रामनिवास जाट ने बुधवार (24 नवम्बर 2021) को आत्महत्या कर ली। वे एक ऐसी बेटी के पिता थे जिसे भगा ले जाने का आरोप यासीन खां के बेटे अनीस पर है। रिपोर्टों के अनुसार जब रामनिवास ने अपनी नाबालिग बेटी को भगा ले जाने की शिकायत पुलिस से की तो आरोपित पक्ष उन्हें धमकाने लगा। इतना धमकाया कि वे जान देने को मजबूर हो गए। मामला राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले का है।
आत्महत्या के बाद आक्रोशित ग्रामीणों ने रामनिवास का शव रखकर प्रदर्शन किया। पुलिसकर्मियों को सस्पेंड करते हुए आरोपितों की गिरफ्तारी की माँग की। हनुमानगढ़ पुलिस का कहना है कि मामला दर्ज कर आरोपितों की तलाश की जा रही है।
राजस्थान के भादरा में नाबालिग लड़की को यसिन खाँ भगा कर ले गया । लड़की के पिता को धमका कर कहा की तेरी लड़की ने इस्लाम स्वीकार कर निकाह कर लिया है ।
मृतक रामनिवास जाट पचारवाली गाँव के रहने वाले थे। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार 7-8 नवंबर को रामनिवास की नाबालिग बेटी को अनीस बहला-फुसलाकर भगा ले गया। इसकी शिकायत पुलिस से की गई। पुलिस पर आरोप है कि उसने लड़की को खोजने का कोई प्रयास नहीं किया।
आरोप है कि शिकायत किए जाने के बाद इस बीच रामनिवास जाट को यासीन खां और उसका दूसरा बीटा सोनू 4-5 अन्य लोगों के साथ केस वापस लेने के लिए धमकाने लगा। कथित तौर पर रामनिवास से कहा गया- तेरी बेटी ने इस्लाम कबूल कर निकाह कर लिया है। मुकदमा वापस नहीं लिया तो तेरे बेटे पंकज को जान से मार देंगे। इतना ही नहीं पीड़ित परिवार का पीछा किया जाने लगा और डराने के तमाम प्रयास किए गए।
बताया जाता है कि जिस दिन रामनिवास ने आत्महत्या की उस दिन भी सुबह एक गाड़ी में 5-7 लोग उनके घर आए थे। उन्होंने जोर-जोर से हाॅर्न बजाया और दहशत फैलाने के लिए गली में कई बार गाड़ी घुमाई। इससे डर कर रामनिवास ने पहले अपने परिवार को घर के अंदर बंद किया और बाद में जहरीला पदार्थ खाकर आत्महत्या कर ली। पुलिस ने इस मामले में केस दर्ज कर जाँच शुरू कर दी है।
मृतक के भाई द्वारा रिपोर्ट दी गई जिस पर मुकदमा दर्ज कर आरोपीगणो की तलाश जारी है ! युवती के सम्बन्ध में पुलिस थाना भिरानी मे प्रकरण दर्ज है एवं तलाश जारी है । इस सम्बंध में न्यायोचित एवं शीघ्रातिशीघ्र कार्यवाही हेतु सम्बंधित को निर्देशित किया जा चुका है ।
एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार अतिरिक्त पुलिस राजेन्द्र मीणा ने लड़की को जल्द बरामद करने का आश्वासन दिया है। मृतक के भाई राजबीर की तहरीर पर अनीस पुत्र यासीन खां, सोनू पुत्र यासीन खां, अनीस की माँ व 4 अन्य अज्ञात के विरुद्ध धारा 306, 509 में केस दर्ज किया गया है।
आजमगढ़ के मुबारकपुर से विधायक शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली ने बहुजन समाज पार्टी (BSP) से इस्तीफा दे दिया है। वे पार्टी विधायक दल के नेता भी थे। उन्होंने बसपा प्रमुख मायावती पर उदासीन रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए इस्तीफा दिया। इसके बाद बसपा ने एक प्रेस रिलीज जारी कर बताया है कि शाह आलम छेड़छाड़ के मुदकमे को वापस कराने का दबाव बना रहे थे।
पार्टी ने शाह आलम के इस्तीफे को लड़की का मामला बताया है। प्रेस रिलीज जारी में कहा गया है कि पार्टी को सोशल मीडिया के माध्यम से पता चला है कि बीएसपी एमएलए व विधानमंडल दल के नेता शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली ने अपने सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है। जिसका खास कारण कुछ और नहीं बल्कि यह है कि इनकी कंपनी में एक लड़की काम करती थी जिसने इनके चरित्र पर गंभीर आरोप लगाते हुए इनके खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी थी। जिसकी जाँच अभी भी चल रही है ऐसा उन्होंने मायावती को खुद बताया था।
रिलीज में कहा गया कि वह चाहते थे कि मायावती यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से कह कर इस मामले की रफा-दफा करा दें। इसके लिए वह हाल ही में मायावती से मिले भी थे। हालाँकि मायावती ने यह कहकर मना कर दिया कि यह लड़की की मामला है इसलिए बेहतर यही होगा कि वह कोर्ट में जाएँ। लेकिन उन्होंने कहा था कि अगर मायावती ने उनकी मदद नहीं की तो वह पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे देंगे।
उल्लेखनीय है कि बसपा से इस्तीफा देते हुए शाह आलम ने अपने लेटर में लिखा था, “पार्टी में मेरे इस कार्यकाल के दौरान बसपा के सभी स्तर कार्यकर्ताओं एवं मतदाताओं से मुझे बहुत ही आदर सम्मान एवं प्यार मिला है। जिसका मैं सदैव एहसानमंद रहूँगा। साल 2012 से पार्टी के प्रति निष्ठावान रहा और पार्टी की तरफ से मिली हर जिम्मेदारी को बखूबी निभाया भी। अब मुझे लगता है मेरी उपेक्षा की जा रही है कि ऐसे में अब आगे साथ रहने की कोई वजह नहीं है।”
युवती ने दर्ज कराई थी छेड़छाड़ की एफआइआर
लखनऊ के गोमतीनगर थाने में फरवरी, 2020 में एक युवती ने गुड्डू जमाली के खिलाफ छेड़छाड़ व धमकी देने की FIR दर्ज कराई थी। शाह आलम पूर्वांचल प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के सीएमडी भी हैं। पीड़िता ने विधायक के साथ कंपनी के एजीएम अक्षित कपूर और एचआर मैनेजर सुमिता को भी नामजद किया था। युवती का आरोप है कि शाह आलम ने उसे कंपनी में 40 हजार रुपए वेतन पर नौकरी देने का भरोसा दिया था। इसके बाद डिप्टी मैनेजर पद पर उसकी ज्वाइनिंग कराई और फिर छेड़छाड़ करने लगे।
आरोपित विधायक युवती को वीडियो कॉल भी करते थे। युवती ने शाह आलम पर कीमती फ्लैटों की रजिस्ट्री कम दामों में करने का भी आरोप लगाया है। इसके बाद पीड़िता ने गोमतीनगर थाने में एफआइआर दर्ज कराई थी। इस मामले में अब तक न तो चार्जशीट लगाई गई है और न ही अंतिम रिपोर्ट न्यायालय में दाखिल की गई है। गोमतीनगर पुलिस का कहना है कि जाँच जारी है। सबूतों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
हरिश्चंद्र श्रीवर्धनकर अब इस दुनिया में नहीं हैं। देविका रोतावन तंगहाली में जीवन गुजार रही हैं। वैसे तो इन दोनों में दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है। लेकिन 26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुआ हमला दोनों को जोड़ता है। दोनों उस हमले में जख्मी हुए थे। दोनों ने हमले के दौरान जिंदा पकड़े गए आतंकी आमिर अजमल कसाब की पहचान की थी।
तंगहाली का जीवन जी रही देविका रोतावन
देविका रोतावन आखिरी बार चर्चा में अगस्त 2020 में आई थी। उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। वजह ईडब्ल्यूएस स्कीम के तहत मकान जिसे देने का वादा महाराष्ट्र सरकार ने किया था। उन्होंने बताया था कि उनका पूरा परिवार भारी वित्तीय संकट से जूझ रहा है। लिहाजा उन्होंने घर के साथ-साथ कुछ ऐसा प्रबंध करने की गुहार लगाई थी, जिससे वह अपनी आगे की पढ़ाई जारी रख सके।
देविका की उम्र 22 साल है। जब 26/11 का हमला हुआ था वह 10 साल की थी। पुणे जाने के लिए अपने पिता और भाई के साथ छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (CSMT) पहुँची थी। यहीं आतंकियों की गोली उसके पैर में लगी। उसे जख्मी हालत में सेंट जॉर्ज अस्पताल ले जाया गया। दो महीने के भीतर 6 सर्जिकल ऑपरेशन हुए। 6 महीने बेड पर गुजरे। स्वस्थ हुई तो कोर्ट गई और आतंकवादी अजमल कसाब के खिलाफ गवाही दी थी। वह मुंबई आतंकवादी हमले के मामले में सबसे कम उम्र की गवाह थी।
उस समय सरकार की ओर से देविका को कई तरह की सुविधाएँ देने का ऐलान किया गया था। बाद में इन्हें भूला दिया गया। देविका ने जब हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी उस समय बताया था, “पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की ओर से 10 लाख की सहायता राशि मिली थी जो मेरे टीबी के इलाज में खर्च हो गया। मैं इसके लिए शुक्रगुजार हूँ लेकिन जो वादे मेरे से किए गए, वे अभी तक पूरे नहीं हो पाए हैं।”
आतंकी को बैग से मारने वाले हरिश्चंद्र श्रीवर्धानकर
26/11 आतंकी हमले के एक और चश्मदीद हरिश्चंद्र श्रीवर्धानकर ने भी आंतकी अजमल कसाब को कोर्ट में पहचाना था। लेकिन कुछ साल बाद वे फुटफाथ पर डेन डिसूजा नाम के एक व्यक्ति को पड़े मिले थे। 26/11 हमले के दौरान श्रीवर्धनकर को कामा अस्पताल के बाहर आतंकियों की दो गोलियाँ पीठ पर लगी थी। उन्होंने कसाब के साथी इस्माइल को अपने ऑफिस बैग से मारा भी था।
श्रीवर्धानकर की मई 2021 को मौत हो गई थी। मूलत: पश्चिम महाराष्ट्र के कोंकण जिले के रहने वाले हरिश्चंद्र खाद्य और नागरिक आपूर्ति विभाग के सेवानिवृत कर्मचारी थे। जब वे फुटपाथ पर मिले तो पता चला कि परिजनों ने उन्हें घर से निकाल दिया था और वे कई दिनों से सड़क पर पड़े थे।
आज भी उस घटना को याद कर हमारी रूह काँप जाती है, जब 26 नवंबर, 2008 को मुंबई दहली थी। 10 में से 9 आतंकियों को मार गिराया गया और अजमल कसाब ज़िंदा पकड़ा गया। इस हमले में हमलावरों सहित कुल 175 लोग मारे गए थे। इनमें 15 पुलिसकर्मी और 2 NSG कमांडो थे। छत्रपति शिवजी टर्मिनल, नरीमन हाउस और ताज होटल को आतंकियों ने खून से लाल कर दिया था। इस हमले में देशवासियों की रक्षा करते हुए बलिदान होने वालों में केरल के मेजर संदीप उन्नीकृष्णन शामिल थे। केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन ने बलिदानी मेजर के परिवार को अपमानित किया था।
आगे बढ़ने से पहले परिचय दे देते हैं कि मेजर संदीप उन्नीकृष्णन थे कौन। उनका जन्म 15 मार्च, 1977 को केरल के कोझिकोड में स्थित चेरुवन्नूर में एक मलयाली परिवार में हुआ था। उनका परिवार बाद में कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में रहने लगा था। उनके पिता के उन्नीकृष्णन ‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO)’ में अधिकारी थे। वो उनके इकलौते बेटे थे। उनकी शुरुआती पढ़ाई-लिखे बेंगलुरु के फ्रैंक एंथोनी पब्लिक स्कूल में हुई। उन्होंने 1995 में विज्ञान से स्नातक किया।
उनके शिक्षकों का कहना है कि वो बचपन से ही खेल-कूद में रुचि रखते थे और एक अच्छे एथलिट भी थे। उन्हें फ़िल्में देखना भी पसंद था। उनकी पत्नी का नाम नेहा है। 1995 में ही वो महाराष्ट्र के पुणे में ‘राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (NDA)’ में शामिल हुए। वहाँ के उनके दोस्त भी उन्होंने एक निःस्वार्थ और दरियादिल और शांत चित्त के व्यक्ति के रूप में याद करते हैं। 12 जुलाई, 1999 को उन्हें भारतीय सेना में ‘बिहार रेजिमेंट’ की 14वीं बटालियन में लेफ्टिनेंट के रूप में शामिल किया गया। नीचे की तस्वीर उसी समय की है।
जब ‘बिहार रेजिमेंट’ में लेफ्टिनेंट बने थे संदीप उन्नीकृष्णन
उन्होंने जम्मू कश्मीर से लेकर राजस्थान तक में भारतीय सेना के लिए सेवाएँ दीं, जिसके बाद उनका चयन ‘राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (NSG)’ के लिए हुआ। प्रशिक्षण के बाद उन्हें जनवरी 2007 में NSG के ‘स्पेशल ऑपरेशन्स ग्रुप (SAG)’ में शामिल किया गया। इसके बाद उन्होंने कई सफल अभियानों में हिस्सा लिया। बेलगावी में स्थित कमांडो विंग इन्फेंट्री स्कूल में सबसे कठिन माने जाने वाले ‘घातक कोर्स’ में उन्होंने शीर्ष स्थान प्राप्त किया था। 2006 में वो NSG के कमांडो सर्विस में शामिल हुए थे। उन्होंने खुद ये विकल्प चुना था।
मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के बारे में उनके पिता कहते हैं कि उन्होंने जिस भी क्षेत्र में कदम रखा, वहाँ वो जीतना चाहते थे और इसीलिए वो सचिन तेंदुलकर के बड़े फैन भी थे। वो हमेशा भारत को जीतते हुए देखना चाहते थे और क्रिकेट में भी जब हार होती थी तब वो उदास हो जाते थे। जब ISRO का कोई प्रोजेक्ट सफल नहीं होता था तब वो अपन पिता को ढाँढस बँधाते थे। उनके पिता कहते हैं कि अच्छा वेतन होने के बावजूद संदीप के अकाउंट में 3-4 हजार रुपए ही होते थे, क्योंकि वो लोगों की खूब मदद किया करते थे।
उनके पिता ने ‘द हिन्दू’ को बताया था, “मैं सोचता था कि मेरा बेटा महँगी ब्रांडेड चीजें खरीदता है, इसीलिए पैसे की बचत नहीं करता। लेकिन बाद में पता चला कि वो चैरिटी करते हैं। उनकी एक दोस्त की माँ को स्पाइन समस्या थी, जिसका सारा खर्च उन्होंने ही उठाया था। कई समाजसेवी संस्थाओं को भी वो रुपए दान दे देते थे। उनके निधन के बाद मुझे उन डोनेशंस को रिन्यू कराने के रिमाइंडर्स आने लगे, तब जाकर मुझे इन चीजों का पता चला।”
मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के पिता ने बताया था कि वो एक राष्ट्रवादी थे और हमेशा राष्ट्रवाद का समर्थन करते थे और राष्ट्रवाद से उनका आशय था कि आप देश के लिए कुछ करें, लेकिन उससे फायदा प्राप्त करने की कोशिश न करें। उन्होंने कहा था कि वो हमेशा ऐसे लोगों का विरोध करते थे, जो खुद को राष्ट्रवादी बताते फिरते थे, क्योंकि उनका मानना था कि कोई राष्ट्रवादी है तो दूसरे लोग ऐसा बोलने चाहिए वो खुद नहीं। वो हमेशा कहते थे कि वो अपने किसी साथी की लाश पर उसकी माँ को रोते हुए नहीं देख सकते। पिता कहते हैं कि उन्होंने इसके बदले अपनी माँ का रोना ही चुना।
26/11 का मुंबई हमला और मेजर संदीप उन्नीकृष्णन
मुंबई में हुए 26/11 के हमले के दौरान आतंकियों से निपटने में महाराष्ट्र पुलिस के जवानों से लेकर NSG के कमांडोज तक ने जो पराक्रम दिखाए, उसके लिए देश हमेशा उनका ऋणी रहेगा। NSG को इस हमले से निपटने के लिए बुलाया गया था। इसी दौरान तेज़ होटल में मेजर संदीप उन्नीकृष्णन और चबाड हाउस में हवलदार गजेंद्र सिंह बिष्ट ने आतंकियों से लड़ते हुए देश के लिए बलिदान दे दिया। वो 28 नवंबर, 2008 को रात के 1 बजे का समय था, जब मजे संदीप उन्नीकृष्णन की टीम Y-शेप में ताज की सीढ़ियों से आगे बढ़ी थी।
अंदर पूरा अंधेरा था। बाहर से फायर ब्रिग्रेड लगातार पानी बरसा रहे थे, ताकि तेज़ होटल में लगी आग को बुझाया जा सके। सीढ़ियों पर भी पानी फैला हुआ था। जब NSG के जवान वहाँ गए, तो आतंकियों ने ऊपर से ही गोलीबारी शुरू कर दी। इसके बाद मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के दो साथियों ने दरवाजे के दोनों तरफ पोजीशन लिया। तभी अचानक से एक ग्रेनेड सीढ़ी पर आकर गिरा और अंधेरे में जोर का ब्लास्ट हुआ। ऊपर से आतंकी AK-47 से गोलीबारी कर रहे थे, जिसकी गोलियाँ दीवारों तक को छेद दे रही थीं।
इस पूरे घटनाक्रम का जिक्र ‘इंडिया टुडे’ मैगजीन के लिए लंबे समय तक आंतरिक सुरक्षा को कवर करने वाले पत्रकार संदीप उन्नीथन ने अपनी पुस्तक ‘Black Tornado, The 3 Sieges of Mumbai‘ में किया है। इसमें उन्होंने लिखा है कि किस तरह आतंकियों को ऊपर होने का फायदा मिल रहा था और उन्होंने NSG के जवानों को देख लिया था। साथियों के कवर फायर के बीच मेजर संदीप उन्नीकृष्णन आगे बढ़े। तभी अचानक एक और ग्रेनेड ब्लास्ट हुआ और उनके साथी सुनील जोधा घायल होकर सीढ़ियों से नीचे जा गिरे।
दो गोलियाँ उनकी छाती में लगीं। उन्हें कुल 7 गोलियाँ लगी थीं, लेकिन वो इस हमले के बाद किसी तरह मौत से संघर्ष करते हुए जीवित बचने में सफल रहे थे। अपने एक साथी को सुनील को फर्स्ट ऐड देने का निर्देश देकर मेजर संदीप उन्नीकृष्णन अकेले आगे बढ़े। उन्हें कवर करने के लिए कोई नहीं था। उन्हें बार-बार कर्नल की तरफ से वापस आने के लिए कहा जा रहा था, लेकिन उनके साथियों ने सोचा कि वो आतंकियों के नजदीक चले गए हैं, इसीलिए जवाब नहीं दे सकते। दूसरे तरफ से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी।
28 नवंबर, 2021 को सुबह 3 बजे तक ताज टॉवर की सभी 21 मंजिलों से सभी बंदियों को निकाल कर मुंबई पुलिस को सौंप दिया गया था, लेकिन मेजर संदीप उन्नीकृष्णन का कोई अता-पता नहीं था। सुबह 10 बजे के करीब उनका मृत शरीर होटल में ही पड़ा मिला। उनके शरीर में कई गोलियाँ धँसी हुई थीं। यहाँ तक कि गोलियाँ उनके सिर के भी आर-पार हो गई थीं। असल में आतंकी एक मूर्ति के पीछे ताखा में छिपे हुए थे। मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के बलिदान के बाद उनके हथियार भी आतंकी लूट कर निकल गए थे।
वो NSG के पहले कमांडो थे, जो मुंबई के 26/11 हमले में बलिदान हुए थे। इसके बाद NSG और ज्यादा सावधान हो गई थी। उसने नए सिरे से रणनीति बनाई थी, ताकि जान का नुकसान न हो। लेकिन, मेजर संदीप उन्नीकृष्णन ने आतंकियों को होटल के उत्तरी हिस्से में एक रेस्टॉरेंट की तरफ धकेल दिया था, जहाँ उनके पास भागने तक की जगह नहीं थी। चारों आतंकी ढूँढ कर ढेर कर दिए गए। बलिदान से पहले वॉकीटॉकी पर उनके अंतिम शब्द थे, “ऊपर मत आना। मैं इनसे निपट लूँगा।”
मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की प्रतिमा
मेजर संदीप उन्नीकृष्णन को भारत सरकार ने ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया। राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार संपन्न हुआ। बेंगलुरु में 4.5 किलोमीटर लंबी एक सड़क का नामकरण उनके नाम पर किया गया। मुंबई के विखरोली लिंक रोड में स्थित जोगेश्वरी के ‘इंडियन एजुकेशन सोसाइटी’ में उनकी एक प्रतिमा स्थापित की गई। ये पहली बार नहीं था, जब उन्होंने ऐसी बहादुरी दिखाई। ‘ऑपेरशन विजय’ के दौरान 31 दिसंबर, 1999 में उन्होंने पाकिस्तानी गोलीबारी के बीच शत्रु से मात्र 200 मीटर की दूरी पर पोस्ट स्थापित किया था।
जब CPI(M) के मुख्यमंत्री ने किया बलिदानी के परिवार का अपमान
उस समय केरल में CPI(M) की सरकार थी और वीएस अच्युतानंदन मुख्यमंत्री हुआ करते थे। एक तरफ जहाँ परिवार ने अपने एकलौते बेटे को खो दिया था, वहीं दूसरी तरह मुख्यमंत्री ने उनका अपमान किया। केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन ने कहा था, “अगर शहीद का घर नहीं होता उनके यहाँ एक कुत्ता भी नहीं जाता।” दरअसल, केरल के तब गृह मंत्री रहे कोडियेरी कलाकृष्णन ‘पोलिटिकल टूरिज्म’ के लिए उनके बेंगलुरु स्थित आवास पर पहुँचे थे, जहाँ उन्हें परिवार के गुस्से का सामना करना पड़ा था, जिसके बाद मुख्यमंत्री ने ये बयान दिया।
अच्युतानंदन ने कहा था, “क्या ये कहीं का नियम है कि कर्नाटक और केरल के मुख्यमंत्री को साथ में दौरा करना चाहिए? अगर वो मेजर संदीप उन्नीकृष्णन का घर नहीं होता तो उसकी तरफ एक कुत्ता भी नहीं देखता। उनके परिवार के साथ हमारा जुड़ाव खास है। एक सैनिक के पिता होने के नाते के उन्नीकृष्णन को ये नहीं समझना चाहिए क्या?” केरल सरकार की तरफ से बलिदानी मेजर के अंतिम संस्कार में कोई नेता नहीं गया, जिस पर विपक्षी भाजपा के हमले के बाद वहाँ की सरकार ने बलिदानी मेजर के घर का दौरा किया।
बलिदानी मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के पिता ने उन नेताओं को घर में नहीं घुसने दिया था, जिसके बाद एक सीएम ने अपने ही राज्य के बलिदानी सैनिक के लिए इस तरह की भाषा का प्रयोग किया। उनके पिता ने केरल के मुख्यमंत्री से मिलने से इनकार कर दिया था। कर्नाटक में तब भाजपा का बीएस येदियुरप्पा मुख्यमंत्री थे। वो खुद अंतिम संस्कार में उपस्थित थे। कर्नाटक के कई लोग थे। लेकिन, केरल सरकार ने किसी को नहीं भेजा। उनके पिता का कहना था कि उनका बेटा सिर्फ केरल का ही नहीं, बल्कि पूरे देश का था।
Major Sandeep Unnikrishnan: 26/11 Hero’s Legacy Lives On
“I don’t want to die an ordinary death. When I go,the whole nation will remember me.” This is what Sandeep told his proud father after joining the NSG. pic.twitter.com/MMPLYAX8nG
केरल के मुख्यमंत्री के दौरे से पहले वहाँ सिक्योरिटी के लिए स्निफर कुत्ते भी लाए गए थे, जिन्हें पिता ने घर से घुसने से मना कर दिया था। तामझाम के साथ वहाँ पहुँचे केरल के सीएम को लेकर मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के पिता ने कहा था कि नेताओं ने इस तरह दौरा जारी रखा तो वो आत्महत्या के लिए भी मजबूर हो जाएँगे। बाद में केरल सरकार ने सफाई दी थी कि मुख्यमंत्री वीएस अच्युतानंदन के ‘राजनीतिक सचिव’ बलिदानी मेजर के अंतिम संस्कार का हिस्सा बने थे।
बेशर्मी की हद तो ये थी कि मुख्यमंत्री अच्युतानंदन ने बाद में कहा कि वो बलिदानी मेजर के परिवार पर टिप्पणी के लिए माफ़ी नहीं माँगेंगे। एक तो वो 4 दिनों तक परिवार से मिलने नहीं गए जबकि येदियुरप्पा वहाँ मुस्तैद थे, ऊपर से उन्होंने इस तरह की बातें की। जब केरल के ये नेतागण वहाँ पहुँचे थे, तब परिवार की स्थिति बेहाल थी और माँ बार-बार बेहोश हो रही थीं। इसी दौरान पिता ने इन नेताओं को वहाँ से निकल जाने के लिए कहा था, जो पूरे लाव-लश्कर के साथ वहाँ पहुँचे हुए थे।
मेजर संदीप उन्नीकृष्णन पर एक फिल्म भी बनी है, जिसका नाम है – ‘मेजर’। तेलुगु अभिनेता अदिवि शेष ने इसमें उनका किरदार निभाया है। फिल्म की स्क्रिप्ट भी उन्होंने ही लिखी है। कोरोना के कारण इस फिल्म की रिलीज डेट में देरी हुई है। इसे 11 फरवरी, 2022 को तेलुगु के अलावा हिंदी और मलयालम में भी रिलीज किया जाएगा। तेलुगु के बड़े स्टार महेश बाबू ने इस फिल्म का निर्माण किया है। शोभिता धूलिपाला और प्रकाश राज अन्य किरदारों में दिखाई देंगे।
जब उन्हें मरणोपरांत ‘अशोक चक्र’ से सम्मानित किया गया, तब बताया गया कि किस तरह अपने दाहिने हाथ में गोली लगने के बावजूद वो लड़ते रहे थे। उन्होंने अपने घायल साथी को सुरक्षित वहाँ से दूर किया। उन्होंने 14 बंदियों की जान बचाई थी और उन्हें सुरक्षित निकाला था। आज भी येलाहंका न्यू टाउन में उनके नाम पर जो सड़क है, वो उनकी गाथा कहती है। बेंगलुरु के राममूर्ति नगर आउटर रिंग रोड जंक्शन पर भी उनकी प्रतिमा है। 15 घंटों तक लगातार संघर्ष कर के लोगों को आतंकियों सुरक्षित निकालने वाले मेजर संदीप उन्नीकृष्णन अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कहानी अगली पीढ़ियों को ज़रूर मालूम होनी चाहिए।
मुंबई में हुए 26/11 आतंकी हमले की आज 13वीं बरसी है। साल 2008 में पाकिस्तान से आए 10 आतंकियों ने देश की आर्थिक राजधानी में इसी तारीख को इतना हाहाकार मचाया था कि पूरा देश उससे दहल उठा था। हर आतंकी के पास एके-47 थी। तमाम सुरक्षाबल सिर्फ इसी कोशिश में जुटे थे कि किसी तरह आतंकियों को दबोचा जाए। हालाँकि अंत में जो जिंदा पकड़ा गया वो सिर्फ अजमल कसाब था और जिसने उसे पकड़वाया वो बहादुर सिपाही तुकाराम ओंबले थे।
हमले के बाद 10 आतंकियों में से किसी एक का पकड़ा जाना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से बेहद जरूरी था, लेकिन जैसे सारे आतंकी मुंबई की सड़कों पर खूनी खेल को खेल रहे थे, किसी को लगा ही नहीं था कि वे पकड़े जाएँगे। सुरक्षाबल की भी पहली अप्रोच जवाबी कार्रवाई ही थी। जगह-जगह पुलिस वाले तैनात थे।
27 नवंबर को डीबी मार्ग पुलिस को करीब 10 बजे सूचना मिली कि 2 हथियारबंद आतंकी गाड़ी में बैठकर आतंक मचा रहे हैं। इसके बाद 15 पुलिसकर्मियों को डीबी मार्ग से चौपाटी की ओर मरीन ड्राइव पर बैरिकेडिंग के लिए भेजा गया। जब आतंकियों की गाड़ी उस रास्ते आई तो वो 40-50 फीट पहले रुकी।
चारों ओर पुलिस को देख आतंकी घबरा गए और पुलिस पर फायरिंग शुरू हुई। पुलिस ने भी जवाबी कार्रवाई की और एक आतंकी को मार गिराया। वहीं कसाब ने मरने की एक्टिंग करनी शुरू कर दी। सभी को लगा कि दोनों आतंकी ढेर हो गए हैं लेकिन फिर भी पुष्टि के लिए किसी को आगे बढ़ना था। पुलिसकर्मियों की भीड़ से तुकाराम आगे बढ़े और गाड़ी के पास हाथ बढ़ाया। इतनी ही देर में कसाब ने अपनी एके-47 उठाई और ओंबले पर दागने चला। ओंबले ने फौरन कसाब की बंदूक की बैरल पकड़ी, मगर फिर भी उसने ट्रिगर दबा दिया। अब गोलियाँ ओंबले के पेट और आंत के आर-पार थीं। लेकिन बावजूद इसके उन्होंने कसाब की गर्दन दबोची तो उसे मरते दम तक नहीं छोड़ा।
ओंबले की बहादुरी कहिए या कुछ और…जिस समय परमबीर सिंह जैसे तमाम बड़े पद के पुलिस अधिकारी आतंकियों का सामना करने के नाम पर पीछे हट गए थे, उस समय पर ओंबले अपनी लाठी लेकर आगे बढ़े और जब गोली लग गई तब भी उन्होंने उस आतंकी को नहीं छोड़ा। इस बहादुरी का नतीजा क्या हुआ ये बाद में पूर्व पुलिस आयुक्त राकेश मारिया की किताब ‘Let me say it now’ से खुला।
राकेश मारिया की किताब बताती है कि जब ओंबले पर गोली चली तो साथी पुलिस वाले आवेश में आकर जवाबी कार्रवाई करने जा रहे थे। लेकिन डीबी मार्ग पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर संजीव गोविलकर ने उन्हें कहा कि उसे मत मारो वही तो सबूत है। 26/11 हमला करके पाकिस्तानी आतंकियों का एक मकसद हिंदुओं को बदनाम करना था। अगर उस रात कसाब न जिंदा बचता या भाग जाता तो शायद हम ये बात नहीं जान पाते है कि पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी ISI और आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा चाहते थे कि अजमल बतौर समीर चौधरी मरे। ताकि दुनिया हिंदुओं पर ऊँगली उठाए और इस पूरे हमले को भगवा आतंक करार दिया जा सके। इस साजिश को अंजाम देने के लिए आतंकियों के हाथ में कलावे बांधे गए थे। साथ ही उन्हें भारतीय पते और हिंदू नाम वाले पहचान पत्र मुहैया करवाए गए थे।
साभार: अमर उजाला
आज उस हमले की 13वीं बरसी है। बलिदानी तुकाराम ओंबले की बहादुरी के कारण आज उन्हें इस दिन बड़े-बड़े अधिकारी नमन करते हैं। उनका वो गाँव जहाँ कोई व्यक्ति पुलिस बल का हिस्सा नहीं था, वहाँ 13 युवा पुलिस में भर्ती हो चुके है। वहीं भारत सरकार भी ओंबले को बलिदानी होने के उपरांत अशोक चक्र पुरस्कार से सम्मानित कर चुकी है। इसके अलावा वैज्ञानिक क्षेत्र में भी ओंबले को सम्मान मिला है। उनके नाम पर एक मकड़ी का नाम-आइसियस तुकारामी रखा गया है।
जाँबाज बलिदानी तुकाराम ओंबले को विशेष सम्मान, महाराष्ट्र में मिली मकड़ी का नाम ‘आइसियस तुकारामी’ रखा गया
2008 में मुंबई में हुए आतंकी हमले को 13 साल हो गए हैं। 26/11 की यह बरसी बलिदानियों के प्रति कृतज्ञता जताने का दिन होने के साथ-साथ उस समय पर्दे के पीछे क्या सब चल रहा था उसको भी जानने का है। हमले के वक्त देश में कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार थी। हमले के दौरान देश ने कपड़े बदल-बदल कर मीडिया के सामने आने वाले एक गृह मंत्री को देखा था। उस मीडिया को देखा था जिसने अपनी टीआरपी के फेर में जाने-अनजाने पाकिस्तान में बैठे आतंकियों तक पल-पल की सूचना पहुँचाने में मदद की। बाद में यह बात भी सामने आई कि इस हमले के तुरंत बाद राहुल गाँधी पार्टी में मशगूल थे। बरखा दत्त ने कबूल किया कि उनकी और उनके साथियों की रिपोर्टिंग ने सैकड़ों जिंदगी को खतरे में डाला। फिलहाल विवादों में घिरे मुंबई पुलिस के कमिश्नर रहे परमबीर सिंह पर तो आतंकियों का मुकाबला करने से इनकार करने तक के आरोप लगे।
मुंबई हमले के बाद रात भर चली थी राहुल गाँधी की पार्टी
26 नवंबर 2008 को पाकिस्तान से आए 10 आतंकियों ने देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में समुंद्र के रास्ते घुसकर गोलीबारी और बमबारी करते हुए खून की नदियाँ बहा दी थी। इन इस्लामी आतंकियों ने चार दिनों तक मुंबई को बंधक बनाकर रखा हुआ। इस हमले में 174 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था। उस समय राहुल गाँधी कॉन्ग्रेस महासचिव थे। मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री थे। सोनिया गाँधी कॉन्ग्रेस की सर्वेसर्वा और पार्टी की अध्यक्ष थीं। लेकिन उस दौरान इन लोगों की संवेदना मर गई थीं। ऐसा हम इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि मुंबई हमले के तुरंत बाद राहुल गाँधी दिल्ली के बाहरी इलाके में स्थित एक फार्महाउस में पूरी रात पार्टी में मशगूल थे। उस समय बलिदानी मेजर संदीप उन्नीकृष्णन की माँ की आँखों के आँसू भी नहीं सूखे थे। 174 मृत लोगों के परिजनों का गम ताजा ही था। 300 घायलों के परिचित अस्पतालों के चक्कर काट रहे थे।
मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया था कि उस समय दिल्ली के बाहरी इलाके में राहुल गाँधी अपने बचपन के दोस्त समीर शर्मा की संगीत रस्म में पहुँचे थे। वह राधे मोहन चौक पर स्थित फार्म हाउस में थे। इंडिया टुडे में इस संगीत रस्म को लेकर लिखा गया था, “शनिवार की रात का संगीत ‘दिलकश’ था। इसे दुल्हन की बहन लीना मुसाफिर और उसके पति इंद्र द्वारा होस्ट किया गया था। पार्टी में 800 से अधिक मेहमानों ने भाग लिया।”
उद्धव ठाकरे ने कॉन्ग्रेस नेता से सवाल पूछते हुए कहा था, “राहुल गाँधी ने 26/11 मुंबई हमलों में वीरगति को प्राप्त हुए जवानों का तिरस्कार किया है। उन्होंने देश के लिए अपनी जान न्योछावर कर देने वाले हेमंत करकरे, अशोक कामटे, तुकाराम अम्बोले और विजय सालस्कर जैसे मराठा पुलिसकर्मियों की बहादुरी का अपमान किया है। उन्होंने एनएसजी के मेजर संदीप उन्नीकृष्णन को अपमानित किया है। जब मुंबई में हमला हुआ, तब राहुल कहाँ थे?”
बरखा दत्त का कबूलनामा
मुंबई हमले के दौरान मीडिया की भूमिका भी काफी विवादास्पद रही थी। बरखा दत्त जैसे पत्रकारों की रिपोर्टिंग ने सैकड़ों लोगों की जान खतरे में डाल दी थी। अगस्त 2012 में प्रोपगेंडा पोर्टल न्यूज़लॉन्ड्री को दिए इंटरव्यू में बरखा दत्त ने स्वीकार किया था कि मुंबई हमले के दौरान टीवी चैनलों और उनके पत्रकारों ने जिस तरह की रिपोर्टिंग की, उससे सैकड़ों लोगों की जान ख़तरे में आ गई थी। विवादित पत्रकार बरखा दत्त ने यह भी कहा था कि टीवी चैनलों की रिपोर्टिंग ऐसी थी कि कई सुरक्षा बलों के जवानों की जान भी ख़तरे में पड़ गई थी। उस दौरान बरखा दत्त वित्तीय धोखाधड़ी के आरोपों में फॅंसी एनडीटीवी के लिए कार्य करती थीं और उनकी रिपोर्टिंग पर काफ़ी सवाल उठे थे। न्यूज़लॉन्ड्री के मधु त्रेहान ने इंटरव्यू के दौरान बरखा से इन्हीं चीजों को लेकर सवाल भी पूछे थे।
परमबीर सिंह पर कर्तव्य में कोताही का आरोप
26/11 आतंकी हमलों के दौरान मुंबई के पुलिस कमिश्नर हसन गफूर थे। उन्होंने परमबीर सिंह सहित अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों पर आरोप लगाया था कि इन लोगों ने आतंकवादियों से मुकाबला करने से इनकार कर दिया था। गफूर ने कहा था कि कानून-व्यवस्था के संयुक्त आयुक्त केएल प्रसाद, अपराध शाखा के अतिरिक्त आयुक्त देवेन भारती, दक्षिणी क्षेत्र के अतिरिक्त आयुक्त के वेंकटेशम और आतंकरोधी दस्ते के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह मुंबई आतंकी हमले के दौरान अपनी ड्यूटी निभाने में विफल रहे थे। 26/11 मुंबई आतंकी हमले के तुरंत बाद अपने कर्तव्यों की लापरवाही के आरोप में परमबीर सिंह और तीन अन्य अतिरिक्त पुलिस कमिश्नरों के खिलाफ साल 2009 में याचिका दायर की गई थी। एक जनहित याचिका (PIL) में इन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की माँग की गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि परमबीर सिंह जैसे अधिकारी तत्कालीन पुलिस कमिश्नर के आदेशों का पालन करने में विफल रहे थे।
साल 2008, तारीख 26 नवंबर, आज से ठीक 13 साल पहले देश की आर्थिक राजधानी मुंबई पर लश्कर-ए-तैयबा के 10 आतंकियों ने एक ऐसा हमला किया था, जिसने भारत समेत पूरी दुनिया को हैरान कर दिया था। बम धमाकों और गोलीबारी के बीच एक तरह से करीब 60 घंटे तक मुंबई बंधक बनी रही। आज भी यह आतंकी हमला भारत के इतिहास का वो काला दिन है जिसे शायद ही कोई भूला सकता है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हमले में 160 से ज्यादा लोग मारे गए, 300 से ज्यादा घायल हुए थे। और इन आतंकियों का सामना करते हुए मुंबई पुलिस, होमगॉर्ड, ATS, NSG कमांडों सहित कुल 22 सुरक्षाबलों ने अपना बलिदान दिया था।
पाकिस्तानी आतंकी हमले को नाकाम करने में वीरगति को प्राप्त हुए सुरक्षाबलों की बात करें तो मुंबई पुलिस, एटीएस, NSG कमाण्डों में प्रमुख नाम ATS प्रमुख हेमंत करकरे, एसीपी अशोक काम्टे, एसीपी सदानंद दाते, एनएसजी के कमांडो मेजर संदीप उन्नीकृष्णन, एनकाउंटर स्पेशलिस्ट एसआई विजय सालस्कर, इंस्पेक्टर सुशांत शिंदे, एसआई प्रकाश मोरे, एसआई दुरूगड़े, एएसआई नाना साहब भोंसले, एएसआई तुकाराम ओंबले, कॉन्सटेबल विजय खांडेकर, जयवंत पाटिल, योगेश पाटिल, अंबादास पवार और एम.सी. चौधरी जैसे प्रमुख नाम हैं।
इनके अलावा होमगॉर्ड मुकेश बी जाधव, अरुण चिट्टे, हवलदार गजेंद्र सिंह, नागप्पा आर महाले, किशोर के.शिंदे, संजय गोविलकर, सुनील कुमार यादव ने भी आतंकियों का सामना करते हुए अपना बलिदान दिया था।
साभार-न्यूज़ 18
देश के इन वीर-बलिदानियों पर आगे बात करने से पहले उस दिन क्या हुआ था यदि उस पर संक्षेप में एक नजर डालें तो 26/11 मुंबई हमलों की छानबीन से जो कुछ सामने आया है, वह बताता है कि 10 हमलावर कराची से नाव के रास्ते मुंबई में घुसे थे। इस नाव पर चार भारतीय भी सवार थे, जिन्हें किनारे तक पहुँचते-पहुँचते आतंकियों ने मार डाला था। रात के तकरीबन आठ बजे थे, जब ये हमलावर कोलाबा के पास कफ़ परेड के मछली बाजार पर उतरे। वहाँ से वे चार ग्रुपों में अलग-अलग बँट गए और टैक्सी लेकर आतंकी मंसूबों को अंजाम देने मुंबई में अपने टारगेट की तरफ निकल गए।
कहा तो यह भी जाता है कि इन लोगों की आपाधापी और हड़बड़ाहट देखकर कुछ मछुआरों को शक भी हुआ और उन्होंने पुलिस को जानकारी भी दी। लेकिन शुरू में मुंबई पुलिस ने इसे कोई ख़ास तवज्जो नहीं दी और न ही आगे बड़े अधिकारियों या खुफिया एजेंसियों को जानकारी दी।
मीडिया रिपोर्टों के हवाले से बात करूँ तो रात करीब साढ़े 9 बजे के आसपास छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर गोलीबारी की पहली खबर मिली। यहाँ दो आतंकियों ने ताबड़तोड़ फायरिंग कर 52 लोगों को मौत के घाट उतार दिया। 100 से ज्यादा लोग हमले में घायल भी हुए। आतंकियों के पास एके-47 राइफलें थीं। यहीं पर हमला करने वालों में एक आतंकी अजमल आमिर कसाब भी था, जिसे बाद में मुंबई पुलिस के एएसआई तुकाराम ओंबले ने जकड़ लिया और 10 में से जीवित पकड़ा जाने वाला यही एकमात्र आतंकी था।
यहीं से थोड़ा देर से ही सही पर आतंकियों के खात्मे का मिशन शुरू हो चुका था। आगे अपने विदेशी ग्राहकों के लिए मशहूर लियोपोल्ड कैफे में दो आतंकियों ने जमकर गोलियाँ चलाईं। इस गोलीबारी में भी 10 लोग मारे गए थे। हालाँकि, जल्द ही यहाँ दोनों आतंकियों को भी सुरक्षाबलों ने ढेर कर दिया। इसके बाद हमला नरीमन हाउस बिजनेस एंड रेसीडेंशियल कॉम्प्लेक्स पर हुआ। हमले से कुछ देर पहले ही पास के गैस स्टेशन में बड़ा धमाका भी हुआ। जिसके बाद नरीमन हाउस में मौजूद लोग बाहर की तरफ आए और इसी दौरान आतंकियों ने उन पर फायरिंग झोंक दी। सबसे बड़ा हमला होटल ताज पर था यदि आतंकी यहाँ अपने मंसूबों में पूरी तरह कामयाब होते तो आतंकी इतिहास में इस दिन की चोट और भी गहरी होती।
कसाब, लियोपोल्ड कैफ़े और होटल ताज महल पैलेस एंड टावर
इन पाकिस्तानी आंतकियों से लड़ते-लड़ते देश के वीर जाँबाजों ने अपनी जान की बाजी लगा दी। मुंबई पुलिस के बहादुर पुलिसकर्मियों, ATS के जवानों और एनएसजी कमांडो सहित तमाम सुरक्षाबलों ने इन आतंकियों का डटकर सामना किया और 10 में से 9 आतंकियों को मारकर अनगिनत लोगों की जान बचाई।
उनमें से आइए जानतें हैं कुछ बहादुर योद्धाओं के बारें में जिन्होंने अपनी जान की परवाह न कर उस दिन लोगों की सुरक्षा करते हुए खुद बलिदान हो गए थे।
मुंबई एटीएस चीफ हेमंत करकरे
मुंबई एटीएस के चीफ हेमंत करकरे जब यह आतंकी हमला हुआ उस समय अपने घर में खाना खा रहे थे, जब उनके पास आतंकी हमले को लेकर क्राइम ब्रांच ऑफिस से फोन आया। करकरे तुरंत घर से निकले और एसीपी अशोक काम्टे, इंस्पेक्टर विजय सालस्कर के साथ मोर्चा सँभाला।
हेमंत करकरे
हालाँकि, कामा हॉस्पिटल के बाहर चली मुठभेड़ में आतंकी अजमल कसाब और इस्माइल खान की अंधाधुंध गोलियाँ लगने से वह बलिदान हो गए। बाद में मरणोपरांत उन्हें अशोक चक्र से सम्मानित किया गया था। हेमंत करकरे ने मुंबई सीरियल ब्लास्ट और मालेगाँव ब्लास्ट की जाँच में भी अहम भूमिका निभाई थी। हालाँकि इनके ऊपर कई कई दूसरे आरोप भी थे जो बाद में इनके बदनामी का कारण भी बनें।
एसीपी अशोक काम्टे
अशोक काम्टे मुंबई पुलिस में बतौर एसीपी तैनात थे। जिस वक्त मुंबई पर आतंकी हमला हुआ, वह एटीएस चीफ हेमंत करकरे के साथ थे। कामा हॉस्पिटल के बाहर पाकिस्तानी आतंकी इस्माइल खान ने उन पर गोलियों की बौछार कर दी। तभी एक गोली उनके सिर में जा लगी। घायल होने के बावजूद उन्होंने लश्कर आतंकी इस्माइल खान को मार गिराया।
एसीपी अशोक काम्टे
सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर विजय सालस्कर
कभी मुंबई अंडरवर्ल्ड के लिए खौफ का दूसरा नाम रहे सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर विजय सालस्कर भी कामा हॉस्पिटल के बाहर हुई फायरिंग में हेमंत करकरे और अशोक काम्टे के साथ आतंकियों की गोली लगने से बलिदान हो गए थे। विजय सालस्कर को भी मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया था।
सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर विजय सालस्कर
एएसआई तुकाराम ओंबले
मुंबई पुलिस के एएसआई तुकाराम ओंबले का जब गिरगाँव चौपाटी पर अजमल कसाब से सामना हुआ, तब वह पूरी तरह निहत्थे थे। यह जानने के बावजूद कि सामने वाले के हाथों में एके-47 है, वह अपनी जान की परवाह किए बिना आतंकी कसाब पर टूट पड़े। इस दौरान उन्हें कसाब की बंदूक से कई गोलियाँ लगीं और वह बलिदान हो गए लेकिन कसाब से अपनी पकड़ ढीली नहीं की। बलिदानी तुकाराम ओंबले को उनकी इस जाँबाजी के लिए शांतिकाल के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार अशोक चक्र से सम्मानित किया गया था।
एएसआई तुकाराम ओंबले
मेजर संदीप उन्नीकृष्णन
मेजर संदीप उन्नीकृष्णन नेशनल सिक्यॉरिटी गार्ड्स (एनएसजी) के कमांडो थे। वह 26/11 एनकाउंटर के दौरान मिशन ऑपरेशन ब्लैक टारनेडो का नेतृत्व कर रहे थे और 51 एसएजी के कमांडर थे। जब ताज महल पैलेस और टावर्स होटल पर कब्जा जमाए बैठे आतंकियों से लड़ रहे थे तो एक आतंकी ने पीछे से उन पर हमला किया जिससे घटनास्थल पर ही वह बलिदान हो गए। मरणोपरांत 2009 में उनको अशोक चक्र से सम्मानित किया गया।
मेजर संदीप उन्नीकृष्णन
एनएसजी कमांडो गजेंद्र सिंह
एनएसजी कमांडो गजेंद्र सिंह, 51 एसएजी (स्पेशल एक्शन ग्रुप) का हिस्सा थे, उन्होंने नरीमन हाउस को खाली कराते समय वीरगति को प्राप्त की, आतंकियों द्वारा फेंका गया एक ग्रेनेड उनके पास ही फट गया, जिससे गंभीर रूप से घायल होने के कारण उन्होंने अपना बलिदान दे दिया।
एनएसजी कमांडो गजेंद्र सिंह
शशांक शिंदे
वह छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पुलिस स्टेशन मुंबई का प्रभारी था, जब सीएसटी में आतंकी हमला हुआ तब वह तब तक आतंकवादियों को लड़ाई में उलझाए रखा जब तक कि उस पर पीछे से किसी अन्य आतंकवादी द्वारा हमला नहीं कर दिया गया। देश के लिए उनके बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया था।
शशांक शिंदे
प्रकाश पी मोरे
प्रकाश पी मोरे, एल.टी. मार्ग थाने में तैनात पुलिस सब-इंस्पेक्टर थे। जिन्होंने अपनी अंतिम साँस तक बहादुरी से लड़ाई लड़ी और देश की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी।
प्रकाश पी मोरे को याद करतीं उनकी माँ (साभार-इंडियन एक्सप्रेस)
बापूसाहेब दुरूगड़े
बापूसाहेब दुरूगड़े, एल.ए.1 थाने के पुलिस सब-इंस्पेक्टर थे जो 26/11 के हमलों के दौरान बलिदान हो गए थे।
विशेष रूप से उल्लेखित इन कुछ नामों के अलावा कुल करीब 22 नाम हैं जिन्होंने मुंबई आतंकी हमले में पाकिस्तानी आतंकियों के मंसूबों को नाकाम करने और उन्हें मौत के घाट उतारने में अपना बलिदान देकर बहादुरी की मिसाल पेश की थी। इसके अलावा भी विभिन्न विभागों से जुड़ें ऐसे हजारों दूसरे सुरक्षा बलों के जवान हैं जिन्होंने अनगिनत लोगों की जान बचाने में बड़ी भूमिका निभाई। बता दें कि आतंकियों के खिलाफ मुंबई में 11 जगहों पर पुलिस और सुरक्षा बलों ने कार्रवाई की थी।
आगे एक ऐसे नाम का जिक्र भी करना जरुरी समझता हूँ जिन्होंने ताज होटल से लोगों को निकालने में बड़ी भूमिका निभाई। जो सुरक्षाबल के रूप में आतंकियों से लड़ने नहीं बल्कि वहीं ताज होटल के रेस्टुरेंट में मौजूद थे और अपनी सूझ-बुझ से 100 से अधिक लोगों को सुरक्षित निकालने में कामयाब रहे। वह नाम है कैप्टन रवि धर्निधिरका का।
कैप्टन रवि धर्निधिरका
ऊपर आए नामों का जिक्र कई बार सुना होगा आपने लेकिन इनके नाम से बहुत कम लोग परिचित हैं। भारतीय मूल के कैप्टन रवि धर्निधिरका की गिनती उन बहादुरों में से हैं, जिन्होंने ताज होटल में 157 लोगों की जान बचाई थी। यूएस मरीन में कैप्टन रहे धर्निधिरका हमले के वक्त ताज के अंदर एक रेस्टोरेंट में थे।
कैप्टन रवि धर्निधिरका (साभार -ज़ी न्यूज़)
पहले कैप्टन खुद हमलावरों से मुकाबला करना चाहते थे लेकिन आतंकियों के हथियारों के खतरे को देखते हूए उन्होंने बंधकों को सुरक्षित बाहर निकालने का फैसला किया। जलते हुए होटल की 20वीं मंजिल से 157 लोगों को सुरक्षित बाहर निकालना अपने आप में एक बड़ा मिशन था जिसे कैप्टन ने बखूबी अंजाम दिया। इस काम में उनकी मदद दक्षिण अफ्रीका के दो पूर्व कमांडो ने भी की।
फिरे चंद नागर
NSG के सूबेदार कमांडो फिरे चंद नागर ने भी इस आतंकी हमले में जान की परवाह न कर ताज होटल में फँसे कई लोगों को मुक्त कराया और आतंकियों को भी मार गिराया। इस साहस के लिए कमांडो नागर को सेना मैडल से भी सम्मानित किया गया था।
बता दें कि आतंकी मिशन सिर्फ ताज तक ही सीमित नहीं था। अगले ही दिन यानि आतंकी हमले की अगली सुबह 27 नवंबर को खबर आई कि ताज से सभी बंधकों को छुड़ा लिया गया है, लेकिन जैसे-जैसे दिन चढ़ा तो पता चला अभी कुछ आतंकी बचे हैं जिन्होंने कुछ और लोगों को अभी बंधक बना रखा है जिनमें कई विदेशी भी शामिल हैं। हमलों के दौरान दोनों ही होटल रैपिड एक्शन फोर्स (आरपीएफ़), मैरीन कमांडो और नेशनल सिक्युरिटी गार्ड (एनएसजी) कमांडो से घिरे रहे।
हालाँकि, उसी दौरान कॉन्ग्रेस शासन में इसे एक नाकामी के तौर पर भी देखा गया जब आतंकियों पर संगठित एक्शन देर से शुरू किया गया। तत्कालीन केंद्र सरकार की तरफ से लापरवाही की बात भी सामने आई। सबसे बड़ी आलोचना एनएसजी कमांडो के देर से पहुँचने को लेकर हुई तो हमलों की लाइव मीडिया कवरेज ने भी आतंकवादियों की ख़ासी मदद की। कहाँ क्या हो रहा है, सब उन्हें अंदर टीवी पर दिख रहा था। कहा जाता है कि बरखा दत्त ने मुंबई हमले के दौरान फँसे एक व्यक्ति के किसी रिश्तेदार को फोन किया और उसकी लोकेशन उजागर कर दी। सब कुछ टीवी पर लाइव चल रहे होने के कारण आतंकियों को उस व्यक्ति के छिपे होने का स्थान मालूम पड़ गया था।
इस प्रकार तमाम मुश्किलों के बीच लगातार 3 दिन तक सुरक्षा बल आतंकवादियों से जूझते रहे। इस दौरान, धमाके हुए, आग लगी, गोलियाँ चली और बंधकों को लेकर उम्मीद टूटती-जुड़ती रही और ना सिर्फ भारत से सवा अरब लोगों की बल्कि दुनिया भर की नज़रें ताज, ओबेरॉय और नरीमन हाउस पर टिकी रहीं। सबकी नजरें मुंबई पर थीं। तीन दिनों के भयानक संघर्ष के बाद 29 नवंबर तक 9 हमलावरों का सफाया कर दिया गया।
स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण में आ गई थी लेकिन तब तक 160 से ज्यादा लोग मारे जा चुके थे। करीब 22 से अधिक सुरक्षाकर्मी भी बलिदान हो गए थे। एक आतंकवादी अजमल आमिर कसाब जिंदा पकड़ा गया था। उसे बाद में 21 नवंबर 2012 को लंबी कानूनी प्रक्रियाओं के बाद फाँसी पर लटका दिया गया। पाकिस्तानी लश्कर आतंकियों के ढेर होने पर देश ने राहत की साँस ली थी।
सभी बलिदानी जवानों के साथ ही सुरक्षाबलों के उन तमाम जवानों का लोग आज भी ऋणी है जिनकी बदौलत न जाने कितने लोगों की जान बची। आज 13 साल बाद भी और आगे भी जब-जब भविष्य में यह 26/11 को याद किया जाएगा लोग उन बलिदानियों को नमन करेंगे जिन्होंने दूसरों को सुरक्षित रखने के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।
तालिबान प्रशासित इस्लामिक अमीरात अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के एक गुरुद्वारे के पास भीषण बम विस्फोट हुआ है। इस विस्फोट में बड़ी संख्या में लोगों के हताहत होने की बात कही जा रही है। हालाँकि, अभी तक ये पता नहीं चला है कि इस घटना में कितने लोग हताहत हुए हैं और ना ही किसी ने अभी तक पुष्टि की है। खबर लिखे जाने तक इस विस्फोट की जिम्मेदारी किसी संगठन ने भी नहीं ली है। अफगानिस्तान की न्यूज एजेंसी टोलो न्यूज ने काबुल के सुरक्षा विभाग के प्रवक्ता जनरल मोबिन के हवाले से इस धमाके की पुष्टि की है।
An explosion occurred in the Kart-e-Parwan area in Kabul city this afternoon, said General Mobin, a spokesman for the Kabul security department.#TOLOnewspic.twitter.com/RFlCT8z5Wq
इस ब्लास्ट को लेकर दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा ने ट्विटर पर एक वीडियो मैसेज में कहा, “अफगानिस्तान के काबुल के अंदर कार्त-ए-परवान गुरुद्वारा है, उसके चौक में एक बहुत बड़ा बम ब्लास्ट हुआ है। इसके बारे में वहाँ की संगत ने मुझे जानकारी दी। बड़ा ब्लास्ट था, जिसके कारण शीशे तक टूट गए। वहाँ काफी बड़ी संख्या में लोगों के जख्मी होने और हताहत होने की जानकारी मिल रही है।” इस वीडियो में दिख रहा है कि एंबुलेंस घटनास्थल की ओर रवाना हो रही हैं।
अफ़ग़ानिस्तान में गुरुद्वारा रोड, करते परवान में एक भयंकर बम विस्फोट की ख़बर है। मुझे काबुल की संगत ने बताया कि वो फ़िलहाल सुरक्षित है पर हालात बहुत डर वाले बने हुये हैं
हिंदू-सिख समुदाय के सुरक्षित होने की जानकारी देते हुए सिरसा ने वीडियो में आगे बताया, “गुरुद्वारे के अंदर बहुत दहशत का माहौल है। गुरुद्वारे के सभी दरवाजे बंद कर दिए गए हैं और किसी को अंदर आने नहीं दिया जा रहा है। अफगानिस्तान में अभी भी 235 हिंदू-सिख हैं, जिनके वीजा अभी अप्रूव नहीं हुए हैं। मैं भारत सरकार से आग्रह करता हूँ कि जैसे 835 लोगों को पहले निकाला गया, वैसे ही इन लोगों के वीजा ग्रांट किए जाएँ, ताकि ये भी वहाँ से सुरक्षित बाहर निकल पाएँ। अभी तक हमारे लोग बिल्कुल सुरक्षित हैं। हालाँकि वहाँ पर काफी बड़ा नुकसान हुआ है।”
इसके पहले 12 नवंबर 2021 को नंगरहार प्रांत के स्पिनघर जिला स्थित एक मस्जिद में जुमे की नमाज के दौरान ब्लास्ट हुआ था। इस ब्लास्ट में कम-से-कम तीन लोगों की मौत और कई लोगों के घायल होने की खबर आई थी। रिपोर्ट के मुताबिक, इस घटना में नमाज पढ़ा रहे मस्जिद के मौलवी सहित तकरीबन एक दर्जन लोग बुरी तरह से घायल हुए थे। तालिबान के एक अधिकारी ने समाचार एजेंसी एएफपी से बातचीत में बम ब्लास्ट की पुष्टि की थी। अधिकारी ने कहा था, “मैं स्पिन घर जिले में एक मस्जिद के अंदर जुमे की नमाज के दौरान विस्फोट की पुष्टि करता हूँ। इसमें मौत भी हुई है और लोग घायल भी हुए हैं।” नंगरहार प्रांत के सरकारी प्रवक्ता कारी हनीफ ने एपी समाचार एजेंसी को बताया था कि ऐसा लगता है कि बम मस्जिद में रखा गया था।
अक्टूबर 2021 के मध्य में काबुल में स्थित एक गुरुद्वारे में तालिबानी बंदूकधारियों ने घुसकर सिखों को धमकाया था। इंडिया वर्ल्ड फोरम के अध्यक्ष पुनीत सिंह चंडोक ने इस संबंध में जानकारी देते हुए कहा कि खुद को इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान (तालिबानी) की स्पेशल यूनिट का हिस्सा बताने वाले कई हथियारबंद लोग गुरुद्वारा दशमेश पिता में जबरन घुस गए और समुदाय के लोगों को धमकाते हुए गुरुद्वारे की पवित्रता को भंग भी किया।
पश्चिम बंगाल पुलिस भर्ती बोर्ड की ओर से कॉन्स्टेबल और महिला कॉन्स्टेबल के पदों पर भर्ती के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे, जिसमें 1000 से अधिक मुस्लिम लड़कियों ने फॉर्म भरते वक्त हिजाब पहनकर फोटो लगाई थी, जिससे उनके आवेदनों को रद कर दिया गया था। अब इस मामले में विवाद बढ़ने के बाद कोलकाता हाईकोर्ट ने पुलिस भर्ती प्रक्रिया पर ही रोक लगा दी है।
बंगाल पुलिस भर्ती बोर्ड के फैसले के खिलाफ मुस्लिम महिलाओं के एक समूह ने कोलकाता हाईकोर्ट का रुख किया था। इस मामले में कोलकाता हाईकोर्ट के जस्टिस अरिंदम मुखर्जी ने अंतरिम फैसला सुनाते हुए कहा कि भर्ती का भविष्य इस मामले के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगा।
बहरहाल कोर्ट के फैसलो को अपनी जीत बताते हुए इस मामले से जुड़ी एक याचिकाकर्ता तुहिना खातून ने स्थगन आदेश को ‘हमारी आशाओं की जीत’ करार दिया। खातून ने क्लेरियन इंडिया को बताया, “हम लंबे समय से इस परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन हमें अवसर देने से वंचित कर दिया गया। अब अदालत हमारी बात सुन रही है और हमें उम्मीद है कि हमें न्याय मिलेगा।” मुस्लिम महिलाओं की पैरवी कर रहे वकील फिरदौस समीम ने कहा, “संविधान अनुमति देता है कि एक मुस्लिम लड़की हिजाब पहन सकती है, लेकिन पुलिस बोर्ड द्वारा दी गई अधिसूचना संवैधानिक प्रावधानों के खिलाफ है।”
उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल पुलिस भर्ती बोर्ड (WBPRB) ने 26 सितंबर 2021 को राज्य पुलिस में कॉन्स्टेबलों और महिला कॉन्स्टेबलों की भर्ती के लिए प्रारंभिक परीक्षा आयोजित की थी। बोर्ड ने 6 सितंबर को परीक्षा के लिए प्रवेश पत्र जारी किए थे। लेकिन कई कारणों के कारण 30,000 से अधिक छात्र परीक्षा देने से वंचित रह गए।
इस मामले में पीड़ित लड़कियों ने सीएम ममता बनर्जी से भी मिलने की कोशिश की थी, लेकिन वो ऐसा नहीं कर सकीं।
WBPRB के चेयरमैन को लिखा पत्र
इस तरह के मामले में पीड़ित उम्मीदवारों ने WBPRB के अध्यक्ष को एक पत्र लिखा है और पूछा कि सिख समुदाय के उम्मीदवारों के लिए नियमों को अपवाद करार दिया गया है ठीक उसी प्रकार से पुलिस भर्ती बोर्ड में नियमों को अपवाद बनाने की माँग की है।
मुस्लिम उम्मीदवारों का तर्क है कि हिजाब पहनना राज्य में मुस्लिम समुदाय की आस्था और उनकी प्रथाओं का एक हिस्सा है। पत्र में उम्मीदवारों ने लिखा है, “हम मानते हैं कि भारतीय लोकतंत्र का दायरा सभी धार्मिक विश्वासों को समायोजित करने के लिए पर्याप्त है।”
साभार: लाइव लॉ
क्या कहते हैं भर्ती के नियम
WBPRB की गाइडलाइंस में कहा गया है कि फोटो में आवेदकों के चेहरे किसी भी तरह से ढके नहीं होने चाहिए। गाइडलाइंस में लिखा है, “आवेदकों को सलाह दी जाती है कि वे फोटोग्राफ और हस्ताक्षर के स्थान पर अन्य वस्तुओं की तस्वीरें अपलोड न करें। चेहरा/सिर ढकने वाला फोटोग्राफ, आँखों को ढकने वाले धूप के चश्मे/टिंटेड ग्लासेस को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
जाँच के दौरान ‘ग्रुपीज’ या ‘सेल्फ़ी’ से क्रॉप किए गए फ़ोटोग्राफ की भी अनुमति नहीं रहेगी।
पंजाब के जालंधर की रहने वाली दिव्यांग शतरंज प्लेयर मलिका हांडा ने पंजाब सरकार द्वारा नौकरी और वित्तीय सहायता देने में विफल रहने और उदासीनता भरा रवैया अपनाने के बाद अब हताश होकर सोशल मीडिया पर अपना दर्द बयाँ किया है। 7 बार की नेशनल डेफ चेस चैम्पियन मलिका हांडा ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में कई पदक जीते हैं, जिनमें विश्व मूक-बधिर शतरंज चैम्पियनशिप में गोल्ड और एशियाई शतरंज चैम्पियनशिप में रजत पदक शामिल हैं।
बीते 10 साल से शतरंज खेल रहीं मलिका हांडा बीते सात साल से राज्य सरकार से नौकरी देने के लिए गुहार लगा रही हैं। इसी क्रम में बुधवार (24 नवंबर 2021) को राष्ट्रीय मूक-बधिर शतरंज चैंपियन ने ट्विटर पर एक छोटी वीडियो क्लिप पोस्ट की। इस वीडियो में हांडा का दर्द और फ्रस्ट्रेशन साफ देखा जा सकता है। वह देश के लिए जीते अपने कई पदकों को दिखाते हुए राज्य सरकार से पूछ रही हैं कि आखिर पंजाब सरकार उसके साथ इतना गलत व्यवहार क्यों कर रही है?
इस स्टार प्लेयर ने लिखा, “मैं बहुत दुखी महसूस कर रही हूँ। दो महीने बीत चुके हैं, लेकिन पंजाब सरकार के किसी व्यक्ति ने ना मुझे बुलाया और ना ही नकद पुरस्कार या नौकरी को लेकर बात की। मैं अभी भी इंतजार कर रही हूँ? क्यों-क्यों? मैं स्नातक हूँ, अंतरराष्ट्रीय मूक-बधिर स्वर्ण पदक हासिल किया है, एशियाई खेलों में 6 पदक हैं। पंजाब ऐसा क्यों कर रहा है? क्यों-क्यों?
I am very feeling sad Two Month gone No one invited me or talked regarding Cash award or Job from Punjab Govt I still waiting waiting Why why I m graduate,Intenational deaf Gold medal, 6 Medals world, Asian. Why why Punjab doing this?????? pic.twitter.com/HZvvlu1u7b
नेशनल चैम्पियन मलिका अपना ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद इसी साल सितंबर में चंडीगढ़ में पंजाब के खेल विभाग के निदेशक से संपर्क कर नौकरी और आर्थिक सहायता के लिए मदद माँगी थी। लेकिन राज्य सरकार की ओर से उदासीनता भरी प्रतिक्रिया मिली तो डायरेक्टर के केबिन से बाहर निकलने के बाद हांडा के सब्र का बाँध टूट गया। इसके बाद ट्विटर पर सांकेतिक भाषा में उन्होंने अपनी पीड़ा व्यक्त की। उनका वीडियो सोशल मीडिया पर तुरंत वायरल हो गया और लोगों ने उन्हें भावनात्मक रुप से सपोर्ट भी किया।
इस मामले में मलिका हांडा के पिता सुरेश हांडा ने कहा, “मलिका आज बहुत परेशान है। मैं और मेरा बेटा अतुल हांडा उसके साथ खेल विभाग के निदेशक के कार्यालय गए थे, लेकिन उन्होंने लगभग उसकी माँग को मानने से मना कर दिया। मेरी बेटी पिछले 8-10 वर्षों से खेल खेल रही है। वो इस उम्मीद में देश और राज्य के लिए मेडल्स लाती रही है कि अन्य ओलंपियन और पैरा-एथिलीटों की तरह एक दिन उसे भी नौकरी का ऑफर मिलेगा।”
मलिका के पिता ने बताया, “पिछले दो-तीन सालों से मलिका से कहा गया है कि अच्छी सरकारी नौकरी पाने के लिए उन्हें पहले उन्हें ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करनी होगी। बड़ी उम्मीदों के साथ उसने खेल निदेशक से मुलाकात की, लेकिन उन्होंने कहा कि राज्य में अभी तक मूक-बधिर एथलीटों को नौकरी देने की कोई नीति नहीं है। यह मौजूदा सरकार के कार्यकाल का अंतिम चरण चल रहा है। अगर उन्होंने अब तक कोई पॉलिसी नहीं बनाई है तो वे अगले तीन महीने में इसे बना सकते हैं। मेरी बेटी की सारी उम्मीदें धूमिल हो रही हैं, इस कारण से उसे मना पाना काफी मुश्किल है।”
इस बीच पंजाब की खेल निदेशक खरबंदा ने कहा है कि पंजाब सरकार के पास सक्षम खिलाड़ियों और पैरा-एथलीटों (हाथ और पैर की विकलांगता) के लिए नीति है, लेकिन अन्य 21 प्रकार की विकलांगता जैसे अंधापन, बहरापन या मंदबुद्धि जैसी विकलांगता के लिए कोई नीति नहीं है।
मलिका हांडा ने एक कोच और सरकारी नौकरी की माँग की
इससे पहले इसी साल अगस्त में भी मलिका ने पंजाब सरकार से सरकारी नौकरी और एक कोच देने का आग्रह किया था। पंजाब के खेल मंत्री राणा गुरमीत एस सोढ़ी और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर को टैग करते हुए हांडा ने पूछा था कि राज्य प्रशासन उनकी अनदेखी क्यों कर रहा है। उन्होंने लिखा, “मैं घर पर बैठी हूँ, क्यों? मैं दिन-ब-दिन अवसाद में जा रही हूँ। कोई मेरी कड़ी मेहनत को नहीं देख रहा है।”
मलिका की माँ रेणु हांडा ने एएनआई को बताया कि सात बार की राष्ट्रीय चैंपियन होने के बावजूद उनकी बेटी को राज्य सरकार की ओर से कोई मान्यता नहीं दी गई है। उन्होंने कहा, “मेरी बेटी इंटरनेशनल डेफ एंड डंब शतरंज चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला है। उसे पिछले साल राष्ट्रपति से राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला था। सात बार की राष्ट्रीय चैंपियन होने के बावजूद सरकार ने उसकी सराहना तक नहीं की।”