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राम मंदिर पर फैसला सुनाने वाले SC के रिटायर जज के घर पर बम से हमला: प्रयागराज में क्राइम ब्रांच सहित पुलिस टीम ने शुरू की जाँच

अयोध्या के श्रीराम मंदिर मामले में फैसला देने वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ में शामिल रहे रिटायर जज न्यायमूर्ति अशोक भूषण के प्रयागराज स्थित पैतृक निवास के बाहर सोमवार को बम फेंकने की घटना सामने आई है। सूचना मिलने के बाद घटनास्थल पर कई थानों की पुलिस फोर्स पहुँच गई। वहीं, आईजी केपी सिंह का कहना है कि यह बमबाजी की नहीं, बल्कि पटाखा छोड़ने की घटना है और जिन लोगों ने ऐसा किया है।

न्‍यायमूर्ति अशोक भूषण का कर्नलगंज थाना क्षेत्र के हाशिमपुर रोड पर पैतृक मकान है। इस मकान में उनके भाई और इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल भूषण रहते हैं, जबकि न्यायमूर्ति अशोक भूषण कैंट थाना क्षेत्र के अशाेक नगर में अपने परिवार के साथ रहते हैं।

लोगों का कहना है कि सोमवार की शाम बाइक सवार बदमाशों ने हाशिमपुर स्थित आवास के बाहर एक-एक कर दो बम फोड़कर फरार हो गए। सूचना के बाद पुलिस के उच्च अधिकारी फारेंसिक व बीडीएस टीम के साथ पहुँच गए और मामले की छानबीन करने लगे। अधिकारियों ने आरोपियों को पकड़ने के लिए क्राइम ब्रांच को सतर्क किया और सर्विलांस लगाने का निर्देश दिया।

जस्टिस अशोक भूषण ने बताया कि घर की रंगाई-पुताई का काम चल रहा था, इसलिए सीसीटीवी कैमरे का डीवीआर बंद था। हालाँकि, पुलिस सड़क पर लगे सीसीटीवी कैमरे के फुटेज के आधार पर जाँच कर रही है। वहीं, पड़ोसियों का कहना है कि पिछले कई दिनों से हाशिमपुर रोड पर अराजक तत्वों को घूमते हुए देखा गया है और वे नशेड़ियों जैसे दिख रहे थे।

आइजी केपी सिंह का कहना है कि आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए पुलिस टीम लगाई गई है। उन्होंने कहा कि कर्नलगंज थाने में तेज रफ्तार बाइक चलाने और विस्फोटक फेंकने के मामले में मुकदमा दर्ज किया गया है। क्राइम ब्रांच और सर्विलांस ने आरोपियों की पहचान कर ली है।

केपी सिंह के अनुसार, जस्टिस भूषण के आवास के सामने चाय की दुकान है और ठेला लगाने वाले का आरोपितों से पारिवारिक विवाद है। उसी विवाद में आरोपितों ने चाय वाले को धमकाने के लिए दहशत फैलाने की कोशिश की।

‘नहीं कहूँगा पाकिस्तान मुर्दाबाद’: ताँगे वाला नूर आलम, 20-22 साल से घूम रहा लखनऊ में, Video वायरल

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आतंकी गिरोह की धमकियों के कारण सारे शहर में हाई अलर्ट है। ऐसे में बुधवार (अगस्त 25, 2021) को एक वीडियो वायरल हुई है। इस वीडियो में एक तांगा वाला रायबरेली रोड तेलीबाग में स्थित लोहे की दुकान के बाहर अपना तांगा लेकर खड़ा है जिसमें एक ऐसा झंडा बना हुआ है, जिसे वायरल वीडियो में पाकिस्तान का बताया जा रहा है। वहीं एक यूट्यूब वीडियो के मुताबिक बताया जा रहा है कि ये निशान पाकिस्तानी झंडे का नहीं है बल्कि ये कर्बला का निशान है

कथित तौर पर वीडियो 3-4 दिन पुराना है। इसमें देख सकते हैं कि वीडियो में तांगा चालक अपना नाम नूर आलम बताता है और खुद को राजीव नगर घुसियाना का निवासी कहता है। उसके मुताबिक उसके तांगे पर बना झंडा 20-22 साल से बना हुआ है। लेकिन उसने कभी इन पर ध्यान नहीं दिया। आलम के अनुसार, उसे लगा कि उसके तांगे पर पेंट है।

वीडियो में सुन सकते हैं कि हिंदुस्तान की सड़कों पर ‘पाकिस्तानी झंडे’ (वायरल वीडियो में नूर आलम से बहस करने वाला शख्स यही बताता है) वाला तांगा देख युवक भड़क जाता है और तांगे वाले से हिंदुस्तान जिंदाबाद कहने की बात करता है। इस पर नूर आलम ‘हिंदुस्तान जिंदाबाद’, ‘जय हिंद’ और ‘भारत माता की जय’ कहता है। बाद में युवक उसे ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ का नारा लगाने को कहता है। लेकिन नूर ऐसा कहने से मना कर देता है। इस बीच तांगा चालक का दूसरा साथी रशीद आता है और युवक से बहस करता है।

दोनों पाकिस्तान मुर्दाबाद कहने से मना कर देते हैं। वह कहते हैं कि यदि कहेंगे तो हिंदुस्तान-पाकिस्तान जिंदाबाद कहेंगे। वायरल वीडियो के संबंध में अधिकारियों के आदेश पर इंस्पेक्टर पीजीआइ आनंद शुक्ला ने तांगा चालक को थाने बुलवाया। जब तांगा चालक से पूछताछ की गई तो वह माफी माँगने लगा। माफी माँगने और दोबारा ऐसी गलती न करने की हिदायत देकर उसके तांगे पर बने झंडों को पेंट करके उसे छोड़ दिया गया।

थाने से निकलने के बाद नूर आलम ने रास्ते में तिरंगा झंडा खरीदा। तिरंगे को सलाम कर तांगे में लगाया और फिर हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे लगाते हुए घर चला गया। इस वाकये की वीडियो भी दैनिक जागरण के डिप्टी न्यूज एडिटर पवन तिवारी ने शेयर की है।

तस्वीर साभार: NewsBook24

‘धर्मस्थलों की रक्षा के लिए खड़ा RSS है असली हिंदुत्व’: अर्नब गोस्वामी ने लिबरल-सेक्युलर पाखंडियों को जमकर धोया, देखें वीडियो

हिंदू धर्म और हिंदुत्व के खिलाफ चल रही वैश्विक साजिश के बीच रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के संपादक अर्नब गोस्वामी ने अपने शो में अंतरराष्ट्रीय वामपंथियों को वर्तमान में सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ में हिंदुत्व के अर्थ और उसकी प्रासंगिकता को समझाया।

उन्होंने अंतरराष्ट्रीय वामपंथी, भारत के विरोधियों और देश के प्रतिष्ठित बुद्धिजीवियों की साजिश को उजागर करते हुए कहा कि ये लोग हिंदुत्व आंदोलन को बदनाम करने का हर संभव प्रयास कर रहे हैं। अर्नब गोस्वामी ने इसके बाद वास्तव में हिंदुत्व का क्या मतलब है इसके बारे में विस्तार से बताया।

हिंदुत्व की अवधारणा को लेकर उनकी कम समझ पर अर्नब ने करारा प्रहार किया। उन्होंने हिंदुत्व समूहों द्वारा किए गए मानवीय और सामाजिक सेवा कार्यों की एक सूची तैयार की, ताकि यह स्पष्ट किया जा सके कि हिंदुत्व आंदोलन के शब्द और उद्देश्य वास्तव में क्या हासिल करना चाहते हैं।

अपने शो में गोस्वामी ने कहा कि पंजाब में आतंकवादियों से देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले आरएसएस के 21 स्वयंसेवक और पवित्र सिख धर्मस्थलों की रक्षा करने वाला आरएसएस ही असली हिंदुत्व है।

अर्नब गोस्वामी ने आगे समझाते हुए कहा, “जब आरएसएस और 11 अन्य संगठनों ने महाराष्ट्र में कोविड-19 के दौरान राहत कार्य किया और वही आरएसएस अब देश के हर हिस्से में एक मॉडल स्कूल बनाना चाहता है, यही असली हिंदुत्व है।”

आरएसएस जैसे हिंदू संगठनों द्वारा देश भर में 118 कोविड -19 केंद्रों की स्थापना, 287 आइसोलेशन सेंटर और कोविड-19 महामारी के दौरान 4,000 से अधिक प्लाज्मा डोनेशन सेंटर द्वारा किए गए कुछ और राहत कार्यों का हवाला देते हुए इक्का-दुक्का पत्रकार ने वैश्विक स्तर पर हिंदू समूहों और देश में हिंदुत्व आंदोलन को बदनाम करने वाले लिबरलों पर सवाल उठाया।

अपने मंगलवार (24 अगस्त) के शो में अर्नब गोस्वामी ने हिंदू धर्म के खिलाफ वैश्विक साजिश का खुलासा किया और इस बारे में कड़े सवाल किए कि क्या दुनिया भर में हिंदुओं के खिलाफ एक एजेंडा चल रहा है, खासकर अफगानिस्तान में तालिबान के उदय के बाद।

उन्होंने अपने शो में बताया कि कैसे लिबरल हिंदुत्व को खत्म करने के लिए वैश्विक सम्मेलन आयोजित करके हिंदुत्व आंदोलन और तालिबान के बीच समानता लाने की कोशिश कर रहे हैं। शो में इस बात पर भी चर्चा की गई कि कैसे एक लिबरल सेक्युलर द्वारा हिंदुत्व के खिलाफ एक अथक अभियान चलाया गया, जो हिन्दुओं के खिलाफ नफरत को बढ़ा रहा है।

पश्चिम बंगाल में 5 महिला टीचरों ने पिया जहर, ममता सरकार की ‘बहुत कम सैलरी’ है वजह, देखें Video

पश्चिम बंगाल में मंगलवार (अगस्त 24, 2021) को 5 महिला टीचरों ने बिकाश भवन में बने राज्य सरकार के शिक्षा विभाग के हेडक्वार्टर के सामने जहर खाकर जान देने की कोशिश की।

पत्रकार अनिंद्य बनर्जी ने घटना से संबंधित एक वीडियो को अपने ट्विटर पर शेयर किया है। वीडियो में टीचरों को जहर पीने के बाद तड़पती अवस्था में देखा जाता है। उनका कहना है कि उन्हें पढ़ाने के बदले केवल 10 हजार रुपए दिए जाते हैं और इस राशि में गुजर-बसर करना काफी मुश्किल होता जा रहा है।

रिपोर्टों के अनुसार, टीचरों को बिधाननगर पुलिस ने परिसर में प्रवेश करने से मना किया था, जिसके बाद उन्होंने कीटनाशकों का सेवन किया। सभी टीचर्स को एनआरएस और आरजी अस्पतालों में भर्ती कराया गया और बाद में उनके पेट से जहर निकालने की कोशिश की गई। मंगलवार शाम तक सभी की स्थिति स्थिर थी लेकिन फिर भी दर रात तक सबको देख-रेख में रखा गया।

जानकारी के मुताबिक, पाँचों महिला टीचरों की पहचान अनीमा नाथ, छोबी दास, शिखा दास, पुतुल मंडल, जोशुआ टुडु और मंदिरा सरदार के तौर पर हुई है। ये सभी शिक्षक ओइक्यो मुक्ता मंच की सदस्य थीं और शिशु शिक्षा केंद्र (एसएसके) और माध्यमिक शिक्षा केंद्र (एमएसके) के शिक्षकों की सैलरी में वृद्धि, सेवाओं के नियमितीकरण की माँग कर रही थीं। इसके अलावा इनकी एक डिमांड ये भी थी कि ऐसे ट्रांसफर आदेशों को रद्द किया जाए जिनके कारण उन्हें घर से दूर जाने पर मजबूर होना पड़ रहा है।

मंगलवार को ये सभी बिकाश भवन के सामने प्रोटेस्ट कर रही थीं कि तभी उनमें से 4 ने काला पदार्थ पी लिया और जमीन पर गिर गईं। इसके बाद उनके मुँह से झाग आने लगा। पार्श शिक्षक ओइक्यो मंच के संयुक्त संयोजक भगीरथ घोष ने कहा कि राज्य सरकार आंदोलन को नियंत्रित करने के लिए ‘तालिबानी रणनीति’ का इस्तेमाल कर रही है। उनकी माँग है कि इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप किया जाए।

अफगानी अब नहीं जा सकेंगे बाहर, तालिबान ने बंद किए सभी रास्ते: दहशत फैलाने के लिए छोटे बच्चों की भी हुई हत्या, तस्वीरें वायरल

अफगानिस्तान में ​तालिबानियों के कब्जे के बाद से डर का माहौल है। पिछले एक हफ्ते से लोग देश छोड़कर भाग रहे हैं। इस बीच ताबिलान ने काबुल एयरपोर्ट पर पहरा बढ़ा दिया है। एयरपोर्ट जाने के सभी रास्तों पर तालिबानी मौजूद हैं, जो अफगान नागरिकों को एयरपोर्ट तक भी नहीं पहुँचने दे रहे हैं। तालिबान के प्रवक्ता जबीउल्लाह मुजाहिद ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कहा कि उन्होंने एयरपोर्ट तक जाने वाली सभी सड़कें ब्लॉक कर दी हैं। अफगान नागरिक अब एयरपोर्ट तक नहीं जा पाएँगे। सिर्फ विदेशी नागरिकों को ही उस सड़क से एयरपोर्ट तक जाने की इजाजत होगी। 

इस बीच, संयुक्त राष्ट्र (यूएन) ने अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति को लेकर चिंता जाहिर की है। संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि तालिबान पहले से ही अफगानिस्तान में मानवाधिकारों का उल्लघंन कर रहा है। निर्दोष नागरिकों की हत्या कर रहा है। बच्चों को आतंकी संगठन में भर्ती कर रहा है। इसके अलावा उनके द्वारा महिलाओं और मासूम बच्चियों पर जुल्म किए जा रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार मामलों की प्रमुख मिशेल बाशेलेट ने मानवाधिकार परिषद से तालिबान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि तालिबान द्वारा महिलाओं व लड़कियों के साथ बुरा बर्ताव किया जा रहा, उनकी आज़ादी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शिक्षा और रोजगार संबंधी अधिकारों का हनन किया जा रहा है। इनका अन्तरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप पालन करना होगा।

डेली मेल की रिपोर्ट के अनुसार, तालिबानी नेताओं ने भले ही सत्ता में आते ही लोगों को सुरक्षा देने का वादा किया हो, लेकिन उनके पुराने शासन को याद करते हुए कोई भी अफगान नागरिक उन पर विश्वास करने को तैयार नहीं है। तालिबानियों के डर से कई अफगानिस्तानी देश छोड़कर भागने को मजबूर हैं, जिसके चलते काबुल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अराजकता फैल गई है।

तालिबान के आतंक से अफगानिस्तान में अफरा-तफरी का माहौल है। तालिबानी हवाई फायरिंग कर रहे हैं। भगदड़ के दौरान मासूम बच्चों की हत्या कर रहे हैं। अफगानिस्तान के पूर्व आंतरिक मंत्री ने यह दावा किया है। उन्होंने ट्विटर पर कुछ तस्वीरें भी पोस्ट की हैं। पूर्व गृह मंत्री मसूद अंद्राबी ने कहा कि तालिबानी निर्दोष बच्चों की हत्या कर रहे, उन्हें डरा रहे हैं, क्योंकि वे क्रूरता से सत्ता जीतने पर विश्चास रखते हैं।

मसूद अंद्राबी, जिसे मार्च 2021 में अशरफ गनी सरकार द्वारा बर्खास्त कर दिया गया था। उन्होंने एक छोटे बच्चे सहित कई लोगों की चौंकाने वाली तस्वीरें पोस्ट कीं, जिनकी तालिबानियों ने कथित तौर पर हत्या कर दी थी। उन्होंने दावा किया कि पिछले हफ्ते काबुल में कब्जा जमाने वाले तालिबानी शासकों ने पूरे अफगानिस्तान पर अपना नियंत्रण कर लिया है। वे छोटे बच्चों और बुजुर्ग नागरिकों को डरा रहे हैं और उन पर शासन करने की कोशिश कर रहा है। अंद्राबी ने कहा कि तालिबान इस तरह आतंकवाद के जरिए राष्ट्र पर शासन नहीं कर सकता है।

पाकिस्तान में ‘जबरन धर्मांतरण विरोधी’ बिल के विरोध में खुलेआम उतरे मौलवी और इस्लामी कट्टरपंथी, इमरान खान को दी धमकी

इमरान खान के नेतृत्व वाली पाकिस्तान सरकार के जबरन धर्मांतरण विरोधी विधेयक पेश करने के फैसले ने पाक में इस्लामी कट्टरपंथियों, मौलवियों को नाराज कर दिया है। डॉन की रिपोर्ट के अनुसार, इस्लामाबाद में धार्मिक मामलों के मंत्रालय द्वारा जबरन धर्मांतरण विरोधी विधेयक के मसौदे पर चर्चा के लिए बुलाई गई बैठक में भाग लेने वाले मौलवियों और धार्मिक विद्वानों ने विधेयक पर गंभीर आपत्ति व्यक्त की है। उन्होंने इमरान खान सरकार को धमकी दी है कि इसे अपने वर्तमान स्वरूप में लागू नहीं किया जा सकता है।

मंत्रालय ने सोमवार (23 अगस्त) को बैठक करने के लिए केवल मुस्लिम हितधारकों को आमंत्रित किया। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग (एनसीएम) या उसके अध्यक्ष चेला राम के सदस्यों को बैठक में आमंत्रित नहीं किया गया था।

बैठक की अध्यक्षता पाकिस्तान के धार्मिक मामलों के मंत्री पीर नूरुल हक कादरी ने की। सरकार ने काउंसिल ऑफ इस्लामिक आइडियोलॉजी (CII) के अध्यक्ष डॉ. किबला अयाज, सीआईआई के अन्य अधिकारियों और कुछ स्थानीय मौलवियों को बैठक में आमंत्रित किया था।

आमंत्रित लोगों में से एक ने कहा कि उन्हें ‘जबरन धर्मांतरण निषेध अधिनियम, 2021’ के मसौदे पर चर्चा करने के लिए आमंत्रित किया गया था। एक वरिष्ठ मौलवी ने कहा, “मसौदे की कॉपियाँ साझा की गईं और कमरे में सभी के दस्तावेज देखने के बाद चर्चा हुई।”

मसौदे को पढ़ने के बाद मौलवियों और धार्मिक विद्वानों ने धर्मांतरण की न्यूनतम आयु सहित कई धाराओं पर गंभीर आपत्ति जताई। मौलवियों ने 18 साल से कम उम्र के बच्चों के जबरन धर्मांतरण को अपराध घोषित करने के खिलाफ आपत्ति जताई और कहा कि यह आयु वर्ग घरेलू हिंसा विधेयक के मसौदे के अलग था, जो वर्तमान में कानून मंत्रालय के पास है।

मौलवियों में से एक को यह कहते हुए कोट किया गया था, “जब माता-पिता अपने बच्चों को घरेलू हिंसा बिल के तहत डांट भी नहीं सकते, तो क्या वे अपने बच्चों को इस्लाम अपनाने से रोक सकते हैं?”

रिपोर्टों के अनुसार, कोई भी गैर-मुस्लिम जो बच्चा नहीं है और धर्मांतरण के लिए सक्षम व इच्छुक है, वह उस क्षेत्र के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश से धर्मांतरण प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर सकता है।

मसौदा कानून इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि आवेदक को अपने आवेदन में नाम, पता, परिवार का विवरण, उनका वर्तमान धर्म और नए धर्म में परिवर्तित होने का कारण सहित सभी विवरण शामिल करने होंगे।

मसौदा कानून में कहा गया है कि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश धर्म परिवर्तन के लिए एक आवेदन प्राप्त होने के सात दिनों के भीतर एक इंटरव्यू के लिए तिथि निर्धारित करेगा। उस तिथि पर न्यायाधीश यह सुनिश्चित करेगा कि धर्म परिवर्तन किसी के दबाव में, जबरन या फिर छल से तो नहीं किया जा रहा है।

प्रस्तावित कानून में कहा गया है कि न्यायाधीश गैर-मुसलमानों को धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन करने और न्यायाधीश के पास वापस लौटने के लिए 90 दिनों का समय दिया जाएगा। इसके बाद न्यायाधीश विस्तृत अध्ययन के बाद धर्म परिवर्तन का प्रमाण पत्र प्रदान करेंगे।

इसके अंतर्गत 5 से 10 साल की सजा और 1,00,000 रुपए से लेकर रुपए तक का जुर्माना भी है। इसमें यदि किसी व्यक्ति का जबरन धर्म परिवर्तन कराया जाता है, तो 2,00,000 रुपए तक के जुर्माना देने का प्रावधान है

बता दें कि पाकिस्तान न केवल धार्मिक अल्पसंख्यकों, बल्कि अपने ही देश के भीतर जातीय अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के लिए जाना जाता है। जबरन धर्मांतरण कार्यक्रम अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से पाकिस्तान में रहने वाले ईसाइयों, सिखों और हिंदुओं के खिलाफ अत्यंत क्रूरता के साथ शुरू किए गए हैं।

मदरसे में 16 साल की छात्रा से रेप करने वाला मौलवी गिरफ्तार, महिला शिक्षक करती थी मदद: पाकिस्तान की घटना

पड़ोसी देश पाकिस्तान में एक मौलवी द्वारा नाबालिग छात्रा से रेप करने का मामला सामने आया है। रिपोर्ट के मुताबिक, 23 अगस्त 2021 को रावलपिंडी पुलिस ने मदरसा में 16 वर्षीय छात्रा के साथ बलात्कार करने के आरोप में शाह नवाज नाम के एक मौलवी को गिरफ्तार किया है। नाबालिग से दुष्कर्म के मामले में आरोपित के खिलाफ 17 अगस्त को मामला दर्ज किया गया था।

इस मामले में रावलपिंडी पुलिस ने एक ट्विटर पोस्ट में कहा कि पिरुधई इलाके में मदरसा छात्रों के खिलाफ दुर्व्यवहार और हिंसा का मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने आरोपी मुफ्ती शाह नवाज अहमद को गिरफ्तार कर लिया है। एसएसपी जाँच, सीपीओ मुहम्मद अहसान यूनुस ने एसपी रावल को मामले की जाँच के निर्देश दिए हैं।

उन्होंने आगे कहा कि आरोपित के खिलाफ पाकिस्तान दंड संहिता की धारा 377B और (II) के तहत मामला दर्ज किया गया था, लेकिन बाद में इसमें धारा 506 को भी जोड़ दिया गया। इस बीच रेप के आरोपित मुफ्ती शाह ने गिरफ्तारी से बचने के लिए कोर्ट से अग्रिम जमानत ले ली थी। जिला अदालत से अंतरिम जमानत 30 अगस्त तक लागू थी। लेकिन, पुलिस द्वारा अतिरिक्त आरोप जोड़े जाने के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

पुलिस ने कहा है कि इस मामले में मदरसा के दूसरे शिक्षकों और स्टाफ सदस्यों को जाँच का हिस्सा बनाया गया था। आरोपित को गिरफ्तारी से बचने में मदद करने के मामले में मुफ्ती के भाई और भतीजे और मदरसा प्रशासक के बेटे के खिलाफ अलग से एक केस दर्ज किया गया है।

पीड़िता ने एक महिला शिक्षिका पर प्रताड़ना में मुफ्ती का साथ देने का आरोप लगाया। पुलिस द्वारा जारी बयान के मुताबिक, पीड़िता की शुरुआती मेडिकल रिपोर्ट से उसे प्रताड़ित किए जाने के निशानों का पता चला है। अब अंतिम मेडिकल रिपोर्ट मिलने के बाद जाँच के दायरे को आगे बढ़ाया जाएगा।

मुगल असली राष्ट्र निर्माता, मुस्लिम शासकों को बदनाम करना आज सबसे आसान: बजरंगी भाईजान के निर्देशक कबीर खान

बॉलीवुड फिल्म बजरंगी भाईजान के निर्देशक कबीर खान ने हाल में अपनी चिंता जाहिर करते हुए बयान दिया कि उन्हें मुगलों को बदनाम करने वाली फिल्में देखना ‘समस्याग्रस्त और परेशान करने वाला’ लगता है। उनके मुताबिक ऐसा ‘सिर्फ पॉपुलर नैरेटिव के साथ जाने के लिए’ किया जाता है और ये फिल्में ‘ऐतिहासिक साक्ष्य’ पर आधारित नहीं हैं। कबीर का कहना है कि मुगल ही देश के असली राष्ट्र निर्माता थे।

बॉलीवुड हंगामा नामक मनोरंजन वेबसाइट को दिए बयान में उन्होंने कहा,

“मुझे यह बेहद समस्याग्रस्त और परेशान करने वाला लगता है और जो वास्तव में मुझे तंग करता है वह यह है कि यह सिर्फ पॉपुलर नैरेटिव के साथ जाने के लिए किया जा रहा है। मैं समझ सकता हूँ कि जब एक फिल्ममेकर रिसर्च करता है तो फिल्ममेकर एक प्वाइंट बनाता है। जाहिर तौर पर सबका अलग नजरिया हो सकता है। अगर आप मुगलों को बदनाम करना चाहते हैं, कृपया करके उसे रिसर्च आधारित रखें और बताएँ कि क्यों; वे खलनायक क्यों थे जो आपको ऐसा लगता है। क्योंकि अगर आप कुछ रिसर्च करते हैं और इतिहास पढ़ते हैं, तो ये बहुत मुश्किल है कि आप उन्हें खलनायक बनाएँ। मुझे लगता है कि वे मूल राष्ट्र निर्माता थे और ये लिखने और कहने के लिए कि उन्होंने हत्या की…बताएँ कि आप किस आधार पर कह रहे हैं।”

वह कहते हैं, “आज के समय में सबसे आसान चीज मुगलों को और अन्य मुस्लिम शासकों को बदनाम करना है। उन्हें बने बनाए स्टीरियोटाइप्स में फिट करने की कोशिश बेहद चिंताजनक है। दुर्भाग्य से मैं उन फिल्मों का सम्मान नहीं कर सकता। यह मेरी निजी राय है। मैं बड़े दर्शकों के लिए ऐसा नहीं बोल सकता लेकिन मैं निश्चित तौर पर ऐसे चित्रण को देख तंग हो जाता हूँ।”

गौरतलब है कि निर्देशक कबीर खान का यह बयान डिज्नी प्लस हॉटस्टार की नई वेब सीरीज ‘द एम्पायर’ का ट्रेलर सामने के बाद आया है। इस सीरीज की चर्चा सोशल मीडिया पर काफी गर्म है। ‘द एम्पायर’ में पहली बार मुग़ल साम्राज्य को शुरुआत से, पहले शासक बाबर की कहानी के साथ दिखाया जाएगा।

स्वामी विवेकानंद ही नहीं, शिकागो में इन्होंने भी लहराई थी धर्म की ध्वजा: वो गाँधी, जिन्हें हम भूल गए…

अमेरिका के शिकागो में हुए विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद का सम्बोधन आज भी हर एक भारतीय के दिलों-दिमाग में रचा-बसा हुआ है। कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष रहे महात्मा गाँधी को हम सब जानते हैं। लेकिन, एक गाँधी ऐसे भी थे जिन्हें हमने भुला दिया। उन्होंने भी स्वामी विवेकानंद की तरह ही विश्व धर्म संसद में हिस्सा लिया था। वो सनातन के ही अंग जैन धर्म के प्रतिनिधि के रूप में वहाँ पहुँचे थे। दुनिया भर में जैन धर्म के सिद्धांतों व विचारों को पहुँचाने का श्रेय उन्हें जाता है। नाम है – वीरचंद राघवजी गाँधी।

गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है भावनगर जिला। यहीं के महुवा इलाके में 25 अगस्त, 1864 को वीरचंद राघवजी गाँधी का जन्म हुआ था। भावनगर में ही शुरुआती शिक्षा के बाद उनका दाखिला एलफिनस्टन महाविद्यालय में कराया गया। 1834 में स्थापित ये कॉलेज मुंबई के सबसे पुराने कॉलेजों में से एक है। उन्होंने यहाँ से ऑनर्स से स्नातक किया। काफी उम्र में उन्होंने 14 भाषाओं में दक्षता प्राप्त की।

मात्र 21 वर्ष की उम्र में उन्हें ‘ऑल इंडिया जैन एसोसिएशन’ के ऑनररी सेक्रेटरी का पद दिया गया। उन्होंने भारतीय साहित्य व धर्म को देश-विदेश में पहुँचाने में बड़ी भूमिका निभाई। 1893 में शिकागो में हुए ‘पार्लियामेंट ऑफ वर्ल्ड रिलीजंस’ के पहले अधिवेशन में उन्होंने स्वामी विवेकानंद के साथ हिस्सा लिया था। इस दौरान उन्होंने भारत की आत्मा व संस्कृति को पश्चिमी जगत के सामने रखा। अमरिका के धार्मिक संगठनों, चर्च समाज व मनोवैज्ञानिक समाज ने उन्हें हाथोंहाथ लिया।

अमेरिका के लोग जैन धर्म को लेकर प्रभावित हुए और वहाँ के बड़े अख़बारों ने उनके सम्बोधन को जगह दी। उन्होंने इस नैरेटिव को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई कि भारत महाराजाओं, बाघों और साँपों का देश है। वो 2 वर्षों तक अमेरिका में रहे और इस दौरान वहाँ के कई शहरों में घूम कर भारतीय चेतना का संचार किया। इसके बाद भी 2 बार वो अमेरिका गए। ये वो समय था, जब भारत के कई इलाके सूखा दे जूझ रहे थे।

ऐसे में 1896 में जब वीरचंद गाँधी अमेरिका गए तो उन्होंने अपने देश के लिए एक जहाज भर कर अन्न व 40,000 रुपए भी जुटाए, ताकि यहाँ के गरीबों की मदद हो सके। उन्होंने इंग्लैंड, फ़्रांस व जर्मनी सहित यूरोप के कई देशों का भी दौरा किया। लंदन की अदालत में उन्हें बतौर बैरिस्टर काम करने की भी अनुमति मिली। अमेरिकी प्रशासक हर्बर्ट वॉरेन ने उनसे जैन धर्म की शिक्षा ली। वॉरेन ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के कुलपति थे। वो जैन शिक्षाओं से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने ये धर्म अपना लिया।

स्वामी विवेकानंद ने नवंबर 1894 में लिखे गए एक पत्र में बताया था कि वीरचंद गाँधी शुद्ध सब्जियों के अलावा कुछ नहीं खाते हैं, भले ही मौसम कितना भी ठंडा क्यों न हो जाए। उन्होंने लिखा था कि वीरचंद गाँधी हमेशा अपने धर्म व देशवासियों का बचाव करने में लगे रहते हैं, इसीलिए भारत के लोग उन्हें काफी पसंद करते हैं। अक्टूबर 1893 में ‘The Rochester Herlad’ अख़बार ने लिखा कि उनके सम्बोधनों को अमेरिका के सभी बूढ़े-बच्चों को सुनना चाहिए।

वीरचंद गाँधी के पिता एक ज्वेलर थे और वो परिवार जैन धर्म के सारे नियम-कानूनों का पालन करता था। उनके पिता ने धर्म के नाम पर चली आ रही कई कुरीतियों को भी ख़त्म किया था, अतः वो एक सुधारवादी भी थे। 1880 में मैट्रिक करने वाले वीरचंद गाँधी ने सबसे पहले तो जैन धर्म के अनुयायियों और पालीताना के राजा के बीच समझौता कराया। जैन धर्म में पवित्र शत्रुंजय तीर्थ में दर्शन के लिए जाने पर श्रद्धालुओं को कर देना होता है।

वीरचंद गाँधी इसके निपटारे के लिए बॉम्बे के गवर्नर तक पहुँचे और उनके सामने अपनी बात रखी। अंत में फैसला हुआ कि पालीताना राज को हर साल 15,000 रुपए दिए जाएँगे और उन्हें जैन श्रद्धालुओं से किसी प्रकार का टैक्स नहीं वसूलना होगा। गरीब जैनों को इससे बड़ा फायदा हुआ और वीरचंद गाँधी की ख्याति चारों तरफ फ़ैल गई। पालीताना में जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव का मंदिर है और आज भी ये कानूनी रूप से विश्व का एकमात्र शहर है।

इसी से आप इसका अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उस समय इस निर्णय का कितना बड़ा असर हुआ होगा। जैन संघ के अधिकारी के रूप में उनका काम इतना अच्छा था कि कानून की पढ़ाई के लिए कई अमीर जैन कारोबारियों ने उन्हें वित्तीय मदद की पेशकश की। 1891 में खबर आई कि एक यूरोपियन ने गिरिडीह में जैन के पवित्र स्थल सम्मेद शिखर में एक बूचड़खाना खुलवाया है, जिसमें सूअर काटे जाते थे।

जैन धर्म के अनुयायियों को ये स्वीकार्य न था। कलकत्ता की अदालत में मामला दायर हुआ, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। वीरचंद गाँधी खुद कलकत्ता पहुँचे और हाईकोर्ट में अपील दायर की। उन्होंने इसके धार्मिक व कानूनी पक्ष गिनाए। वो कई महीनों तक शहर में रहे व बंगाली दस्तावेजों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। सभी धार्मिक व कानूनी दाँव-पेंच को समझा। शिलालेखों व प्राचीन दस्तावेजों की मदद से उन्होंने इस केस में फतह हसिल की व बूचड़खाना बंद हुआ।

जैन धर्म के लिए ये उनका दूसरा मैराथन प्रयास था, जो सफल रहा। उस समय आचार्य विजयानंद सूरी (गुजराँवाला के आत्मराम) जैन धर्म के सबसे बड़े गुरु माने जाते थे। असल में विश्व धर्म संसद में हिस्सा लेने के लिए उनके पास ही आमंत्रण आया था, लेकिन तब जैन गुरु विदेश की यात्रा नहीं करते थे। इसीलिए, जैन समुदाय ने वीरचंद गाँधी को अपना प्रतिनिधि चुना। वो शिकागो पहुँचे और वहाँ के विद्वानों के बीच भी अपनी प्रतिष्ठा हासिल की।

वहाँ से बॉम्बे लौटने के बाद भी उन्होंने जैन धर्म के सिद्धांतों पर कई लेक्चर देकर लोगों को धर्म का पाठ पढ़ाया। 1896 में वो दोबारा अमेरिका पहुँचे। इसके बाद वो कुछ दिनों के लिए भारत आए। फिर इंग्लैंड के बार में प्रैक्टिस के लिए वो वहाँ गए। लेकिन, उनका मन फिर भी स्वदेश में ही लगा। जैसे स्वामी विवेकानंद मात्र 39 की उम्र में चल बसे थे, वीरचंद गाँधी का निधन भी मात्र 37 वर्ष की आयु में 7 अगस्त, 1901 को हुआ।

उन्होंने अपने जीवनकाल में जैन सिद्धांतों व भारतीय धर्म व दर्शन पर 535 संबोधन दिए, जो उनकी उम्र के हिसाब से एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। विश्व धर्म संसद में भी 3000 विद्वानों के बीच भारतीय पारंपरिक वेशभूषा में पहुँचे स्वामी विवेकानंद और वीरचंद गाँधी, दोनों ही युवा थे। गुजरती, हिंदी, बंगाली, अंग्रेजी, संस्कृत प्राकृत और फ्रेंच जैसी भाषाओं का ज्ञान रखने वाले वीरचंद गाँधी के सम्बोधन से अमेरिकी इतने प्रभावित थे कि उन्हें अमेरिका में रुकने के लिए निवेदन किया गया।

योग पर भी उनके कई लेक्चर हैं। उन्होंने कभी जैन धर्म का प्रचार करते समय किसी अन्य मजहब की बुराई नहीं की। उन्होंने भारत के आलोचकों पर प्रहार करते हुए दुनिया को बताया कि सांस्कृतिक योग्यता, कृषि, साहित्य, कला, अच्छा व्यवहार, ज्ञान आतिथ्य, फेमिनिज्म, प्यार और सम्मान – ये भी भारत में अलग-अलग रूपों में मौजूद हैं। अमेरिका में उन्होंने ‘द गाँधी फिलोसॉफिकल सोसाइटी’, ‘द स्कूल ऑफ ओरिएण्टल फिलॉसोफी’ और ‘द सोसाइटी फॉर द एजुकेशन ऑफ़ वीमेन ऑफ इंडिया’ की स्थापना की।

‘ऐसे ही चलता रहा तो परिणाम अच्छा नहीं होगा’: हुर्रियत पर प्रतिबंध की संभावना से भड़कीं महबूबा मुफ्ती

जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के दोनों धड़ों को मोदी सरकार द्वारा प्रतिबंधित किए जाने की संभावना वाली खबर के बाद महबूबा मुफ्ती ने अपना आपा खो दिया है। उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए एक के बाद कई बड़े आरोप लगाए। मुफ्ती ने कॉन्ग्रेस का महिमामंडन करते हुए कहा कि उसने 70 साल में जो भी बनाया था, इस सरकार ने सब बेच दिया।

टाइम्स नाऊ चैनल की रिपोर्ट के मुताबिक, महबूबा ने हुर्रियत कॉन्फ्रेंस पर मोदी सरकार द्वारा बैन लगाए जाने के प्रस्ताव को लेकर कहा, “जो पिछले 70 साल में हिन्दुस्तान की लीडरशिप मोटे तौर पर कॉन्ग्रेस ने पैदा किया था या बनाया था, उन सभी चीजों को तो इस सरकार ने बेच दिया। ये तो सड़कें, पुल, पेट्रोल पंप, एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, पावर प्रोजेक्ट बेच रहे हैं। तो इनसे गिला क्या करना है?”

महबूबा ने आगे कहा, “आप सभी देख ही रहे हैं कि ये (मोदी सरकार) पूरे मुल्क में क्या कर रहे हैं। कोई स्टूडेंट हो, कोई एक्टिविस्ट हो या फिर कोई पॉलिटिशियन हो, जो भी इनके खिलाफ बात करता है तो उसे जेल में डाल देते हैं। ऐसे में हुर्रियत की तो बात ही क्या करना।”

इस कश्मीर में इंदिरा का भाईचारा

महबूबा मुफ्ती ने कहा कि कॉन्ग्रेस में कुछ खामियाँ हो सकती हैं, लेकिन आपको इस बात से सहमत होना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर का उस भारत में विलय हुआ था, जो नेहरू का भारत था, जहाँ इंदिरा का भाईचारा था, जो गाँधी का भारत था। उन्होंने कहा, “अगर जवाहरलाल नेहरू नहीं होते और जिस सेक्युलर कल्चर को अब नष्ट किया जा रहा है, तो मुझे नहीं लगता कि जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा बना होता।”

पीडीपी चीफ ने आगे कहा कि मैंने बैठक में प्रधानमंत्री से कहा कि जिस तरह से आप जम्मू-कश्मीर में लाठी का इस्तेमाल कर रहे हैं, आप लोगों का अपमान कर रहे हैं। अगर आप इसी तरह चलते रहे तो इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।

गौरतलब है कि पाकिस्तानी संस्थानों में कश्मीरी छात्रों को एमबीबीएस में नामांकन दिलाने के मामले में फंडिंग को लेकर चार छात्रों को सुरक्षा एजेंसियों ने गिरफ्तार किया था। इनसे पूछताछ में पता चला था कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से जुड़े संगठन उम्मीदवारों से एमबीबीएस में एडमिशन के नाम पर पैसा लेकर उसका इस्तेमाल घाटी में आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए करते हैं। इसी के बाद सरकार ने संगठन पर शिकंजा कसने को लेकर फैसला लिया था। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के दोनों धड़ों के खिलाफ अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट (UAPA) की धारा 3 (1) के तहत कार्रवाई की संभावना है।