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पीएम मोदी पहुँचे अहमदाबाद, प्लेन क्रैश के घटनास्थल का लिया जायजा: एकलौते बचे यात्री समेत अन्य घायलों से की मुलाकात, 2 घंटे का है दौरा

अहमदाबाद में गुरुवार (12 जून 20215) की दोपहर हुए प्लेन क्रैश की घटना के बाद देश भर में शोक का माहौल है। इसमें 1 यात्री को छोड़ कर यात्रियों की मौत हो गई है और कई अन्य घायलों का इलाज सिविल अस्पताल में किया जा रहा है। इस घटना के बाद शुक्रवार (13 जून 2025) की सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अहमदाबाद पहुँचे।

एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सुबह 8:30 बजे पहुंचे। 2 घंटे के दौरे में पीएम मोदी अहमदाबाद में हुए प्लेन क्रैश के घटना स्थल पर पहुँचे। उनके साथ गुजरात के सीएम भूपेंद्र पटेल और सांसद सीआर पाटील भी साथ थे। यहाँ का जायजा लेने के बाद पीएम मोदी सिविल अस्पताल में घायलों से मिले और उनका हाल लिया। इसके बाद वह अहमदाबाद में ही एक बैठक भी करेंगे।

पीएम मोदी से पहले गुरुवार को ही गृह मंत्री अमित शाह ने भी अहमदाबाद पहुँच कर मामले की जानकारी ली थी। इसके बाद पूरे मामले की ब्रीफिंग तैयार की गई।

गुरुवार को दोपहर अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर एयर इंडिया का बोइंग 787 ड्रीमलाइनर विमान ने लंदन के गेटविक एयरपोर्ट के लिए उड़ान भरी थी लेकिन उड़ान भरने की कुछ मिनट के अंदर ‘मेडे’ की काल के बाद मेघानीनगर इलाके में जहाज क्रैश हो गया। प्लेन क्रैश होकर बीजे मेडिकल कॉलेज के हॉस्टल पर गिरा। इस दौरान हॉस्टल में मौजूद लोग भी हताहत हुए। इस पूरे हादसे में अब तक यात्रियों समेत अन्य लोगों को मिलाकर 265 लोगों की मौत हो गई है।

विमान में कुल 242 लोग सवार थे जिनमें दो पायलट और 10 केबिन क्रू भी शामिल थे। हादसे में गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता विजय रूपाणी का भी निधन हुआ है। उनकी मौत के बाद लंदन से उनका परिवार शुक्रवार को भारत पहुँचा।

इस पूरे प्लेन क्रैश में सिर्फ एक व्यक्ति विश्वास कुमार रमेश ही जीवित बचा है। इसका इलाज भी सिविल अस्पताल में किया जा रहा है अपने दौरे में पीएम मोदी विश्वास से भी मुलाकात कर सकते हैं।

प्लेन क्रैश में मृतक लोगों की पहचान के लिए उनका डीएनए टेस्ट भी किया जाएगा इसके लिए मृतकों के परिजनों के सैंपल लिए जाएँगे।

मेडिकल हॉस्टल में खाना खा रहे थे डॉक्टर, जब छत में घुसा एयर इंडिया का विमान: 240+ मौतें, पीड़ित परिजनों को ₹1-1 करोड़ देगा TATA; जानिए अब तक क्या हुआ

गुजरात के लिए गुरुवार (12 जून 2025) का दिन एक काला दिन बन गया। अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई पटेल इंटरनेशनल एयरपोर्ट से लंदन के गैटविक एयरपोर्ट के लिए उड़ान भरने वाली एयर इंडिया की फ्लाइट AI-171 टेक-ऑफ के चंद मिनटों बाद ही क्रैश हो गई।

इस विमान में 230 यात्री और 12 क्रू मेंबर्स यानी कुल 242 लोग सवार थे। इनमें गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के बड़े नेता विजय रूपाणी भी शामिल थे। विजय रूपाणी इस फ्लाइट में बिजनेस क्लास की 2D सीट पर सवार थे।

हादसा इतना भयानक था कि पूरा शहर सन्न रह गया। विमान मेघाणी नगर के रिहायशी इलाके में बीजे मेडिकल कॉलेज की मेस बिल्डिंग और अतुल्यम हॉस्टल से टकराया, और देखते ही देखते आग का गोला बन गया। चारों तरफ धुआँ, मलबा और चीख-पुकार फैल गई।

इस हादसे में सिर्फ एक यात्री रमेश विश्वास कुमार किसी चमत्कार से जिंदा बचा। बाकी 241 लोगों की मौत की खबर ने पूरे देश को झकझोर दिया। हालाँकि कई रिपोर्ट्स में दावा है कि बचने वालों की संख्या 2 है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, हादसा दोपहर करीब 1:38 बजे हुआ। फ्लाइट बोइंग 787 ड्रीमलाइनर थी, जिसका रजिस्ट्रेशन नंबर VT-ANB था। एयरपोर्ट से उड़ान भरने के कुछ ही सेकंड बाद पायलट ने एयर ट्रैफिक कंट्रोल को ‘मेडे’ कॉल भेजी। ये कॉल तब दी जाती है, जब विमान में कोई बहुत बड़ी तकनीकी खराबी हो और जान का खतरा हो। लेकिन इसके बाद विमान से संपर्क टूट गया। विमान सिर्फ 625 फीट की ऊँचाई तक पहुँचा था और फिर अचानक नीचे आ गिरा।

प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि विमान हवा में डगमगाया और फिर जोरदार धमाके के साथ क्रैश हो गया। मेघाणी नगर में जहाँ विमान गिरा, वहाँ की इमारतें हिल गईं। आसपास के लोग दौड़े, लेकिन आग और धुएँ ने सबकुछ तबाह कर दिया। हादसे के समय मेडिकल कॉलेज में छात्र भोजन कर रहे थे।

हादसे की खबर मिलते ही पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। अहमदाबाद पुलिस कमिश्नर जी.एस. मलिक ने बताया कि अब तक 204 शव बरामद हो चुके हैं। 41 लोग घायल हैं, जिनका सिविल और प्राइवेट अस्पतालों में चल रहा है। मरने वालों की पहचान के लिए DNA टेस्ट किए जा रहे हैं। क्योंकि हादसा इतना भयानक था कि कई शवों को पहचान पाना मुश्किल हो गया है। राहत और बचाव के लिए NDRF, BSF और आर्मी की टीमें दिन-रात लगी हैं।

रैपिड एक्शन फोर्स और CRPF के 100 से ज्यादा जवान मलबा हटाने और लोगों को बचाने में जुटे हैं। दमकल की सात गाड़ियों ने आग पर काबू पाया, लेकिन तब तक बहुत कुछ जलकर खाक हो चुका था।

हादसे में जिंदा बचे इकलौते यात्री रमेश विश्वास कुमार की कहानी किसी फिल्म से कम नहीं। रमेश ने बताया, “विमान में धमाका हुआ, और चारों तरफ आग फैल गई। मुझे कुछ समझ नहीं आया। एंबुलेंस में मुझे अस्पताल लाया गया। मुझे यकीन नहीं होता कि मैं जिंदा हूँ। ये किसी करिश्मे जैसा है।” रमेश का इलाज अहमदाबाद के सिविल अस्पताल में चल रहा है। उनकी हालत नाज़ुक है, लेकिन वो जिंदगी की जंग लड़ रहे हैं। उनकी बातें सुनकर हर कोई हैरान है कि इतने बड़े हादसे में कोई कैसे बच सकता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, विमान में 169 भारतीय, 53 ब्रिटिश, 7 पुर्तगाली और 1 कनाडाई नागरिक सवार थे। हादसे की खबर मिलते ही लोग अपने अपनों की खबर लेने के लिए अस्पतालों की ओर दौड़े। भावना पटेल नाम की एक महिला ने बताया कि उनकी बहन इस फ्लाइट में थी। वो रोते हुए अपनी बहन की हालत जानने की कोशिश कर रही थीं। ऐसे कई परिवार हैं जो अपनों को खोने के गम में डूबे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हादसे पर गहरा दुख जताया। उन्होंने ट्वीट किया, “अहमदाबाद का हादसा दिल दहलाने वाला है। मेरी संवेदनाएँ पीड़ित परिवारों के साथ हैं।” उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह और नागरक उड्डयन मंत्री राम मोहन नायडू से बात की और राहत कार्य तेज करने को कहा। गृहमंत्री अमित शाह शाम के समय हादसे वाली जगह पर भी पहुँचे।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी शोक जताते हुए कहा, “ये हादसा दिल तोड़ने वाला है। पूरा देश पीड़ितों के साथ खड़ा है।”

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घायलों के जल्द ठीक होने की कामना की। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने भी दुख जताया, क्योंकि विमान में कई ब्रिटिश नागरिक सवार थे।

एयर इंडिया ने हादसे की पुष्टि की और हेल्पलाइन नंबर 1800-5691-444 जारी किया। नागरक उड्डयन मंत्रालय ने कंट्रोल रूम बनाया, जिसके नंबर 011-24610843 और 9650391859 हैं।

एयर इंडिया के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने कहा, “हम प्रभावित परिवारों को हर मुमकिन मदद दे रहे हैं।” विमान दुर्घटना जाँच ब्यूरो की टीम हादसे की जाँच के लिए अहमदाबाद पहुँच चुकी है। DGCA के मुताबिक, विमान के दोनों पायलट अनुभवी थे। कप्तान के पास 8,200 घंटे और को-पायलट के पास 1,100 घंटे का उड़ान अनुभव था। लेकिन फिर भी ये हादसा कैसे हुआ, ये सवाल सबके मन में है।

हादसे के तुरंत बाद अहमदाबाद एयरपोर्ट पर सभी उड़ानें रोक दी गई थी, हालाँकि शाम तक सीमित संख्या में उड़ाने फिर से शुरू कर दी गईं। विमान ने दिल्ली से अहमदाबाद के लिए उड़ान भरी थी, और कुछ देर रुकने के बाद लंदन रवाना हुआ था। हादसे की वजह से पूरे इलाके में अफरा-तफरी मची है। मेघाणी नगर के लोग अब भी सदमे में हैं। वहाँ की गलियाँ मलबे और दुख से भरी पड़ी हैं।

ये हादसा भारत के लिए एक बहुत बड़ा झटका है। विजय रूपाणी जैसे बड़े नेता का जाना और 241 लोगों की मौत ने हर किसी को स्तब्ध कर दिया। गुजरात ही नहीं, पूरी दुनिया में इसकी चर्चा हो रही है। लोग सोशल मीडिया पर शोक जता रहे हैं। बीजेपी के गुजरात अध्यक्ष सीआर पाटिल ने भी रूपाणी के निधन की पुष्टि की और कहा कि ये पार्टी के लिए बड़ा नुकसान है।

अब सबकी नजरें जाँच पर टिकी हैं। आखिर इतना बड़ा हादसा हुआ कैसे? क्या तकनीकी खराबी थी या कोई और वजह? इन सवालों के जवाब मिलने में वक्त लगेगा। लेकिन इस हादसे ने एक बार फिर बता दिया कि जिंदगी कितनी अनिश्चित है। जो लोग सुबह अपने घरों से निकले, उन्हें क्या पता था कि वो कभी लौटकर नहीं आएँगे। पूरा देश इस दुख में पीड़ित परिवारों के साथ खड़ा है। और उम्मीद है कि रमेश विश्वास जैसे लोग जिंदगी की इस जंग को जीत जाएँगे।

दुनिया भर में ‘चौधरी’ बनते हैं डोनाल्ड ट्रंप, करते हैं सब जगह ‘सुलह-समझौता’ करवाने के दावे… लेकिन नहीं बुझा पा रहे अब खुद के देश में लगी आग: हफ़्तों से जल रहा लॉस एंजिल्स

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प खुद को दुनिया में सबसे ताकतवर पद पर मानते हैं और खुद को शांति का दूत बताने के लिए बड़े स्तर पर प्रचार करते हैं। वे यह दावा करते हैं कि वे युद्ध में उलझे देशों के बीच शांति ला सकते हैं और बातचीत के ज़रिए विवाद सुलझा सकते हैं।

लेकिन लॉस एंजिल्स में हो रही हिंसा ने उनके इस दावे पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शहर में तनाव और आगजनी जारी है, भले ही ट्रम्प प्रशासन ने नेशनल गार्ड के सैनिक तैनात कर दिए हैं।

ट्रम्प यह कह सकते हैं कि कैलिफोर्निया में डेमोक्रेटिक पार्टी की सरकार है, जहाँ गवर्नर और मेयर दोनों डेमोक्रेट हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि हालात काबू में लाने में संघीय सरकार की भी नाकामी साफ दिख रही है।

हफ्ते के अंत में लॉस एंजिल्स की सड़कों पर प्रदर्शनकारियों की भारी भीड़ उमड़ पड़ी, जब संघीय एजेंसियों ने इमिग्रेशन छापों में दर्जनों लोगों को गिरफ्तार किया। भीड़ को कंट्रोल करने के लिए पुलिस ने रबर की गोलियाँ और आँसू गैस का इस्तेमाल किया, लेकिन प्रदर्शन और हिंसा बढ़ती गई।

हजारों लोगों ने सड़कों को जाम कर दिया और कुछ ने गाड़ियों में आग लगा दी। ये विरोध केवल शहर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि कॉम्पटन और पैरामाउंट जैसे आस-पास के इलाकों में भी फैल गया।

6 जून को दोपहर में हल्के तनाव से शुरू हुआ ये विरोध जल्दी ही हिंसक हो गया। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पत्थर, बोतलें और पटाखे फेंके। आंदोलनकारी और संघीय अधिकारी इस स्थिति के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।

स्थिति बिगड़ने पर राष्ट्रपति ट्रम्प ने 7 जून की शाम को 2000 नेशनल गार्ड सैनिकों को तैनात करने का आदेश दिया।

सैन फ्रांसिस्को में (8 जून 2025) को इमिग्रेशन सर्विसेज बिल्डिंग के बाहर विरोध प्रदर्शन हुआ, जिसमें लगभग 60 लोगों को गिरफ्तार किया गया। इनमें कुछ की उम्र 18 साल से कम थी। इसी दौरान रिपोर्टिंग के दौरान ऑस्ट्रेलिया के चैनल नाइन न्यूज़ के लिए काम कर रही अमेरिकी पत्रकार लॉरेन टोमासी को पुलिस की रबर की गोली लग गई। इस गोली से वह बुरी तरह घायल हो गईं।

कैलिफोर्निया नेशनल गार्ड  में (8 जून 2025) को करीब 2000 सैनिकों ने लॉस एंजिल्स में एंट्री की। यह फैसला राष्ट्रपति ट्रम्प ने राज्यपाल की अनुमति के बिना लिया, जो 1965  के बाद पहली बार हुआ। हालाँकि इतनी बड़ी कार्रवाई के बावजूद हालात में कोई तुरंत सुधार नहीं हुआ।

कैलिफोर्निया के गवर्नर गेविन न्यूज़ॉम और कई अन्य स्थानीय नेताओं ने इस कदम की कड़ी आलोचना की। न्यूज़ॉम ने ट्रम्प को ‘तानाशाह’ कहा और कहा कि यह तैनाती कोई ज़रूरी ज़रूरत पूरी करने के लिए नहीं, बल्कि एक नया संकट खड़ा करने के लिए की गई थी। उन्होंने इसे ‘जानबूझकर भड़काऊ’ बताया, जिससे स्थिति और बिगड़ सकती है।

न्यूज़ॉम के कार्यालय ने ट्रम्प प्रशासन को एक औपचारिक पत्र भेजकर सैनिकों को वापस बुलाने की माँग भी की। ट्रम्प भले ही खुद को दुनिया में कहीं भी शांति लाने वाला नेता बताते हैं, लेकिन वे कैलिफोर्निया में राज्य सरकार के साथ मिलकर शांति लाने में नाकाम रहे।

लॉस एंजिल्स की मेयर करेन बास, जो खुद डेमोक्रेट हैं, उन्होंने हिंसक प्रदर्शनकारियों की निंदा की, लेकिन साथ ही ट्रम्प प्रशासन पर भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि नेशनल गार्ड को तैनात करके ट्रम्प ने डर फैलाया, जिसने हालात को और खराब कर दिया।

ट्रम्प ने कैलिफोर्निया के अधिकारियों के साथ मिलकर शांति कायम करने की कोशिश करने के बजाय कहा, “अगर गवर्नर गेविन न्यूज़ॉम और मेयर करेन बास अपना काम नहीं कर सकते, तो संघीय सरकार खुद दंगों और लूटपाट को उस तरीके से संभालेगी जैसा उसे किया जाना चाहिए।”

रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने बताया कि कैंप पेंडलटन में मौजूद मरीन हाई अलर्ट पर हैं। अगर लॉस एंजिल्स में हिंसा जारी रहती है, तो पेंटागन वहाँ एक्टिव-ड्यूटी सैनिक भेजने के लिए तैयार है। यूएस नॉर्दर्न कमांड के मुताबिक, लगभग 500 मरीन किसी भी समय तैनाती के लिए तैयार हैं।

दिलचस्प बात यह है कि जब लॉस एंजिल्स में हालात बिगड़ते जा रहे हैं, तो ट्रम्प अपने ही देश के लोगों से शांति और समझदारी से बात नहीं कर पा रहे हैं। वे खुद को अक्सर दुनिया भर में शांति लाने वाला नेता बताते हैं, लेकिन अपने देश में संकट से निपटने के लिए उन्होंने बड़ी ताकत का इस्तेमाल करने में कोई झिझक नहीं दिखाई।

इसके अलावा, उनके अधिकारियों ने हालात सुधारने के लिए और भी सख्त कदम उठाने की चेतावनी दी है, जबकि वे अक्सर दूसरे देशों को शांतिपूर्ण बातचीत का सुझाव देते हैं।

भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता के दावे

भारत ने 7 मई 2025 को ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ शुरू किया, जो 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी हमले के जवाब में किया गया था। इस ऑपरेशन में भारत ने पाकिस्तान के 9 अलग-अलग इलाकों में आतंकी ठिकानों को नष्ट किया।

जब पाकिस्तान ने सीमा पर नागरिक इलाकों को निशाना बनाने की कोशिश की, तो भारत ने जवाब में उसके एयरबेस, लड़ाकू विमान और एक AWACS (एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम) विमान पर भी हमला किया।

पाकिस्तान के सैन्य संचालन महानिदेशक (DGMO) ने 7 मई की शाम में भारत को आधिकारिक संदेश भेजकर शत्रुता खत्म करने की अपील की। इसके बाद, पाकिस्तान के अनुरोध पर भारत और पाकिस्तान ने 10 मई को दोपहर 3:35 बजे DGMO स्तर की बैठक कर युद्धविराम पर बातचीत की।

फिर भी ट्रम्प और उनके प्रशासन ने इस समझौते का श्रेय खुद को दिया। उन्होंने कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच युद्धविराम उनकी मध्यस्थता की वजह से संभव हो सका।

ट्रम्प ने 10 मई को ट्रुथ सोशल पर लिखा, “अमेरिका की मध्यस्थता में एक लंबी रात की बातचीत के बाद यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि भारत और पाकिस्तान तुरंत और पूरी तरह युद्धविराम पर सहमत हो गए हैं। दोनों देशों को समझदारी और बेहतरीन खुफिया जानकारी के इस्तेमाल के लिए बधाई। इस मामले पर ध्यान देने के लिए धन्यवाद।”

ट्रंप ने दावा किया कि भारत और पाकिस्तान को युद्धविराम के लिए राजी करने के पीछे उन्हीं का दबाव था। उन्होंने कहा कि उन्होंने दोनों देशों को व्यापार रोकने की धमकी दी थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को एक ‘अच्छे डिनर’ के लिए भी बुलाया था, ताकि बातचीत हो सके। ट्रंप ने खुद को शांति का मसीहा बताने में कोई कमी नहीं छोड़ी।

पाकिस्तान ने उनके इन बयानों का स्वागत किया, लेकिन भारत ने साफ तौर पर इन दावों से इनकार किया और कहा कि ट्रंप का इस समझौते में कोई योगदान नहीं था।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि पाकिस्तान के साथ तनाव के दौरान वाशिंगटन और नई दिल्ली के वरिष्ठ नेताओं के बीच बातचीत जरूर हुई थी, लेकिन उसमें व्यापार का कोई ज़िक्र नहीं था। उन्होंने साफ कहा कि पाकिस्तान को पीछे हटने के लिए किसी बाहरी मदद की नहीं, बल्कि भारत की सैन्य ताकत की वजह से मजबूर होना पड़ा।

इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन ने भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता की कहानी इसलिए गढ़ी, ताकि वह अपने ऊँचे व्यापार शुल्कों को सही ठहरा सके और इसे एक कूटनीतिक सफलता के रूप में पेश कर सके।

हालाँकि अमेरिका की एक अदालत ने ट्रंप के इन दावों को खारिज कर दिया, जिससे उनके प्रशासन को बड़ा नुकसान हुआ।

रूस-यूक्रेन युद्ध पर ट्रम्प का पलटवार

ट्रम्प, जो अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर बातें करने के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने अपने राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान बार-बार दावा किया कि अगर वे फिर से राष्ट्रपति बने तो रूस और यूक्रेन के बीच का युद्ध आसानी से खत्म कर सकते हैं।

फॉक्स न्यूज के होस्ट सीन हैनिटी से बातचीत में ट्रम्प ने कहा, “यह एक बहुत ही आसान बातचीत हो सकती है, लेकिन मैं अभी नहीं बताऊँगा कि वो कैसे होगी, क्योंकि फिर वह काम नहीं करेगी।”

ट्रम्प ने मई 2023 में एक टाउनहॉल में कहा, “अगर मैं व्हाइट हाउस वापस गया, तो 24 घंटे के भीतर यह युद्ध खत्म कर दूँगा। लोग मर रहे हैं, रूसी और यूक्रेनी दोनों। मैं चाहता हूँ कि वे मरना बंद करें और मैं यह कर सकता हूँ।”

पिछले साल अगस्त में नेशनल गार्ड कॉन्फ्रेंस में ट्रम्प ने कहा, “मैं राष्ट्रपति चुनाव जीतने के तुरंत बाद, ओवल ऑफिस में पहुँचने से पहले ही रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा भयानक युद्ध खत्म कर दूँगा। मैं इसे बहुत जल्दी सुलझा लूँगा।”

उन्होंने आगे कहा, “मैं नहीं चाहता कि आप लोग (अमेरिकी सैनिक) वहाँ जाएँ।”

फरवरी में ट्रम्प ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर ज़ेलेंस्की पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि ज़ेलेंस्की बिना चुनाव के ‘तानाशाह’ की तरह काम कर रहे हैं और उन्हें चेतावनी दी कि अगर वे जल्दी कदम नहीं उठाते तो उनका देश खत्म हो सकता है।

ट्रम्प ने यह भी दावा किया कि वे रूस के साथ युद्ध खत्म करने के लिए सफल बातचीत कर रहे हैं और यह काम सिर्फ वही और उनका प्रशासन कर सकता है।

ओवल ऑफिस में ज़ेलेंस्की के साथ ट्रम्प की बैठक तनावपूर्ण रही और लगभग पूरी तरह विफल हो गई। ट्रम्प ने यूक्रेन को दी जा रही सैन्य सहायता अस्थायी रूप से रोक दी थी। उन्होंने ज़ेलेंस्की पर युद्ध को लंबा करने का आरोप भी लगाया और रूस द्वारा कीव पर हुए जानलेवा हमलों की आलोचना करते हुए खुद को दुनिया में शांति लाने वाला सबसे ताकतवर नेता दिखाने की कोशिश की।

हालांकि, ट्रम्प का दावा है कि वह रूस-यूक्रेन युद्ध जल्दी खत्म कर सकते हैं, ज्यादा समय तक नहीं टिक पाया। दोनों देशों के रिश्ते और भी खराब हो गए हैं।

मार्च में एक इंटरव्यू के दौरान ट्रम्प ने अपने पहले के बयान पर पीछे हटते हुए कहा, “जब मैंने यह कहा था तो मैं थोड़ा मज़ाक कर रहा था। मेरा मतलब था कि मैं इस युद्ध को खत्म करना चाहता हूँ और मुझे लगता है कि मैं ऐसा कर पाऊँगा।”

इस बीच, शांति की जगह हालात और बिगड़ गए। यूक्रेन ने एक बड़े ऑपरेशन में 117 ड्रोन का इस्तेमाल कर रूस के 34% रणनीतिक क्रूज मिसाइल वाहकों पर हमला किया। इसके जवाब में रूस ने भी घातक हमले किए, जिससे युद्ध और तेज़ हो गया।

पिछले महीने ट्रम्प ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से दो घंटे से ज्यादा बातचीत की, लेकिन वे उन्हें युद्धविराम के लिए राज़ी नहीं कर सके।

ट्रम्प ने माना कि यह बातचीत उम्मीद से कहीं ज्यादा मुश्किल रही। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म करने का उनका वादा अब तक पूरा नहीं हो पाया है। ट्रम्प ने यहाँ तक कहा कि उन्हें लगता है कि पुतिन यूक्रेन के हालात पर ‘पूरा नियंत्रण’ लेने की कोशिश कर रहे हैं।

ट्रम्प गाजा में शांति लाने में विफल रहे

ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत गाजा में चल रहे इजरायल हमास संघर्ष को सुलझाने की कोशिश से की। उन्होंने कुछ शुरुआती सफलता भी पाई, लेकिन इस क्षेत्र में स्थायी शांति अब भी दूर की बात है।

ट्रम्प के दूत स्टीव विटकॉफ ने बाइडेन प्रशासन के मध्य पूर्व सलाहकार ब्रेट मैकगर्क के साथ मिलकर हमास और इजरायली नेताओं को एक अस्थायी युद्धविराम समझौते पर राज़ी किया। यह समझौता ट्रम्प के शपथ ग्रहण से एक दिन पहले लागू हुआ।

इस समझौते के तहत गाजा में बंधक बनाए गए 33 लोगों और इजरायल की जेलों में बंद लगभग 2,000 फिलिस्तीनी कैदियों को रिहा किया गया। लेकिन मार्च में यह युद्धविराम टूट गया क्योंकि दोनों पक्ष बाकी 59 बंधकों की रिहाई पर सहमत नहीं हो सके। इनमें से आधे से ज्यादा को इजरायली अधिकारी मृत मानते हैं, जिससे लड़ाई फिर से शुरू हो गई।

स्थिति अब भी गंभीर बनी हुई है। इजरायल ने गाजा को दी जाने वाली सभी सहायता रोक दी है और हमास पर आरोप लगाया है कि वह इस मदद को अपने फायदे के लिए चुरा रहा है।

ट्रम्प की कोशिशें तनाव कम करने के बजाय इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को हैरान कर गईं। नेतन्याहू ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करना चाहते हैं और अमेरिका की मदद से ईरान के सेंट्रीफ्यूज और अन्य परमाणु ठिकानों पर बमबारी करना चाहते हैं।

वहीं, ट्रम्प युद्ध रोकना चाहते हैं और खुद को ‘शांति दूत’ के रूप में दिखाना चाहते हैं। इसलिए वो ईरान के साथ बातचीत शुरू करना चाहते हैं। इसके अलावा, सीरिया को लेकर भी ट्रम्प और नेतन्याहू के बीच मतभेद हो सकते हैं।

ट्रम्प ने एक योजना पेश की थी जिसमें गाजा और आसपास के इलाकों को ‘मध्य पूर्व का रिवेरा’ बनाने की बात कही गई थी। इस योजना के तहत करीब 20 लाख फिलिस्तीनियों को अन्य क्षेत्रों में बसाने का प्रस्ताव था।

हालाँकि अरब देशों के विरोध के बाद ट्रम्प ने कहा कि वह इस योजना को सिर्फ एक ‘सिफारिश’ के तौर पर पेश करेंगे, लेकिन इसे जबरन लागू नहीं करेंगे।

इसके जवाब में अरब लीग के नेताओं ने एक वैकल्पिक प्रस्ताव तैयार करने के लिए बैठक की, लेकिन अमेरिका और इजरायल ने उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया, खासकर गाजा के भविष्य के शासन से जुड़े मुद्दों को लेकर।

ट्रम्प ने दावा किया कि “कोई भी फिलिस्तीनियों को गाजा से बाहर नहीं निकाल रहा है।” वहीं, अरब देशों के विदेश मंत्रियों ने कहा कि वे अब भी अमेरिकी दूतों के साथ मिलकर मिस्र की शांति योजना पर बातचीत कर रहे हैं।

ट्रम्प ने पत्रकारों से कहा कि जब वे पोप के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए रोम जा रहे थे, तब उन्होंने गाजा में भोजन और दवाइयाँ पहुँचाने के लिए इज़रायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू पर “काफी दबाव” डाला। लेकिन जब उनसे पूछा गया कि नेतन्याहू ने इस पर क्या जवाब दिया, तो उन्होंने कुछ नहीं कहा।

इस बीच, इज़रायल ने गाजा में अपना सैन्य अभियान जारी रखा है। राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रवक्ता ने कहा, “हम सभी बचे हुए बंधकों की रिहाई सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हमास ने शांति की बजाय हिंसा का रास्ता चुना है।

राष्ट्रपति ट्रम्प ने साफ किया है कि जब तक हमास बंधकों को रिहा नहीं करता और हथियार नहीं डालता, तब तक उसे कड़ा जवाब मिलता रहेगा”। प्रवक्ता ने इस बात से इनकार किया कि ट्रम्प गाजा संकट का हल निकालने में नाकाम रहे हैं।

अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना, उसमें भी फेल

ट्रम्प के कार्यकाल के दौरान व्हाइट हाउस और खुद ट्रम्प ने यह दिखाने की कोशिश की कि अमेरिका की विदेश नीति पर मजबूत पकड़ है और वे दुश्मन देशों को भी बातचीत की मेज पर ला सकते हैं। उन्होंने खुद को वैश्विक शांति के समर्थक के रूप में पेश किया।

लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग रही। ट्रम्प कई बार अपने बड़े-बड़े वादों को पूरा करने में नाकाम रहे। उन्होंने अपने समर्थकों के बीच लोकप्रिय बने रहने के लिए कई बार झूठे दावे भी किए।

दुनिया भर में हालात लगातार बिगड़ते गए, जबकि ट्रम्प बार-बार इन समस्याओं को सुलझाने का वादा करते रहे। सबसे अहम बात यह है कि वे दुनिया में शांति लाने की बात करते हैं, लेकिन अपने ही देश में शांति कायम नहीं कर सके।

ट्रम्प का प्रदर्शन देश और विदेश दोनों जगह कमजोर रहा है, जबकि उनके दावे बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए हैं। विडंबना यह है कि वे अपने ही देश में विपक्षी पार्टियों से बातचीत तक नहीं कर पाते, लेकिन फिर भी दावा करते हैं कि वे दुनिया के दुश्मन देशों को एक साथ ला सकते हैं।

ट्रम्प खुद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नोबेल शांति पुरस्कार के योग्य नेता के रूप में दिखाना चाहते हैं। लेकिन जब उन्हें अपने देश के अंदर छोटी-मोटी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, तो वे शांतिपूर्ण समाधान की जगह टकराव और विवाद का रास्ता अपनाते हैं।

सिर्फ रजिस्ट्री से नहीं बन जाते प्रॉपर्टी के मालिक, सुप्रीम कोर्ट ने दिया फैसला: कहा- अदालत की मान्यता और बाकी भी जरूरी

सुप्रीम कोर्ट ने मालिकाना हक को लेकर बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट का कहना है कि आप सिर्फ इसलिए संपत्ति के मालिक नही हो सकते हैं, क्योंकि आपने उसे पंजीकृत करा लिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि सिर्फ़ संपत्ति का पंजीकरण ही स्वामित्व की पुष्टि नहीं करता। कानूनी दस्तावेज़ और अदालती मान्यता ही वास्तविक स्वामित्व अधिकार साबित करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

भारत में प्रॉपर्टी के बारे में लोगों की सोच बदलने वाले एक बड़े फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ तौर पर कहा है कि किसी प्रॉपर्टी को रजिस्टर करवाने का मतलब यह नहीं है कि आप कानूनी तौर पर उसके मालिक हैं।

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?

भारत में प्रोपर्टी पर मालिकाना हक के लिए केवल रजिस्ट्री ही जरूरी नहीं है, बल्कि कई दूसरे दस्तावेजों की आवश्यकता है। कोर्ट ने कहा है कि संपत्ति का रजिस्ट्रेशन केवल व्यक्ति के दावे का समर्थन कर सकता है। लेकिन, ये संपत्ति के कानूनी कब्जे के लिए पर्याप्त नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की पूरे देश में चर्चा शुरू हो गई है। उम्मीद की जा रही है कि इससे प्रॉपर्टी खरीदने वालों, कानूनी पेशेवरों और रियल एस्टेट डेवलपर्स पर बड़ा असर पड़ेगा।

मामले की सुनवाई जस्टिस अभय एस. ओका की बेंच ने की। फैसले में साफ कहा गया है, “केवल पंजीकरण से पूर्ण स्वामित्व अधिकार स्थापित नहीं होता।” अदालत ने यह भी कहा कि यह साबित करने के लिए कि आप संपत्ति के मालिक हैं, आपके पास उचित और पूरे दस्तावेज होने चाहिए।

फैसले में कोर्ट ने कहा, “स्वामित्व को निर्णायक रूप से साबित करने के लिए विस्तृत दस्तावेजों की आवश्यकता होती है।”

आम तौर पर माना जाता है कि अगर आपने अपने नाम पर कोई संपत्ति रजिस्ट्री करवाई है, तो आप कानूनी तौर पर उसके मालिक बन गए।

लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यह सच नहीं है। कोर्ट ने कहा कि पंजीकरण प्रक्रिया का सिर्फ एक चरण है और मालिकाना हक इससे नहीं मिलता। इसका मतलब है संपत्ति का उपयोग, नियंत्रण और बिक्री करने का पूरा कानूनी अधिकार मिलने के लिए दूसरे दस्तावेज जरूरी हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब संपत्ति विवादों की बात आती है, तो अदालतें अभी भी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसलिए भले ही किसी ने संपत्ति पंजीकृत कर ली हो, लेकिन असली मालिक कौन है? इस बारे में अंतिम निर्णय इस बात पर निर्भर करेगा कि अदालत सभी दस्तावेजों और साक्ष्यों को देखने के बाद क्या निर्णय लेती है।

यह निर्णय उन लोगों के लिए खास महत्वपूर्ण है जिन्होने संपत्ति खरीदी है या जिन्हें विरासत या किसी अन्य तरीके से मिली है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का असर

इस फैसले से रियल एस्टेट सेक्टर और कानूनी पेशे में भी बड़े बदलाव आएँगे। बिल्डरों, खरीदारों और वकीलों को अब संपत्ति खरीदते या बेचते समय स्पष्ट कानूनी नियमों का पालन करना होगा। फैसले के बाद अब कानूनी स्वामित्व सिर्फ संपत्ति का पंजीकरण करवाने से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है, इसलिए इससे संपत्ति की कीमतों और संपत्ति की खरीद-बिक्री पर भी असर पड़ सकता है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि संपत्ति के स्वामित्व के लिए उचित दस्तावेजों और संपत्ति पर वास्तविक नियंत्रण दोनों की जरूरी है। यदि किसी और के पास कब्जा है या किसी तरह का विवाद हैं, तो स्वामित्व पर सवाल उठा सकता है, भले ही पंजीकरण के कागजात पूरे हों।

यह निर्णय उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो जमीन या फ्लैट खरीदने, बेचने या विरासत में लेने की योजना बना रहे हैं। यह संपत्ति खरीदने से पहले उचित कानूनी जाँच और पूर्ण कागजी कार्रवाई की आवश्यकता को दर्शाता है।

खरीदारों के लिए यह फैसला एक चेतावनी है। यह उन्हें घर या जमीन खरीदने से पहले उचित पृष्ठभूमि की जाँच करने के लिए कहता है। सिर्फ इसलिए कि संपत्ति पंजीकृत है, इसका मतलब यह नहीं है कि कोई समस्या नहीं है।

खरीदारों को चाहिए कि संपत्ति का कब्जा किसके पास है ये पुष्टि कर लें। साथ ही सुनिश्चित करें कि कोई कानूनी मामला या विवाद नहीं है। ये भी जाँच कर लें कि मालिक के पास वैध दस्तावेज मौजूद हैं।

मालिकाना हक के लिए जरूरी है ये दस्तावेज

बिक्री आलेख या सेल डीड– संपत्ति ट्रांसफर करने के लिए सेल डीड जरूरी होता है। पहली बार किसी भी संपत्ति को खरीदने के लिए भी ये जरूरी है।

मदर डीड– संपत्ति के लेन-देने के लिए मदर डीड जरूरी कानूनी दस्तावेज है।ये मालिकाना हक के इतिहास को दर्शाता है।

बिक्री और खरीद समझौता– किसी भी प्रॉपर्टी की खरीद के लिए बिक्री और खरीद समझौता सबसे जरूरी दस्तावेजों में शामिल है। इसमें खरीदने-बेचने वालों की पूरी जानकारी होती है।

भवन स्वीकृति योजना– किसी भी संपत्ति पर घर बनाने से पहले नगर निगम या अथॉरिटी से इसकी मंजूरी जरूरी है। ये दस्तावेज बेहद जरूरी है।

कब्जा पत्र – ये कानूनी दस्तावेज साबित करता है कि जिसके नाम पर ये पत्र है उसका संपत्ति पर कब्जा होगा। ये संपत्ति ट्रांसफर करने का भी प्रमाण है।

कंप्लीशन सर्टिफिकेट– ये एक ऐसा दस्तावेज है जो साबित करता है कि बिल्डिंग का निर्माण स्थानीय नियमों के मुताबिक किया गया है और स्थानीय निकाय द्वारा पास कर दिया गया है।

खाता प्रमाणपत्र– ये एक रेवेन्यू सर्टिफिकेट है जिसमें प्रॉपर्टी की डिटेल्स होती है। इसमें प्रॉपर्टी का आकार,स्थान और क्षेत्रफल शामिल होता है। ये दस्तावेज प्रॉपर्टी टैक्स का भुगतान करने के लिए जरूरी है।

अलॉटमेंट लेटर– ये एक कानूनी दस्तावेज है जो डेवलपर या सेलर की तरफ से जारी किया जाता है। निर्माणाधीन मकान के लिए ये जरूरी दस्तावेज है।

भार प्रमाण पत्र– संपत्ति पर कोई देनदारी है या नहीं इससे पता चलता है। साथ ही कानूनी विवादों से संपत्ति मुक्त है।

नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट– संपत्ति पर लोन चुका दिया गया है या नहीं। संपत्ति पर कोई देनदारी तो नहीं है। इसका पता चलता है।

पहचान और पते का प्रमाण– अगर कोई संपत्ति खरीदते हैं तो ये सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि उस पते का इस्तेमाल आपकी आईडी यानी आधार कार्ड,पैन कार्ड, पासपोर्ट के लिए हो। एड्रेस प्रूव भी इससे हो सके।

इंदौर में यूसुफ खान ने मुकेश बन हिन्दू युवती को फँसाया, रेप कर बनाया अश्लील वीडियो: हिन्दू कार्यकर्ताओं ने पकड़ा, पिटाई के बाद पुलिस को सौंपा

मध्य प्रदेश के इंदौर शहर के कनाड़िया थाना क्षेत्र से लव जिहाद का मामला सामने आया है, जहाँ यूसुफ खान नाम के एक आरोपित ने अपनी पहचान छिपाकर एक हिंदू युवती को प्रेम जाल में फँसाया, उससे दुष्कर्म किया और धर्म परिवर्तन के लिए दबाव डाला। यूसुफ खान ने खुद को मुकेश बताकर युवती से नजदीकियाँ बढ़ाईं, शादी का झाँसा दिया और फिर उसका शारीरिक शोषण किया।

जब युवती को उसकी असली पहचान का पता चला, तो यूसुफ खान ने उसे धमकियाँ दीं और उसकी निजी तस्वीरें व वीडियो वायरल करने की धमकी दी। इस मामले में कनाड़िया पुलिस ने यूसुफ खान को गिरफ्तार कर लिया है और उसके खिलाफ कई गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया गया है। इस मामले में एफआईआर की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है।

ढाबे पर मुलाकात, फिर पहचान छिपाकर मेल-मिलाप

हिंदू पीड़िता मूल रूप से उज्जैन निवासी है। वो वर्तमान में इंदौर की स्कीम नंबर 78 में एक डॉक्टर के यहाँ नौकरी करती है। उसने पुलिस को बताया कि करीब डेढ़ साल पहले वह अपनी एक सहेली की बर्थडे पार्टी में राउ स्थित एक ढाबे पर गई थी। वहाँ उसकी मुलाकात यूसुफ खान से हुई, जिसने अपना नाम मुकेश बताया। यूसुफ खान ने उससे दोस्ताना व्यवहार किया और अपना फोन नंबर देकर किसी भी मदद के लिए संपर्क करने को कहा। इसके बाद दोनों के बीच फोन पर बातचीत शुरू हुई। यूसुफ खान ने धीरे-धीरे युवती का भरोसा जीत लिया और उसे इंदौर में अलग-अलग जगहों पर कार से घुमाने लगा।

यूसुफ खान ने युवती को अपने फ्लैट पर भी बुलाना शुरू कर दिया। उसने युवती को शादी का प्रस्ताव दिया और कहा कि वह उसका सारा खर्च उठाएगा, इसलिए उसे नौकरी छोड़ देनी चाहिए। यूसुफ खान की बातों में आकर युवती ने उस पर भरोसा कर लिया। इस दौरान यूसुफ खान ने शादी का झाँसा देकर युवती के साथ कई बार शारीरिक संबंध बनाए। युवती को उस समय तक यूसुफ खान की असली पहचान का कोई अंदाजा नहीं था। वो उसके फ्लैट पर भी बेधड़क आता-जाता रहता था।

असली पहचान खुली, तो पैरों तले खिसक गई जमीन

कुछ दिन पहले यूसुफ खान के फ्लैट में एक पार्टी के दौरान युवती को उस पर शक हुआ। पार्टी में यूसुफ खान का एक दोस्त उसे साहिल कहकर बुला रहा था। इससे युवती को संदेह हुआ और उसने चुपके से यूसुफ खान का पर्स चेक किया। पर्स में उसे एक आईडी मिली, जिसमें यूसुफ खान का असली नाम लिखा था। जब युवती ने यूसुफ खान से इस बारे में सवाल किया, तो उसने अपना असली धर्म और पहचान उजागर कर दी। यूसुफ खान ने युवती पर निकाह के लिए धर्म परिवर्तन करने का दबाव डालना शुरू कर दिया।

जब युवती ने धर्म परिवर्तन से इनकार किया, तो यूसुफ खान ने उसका उत्पीड़न शुरू कर दिया। उसने युवती के साथ मारपीट की और उसकी निजी तस्वीरें व वीडियो वायरल करने की धमकी दी। यूसुफ खान ने युवती को डराने के लिए उसका मानसिक और शारीरिक शोषण किया। वह बार-बार युवती को धमकाता रहा कि अगर उसने उसकी बात नहीं मानी, तो वह उसकी जिंदगी बर्बाद कर देगा।

हिंदूवादी संगठन की मदद से पकड़ा गया यूसुफ खान

यूसुफ खान की धमकियों से डरकर युवती ने हिंदूवादी संगठन से संपर्क किया। उसने अपनी आपबीती संगठन के कार्यकर्ताओं मानसिंह राजावत और अंकित विश्वकर्मा को बताई। इसके बाद हिंदूवादी संगठन के कार्यकर्ताओं ने युवती के साथ मिलकर एक योजना बनाई। मानसिंह राजावत, अंकित विश्वकर्मा, कपिल कौशल, उदय सिलावट और राहुल पुरी जैसे कार्यकर्ता यूसुफ खान के फ्लैट पर पहुँचे। वहाँ उन्होंने यूसुफ खान की जमकर पीटा और फिर उसे कनाड़िया पुलिस के हवाले कर दिया।

यूसुफ खान पर नए धर्मांतरण रोधी कानून के तहत केस

कनाड़िया थाना पुलिस ने 25 वर्षीय युवती की शिकायत के आधार पर यूसुफ खान के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 (दुष्कर्म), 323 (मारपीट), 506 (धमकी) और मध्य प्रदेश धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है। पुलिस ने यूसुफ खान को गिरफ्तार कर लिया और उससे पूछताछ शुरू कर दी है। पुलिस इस मामले की गहन जाँच कर रही है ताकि यूसुफ खान के अन्य अपराधों का भी पता लगाया जा सके।

स्थानीय लोगों की मानें तो यूसुफ उज्जैन में 3 ओयो होटल्स का संचालन करता है। उसके पास कई ट्रैवेल एजेंसियों से जुड़ी गाड़ियाँ आती-जाती रहती थी। जिनपर वो लड़कियों को घुमाता है। अलग-अलग गाड़ियों का इस्तेमाल उसने इस लड़की के मामले में भी किया।

यह मामला मध्य प्रदेश में बढ़ते धर्मांतरण और दुष्कर्म के मामलों की गंभीरता को दर्शाता है। मध्य प्रदेश सरकार ने 2021 में धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम लागू किया था, जिसमें जबरन धर्म परिवर्तन के लिए सजा का प्रावधान है। इस कानून के तहत दोषी को 10 साल तक की सजा और एक लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। इस मामले में यूसुफ खान पर भी इस अधिनियम के तहत कार्रवाई की जा रही है।

बता दें कि इंदौर में मुस्लिम युवकों द्वारा बाकायदा गिरोह बनाकर हिंदू लड़कियों को निशाना बनाने की भी रिपोर्ट्स सामने आई थी। यहाँ हालिया मामले में एक मुस्लिम युवक ने शूटिंग सेंटर की आड़ में हिंदू लड़कियों को अपना शिकार बनाया। उसके खिलाफ आधा दर्जन से अधिक एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं। एमपी पुलिस ने लव जिहाद की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए एसआईटी का गठन किया है।

‘माँ कामाख्या मंदिर में होती है नरबलि’, एंकर के बयान पर CNN न्यूज18 ने माँगी माफी… कहा- क्लिप भी हटा रहे: राजा रघुवंशी की हत्या से जोड़ी थी फर्जी बात

सीएनएन न्यूज़18 ने गुरुवार (12 जून 2025) को अपने एक एंकर के ऑन एयर कही गई बातों को लेकर माफी माँगी है। एंकर आकांक्षा स्वरूप ने कामाख्या मंदिर में मानव बलि का दावा किया था और राजा रघुवंशी की हत्या को उससे जोड़ा था। चैनल ने इसे पूरी तरह से गलत बताया और कहा कि ऐसा करने का उनका कोई इरादा नहीं था।

सीएनएन न्यूज़18 ने एक्स पर पोस्ट किया, “कल प्रसारित एक शो में, राजा रघुवंशी हत्याकांड के संदर्भ में, सीएनएन न्यूज़18 के एंकर ने असम के पवित्र कामाख्या मंदिर में ‘नर बलि’ का गलत उल्लेख किया। यह पूरी तरह से गलत निर्णय था। हमारा ऐसा कोई इरादा नहीं था। हम उन सभी लोगों से माफी माँगते हैं, जिनकी धार्मिक भावनाएँ इन टिप्पणियों के बाद आहत हुई हैं। इसके अलावा हमने अपने सभी प्लेटफॉर्म से इस तरह के किसी भी क्लिप का संदर्भ हटा दिया है। हमें इन टिप्पणियों पर गहरा खेद है और हम इसके लिए माफी माँगते हैं।”

बुधवार को राजा रघुवंशी की बहन श्रास्ती रघुवंशी से बात करते हुए एंकर आकांक्षा स्वरूप ने विवादित टिप्पणी की। श्रास्ती रघुवंशी ने उनसे बात करते हुए दावा किया कि यह नर बलि का मामला भी हो सकता है, क्योंकि हनीमून कपल मेघालय जाने से पहले गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर गए थे। राजा की हत्या उनकी पत्नी सोनम ने मध्य प्रदेश के तीन सहयोगियों की मदद से की थी।

आकांक्षा स्वरूप ने कहा, “ऐसा कहा जा रहा है कि यह मानव बलि का मामला हो सकता है। हमने राजा रघुवंशी के भाई से बात की है, जिन्होंने कहा कि इसे नर बलि कहा जा सकता है क्योंकि उन्हें पीछे से चाकू मारा गया था और उनके गले में माला भी थी। वे कामाख्या गए थे, जहां मानव बलि दी जाती है।”

फिर एंकर ने पूछा, “तो क्या ये बातें संदेह पैदा करती हैं कि यह तांत्रिक हत्या हो सकती है?” इसका जवाब देते हुए राजा की बहन ने कहा कि वह इस पर कुछ नहीं कह सकती। हालाँकि उन्होंने कहा कि उन्हें पता है कि कामाख्या में नर बलि दी जाती है।

यह CNN News18 की एंकर आकांक्षा स्वरूप द्वारा लगाया गया एक पूरी तरह से झूठा दावा है। कामाख्या में कोई मानव बलि नहीं दी जाती है। हाँ, शक्ति पीठ पर पशु बलि दी जाती है। यहाँ दुर्गा पूजा के दौरान कई तरह के जानवरों और पक्षियों की बलि दी जाती है।

पश्चिम बंगाल में शिव मंदिर पर हमले के खिलाफ BJP ने किया प्रदर्शन, मुस्लिम भीड़ ने किया था हिन्दू-पुलिस पर पथराव: MLA अग्निमित्रा पॉल बोलीं- ममता सरकार जानती थी 2000 जिहादियों के सड़क पर उतरने की बात

पश्चिम बंगाल में मुस्लिम भीड़ ने मंगलवार (10 जून 2025) को शिव मंदिर पर हमला किया। विरोध में बीजेपी नेताओं ने गुरुवार (12 जून 2025) को पश्चिम बंगाल विधानसभा के बाहर विरोध प्रदर्शन किया है। बीजेपी नेताओं ने माँग की है कि इस मामले पर तुरंत चर्चा होनी चाहिए। इसी बीच पुलिस ने हिसंक झड़प को अवैध निर्माण से जुड़ा बताया है और 40 लोगों को गिरफ्तार किया है।

मामले में पुलिस ने 40 लोगों को गिरफ्तार कर स्थिति को नियंत्रण करने की सूचना दी है। पुलिस का कहना है कि वह मामले की जाँच कर रही है कि क्या यह सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने की साज़िश थी।

बीजेपी नेता अग्निमित्रा पॉल ने पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा और शिव मंदिर में तोड़फोड़ पर ममता बनर्जी सरकार से सवाल पूछा है। पॉल ने पूछा कि यह सब क्यों हुआ? सरकार को पहले से पता क्यों नहीं था कि 2000 लोग सड़कों पर आ सकते हैं? अग्निमित्रा ने सीधा आरोप लगाया कि ये सब ममता बनर्जी करवा रही हैं।

पॉल का कहना है कि ममता बनर्जी सिर्फ 33% वोटों की चिंता करती हैं और उन्हें इस बात की परवाह नहीं है कि हिंदू या पुलिसकर्मी मरें। पॉल ने ममता बनर्जी को ‘मुहम्मद यूनुस’ से तुलना की है, जो सिर्फ एक खास वर्ग की चिंता करता है।

पॉल ने बताया कि विधानसभा में इस मुद्दे पर चर्चा की माँग की (जिसे ‘एडजर्नमेंट मोशन’ कहते हैं) गई थी, लेकिन स्पीकर ने अनुमति नहीं दी क्योंकि यह सत्तारूढ़ पार्टी टीएमसी के खिलाफ जाता है।

मामला क्या है?

घटना दक्षिण 24 परगना के बज-बज इलाके में, रवींद्र नगर पुलिस स्टेशन के पास महेशतला में हुई। वहाँ के हिन्दू समुदाय ने देखा कि एक पुराने शिव मंदिर के पास मौजूद तालाब पर कुछ लोग कब्ज़ा कर रहे हैं।

हिंदू समुदाय ने अधिकारियों से शिकायत भी की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। मंगलवार (10 जून 2025) को, कुछ मुस्लिमों ने मंदिर की ज़मीन पर फल की दुकानें लगाने की कोशिश की। हिन्दुओं ने रोका तो विवाद शुरू हो गया, जो देखते ही देखते हिंसक झड़प में बदल गया।

मंदिर तोड़ा, पुलिस पर हमला!

इसके बाद मुस्लिम भीड़ ने शिव मंदिर में तोड़फोड़ कर दी और मंदिर पर पत्थर और ईंटें फेंकीं। जब पुलिस मौके पर पहुँची, तो मुस्लिम भीड़ ने उन पर भी हमला कर दिया। सड़कों पर पत्थर, ईंटें और टूटी हुई चीज़ें बिखरी पड़ी थीं।

बीजेपी नेता सुवेंदु अधिकारी ने बताया कि भीड़ ने सिर्फ मंदिर ही नहीं, बल्कि पवित्र तुलसी मंच, आस-पास की हिन्दू दुकानों और घरों पर भी हमला किया।

पुलिस बेबस, बीजेपी आग बबूला

सुवेंदु अधिकारी ने आरोप लगाया कि रवींद्र नगर पुलिस स्टेशन से कुछ ही दूरी पर यह सब हुआ, लेकिन पुलिस ने भीड़ को रोकने के लिए कुछ नहीं किया। सुवेंदु अधिकारी ने सोशल मीडिया पर वीडियो भी पोस्ट किए, जिनमें भारी भीड़ को हिंसा करते देखा जा सकता है, और पास में पुलिस स्टेशन भी दिख रहा है।

पत्थरबाज़ी में कई पुलिसकर्मी घायल हुए, जिनमें एक महिला कॉन्स्टेबल भी शामिल है। पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े और अतिरिक्त बल बुलाया, लेकिन भीड़ लगातार हमला करती रही। हालात इतने बिगड़ गए कि पुलिस को कुछ देर के लिए पीछे हटना पड़ा।

फिलहाल, हालात पर काबू पाने के लिए कोलकाता से भारी संख्या में पुलिस बल भेजा गया है, लेकिन अब भी कुछ जगहों पर पत्थरबाज़ी की खबरें हैं।

ईरान पर हमला करने वाला है इजरायल, इराक में अमेरिकी ठिकानों पर अटैक से मिलेगा जवाब?: US ने अपने अधिकारी बुलाए वापस, रिपोर्ट में बताया- मिडल-ईस्ट में हो सकता एक और युद्ध

मध्य पूर्व में युद्ध की आशंका है। आने वाले दिनों में इजरायल ईरान के खिलाफ मिशन शुरू करने की तैयारी कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक इजरायल ने अमेरिकी अधिकारियों को ईरान पर हमला करने की अपनी योजना के बारे में बता दिया है। इसके बाद अमेरिकी विदेश विभाग ने बुधवार (11 जून) को अमेरिकी नागरिकों और अधिकारियों को बढ़ते क्षेत्रीय तनाव के बीच इराक छोड़ने की सलाह दी है।

अमेरिका को आशंका है कि ईरान इराक में अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाकर इजरायल की कार्रवाई का जवाब दे सकता है। रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका मध्य पूर्वी क्षेत्र में ईरान की मारक क्षमता वाले अपने दूतावासों और ठिकानों से अपने गैर-जरूरी कर्मचारियों को वापस बुलाने की योजना बना रहा है। यूएई, बहरीन और कुवैत में अमेरिका के सैन्य ठिकानों को कथित तौर पर रेड अलर्ट पर रखा गया है।

अमेरिकी सरकार ने क्षेत्र में सैन्य परिवार के सदस्यों को स्वेच्छा से क्षेत्र छोड़ने के लिए अधिकृत किया है। बुधवार को कैनेडी सेंटर में बोलते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने मीडिया को सूचित किया कि अमेरिकी नागरिकों को मध्य पूर्व छोड़ने की सलाह दी गई है। ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका नहीं चाहता कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करे।

इस बीच, ईरान के रक्षा मंत्री अजीज नसीर जादेह ने बुधवार को क्षेत्र में अमेरिकी ठिकानों पर ईरानी हमले की संभावना जाहिर करते हुए कहा है, “अगर हम पर कोई संघर्ष थोपा जाता है, तो इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स मेजबान देशों में सभी अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाएगा।”

अमेरिका-ईरान परमाणु समझौता

मध्य पूर्व में अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ कथित तौर पर ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर छठे दौर की वार्ता के लिए अगले कुछ दिनों में ईरानी अधिकारियों से मिलने की योजना बना रहे हैं। दोनों देशों ने अप्रैल 2024 से पाँच दौर की चर्चा की है ताकि एक ऐसे समझौते पर पहुँच सकें जो 2015 के ईरान परमाणु समझौते की जगह ले सके। ट्रम्प ने 2018 में अपने पहले कार्यकाल के दौरान रद्द कर दिया था। ईरान परमाणु समझौता या संयुक्त व्यापक कार्य योजना (JCPOA) ईरान द्वारा अमेरिकी सुरक्षा परिषद (संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, चीन, रूस और जर्मनी) और यूरोपीय संघ के पाँच स्थायी सदस्यों के साथ हस्ताक्षरित एक समझौता था, जिसने प्रतिबंधों को हटाने के बदले में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर प्रतिबंध लगा दिए थे।

राष्ट्रपति ट्रंप को अमेरिका और ईरान के बीच चर्चाओं को लेकर कम उम्मीदें हैं। उन्होंने दोनों देशों के बीच परमाणु समझौते की संभावना की कमी जताई। ट्रंप ने कहा, “मुझे नहीं पता। मुझे ऐसा लगता था, और मैं इसके बारे में कम आश्वस्त होता जा रहा हूँ। ऐसा लगता है कि वे देरी कर रहे हैं, और मुझे लगता है कि यह शर्म की बात है, लेकिन मैं अब कुछ महीने पहले की तुलना में कम आश्वस्त हूँ। उनके साथ कुछ हुआ है, लेकिन मैं किसी समझौते के होने को लेकर बहुत कम आश्वस्त हूँ।”

अमेरिका-ईरान वार्ता खटाई में है। साथ ही ईरान द्वारा परमाणु समझौते के लिए अमेरिका के प्रस्ताव को अस्वीकार करने और यूरेनियम को रिफाइन करने के अपने अधिकार को मान्यता देने की माँग के कारण इजरायल और ईरान के बीच तनाव बढ़ गया है।

अमेरिका और इजरायल ईरान के परमाणु कार्यक्रम का विरोध कर रहे हैं

अमेरिका और इजराइल दोनों ही ईरान के परमाणु कार्यक्रम का विरोध कर रहे हैं। इससे यहूदी राष्ट्र को खतरा बढ़ सकता है। परमाणु हथियार विकसित करने से ईरान की सैन्य क्षमताएँ बढ़ेंगी और साथ ही मध्य पूर्व में उसका प्रभाव भी बढ़ेगा। इसे रोकने के लिए इजरायल पूरी ताकत लगा रहा है। हालाँकि ईरान किसी भी परमाणु हथियार को विकसित करने से इनकार करता रहा है।

अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौते की कोई संभावना न होने के कारण, अब इजरायल ईरान के परमाणु प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने की योजना बना सकता है ताकि उसके परमाणु कार्यक्रम की प्रगति की संभावनाओं को खत्म किया जा सके। हालाँकि, चूँकि ईरान की परमाणु सुविधाएँ भूमिगत हैं, इसलिए इजरायल को उन्हें ढूँढने और निशाना बनाने के लिए अमेरिका की सहायता की आवश्यकता होगी।

ईरान- इजरायल विवाद का इतिहास

ईरान और इजराइल के बीच मौजूदा स्थिति को देखते हुए यह मानना ​​मुश्किल है कि दोनों देश कभी एक-दूसरे के काफी करीब थे। ईरान में 1979 की क्रांति के बाद इजराइल-ईरान संबंधों में गिरावट आई, जिसके परिणामस्वरूप देश में शासन बदल गया। क्रांति ने मोहम्मद रजा शाह पहलवी की जगह ली, जो पश्चिम की ओर झुकाव रखते थे।

हालाँकि अयातुल्ला रूहोल्लाह खोमैनी ने ईरान को इस्लामी गणराज्य घोषित किया। खोमैनी सरकार ने इजराइल और अमेरिका दोनों का खुलकर विरोध किया। वर्तमान ईरान सरकार इजराइल के अस्तित्व को मान्यता नहीं देता है। ईरान के दूसरे सर्वोच्च नेता, अयातुल्ला अली खामेनेई ने इजराइल को एक ‘कैंसरयुक्त ट्यूमर’ बताया। उन्होंने कहा, “निस्संदेह उखाड़कर नष्ट कर दिया जाएगा”।

क्षेत्र में इजराइल और अमेरिका के प्रभाव को चुनौती देने की अपनी व्यापक रणनीति के तहत ईरान फिलिस्तीनी आतंकवादी समूहों का समर्थन कर रहा है। 2009 के खोमैनी ने कथित तौर पर कहा था कि उनका शासन किसी भी देश या समूह का समर्थन करेगा जो इजराइल से लड़ता है। ईरान इजरायल को निशाना बनाने के लिए आतंकवादी समूहों का समर्थन करके मध्य पूर्व में अघोषित तौर पर शामिल रहा है।

पति की शारीरिक कमजोरी का मजाक नहीं उड़ा सकती पत्नी, उसे नहीं कह सकती ‘केम्पा-निखट्टू’: ओडिशा हाई कोर्ट ने बताया ‘मानसिक क्रूरता’, तलाक का आधार माना

ओडिशा हाई कोर्ट का कहना है कि अगर पत्नी अपने पति की शारीरिक अक्षमता या दुर्बलता का मजाक बनाती है या उसे ‘निखट्टू’ या ‘केम्पा’ जैसे अपमानजनक शब्दों का उपयोग करती है तो इस आधार पर पति अपनी पत्नी से तलाक ले सकता है। पति के लिए इस तरह के शब्द मानसिक क्रूरता से कम नहीं हैं।

फैमिली कोर्ट के तलाक के फैसले को बरकरार रखते हुए जस्टिस बिभु प्रसाद राउत्रे और जस्टिस चित्तरंजन दास की बेंच ने ये कहा-

“किसी व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह सामान्य तौर पर भी दूसरे व्यक्ति का सम्मान करे। जब पति-पत्नी के संबंधों की बात आती है तो यह अपेक्षित होता है कि पत्नी अपने पति का सम्मान करे,फिर चाहे पति को कोई शारीरिक दुर्बलता ही क्यों न हो। यहाँ यह मामला है कि पत्नी ने पति की शारीरिक दुर्बलता को लेकर उस पर आरोप लगाए और उस पर टिप्पणियाँ की। यह निश्चित रूप से मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है।”

क्या है मामला

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, तलाक के लिए कोर्ट पहुँचे पति-पत्नी का विवाह हिंदू रीति रिवाजों के अनुसार 1 जून 2016 को हुआ था। पति का आरोप है कि शादी के बाद से ही पत्नी उसकी शारीरिक दुर्बलता को लेकर ताने कसती रहती थी।

सितंबर 2016 में पत्नी उसका घर छोड़कर चली गई। मान-मनौव्वल के बाद जनवरी 2017 में वह वापस आई। हालाँकि पति का आरोप है कि वापसी के बाद भी पत्नी का रवैया नहीं बदला और वह लगातार उस पर ताने कसती रही। इसके चलते पति-पत्नी के बीच काफी झगड़े हुए। इसके बाद मार्च 2018 में पत्नी ने घर छोड़ कर चली गई और पति और ससुराल वालों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए (क्रूरता) के तहत आपराधिक मामला दर्ज करा दिया।

इसके बाद पति ने अप्रैल 2019 में तलाक की अर्जी डाली। फैमिली कोर्ट के जज जस्टिस पुरी ने पाँच मुद्दों पर फैसला सुनाया। इसमें पत्नी की ओर से पति पर की गई क्रूरता की बात भी शामिल की गई। सुनवाई के बाद कोर्ट ने तलाक की मंजूरी दे दी।

पत्नी एलीमनी (स्थायी भरण-पोषण) और स्त्रीधन संपत्तियों के वापस न मिलने से परेशान थी। इसके चलते पत्नी ने इस आदेश को चुनौती देते हुए वैवाहिक अपील (मेट्रीमोनियल अपील) दायर कर दी। कोर्ट ने पत्नी को फैमिली कोर्ट का रुख करने की आजादी भी दी है क्योंकि पति-पत्नी की आय का आकलन किए बिना स्थायी भरण-पोषण देने का कोई आधार नहीं था।

कोर्ट ने क्या कहा

हाई कोर्ट ने माना कि पति शारीरिक रूप से विकलांग व्यक्ति है। पति ने इस बात की गवाही दी थी कि पत्नी उसकी शारीरिक अक्षमता को लेकर उस पर ‘केम्पा’ और ‘निखट्टू’ जैसी अपमानजनक टिप्पणियाँ करती थी। केम्पा एक उड़िया शब्द है जिसका अर्थ है- एक हाथ से दिव्यांग होना। इस पर सुनवाई के दौरान भी पत्नी इन आरोपों को गलत साबित नहीं कर पाई। इसके अलावा पति की ओर से आए एक अन्य गवाह ने भी इस बात की पुष्टि की।

सुनवाई के दौरान पत्नी ने यह भी माना कि उसने पति और ससुराल वालों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करवाया। मामले पर फैसला सुनाने से पहले कोर्ट ने कहा कि क्रूरता में मानसिक उत्पीड़न भी शामिल होता है। जस्टिस राउत्रे ने फैसले में कहा कि वैवाहिक संबंधों में पति-पत्नी से एक-दूसरे का सम्मान और समर्थन करने की अपेक्षा की जाती है।

कोर्ट का कहना है कि पत्नी अगर पति की शारीरिक दुर्बलता पर अपमानजनक टिप्पणियाँ करती है तो ये पति के लिए मानसिक उत्पीड़न का कारण बनता है। इन शब्दों उपयोग पत्नी की ईर्ष्या भरी सोच और अनादर बताता है।

कहलाती है ‘एक्टिविस्ट’, पर फोकस PR स्टंट पर: ग्रेटा थनबर्ग को पीड़ितों के हितों की नहीं चिंता, गाजा जाकर यहूदी विरोधी भावना को भुनाने की फिराक में थी

जब ग्रेटा थनबर्ग का नाम आता है, लोग उन्हें जलवायु परिवर्तन की बड़ी आवाज़ मानते हैं। लेकिन हाल के सालों में उनकी हरकतों पर सवाल उठने लगे हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वे असली समस्याओं को सुलझाने की बजाय सिर्फ़ सुर्खियों में रहने के लिए अलग-अलग आंदोलनों में कूद पड़ती हैं।

पहले ग्रेटा जलवायु परिवर्तन पर भाषण देती थीं, सरकारों से सवाल करती थीं और पर्यावरण के लिए सख्त कदम उठाने की माँग करती थीं। लेकिन अब वे फिलिस्तीन के मुद्दे पर बोलने लगी हैं। वे ‘फ्री फिलिस्तीन’ आंदोलन में शामिल हो गई हैं और फिलिस्तीनी स्कार्फ़ (केफियाह) पहनकर प्रदर्शन करती दिखती हैं।

आलोचक कहते हैं कि ग्रेटा की यह सक्रियता अब समस्याएँ हल करने से ज़्यादा खुद को मशहूर रखने का तरीका बन गई है। कुछ मीडिया उन्हें ‘न्याय की लड़ाई’ लड़ने वाली बताता है, लेकिन कई लोग इसे सोची-समझी रणनीति मानते हैं, जिसमें पीड़ितों की तकलीफ़ से ज़्यादा ग्रेटा की अपनी ब्रांडिंग पर ध्यान होता है।

सवाल यह है कि क्या ग्रेटा वाकई सामाजिक और पर्यावरणीय न्याय के लिए लड़ रही हैं, या यह सब सिर्फ़ प्रचार बनकर रह गया है?

गाजा के लिए मदद या प्रचार स्टंट: ग्रेटा और उनकी ‘सेल्फी यॉट’

ग्रेटा अब एक नए मुद्दे पर सक्रिय हैं। उन्होंने गाजा में इजरायल की घेराबंदी को चुनौती देने के लिए ‘फ्रीडम फ्लोटिला’ नाम के अभियान में हिस्सा लिया। वे ‘मैडलीन’ नाम की एक नाव पर सवार हुईं, जो फ्रीडम फ्लोटिला गठबंधन का हिस्सा थी। इस अभियान का मकसद गाजा तक मानवीय सहायता पहुँचाना था। लेकिन इस कदम पर भी सवाल उठे कि क्या यह पीड़ितों की मदद का प्रयास है या फिर प्रचार का एक और नाटक।

आलोचक कहते हैं कि ग्रेटा ऐसे गंभीर मुद्दों में शामिल तो हो जाती हैं, लेकिन उनका मकसद समस्या हल करना नहीं, बल्कि चर्चा में बने रहना है।

ग्रेटा और 11 अन्य कार्यकर्ताओं को ले जा रही ‘मैडलीन’ नाव को इजरायली सेना ने रास्ते में रोक लिया। इस नाव पर ब्रिटिश झंडा था और यह फ्रीडम फ्लोटिला गठबंधन का हिस्सा थी। इस मिशन का मकसद गाजा में मदद पहुँचाना था।

नाव पर फ्रांस की यूरोपीय सांसद रीमा हसन भी सवार थीं। यह नाव इटली के सिसिली से चली थी और गाजा जाने की कोशिश कर रही थी।

इसके बाद बहस शुरू हो गई कि क्या ऐसे अभियान वाकई मदद करते हैं या सिर्फ़ दिखावे के लिए होते हैं।

एक इजरायली अधिकारी ने इस मिशन को ‘सेल्फी फ्लोटिला’ कहा और बताया कि उनका मकसद हमास पर हर तरफ से दबाव बनाना है। वे गाजा में ऐसी किसी मदद को नहीं पहुँचने देना चाहते, जो उनके नियंत्रण में न हो। उन्होंने कहा कि अगर इस नाव को जाने दिया गया, तो और लोग भी ऐसी कोशिश करेंगे, जिससे इजरायल के खिलाफ उकसावे की गतिविधियाँ बढ़ सकती हैं। इजरायल ऐसी किसी स्वतंत्र सहायता को इजाज़त देने को तैयार नहीं, खासकर जब वह उनके नियंत्रण से बाहर हो।

गाजा यात्रा की पहले से तैयारी, सोशल मीडिया पर लगाया अपहरण का आरोप

ग्रेटा को अच्छी तरह पता था कि गाजा की यह यात्रा उन्हें दुनिया भर में सुर्खियाँ और सहानुभूति दिला सकती है, खासकर जब गाजा में लोग भयंकर संकट झेल रहे हैं। जब इजरायली सेना ने उनकी नाव रोकी, तो ग्रेटा ने तुरंत सोशल मीडिया पर एक पहले से रिकॉर्ड किया वीडियो डाला। इसमें उन्होंने आरोप लगाया कि इजरायली सेना ने अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में उनका अपहरण किया।

कई लोग कहते हैं कि ग्रेटा ने इस पूरे अभियान को पहले से प्रचार की तरह तैयार किया था, ताकि नाव रुकने पर वे खुद को पीड़ित दिखाकर लोगों की सहानुभूति बटोर सकें।

जब ग्रेटा ने अपहरण का आरोप लगाया, तो यह खबर तुरंत सुर्खियों में आ गई। वामपंथी मीडिया ने इसे इजरायल के खिलाफ हमले का मौका बना लिया। लेकिन कई लोगों ने इस दावे पर सवाल उठाए। उनका कहना है कि इजरायल के पास और भी बड़े मुद्दे हैं, उन्हें 22 साल की ग्रेटा का अपहरण करने की ज़रूरत नहीं, जो खुद को संकटग्रस्त लोगों की वैश्विक नायिका बताती हैं।

7 अक्टूबर को हमास ने सैकड़ों इजरायली और विदेशी लोगों को अगवा किया था, जिनमें बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएँ शामिल थीं। कई लोग मारे गए, कई को बेरहमी से सताया गया, और कुछ आज भी उनकी हिरासत में हैं। इसके मुकाबले, ग्रेटा को सिर्फ़ हिरासत में लिया गया और बाद में सुरक्षित छोड़ दिया गया। उन्हें न चोट लगी, न भूखा रखा गया, न सताया गया।

आलोचक कहते हैं कि ग्रेटा का अपहरण का दावा न सिर्फ़ नाटक है, बल्कि उन असली पीड़ितों का मज़ाक उड़ाने जैसा है, जो आतंकवाद का शिकार हुए।

रुक नहीं रहा ग्रेटा का नाटक

हिरासत में लिए जाने के बाद भी ग्रेटा ने नाटक जारी रखा। उन्होंने अपने समर्थकों से कहा कि वे स्वीडन सरकार पर दबाव डालें ताकि उन्हें छुड़ाया जाए। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनकी नाव पर कोई उत्तेजक पदार्थ छिड़का गया। आलोचक कहते हैं कि इस पूरे अभियान में गाजा के असली संकट से ज़्यादा ग्रेटा की कैमरे के सामने मौजूदगी पर ध्यान था।

यह अभियान मानवीय सहायता से ज्यादा एक सोची-समझी प्रचार योजना की तरह दिखा, जिसमें ग्रेटा खुद को एक वीर कार्यकर्ता के रूप में पेश करने की कोशिश करती दिखीं, जबकि गाजा की असली तकलीफें कहीं पीछे छूट गईं।

ग्रेटा और 11 अन्य कार्यकर्ताओं की नाव में जो मदद का सामान था, जैसे बेबी फॉर्मूला और चावल, वह सिर्फ़ दिखावे के लिए था। गाजा के बड़े संकट के सामने यह सामान बहुत कम था।

दरअसल, उनकी पूरी नाव में जो राहत सामग्री थी, वह एक ट्रक से भी कम थी। वहीं, सिर्फ पिछले दो हफ्तों में ही इजरायल ने लगभग 1200 सहायता ट्रक गाजा में भेजे हैं। इससे साफ होता है कि थनबर्ग और उनके साथियों की मदद असल में जरूरतमंदों के लिए पर्याप्त नहीं थी। आलोचकों का कहना है कि ग्रेटा का यह सहायता मिशन फिलिस्तीनियों की मदद करने से ज्यादा, खुद को चर्चा में लाने की कोशिश थी।

गाजा इस समय बेहद गंभीर संकट से गुजर रहा है। 7 अक्टूबर को हमास के हमले के बाद इजरायल की जवाबी कार्रवाई में हजारों लोग मारे जा चुके हैं, 90% से ज्यादा आबादी विस्थापित हो चुकी है और वहाँ लोग लगातार अंतर्राष्ट्रीय मदद पर निर्भर हैं। ऐसे में ग्रेटा की हीरो बनने की कोशिश असली पीड़ितों की तकलीफ़ के सामने दिखावटी लगती है।

ग्रेटा थनबर्ग अक्सर पर्यावरण और बढ़ते कार्बन उत्सर्जन पर चिंता जताती हैं, लेकिन जब बात हमास की आती है, तो वे चुप्पी साध लेती हैं।

ग्रेटा अक्सर पर्यावरण और कार्बन उत्सर्जन की बात करती हैं, लेकिन हमास पर चुप रहती हैं। 7 अक्टूबर 2023 को जब हमास ने इजरायल पर हमला किया, तो हजारों मिसाइलें दागी गईं, जिससे पर्यावरण को भारी नुकसान हुआ। लेकिन ग्रेटा ने न तो इस पर्यावरणीय विनाश की निंदा की, न ही इजरायली नागरिकों की हत्या, बलात्कार या अपहरण पर कुछ कहा।

आलोचक कहते हैं कि यह नई बात नहीं। कई फिलिस्तीन समर्थक कार्यकर्ताओं ने भी हमास के अत्याचार दिखाने वाली डॉक्यूमेंट्री देखने से मना कर दिया, जिसमें इजरायली महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों पर हुए ज़ुल्म दिखाए गए थे। इजरायली अधिकारियों को उम्मीद थी कि ग्रेटा इन पीड़ितों के लिए बोलेंगी, लेकिन उनका रवैया सिर्फ़ एक पक्ष की तरफ झुका रहा।

‘फ्री फिलिस्तीन’ के नारे लगाना, हमास को मानवीय दिखाना और इजरायल को विलेन बताना पश्चिमी देशों में अब ट्रेंड बन गया है। ग्रेटा भी इसी ट्रेंड का हिस्सा लगती हैं। उन्होंने कभी यमन, सूडान जैसे संघर्ष क्षेत्रों के लिए फ्लोटिला नहीं भेजा, जहाँ रोज़ लोग मारे जा रहे हैं। लेकिन गाजा के लिए ज़रूर गईं, क्योंकि उन्हें पता है कि बिना यहूदियों के मीडिया में खबर नहीं बनती।

चाहे जलवायु संकट पर उनके भाषण हों या गाजा की फ्लोटिला यात्रा, ग्रेटा हमेशा ऐसे नाटकीय कदम उठाती हैं, जो उनकी ‘इंसाफ की लड़ाई’ वाली छवि को मज़बूत करते हैं। लेकिन आलोचक कहते हैं कि वे जिन मुद्दों को उठाती हैं, उनकी गहराई और जटिलता को नज़रअंदाज़ कर देती हैं। उनका रवैया समाधान की ओर कम और प्रचार व ट्रेंड के पीछे भागने जैसा ज़्यादा है, जहाँ इंसाफ़ से ज़्यादा कैमरे की नज़र में रहना ज़रूरी है।

‘ग्रीन एनर्जी’ नाव और ग्रेटा का ट्रान्साटलांटिक पीआर स्टंट

ग्रेटा ने एक बार ‘मालिजिया’ नाम की रेसिंग नाव से अटलांटिक महासागर पार किया, जिसे ‘ज़ीरो कार्बन’ बताया गया। वे न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र के जलवायु सम्मेलन में जा रही थीं और इसे पर्यावरण के लिए कदम कहा। लेकिन सच यह था कि नाव पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल नहीं थी। इसे चलाने में सहायक जहाज़ इस्तेमाल हुए, जो जीवाश्म ईंधन से चलते थे। नाव वापस लाने के लिए चालक दल के कुछ लोग हवाई जहाज़ से लौटे, जिससे कार्बन उत्सर्जन हुआ और ‘जीरो कार्बन‘ का दावा कमज़ोर पड़ गया।

यह यात्रा पर्यावरण बचाने से ज़्यादा ग्रेटा को ‘धरती की रक्षक’ दिखाने के लिए थी। वामपंथी मीडिया ने इसे खूब बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया और उन्हें पर्यावरण आइकन बना दिया। लेकिन इस कवायद का कार्बन उत्सर्जन पर कोई असर नहीं पड़ा और यह जागरूकता से ज़्यादा प्रचार बनकर रह गया।

इलेक्ट्रिक कार और कोबाल्ट खनन का नाटक

दिसंबर 2019 में ग्रेटा मैड्रिड के जलवायु शिखर सम्मेलन में इलेक्ट्रिक कार (Seat Mii Electric) से पहुँचीं। वे हवाई यात्रा से बचती हैं ताकि कार्बन उत्सर्जन कम हो, इसलिए नाव और इलेक्ट्रिक कार का इस्तेमाल करती हैं।

लेकिन यहाँ विरोधाभास है। ग्रेटा ख़ुद कह चुकी हैं कि इलेक्ट्रिक कार की बैटरियों में इस्तेमाल होने वाला कोबाल्ट ज़्यादातर कांगो से आता है, जहाँ बच्चों से जबरन मज़दूरी कराकर इसे निकाला जाता है। फिर भी, उनकी यह यात्रा उनके अपने बयान से मेल नहीं खाती।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पर्यावरण बचाने के नाम पर दूसरे गंभीर मानवाधिकार मुद्दों की अनदेखी करना सही है? ग्रेटा की ये यात्रा उनके उस बयान से मेल नहीं खाती, जिसमें उन्होंने कोबाल्ट खनन में बच्चों के शोषण को लेकर चिंता जताई थी। आलोचकों का मानना है कि यह एक और उदाहरण है जहाँ वे अपने दिखावे के एजेंडे के तहत अपनी ही बातों को नजरअंदाज कर देती हैं।

ग्रेटा का भारत में किसान आंदोलन का समर्थन

ग्रेटा ने भारत में कृषि कानूनों के खिलाफ़ प्रदर्शन कर रहे किसानों का समर्थन किया। उन्होंने एक्स पर पोस्ट किया कि यह आंदोलन ‘दमनकारी नीतियों’ के खिलाफ़ लड़ाई है। लेकिन यह आंदोलन ज़्यादातर उन किसानों की माँगों से जुड़ा था, जो धान की खेती और उसकी सब्सिडी को बचाना चाहते थे। यह कुछ राजनीतिक लॉबियों से भी जुड़ा था, जो अनाज मंडियों (APMC मंडियों) पर कब्ज़ा रखती हैं। बाद में यह आंदोलन खालिस्तानी तत्वों और हिंसा की वजह से भी बदनाम हुआ।

आलोचक कहते हैं कि ग्रेटा ने मुद्दे की गहराई समझे बिना एक पक्ष ले लिया, जिससे प्रचार और राजनीतिक एजेंडे को बढ़ावा मिला, न कि किसानों की असली समस्याओं का हल।

ऑपइंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब में धान की खेती ने ज़मीन की गुणवत्ता बिगाड़ दी और भूजल लगभग ख़त्म हो गया। धान को बहुत पानी चाहिए, दालों या तिलहन से 10 गुना ज़्यादा। एक किलो धान के लिए 500-600 लीटर पानी लगता है। फसल कटने के बाद पराली जलाने से भारी प्रदूषण होता है। मोदी सरकार के नए कृषि कानून इन समस्याओं को हल करने के लिए थे, जिसमें पराली जलाना अपराध था।

लेकिन जब इन मुद्दों पर सही बात कहने की जरूरत थी, तब ग्रेटा थनबर्ग, जो खुद को जलवायु कार्यकर्ता कहती हैं, ने इन पर्यावरणीय समस्याओं को नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने भारत के किसानों के समर्थन में वही बातें कहीं, जो उन्हें टूलकिट में बताई गई थीं। यानी उन्होंने स्थानीय समस्याओं को समझे बिना, एक तय स्क्रिप्ट पर काम किया और सिर्फ प्रचार के लिए पक्ष लिया।

ग्रेटा की सक्रियता में नाटक ज़्यादा और समाधान कम है। फिर भी, वामपंथी मीडिया ने उन्हें ‘पर्यावरण की देवी‘ बना दिया। मीडिया उन्हें निडर और न्याय की लड़ाई लड़ने वाली बताता है, लेकिन उनके बड़े भाषणों या गतिविधियों का कोई ठोस असर नहीं हुआ। न 2018 का स्कूल स्ट्राइक, न 2019 का ‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई?’ भाषण, और न ही गाजा मिशन ने कोई बड़ा बदलाव लाया या कार्बन उत्सर्जन कम किया।

वे सुर्खियों में रहती हैं, लेकिन उनके काम से न पर्यावरण सुधरा, न ज़रूरतमंदों की हालत। फिर भी वामपंथियों का खेमा उनके नाटक को नज़रअंदाज़ कर उन्हें हीरो बनाने में जुटा रहता है।