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टिकैत का ऐलान- दिल्ली की सीमा से नहीं हटेंगे, जारी रहेगा आंदोलन: टिकरी-सिंघु बॉर्डर पर बढ़ा ‘किसानों’ का जमावड़ा, पिज्जा पार्टी भी

किसान आंदोलन को आज एक साल पूरे हो गए। नए कृषि कानूनों की वापसी की प्रक्रिया भी शुरू हो गई, लेकिन MSP समेत दूसरी कई माँगों के नाम पर किसान नेता बॉर्डर और महापंचायत बुलाकर शक्ति प्रदर्शन कर रहे हैं। टीकरी बॉर्डर के पास सेक्टर-13 में भी किसान महापंचायत हो रही है। इसके अलावा सिंघु बॉर्डर पर भी किसानों की काफी भीड़ है। यहाँ पिज्जा पार्टी करके आंदोलन की पहली सालगिरह मनाई जा रही है।

आंदोलन के एक साल पूरे होने के पर भी किसानों की वापसी के आसार नजर नहीं आ रहे हैं लगातार किसान नेताओं की डिमांड बढ़ रही है। राकेश टिकैत ने कहा, “दिल्ली की सीमाओं पर उन्हें बैठे हुए 1 साल हो गया है। सरकार ने तीनों ‘काले कानूनों’ को वापस लेने की घोषणा भले ही कर दी है, लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) समेत कई अन्य मुद्दे पर सरकार ने मौन धारण किया हुआ है। सरकार इस मुद्दों पर किसानों से कोई बात नहीं कर रही है। जब तक किसानों की सभी माँगे पूरी नहीं होतीं तब तक किसान दिल्ली की सीमाओं से हटने वाले नहीं हैं।”

टिकैत ने अपने आगे के प्लान के बारे में बताते हुए कहा, “27 नवंबर को संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक है और उस बैठक में सभी मुद्दों को रखा जाएगा जिसके बाद किसानों के आंदोलन की आगे की रणनीति तय होगी। 29 नवंबर को किसान संसद के सामने ट्रैक्टर मार्च निकालेंगे और अब किसान शांत बैठने वाले नहीं हैं क्योंकि सरकार ने तीनों कृषि कानून वापस लेने का ऐलान भले कर दिया हो, लेकिन किसान शुरू से एमएससी पर गारंटी कानून माँग रहे थे, जिसको लेकर सरकार ने अभी तक कोई जवाब नहीं दिया है, इसलिए किसानों का आंदोलन अभी खत्म नहीं होगा।”

किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा कि सरकार को जो खुला पत्र लिखा गया था उसका भी जवाब अभी तक नहीं आया है। यह सभी मुद्दे संयुक्त किसान मोर्चा की बैठक में उठाए जाएँगे और संयुक्त किसान मोर्चा तय करेगा कि किसानों का आंदोलन आगे क्या रूप लेगा। उन्होंने बताया कि किसान कृषि कानूनों के खिलाफ एक साल से लगातार आंदोलन कर रहे हैं। ठंडी, गर्मी और बरसात में एक साल से खुले आसमान के नीचे धरना -प्रदर्शन कर रहे हैं। इस दौरान करीब 750 आंदोलनकारी किसान शहीद हो चुके हैं। इन मुद्दों को लेकर दिल्ली कि चारों सीमाओं पर हजारों की संख्या में जमा हो रहे हैं। किसानों से विचार-विमर्श के बाद आगे की रणनीति तय की जाएगी।

बता दें कि इधर महापंचायत को लेकर पंजाब से बड़ी संख्या में किसान दिल्ली की सीमाओं पर फिर से इकठ्ठा हो रहे हैं। जिसके मद्देनजर दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा बढ़ाई है। पैरामिलिट्री के जवानों की तादाद भी अधिक हुई है।

धर्मांतरण जिहाद पर TV शो इस्लामोफोबिया? न्यूज नेशन को NBDSA ने सारे वीडियो हटाने के दिए आदेश

न्यूज ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी (NBDSA) को न्यूज नेशन टीवी के शो ‘कन्वर्ज़न जिहाद’ (‘Conversion Jihad’) के खिलाफ 6 नवंबर को एक शिकायत मिली। इसके बाद 15 नवंबर को NBDSA ने एक आदेश पारित किया, जिसमें उसने ब्रॉडकास्टर से यह सुनिश्चित करने के लिए कहा कि अगर उसका एंकर ‘निष्पक्ष’ नहीं रहता है तो उस पर कर्रवाई करे। NBDSA ने चैनल को कार्रवाई करने और कार्यक्रम के संचालन के लिए अपने एंकरों को उचित तरीके से प्रशिक्षित करने का निर्देश दिया।

इसके अलावा, एनबीडीएसए ने निर्देश दिया कि न्यूज नेशन इस कार्यक्रम के सभी वीडियो 7 दिनों के भीतर सभी प्लेटफॉर्म से हटा ले। यदि वीडियो उपलब्ध रहते हैं तो चैनल को लिखित रूप में इसके बारे में NBDSA को सूचित करना होंगे। याद दिला दें कि न्यूज नेशनने ‘कन्वर्ज़न जिहाद’ शो के लिए बिना शर्त माफी जारी किया था। 

एनबीडीएसए के चेयरपर्सन जस्टिस (रिटायर्ड) एके सीकरी ने कहा कि किसी भी न्यूज को प्रसारित करते समय आचार संहिता, प्रसारण मानक, सेल्फ-रेगुलेशन, मौलिक सिद्धांत और विशिष्ट दिशा-निर्देशों और निष्पक्षता का पालन किया जाना चाहिए।

एनबीडीएसए ने एंकर दीपक चौरसिया द्वारा शो के दौरान दिए गए कुछ बयानों पर भी नाराजगी जताई। एनबीडीएसए ने जिन कुछ बयानों का विरोध किया, उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:

1. “मेमचंद जिंदा है जमात शर्मिंदा है”

2. “500- हिंदू कैसे बनाए मुस्लिम?”

3. “क्या मेवात पाकिस्तान बन गया?”

सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति एके सीकरी ने कहा कि इस तरह के बयान सिद्धांतों और दिशानिर्देशों का उल्लंघन करते हैं। बता दें कि YouTube पर NewsNation का वीडियो अब “प्राइवेट” है और इसे आम जनता के लिए ऑफ एयर कर दिया गया है।

न्यूज नेशन टीवी और ‘कन्वर्शन जिहाद’ शो के खिलाफ क्या थी शिकायत

CJP (सिटीजन्स फॉर जस्टिस एंड पीस) नामक एक एनजीओ ने न्यूज नेशन टीवी के “कन्वर्ज़न जिहाद” शो को लेकर एनबीएसडीए में शिकायत दर्ज कराई थी। इस शो की एंकरिंग दीपक चौरसिया ने की थी। शिकायत में कहा गया कि एंकर ने मौलाना सैयद उल कादरी को ‘झूठ का कारखाना’ बताया था और पूरे मुस्लिम समुदाय की ओर से उन्हें माफी माँगने के लिए कहा था।

शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि जमात द्वारा गैर-धार्मिक और देश विरोधी गतिविधि को अंजाम देने की बात कहकर इस दौरान “इस्लामोफोबिक” विचारों को बढ़ावा देने का “प्रयास” किया गया। एनजीओ ने दावा किया कि इस तरह के कार्यक्रमों को प्रसारित नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि वे भारत की “समग्र और विविधता” की संस्कृति को नुकसान पहुँचा सकते हैं और इससे हिंसा हो सकती है।

इस पर न्यूज नेशन टीवी ने कहा था कि कार्यक्रम में मेहमानों द्वारा दिए गए बयानों के लिए चैनल या एंकर को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। हालाँकि, चैनल ने कहा कि इससे अगर किसी को ठेस पहुँची है तो उन्होंने बिना शर्त माफी माँग रहा है। माफी माँगने के बावजूद NBDSA ने इसे ‘इस्लामोफोबिया’ बताते हुए शो के वीडियो को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हटाने का आदेश दिया।

घोड़ी थी ही नहीं, दावा- दलित दूल्हों को दबंगों ने घोड़ी पर बैठने नहीं दिया: मीडिया ‘एजेंडा’ की राजस्थान पुलिस ने खोली पोल

पिछले दिनों मेनस्ट्रीम मीडिया में राजस्थान के बूँदी जिले की एक खबर आई थी। इन रिपोर्टों में दावा किया गया था कि दलित समुदाय के दूल्हों को घोड़ी पर नहीं बैठने दिया गया। राजस्थान पुलिस ने एक बयान जारी कर इन खबरों को गलत बताया है। पुलिस के अनुसार दूल्हों के लिए वधू पक्ष घोड़ी की व्यवस्था ही नहीं कर पाए थे।

मीडिया रिपोर्टों में बताया गया था कि नीम का खेड़ा गाँव निवासी गणेश लाल मेघवाल की तीन बेटियों की शादी थी। बारात भीलवाड़ा जिले के 3 परिवारों से आई थी। जब दूल्हों को घोड़ियों पर बिठाकर तोरण द्वार पर ले जाने की तैयारी हो रही थी, तभी कुछ दबंग (गुर्जर बिरादरी) इकट्ठा हो गए और इसका विरोध किया। इसके बाद दूल्हे कार से ले जाए गए। कुछ रिपोर्टों में कहा गया है कि दूल्हे मोटरसाइकिल पर ले जाए गए। इन रिपोर्टों के अनुसार दलितों के विरोध करने में माली समाज के लोग भी गुर्जर का साथ दे रहे थे।

पूरे मामले की हकीकत जानने से पहले जरा कुछ मीडिया रिपोर्टों पर गौर करिए। TV 9 भारतवर्ष ने लिखा, “पुलिस के सामने ही दबंगों की गुंडागर्दी। दलित दूल्हे को नहीं चढ़ने दिया घोड़ी, जबरदस्ती उतार कर बाइक से भेजा।”

TV 9

यूनीवार्ता ने भी’ ‘दबंगों ने नहीं होने दी 3 दलित दूल्हों की घुड़चढ़ी’ जैसा शीर्षक दिया।

इस खबर पर दैनिक भास्कर की हेडलाइन थी – विरोध के चलते घोड़ी पर नहीं बैठ पाए 3 दलित दूल्हे।

दैनिक भास्कर

हिंदुस्तान ने हेडलाइन दी- दबंगों ने दलित दूल्हों को घोड़ी पर चढ़कर बारात नहीं ले जाने दी।

हिंदुस्तान

पत्रिका की खबर के अनुसार राजस्थान में दलित दूल्हों को नहीं चढ़ने दिया गया घोड़ी। कार में बैठ कर आए 3 दूल्हे।

पत्रिका

नवभारत टाइम्स ने लिखा, ‘राजस्थान में दलित दूल्हों के शादी में घोड़ी पर बैठना आज भी मना।’

NBT

न्यूज़ ट्रैक ने लिखा- दबंगों की गुंडागर्दी के आगे पुलिस बनी मूकदर्शक! दलित दूल्हों को नहीं चढ़ने दिया घोड़ी, जबरदस्ती उतारकर बाइक से भेजा।’

न्यूज़ ट्रैक

इसी प्रकार की खबरें कुछ स्थानीय पोर्टलों ने भी प्रकाशित की थी। थोड़े ही समय में इस मामले को राजनैतिक तूल मिलने लगा। इस पर बयानबाजी शुरू हो गई।

दिलीप मंडल

इस मामले का सच राजस्थान पुलिस ने बतया है। राजस्थान की बूँदी पुलिस द्वारा जारी प्रेसनोट ने तमाम मीडिया संस्थानों के दावों को झुठला दिया है। पुलिस द्वारा 23 नवम्बर 2021 को जारी प्रेसनोट में कहा गया है कि कुछ समाचार पत्रों व सोशल मीडिया में 21 नवम्बर 2021 को गाँव नीम का खेड़ा में आई बारात के बारे में खबर छपी है कि उसमे किसी जाति विशेष के विरोध के चलते दलित दूल्हों को घोड़ी पर नहीं चढ़ने दिया गया। दूल्हे घोड़ी पर इसलिए नहीं बैठ पाए थे क्योंकि लड़की पक्ष वालों ने जहाँ से घोड़ी का इंतज़ाम किया था वहाँ घोड़ी उपलब्ध ही नहीं थी।

इसी के साथ पुलिस ने स्पष्ट किया है कि नीम का खेड़ा गाँव में दलित दूल्हों को घोड़ी पर बैठने को ले कर कोई विवाद ही नहीं था। किसी भी पक्ष द्वारा पुलिस से शादी से पहले या शादी के बाद किसी भी प्रकार की कोई शिकायत भी नहीं की गई है। उसी गाँव के लोगों ने दूल्हों को गाड़ी में बिठाकर तोरण का कार्यक्रम पूरा करवाया। पूरे कार्यक्रम के दौरान पुलिस मौजूद रही। शादी के दौरान कानून-व्यवस्था की स्थिति पूरी तरह से सामान्य रही।

इस मामले में ऑप इंडिया ने बूँदी जिले के सदर थाना प्रभारी से बात की। उन्होंने बताया की कि पुलिस कंट्रोल रूम पर ये सूचना थी कि नीम का खेड़ा गाँव की बारात में व्यवधान न हो इसके लिए फ़ोर्स भेजी जाए। मैं मौके पर गया। मैंने लड़की के पिता गणेश लाल मेघवाल से पूछा कि उन्हें किसी से कोई दिक्कत तो नहीं ? उन्होंने बताया कि मुझे कोई दिक्कत नहीं, सब सामान्य है। घोड़ी वहाँ थी ही नहीं। बारात के दौरान मैं वहाँ रुका रहा। किसी भी प्रकार का कोई भी विवाद नहीं हुआ, सब कुछ सामान्य रूप में बीता।

‘क्या आप कह रहे हैं कि हिंदू समूहों ने (गोधरा) ट्रेन जलाने की साजिश रची… हद है’: जकिया जाफरी की याचिका पर कोर्ट में एसआईटी

2002 के गुजरात दंगों की जाँच कर रही सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एसआईटी ने हिंदू समूहों द्वारा मुस्लिमों को फँसाने के लिए ट्रेन जलाने की योजना बनाने वाले आरोपों को ‘बेतुका’ करार दिया है। एसआईटी ने कहा है कि हिंदू समूहों द्वारा साबरमती एक्सप्रेस में एस-6 कोच को जलाने की योजना बनाने वाले दावे निराधार हैं

द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, अदालत में एसआईटी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा, “आरोप है (कि) घटना से पहले, यानि 27 फरवरी से पहले हथियार इकठ्ठा होने शुरू हो गए थे। यह मेरे दिमाग को चकरा देता है। मान लीजिए कि मैं विहिप का कट्टर हिंदू सदस्य हूँ और मैं ट्रेन जलने की घटना की तारीख जाने बिना 25 फरवरी को हथियार रख रहा हूँ, इसका कोई मतलब नहीं है…।

अधिवक्ता रोहतगी ने आगे कहा, “या आप कह रहे हैं कि यह ट्रेन जलाने की भी साजिश रची गई थी? यह सही नहीं हो सकता। क्योंकि ट्रेन पाँच घंटे की देरी से चल रही थी और केवल दो मिनट के लिए रुकने वाली थी। वे नहीं जान सकते थे। यह बेतुका है। यहाँ जो कहा जा रहा है उसकी एक सीमा है।”

रोहतगी ने कहा, “या तो उन्हें पता था कि ट्रेन पाँच घंटे लेट होगी और दूसरा पक्ष हमला करेगा और उनके पास वापस हमला करने के लिए सामग्री होगी। यह वाइल्ड है।”

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि वामपंथी-इस्लामी समूहों द्वारा गोधरा ट्रेन जलाने की घटना को भी हिंदू समूहों द्वारा ही किया गया काम बताने और महिलाओं और बच्चों सहित 59 निर्दोष हिंदुओं को मारने वाले मुस्लिम दंगाइयों के अपराधों पर लीपापोती के अनगिनत प्रयास किए गए हैं।

जस्टिस एएम खानवलीकर, दिनेश माहेश्वरी और सीटी रविकुमार की बेंच गुजरात दंगों में मारे गए कॉन्ग्रेस के पूर्व सांसद अहसान जाफरी की पत्नी जकिया जाफरी की अपील पर सुनवाई कर रही थी।

5 अक्टूबर, 2017 को, गुजरात उच्च न्यायालय ने अहमदाबाद मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा था जिसमें एसआईटी द्वारा प्रस्तुत क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया गया था। एसआईटी ने गुजरात के पूर्व सीएम नरेंद्र मोदी और 63 अन्य को दंगों से जुड़े मामलों में क्लीन चिट दे दी थी।

अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने अदालत को बताया कि जकिया जाफरी ने 2006 में अपनी शिकायत दर्ज की थी, एक साल बाद, जब वह हाईकोर्ट गई, तब तक तीस्ता सीतलवाड़ शामिल हो गई थीं। उन्होंने याद दिलाया कि हाईकोर्ट ने पहले माना था कि सीतलवाड़ की कोई भूमिका नहीं थी। और वह इस मामले में प्रोसिडिंग जारी रखने की हकदार नहीं थीं। उन्होंने कहा कि श्रीमती जाफरी की शिकायतों की जाँच के लिए एसआईटी को सुप्रीम कोर्ट का निर्देश स्पष्ट और संरक्षित था।

रोहतगी ने आगे कहा, “जब तक मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश के खिलाफ विरोध याचिका दायर की गई थी, तब तक चीजें सीमा से बाहर हो गई थीं।” शिकायत 30-40 पन्नों की थी, विरोध 1200 पन्नों का था और अब कोर्ट के सामने 20,000 पन्नों से ज्यादा का रिकॉर्ड है।

रोहतगी ने कहा कि तीस्ता सीतलवाड़ का एनजीओ अब इसे आगे बढ़ा रहा है, जिसे श्रीमती जाफरी की शिकायत पर महज गौर करने का आदेश दिया गया था, इस धारणा के साथ कि गुलबर्ग सोसाइटी मामले में उनके पास कुछ बताने के लिए हो सकता है, जो अब तीस्ता सीतलवाड़ की भागीदारी से कुछ का कुछ और हो गया है।

जम्मू-कश्मीर: अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के सभी गुटों को UAPA के तहत बैन करेगी सरकार, टेरर फंडिंग पर कसेगी नकेल

जम्मू-कश्मीर में शांति व्यवस्था में खलल डालने और कट्टरता फैलाने में अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का अहम रोल रहा है। इसके कई नेताओं पर आतंकियों को धन मुहैया कराने का आरोप है। इसको देखते हुए केंद्र की मोदी सरकार जल्द ही कश्मीरी अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के सभी गुटों को गैर-कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत प्रतिबंधित कर सकती है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, खुफिया एजेंसियों के सूत्रों ने कहा कि मोदी सरकार हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के सभी गुटों पर प्रतिबंध लगाने का फैसला ले सकती है। इनमें मृत सैयद अली शाह गिलानी का गुट भी शामिल है। हुर्रियत के इन गुटों को सरकार UAPA की धारा 3(1) के तहत बैन करने की योजना पर काम कर रही है।

हाल ही में NIA के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर सरकार ने गृह मंत्रालय को हुर्रियत कॉन्फ्रेंस द्वारा राज्य में टेरर फंडिंग की जानकारी दी गई थी। इसके बाद केंद्रीय गृहमंत्री ने एनआईए और राज्य सरकार से इस मामले में और अधिक जानकारी साझा करने को कहा था। सूत्रों के मुताबिक, गृह मंत्रालय द्वारा माँगी गई जानकारी उसे सौंप दी गई है।

एक अधिकारी ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के कई नेता बीते कुछ सालों में जेल में बंद हैं और जाँच एजेंसियाँ टेरर फंडिंग नेटवर्क को भेदने में कामयाब रही हैं। संगठन के सभी गुटों पर बैन से आतंकवाद से और अधिक प्रभावी तरीके से निपटा जा सकेगा। उन्होंने कहा कि बैन से एजेंसियों को हुर्रियत सम्मेलन द्वारा किए जाने वाले सामुदायिक स्तर के फंड संग्रह पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी। अलगाववादी संगठन बाद में उसी पैसे को पाकिस्तान की आईएसआई के निर्देश पर कश्मीर में आतंकियों को देती है।

अधिकारी ने आगे बताया कि यूएपीए के तहत बैन लगाने से टेरर फंडिंग के साथ ही हुर्रियत द्वारा जिन रास्तों से फंडिंग की जाती है, उसे भी रोका जा सकेगा। उल्लेखनीय है कि हुर्रियत पाकिस्तान के कॉलेजों में अपने कोटे से मेडिकल सीटों की बिक्री करता है और उससे मिलने वाले पैसे को कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए इस्तेमाल करता है।

बैन लगाने के बाद हुर्रियत को अपने सभी कार्यालयों और बुनियादी ढाँचे को तोड़ना होगा। इसके अलावा उसके द्वारा बुलाए जाने वाले बंद और विरोध को अवैध हो जाएँगे। सरकार हुर्रियत के खिलाफ बैन करने का फैसला करने के बाद आधिकारिक राजपत्र में इसकी घोषणा करेगी। इसके बाद, इस फैसलों को यूएपीए के तहत गठित समिति द्वारा मंजूरी देनी होगी।

‘परिवारवाद स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा, राजनीतिक लाभ के लिए सजा पाए लोगों का महिमामंडन किया जा रहा’: संविधान दिवस पर PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संविधान दिवस के अवसर पर शुक्रवार (26 नवंबर) को संसद भवन में एक सभा को संबोधित करते हुए कॉन्ग्रेस को कठघड़े में खड़ा किया। प्रधानमंत्री ने परिवारवाद को लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बताते हुए परोक्ष रूप से कॉन्ग्रेस को ‘पार्टी फॉर द फैमिली, पार्टी बाय द फैमिली’ बताया। उन्होंने कहा कि यदि कोई पार्टी एक परिवार द्वारा कई पीढ़ियों तक चलाई जाती है तो यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। संविधान बनाने वालों ने देशहित को सबसे ऊपर रखा, लेकिन समय के साथ राजनीति में देशहित पीछे छूट गया। वहीं, इस कार्यक्रम का विपक्ष दलों ने बहिष्कार किया।

पीएम मोदी ने कहा, “लोकतंत्र के प्रति आस्था रखने वाले लोगों के लिए चिंता का एक विषय है और वो हैं पारिवारिक पार्टियाँ। राजनीतिक दल ‘पार्टी फॉर द फैमिली, ‘पार्टी बाय द फैमिली’… अब आगे कहने की मुझे जरूरत नहीं लगती है। ये संवैधानिक भावना के खिलाफ है, संविधान के विपरीत है। एक पार्टी जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी एक ही परिवार चलाता रहे, पार्टी की सारी व्यवस्था परिवारों के पास रहे, वो स्वस्थ लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा संकट होता है।”

पीएम मोदी ने कहा कि महात्मा गाँधी ने कर्तव्य के जो बीज बोए थे, आजादी के बाद वह वटवृक्ष बन जाने चाहिए थे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। उन्होंने आगे कहा, “चिंता तब होती है जब न्यायपालिका ने किसी को भ्रष्टाचार के लिए घोषित कर दिया है, भ्रष्टाचार के लिए उसे सजा हो चुकी है, लेकिन राजनीतिक स्वार्थ के कारण उसका भी महिमामंडन चलता रहे, राजनीतिक लाभ के लिए सारी मर्यादाओं को तोड़कर, लोक-लाज को छोड़कर उनके साथ बैठना-उठना शुरू हो जाता है तो देश के नौजवान के मन में लगता है कि भ्रष्टाचार के रास्ते पर चलना बुरा नहीं है। उन्हें रास्ता मिल जाता है। क्या हमें ऐसी समाज व्यवस्था खड़ी करनी है?”

प्रधानमंत्री ने कहा कि देश आजाद होने के बाद 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाने की परंपरा शुरू करनी चाहिए थी। इससे आने वाली पीढ़ियाँ जानती कि संविधान बना कैसे, किसने बनाया, क्यों बनाया। यह विविधता भरे इस देश में ताकत और अवसर के रूप में काम आता, लेकिन कुछ लोग इससे चूक गए।

संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री ने डॉक्टर भीमराव अंबेडकर, राजेंद्र प्रसाद, महात्मा गाँधी जैसे सेनानियों को नमन किया। मुंबई हमले को याद करते हुए उन्होंने कहा, “आज 26/11 का वो दुखद दिन है, जब देश के दुश्मनों ने देश के भीतर आकर मुंबई में आतंकवादी घटना को अंजाम दिया। देश के अनेक हमारे वीर जवानों ने उन आतंकवादियों से लोहा लेते-लेते अपने आपको समर्पित कर सर्वोच्च बलिदान किया। मैं आज उन सभी बलिदानियों को नमन करता हूँ।”

वहीं, संविधान दिवस के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम का देश की 14 विपक्षी पार्टियों ने बहिष्कार किया। इनमें शिव सेना, राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, सीपीआई, सीपीएम, आईयूएमएल और डीएमके शामिल हैं। दरअसल, कॉन्ग्रेस और तृणमूल कॉन्ग्रेस ने इस कार्यक्रम में शामिल होने से पहले ही इनकार कर दिया था। इसके बाद कॉन्ग्रेस की अपील पर बाकी पार्टियों ने इसका बहिष्कार किया।

‘लड़कर लेंगे ​हिंदुस्तान’ कहने वालों को मोहन भागवत की दो टूक- ये 2021 है, 1947 नहीं: RSS प्रमुख ने उठाई ‘अखंड भारत’ की बात

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि भारत के विभाजन की पीड़ा का समाधान बँटवारे को निरस्त करना ही है। गुरुवार (25 नवंबर 2021) को नोएडा में कृष्णा नंद सागर लिखित पुस्तक ‘विभाजनकालीन भारत के साक्षी’ के लोकार्पण समारोह के दौरान संघ प्रमुख ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि यह 2021 का भारत है, 1947 का नहीं। एक बार विभाजन हो चुका है अब दोबारा ऐसा नहीं होगा।

भागवत ने कहा, “आपकी पूजा बदल गई, इससे हमको फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि हमारे यहाँ जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी वाली परंपरा है। आपको लगता है कि पूर्वजों के घर में आना है तो आओ हम लेने के लिए बिलकुल तैयार हैं। नहीं, लगता तो अपनी पूजा में लगे रहो। आपकी पूजा का भी संरक्षण हम करेंगे। परंतु अलगाव नहीं चलेगा। मातृभूमि हमारी शक्ति है। वो प्रॉपर्टी नहीं है जो आप तोड़कर माँग रहे हो। उसे किराए पर नहीं दिया जा सकता, उसे बेचा नहीं जा सकता। वो हमारी मातृभूमि है। आपको भी उसके साथ उसी भाव से रहना होगा।”

भागवत ने कहा, “एक योजनाबद्ध षड्यंत्र किया गया। हमने समझौता करने के लिए सब कुछ छोड़ दिया। हमने अपने राष्ट्रध्वज के रंग इसलिए बदल दिए क्योंकि उनको बुरा लगेगा। हमने सीधे देश में दरार डालने वाली माँग इसलिए स्वीकार की, क्योंकि उनको बुरा लगेगा। ‘हँस कर लिया पाकिस्तान, लड़ कर लेंगे हिंदुस्तान’ की आकांक्षा रखने वालों को बताना चाहता हूँ कि मैं पूरे देश घूमता हूँ। आपको बताता हूँ कि ये 2021 है, 1947 नहीं। भारत का विभाजन एक बार संभव हुआ। एक बहुत बड़ी ठोकर हमारे समाज ने खाई, लहूलुहान हो गया, पीड़ा से कुलबुला उठा। लेकिन अब वो इस बात को भूलेगा नहीं। इसलिए भारत का विभाजन अब संभव नहीं। कोई इसके प्रयास करेगा तो उसके टुकड़े होंगे।”

मोहन भागवत ने विभाजन के संदर्भ में कहा, “देश का विभाजन न मिटने वाली वेदना है, क्योंकि भारत के विभाजन में सबसे पहली बलि मानवता की गई। खून की नदियाँ न बहे, इसलिए यह प्रस्ताव स्वीकार किया गया। नहीं करते तो जितना खून बहता उससे कई गुना खून उस समय बहा और आज भी बह रहा है। एक तो बात साफ है विभाजन का उपाय, उपाय नहीं था। इससे न तो भारत सुखी है और न ही वो लोग सुखी हैं, जिन्होंने उस समय इस्लाम के नाम पर इसकी माँग की थी।”

उन्होंने आगे कहा, “विभाजन की उत्पत्ति किस मानसिकता में है कि हम तुम्हारे साथ नहीं रह सकते हैं, क्यों… क्योंकि हम अलग हैं, इसलिए हम साथ नहीं रह सकते। तुम्हारे साथ हमारा अलगाव है। एकता नहीं है। भारत नाम की प्रवृत्ति कहती है कि तुम अलग हो, इसलिए तुमको अलग होने की आवश्यकता नहीं है। जितना तुम्हारा अलगाव है, तुम्हारे लिए ठीक है, उसे अपने पास रखो। मेरी विशिष्टता मेरे पास है, मैं उसका सम्मान करता हूँ। तुम्हारी विशिष्टता का सम्मान करता हूँ। झगड़ा करने की बात कहाँ है। मिलकर चलें।”

उन्होंने कहा, “ये विभाजन उस समय की वर्तमान परिस्थिति का जितना नतीजा है उससे ज़्यादा इस्लाम के आक्रमण और ब्रिटिशों के आक्रमण का नतीजा है। इस्लाम के आक्रमण से पहले भी भारत में कई आक्रमण हुए लेकिन वो लूट कर चले गए या यहाँ के समाज में रच-बस गए। जो भारत में राज करने के लिए यहाँ बस गए थे, वो आज कहाँ गए, पता नहीं। इस्लाम के आक्रमण को लेकर गुरु नानक देव जी ने सावधान किया था। गुरु नानक देव ने साफ कह दिया था कि ये आक्रमण हिंदुस्तान पर है, हिंदू समाज पर है, किसी एक पूजा पर नहीं। निराकार की पूजा भारत में भी है लेकिन उसको भी नहीं छोड़ा गया क्योंकि संबंध पूजा से नहीं बल्कि प्रवृत्ति से था। वो प्रवृत्ति कि हम ही सही हैं बाकी सब गलत हैं, जिनको रहना है, हमारे तरीके से रहना पड़ेगा।”

संघ प्रमुख ने आगे कहा, “हमारी क्या-क्या गलती हुई, वो गलती हम नहीं दोहराएँगे। देश की अखंडता के बारे में कभी भी कोई भी समझौता नहीं होगा। लड़ना पड़े, तो लड़ेंगे, मरना पड़े तो मरेंगे। धर्म के लिए इतने बलिदान हुए। बलिदान करने वालों को तो पता था कि हम गए तो दुनिया है या नहीं हमको क्या पता… परंतु उन्होंने इसका विचार नहीं किया… ये एक सत्य है। ये हमारा भारतवर्ष है… ये हमारा हिंदू राष्ट्र है। हम हिंदू हैं। हम नहीं छोड़ेंगे।”

देश को विभाजित करने वाले नारों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “15 अगस्त 1947 की खंडित स्वतंत्रता के बाद भी यह संघर्ष समाप्त नहीं हुआ है। ये आपको बताने की जरूरत नहीं है कि क्योंकि भारत में नारे लगते हैं, भारत तेरे टुकड़े होंगे।”

सलमान खुर्शीद की ‘सनराइज ओवर अयोध्या’ पर बैन से दिल्ली HC का इनकार, कहा- ‘जरूरी नहीं कि इसे पढ़ें ही’

दिल्ली हाईकोर्ट ने सलमान खुर्शीद की विवादित किताब ‘सनराइज ओवर अयोध्या’ पर बैन लगाने से मना कर दिया है। विनीत जिंदल की याचिका को ख़ारिज करते हुए कोर्ट ने कहा, “हम क्या कर सकते हैं यदि लोग इतने संवेदनशील हो चुके हैं तो। किसी ने ये तो नहीं कहा है न कि इसे पढ़ें ही।” कोर्ट ने यह भी कहा, “अगर आप इस किताब को नहीं पढ़ना चाहते हैं तो अपनी आँखें बंद कर लीजिए। अगर किताब से भावनाएँ आहत होती हैं, तो इससे बेहतर किताब पढ़ सकते हैं।” अदालत ने ये भी कहा कि किताबों की बिक्री और प्रकाशन रोकने के अधिकार सरकार के पास होते हैं। यह फैसला जस्टिस यशवंत वर्मा की बेंच ने सुनाया है।

याचिकाकर्ता विनीत जिंदल की तरफ से वकील राज किशोर ने बहस की। उनके अनुसार किताब के प्रकाशित होने से साम्प्रदायिक तनाव फ़ैल सकता है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार याचिका में किताब के प्रकाशन और बिक्री पर बैन लगाने की माँग की गई थी। इस किताब में हिंदुत्व की तुलना आतंकी संगठनों आईएसआईएस और बोको हराम जैसे कट्टरपंथी मुस्लिम समूहों से करने का आरोप है। याचिकाकर्ता के अनुसार सलमान खुर्शीद की किताब ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ की सीमा को पार कर रही है।

याचिकाकर्ता विनीत जिंदल इससे पहले भी सलमान खुर्शीद के खिलाफ दिल्ली पुलिस में शिकायत दर्ज करवा चुके हैं। वहीं इससे पहले भी दिल्ली उच्च न्यायालय सलमान खुर्शीद की किताब पर बैन लगाने की याचिका ख़ारिज कर चुका है। इसी माह हिन्दू सेना के विष्णु गुप्ता की याचिका को ख़ारिज करते हुए एडिशनल जज प्रीती परेवा ने कहा था, “प्रथम दृष्टया अदालत की राय में ऐसा कोई मामला नहीं बनता है कि इस पर एकतरफा आदेश दिया जाए। लेखक को किताब लिखने और उसे प्रकाशित करने का अधिकार है।”

हिंदुत्व की तुलना इस्लामिक जिहादी संगठन आईएस और बोको हराम से करना ही किताब पर फैले विवाद का मुख्य कारण है। यह टिप्पणी किताब के पेज 113 पर ‘द केसर स्काई’ नामक एक अध्याय में की गई है। इसमें कहा गया है कि आईएसआईएस और बोको हराम के लिए हिंदू धर्म की समानता को एक नकारात्मक विचारधारा के रूप में माना जाता है, जिसका हिंदू पालन कर रहे हैं और हिंदू धर्म हिंसक, अमानवीय और दमनकारी है। सलमान खुर्शीद की विवादित पुस्तक में हिन्दू और हिंदुत्व को अलग बताया गया है। हिन्दू धर्म को गाँधी के नजरिए से लिखने का दावा किया गया है। इस किताब के विमोचन के बाद ही विरोध का सिलसिला शुरू हो गया है।

मोहल्ला क्लीनिक में दवा लेने गई थी 12 साल की बच्ची, डॉक्टर ने की घिनौनी हरकत: दिल्ली के कराला का मामला

दिल्ली के एक मोहल्ला क्लीनिक में एक नाबालिग बच्ची के साथ यौन शोषण का मामला सामने आया है। बच्ची दलित समुदाय से है जिसकी उम्र 12 साल बताई जा रही है। पीड़िता के पिता वेंडर हैं। आरोप मोहल्ला क्लीनिक के डॉक्टर पर ही लगा है जिसका नाम रक्षित दहिया बताया जा रहा है। घटना बुधवार (24 नवम्बर 2021) की है। पुलिस ने आरोपित डॉक्टर को गिरफ्तार कर लिया है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार यह घटना दिल्ली के कराला इलाके में खुले मुहल्ला क्लीनिक की है। घटना बुधवार शाम की है जब बच्ची क्लीनिक में दवा लेने गई थी। आरोप है कि तब डॉक्टर ने उसके साथ घिनौनी हरकत की। बच्ची ने घर जा कर अपने परिवार वालों को ये बात बताई। बच्ची के परिजन अगले दिन गुरुवार (25 नवम्बर 2021) को पड़ोसियों के साथ क्लीनिक पर गए। उसी समय सुबह लगभग 11.15 पर पुलिस को बुला लिया गया।

पुलिस ने लड़की का बयान दर्ज किया। पीड़ित बच्ची की काउंसलिंग भी करवाई गई है। आरोपित डॉक्टर के विरुद्ध थाना कंझावला में पॉक्सो एक्ट व अन्य धाराओं में केस दर्ज कर लिया गया है। पुलिस कार्रवाई की जानकारी देते हुए डीसीपी प्रणव तायल ने बताया कि बच्ची का मेडिकल कराया गया है। साथ ही आरोपित को पॉक्सो व अन्य धाराओं में गिरफ्तार कर लिया गया है।

भारतीय जनता पार्टी के दिल्ली कोषाध्यक्ष विष्णु मित्तल ने इस घटना के बाद मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल से इस संबंध में प्रकाशित रिपोर्ट साझा करते हुए लिखा है, “अब ये हालत हो चुकी है आम आदमी पार्टी के मोहल्ला क्लीनिक की। एक दलित बच्ची के साथ।”

ईसाई बनने के बाद दलित से शादी, माँग रहा था अंतर जातीय विवाह प्रमाण-पत्र: हाई कोर्ट ने ठुकराई अर्जी, कहा- धर्म बदलने से जाति नहीं बदलती

मद्रास उच्च न्यायालय ने एक आदेश में कहा कि धर्मांतरण करने से व्यक्ति की जाति नहीं बदलती। इसके आधार पर अंतर जातीय प्रमाण-पत्र (inter-caste certificate) जारी नहीं किया जा सकता। जस्टिस एसएम सुब्रह्मण्यम ने अनुसूचित जाति (SC) वर्ग के एक व्यक्ति की याचिका को खारिज करते हुए यह आदेश दिया।  

तमिलनाडु के सलेम जिले के निवासी ए पॉल राज जन्म से आदि द्रविड़ समुदाय (अनुसूचित जाति) से आते हैं। बाद में धर्म परिवर्तन कर वे ईसाई बन गए। इसके बाद राज्य समाज कल्याण विभाग के एक पुराने आदेश के तहत पिछड़ा वर्ग का सर्टिफिकेट हासिल कर लिया। बाद में अरुन्थातियार समुदाय की एक महिला से शादी की। यह भी अनुसूचित जाति वर्ग में आती है।

इसके आधार पर ए पॉल राज ने सलेम जिला प्रशासन में अंतरजातीय विवाह प्रमाण-पत्र बनवाने का आवेदन दिया, जिसे खारिज कर दिया गया। इस फैसले को मद्रास हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। हाई कोर्ट ने पाया कि जन्म से दोनों पति-पत्नी अनुसूचित जाति के हैं। कोर्ट ने कहा कि धर्म परिवर्तन करने से जाति नहीं बदलती, इसलिए राज को भले ही पिछड़ा वर्ग का प्रमाण-पत्र जारी कर दिया गया हो, लेकिन उनकी जाति नहीं बदली है। ऐसे में उन्हें अंतरजातीय विवाह का प्रमाण-पत्र नहीं दिया जा सकता।

गौरतलब है कि अंतरजातीय विवाह प्रमाण-पत्र होने पर सरकारी नौकरी में प्राथमिकता मिलती है। सरकारी कल्‍याणकारी योजनाओं का लाभ मिलता है। लेकिन न्यायाधीश ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि पति और पत्‍नी दोनों ही एक समुदाय से हैं, इस कारण से वे अंतरजातीय विवाह प्रमाण-पत्र के हकदार नहीं हैं।

मद्रास हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जाति जन्म से निर्धारित होती है। धर्म परिवर्तन से यह नहीं बदलती। इस मामले में पति और पत्नी दोनों एससी वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। केवल इस आधार पर अंतर जातीय विवाह प्रमाण-पत्र नहीं किया जा सकता कि किसी दलित ने धर्म परिवर्तन करने के बाद एससी वर्ग से आने वाले के साथ शादी की है।