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गोतस्करों ने किया गोरक्षक पर हमला… 12 दिन बाद हुई मौत: ओडिशा के भद्रक में आक्रोशित हुए हिन्दू, इन्टरनेट बंद; भाजपा सरकार ने किया ₹10 लाख मुआवजे का ऐलान

ओडिशा के भद्रक में गोतस्करों के हमले में एक गोरक्षक की मौत हो गई है। गोतस्करों के एक समूह में गोरक्षक पर बीते दिनों हमला किया था। इसमें वह गंभीर रूप से घायल था। उसकी अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई है। इसके चलते हिन्दू आक्रोशित हैं। भद्रक में अब इन्टरनेट पर रोक लगा दी गई है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बुधवार (11 जून, 2025) को गोरक्षक संतोष पारीदा की एक अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई है। वह भद्रक के तिहदी के रहने वाले थे। गोरक्षक पारीदा बीते 30 मई, 2025 से अस्पताल में भर्ती थे और उनका इलाज चल रहा था।

पारीदा पर 30 मई, 2025 को गोतस्करों के गैंग ने हमला कर दिया था। रिपोर्ट्स में बताया गया है कि गोतस्कर मुस्लिम थे। गोतस्करों के हमले में पारीदा गंभीर रूप से घायल हो गए थे। आशंका जताई जा रही है कि यह हमला तब हुआ जब गोरक्षक ने गोतस्करों को रोका।

भद्रक में इस मौत के बाद स्थिति तनावपूर्ण हो गई है । मामले में भद्रक पुलिस ने FIR दर्ज कर ली है। भद्रक पुलिस ने इस मामले में 12 लोगों को गिरफ्तार भी कर लिया है। बिगड़ी स्थिति को देखते हुए भद्रक में इन्टरनेट को 12 जून, 2025 से बंद कर दिया गया है।

भद्रक में अतिरिक्त पुलिस बल भी तैनात किया गया है। मामले का संज्ञान राज्य की मोहन चरण माँझी सरकार ने भी ले लिया है। माँझी सरकार ने पीड़ित परिवार को ₹10 लाख मुआवजा दिए जाने का ऐलान किया है। सरकार ने मामले में कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया है।

एक रिपोर्ट बताती है कि ओडिशा में 2019-24 के बीच 2000+ गोतस्करी के मामले दर्ज हो चुके हैं। ओडिशा पुलिस के एक वरिष्ठ अफसर ने नाम ना लिखने की शर्त पर ऑपइंडिया को बताया कि भद्रक की सीमा पश्चिम बंगाल से विशेष दूर नहीं है, ऐसे में यहाँ से गायों की तस्करी बंगाल के रास्ते बांग्लादेश में होती है।

कश्मीर में चिनाब ब्रिज से लेकर केरल में विझिनजाम पोर्ट तक: मोदी सरकार लाई एक से बढ़कर एक परियोजनाएँ, बदल रही है देश की दिशा और दशा

ऐसे दौर में जब बुनियादी ढाँचा किसी देश की वैश्विक स्थिति को परिभाषित करता है, भारत के इंजीनियरिंग चमत्कार अब सिर्फ़ सुर्खियाँ नहीं बटोर रही हैं, बल्कि जीवन बदलने वाली वास्तविकताएँ बन गई हैं। जम्मू-कश्मीर में हाल ही में दुनिया के सबसे ऊँचे रेलवे पुल, चेनाब रेल ब्रिज से लेकर तमिलनाडु में वर्टिकल-लिफ्ट पम्बन रेलवे सी ब्रिज तक, ये महत्वाकांक्षी परियोजनाएँ न केवल परिदृश्य बदल रही हैं, बल्कि लोगों के जीवन को भी जोड़ रही हैं। चाहे वह आवागमन को आसान बनाना हो, पर्यटन को बढ़ावा देना हो या रणनीतिक उपस्थिति दर्ज कराना हो, भारत का मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर राष्ट्रीय विकास का एक नया अध्याय लिख रहा है।

चिनाब रेल ब्रिज जीवन बदलने वाला है

चेनाब रेल ब्रिज जम्मू और कश्मीर में चिनाब नदी से 359 मीटर ऊपर है। यह दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे ब्रिज है। यह एफिल टॉवर से भी ऊँचा है। यह कश्मीर घाटी और देश के बाकी हिस्सों के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी है। चिनाब रेल ब्रिज सिर्फ़ एक इंजीनियरिंग उपलब्धि से कहीं ज़्यादा है क्योंकि यह उस क्षेत्र में बदलाव का वादा करता है जो लंबे समय से भूभाग, मौसम और संघर्ष के कारण अलग-थलग पड़ा हुआ है।

स्रोत- बीबीसी

देश में ऐसा कोई पुल नहीं था जो चिनाब ब्रिज बनाने वाली टीम के लिए मिसाल बन सके। पुल के स्टील आर्च को हर चरण में नवाचार की आवश्यकता थी। पुल के पीछे के इंजीनियरों ने अस्थिर हिमालयी भूविज्ञान से निपटने के लिए एक डिजाइन-एज़-यू-गो दृष्टिकोण अपनाया। पुल को 63 मिमी मोटी स्टील का उपयोग करके बनाया गया है जो विस्फोट प्रतिरोधी है और कंक्रीट के खंभे हैं। यह पुल भूकंप, तेज़ हवाओं और तोड़फोड़ को झेलने में सक्षम है।

दो दशकों से अधिक समय से क्षेत्र बेहतर परिवहन बुनियादी ढांचे की प्रतीक्षा कर रहा था। यह पुल 35,000 करोड़ रुपए की USBRL परियोजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ये दूरदराज के गाँवों तक बेहतर पहुँच प्रदान करेगा, जहाँ सिर्फ पैदल या नाव के माध्यम से पहुँचा जा सकता था। 2,015 किलोमीटर की सड़क से लगभग 70 गाँव लाभान्वित होंगे और आर्थिक गतिविधि, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा के लिए रास्ते खोलेंगे।

इसके अलावा, यह कश्मीर और लद्दाख में भारतीय रक्षा बलों के लिए एक रणनीतिक मार्ग भी प्रदान करता है। चूंकि यह सभी मौसम में रेल के आवागमन की सुविधा देगा, इसलिए सैनिकों को अब बर्फबारी या राजमार्ग बंद होने से परेशानी नहीं होगी।

स्थानीय लोगों के लिए, यह सेब और अखरोट जैसे खराब होने वाले सामानों के परिवहन के लिए एक अच्छा मार्ग है। नए रेल लिंक से पर्यटन में तेजी आएगी।

ढोला-सादिया ब्रिज: असम को अरुणाचल से जोड़ने वाला पूर्वोत्तर का अहम ब्रिज

ढोला-सादिया पुल का उद्घाटन मई 2017 में प्रधानमंत्री मोदी ने किया था। यह 9.15 किलोमीटर लंबा है और असम में ब्रह्मपुत्र नदी पर बना है। यह नदी पर बना भारत का सबसे लंबा पुल है। ये असम के ऊपरी हिस्सों और अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी जिलों के बीच चौबीसों घंटे हर मौसम में संपर्क बनाए रखता है। इसने असम के रूपई और अरुणाचल प्रदेश के मेका के बीच यात्रा की दूरी को 165 किलोमीटर कम कर दिया है। पुल की वजह से अब इन दोनों क्षेत्रों के बीच की दूरी पहले के छह घंटे के बजाय सिर्फ़ एक घंटे में तय की जा सकती है।

स्रोत-इंडिया टुडे

पुल से पहले, परिवहन प्रणाली नौकाओं पर निर्भर थी जो अक्सर बाढ़ से प्रभावित होती थीं। इसने क्षेत्र के भीतर नागरिक और सैन्य दोनों तरह की यात्रा के तरीके को बदल दिया है। यह माल और सेवाओं की आपूर्ति सुनिश्चित करने के साथ-साथ सीमावर्ती क्षेत्रों की ओर रक्षा बलों की तेजी से आवाजाही के लिए भी महत्वपूर्ण है। इस कनेक्टिविटी ने क्षेत्र में आर्थिक विकास में योगदान दिया है, साथ ही पूर्वोत्तर और भारत की मुख्य भूमि के बीच की खाई को पाटा है।

विझिनजाम अंतर्राष्ट्रीय बंदरगाह: भारत के समुद्री भविष्य के लिए एक नया प्रवेश द्वार

विझिनजाम अंतर्राष्ट्रीय गहरे पानी का बहुउद्देशीय बंदरगाह केरल में बनाया गया है। इस पर सरकार को 8,800 करोड़ रुपये खर्च करने पड़े। यह भारत के समुद्री बुनियादी ढांचे के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। इसे मई 2025 में पीएम मोदी ने राष्ट्र को समर्पित किया। विझिनजाम अंतर्राष्ट्रीय बंदरगाह भारत का एकमात्र गहरा जल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह है, जिसे कंटेनर और बहुउद्देशीय कार्गो के लिए डिजाइन किया गया है।

स्रोत-कार्गो इनसाइट

यह बंदरगाह भारत के आत्मनिर्भर भारत विजन को मजबूत करता है। इससे विदेशों में खर्च होने वाले पैसे की बचत होगी।

बंदरगाह की गहराई 20 मीटर है, जो दुनिया के सबसे बड़े मालवाहक जहाजों को आसानी से फिट कर सकती है। यह एक आधुनिक समय का ट्रांसशिपमेंट हब है जो बिना किसी जटिलता के बड़े पैमाने पर कार्गो वॉल्यूम को संभाल सकता है। आने वाले वर्षों में बंदरगाह अपनी क्षमता बढ़ाएगा, जिससे केरल एक प्रमुख व्यावसायिक केन्द्र बन जाएगा।

यह कोलंबो, सिंगापुर और दुबई जैसे वैश्विक ट्रांसशिपमेंट केंद्रों के साथ प्रतिस्पर्द्धा करने की स्थिति में है, जिससे विदेश जानेवाली कंटेनर आवाजाही की लागत कम हो जाएगी।

यह आर्थिक अवसर और रोजगार सृजन लाता है। कोच्चि के निकट एक जहाज निर्माण और मरम्मत क्लस्टर का निर्माण कार्य चल रहा है। इससे हजारों रोजगार के अवसर खुलेंगे, खास तौर पर युवाओं और स्थानीय प्रतिभाओं के लिए। समुद्री गतिविधियों में वृद्धि से पर्यटन, एमएसएमई और मत्स्य पालन जैसे संबद्ध क्षेत्रों का विकास होगा।

पम्बन ब्रिज: भारत का पहला वर्टिकल लिफ्ट सी ब्रिज

तमिलनाडु में नए पम्बन ब्रिज का उद्घाटन अप्रैल 2025 में किया गया था। यह भारत का पहला वर्टिकल लिफ्ट रेलवे सी ब्रिज है। यह पाक जलडमरूमध्य में लगभग 2.07 किमी तक फैला है और रामेश्वरम द्वीप को मुख्य भूमि भारत से जोड़ता है। इसने 1914 के कैंटिलीवर ब्रिज की जगह ली है जो लंबे समय से तीर्थयात्रियों और व्यापारियों की सेवा कर रहा था।

पुल का निर्माण रेल विकास निगम लिमिटेड ने किया है। इसके 72.5 मीटर के नौवहन क्षेत्र को 17 मीटर तक उठाया जा सकता है, जिससे बड़े समुद्री जहाज रेल यातायात को बाधित किए बिना इसके नीचे से गुजर सकते हैं। इसे जंग-रोधी स्टेनलेस स्टील, विशेष पॉलीसिलोक्सेन कोटिंग और हाई-ग्रेड सुरक्षात्मक पेंट का उपयोग करके बनाया गया है। इसका जीवनकाल 100 वर्ष है।

स्रोत-दृष्टि आईएएस

नया पुल पुराने पुल से 3 मीटर ऊँचा है। इसमें डबल-ट्रैक उपयोग के लिए तैयार एक सबस्ट्रक्चर है। उन्नत निर्माण कठोर समुद्री मौसम, भूकंपीय गतिविधि और चक्रवातों का सामना कर सकता है।

तमिलनाडु के लोगों और रामेश्वरम के तीर्थयात्रियों के लिए, यह तेज़, सुरक्षित और निर्बाध यात्रा की गारंटी देता है। यह क्षेत्र में समुद्री नौवहन को भी मजबूत करता है, जिससे नौका-आधारित परिवहन पर निर्भरता कम होती है।

अटल सुरंग: हिमालय की कनेक्टिविटी को बदलने वाली भारत की सबसे लंबी राजमार्ग सुरंग

अटल सुरंग का उद्घाटन अक्टूबर 2020 में किया गया था। यह आधुनिक इंजीनियरिंग का एक चमत्कार है। यह हिमालय की पीर पंजाल रेंज के नीचे 9.02 किमी तक फैली है। अटल सुरंग 10,000 फीट से ऊपर दुनिया की सबसे लंबी राजमार्ग सुरंग है। पूर्व प्रधान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर इसका नामकरण किया गया है। यह मनाली और सुदूर लाहौल-स्पीति घाटी के बीच सालभर संपर्क सुनिश्चित करता है। पहले भारी बर्फबारी के कारण साल में 6 महीने मुख्य भूमि से कट जाता था।

स्रोत-अमर उजाला

सुरंग का निर्माण सीमा सड़क संगठन द्वारा किया गया था। इसने मनाली और लेह के बीच की दूरी 46 किलोमीटर कम कर दी और यात्रा का समय 4 से 5 घंटे कम कर दिया। दक्षिण पोर्टल मनाली से 25 किलोमीटर दूर 3,060 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है, जबकि उत्तर पोर्टल 3,071 मीटर की ऊँचाई पर सिस्सू गाँव के पास से निकलता है।

यह घोड़े की नाल के आकार की, सिंगल-ट्यूब, डबल-लेन संरचना है जिसमें 8 मीटर की सड़क और 5.525 मीटर की ओवरहेड क्लीयरेंस है। इसमें एक अंतर्निहित आपातकालीन भागने वाली सुरंग भी है। यह 80 किमी/घंटा तक की गति से प्रतिदिन 3,000 कारों और 1,500 ट्रकों का समर्थन कर सकती है।

जेड-मोड़ सुरंग, सोनमर्ग और करगिल दोनों तक पहुँचना हुआ आसान

जेड-मोड़ सुरंग दो दिशाओं में है, जो 6.5 किमी लंबी है। इसमें सड़क की लंबाई 5.6 किमी शामिल है। यह सुरंग गंदेरबल के गगनगीर और सोनमर्ग के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी है। सुरंग 8,500 फीट से अधिक की ऊँचाई पर बनाई गई है। यह सड़क के Z-आकार वाले हिस्से के लिए एक विकल्प प्रदान करती है जहाँ हिमस्खलन की वजह से सर्दियों में सोनमर्ग तक पहुँचना असंभव होता था। अब सोनमर्ग पर्यटक स्थल तक पूरे साल पहुँचना लोगों के लिए आसान हो गया है। सुरंग रक्षा के नजरिए से भी महत्वपूर्ण है। Z-मोड़ सुरंग कश्मीर घाटी और लद्दाख दोनों के लिए रणनीतिक और आर्थिक रूप से भारत के लिए महत्वपूर्ण है।

स्रोत-ईटी

सुरंग श्रीनगर-लेह राजमार्ग का हिस्सा है। लद्दाख तक पहुँच को सुगम बनाने के मामले में यह कनेक्टिविटी काफी अहम है। इससे कश्मीर घाटी में आर्थिक विकास और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा। यह दो-लेन वाली सड़क सुरंग है। उसमें इमरजेंसी सिचुएशन में बचने के लिए समानांतर 7.5 मीटर चौड़ा रास्ता है।

अटल सेतु: भारत का सबसे लंबा समुद्री पुल

मुंबई में ‘अटल बिहारी वाजपेयी सेवारी-न्हावा शेवा अटल सेतु’ आधिकारिक तौर पर जनवरी 2024 में खोला गया था। यह देश का सबसे लंबा पुल और सबसे लंबा समुद्री पुल है और कुल 21.8 किलोमीटर को जोड़ता है। इसमें 16.5 किलोमीटर खुले समुद्र पर हैं, क्योंकि छह लेन वाला मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक (एमटीएचएल) मुंबई में सेवरी से नवी मुंबई में न्हावा शेवा के बीच 3.4 किलोमीटर की दूरी को जोड़ता है।

स्रोत- पीएम मोदी/ एक्स

यह पुल दक्षिण मुंबई से भारत की मुख्य भूमि तक परिवहन के लिए एक सीधा और विश्वसनीय संपर्क है, जो मुंबई और नवी मुंबई के बीच यात्रा के समय को कम करता है। यह मुंबई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे और नवी मुंबई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे तक जाने का आसान मार्ग है। साथ ही, पुणे, गोवा और दक्षिण भारत के प्रवेश द्वार तक यात्रा के समय को भी कम करता है।

इस पुल का आर्थिक महत्व भी काफी है, क्योंकि यह मुंबई बंदरगाह और जवाहरलाल नेहरू बंदरगाह के बीच माल की ढुलाई के लिए आसान मार्ग है।

इस पुल के बेस में आईसोलेशन बियरिंग का इस्तेमाल किया गया है, जो भूकंप के 6.5 तीव्रता को भी झेल सकता है। इस पुल में नॉइस बैरियर का इस्तेमाल किया है, जो किनारों पर लगाए हैं। इसमें साइलेंसर है जो ध्वनि की तीव्रता को कम करता है। इससे समुद्री जीवों को शोर-शराबे का सामना नहीं करना पड़ेगा।

अपने आकार, भौगोलिक महत्व और इंजीनियरिंग की श्रेष्ठता के साथ अटल सेतु एक पुल से कहीं ज़्यादा है। यह आधुनिक भारत की महत्वाकांक्षा का प्रतीक है जो अपने विकास को समायोजित करने वाले बुनियादी ढाँचे का निर्माण करता है।

भारत की मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएँ दरअसल राष्ट्रीय परिवर्तन के साधन हैं। दूरदराज के गाँवों को जोड़ने से लेकर यात्रा के समय को कम करने और व्यापार को बढ़ावा देने तक, प्रत्येक पुल, सुरंग और बंदरगाह समावेशी विकास के लिए देश की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। ये पहल न केवल रणनीतिक तत्परता और आर्थिक एकीकरण को बढ़ाती हैं, बल्कि नागरिकों के जीवन में रोजमर्रा की ज़िंदगी को भी आसान बनाती हैं।

शेख हसीना के बयान रोक लो… कहकर मुहम्मद यूनुस गिड़गिड़ाया था PM मोदी के पास: लंदन में खुद ही किया फजीहत होने का खुलासा, ब्रिटेन PM ने भी मिलने से किया इनकार

बांग्लादेश के अंतरिम मुख्य सलाहकार मुहम्मद यूनुस को अपनी हालिया यात्राओं में निराशा हाथ लगी है। जहाँ एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना के ऑनलाइन भाषणों पर रोक लगाने के उनके आग्रह को यह कहकर टाल दिया कि यह सोशल मीडिया है, आप इसे नियंत्रित नहीं कर सकते।

वहीं दूसरी ओर, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने भी यूनुस से मुलाकात से इनकार कर दिया। यूनुस ब्रिटेन की यात्रा पर हसीना सरकार द्वारा कथित रूप से विदेशों में धोखे से भेजी गई करोड़ो की राशि को वापस लाने के लिए समर्थन जुटाने गए थे। इन कूटनीतिक झटकों से बांग्लादेश के आर्थिक नुकसान की आशंका बढ़ गई है, क्योंकि उसे विदेशों में जमा कथित ‘चोरी की धनराशि’ को वापस लाने में चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

भारत में बेअसर यूनुस की दलील

लंदन में बोलते हुए, यूनुस ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हसीना के ऑनलाइन भाषणों पर लगाम लगाने की गुहार लगाई, जो बांग्लादेश में ‘गुस्सा भड़का’ रहे हैं। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने साफ कर दिया कि ‘यह सोशल मीडिया है, आप इसे नियंत्रित नहीं कर सकते।’ यह स्पष्ट इनकार यूनुस की इस अड़ियल माँग पर एक तमाचा था कि भारत को अपने घरेलू कानूनों से परे जाकर काम करना चाहिए।

यूनुस की यह दलील कि भारत बांग्लादेश की अपेक्षा के अनुरूप काम नहीं कर रहा, उनकी निराशा और कूटनीतिक अक्षमता का ही प्रमाण है। यूनुस की सरकार, जो खुद हसीना पर ‘फर्जी खबर’ फैलाने का आरोप लगाती है, लेकिन अब यूनुस खुद भारतीय मीडिया पर आरोप लगाकर अपनी खामियों को छिपाने की कोशिश कर रहे है।

ब्रिटेन में भी नहीं मिली ‘लिफ्ट’: स्टारमर का ठुकराना

यूनुस की लंदन यात्रा, जिसका मकसद हसीना सरकार द्वारा कथित रूप से विदेशों में धोखे से भेजी गई करोड़ो की राशि को वापस लाना था, वह भी पूरी तरह से ध्वस्त हो गई। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने यूनुस से मिलने से स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया।

यूनुस ने दावा किया कि ब्रिटेन को ‘नैतिक रूप से’ मदद करनी चाहिए, लेकिन ब्रिटिश अधिकारियों ने उन्हें कोई भाव नहीं दिया, जिससे उनकी वैश्विक विश्वसनीयता पर बड़ा सवालिया निशान लग गया। यह स्पष्ट है कि यूनुस, अपनी नोबेल पुरस्कार विजेता की प्रतिष्ठा के बावजूद, अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी बात मनवाने में अक्षम साबित हुए हैं।

आर्थिक वसूली का बेतुका दावा

यूनुस द्वारा कथित ‘चोरी की धनराशि’ की वसूली का दावा केवल एक राजनीतिक हथकंडा लगता है। यूनुस 20 लाख करोड़ ($234 बिलियन) के कथित गबन का आरोप लगाते हैं और ब्रिटेन, कनाडा, सिंगापुर जैसे देशों को ‘चोरी किए गए’ राशि के गंतव्य के रूप में नामित करते हैं। लेकिन बिना ठोस अंतरराष्ट्रीय सहयोग और प्रभावी कूटनीति के ये दावे सिर्फ हवाई किले बनाने जैसा है।

यूनुस की यह कवायद बांग्लादेश को आर्थिक रूप से और अधिक नुकसान पहुँचा सकती है, क्योंकि उनकी अक्षमता ने धन-वापसी के प्रयासों को एक मजाक बना दिया है। उनकी यात्राओं से स्पष्ट है कि वे सिर्फ राजनीतिक लाभ हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं, न कि बांग्लादेश के वास्तविक हितों की रक्षा की।

3 दिन में 500+ हवाई हमलों से दहला यूक्रेन, रूस ने ताबड़तोड़ ड्रोन छोड़े: खारकीव में 9 मिनट तक होती रही लगातार बमबारी, 1 जून वाले हमले का बदला

रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे संघर्ष में बुधवार (11 जून 2025) को रूस ने यूक्रेन के दूसरे सबसे बड़े शहर खारकीव पर 9 मिनट का लक्षित ड्रोन हमला किया, जिसके बाद यह दावा किया गया कि यह यूक्रेन द्वारा रूसी क्षेत्र में हालिया हमलों का ‘करारा जवाब’ था। इस सटीक सैन्य कार्रवाई में 6 लोगों की जान गई और 64 लोग घायल हुए, जिनमें 9 बच्चे भी शामिल थे।

वहीं, गुरुवार (12 जून 2025) को भी खारकीव में ड्रोन हमले हुए और दक्षिणी यूक्रेन के मायकोलाइव और खेरसॉन में बिजली गुल हो गई। युद्धग्रस्त इलाकों में 1,212 सैनिकों के शवों और कैदियों की अदला-बदली हुई है, लेकिन रूस अपनी शर्तों पर अड़ा है, जिससे शांति की उम्मीद अभी भी दूर है।

युद्ध की शुरुआत: 2022 का ‘महायुद्ध’

रूस और यूक्रेन के बीच यह भीषण युद्ध फरवरी 2022 में शुरू हुआ, जब रूस ने यूक्रेन पर पूरी तरह से हमला कर दिया। हालाँकि, दोनों देशों के बीच तनाव की जड़ें 2014 से ही गहरी हो चुकी थीं, जब रूस ने क्रीमिया को अपने में मिला लिया और पूर्वी यूक्रेन के डोनबास इलाके में अलगाववादियों का समर्थन करना शुरू कर दिया था।

रूस इस युद्ध को अपनी सुरक्षा का मसला बताता है, खासकर नाटो (NATO) के लगातार बढ़ते दायरे और यूक्रेन के पश्चिमी देशों की तरफ झुकाव को लेकर उसकी चिंताएँ रही हैं।

बता दें, कि यूक्रेन ने 1 जून 2025 को रूस पर बड़ा ड्रोन हमला किया था, जिसे ‘ऑपरेशन स्पाइडरवेब‘ का नाम दिया गया था। इस हमले में यूक्रेन ने रूस के परमाणु-सक्षम लंबी दूरी के बॉम्बर को निशाना बनाने का दावा किया था, जिससे रूसी सैन्य शक्ति को भारी नुकसान पहुँचाने की बात कही गई थी।

यूक्रेन को आर्थिक मदद

इस युद्ध में मुख्य रूप से रूस और यूक्रेन आमने-सामने हैं। यूक्रेन को अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोपीय संघ और कई अन्य पश्चिमी देशों से भारी मात्रा में सैन्य और आर्थिक मदद मिल रही है। रूस पर कई देशों ने कड़े प्रतिबंध लगाए हैं, जबकि बेलारूस जैसे कुछ देश रूस का साथ दे रहे हैं।

युद्ध में दोनों पक्ष ड्रोन, मिसाइल, तोपखाने और हवाई हमलों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे हैं। यूक्रेन में खारकीव, लुगांस्क, डोनेट्स्क, ज़ापोरिज़्ज़िया और खेरसॉन जैसे इलाके इस युद्ध के मुख्य मैदान बने हुए हैं, जहाँ लगातार गोलीबारी और हमले हो रहे हैं।

शांति वार्ता: एक उम्मीद, एक हताशा

हाल ही में, एक सकारात्मक खबर यह भी आई थी, कि रूस ने 1,212 यूक्रेनी सैनिकों के शव लौटाए हैं, जो युद्ध में मारे गए थे। यह वापसी पिछले सप्ताह इस्तांबुल में हुई शांति वार्ताओं के दौरान हुए समझौते का हिस्सा थी, जहाँ कैदियों की अदला-बदली पर भी सहमति बनी थी।

यूक्रेनी सरकार ने बताया कि लौटाए गए अवशेषों में खारकीव, लुगांस्क, डोनेट्स्क, ज़ापोरिज़्ज़िया और खेरसॉन जैसे इलाकों में मारे गए सैनिकों के साथ-साथ रूस के कुर्स्क क्षेत्र में यूक्रेन के जवाबी हमले में शहीद हुए सैनिक भी शामिल हैं।

हालाँकि, इस्तांबुल में हुई दो दौर की बातचीत के बावजूद युद्ध खत्म होने की कोई राह नहीं निकली। कैदियों की अदला-बदली और सैनिकों के शवों की वापसी ही इन वार्ताओं के एकमात्र ठोस नतीजे रहे हैं।

शांति की राह में दीवारें

शांति अभी भी दूर की कौड़ी है क्योंकि रूस बिना शर्त युद्धविराम की माँग को लगातार ठुकरा रहा है। रूस की माँग है कि यूक्रेन अपने महत्वपूर्ण इलाकों को छोड़ दे और नाटो में शामिल होने का सपना त्याग दे। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर नागरिकों को निशाना बनाने का आरोप लगा रहे हैं, लेकिन इस संघर्ष में हजारों नागरिक, जिनमें ज्यादातर यूक्रेनी हैं, अपनी जान गँवा चुके हैं।

आम लोगों को सामाजिक सुरक्षा देने में दूसरे नंबर पर पहुँचा भारत… 1 दशक में लगाई 45% फीसदी की छलांग: 2015 में था सिर्फ 19 फीसदी, 2025 में आँकड़ा 64.3% हुआ

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की विश्व सामाजिक सुरक्षा रिपोर्ट में भारत के लिए एक खुशखबरी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत अपने नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा देने में दुनिया में दूसरे स्थान पर है। आँकड़े कहते हैं कि भारत में 94 करोड़ से भी अधिक लोगों को सामाजिक सुरक्षा दे रहा है। 2015 में ये 19% था जो अब 2025 में 64.3% हो गया है यानी 10 वर्षों में ये आँकड़ा 45% तक बढ़ा है।

केंद्रीय मंत्री मनसुख मंडाविया ने इस रिपोर्ट पर कहा कि भारत की सामाजिक सुरक्षा कवरेज में हुई यह वृद्धि दुनिया में सबसे तेज विस्तार है। लाखों ऐसे लोग हैं जो विभिन्न खाद्य और स्वास्थ्य सुरक्षा योजनाओं का लाभ ले रहे हैं। ये सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाता है। हमारा लक्ष्य समाज के आखिरी व्यक्ति तक सशक्तिकरण लाना है।

जिनेवा में अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन के 113वें सत्र में ILO के महानिदेशक गिल्बर्ट एफ होंगबो के साथ केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्री मनसुख मंडाविया ने बातचीत की। इस दौरान उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने पिछले 11 वर्षों में गरीबों और मजदूरों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ लाईं हैं।

ILO श्रम अधिकारों और सामाजिक न्याय के लिए समर्पित संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी है। ये समय-समय पर अपने 187 सदस्य देशों के बीच सामाजिक सुरक्षा कवरेज का मूल्यांकन करती है। इसके तहत 9 श्रेणियों में आँकड़े लागू किए जाते हैं।

इनमें बेरोजगारी भत्ता, परिवार और बाल लाभ, स्वास्थ्य सुरक्षा, वृद्धावस्था पेंशन, रोजगार संबंधी चोट का लाभ, मातृत्व लाभ, दिव्यांगता लाभ, आय बदलने के जरिए बिमारी का लाभ और सर्वाइवर बेनेफिट शामिल होते हैं।

ILO की मान्यता प्राप्त करने के लिए किसी भी देश की सामाजिक सुरक्षा योजना को कानूनी तौर पर समर्थित, सक्रिय रूप से लागू और पिछले तीन वर्षों के सत्यापित आँकड़ों के साथ प्रस्तुत किया जाना जरूरी होता है।

भारत की सामाजिक सुरक्षा प्रणाली में विभिन्न कल्याणकारी कार्यक्रमों के माध्यम से काफी विस्तार हुआ है। इसका लक्ष्य लाखों लोगों को वित्तीय सुरक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और खाद्य सहायता पहुँचाना है।

इन कार्यक्रमों ने देश भर में आजीविका में सुधार और गरीबी को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इनमें आयुष्मान भारत, ई-श्रम पोर्टल, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना, अटल पेंशन योजना समेत अन्य योजनाएं शामिल हैं।

अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का 48.8% का आँकलन भारत के सामाजिक सुरक्षा परिदृश्य के लिहाज से अभी अधूरा है। रिपोर्ट के अनुसार, ये डेटा अभी पूलिंग अभ्यास का पहला चरण है। इसमें 8 राज्यों के केंद्रीय और महिला-केंद्रित योजनाओं के लाभार्थियों के आँकड़ें शामिल किए गए हैं। दूसरे चरण के पूरा होने के बाद भारत की कुल सामाजिक सुरक्षा कवरेज 100 करोड़ से अधिक तक पहुँच सकती है।

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने सामाजिक सुरक्षा कवरेज का व्यापक मूल्यांकन करने के लिए 19 मार्च 2025 को भारत के सामाजिक सुरक्षा डेटा पूलिंग अभ्यास के पहले चरण की शुरुआत की है। इस पहल का उद्देश्य भारत की कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों के डेटा को इकट्ठा करना है।

पहले चरण में उत्तर प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और गुजरात सहित दस राज्यों को केंद्रीय स्तर पर डेटा एकत्र करने के लिए चुना गया है।

सामाजिक सुरक्षा कवरेज के आँकड़ों को 2025 में अपडेट करने वाला भारत दुनिया का पहला देश भी है। केंद्रीय मंत्री का कहना है कि इससे डिजिटाइजेशन और लोगों के लिए कल्याणकारी योजनाओं की प्रणाली में पारदर्शिता मजबूत हुई है।

साउथ दिल्ली से धरे गए 134 बांग्लादेशी, 38 औरतें-43 बच्चे साथ में: अवैध रूप से रहने वाले सब होंगे डिपोर्ट, ‘ऑपरेशन पुश बैक’ तेज

दिल्ली पुलिस की दक्षिणी जिला टीमों ने शहर में 14 अलग-अलग अभियान चलाकर 134 बांग्लादेशी नागरिकों को डिपोर्टेशन के लिए भेजा है। इनमें 38 महिलाएँ और 43 बच्चे भी शामिल हैं। दक्षिणी जिले की कई टीमें झुग्गी-झोपड़ियों और संदिग्ध इलाकों का दौरा कर रही हैं, जहाँ वे संदिग्ध बांग्लादेशी अप्रवासियों की पहचान के लिए वोटर ID और आधार कार्ड की जाँच कर रही हैं।

क्या है ‘ऑपरेशन पुश बैक’?

दिल्ली पुलिस ने दक्षिणी दिल्ली में एक बड़ी कार्रवाई करते हुए पिछले लगभग पाँच महीनों में 134 बांग्लादेशी नागरिकों को हिरासत में लिया है। दक्षिणी जिला पुलिस उपायुक्त (DCP) अंकित चौहान ने बुधवार (11 जून 2025) को इसकी जानकारी दी।

DCP के मुताबिक, यह ऑपरेशन 27 दिसंबर 2024 से 10 जून 2025 के बीच चलाया गया। इस दौरान विभिन्न इलाकों में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान की गई और उन्हें डिपोर्ट (देश निकाला) किया गया।

सत्यापन अभियान और रणनीति

पुलिस टीमों ने दक्षिणी जिले के संवेदनशील इलाकों में सघन सत्यापन अभियान चलाया इस दौरान आधार कार्ड, वोटर आईडी और अन्य दस्तावेजों की बारीकी से जाँच की गई।

DCP चौहान के अनुसार, यह कार्रवाई एक बड़ी रणनीति का हिस्सा थी, जिसका मुख्य मकसद दिल्ली में गैरकानूनी रूप से रह रहे विदेशी नागरिकों की पहचान करना और उन पर कार्रवाई करना था।

दर्ज किए गए मामले और गिरफ़्तारियाँ

इन अभियानों के दौरान कई मामलों में भारतीय दंड संहिता (BNS), विदेशी नागरिक अधिनियम, शस्त्र अधिनियम और आधार अधिनियम के तहत केस दर्ज किए गए हैं। गिरफ़्तारियाँ संगम विहार, फतेहपुर बेरी, लोधी कॉलोनी और मैदानगढ़ी जैसे इलाकों के थानों के अंतर्गत की गईं।

संगम विहार में पाँच बांग्लादेशी नागरिकों को गिरफ्तार किया गया है। फतेहपुर बेरी में दो बांग्लादेशी नागरिक पकड़े गए है। लोधी कॉलोनी में एक केस में दो बांग्लादेशी नागरिक पकड़े गए। मैदानगढ़ी में एक बांग्लादेशी नागरिक को अवैध हथियार के साथ गिरफ्तार किया गया।

आगे क्या?

पुलिस ने बताया कि अभी और भी ऐसे विदेशी नागरिकों की पहचान की जा रही है, जो अवैध रूप से दक्षिणी दिल्ली में रह रहे हैं। ऐसे नागरिकों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

मुस्लिमों ने किया शिव मंदिर की जमीन पर अतिक्रमण, हिन्दुओं ने किया विरोध तो भीड़ हुई हमलावर: पत्थर बरसाए-गाड़ियाँ जलाईं, पश्चिम बंगाल की घटना

पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना में भीड़ ने एक हिन्दू मंदिर पर हमला किया। उन्होंने हिन्दुओं और पुलिस पर जम कर पत्थर बरसाए। भीड़ ने शिव मंदिर में भी तोड़फोड़ की। पथराव में हिन्दुओं समेत कई पुलिसकर्मी घायल हो गए हैं।

यह घटना मंगलवार (10 जून, 2025) को हुई। घटना तब शुरू हुई जब हिंदू समुदाय के लोगों ने शिव मंदिर की जमीन पर हो रहे अतिक्रमण का विरोध किया। इसके बाद मुस्लिम भड़क गए। भीड़ ने इसके बाद शिव मंदिर में तोड़फोड़ कर दी।

मामला बिगड़ते ही हिंसा फैल गई और भीड़ ने पुलिस पर पत्थर और ईंटें फेंकनी शुरु कर दी। इसके अलावा, इलाके में कई दुकानें और वाहन भी तोड़ दिए गए। इस पथराव में पुलिसकर्मियों समेत कई लोग घायल हो गए है।

यह घटना दक्षिण 24 परगना के बज-बज इलाके में, रवींद्र नगर पुलिस स्टेशन के पास महेशतला में हुई। हाल ही में वहाँ के हिंदू लोगों ने देखा कि एक पुराने शिव मंदिर के परिसर में मौजूद तालाब को मिट्टी से भरकर धीरे-धीरे कब्जा किया जा रहा है।

लोगों ने इस अतिक्रमण की शिकायत अधिकारियों से की थी, लेकिन प्रशासन की ओर से कोई कार्रवाई नहीं हुई। मंगलवार को बज-बज इलाके में कुछ मुसलमानों ने शिव मंदिर की जमीन पर फलों की दुकानें लगाने की कोशिश की।

यह देखकर हिंदू समुदाय के लोगों ने उन्हें रोका। इसी बात पर दोनों पक्षों के बीच विवाद शुरू हुआ, जो जल्दी ही झड़प में बदल गया और हिंसा हो गई। इसके बाद मुस्लिम भीड़ ने मंदिर में तोड़फोड़ की और उस पर पत्थर व ईंटें फेंकी। जब पुलिस मौके पर पहुँची तो भीड़ ने उन पर भी हमला कर दिया।

इसके बाद हालात और बिगड़ गए। पूरा इलाका पत्थरों, ईंटों और टूटी हुई चीजों से भर गया, जैसे वहाँ कोई बड़ी तबाही हुई हो। भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी के अनुसार, भीड़ ने सिर्फ मंदिर ही नहीं, बल्कि पवित्र तुलसी मंच, आसपास की हिंदू दुकानों और घरों पर भी हमला किया। मंदिर पर पत्थर और ईंटें फेंकी गईं, जिससे वहाँ मौजूद कई चीजों को नुकसान पहुँचा।

भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि यह घटना रवींद्र नगर पुलिस स्टेशन से थोड़ी ही दूरी पर हुई, लेकिन पुलिस ने भीड़ को रोकने के लिए कुछ नहीं किया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि पूरी घटना पुलिस की मौजूदगी में हुई, लेकिन वों उन उपद्रवियों को रोक नहीं पाए।

सुवेंदु अधिकारी ने एक वीडियो भी पोस्ट किया, जिसमें भारी भीड़ को बवाल करते हुए देखा जा सकता है। वीडियो में टूटा हुआ मंदिर और उसके सामने सड़क के दूसरी तरफ पुलिस स्टेशन भी साफ दिखाई दे रहा  है। साथ ही वीडियो में एक स्थानीय हिंदू ने बताया कि भीड़ ने उन्हे मंदिर बंद करने को कहा, लेकिन उन्होंने कहा कि मंदिर खुला रहेगा।

भीड़ ने पुलिस पर पत्थर और ईंटें फेंकी और सड़क पर खड़ी कई गाड़ियों को नुकसान पहुँचाया। आसपास की दुकानों में भी तोड़फोड़ की गई। एक पुलिसकर्मी की बाइक को आग लगा दी गई और कई पुलिस वाहनों को भी नुकसान पहुँचाया गया।

एक पुलिसकर्मी ने बताया कि शुरुआत में भीड़ कम थी, इसलिए वे तुरंत कुछ नहीं कर पाए। पत्थरबाजी में कई पुलिसकर्मी घायल हो गए, जिनमें एक महिला कॉन्स्टेबल भी शामिल है। रिपोर्ट में बताया गया है कि पास की इमारतों की छतों से भी पुलिस पर पत्थर और ईंटें फेंकी गईं।

पुलिस ने हालात काबू में करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े और मौके पर अतिरिक्त पुलिस बल और आरएएफ भेजा गया। लेकिन भीड़ शांत नहीं हुई और लगातार पुलिस पर हमला करती रही। हालात बिगड़ते देख पुलिस को कुछ समय के लिए पीछे हटना पड़ा।

बाद में और पुलिस बल पहुँची, तब जाकर हालत पर काबू पाया जा सका। हालाँकि, अब भी कुछ जगहों पर पत्थरबाजी हो रही है। मौके पर पहुँची पुलिस की गाड़ियों को भी निशाना बनाया जा रहा है। कोलकाता से बड़ी संख्या में पुलिस बल भेजा जा रहा है ताकि हालात पूरी तरह से काबू पाया जा सकें।

कौशांबी में चुनावी रंजिश के चलते बुना गया ‘रेप’ का मामला, आरोपित के पिता ने दी जान तब बेगुनाह निकला सिद्धार्थ: जानें – कैसे एक थप्पड़ की वजह से बर्बाद हो गया पूरा परिवार

उत्तर प्रदेश के कौशांबी जिले के लोहंदा गाँव में एक फर्जी रेप केस ने एक परिवार को तबाह कर दिया। चुनावी रंजिश के चलते ग्राम प्रधान ने साजिश रची, जिसके कारण एक बेगुनाह युवक जेल गया और उसके पिता ने आत्महत्या कर ली। बाद में जाँच में रेप का आरोप झूठा निकला और युवक को जमानत पर रिहा कर दिया गया।

हालाँकि वो अपने पिता की अंतिम यात्रा तक में शामिल नहीं हो पाया। नाबालिग के कथित रेप से जुड़ा ये मामला पिछले कई दिनों से चर्चा में है, जो ग्राम प्रधान की साजिश, पुलिस की लापरवाही और ब्लैकमेलिंग की करतूतों से जुड़ा पाया गया।

मामला शुरू कैसे हुआ?

27 मई 2025 को सैनी कोतवाली में एक 8 साल की बच्ची के साथ रेप की शिकायत दर्ज की गई। शिकायत में धन्नू उर्फ सिद्धार्थ तिवारी को आरोपित बनाया गया। पुलिस ने 28 मई को भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (रेप) और पॉक्सो एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया। अगले ही दिन, 29 मई को सिद्धार्थ को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

सिद्धार्थ के पिता रामबाबू तिवारी शुरू से चिल्लाते रहे कि उनका बेटा निर्दोष है। उनका कहना था कि गाँव के ग्राम प्रधान भूप नारायण पाल ने पुरानी चुनावी रंजिश के चलते उनके बेटे को फर्जी केस में फँसाया है। रामबाबू ने पुलिस, स्थानीय अफसरों और कोर्ट तक में गुहार लगाई, लेकिन उनकी एक न सुनी गई।

पिता ने की आत्महत्या

न्याय न मिलने से टूट चुके रामबाबू ने 4 जून 2025 को सैनी कोतवाली के सामने जहर खाकर आत्महत्या कर ली। मरने से पहले उन्होंने अपने शरीर पर एक सुसाइड नोट लिखा, जिसमें ग्राम प्रधान भूप नारायण पाल और उनके भाई वीरेंद्र पाल को बेटे को फँसाने और अपनी मौत का जिम्मेदार बताया। इस नोट में उन्होंने साफ लिखा कि प्रधान ने पुलिस से साँठगाँठ कर सिद्धार्थ को झूठे केस में फँसाया।

रामबाबू की मौत ने पूरे गाँव में हंगामा मचा दिया। उनके बेटे अक्षय तिवारी ने प्रधान, उसके भाई और तीन अन्य लोगों के खिलाफ जहर देकर हत्या का मुकदमा दर्ज कराया। पुलिस ने इस मामले में वीरेंद्र पाल और एक अन्य आरोपित को गिरफ्तार कर जेल भेजा, लेकिन भूप नारायण और दो अन्य लोग फरार हो गए।

रेप का आरोप निकला झूठा

रामबाबू की आत्महत्या के बाद मामले ने तूल पकड़ा। कौशांबी के पुलिस अधीक्षक (SP) राजेश कुमार ने तुरंत एक विशेष जाँच दल (SIT) का गठन किया। SIT ने बच्ची, चश्मदीदों और गाँव वालों के बयान लिए। 8 जून 2025 को बच्ची ने धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने बयान दिया कि उसके साथ कोई रेप नहीं हुआ था।

बच्ची ने बताया कि वह सिद्धार्थ के घर के पास रामायण सुनने गई थी। वहाँ कुछ बच्चे टिन शेड पर पत्थर फेंक रहे थे। सिद्धार्थ ने गुस्से में उसे एक थप्पड़ मारा। बच्ची रोते हुए घर गई और अपनी माँ को बताया। माँ ने गुस्से में रेप की झूठी कहानी बनाई और बच्ची को झूठ बोलने के लिए उकसाया।

SIT ने पाया कि यह पूरा मामला ग्राम प्रधान भूप नारायण पाल और रामबाबू के बीच पुरानी चुनावी रंजिश का नतीजा था। प्रधान ने पुलिस से मिलीभगत कर सिद्धार्थ को फँसाने की साजिश रची। जाँच में सिद्धार्थ को क्लीन चिट मिली। पुलिस ने रेप (धारा 376) और पॉक्सो एक्ट की धाराएँ हटा दीं। इसके बाद सिद्धार्थ के वकील अविनाश कुमार त्रिपाठी ने ACJM कोर्ट में जमानत याचिका दायर की। 9 जून 2025 को कोर्ट ने सिद्धार्थ को जमानत दी और उसी शाम उसे जेल से रिहा कर दिया गया। वह 11 दिन जेल में रहा।

ब्लैकमेलिंग और 20 लाख की उगाही का आरोप

खुद को हाईकोर्ट का वकील बताने वाले रामबाबू के भतीजे आशीष तिवारी ने दावा किया कि ग्राम प्रधान और उनके भाई ने सिद्धार्थ को फर्जी केस में फँसाया। आशीष के मुताबिक, प्रधान ने मामले को रफा-दफा करने के लिए 20 लाख रुपये की माँग की थी। जब परिवार ने पैसे देने से मना किया, तो रामबाबू को जहर देकर मार डाला गया। सुसाइड नोट में भी रामबाबू ने प्रधान को अपनी मौत का जिम्मेदार ठहराया था। पुलिस ने इस दावे की जाँच शुरू की, लेकिन अभी तक इसकी पुष्टि नहीं हुई है।

लापरवाही बरतने वाले पुलिसकर्मियों पर भी गिरी गाज

SIT की जाँच में पुलिस की बड़ी लापरवाही सामने आई। अगर शुरू में धारा 164 के बयान की ठीक से जाँच की गई होती, तो शायद रामबाबू की जान बच सकती थी। हालाँकि सरकार ने इस मामले में कड़े कदम उठाते हुए पुलिसकर्मियों पर गंभीर कार्रवाई की।

इसी क्रम में सरकार ने सैनी कोतवाली के इंस्पेक्टर बृजेश करवरिया को लाइन हाजिर कर दिया, तो पथरावाँ चौकी प्रभारी आलोक राय और मामले के जाँचकर्ता (IO – Investigation Officer) कृष्ण स्वरूप को निलंबित कर दिया गया। SP राजेश कुमार ने कहा कि पुलिस की भूमिका की भी जाँच की जा रही है। कड़ाधाम थाना प्रभारी धीरेंद्र कुमार को मामले की आगे की जाँच सौंपी गई।

आरोपित ग्राम प्रधान फरार, इनाम घोषित

ग्राम प्रधान भूप नारायण पाल और उनके दो साथी अभी भी फरार हैं। पुलिस को उनकी लोकेशन हरियाणा में मिली है। SP राजेश कुमार ने प्रधान की गिरफ्तारी के लिए 25,000 रुपये का इनाम घोषित किया है। एक पुलिस टीम हरियाणा में छापेमारी कर रही है। गाँव में प्रधान के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा है। लोग उसे जल्द से जल्द गिरफ्तार करने की माँग कर रहे हैं।

रामबाबू की आत्महत्या और सिद्धार्थ के जेल जाने से तिवारी परिवार पूरी तरह टूट गया। रामबाबू की पत्नी और बेटों का रो-रोकर बुरा हाल है। गाँव वाले भी इस घटना से सदमे में हैं। यह मामला न सिर्फ चुनावी रंजिश की गंदी राजनीति को उजागर करता है, बल्कि पुलिस और प्रशासन की लापरवाही पर भी सवाल उठाता है। अगर पुलिस ने शुरू में निष्पक्ष जाँच की होती, तो एक बाप की जान बच सकती थी।

यह घटना बताती है कि कैसे व्यक्तिगत दुश्मनी और सिस्टम की खामियाँ मिलकर एक परिवार को तबाह कर सकती हैं। सिद्धार्थ को 11 दिन जेल में रहना पड़ा, उसके पिता की जान चली गई, और मुख्य आरोपित अभी भी फरार है। SIT की जाँच ने सच सामने ला दिया, लेकिन रामबाबू को वापस नहीं लाया जा सकता। यह मामला पुलिस, प्रशासन और समाज के लिए सबक है कि हर आरोप की गहन और निष्पक्ष जाँच जरूरी है।

पूरी दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ी मुस्लिम आबादी, भारत समेत हिन्दुओं का जनसंख्या में कई देशों में घट रहा हिस्सा: Pew रिपोर्ट ने बताया- 10 साल में बढ़े 34 करोड़ मुस्लिम

इस्लाम विश्व में सबसे तेजी से बढ़ने वाला मजहब बन गया है। इस्लाम अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मजहबी समूह है। यह जानकारी एक हाल ही में आई रिपोर्ट ने दी है। इसमें यह भी बताया गया है कि जहाँ मुस्लिमों की संख्या बढ़ी है, तो वहीं हिन्दुओं की आबादी लगातार घट रही है।

सोमवार (9 जून 2025) को जारी प्यू रिसर्च सेंटर की ‘वैश्विक धार्मिक परिदृश्य अध्ययन’ रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2010 से वर्ष 2020 के बीच मुस्लिम आबादी में 34.7 करोड़ (347 मिलियन) की वृद्धि दर्ज की गई, जो सभी अन्य धर्मों की संयुक्त जनसंख्या वृद्धि से अधिक है।

इन दस सालों में जहाँ मुस्लिमों की संख्या तेजी से बढ़ी, वहीं हिंदुओं सहित अन्य प्रमुख धर्मों की आबादी में गिरावट देखी गई। यह अध्ययन वैश्विक स्तर पर धार्मिक जनसांख्यिकी में हो रहे महत्वपूर्ण बदलावों को दर्शाता है।

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पिछले 10 वर्षों में दुनिया भर में मुस्लिमों की आबादी 21% बढ़ी है, जो 1.7 अरब से बढ़कर 2 अरब हो गई। यह बढ़ोतरी बाकी दुनिया की आबादी की तुलना में दोगुनी तेज़ है, क्योंकि कुल वैश्विक आबादी इस दौरान सिर्फ 10% बढ़ी। इसी वजह से मुस्लिमों का दुनिया की आबादी में हिस्सा 24% से बढ़कर 26% हो गया है।

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अध्ययन के अनुसार, ईसाई और मुस्लिमों के बाद तीसरे नंबर पर वे लोग हैं जो किसी धर्म से नहीं जुड़े हैं। हिंदू चौथे स्थान पर हैं, जिनकी हिस्सेदारी वैश्विक आबादी में 15% है।

दुनिया के हर हिस्से में बढ़े मुस्लिम

इस शोध के अनुसार, दुनिया के सभी हिस्सों में मुस्लिम आबादी बढ़ी है, लेकिन हर जगह बढ़ोतरी का स्तर अलग रहा। 2020 तक सबसे ज्यादा बढ़ोतरी उत्तरी अमेरिका में हुई, जहाँ मुस्लिम आबादी 52% बढ़ी। इसके बाद सब अफ्रीका के सहारा क्षेत्र का नंबर आता है, जहाँ मुस्लिम आबादी 34% बढ़कर 2020 में 36.9 करोड़ (369 मिलियन) हो गई। इस क्षेत्र की कुल आबादी में मुस्लिमों की हिस्सेदारी अब 33% है।

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दुनिया के लगभग हर क्षेत्र में मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ी है, लेकिन लैटिन अमेरिका और कैरिबियन में यह वृद्धि बाकी क्षेत्रों की तुलना में कम रही। वहाँ मुस्लिम आबादी 6% बढ़ी, जबकि गैर-मुस्लिम आबादी 10% बढ़ी।

एशिया प्रशांत क्षेत्र में मुस्लिमों की कुल हिस्सेदारी 2020 में 1.4% बढ़कर 26% हो गई, लेकिन दुनिया में मुस्लिम आबादी की कुल हिस्सेदारी में इस क्षेत्र की भागीदारी 61% से घटकर 59% रह गई। प्यू की रिपोर्ट बताती है कि 2010 के बाद से अफ्रीका के मुस्लिम इलाकों में मुस्लिमों की संख्या बढ़ने लगी है।

अब दुनिया के 18% मुस्लिम इस क्षेत्र में रहते हैं, जो पहले से 2% ज्यादा है।

दुनिया के एक तिहाई मुस्लिम भारत-पाकिस्तान और इंडोनेशिया में

अध्ययन के अनुसार, दुनिया के एक तिहाई मुस्लिम सिर्फ भारत, पाकिस्तान और इंडोनेशिया में रहते हैं। 2020 में भारत में करीब 213 मिलियन (21.3 करोड़) मुस्लिम थे, जो देश की कुल आबादी का 15% हैं। इंडोनेशिया में मुस्लिमों की संख्या भारत से थोड़ी ज्यादा, करीब 240 मिलियन (24 करोड़) थी, जो दुनिया के कुल मुस्लिमों का 12% है।

दुनिया के लगभग 65% मुस्लिम केवल 10 देशों में रहते हैं। इन देशों में कुल 1.3 अरब मुस्लिम हैं। इन 10 में से 9 देशों में इस्लाम बहुसंख्यक धर्म है, सिर्फ भारत एक ऐसा देश है जहाँ मुस्लिम अल्पसंख्यक हैं।

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5 देश जहाँ मुस्लिम आबादी में बड़ा बदलाव आया

कजाकिस्तान, बेनिन, लेबनान, ओमान और तंजानिया जैसे पाँच देशों में मुस्लिम आबादी में बड़े बदलाव देखे गए हैं। इनमें से तीन देशों कजाकिस्तान, बेनिन और लेबनान में मुस्लिमों की संख्या बढ़ी है। कजाकिस्तान में 8.2%, बेनिन में 7.9% और लेबनान में 5.5% की बढ़ोतरी हुई है। वहीं, ओमान और तंजानिया में मुस्लिम आबादी घट गई है। ओमान में 8.3% और तंजानिया में 5.5% की कमी दर्ज की गई है।

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इन पाँच देशों (कजाकिस्तान, बेनिन, लेबनान, ओमान और तंजानिया) में मुस्लिम आबादी में जो बदलाव हुए, उसका मुख्य कारण पलायन है। कुछ देशों में गैर-मुस्लिम लोग बाहर चले गए, जिससे मुस्लिम आबादी का प्रतिशत बढ़ा, जबकि कुछ जगहों पर मुस्लिम शरणार्थियों के आने से उनकी संख्या बढ़ी।

यूरोप के कई देशों में भी मुस्लिम आबादी बढ़ी है, इसका कारण आप्रवासन (immigration) और मुस्लिमों की औसत से अधिक जन्म दर है। हालाँकि, इन देशों में मुस्लिम आबादी की हिस्सेदारी में बढ़ोतरी 5% से कम रही।

दूसरी ओर ईसाई अब भी दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक समूह हैं, लेकिन पिछले दस सालों में उनकी जनसंख्या में केवल 12 करोड़ (122 मिलियन) की बढ़त हुई और उनकी वैश्विक हिस्सेदारी घटकर 28.8% रह गई, जो पहले से 1.8% कम है।

पूरी दुनिया में घट रहे हिन्दू

प्यू के रिपोर्ट्स के मुताबिक, दक्षिण एशिया के चार देशों भारत, नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू आबादी में थोड़ी गिरावट दिखी, लेकिन यह गिरावट 5% से कम है। किसी भी देश या इलाके में हिंदुओं की हिस्सेदारी में कोई बड़ी बढ़ोतरी या कमी नहीं हुई है।

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ईसाई, मुस्लिम और धर्म ना मानने वालों के बाद हिंदू दुनिया का चौथा सबसे बड़ा धार्मिक समूह हैं। 2010 से 2020 के बीच हिंदू आबादी में 12% की वृद्धि हुई है, जो करीब 11 करोड़ से बढ़कर 12 करोड़ के करीब पहुँच गई है, लेकिन इस दौरान हिंदुओं का विश्व जनसंख्या में हिस्सा थोड़ा घटकर 15.0% से 14.9% हो गया। इसके पीछे की वजह रही कि गैर हिंदुओं की वृद्धि दर भी लगभग बराबर रही, इसलिए हिंदुओं का वैश्विक हिस्सेदारी लगभग स्थिर ही रही।

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दुनिया के लगभग 99% हिंदू एशिया प्रशांत क्षेत्र में रहते हैं। भारत, नेपाल और मॉरीशस में वे सबसे बड़ा धार्मिक समूह हैं।

शोध के अनुसार, पिछले 10 सालों में मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में हिंदू आबादी में 62% तेजी से बढ़ोतरी हुई है, जो अब करीब 32 लाख (3.2 मिलियन) है। इसी दौरान उत्तरी अमेरिका में भी हिंदू आबादी 55% बढ़कर 36 लाख (3.6 मिलियन) तक पहुँच गई है। ये बढ़ोतरी मुख्य रूप से आर्थिक अवसरों के कारण हुई है, जिससे हिंदू लोग संयुक्त अरब अमीरात (UAE), यूरोप और अन्य जगहों पर प्रवास कर रहे हैं।

2010 से 2020 के बीच हिंदुओं की भौगोलिक स्थिति में थोड़ा बदलाव आया है। एशिया पेसिफिक में हिंदू आबादी में 0.2% की थोड़ी कमी हुई, जबकि उत्तरी अमेरिका और मध्य पूर्व उत्तरी अफ्रीका में हिंदुओं की संख्या में 0.1% की बढ़ोतरी हुई है।

1950-2015 के बीच 43% बढ़ी मुस्लिम आबादी

पूरी दुनिया की तरह भारत में भी तेजी से मुस्लिम आबादी बढ़ी है। मई 2024 में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, 1950 से 2015 के बीच मुस्लिमों की आबादी 43.15% बढ़ी, जबकि हिंदुओं की आबादी में 7.85% की कमी आई। इसी दौरान ईसाइयों और सिखों की आबादी में भी क्रमशः 5.38% और 6.58% की गिरावट हुई।

इस अवधि में भारत की कुल आबादी में हिंदुओं का हिस्सा 84% से घटकर 78% हो गया, जबकि मुस्लिमों की हिस्सेदारी 9.84% से बढ़कर 14.09% हो गई है। भारत के पड़ोसी देशों में जहाँ मुस्लिम या उनके संप्रदाय की आबादी 50% से ज्यादा है, वहाँ मुस्लिम समुदाय की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।

बांग्लादेश में सबसे ज्यादा 18.5% की वृद्धि हुई, इसके बाद पाकिस्तान में 3.75% और अफगानिस्तान में 0.29% की बढ़ोतरी हुई है। मई 2022 में जारी पाँचवीं राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में मुस्लिमों महिलाओं का टोटल फर्टिलिटी रेट (TFR) सबसे ज्यादा है। फर्टिलिटी रेट किसी 15-49 वर्ष की महिला द्वारा जन्म दिए गए बच्चों की संख्या है।

यदि किसी समूह की महिलाओं का टोटल फर्टिलिटी रेट 2.1 से अधिक है तो उसकी आबादी बढती है। यदि यह कम होता तो आबादी में कमी आती है। NFHS सर्वे बताता है हिन्दुओं में TFR पिछले कुछ वर्षों में घटकर 3.4 से 2.0 बच्चों तक आ गया है। (1992-93 से 2019-21 के बीच)। लेकिन मुस्लिम समुदाय में प्रति महिला औसत यह TFR 2.36 हैं।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 15 से 19 साल की उम्र की मुस्लिम महिलाओं में किशोरावस्था में गर्भधारण ज्यादा होता है, यह प्रतिशत 8% है, जो अन्य धर्मों की महिलाओं से ज्यादा है। जब दूसरी संतान की बात आती है, तो मुस्लिमों में सबसे कम महिलाएँ ऐसी हैं जो दूसरा बच्चा नहीं चाहतीं। 15 से 49 साल की उम्र की विवाहित महिलाओं में, 72% सिख और 71% हिंदू महिलाएँ आगे बच्चे नहीं चाहतीं, जबकि मुस्लिम महिलाओं में यह संख्या 64% है।

जाति की जिस आग में देश को जलाना चाहते हैं राहुल गाँधी, उसमें कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ही झुलसी: जानिए – खुद की जाति जनगणना क्यों बनी जी का जंजाल, ‘आलाकमान’ को क्यों नहीं कबूल

कर्नाटक में एक बार फिर जातिगत जनगणना का मुद्दा सियासत का केंद्र बन गया है। कॉन्ग्रेस, जो पिछले कुछ सालों से इस मुद्दे को अपने ‘सामाजिक न्याय’ के एजेंडे का चेहरा बनाती रही, अब खुद अपने ही बनाए जाल में फँसती नजर आ रही है। इस मुद्दे के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी सियासी पहचान को मजबूत करने की कोशिश में लगे राहुल गाँधी भी कर्नाटक में इस मुद्दे के उलझने से मुश्किल में पड़ गए हैं।

अब डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार के ताजा बयानों और कॉन्ग्रेस हाईकमान के यू-टर्न से साफ है कि पार्टी बैकफुट पर है। दूसरी तरफ, बीजेपी इसे कॉन्ग्रेस की नाकामी और ध्यान भटकाने की साजिश करार दे रही है।

आखिर ये नौबत क्यों आई? 2015 की जातिगत जनगणना की रिपोर्ट में ऐसा क्या था कि कॉन्ग्रेस को पलटना पड़ रहा है? कॉन्ग्रेस का वादा क्या था और अब क्यों उसे अपने कदम पीछे खींचने पड़ रहे हैं? और सबसे अहम, राहुल गाँधी का ‘जाति ब्रेकिंग न्यूज’ वाला नैरेटिव अब उनके लिए जंजाल क्यों बन रहा है? चलिए, इस पूरे मसले को विस्तार से समझते हैं।

क्यों फिर से उठा जातिगत जनगणना का मुद्दा?

10 जून 2025 को कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने ऐलान किया कि वो राज्य में फिर से जातिगत जनगणना करवाएगी। डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार ने कहा, “90 दिनों के भीतर इसकी टाइमलाइन तय हो जाएगी और प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होगी।” लेकिन सवाल ये है कि जब 2015 में करवाया गया सर्वे पहले ही तैयार है, तो दोबारा जनगणना की जरूरत क्यों पड़ी? कॉन्ग्रेस तो इस सर्वे को ‘कर्नाटक मॉडल’ के तौर पर प्रचारित करती रही थी। फिर अब अचानक यू-टर्न क्यों?

इसके पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है 2015 की जातिगत जनगणना की रिपोर्ट, जिसे एच. कांथराज की अगुआई में कर्नाटक पिछड़ा वर्ग आयोग ने तैयार किया था। इस रिपोर्ट को फरवरी 2024 में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को सौंपा गया था।

इसमें सुझाव दिया गया था कि अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का आरक्षण 32% से बढ़ाकर 51% और मुस्लिमों का आरक्षण 4% से 8% किया जाए। कुल मिलाकर अगर ये सिफारिशें लागू होतीं, तो कर्नाटक में कुल आरक्षण 85% तक पहुँच जाता – 51% OBC, 24% SC-ST और 10% EWS के लिए।

लेकिन इस रिपोर्ट ने कर्नाटक की दो सबसे प्रभावशाली जातियों लिंगायत और वोक्कालिगा को नाराज कर दिया। इन समुदायों का दावा है कि उनकी आबादी को इस सर्वे में कम करके आँका गया। सर्वे के मुताबिक, लिंगायतों की आबादी कुल जनसंख्या का करीब 11% और वोक्कालिगा की 10% से थोड़ा ज्यादा थी।

ये आँकड़े उनके अपने अनुमानों से बहुत कम थे। कर्नाटक की सियासत में बड़ा रोल अदा करने वाले लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय इस बात से भड़क गए कि उनकी गिनती कम दिखाई गई, जबकि मुस्लिमों की आबादी में 1984 से 2015 के बीच 94% की बढ़ोतरी दिखाई गई। सर्वे में मुस्लिम OBC में सबसे बड़ा समूह बन गए थे और उनकी हिस्सेदारी 18.08% बताई गई।

साल 2015 की जातिगत जनगणना की रिपोर्ट में क्या था?

साल 2015 की जातिगत जनगणना, जिसे कर्नाटक पिछड़ा वर्ग आयोग ने एच. कांथराज के नेतृत्व में शुरू किया और 2020 में के. जयप्रकाश हेगड़े ने पूरा किया, कर्नाटक की सियासत में भूचाल ला देने वाली थी। इस सर्वे में कई चौंकाने वाले आँकड़े सामने आए-

मुस्लिम आबादी में 94% की बढ़ोतरी: 1984 के वेंकटस्वामी कमीशन के सर्वे में मुस्लिम आबादी 39.63 लाख थी, जो 2015 में बढ़कर 76.9 लाख हो गई। यानी 30 साल में उनकी आबादी लगभग दोगुनी हो गई। उनकी हिस्सेदारी 1984 में 10.97% थी, जो 2015 में बढ़कर 18.08% हो गई।

लिंगायत और वोक्कालिगा की आबादी: 1984 में लिंगायतों की आबादी 61.14 लाख (16.92%) और वोक्कालिगा की 42.19 लाख (11.68%) थी। 2015 में लिंगायतों की आबादी 8.50% बढ़कर करीब 66 लाख और वोक्कालिगा की 46% बढ़कर करीब 61 लाख हो गई। लेकिन उनकी हिस्सेदारी में कमी आई, क्योंकि मुस्लिम और OBC समुदायों की आबादी तेजी से बढ़ी।

OBC की हिस्सेदारी: सर्वे के मुताबिक, कर्नाटक की कुल आबादी में OBC की हिस्सेदारी 69.60% थी। इस आधार पर आयोग ने OBC आरक्षण को 32% से बढ़ाकर 51% करने की सिफारिश की। इसमें मुस्लिमों का आरक्षण 4% से बढ़ाकर 8% करने की बात थी।

कुल आरक्षण 85% तक: अगर ये सिफारिशें लागू होतीं, तो कर्नाटक में कुल आरक्षण 85% हो जाता – 51% OBC, 24% SC-ST और 10% EWS के लिए। यह सुप्रीम कोर्ट के इंद्रा साहनी मामले में तय 50% की सीमा को पार करता, जिसके लिए कॉन्ग्रेस ने झारखंड और तमिलनाडु का उदाहरण दिया, जहाँ क्रमशः 77% और 69% आरक्षण लागू है।

इस रिपोर्ट ने कॉन्ग्रेस की मुश्किलें बढ़ा दीं। लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों ने इसे ‘अन्याय’ करार दिया और कहा कि उनकी आबादी को जानबूझकर कम दिखाया गया। वहीं, सिद्धारमैया की कुरुबा जाति को ‘अधिक पिछड़ा’ से ‘सबसे पिछड़ा’ श्रेणी में डालने की सिफारिश ने भी विवाद खड़ा किया।

कॉन्ग्रेस का वादा और यू-टर्न

कॉन्ग्रेस ने 2013 में सिद्धारमैया के पहले कार्यकाल में जातिगत जनगणना शुरू की थी। तब इसे ‘सामाजिक न्याय’ का ऐतिहासिक कदम बताया गया था। राहुल गाँधी ने भी इस मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया और बार-बार कहा कि वो सुप्रीम कोर्ट की 50% आरक्षण की सीमा को तोड़ना चाहते हैं। कॉन्ग्रेस ने इसे ‘कर्नाटक मॉडल’ के तौर पर पेश किया और दावा किया कि ये पिछड़े वर्गों, दलितों और मुस्लिमों के लिए गेम-चेंजर होगा।

लेकिन जब 2024 में ये रिपोर्ट सामने आई, तो कॉन्ग्रेस के सामने दोहरी चुनौती थी। पहली – लिंगायत और वोक्कालिगा जैसे प्रभावशाली समुदायों का विरोध, जो कर्नाटक की सियासत में बड़ा रोल अदा करते हैं। दूसरी – पार्टी के भीतर का अंतर्विरोध। सिद्धारमैया इसे लागू करने के पक्ष में थे, क्योंकि ये उनकी ‘अहिन्दा’ (अल्पसंख्यक, OBC और दलित) रणनीति को मजबूत करता। लेकिन डीके शिवकुमार जो खुद वोक्कालिगा हैं, और लिंगायत नेताओं ने इसका विरोध शुरू कर दिया।

17 अप्रैल 2025 को हुई कैबिनेट बैठक में इस रिपोर्ट पर चर्चा तो हुई, लेकिन कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया। कॉन्ग्रेस हाईकमान को लगा कि ये मुद्दा पार्टी के लिए सियासी नुकसान कर सकता है। नतीजा? दिल्ली में मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गाँधी के साथ बैठक के बाद फैसला लिया गया कि पुराने सर्वे को या तो पूरी तरह स्क्रैप किया जाए या उसमें संशोधन किया जाए।

डीके शिवकुमार बोले- ‘सबको साथ लेकर चलेंगे’

डीके शिवकुमार ने 10 जून 2025 को दिल्ली में मीडिया से बात करते हुए कहा, “जाति जनगणना का डेटा करीब 10 साल पुराना है। हमारे बुजुर्गों ने सुझाव दिया है कि हर वर्ग के नेताओं को इस बारे में बोलने का मौका देकर सामाजिक न्याय सुनिश्चित किया जाए। इसलिए हम विचार कर रहे हैं कि सभी को मौका दिया जाए ताकि किसी भी वर्ग को कोई असुविधा न हो और किसी के साथ नाइंसाफी न हो। हम कैबिनेट में इस पर चर्चा करेंगे और दोबारा जनगणना की तारीख तय करेंगे। इस बार इसे ऑनलाइन भी करवाएंगे। ये एक लंबी प्रक्रिया है। जल्द ही हम बताएँगे कि ये कब शुरू होगी और कैसे होगी।”

शिवकुमार ने आगे कहा, “हम लोगों की भावनाओं को समझते हैं, हम हर जिंदगी का सम्मान करते हैं। हमने समाज के अलग-अलग वर्गों से जानकारी ली है। कुछ लोग मानते हैं कि ये 10 साल पुराना सर्वे है, जिसमें बहुत खर्चा हुआ था। लेकिन हम उस रिपोर्ट से सहमत हैं, जो भी उसमें है। हम सिर्फ आँकड़ों को लेकर चिंतित हैं। 22 जून को हम इस पर अंतिम फैसला लेने वाले थे, लेकिन उससे पहले हाईकमान ने हमें बुलाया। उन्होंने डिटेल्स माँगी हैं। उन्होंने मीडिया लीडर्स से सलाह ली और हमें निर्देश दिया कि आप अपनी नीति के मुताबिक चलें, जो बैकवर्ड क्लास कमीशन कहता है, उसी के हिसाब से करें। किसी को नाराज नहीं होना चाहिए।”

शिवकुमार का ये बयान साफ दिखाता है कि कॉन्ग्रेस अब हर तरफ से दबाव में है। एक तरफ वो अपने ‘सामाजिक न्याय’ के नैरेटिव को बचाना चाहती है, दूसरी तरफ लिंगायत और वोक्कालिगा जैसे प्रभावशाली समुदायों को नाराज नहीं करना चाहती।

बीजेपी ने बताया ‘कॉन्ग्रेस की साजिश’

बीजेपी ने इस मुद्दे को कॉन्ग्रेस की नाकामी और सियासी ड्रामेबाजी करार दिया। कर्नाटक बीजेपी के अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने कहा, “जब भी कॉन्ग्रेस सरकार अपनी प्रशासनिक नाकामियों के चलते संकट में आती है, वो जातिगत जनगणना का प्रस्ताव लाती है। ये सामाजिक चिंता से नहीं, बल्कि लोगों का ध्यान भटकाने की साजिश है। बेंगलुरु में चिन्नास्वामी स्टेडियम के पास हाल की स्टैम्पेड में 11 लोगों की मौत हुई। लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार जो पब्लिसिटी के जुनून में डूबी है और लोगों के गुस्से का सामना कर रही है, इस जनगणना को फिर से लाकर अपनी नाकामियों को छिपाने की कोशिश कर रही है।”

उन्होंने सवाल पूछा है कि क्या कॉन्ग्रेस सरकार ये मान रही है कि 160 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करके की गई जनगणना पूरी तरह बेकार थी? उन्होंने कहा, “डिप्टी सीएम का बयान यही दिखाता है। अब समय आ गया है कि लोग कॉन्ग्रेस की चालाकी, गैर-जिम्मेदारी और जनता को तंग करने की नीति को सबक सिखाएँ।”

बीजेपी के महासचिव सुनील कुमार कारकला ने कहा, “कॉन्ग्रेस हाईकमान ने कर्नाटक सरकार की तैयार की गई जातिगत जनगणना की रिपोर्ट को रद्द कर दिया है। ये रिपोर्ट नंदी हिल्स में कैबिनेट बैठक में मंजूरी के लिए तय थी। लेकिन हाईकमान ने इसे खारिज कर दिया और डेटा में गड़बड़ी का हवाला देकर दोबारा सर्वे का आदेश दिया। कॉन्ग्रेस और सीएम सिद्धारमैया को समुदायों में असंतोष पैदा करने के लिए माफी माँगनी चाहिए।”

राहुल गाँधी का जंजाल

राहुल गाँधी ने पिछले कुछ सालों में जातिगत जनगणना को अपनी सियासी रणनीति का केंद्र बनाया था। वो बार-बार कहते रहे कि उनकी पार्टी सुप्रीम कोर्ट की 50% आरक्षण की सीमा को तोड़ना चाहती है। 2024 में उन्होंने कहा था, “हम भारत में सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए 50% की दीवार को तोड़ देंगे।” कर्नाटक में उनकी पार्टी ने इस दिशा में कदम भी उठाया। लेकिन अब वही मुद्दा उनके लिए जंजाल बन रहा है।

कर्नाटक में लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों का विरोध कॉन्ग्रेस के लिए सियासी नुकसान का सबब बन सकता है। ये दोनों समुदाय परंपरागत रूप से बीजेपी और जेडी(एस) के वोटर रहे हैं। कॉन्ग्रेस की ‘अहिन्दा’ रणनीति (अल्पसंख्यक, OBC और दलित) इन समुदायों को पहले ही नजरअंदाज करती रही है। अब अगर कॉन्ग्रेस 2015 की रिपोर्ट को लागू करती है, तो लिंगायत और वोक्कालिगा और नाराज होंगे। और अगर नहीं करती तो उसका ‘सामाजिक न्याय’ का नैरेटिव कमजोर पड़ जाएगा।

राहुल गाँधी की मुश्किल ये है कि वो राष्ट्रीय स्तर पर तो जातिगत जनगणना का ढोल पीट रहे हैं, लेकिन कर्नाटक में उनकी अपनी सरकार इसे लागू करने में नाकाम रही है। इससे बीजेपी को मौका मिल गया है कि वो कॉन्ग्रेस को ‘वोटबैंक की राजनीति’ करने वाली पार्टी करार दे।

कॉन्ग्रेस की रणनीति में अहिन्दा वोटबैंक

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस की रणनीति हमेशा से ‘अहिन्दा’ (अल्पसंख्यक, OBC और दलित) वोटबैंक को मजबूत करने की रही है। ये शब्द सबसे पहले कॉन्ग्रेस के नेता देवराज उर्स ने दिया था और सिद्धारमैया ने इसे अपनी सियासी पहचान बनाया। 2015 की जनगणना में OBC और मुस्लिम आरक्षण बढ़ाने की सिफारिश इसी रणनीति का हिस्सा थी। कर्नाटक में मुस्लिम आबादी 18.08% है और वो OBC में सबसे बड़ा समूह हैं। कॉन्ग्रेस को लगता है कि अगर वो मुस्लिमों और OBC को ज्यादा आरक्षण देगी, तो उसका वोटबैंक और मजबूत होगा।

लेकिन ये रणनीति अब उलटी पड़ रही है। लिंगायत और वोक्कालिगा समुदायों का विरोध कॉन्ग्रेस के लिए सिरदर्द बन गया है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट की 50% आरक्षण की सीमा को तोड़ने की बात भी कानूनी पचड़े में फंस सकती है। कॉन्ग्रेस ने झारखंड और तमिलनाडु का उदाहरण तो दिया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का इंद्रा साहनी फैसला अभी भी लागू है।

कर्नाटक में जातिगत जनगणना का मुद्दा कॉन्ग्रेस के लिए दोधारी तलवार बन गया है। एक तरफ पार्टी अपने ‘सामाजिक न्याय’ के नैरेटिव को बनाए रखना चाहती है, जिसके तहत वो OBC, मुस्लिम और दलित वोटबैंक को साधने की कोशिश कर रही है। दूसरी तरफ लिंगायत और वोक्कालिगा जैसे प्रभावशाली समुदायों का विरोध उसे बैकफुट पर ले आया है। डीके शिवकुमार का बयान कि “हम हर समुदाय को साथ लेकर चलेंगे” कॉन्ग्रेस की मजबूरी को दिखाता है।

राहुल गाँधी, जो जातिगत जनगणना को राष्ट्रीय स्तर पर अपनी सियासी पहचान का हिस्सा बनाना चाहते थे, अब खुद इस जंजाल में फँसते जा रहे हैं। उनकी पार्टी न तो 2015 की रिपोर्ट को लागू कर पा रही है, न ही इसे पूरी तरह खारिज कर पा रही है। बीजेपी इसे कॉन्ग्रेस की नाकामी और सियासी ड्रामेबाजी बता रही है और कर्नाटक की जनता के बीच ये सवाल उठ रहा है कि क्या कॉन्ग्रेस वाकई सामाजिक न्याय की बात करती है, या ये सिर्फ वोटबैंक की राजनीति है?

कुल मिलाकर राहुल गाँधी का ‘जाति ब्रेकिंग न्यूज’ वाला ड्रामा अब उनके लिए जंजाल बन गया है। और कर्नाटक में कॉन्ग्रेस की ये उलझन आने वाले दिनों में और गहरा सकती है।