संभल हिंसा की गहराई में जाने पर कई चौंकाने वाली बातें सामने आती हैं, जो पहले की रिपोर्टों में नहीं थीं। SIT की चार्जशीट के अनुसार, इस खूनी खेल का साजिशकर्ता दुबई में बैठा गैंगस्टर शारिक साठा है, जिसे संभल के सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क का खुला प्रोटेक्शन मिला था।
जानकारी के अनुसार, पुलिस ने दावा किया कि साठा ने सीधे तौर पर मुस्लिम भीड़ को भड़काया था। शारिक साठा ने मुस्लिमों को उकसाया कि वे जामा मस्जिद के सर्वे को रोकें, क्योंकि यह उनकी ‘500 साल पुरानी बाबर की निशानी’ है, जिसे बचाना उनका फर्ज़ है।
इस साज़िश का सबसे घिनौना पहलू यह है कि शारिक साठा के इशारे पर ही हिंदू पक्ष के वकील विष्णु शंकर जैन की हत्या की साज़िश रची गई थी। इस काम के लिए शारिक साठा गैंग से जुड़े मोहम्मद गुलाम को सुपारी दी गई थी, जिसे पुलिस ने बाद में गिरफ्तार कर लिया था।
मोहम्मद गुलाम के पास से भारी मात्रा में विदेशी हथियार भी बरामद हुए, जो इस साज़िश की गंभीरता को दिखाते हैं। पुलिस ने यह भी खुलासा किया है कि शारिक साठा गैंग का संबंध अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम की D कंपनी से है, जिससे इस हिंसा के पीछे एक गहरी और खतरनाक अंतरराष्ट्रीय साज़िश की बू आती है।
व्हाट्सएप ग्रुप में साजिश का पटकथा
संभल हिंसा की साज़िश एक व्हाट्सएप ग्रुप ‘सांसद संभल’ से रची गई थी, जिसके एडमिन खुद सांसद जियाउर्रहमान बर्क थे। पुलिस को पक्के सबूत मिले हैं कि 22 और 24 नवंबर को इसी ग्रुप में हिंसा भड़काने के मैसेज भेजे गए। इन मैसेज में भारी भीड़ जुटाने और सरकारी सर्वे को किसी भी कीमत पर रोकने का निर्देश था।
दुबई में बैठा गैंगस्टर शारिक साठा ने भी 23 नवंबर को फोन पर निर्देश दिए थे कि सर्वे नहीं होना चाहिए। इस भीड़ का मुख्य निशाना हिंदू वकील विष्णु शंकर जैन थे, जिनकी हत्या की साज़िश रची गई थी, लेकिन वह बाल-बाल बच गए।
सुनियोजित थी संबल हिंसा साजिश
24 नवंबर 2024 को संभल में शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान भड़की हिंसा ने पूरे नॉर्थ इंडिया को हिला दिया था। हिंदू पक्ष का दावा है कि विवादित मस्जिद उस जगह बनी है, जहाँ पहले श्रीहरिहर मंदिर था। कोर्ट के आदेश पर जब एडवोकेट कमिश्नर की टीम सर्वे के लिए पहुँची, तो मुस्लिम भीड़ ने हिंसक रूप ले लिया।
पुलिस की जाँच में सामने आया है कि यह हिंसा कोई अचानक नहीं हुई, बल्कि एक सुनियोजित साज़िश का नतीजा थी। SIT ने अपनी 11वीं चार्जशीट में सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क, सपा विधायक नवाब इकबाल महमूद के बेटे सुहैल इकबाल सहित 23 लोगों को आरोपित बनाया है, जबकि विधायक पुत्र सुहैल इकबाल को क्लीनचिट मिली है।
इस सुनियोजित हमले में चार लोगों की जान गई और 29 पुलिसकर्मी घायल हुए। शाही जामा मस्जिद कमेटी के सदर जफर अली ने पुलिस को बताया कि सपा सांसद बर्क की इसमें बड़ी भूमिका थी। पहले 3000 पन्नों की चार्जशीट दाखिल हुई थी, और अब 1200 पन्नों की एक और चार्जशीट दाखिल की गई है।
अपने तीन देशों के दौरे में भारत के प्रधानमंत्री बुधवार को क्रोएशिया पहुँचे। इस दौरान दोनों देशों के बीच कई अहम मसलों पर एक साथ काम करने के लिए सहमति बनी। पीएम मोदी ने दौरे के बाद आतंकवाद और दोनों देशों की सुरक्षा और संप्रभुता पर अपनी बात रखी।
क्रोशिया में पहली बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने दौरा किया है। यूरोप का ये एक बेहद छोटा सा देश है। क्रोएशिया के जाग्रेब में पहुँचने के बाद मंत्रोच्चार से पीएम मोदी का स्वागत किया गया। इसके बाद पीएम मोदी ने क्रोएशिया में रह रहे भारतीय प्रवासियों से मुलाकात की। यहाँ लगभग 17,000 भारतीय मूल के लोग रहते हैं। लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ मुलाकात के दौरान ‘वंदे मातरम’, ‘जय श्री राम’ और ‘मोदी-मोदी’ के नारे लगाए।
अपने दौरे में प्रधानमंत्री मोदी ने क्रोशिया के प्रधानमंत्री आंद्रेज प्लेंकोविच के साथ राष्ट्रपति जोरन मिलानोविच से भी मुलाकात की। इस दौरान भारत और क्रोएशिया के बीच विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, रक्षा, ऊर्जा, फार्मास्यूटिकल्स, आईटी, सेमीकंडक्टर और एग्रीकल्चर के क्षेत्र में साथ काम करने के लिहाज से कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। इनमें से सबसे अहम ‘रक्षा सहयोग योजना’ रही जिसे मजबूत करने पर दोनों देशों की सहमति बनी।
Grateful to the people and Government of Croatia for the warm welcome during what has been a truly landmark visit. This visit ushers in a new chapter in our shared journey of friendship and extensive cooperation.@AndrejPlenkovic
दौरे के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हमारे मित्र देश का साथ हमारे दौरे के लिए काफी महत्वपूर्ण रहा। क्रोएशिया और भारत इस बात पर सहमत है कि आतंकवाद मानवता का दुश्मन है। आतंकवाद और बातचीत एक साथ नहीं हो सकती।
पीएम मोदी ने कहा कि यूरोपीय यूनियन के साथ हमारी स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप को मजबूत करने में क्रोएशिया का समर्थन और सहयोग काफी महत्वपूर्ण है। दोनों देश इस बात का समर्थन करते हैं कि यूरोप हो या एशिया किसी भी समस्या का समाधान रणभूमि से नहीं किया जा सकता बल्कि डायलॉग और डिप्लोमेसी से किया जा सकता है।
प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि किसी भी देश की अखंडता और संप्रभुता का सम्मान आवश्यक है। क्रोएशिया में आना मेरे लिए एक विशेष पल है। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पीएम मोदी ने पहली बार तीन देशों के दौरा किया। इसके तहत पहले वह साइप्रस, कनाडा और क्रोएशिया का दौरा शामिल था।
G7 शिखर सम्मेलन में आमंत्रित किए जाने के बाद पीएम मोदी कनाडा पहुँचे। यहाँ पर उन्होंने भारत के आउटरीच पार्टनर के तौर पर हिस्सा लिया। G-7 दुनिया की 7 उन्नत अर्थव्यवस्थाओं और यूरोपीय संघ का एक अनौपचारिक समूह है। इसमें संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और यूनाइटेड किंगडम शामिल हैं।
G7 शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी ने इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर, दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा, आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री अल्बनीज समेत अन्य नेताओं के साथ मुलाकात कर द्विपक्षीय वार्ता की।
क्रोएशिया का दौरा पूरा करने के बाद प्रधानमंत्री भारत वापसी कर चुके हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर हमला करने का मन तो बना लिया है, लेकिन अभी आखिरी फैसला नहीं लिया है। ट्रंप की नज़र इस बात पर है कि क्या ईरान अपना परमाणु हथियार बनाने का काम छोड़ता है या नहीं। ट्रंप का कहना है कि उनके पास हर मुश्किल का हल है, लेकिन वह अभी इंतज़ार कर रहे हैं।
ट्रंप का यह भी कहना है कि ईरान ने पहले अच्छे समझौते से इनकार कर दिया था, लेकिन अब वे व्हाइट हाउस आकर मिलना चाहते हैं। ट्रंप ने कहा कि वह युद्ध नहीं चाहते, लेकिन अगर ईरान के पास लड़ने या परमाणु हथियार रखने का विकल्प है, तो उन्हें वही करना होगा जो ज़रूरी है।
#WATCH वाशिंगटन, डीसी | ईरान की स्थिति पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा, "… मेरे पास हर चीज के लिए एक योजना है, लेकिन हम देखेंगे कि क्या होता है। उन्हें सौदा करना चाहिए था। मेरे पास उनके लिए एक बढ़िया सौदा था। हमने 60 दिनों तक इस बारे में बात की और अंत में, उन्होंने… pic.twitter.com/3Df2PWP9zL
ट्रंप ने अपने सैन्य सलाहकारों से यह भी पूछा है कि क्या अमेरिका के 30,000 पाउंड वजनी बंकर-बस्टर बमों का इस्तेमाल ईरान की अत्यधिक संरक्षित फोर्डो परमाणु साइट को नष्ट करने के लिए किया जा सकता है।
ट्रंप के समर्थक और युद्ध
ट्रंप के कुछ समर्थक, जिन्होंने उन्हें राष्ट्रपति बनने में मदद की, वे नहीं चाहते कि देश को मिडिल ईस्ट के एक नए युद्ध में धकेला जाए। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप को सत्ता में लाने वाले समर्थकों के बीच विभाजन पैदा हो गया है। उनके कुछ प्रमुख रिपब्लिकन समर्थक, जैसे स्टीव बैनन, ईरान पर हमले के विरोध में हैं।
वे ट्रंप की देश को अलग-थलग करने वाली नीतियों के समर्थक हैं। बैनन ने कहा है कि इजरायल ने ‘जो शुरू किया था, उसे पूरा करने दें।’ हालाँकि, ट्रंप का कहना है कि उनके कुछ समर्थक अब थोड़े नाखुश हैं लेकिन अन्य लोग उनसे सहमत हैं कि ईरान परमाणु शक्ति नहीं बन सकता।
ईरान में हालात और हमला
ईरान और इजरायल के बीच पिछले सात दिनों से हमले जारी हैं। इजरायल तेहरान के अलग-अलग हिस्सों में हवाई हमले कर रहा है और उसके परमाणु ठिकानों को नुकसान पहुँचाने का दावा कर रहा है।
वहीं, ईरान इजरायल पर लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें दाग रहा है। ईरान पर इजरायली हमलों में कम से कम 639 लोग मारे जा चुके हैं और 1,329 घायल हुए हैं। इजरायल में 24 लोगों की मौत की खबरें हैं।
ईरान का जवाब
ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई ने ट्रंप की धमकियों को खारिज कर दिया है और चेतावनी दी है कि अगर अमेरिका हमले में शामिल होता है तो उसके ‘बुरे परिणाम होंगे‘ और अमेरिका को काफी ज्यादा नुकसान होगा।
खामेनेई ने कहा कि ईरान कभी झुकेगा नहीं और धमकी भरी भाषा में बात करने वालों को ‘ईरानी राष्ट्र सरेंडर नहीं करेगा’ समझना चाहिए।
इजरायल की फॉर्डो साइट पर नजर
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू चाहते हैं कि ट्रंप अमेरिका को ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान में शामिल करें और उसके संभावित भूमिगत हथियार बनाने वाले परमाणु कार्यक्रम को खत्म कर दें। इजरायल का दावा है कि उसने फॉर्डो परमाणु साइट सहित कई परमाणु साइटों पर हमले किए हैं और उन्हें नुकसान पहुँचाया है।
इजरायल का मानना है कि फॉर्डो साइट सबसे महत्वपूर्ण है, जहाँ ईरान परमाणु हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है और जिसे इजरायली सेना नुकसान नहीं पहुँचा पा रही है। नेतन्याहू को उम्मीद है कि अगर ट्रंप अंतिम आदेश देते हैं, तो अमेरिकी वायु सेना B2 बॉम्बर से ‘बंकर बस्टर’ बम गिरा सकती है, जिससे इस भूमिगत प्लांट को तबाह किया जा सकता है।
रूस का रुख
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा है कि वह ईरान-इजरायल के बढ़ते संघर्ष को लेकर इजरायल और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लगातार संपर्क में हैं। पुतिन ने जोर देकर कहा कि अब समय आ गया है कि इस लड़ाई को रोकने के रास्ते खोजे जाएँ और ऐसा समाधान निकाला जाए जो इजरायल की सुरक्षा और ईरान के हितों दोनों का सम्मान करे।
पुतिन ने यह भी पुष्टि की कि रूस के वर्कर ईरान के बुशहर परमाणु ऊर्जा संयंत्र में काम कर रहे हैं, और इजरायल से सहमति बनी है कि वह इन लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। पुतिन ने साफ किया कि रूस और ईरान के बीच परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग जारी रहेगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी की कनाडा में जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात हुई। दोनों नेताओं ने हाथ मिलाया और दोस्ती की बात की। मेलोनी ने पीएम मोदी की तारीफ करते हुए कहा, “आप बेस्ट हैं, मैं आपकी तरह बनना चाहती हूँ।”
पीएम मोदी से मुलाकात के दौरान मेलोनी ने उनसे कहा कि आप बेस्ट हैं और मैं भी आपकी तरह बनने की कोशिश कर रही हूँ। जी-7 उन 7 देशों का समूह है, जिसमें इटली, फ्रांस, अमेरिका और दूसरे देश शामिल है। भारत इसका हिस्सा नहीं है, लेकिन 2019 से भारत को बतौर गेस्ट आमंत्रित किया जा रहा है।
इसी मुलाकात के दौरान दोनों ने मुलाकात की। इसकी तस्वीर मेलोनी ने सोशल मीडिया पर शेयर की, जिसमें दोनों हँसते नजर आए।
मेलोनी ने ट्वीट कर लिखा, “इटली और भारत गहरी दोस्ती से जुड़े हैं।”
पीएम मोदी ने उनकी पोस्ट को रीपोस्ट करते हुए कहा, “आपसे सहमत हूँ, हमारी दोस्ती मजबूत होगी और लोगों को फायदा होगा।”
Fully agree with you, PM Giorgia Meloni. India’s friendship with Italy will continue to get stronger, greatly benefitting our people!@GiorgiaMelonihttps://t.co/LaYIIZn8Ry
दोनों ने भारत-इटली संबंधों को बेहतर करने की बात कही। इस दौरान ग्लोबल साउथ और इंडो-पैसिफिक जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई।
पीएम मोदी ने इटली में भारतीय सेना के योगदान को याद करते हुए मेमोरियल की योजना का जिक्र किया। मेलोनी ने इसे मूल्य आधारित साझेदारी बताया और सहयोग बढ़ाने की इच्छा जताई। इस मुलाकात से दोनों देशों के रिश्ते और गहरे होंगे। इस बैठक में दोनों देशों के पीएम ने भारत और इटली के बीच बढ़ते द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा की और आपसी सहयोग को और मजबूत करने की प्रतिबद्धता जताई।
गौरतलब है कि पीएम मोदी और जॉर्जिया मेलोनी की मुलाकातों के वीडियो अक्सर सोशल मीडिया पर वायरल होते रहते हैं। दोनों के प्रशंसक Melodi नाम से अक्सर ट्वीट करते हैं, जिसमें दोनों नेता एक-दूसरे से बातचीत करते नजर आते हैं। हालाँकि कई बार ये पोस्ट बेहद मजाकिया भी होते हैं।
इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध के बाद भारत ने अपने नागरिकों को निकालना चालू कर दिया है। भारत ने अपने नागरिकों को युद्धग्रस्त ईरान से निकालने के लिए ‘ऑपरेशन सिन्धु’ लॉन्च किया है। भारत ने अपने 100+ नागरिकों को ईरान से निकाल भी लिया है। इन्हें आर्मेनिया के रास्ते निकाला गया है।
लगभग 110 भारतीय छात्र, जो ईरान के विभिन् विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कर रहे थे, उन्हें दूतावास की मदद से पहले सीमा पार कर आर्मेनिया पहुँचाया गया और अब वों सभी विशेष उड़ान से भारत लौट आए हैं। इन छात्रों को लेकर पहली फ्लाइट आर्मेनियाई राजधानी येरेवन से बुधवार (18 जून 2025) को दिल्ली पहुँचे।
Operation Sindhu begins ??.
India launched Operation Sindhu to evacuate Indian nationals from Iran. India evacuated 110 students from northern Iran who crossed into Armenia under the supervision of our Missions in Iran and Armenia on 17th June. They departed from Yerevan on a… pic.twitter.com/8WJom7wh5f
ईरान और आर्मेनिया ने इस मामले में भारत की काफी सहायता की है। ईरान ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि वह भारत के छात्रों को बाहर निकालने के लिए अपने दरवाजे खुले रखेगा और इसी प्रतिबद्धता को निभाते हुए उसने भारतीय मिशन को हरसंभव सहायता दी।
ईरान से सुरक्षित निकाले गए छात्र
तेहरान में स्थित भारतीय दूतावास ने तनाव के बाद बिगडती स्थिति को देखते हुए 110 भारतीय छात्रों को तुरंत शहर से बाहर निकालने की योजना बनाई। इन छात्रों को सुरक्षित रास्ते से आर्मेनिया ले जाया गया और फिर वहाँ से भारत भेजा गया।
निकाले गए छात्रों में से ज्यादातर उर्मिया मेडिकल यूनिवर्सिटी के हैं। इनमें से करीब 90 छात्र जम्मू-कश्मीर के हैं। ईरान से निकाले गए छात्र तमहीद मुगल ने बताया कि वे सभी भारत सरकार के इस त्वरित कदम के लिए आभारी हैं। उन्होंने कहा कि कहा कि इस मुश्किल समय में सरकार ने उनकी सुरक्षा को प्राथमिकता दी।
भारतीय छात्र ईरान में क्या करने जाते हैं?
ईरान में बड़ी संख्या में भारतीय छात्र मेडिकल शिक्षा के लिए जाते हैं। उर्मिया, तेहरान, मशहद जैसे शहरों में कई मेडिकल विश्वविद्यालय हैं जहाँ छात्र एमबीबीएस और अन्य मेडिकल डिग्रियों की पढ़ाई करते हैं। यहाँ फीस कम होती है और एडमिशन प्रक्रिया भी सरल होती है, जिससे मध्यवर्गीय भारतीय परिवारों के लिए यह एक आसान विकल्प बन जाता है।
रिपोर्ट्स बताती हैं कि भारत में जहाँ MBBS की पढ़ाई की फीस ₹1 करोड़ जाती है तो वहीं ईरान में यह ₹14 लाख से ₹30 लाख तक में ही हो जाता है। बताया गया है कि यहाँ मेडिकल की शिक्षा बांग्लादेश से भी सस्ती है। इसके अलावा ईरान, बांग्लादेश के मुकाबले कहीं अधिक विकसित है।
कुछ लोगों का दावा है कि ईरान जम्मू-कश्मीर से ईरान जाने वाले शिया छात्रों को सब्सिडी भी मिलती है। बताया गया है कि ईरान में वर्तमान में 2000 भारतीय छात्र पढ़ते हैं। ईरान का मेडिकल शिक्षा क्षेत्र भारत में मान्यता प्राप्त है और छात्रों को विदेश में अच्छी शिक्षा मिलती है।
यहाँ के कई विश्वविद्यालय विश्व में मान्यता रखते हैं। हालाँकि, इस बार के हालात असामान्य हैं और क्षेत्र में बढ़ते युद्ध के खतरे को देखते हुए भारत सरकार ने एहतियातन छात्रों को बाहर निकालने का फैसला लिया। अब इन्हें ऑपरेशन सिंधु के तहत बाहर निकाला जाएगा।
उत्तर प्रदेश के संभल जिले में 24 नवंबर 2024 को शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान भड़की हिंसा मामले में 11वीं चार्जशीट दाखिल हो गई है। संभल पुलिस ने समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसद जियाउर्रहमान बर्क, सपा विधायक नवाब इकबाल महमूद के बेटे सुहैल इकबाल सहित 23 लोगों के खिलाफ चंदौसी की MP-MLA कोर्ट में 1000 से ज्यादा पन्नों की चार्जशीट दाखिल की है।
इस चार्जशीट में हिंसा की साजिश, भड़काऊ भाषण और भीड़ को उकसाने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। बता दें कि संभल हिंसा ने पूरे राज्य में सनसनी मचा दी थी। इस घटना में चार लोगों की मौत हुई थी, जबकि 29 पुलिसकर्मी और कई आम नागरिक घायल हो गए थे।
हिंसा की शुरुआत तब हुई जब कोर्ट के आदेश पर शाही जामा मस्जिद और श्रीहरिहर मंदिर के बीच विवादित स्थल का सर्वेक्षण करने के लिए एडवोकेट कमिश्नर की टीम पहुँची थी। हिंदू पक्ष का दावा है कि मस्जिद उस जगह बनी है, जहाँ पहले हरिहर मंदिर था। सर्वे के विरोध में सैकड़ों लोगों की भीड़ जमा हो गई और देखते ही देखते हालात बेकाबू हो गए। भीड़ ने पथराव, आगजनी और गोलीबारी शुरू कर दी।
इस दौरान कई पुलिस वाहन जलकर खाक हो गए, और डिप्टी कलेक्टर रमेश बाबू सहित कई अधिकारी घायल हो गए। डिप्टी कलेक्टर ने अपनी शिकायत में कहा कि भीड़ ने उन्हें जान से मारने की नीयत से हमला किया था।
पुलिस ने इस मामले में अब तक 90 लोगों को गिरफ्तार किया है, जिनमें जामा मस्जिद के सदर जफर अली भी शामिल हैं। जफर अली ने पूछताछ में दावा किया कि 23 नवंबर 2024 की रात को सपा सांसद बर्क ने उनसे फोन पर बात की थी।
पुलिस का कहना है कि इस बातचीत में हिंसा की साजिश रची गई। चार्जशीट में यह भी उल्लेख है कि सुहैल इकबाल ने भीड़ को उकसाते हुए कहा था, “सांसद बर्क हमारे साथ हैं, अपने मंसूबे पूरे करो।” इसके बाद पथराव और गोलीबारी शुरू हो गई, जिसमें एक गोली सीओ के पैर में लगी।
सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि वह घटना के दौरान संभल में मौजूद नहीं थे और यह सब राजनीति से प्रेरित है। बर्क ने यह भी कहा कि वह कानून और संविधान में विश्वास रखते हैं और जाँच में पूरा सहयोग कर रहे हैं।
8 अप्रैल 2025 को एसआईटी ने बर्क से नखासा थाने में ढाई घंटे तक पूछताछ की थी। इस दौरान बर्क 10 वकीलों के साथ थाने पहुँचे थे। हालाँकि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उनकी गिरफ्तारी पर रोक लगा रखी है, लेकिन जाँच में सहयोग करने का आदेश दिया है।
पुलिस की जाँच में यह भी सामने आया कि हिंसा में इस्तेमाल हुए हथियारों में 315 बोर की गोलियाँ शामिल थीं, जो आमतौर पर तमंचों में इस्तेमाल होती हैं। पुलिस ने कुछ घरों से धारदार हथियार भी बरामद किए, जिनमें एक अनोखा हथियार था, जिससे दोनों तरफ से वार किया जा सकता था।
पुलिस का दावा है कि यह हिंसा सुनियोजित थी और शुक्रवार (22 नवंबर) को जुमे की नमाज के बाद भड़काऊ बयानों से भीड़ को उकसाया गया था। बर्क ने कहा था कि मस्जिद हमेशा रहेगी। अगर हम इसे नहीं बचाएँगे, तो दुनिया हम पर थूकेगी। बर्क ने कहा था, ‘जामा मस्जिद का सर्वे हुआ तो कौम (मुस्लिम) हम पर ही थूकेगी।’
संभल हिंसा मामले में 12 एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसमें से 10 में पहले ही चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है। ये 11वाँ केस है, जिसमें चार्जशीट दाखिल की गई थी। इन एफआईआर में दंगा भड़काने, हत्या के प्रयास, सरकारी कार्य में बाधा डालने और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने जैसे अपराध शामिल हैं। चार्जशीट में 700-800 अज्ञात लोगों को भी आरोपित बनाया गया है।
भारत के लोकतंत्र पर 25 जून 1975 की आधी रात को एक बड़ा हमला हुआ। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने चुनावी गड़बड़ी के कारण उनके चुनाव को अवैध करार दिया था।
इससे उनकी कुर्सी पर खतरा मंडराने लगा। सत्ता बचाने के लिए इंदिरा गाँधी ने संविधान के अनुच्छेद 352 का इस्तेमाल करते हुए देश में आपातकाल घोषित कर दिया, जो 21 महीने तक चला।
आपातकाल के दौरान नागरिकों की स्वतंत्रता छीन ली गई और मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया। 1 लाख से ज्यादा लोगों को बिना मुकदमे के जेल में डाल दिया गया।
सरकार ने आंतरिक सुरक्षा अधिनियम (MISA) का इस्तेमाल असहमति और विरोध को दबाने के लिए किया। अखबारों पर सेंसरशिप लगाई गई, छात्र आंदोलनों को बलपूर्वक रोका गया और कई राजनीतिक नेताओं को जेल भेजा गया। सिर्फ 10 दिन बाद, 4 जुलाई 1975 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया।
इस तानाशाही वाले माहौल में, गुजरात के 25 साल के युवा आरएसएस प्रचारक नरेंद्र मोदी ने छिपकर काम करना शुरू किया और इंदिरा गाँधी की सरकार के खिलाफ विरोध में सक्रिय भूमिका निभाई।
जब आरएसएस के वरिष्ठ नेताओं को गिरफ्तार किया गया, तब मोदी ने भूमिगत रहते हुए एक नई रणनीति बनाई। उनके साहस, योजनाओं और संघर्ष ने न सिर्फ आपातकाल विरोधी आंदोलन को मजबूत किया, बल्कि एक राष्ट्रीय नेता के रूप में उनके राजनीतिक सफर की नींव भी रखी।
असली फासीवादी कौन- कॉन्ग्रेस या लोकतंत्र के लिए आंदोलन करने वाले मोदी
विडंबना है कि जिस कॉन्ग्रेस पार्टी ने 1975 में आपातकाल के दौरान एक लाख से ज्यादा लोगों को जेल में डाला, आरएसएस पर प्रतिबंध लगाया, प्रेस पर सेंसरशिप लगाई, लोगों को प्रताड़ित किया, वही पार्टी आज नरेंद्र मोदी को ‘फासीवादी’ कह रही है, जबकि उन्होंने उस समय इन सबके खिलाफ डटकर संघर्ष किया था।
नरेंद्र मोदी ने आपातकाल के दौरान न सिर्फ विरोध किया, बल्कि भूमिगत रहकर सरकार के दमन के खिलाफ आंदोलन को मजबूत किया। लेकिन 2014 में जब से वो प्रधानमंत्री बने हैं, कॉन्ग्रेस पार्टी लगातार उन्हें बदनाम करने की कोशिश कर रही है।
बार-बार चुनावी जमीन पर पटखनी खाने वाले कॉन्ग्रेस के नेता राहुल गाँधी चुनावी असफलता झेल चुके हैं मोदी की तुलना हिटलर से करते हैं। प्रधानमंत्री बनने से पहले 2014 में ही नरेंद्र मोदी को कॉन्ग्रेस ने ‘हिटलर’ कहना शुरू कर दिया था।
हैरानी की बात ये है कि जो लोग हिटलर जैसे तानों का इस्तेमाल कर रहे थे, वे खुद उस समय की सच्चाई को नजरअंदाज कर रहे थे। कॉन्ग्रेस की मीडिया टीम अक्सर पीएम मोदी को ‘तानाशाह’, ‘निरंकुश’ जैसे शब्दों से निशाना बनाती है और अपने अतीत को भूल जाती है।
राहुल गाँधी ने 2023 में यहाँ तक कह दिया कि मोदी सरकार के दौर में भारत एक ‘फासीवादी देश’ बन गया है। लेकिन वहीं नरेंद्र मोदी 1975 के आपातकाल में गिरफ्तारी से बचते हुए छिपकर विरोध कर रहे थे। वे भूमिगत होकर साहित्य बाँट रहे थे और जेल में बंद कार्यकर्ताओं के परिवारों की मदद कर रहे थे।
उस समय कॉन्ग्रेस प्रेस पर पाबंदी लगा रही थी और लोकतंत्र को कुचल रही थी। हाल ही में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी मोदी सरकार की तुलना ‘फासीवादी शासन’ से की और कहा कि INDI गठबंधन मोदी के खिलाफ इस लड़ाई को जारी रखेगा। 1975 में अगर किसी ने उस तरह की बात इंदिरा गाँधी के खिलाफ कही होती, तो उसे सीधा जेल भेज दिया जाता। इससे पहले, 2018 में भी खड़गे ने मोदी की तुलना हिटलर से की थी।
यह विडंबना है कि जिन्होंने कभी असली आपातकाल लगाया, आज वे लोकतंत्र की बात कर रहे हैं और उन लोगों पर आरोप लगा रहे हैं, जिन्होंने उस आपातकाल का विरोध किया था।
The constituents of the INDIA Bloc thank the people of India for the overwhelming support received by our alliance. The people’s mandate has given a befitting reply to the BJP and their politics of hate, corruption and deprivation. This is a political and moral defeat of Prime… pic.twitter.com/oWyQSrxWBR
अगर बात को साफ-साफ समझें तो नरेंद्र मोदी ने कभी देश में लोगों के मौलिक अधिकारों को निलंबित नहीं किया। आज हर कोई उनकी खुलकर आलोचना करता है, खासकर विपक्षी नेता और वो भी बिना किसी डर के।
मोदी ने अखबारों पर सेंसरशिप नहीं लगाई बल्कि ये काम 1975 में इंदिरा गाँधी ने किया था। मोदी ने कॉन्ग्रेस नेताओं या छात्रों को बड़ी संख्या में जेल में नहीं डाला जबकि इंदिरा गाँधी के समय ऐसा खुलकर हुआ था।
इंदिरा गाँधी ने आपातकाल के दौरान पुलिस का इस्तेमाल कर असहमति को दबाया और देश को अपनी मर्जी से चलाया, संविधान की अनदेखी की। नरेंद्र मोदी ने ऐसा कुछ नहीं किया। इसके उलट, उन्होंने उस समय छिपकर आपातकाल का विरोध किया, भेष बदलकर काम किया, गिरफ्तार कार्यकर्ताओं की मदद की और लोकतंत्र की रक्षा की।
लेकिन आज की राजनीति में सच्चाई को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है। अब जो लोग उस दौर के दमनकारी शासन का हिस्सा थे, वे खुद को आज लोकतंत्र के रक्षक बताने की कोशिश कर रहे हैं और मोदी जैसे व्यक्ति, जिन्होंने उस दमन के खिलाफ लड़ाई लड़ी, उन्हें ‘फासीवादी’ कह रहे हैं।
अगर किसी को ‘फासीवादी’ कहा जाना चाहिए, तो वो कौन है, वो जिसने आपातकाल लगाया था? या वो जिसने उसका विरोध किया था? ये सवाल आज भी उतना ही जरूरी है जितना 1975 में था।
मोदी और आपातकाल
जब 1975 में देश में आपातकाल लगाया गया, तब नरेंद्र मोदी पहले से ही एक सक्रिय और पहचाने जाने वाले युवा नेता बन चुके थे। 1974 के गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन में उनकी भूमिका बेहद अहम रही, जिसने राज्य में कॉन्ग्रेस सरकार को गिराने में बड़ी भूमिका निभाई।
इस आंदोलन के बाद लोग उन्हें एक प्रतिबद्ध, समझदार और रणनीतिक आयोजक के रूप में देखने लगे। नरेंद्र मोदी ने 1972 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के पूर्णकालिक प्रचारक के रूप में अपना जीवन समर्पित कर दिया था।
महज तीन साल बाद ही आपातकाल घोषित कर दिया गया। लेकिन मोदी की परिपक्व सोच, सूझबूझ और परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता ने उन्हें आरएसएस के भूमिगत नेटवर्क की एक महत्वपूर्ण कड़ी बना दिया।
आपातकाल के दौरान उन्हें एक खास जिम्मेदारी दी गई, संगठन को जिंदा रखना, गुप्त रूप से संचार बनाए रखना और किसी भी हालत में गिरफ्तारी से बचना।
नरेंद्र मोदी ने इस मिशन को सफल बनाने के लिए वरिष्ठ आरएसएस नेताओं जैसे लक्ष्मणराव इनामदार (जिन्हें ‘वकील साहब’ कहते थे), केशवराव देशमुख और वसंत गजेंद्रगढ़कर के साथ मिलकर काम किया।
वे नानाजी देशमुख और दत्तोपंत ठेंगड़ी जैसे दिग्गज नेताओं द्वारा चलाए जा रहे राष्ट्रीय स्तर के लोक संघर्ष समिति आंदोलन से भी सक्रिय रूप से जुड़े थे। इन नेताओं के मार्गदर्शन में मोदी ने चुपचाप लेकिन बेहद असरदार तरीके से आपातकाल के खिलाफ विरोध आंदोलन को ताकत दी और लोकतंत्र की रक्षा में अपनी अहम भूमिका निभाई।
कैसे भूमिगत हुए थे मोदी
आपातकाल के दौरान गुजरात पुलिस और देश के बाकी राज्यों की पुलिस पूरी तरह अलर्ट पर थी। गुजरात उस समय आरएसएस का सबसे सक्रिय केंद्र था, और सरकार को पता था कि इंदिरा गांधी के शासन के खिलाफ बढ़ते असंतोष को वहां काबू में रखना बहुत जरूरी है।
इसलिए, खुफिया निगरानी बेहद कड़ी थी और आरएसएस कार्यकर्ताओं को पकड़ने की कोशिश लगातार चल रही थी। लेकिन इन हालात के बावजूद, नरेंद्र मोदी गिरफ्तारी से पूरी तरह बचने में सफल रहे। उन्होंने पुलिस की नजरों से बचने के लिए कई भेष अपनाए। कभी वे भगवा कपड़े पहने साधु बन जाते, तो कभी पगड़ी पहने बुजुर्ग सिख।
उन्होंने अगरबत्ती बेचने वाले एक स्ट्रीट वेंडर और कॉलेज जाने वाले एक सरदारजी छात्र का रूप भी अपनाया। इन बदलते भेषों की मदद से मोदी लगातार छिपते रहे और आपातकाल विरोधी गतिविधियो को जारी रखा।
नरेंद्र मोदी संन्यासी के रूप में
आपातकाल के दौरान मुंबई में एक बेहद जोखिम भरे मिशन में नरेंद्र मोदी ने खुद को मकरन देसाई के बेटे के रूप में पेश किया, जो बाद में भाजपा नेता बने। यह पहचान उन्हें सरकारी निगरानी से बचाने में मददगार साबित हुई।
इस पूरे मिशन की योजना खुद मोदी ने बनाई थी, ताकि वे एक वैध पहचान के सहारे बिना किसी शक या सजा के आसानी से यात्रा कर सकें। यह उनकी समझदारी और सूझबूझ का एक और उदाहरण था, जिससे वे आपातकाल के दौरान विरोध की गतिविधियों को जारी रख पाए।
नरेंद्र मोदी ने ‘सरदार जी’ का वेश धारण किया
आपातकाल के दौरान एक दिलचस्प और यादगार घटना में, नरेंद्र मोदी ने स्वामीजी का वेश धारण किया और भावनगर जेल पहुंच गए। उनका उद्देश्य था विष्णुभाई पंड्या और अन्य बंदियों से मुलाकात करना, जो जेल में बंद थे। उन्होंने जेल अधिकारियों से कहा कि वे सत्संग करने आए हैं, यानी धार्मिक प्रवचन देने के लिए आए हैं।
इस पहचान के चलते उन्हें बिना किसी शक के जेल के अंदर जाने दिया गया। वहां उन्होंने आध्यात्मिक बातचीत के बहाने बंदियों से जरूरी बातें साझा कीं। करीब एक घंटे बाद, वे बिल्कुल शांतिपूर्वक और बिना किसी परेशानी के जेल से बाहर निकल गए। यह घटना उनके साहस, चतुराई और योजनाबद्ध तरीके से काम करने की एक अनोखी मिसाल है।
कोड, प्रिंटिंग प्रेस और साइक्लोस्टाइल मशीनों के रणनीतिकार
किसी भी संघर्ष में, संचार सबसे अहम हथियार होता है, और आपातकाल के समय नरेंद्र मोदी जैसे नेताओं के लिए यह प्रतिरोध की जीवन रेखा था। लेकिन इसमें जोखिम बहुत ज्यादा थे, अगर वे पकड़ में आते, तो पूरा नेटवर्क और आंदोलन खतरे में पड़ सकता था।
ऐसे हालात में मोदी ने राज्य की ताकतवर मशीनरी को मात देने के लिए कई अनोखे तरीके अपनाए। उन्हें भूमिगत संदेश फैलाने के लिए छपाई की जरूरत थी, जिसके लिए उन्होंने साइक्लोस्टाइल मशीनों की तस्करी और संचालन की जिम्मेदारी संभाली।
ये मशीनें उन पर्चों को छापने के लिए इस्तेमाल होती थीं जिनमें आपातकाल का विरोध, सरकारी अत्याचारों का खुलासा और लोकतंत्र की रक्षा का आह्वान किया गया था। इन पर्चों का वितरण भी पूरी तरह विकेंद्रित था। उन्हें सामान या टिफिन बॉक्स में छिपाकर ले जाया जाता, या नाई की दुकानों में छोड़ दिया जाता ताकि लोग चुपचाप उन्हें उठा सकें।
गांवों में संदेश फैलाने के लिए साधु, पुजारी और धार्मिक प्रचारकों को जोड़ा गया, जो बिना शक की नजर में आए संदेश को आगे बढ़ा सकते थे। संचार को सुरक्षित रखने के लिए भी कई चालें चली गईं। जैसे, फोन नंबरों को अंकों की अदला-बदली करके कोड में बदल दिया जाता था, ताकि अगर कोई कॉल सुने तो कुछ समझ न आए।
सत्यनारायण पूजा जैसे धार्मिक कार्यक्रमों की आड़ में गुप्त बैठकें होती थीं, और आरएसएस की बैठकों को ‘चंदन का कार्यक्रम’ कहा जाता था ताकि शक न हो। यहां तक कि घर के बाहर चप्पल रखने का तरीका भी जानबूझकर बदला जाता था।
क्योंकि पुलिस को संघ के अनुशासन की पहचान करने की ट्रेनिंग दी गई थी। इन सभी छोटे-बड़े उपायों ने मिलकर आपातकाल के दौरान एक छिपे हुए लेकिन मजबूत विरोध आंदोलन को जीवित रखा, जिसमें नरेंद्र मोदी की भूमिका बहुत ही अहम रही।
नेताओं को संगठित करना, पलायन नेटवर्क का निर्माण करना
आपातकाल के दौरान नरेंद्र मोदी ने सिर्फ पर्चे ही नहीं, बल्कि लोगों को भी एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाने का काम किया। जॉर्ज फर्नांडिस, वी.एम. तारकुंडे और दत्तोपंत ठेंगड़ी जैसे बड़े आपातकाल विरोधी नेता जब गुजरात आए, तो उनकी पूरी यात्रा का समन्वय नरेंद्र मोदी ने किया। ये बैठकें सुरक्षित घरों में होती थी और हर जगह पर भागने के रास्ते और सुरक्षा इंतजाम पहले से तैयार रहते थे।
मोदी के नेतृत्व में यह पूरा आंदोलन विकेंद्रीकृत था। हर स्वयंसेवक या जिला इकाई अपने-अपने स्तर पर काम करती थी, लेकिन गुप्त तरीकों से एक-दूसरे से जुड़ी रहती थी। मोदी रसद के मामले में बेहद सावधान थे।
कई बार, जिन कार्यकर्ताओं को किसी नेता को बाहर ले जाना होता था, उन्हें ये तक नहीं बताया जाता था कि वे किसे लेकर जा रहे हैं या क्यों। हर योजना को आखिरी मिनट तक पूरी गोपनीयता से तैयार किया जाता था।
एक बार ऐसा हुआ कि नरेंद्र मोदी सिख युवक का भेष धारण करके एक गुप्त बैठक में शामिल थे। तभी पुलिस किसी सूचना के आधार पर उस स्थान पर पहुँच गई। जब पुलिस ने मोदी से सवाल पूछे, तो उन्होंने बहुत शांत और सामान्य तरीके से जवाब दिया, जिससे पुलिस को कोई शक नहीं हुआ।
वे उन्हें कहीं और भेजकर खुद सुरक्षित निकल गए। पुलिस को अंदाजा भी नहीं हुआ कि जिसे वे ढूँढ रहे थे, वह उनके ठीक सामने खड़ा था। इस तरह की घटनाएँ मोदी की साहस, समझदारी और चतुर रणनीति को दर्शाती हैं, जिसने आपातकाल के दौरान विरोध आंदोलन को जिंदा और मजबूत बनाए रखा।
चलाए रखा आंदोलन
क्रांति सिर्फ बड़े आंदोलन या नारेबाजी का नाम नहीं है, यह धैर्य और सेवा से भी जुड़ी होती है। आपातकाल के दौरान नरेंद्र मोदी ने सिर्फ विरोध नहीं किया, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि जेल में बंद आरएसएस स्वयंसेवकों के परिवार भूखे न सोएँ।
उन्होंने उनकी वित्तीय मदद, चिकित्सा देखभाल और दूसरी जरूरतों का भी पूरा ध्यान रखा। मोदी खुद गोपनीय यात्रा करते थे, परिवारों से मिलते थे और उनके लिए जीवन रेखा बन गए थे।उनके शब्दों ने कई युवाओं को प्रेरित किया।
पोरबंदर में जब सभी वरिष्ठ कार्यकर्ता गिरफ्तार हो गए और युवा स्वयंसेवक हिम्मत हारने लगे, तो नरेंद्र मोदी ने सामने आकर उन्हें हौसला दिया। उन्होंने कहा, “अगर आपका इरादा सही है, तो अकेला व्यक्ति भी काफी है। लोकतंत्र की जीत होनी चाहिए।”
मोदी ने आंदोलन में हर किसी की भूमिका तय की। मेडिकल छात्रों को खास काम दिए गए, क्योंकि वे बिना शक के एक जगह से दूसरी जगह जा सकते थे और उन्होंने यही मौका पर्चे पहुँचाने के लिए इस्तेमाल किया।
बच्चों को भी संदेशवाहक के रूप में शामिल किया गया, क्योंकि उनकी गतिविधियों पर सबसे कम शक होता था। इस तरह नरेंद्र मोदी की रणनीति सेवा और प्रेरणा के जरिए आपातकाल के दौरान न सिर्फ आंदोलन को जिंदा रखा, बल्कि उसे आगे भी बढ़ाया।
आपदा में कवि का निर्माण
आपातकाल के कठिन समय में, जब देश में डर और दमन का माहौल था, नरेंद्र मोदी ने न केवल सक्रिय रूप से विरोध किया, बल्कि अपने अनुभवों और भावनाओं को डायरी में भी लिखा। उन्होंने उस कठिन समय के बारे में एक शक्तिशाली कविता लिखी, जो आपातकाल के खिलाफ चल रहे आंदोलन के आदर्शवाद, त्याग और जोश को दर्शाती थी।
यह कविता गुजराती में लिखी गई थी और इसका एक सरल अनुवाद आंदोलन की उस भावना को सामने लाता है, जिसमें संघर्ष, उम्मीद और देश के लिए बलिदान की बात की गई है। यह लेखन नरेंद्र मोदी की आंतरिक भावना, देशभक्ति और उस समय के युवा जोश को दर्शाता है, जब लोकतंत्र को बचाने के लिए लोग चुपचाप लेकिन मजबूती से लड़ रहे थे।
जब कर्तव्य ने पुकारा तो कदम कदम बढ़ गये जब गूंज उठा नारा ‘भारत माँ की जय’ तब जीवन का मोह छोड़ प्राण पुष्प चढ़ गये कदम कदम बढ़ गये टोलियाँ की टोलियाँ जब चल पड़ी यौवन की तो चौखट चरमरा गये सिंहासन हिल गये प्रजातंत्र के पहरेदार सारे भेदभाव तोड़ सारे अभिनिवेश छोड़, मंजिलों पर मिल गये चुनौती की हर पंक्ति को सब एक साथ पढ़ गये कदम कदम बढ़ गये सारा देश बोल उठा जयप्रकाश जिंदाबाद तो दहल उठे तानाशाह भृकुटियां तन गई लाठियाँ बरस पड़ी सीनों पर माथे पर कदम कदम बढ़ गये
इसका मतलब है, “जब कर्तव्य ने पुकारा, हम बिना डरे आगे बढ़े। जब ‘भारत माता की जय’ के नारे गूंजे, हमने जीवन के आराम को छोड़ दिया और अपनी सांसों को समर्पित कर दिया। कदम दर कदम, हम आगे बढ़े। युवाओं की टोलियाँ सिंहासन हिलाती और दरवाज़े तोड़ती हुई आगे बढ़ीं। लोकतंत्र के पहरेदार उठे, भेदभाव मिटाते हुए। चुनौती को पंक्ति दर पंक्ति पढ़ते हुए, हम आगे बढ़े। देश ने ‘जेपी ज़िंदाबाद’ का नारा लगाया। तानाशाह काँप उठे, लाठियाँ गिरीं। लेकिन हमने अपनी छाती और सिर पर उन्हें झेला। कदम दर कदम, हम आगे बढ़े।”
यह सिर्फ़ एक कविता नहीं थी, यह भविष्यवाणी थी।
संघर्ष मा गुजरात, प्रतिरोध लिख रहा हूँ
जब आपातकाल 1977 में खत्म हुआ, तो नरेंद्र मोदी ने उस दौर में अपनी भूमिका और अनुभवों को एक किताब में दर्ज किया। इस किताब का नाम था ‘संघर्ष मा गुजरात‘। उन्होंने यह किताब सिर्फ 23 दिनों में, बिना किसी संदर्भ सामग्री के लिखी।
यह किताब गुजरात में आपातकाल के दौरान हुए घटनाक्रमों का एक विस्तृत और गहराई से लिखा गया क्षेत्रीय विवरण है। इसमें मोदी ने बताया कि कैसे आंदोलन चला, लोग कैसे जुड़े और किस तरह से विरोध को संगठित किया गया। यह किताब आज भी आपातकाल के समय गुजरात में हुए संघर्षों को समझने के लिए एक अहम दस्तावेज मानी जाती है।
संघर्ष मा गुजरात का कवरमीसा’ का कोड़ा बरसा
इसे तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री बाबूभाई पटेल ने शुरू किया था और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली।
पुस्तक का लोकार्पण
एक अन्य पुस्तक, ‘आपातकाल के सेनानी’ में एक आयोजक और भूमिगत नेता के रूप में उनकी भूमिका का वर्णन किया गया है।
पुस्तक विमोचन की समाचार कटिंग
चुप नहीं हुए मोदी
आपातकाल का दौर नरेंद्र मोदी के जीवन में एक ऐसा समय था, जिसने उन्हें गहराई से प्रभावित किया और उनका दृष्टिकोण आकार दिया। इसी कठिन समय में उनका विकेंद्रीकरण में विश्वास, संकट के समय तेजी से फैसले लेने की क्षमता, और जनता को प्राथमिकता देने की सोच और भी मजबूत हुई। आज जब वे भारत के प्रधानमंत्री हैं, तो वे आपातकाल का जिक्र सिर्फ इतिहास के तौर पर नहीं, बल्कि इस चेतावनी के रूप में करते हैं कि अगर सत्ता बेकाबू हो जाए तो क्या हो सकता है।
जब बहुत से लोग डरकर चुप हो गए, तब मोदी ने रणनीति बनाना शुरू किया। जब दूसरों ने हार मान ली, तब उन्होंने विरोध की ताकत को जोड़े रखा। जेल की दीवारों और छिपे हुए घरों की चुप्पी के बीच, मोदी ने लोकतंत्र की आवाज को जिंदा रखा।
आपातकाल के दौरान नरेंद्र मोदी की कहानी सिर्फ खुद को बचाने की कहानी नहीं है। यह एक साहसी प्रतिरोध की कहानी है, एक ऐसे युवक की कहानी, जिसने तब आवाज उठाई जब बाकी चुप थे, जिसने भूमिगत होकर लोकतंत्र की रक्षा की। यह वही कहानी है, जिसने एक नेता को नहीं, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक आत्मा को भी आकार दिया।
ईरान और इजरायल के बीच छिड़ी जंग ने मिडिल ईस्ट को युद्ध के कगार पर ला खड़ा किया है। इस बीच, ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के धमकी भरे बयानों का कड़ा जवाब दिया है। टेलीविजन संबोधन में खामेनेई ने कहा, “ईरान थोपी गई जंग में सरेंडर नहीं करेगा। अमेरिकी दखल से अपूरणीय क्षति होगी।”
खामेनेई ने इजरायल के हालिया हमलों को ‘मूर्खतापूर्ण और दुर्भावनापूर्ण’ बताया, जिसमें तेहरान सहित कई सैन्य और परमाणु ठिकानों को निशाना बनाया गया। उन्होंने कहा, “इजरायल ने हमारी हवाई सीमा का उल्लंघन कर बड़ी गलती की है। वह इसके गंभीर परिणाम भुगतेगा।”
बता दें कि ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ पर लिखा था कि वह खामेनेई का ठिकाना जानते हैं, लेकिन ‘फिलहाल’ उन्हें निशाना नहीं बनाएँगे। उन्होंने ईरान से ‘बिना शर्त सरेंडर’ की माँग की, जिसे खामेनेई ने ‘हास्यास्पद’ करार दिया।
उन्होंने एक्स पर लिखा, “अमेरिकी राष्ट्रपति हमें धमकी देता है। एक बेहूदा बयान में वह ईरानी क़ौम से कहता है कि आओ और समर्पण कर दो। धमकियाँ उन्हें दी जाएँ जो इन धमकियों से डरते हों। ईरानी क़ौम धमकी देने वालों से कभी मरऊब नहीं होती।”
The US President threatens us. With his absurd rhetoric, he demands that the Iranian people surrender to him. They should make threats against those who are afraid of being threatened. The Iranian nation isn’t frightened by such threats.
ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघई ने अल जज़ीरा से कहा, “अमेरिकी हस्तक्षेप पूरे क्षेत्र को पूर्ण युद्ध में झोंक देगा।” वहीं, खामेनेई ने एक्स पर पोस्ट कर जंग का ऐलान किया और कहा, “ईरान इजरायल के साथ कोई सुलह नहीं करेगा।” खामेनेई ने जोर देकर कहा कि उनकी सेना तैयार है और जनता व सरकार का पूरा समर्थन है।
खामनेई के ट्वीट का स्क्रीनशॉट
यह तनाव तब और बढ़ गया जब इजरायल ने ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर हमले किए, जिसमें कई वरिष्ठ कमांडर मारे गए। जवाब में ईरान ने इजरायल के तेल रिफाइनरी और सैन्य ठिकानों पर हमले किए। यरुशलम में अमेरिकी दूतावास बुधवार से शुक्रवार तक बंद रहेगा, और कर्मचारियों को घरों में रहने का निर्देश दिया गया है। वैश्विक समुदाय चिंतित है कि यह संघर्ष बड़ा रूप ले सकता है। कई देशों ने अपने नागरिकों को सतर्क रहने की सलाह दी है।
कलकत्ता हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार को बंगाल में महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम यानी मनरेगा स्कीम 1अगस्त 2025 से लागू करने का आदेश दिया है। मार्च 2022 को पश्चिम बंगाल में इस योजना को रोक दिया गया था।
कोर्ट ने कहा है कि केन्द्र सरकार इसको लेकर कोई शर्त लगा सकती है ताकि पहले हुई अनियमितताएँ दोबारा न हों। उस वक्त केन्द्र सरकार ने राज्य को दिये जाने वाले आवंटन राशि को रद्द कर दिया था। ये फैसला 63 कार्यस्थलों के निरीक्षण के आधार पर किया था। इस दौरान 31 कार्यस्थलों पर गड़बड़ी पाई गई थी।
संसद के बजट सत्र के दौरान 25 मार्च 2025 केन्द्रीय मंत्री चंद्रशेखर पेम्मासानी ने मनरेगा को लेकर जानकारी के दौरान भी कहा था कि बंगाल में धन का दुरुपयोग हुआ और ऐसे मामले सामने आए जब काम के बंटवारे और ठेकों को लेकर गड़बड़ियाँ पाई गई। मंत्री के मुताबिक “हमने एक ऑडिट टीम भेजी। उन्होंने 44 ऐसे काम पाए जिनमें अनियमितताएं थीं। उन्होंने 34 मामलों में पूरी वसूली की। अभी भी 10 अन्य काम पूरे किए जाने बाकी हैं। वित्तीय गड़बड़ी 5.37 करोड़ रुपये की थी। इसमें से उन्होंने 2.39 करोड़ रुपये वसूल किए हैं। कुछ चीजों पर अभी भी ध्यान देने की जरूरत है।”
साल 2021-22 में मनरेगा के तहत राज्य को ₹7507.80 करोड़ दिए गए थे। इसके बाद तीन साल तक राज्य को धनराशि नहीं दिए गए। इस पर कोर्ट का कहना है कि मनरेगा योजना को अनिश्चितकाल के लिए निलंबित नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने केन्द्र से पूछा कि पश्चिम बंगाल के कुछ इलाकों, जैसे मालदा, दार्जिलिंग, पूर्वी बर्धमान, हुगली को छोड़कर इस योजना को फिर से क्यों नहीं शुरू किया गया?
चीफ जस्टिस टीएस शिवगनम और जस्टिस चैताली चटर्जी की खंडपीठ ने इस मामले पर सुनवाई की। खंडपीठ ने कहा ” ये सभी आरोप 2022 से पहले के हैं, आप जो चाहें करें, लेकिन योजना को लागू करें “
कोर्ट ने कहा कि इस धनराशि को समेकित निधि में जमा करना होगा। साथ ही इस धनराशि का पहले जिसने दुरुपयोग किया, उससे कानूनी तरीके से निपटा जाना चाहिए।
खंडपीठ ने कहा, ” मनरेगा योजना को अनिश्चितकाल तक ठंडे बस्ते में नहीं डाला जा सकता। केन्द्र सरकार के पास इसकी अनियमितता की जाँच के लिए पर्याप्त साधन हैं। ये जिस उद्देश्य से बनाया गया है उस हित को पूरा करना होगा। इसलिए केन्द्र सरकार को अपनी जाँच को आगे बढ़ाने के साथ साथ योजना को 1 अगस्त 2025 से लागू किया जाए”
कोर्ट ने कहा कि केन्द्र और राज्य सरकारें धन के वितरण पर अपनी शर्ते रखने के लिए स्वतंत्र हैं ताकि पहले जो गड़बड़ी हुई है वह न हो।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान हुए सीजफायर के फैसले में अमेरिका की कोई मध्यस्थता नहीं थी… ये बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से 35 मिनट लंबी बातचीत में स्पष्ट की। उन्होंने कनाडा दौरे के वक्त डोनाल्ड ट्रंप से कॉल पर बात करते हुए साफ कहा कि भारत अपने मुद्दों में तीसरे पक्ष को स्वीकार नहीं करेगा चाहे वो पक्ष अमेरिका का ही क्यों न हो। उन्होंने ये भी कहा कि भारत अब आतंक के खिलाफ पर्दे के पीछे से नहीं लड़ेगा, सामने से लड़ेगा और जवाब देगा।
भारतीय पीएम का ये रुख देखने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने भी आतंक के खिलाफ समर्थन किया। बाद में ये सारी बातें विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने मीडिया को बताई।
Foreign Secretary Vikram Misri announced that Prime Minister @narendramodi had a telephonic conversation with US President #DonaldTrump, which lasted approximately 35 minutes. During the discussion, PM Modi briefed President Trump about Operation Sindoor. PM Modi clarified that… pic.twitter.com/1RuPVc778V
ये पूरी बातचीत पिछले महीने ऑपरेशन सिंदूर के वक्त जो खबरें आईं थीं उससे संबंधित थीं, जिनमें ट्रंप के एक पोस्ट के बाद धड़ल्ले से चलाया गया कि भारत ने तो ऑपरेशन सिंदूर इसलिए रोका क्योंकि अमेरिका ने हस्तक्षेप किया था। इस एक दावे पर उन कॉन्ग्रेसियों और वामपंथियों को भी बोलने का मौका मिला जो चाहकर भी ऑपरेशन सिंदूर पर मोदी सरकार की आलोचना नहीं कर पा रहे थे।
ट्रंप का पोस्ट आते ही सोशल मीडिया पर मोदी सरकार की आलोचना शुरू हो गई। कहा जाने लगा कि हमेशा से कहा जाता था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर विपक्ष साथ नहीं दे रहा, मगर ऑपरेशन सिंदूर के समय जब सब एकजुट थे, सरकार की कार्रवाई का समर्थन दे रहे थे तो सरकार क्यों पीछे हटी…।
हर तरह से माहौल बनाया गया कि देश की आम जनता यही सोचे कि मोदी सरकार अमेरिका के आगे झुक गई और पाकिस्तान से मुँह की खा बैठी।
सोशल मीडिया पर चल रहे तमाम प्रपंच के बाद विदेश सचिव विक्रम मिस्री इस मुद्दे पर सामने आए। उन्होंने बताया कि ये सीजफायर सिर्फ और सिर्फ पाकिस्तान के गिड़गिड़ाने के कारण हुआ है, अमेरिका की मध्यस्थता की वजह से नहीं।
हालाँकि, तब भी कॉन्ग्रेसी जानबूझकर झूठ फैलाते रहे। उन्होंने मोदी सरकार के प्रति कुंठा निकालने के लिए अपने ही देश पर सवाल खड़ा करना शुरू कर दिया। नतीजा ये हुआ कि जब पाकिस्तान को अपनी हार के बावजूद अपने लोगों में जीत का माहौल बनाना था, तो उन्होंने कॉन्ग्रेस नेताओं के बयान का इस्तेमला किया। वहीं पाकिस्तान हैंडल्स ने भी इन्हें जमकर शेयर किया।
And it has happened yet again.
Pakistani Media is playing Rahul Gandhi's and Congress's narrative of "Surrender"
— Politics Pe Charcha (@politicscharcha) June 4, 2025
टीवी शो में वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेताओं के बयान चलाए गए जिसमें वो मोदी सरकार से जवाब माँग रहे थे कि उन्होंने अमेरिका को मध्यस्थता का मौका क्यों दिया। इस सीजफायर को ‘राष्ट्र शर्म’ तक की बात कही जाने लगी। ताना दिया गया कि नाम ‘नरेंद्र’ और किया ‘सरेंडर’। सवाल उठे कि अगर ट्रंप ने मध्यस्थता नहीं की होती तो फिर वो पोस्ट क्यों करते और क्यों इतना साफ होकर बताते कि ये जंग उनकी वजह से रुकी है।
And it has happened yet again.
Pakistani Media is playing Rahul Gandhi's and Congress's narrative of "Surrender"
— Politics Pe Charcha (@politicscharcha) June 4, 2025
कॉन्ग्रेसियों जिस समय ऑपरेशन सिंदूर को देखते हुए जब भारतीय सेना की कार्रवाई पर देश को गौरवान्वित होने के लिए कहना था, उस समय वो अपने निराधार व फर्जी सवालों से देश की जनता को सिर्फ इसलिए आशंकित कर रहे थे ताकि मोदी सरकार के खिलाफ माहौल बन सके। पवन खेड़ा जैसे नेता इस प्रोपगेंडे को हवा देने में प्रमुख नाम थे।
कुछ दिन पहले की ही बात है पार्टी के महासचिव जयराम रमेश ने एक्स पर पोस्ट किया था जिसमें उन्होंने लिखा था कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने 34 दिनों (10 मई 2025 से 13 जून, 2025) के बीच में, तीन अलग-अलग देशों में 13 अलग-अलग मौकों पर सार्वजनिक रूप से ढिंढोरा पीटा कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम कराया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आखिर इस पर कब बोलेंगे।
Today President Trump turns 79.
In the 34 days between May 10, 2025 and June 13, 2025, he trumpeted publicly on 13 different occasions in 3 different countries that he had brought about a cease-fire between India and Pakistan using trade with America as a carrot and stick. He,… pic.twitter.com/kOU1VxKLZB
आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 35 मिनट की ट्रंप के साथ हुई बातचीत उन्हीं प्रश्नों का जवाब है। पीएम ने डोनाल्ड ट्रंप से बात करके उन्हीं के सामने ये कह दिया कि भारत किसी की मध्यस्था नहीं स्वीकार करेगा, तो ये अमेरिका से ज्यादा उन विपक्षियों को जवाब है जिन्होंने मोदी सरकार के साथ-साथ भारतीय सेना पर भी सवाल खड़े किए थे और ये पूछा था कि आखिर पता होना चाहिए कि पाकिस्तान के कितने विमान मार गिराए गए हैं।
वैसे राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर कॉन्ग्रेसियों द्वारा सवाल उठाना कोई नया नहीं है। ऑपरेशन उड़ी हो या फिर ऑपरेशन बालाकोट… जब-जब इससे पहले भी मोदी सरकार ने पाकिस्तान के विरुद्ध एक्शन लिया है, तब-तब कॉन्ग्रेसी इस तरह के सवाल लेकर खड़े हुए हैं। उन्हें न तो देश की सेना पर भरोसा है और न ही देश की सरकार पर। कॉन्ग्रेसियों को तो अपने भी नेताओं से समस्या होती है अगर वो विदेश जाकर भारत के इन ऑपरेशन का बखान कर दें। शशि थरूर के साथ पार्टी द्वारा किया गया व्यवहार इसका ताजा उदाहरण है।
भारत पर शक करने की आदत विपक्ष में पुरानी
याद दिला दें कि ऑपरेशन सिंदूर की सफलता के बाद सरकार ने सर्वदलीय डेलीगेशन को अलग-अलग देश भेजा था ताकि वो लोग भारतीय सेना की कार्रवाई के बारे में विश्व को बता सकें। इनमें एक डेलीगेशन का प्रतिनिधित्व शशि थरूर भी कर रहे थे। उन्होंने अपनी जिम्मेदारी को अच्छे से निभाया, और भारतीय सेना के शौर्य के बारे में दुनिया को बताया, लेकिन ये प्रतिबद्धता देख उनकी पार्टी के नेता उनपर भड़क गए। उन्हें ये तक सुनना पड़ा कि वो भाजपा मे शामिल होने वाले हैं। बाद में उन्होंने इन सवालों का जवाब ये कहकर दिया कि अगर कोई देश की सेवा कर रहा है तो उसे इन बातों से फर्क नहीं पड़ना चाहिए।
वहीं 2019 की बात याद दिलाएँ तो जब पुलवामा में इस्लामी आतंकियों ने भारतीय सेना के काफिले को निशाना बनाकर फिदायीन हमला करवाया था, तब जब मोदी सरकार ने सेना को खुली छूट देकर एक्शन लेने को कहा था, उस समय ऑपरेशन बालाकोट हुआ था। वायु सेना ने चुन-चुनकर पाकिस्तानी आतंकियों को निशाने पर लिया था। पूरा देश इस पर गर्व कर रहा था मगर विपक्ष ने उसमें भी ये कहा था कि मोदी सरकार सेना की कार्रवाई पर राजनीतिक लाभ ले रही है।
पीएम मोदी कर रहे वही, जो कहा था
दिलचस्प बात ये है कि जो कॉन्ग्रेस सेना के एक्शन पर मोदी सरकार की तारीफ होने से ऐतराज जताती है उनके कार्यकाल में भी कई घटनाएँ ऐसी हुई थी जब सेना सीमा पार बैठे आतंकियों औकात दिखा सकते थे। हालाँकि, ऐसा नहीं हुआ इसके पीछे क्या वजह रही, ये कॉन्ग्रेस ही जानती होगी। मगर, नरेंद्र मोदी का ये पक्ष हमेशा से था कि पाकिस्तान को उसकी भाषा में ही जवाब देना जरूरी है।
उनकी इसपर एक वीडियो अक्सर वायरल रहती है जिसमें वो आप की अदालत में कह रहे थे- पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देना चाहिए ये लव लेटर लिखने बंद करना चाहिए। इंटरनेशनल प्रेशर पैदा करने की ताकत भारत पे है। पूरी दुनिया पर प्रेशर हम पैदा कर सकते हैं। पाकिस्तान हमें मारकर चला गया, हम पर हमला बोल दिया और हमारे मंत्री अमेरिका जाकर रोने लगे। पड़ोसी मारकर चला गया तो आप अमेरिका क्यों गए, आपको अमेरिका जाना चाहिए था।
आज पीएम मोदी पर जब अपनी उस बात को पूरा करने का मौका है तो वो हर बार इसे चरितार्थ करते हैं। देश के डिफेंस सेक्टर को मजबूत करने के अलावा वो समय-समय पर देश की सेना में आत्मविश्वास भरने में कोई कसर नहीं छोड़ते। उनपर विश्वास दिखाने पर पीछे नहीं हटते। नतीजा ये आता है कि पाकिस्तान को उसी की जवाब में भाषा दिया जाता है और अगर नेता अमेरिका जाते हैं तो ये साफ करने कि हम आतंरिक मामलों में और आतंकवाद के मुद्दे पर उसकी मध्यस्थता नहीं स्वीकारेंगे चाहे जो हो जाए।