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मुगल असली राष्ट्र निर्माता, मुस्लिम शासकों को बदनाम करना आज सबसे आसान: बजरंगी भाईजान के निर्देशक कबीर खान

बॉलीवुड फिल्म बजरंगी भाईजान के निर्देशक कबीर खान ने हाल में अपनी चिंता जाहिर करते हुए बयान दिया कि उन्हें मुगलों को बदनाम करने वाली फिल्में देखना ‘समस्याग्रस्त और परेशान करने वाला’ लगता है। उनके मुताबिक ऐसा ‘सिर्फ पॉपुलर नैरेटिव के साथ जाने के लिए’ किया जाता है और ये फिल्में ‘ऐतिहासिक साक्ष्य’ पर आधारित नहीं हैं। कबीर का कहना है कि मुगल ही देश के असली राष्ट्र निर्माता थे।

बॉलीवुड हंगामा नामक मनोरंजन वेबसाइट को दिए बयान में उन्होंने कहा,

“मुझे यह बेहद समस्याग्रस्त और परेशान करने वाला लगता है और जो वास्तव में मुझे तंग करता है वह यह है कि यह सिर्फ पॉपुलर नैरेटिव के साथ जाने के लिए किया जा रहा है। मैं समझ सकता हूँ कि जब एक फिल्ममेकर रिसर्च करता है तो फिल्ममेकर एक प्वाइंट बनाता है। जाहिर तौर पर सबका अलग नजरिया हो सकता है। अगर आप मुगलों को बदनाम करना चाहते हैं, कृपया करके उसे रिसर्च आधारित रखें और बताएँ कि क्यों; वे खलनायक क्यों थे जो आपको ऐसा लगता है। क्योंकि अगर आप कुछ रिसर्च करते हैं और इतिहास पढ़ते हैं, तो ये बहुत मुश्किल है कि आप उन्हें खलनायक बनाएँ। मुझे लगता है कि वे मूल राष्ट्र निर्माता थे और ये लिखने और कहने के लिए कि उन्होंने हत्या की…बताएँ कि आप किस आधार पर कह रहे हैं।”

वह कहते हैं, “आज के समय में सबसे आसान चीज मुगलों को और अन्य मुस्लिम शासकों को बदनाम करना है। उन्हें बने बनाए स्टीरियोटाइप्स में फिट करने की कोशिश बेहद चिंताजनक है। दुर्भाग्य से मैं उन फिल्मों का सम्मान नहीं कर सकता। यह मेरी निजी राय है। मैं बड़े दर्शकों के लिए ऐसा नहीं बोल सकता लेकिन मैं निश्चित तौर पर ऐसे चित्रण को देख तंग हो जाता हूँ।”

गौरतलब है कि निर्देशक कबीर खान का यह बयान डिज्नी प्लस हॉटस्टार की नई वेब सीरीज ‘द एम्पायर’ का ट्रेलर सामने के बाद आया है। इस सीरीज की चर्चा सोशल मीडिया पर काफी गर्म है। ‘द एम्पायर’ में पहली बार मुग़ल साम्राज्य को शुरुआत से, पहले शासक बाबर की कहानी के साथ दिखाया जाएगा।

स्वामी विवेकानंद ही नहीं, शिकागो में इन्होंने भी लहराई थी धर्म की ध्वजा: वो गाँधी, जिन्हें हम भूल गए…

अमेरिका के शिकागो में हुए विश्व धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद का सम्बोधन आज भी हर एक भारतीय के दिलों-दिमाग में रचा-बसा हुआ है। कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष रहे महात्मा गाँधी को हम सब जानते हैं। लेकिन, एक गाँधी ऐसे भी थे जिन्हें हमने भुला दिया। उन्होंने भी स्वामी विवेकानंद की तरह ही विश्व धर्म संसद में हिस्सा लिया था। वो सनातन के ही अंग जैन धर्म के प्रतिनिधि के रूप में वहाँ पहुँचे थे। दुनिया भर में जैन धर्म के सिद्धांतों व विचारों को पहुँचाने का श्रेय उन्हें जाता है। नाम है – वीरचंद राघवजी गाँधी।

गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है भावनगर जिला। यहीं के महुवा इलाके में 25 अगस्त, 1864 को वीरचंद राघवजी गाँधी का जन्म हुआ था। भावनगर में ही शुरुआती शिक्षा के बाद उनका दाखिला एलफिनस्टन महाविद्यालय में कराया गया। 1834 में स्थापित ये कॉलेज मुंबई के सबसे पुराने कॉलेजों में से एक है। उन्होंने यहाँ से ऑनर्स से स्नातक किया। काफी उम्र में उन्होंने 14 भाषाओं में दक्षता प्राप्त की।

मात्र 21 वर्ष की उम्र में उन्हें ‘ऑल इंडिया जैन एसोसिएशन’ के ऑनररी सेक्रेटरी का पद दिया गया। उन्होंने भारतीय साहित्य व धर्म को देश-विदेश में पहुँचाने में बड़ी भूमिका निभाई। 1893 में शिकागो में हुए ‘पार्लियामेंट ऑफ वर्ल्ड रिलीजंस’ के पहले अधिवेशन में उन्होंने स्वामी विवेकानंद के साथ हिस्सा लिया था। इस दौरान उन्होंने भारत की आत्मा व संस्कृति को पश्चिमी जगत के सामने रखा। अमरिका के धार्मिक संगठनों, चर्च समाज व मनोवैज्ञानिक समाज ने उन्हें हाथोंहाथ लिया।

अमेरिका के लोग जैन धर्म को लेकर प्रभावित हुए और वहाँ के बड़े अख़बारों ने उनके सम्बोधन को जगह दी। उन्होंने इस नैरेटिव को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई कि भारत महाराजाओं, बाघों और साँपों का देश है। वो 2 वर्षों तक अमेरिका में रहे और इस दौरान वहाँ के कई शहरों में घूम कर भारतीय चेतना का संचार किया। इसके बाद भी 2 बार वो अमेरिका गए। ये वो समय था, जब भारत के कई इलाके सूखा दे जूझ रहे थे।

ऐसे में 1896 में जब वीरचंद गाँधी अमेरिका गए तो उन्होंने अपने देश के लिए एक जहाज भर कर अन्न व 40,000 रुपए भी जुटाए, ताकि यहाँ के गरीबों की मदद हो सके। उन्होंने इंग्लैंड, फ़्रांस व जर्मनी सहित यूरोप के कई देशों का भी दौरा किया। लंदन की अदालत में उन्हें बतौर बैरिस्टर काम करने की भी अनुमति मिली। अमेरिकी प्रशासक हर्बर्ट वॉरेन ने उनसे जैन धर्म की शिक्षा ली। वॉरेन ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के कुलपति थे। वो जैन शिक्षाओं से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने ये धर्म अपना लिया।

स्वामी विवेकानंद ने नवंबर 1894 में लिखे गए एक पत्र में बताया था कि वीरचंद गाँधी शुद्ध सब्जियों के अलावा कुछ नहीं खाते हैं, भले ही मौसम कितना भी ठंडा क्यों न हो जाए। उन्होंने लिखा था कि वीरचंद गाँधी हमेशा अपने धर्म व देशवासियों का बचाव करने में लगे रहते हैं, इसीलिए भारत के लोग उन्हें काफी पसंद करते हैं। अक्टूबर 1893 में ‘The Rochester Herlad’ अख़बार ने लिखा कि उनके सम्बोधनों को अमेरिका के सभी बूढ़े-बच्चों को सुनना चाहिए।

वीरचंद गाँधी के पिता एक ज्वेलर थे और वो परिवार जैन धर्म के सारे नियम-कानूनों का पालन करता था। उनके पिता ने धर्म के नाम पर चली आ रही कई कुरीतियों को भी ख़त्म किया था, अतः वो एक सुधारवादी भी थे। 1880 में मैट्रिक करने वाले वीरचंद गाँधी ने सबसे पहले तो जैन धर्म के अनुयायियों और पालीताना के राजा के बीच समझौता कराया। जैन धर्म में पवित्र शत्रुंजय तीर्थ में दर्शन के लिए जाने पर श्रद्धालुओं को कर देना होता है।

वीरचंद गाँधी इसके निपटारे के लिए बॉम्बे के गवर्नर तक पहुँचे और उनके सामने अपनी बात रखी। अंत में फैसला हुआ कि पालीताना राज को हर साल 15,000 रुपए दिए जाएँगे और उन्हें जैन श्रद्धालुओं से किसी प्रकार का टैक्स नहीं वसूलना होगा। गरीब जैनों को इससे बड़ा फायदा हुआ और वीरचंद गाँधी की ख्याति चारों तरफ फ़ैल गई। पालीताना में जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव का मंदिर है और आज भी ये कानूनी रूप से विश्व का एकमात्र शहर है।

इसी से आप इसका अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उस समय इस निर्णय का कितना बड़ा असर हुआ होगा। जैन संघ के अधिकारी के रूप में उनका काम इतना अच्छा था कि कानून की पढ़ाई के लिए कई अमीर जैन कारोबारियों ने उन्हें वित्तीय मदद की पेशकश की। 1891 में खबर आई कि एक यूरोपियन ने गिरिडीह में जैन के पवित्र स्थल सम्मेद शिखर में एक बूचड़खाना खुलवाया है, जिसमें सूअर काटे जाते थे।

जैन धर्म के अनुयायियों को ये स्वीकार्य न था। कलकत्ता की अदालत में मामला दायर हुआ, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। वीरचंद गाँधी खुद कलकत्ता पहुँचे और हाईकोर्ट में अपील दायर की। उन्होंने इसके धार्मिक व कानूनी पक्ष गिनाए। वो कई महीनों तक शहर में रहे व बंगाली दस्तावेजों का अंग्रेजी में अनुवाद किया। सभी धार्मिक व कानूनी दाँव-पेंच को समझा। शिलालेखों व प्राचीन दस्तावेजों की मदद से उन्होंने इस केस में फतह हसिल की व बूचड़खाना बंद हुआ।

जैन धर्म के लिए ये उनका दूसरा मैराथन प्रयास था, जो सफल रहा। उस समय आचार्य विजयानंद सूरी (गुजराँवाला के आत्मराम) जैन धर्म के सबसे बड़े गुरु माने जाते थे। असल में विश्व धर्म संसद में हिस्सा लेने के लिए उनके पास ही आमंत्रण आया था, लेकिन तब जैन गुरु विदेश की यात्रा नहीं करते थे। इसीलिए, जैन समुदाय ने वीरचंद गाँधी को अपना प्रतिनिधि चुना। वो शिकागो पहुँचे और वहाँ के विद्वानों के बीच भी अपनी प्रतिष्ठा हासिल की।

वहाँ से बॉम्बे लौटने के बाद भी उन्होंने जैन धर्म के सिद्धांतों पर कई लेक्चर देकर लोगों को धर्म का पाठ पढ़ाया। 1896 में वो दोबारा अमेरिका पहुँचे। इसके बाद वो कुछ दिनों के लिए भारत आए। फिर इंग्लैंड के बार में प्रैक्टिस के लिए वो वहाँ गए। लेकिन, उनका मन फिर भी स्वदेश में ही लगा। जैसे स्वामी विवेकानंद मात्र 39 की उम्र में चल बसे थे, वीरचंद गाँधी का निधन भी मात्र 37 वर्ष की आयु में 7 अगस्त, 1901 को हुआ।

उन्होंने अपने जीवनकाल में जैन सिद्धांतों व भारतीय धर्म व दर्शन पर 535 संबोधन दिए, जो उनकी उम्र के हिसाब से एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। विश्व धर्म संसद में भी 3000 विद्वानों के बीच भारतीय पारंपरिक वेशभूषा में पहुँचे स्वामी विवेकानंद और वीरचंद गाँधी, दोनों ही युवा थे। गुजरती, हिंदी, बंगाली, अंग्रेजी, संस्कृत प्राकृत और फ्रेंच जैसी भाषाओं का ज्ञान रखने वाले वीरचंद गाँधी के सम्बोधन से अमेरिकी इतने प्रभावित थे कि उन्हें अमेरिका में रुकने के लिए निवेदन किया गया।

योग पर भी उनके कई लेक्चर हैं। उन्होंने कभी जैन धर्म का प्रचार करते समय किसी अन्य मजहब की बुराई नहीं की। उन्होंने भारत के आलोचकों पर प्रहार करते हुए दुनिया को बताया कि सांस्कृतिक योग्यता, कृषि, साहित्य, कला, अच्छा व्यवहार, ज्ञान आतिथ्य, फेमिनिज्म, प्यार और सम्मान – ये भी भारत में अलग-अलग रूपों में मौजूद हैं। अमेरिका में उन्होंने ‘द गाँधी फिलोसॉफिकल सोसाइटी’, ‘द स्कूल ऑफ ओरिएण्टल फिलॉसोफी’ और ‘द सोसाइटी फॉर द एजुकेशन ऑफ़ वीमेन ऑफ इंडिया’ की स्थापना की।

‘ऐसे ही चलता रहा तो परिणाम अच्छा नहीं होगा’: हुर्रियत पर प्रतिबंध की संभावना से भड़कीं महबूबा मुफ्ती

जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के दोनों धड़ों को मोदी सरकार द्वारा प्रतिबंधित किए जाने की संभावना वाली खबर के बाद महबूबा मुफ्ती ने अपना आपा खो दिया है। उन्होंने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए एक के बाद कई बड़े आरोप लगाए। मुफ्ती ने कॉन्ग्रेस का महिमामंडन करते हुए कहा कि उसने 70 साल में जो भी बनाया था, इस सरकार ने सब बेच दिया।

टाइम्स नाऊ चैनल की रिपोर्ट के मुताबिक, महबूबा ने हुर्रियत कॉन्फ्रेंस पर मोदी सरकार द्वारा बैन लगाए जाने के प्रस्ताव को लेकर कहा, “जो पिछले 70 साल में हिन्दुस्तान की लीडरशिप मोटे तौर पर कॉन्ग्रेस ने पैदा किया था या बनाया था, उन सभी चीजों को तो इस सरकार ने बेच दिया। ये तो सड़कें, पुल, पेट्रोल पंप, एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, पावर प्रोजेक्ट बेच रहे हैं। तो इनसे गिला क्या करना है?”

महबूबा ने आगे कहा, “आप सभी देख ही रहे हैं कि ये (मोदी सरकार) पूरे मुल्क में क्या कर रहे हैं। कोई स्टूडेंट हो, कोई एक्टिविस्ट हो या फिर कोई पॉलिटिशियन हो, जो भी इनके खिलाफ बात करता है तो उसे जेल में डाल देते हैं। ऐसे में हुर्रियत की तो बात ही क्या करना।”

इस कश्मीर में इंदिरा का भाईचारा

महबूबा मुफ्ती ने कहा कि कॉन्ग्रेस में कुछ खामियाँ हो सकती हैं, लेकिन आपको इस बात से सहमत होना चाहिए कि जम्मू-कश्मीर का उस भारत में विलय हुआ था, जो नेहरू का भारत था, जहाँ इंदिरा का भाईचारा था, जो गाँधी का भारत था। उन्होंने कहा, “अगर जवाहरलाल नेहरू नहीं होते और जिस सेक्युलर कल्चर को अब नष्ट किया जा रहा है, तो मुझे नहीं लगता कि जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा बना होता।”

पीडीपी चीफ ने आगे कहा कि मैंने बैठक में प्रधानमंत्री से कहा कि जिस तरह से आप जम्मू-कश्मीर में लाठी का इस्तेमाल कर रहे हैं, आप लोगों का अपमान कर रहे हैं। अगर आप इसी तरह चलते रहे तो इसका परिणाम अच्छा नहीं होगा।

गौरतलब है कि पाकिस्तानी संस्थानों में कश्मीरी छात्रों को एमबीबीएस में नामांकन दिलाने के मामले में फंडिंग को लेकर चार छात्रों को सुरक्षा एजेंसियों ने गिरफ्तार किया था। इनसे पूछताछ में पता चला था कि हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से जुड़े संगठन उम्मीदवारों से एमबीबीएस में एडमिशन के नाम पर पैसा लेकर उसका इस्तेमाल घाटी में आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए करते हैं। इसी के बाद सरकार ने संगठन पर शिकंजा कसने को लेकर फैसला लिया था। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के दोनों धड़ों के खिलाफ अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रिवेंशन एक्ट (UAPA) की धारा 3 (1) के तहत कार्रवाई की संभावना है।

जिनके लिए फासिस्ट मोदी सरकार, वे ही आवाज पर बिठा रहे पहरा: नारायण राणे के साथ जो हुआ वह लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं

केंद्रीय मंत्री नारायण राणे की एफआईआर के बाद गिरफ्तारी और उसके बाद जमानत, लगभग सब कुछ वैसा ही हुआ जैसा माना जा रहा था। चूँकि एफआईआर महाराष्ट्र में सत्ताधारियों द्वारा दायर की गई थी तो गिरफ्तारी को लेकर किसी तरह का संशय नहीं था। इसके अलावा चूँकि आलोचना/राजनीतिक टिप्पणी को अपराध माना गया था इसलिए जमानत को लेकर भी किसी तरह का संशय नहीं था।

वैसे भी राजनीतिक या सैद्धांतिक आलोचना को लेकर कुछ नेताओं और राज्य सरकारों की प्रतिक्रिया, फैसले और उनके परिणाम दिन प्रतिदिन प्रेडिक्टेबल होते जा रहे हैं और उनमें किसी बदलाव की संभावना फिलहाल दिखाई नहीं देती। वैसे महाराष्ट्र सरकार द्वारा राणे की गिरफ्तारी को आज चाहे जैसे देखा जाए, निकट भविष्य में इसके असामान्य राजनीतिक परिणाम दिखाई दे सकते हैं।

हाल के वर्षों में महाराष्ट्र की राजनीति को देखने वाले इस बात को लेकर लगभग निश्चिन्त थे कि राणे की गिरफ़्तारी तय है और यही बात लोकतांत्रिक विमर्श के लिए खतरे की घंटी है। इसलिए नहीं कि एक केंद्रीय मंत्री की गिरफ्तारी हुई बल्कि इसलिए कि यह गिरफ्तारी आम आलोचना की प्रक्रिया में एक राजनीतिक टिप्पणी करने के कारण हुई। हाल में कुछ आलोचनाओं और उन पर आई प्रतिक्रिया को देखा जाए तो यह कह सकते हैं कि भारत की राजनीति आज उस बिंदु पर है जहाँ कुछ नेताओं या उनके द्वारा चलाई जा रही सरकारों की नीतियों की आलोचना या उन पर प्रतिकूल टिप्पणी करना बिना किसी खतरे की तैयारी के लगभग असंभव सा है।

कुछ समय पहले तक यह बात पत्रकारों या आम नागरिकों पर लागू होती थी। पर आलोचना या राजनीतिक टिप्पणी की सुविधा अब विपक्ष के नेताओं के लिए भी उपलब्ध नहीं रही। इससे पहले महाराष्ट्र सरकार या सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं ने मुख्यमंत्री ठाकरे की आलोचना करने वाले आम नागरिकों के साथ कैसा व्यवहार किया, वह राजनीतिक घटनाओं की सूची का हिस्सा है। अर्नब गोस्वामी को कैसे और किन परिस्थितियों में गिरफ्तार किया गया, वह भारत भर ने देखा। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की आलोचना करने वाले आम नागरिकों की पिटाई से लेकर गिरफ्तारी तक सब कुछ किया गया। कुछ मामलों में सोशल मीडिया पर आलोचनात्मक कमेंट के लिए लोगों को दूसरे राज्यों से भी गिरफ्तार करके मुंबई ले जाया गया। 

अब यह सब आम नागरिकों या पत्रकारों तक सीमित न रहकर राजनीतिक प्रतिद्वंदियों के साथ होने लगा है। देखा जाए तो राणे की गिरफ्तारी ने एक ऐसी राजनीतिक परंपरा की नींव डाल दी हैए जिसके आगे चलकर और मजबूत होने की संभावना है। सबसे मजे की बात यह है कि जिस बयान के चलते नारायण राणे की गिरफ्तारी हुई उससे घटिया बयान उद्धव ठाकरे अन्य नेताओं के लिए कई बार दे चुके हैं। राणे की गिरफ्तारी के बाद सोशल मीडिया में उद्धव ठाकरे का एक ऐसा वीडियो वायरल हुआ जिसमें वे योगी आदित्यनाथ को न केवल ढोंगी बता रहे हैंए बल्कि उन्हें चप्पलों से मारने की सिफारिश करते नज़र आ रहे हैं।

राजनीतिक आलोचना को लेकर पिछले कई वर्षों में जो कुछ महाराष्ट्र में होता रहा है, कुछ उसी तरह की राजनीति अन्य कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में भी देखी गई। कॉन्ग्रेस के टूलकिट के मामले में छत्तीसगढ़ में संबित पात्रा के खिलाफ एफआईआर कुछ इसी राजनीतिक सोच का परिणाम थी। सोशल मीडिया पर नेताओं की आलोचना को लेकर झारखंड में भी एफआईआर हो चुके हैं। पश्चिम बंगाल में राजनीतिक विरोधियों के साथ वर्षों से क्या हो रहा है, वह पूरे देश के सामने है। इन सब के बावजूद केंद्र में सत्ताधारी दल भाजपा की नीतियों में तथाकथित फासिज्म का आविष्कार कर लेने वालों को इन राज्यों में आलोचना के परिणामस्वरूप होने वाले गिरफ्तारी, पिटाई या अन्य राजनीतिक चालें दिखाई नहीं देती। यह बात लोकतांत्रिक राजनीति के लिए दुर्भाग्यपूर्ण है। 

शिवसेना, कॉन्ग्रेस पार्टी, एनसीपी या तृणमूल कॉन्ग्रेस और इन दलों के नेता समझते तो हैं कि आलोचना और राजनीतिक टिप्पणियाँ लोकतांत्रिक राजनीति का अभिन्न अंग हैं पर वे इस बात को स्वीकार नहीं कर पाते। हर आलोचना का जवाब गिरफ्तारी या पिटाई नहीं हो सकती। आलोचना से सरकार कमजोर नहीं दिखे इसलिए एक कमजोर सरकार ही आलोचना का जवाब ऐसे कदम उठाकर देती है। इसके अलावा एक बात और है राजनीतिक दलों को स्वीकार करने की आवश्यकता है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बढ़ने की वजह से आम भारतीय के लिए अपनी बात रखने के साधन बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में आलोचना से लेकर सराहना तक, सब बढ़ेगी और निकट भविष्य में आलोचना के प्रति सहनशील और सराहना के प्रति विनम्र होना राजनीतिक दलों और उसके नेताओं के लिए सबसे बड़ा होमवर्क होगा। 

ऐसे राजनीतिक क़दमों का नफा या नुकसान तो अलग बहस का विषय है पर यह तय है कि राजनीतिक विरोधियों के प्रति बदले की ऐसी भावना न तो लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए शुभ है और न ही राजनीतिक परम्पराओं के लिए। दलों को यह स्वीकार करना होगा कि राजनीति में आलोचना के प्रति सहनशीलता किसी भी लोकतंत्र के परिष्कृत होने की निशानी है। ऐसे में यदि कुछ दल सहनशील रहें और कुछ सहनशील न रहे तो उबड़-खाबड़ राजनीतिक धरातल का निर्माण होगा और इससे नेताओं और दलों के आचरण में सुधार की गुंजाइश रहेगी। ऐसे में भाजपा नेता और लद्दाख के युवा सांसद जम्यांग सेरिंग नामग्याल के प्रसिद्ध संसदीय भाषण की एक पंक्ति उधार लेते हुए कहा जा सकता है कि- सुनने की क्षमता रखिए।

मेवात में धर्मांतरण कराने वाला अबू बकर खुद था हिंदू, 500 गज के प्लॉट के लिए बाप ने पूरे परिवार से कबूल करवाया था इस्लाम

हरियाणा के मेवात में कुछ दिन पहले एक हिंदू युवक के धर्मांतरण कराने के मामले में अबू बकर नाम के युवक को गिरफ्तार किया गया था। अब इसी मामले की छानबीन में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। हालिया जानकारी के अनुसार, अबू बकर खुद हिंदू था और यादव समाज से संबंध रखता था। 

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, 14 साल पहले अबू बकर का नाम संदीप यादव था, जो गुरुग्राम जिले के पटौड़ी थाना अंतर्गत नूरगढ़ गाँव में रहता था। लेकिन, साल 2007 में उसके पिता तेजपाल सलंबा गाँव में जाकर बस गए। वह नूँह के टाई गाँव में पढ़ाते थे।

इस दौरान तेजपाल ने अपने हिस्से की जमीन और घर बेचा था। सलंबा में बसने के बाद 500 गज के प्लॉट के चक्कर में तेजपाल ने इस्लाम मजहब अपना लिया और अपना नाम अबुल रहमान कर लिया। वहीं बेटे संदीप यादव को अबू बकर बना दिया गया। पत्नी बबली का नाम मरीयम रख दिया और बेटी सपना का नाम जैनब कर दिया।

कुछ समय बाद अबू बकर का फरीदाबाद से निकाह कराया गया। अब वर्तमान में उसके दो बच्चे हैं और सलंबा गाँव में 200 गज जमीन भी है। जानकारी के मुताबिक अबू बकर वामसैफ संस्था से जुड़ा था और धौज गाँव में मदरसा चलाता था, जिसमें 200 बच्चे पढ़ते हैं।

मामले की जाँच में पता चला है कि अबू बकर के पिता ने 14 साल पहले केवल 500 गज प्लाट के लालच में न केवल खुद अपना धर्म परिवर्तन किया बल्कि अपनी पत्नी समेत बच्चों का भी धर्मांतरण करवा दिया।

धर्मांतरण के आरोप में पकड़ा गया था अबू बकर

उल्लेखनीय है कि अभी कुछ दिन पहले मेवात के रोजकामेव थाना अंतर्गत बरोटा गाँव के निवासी मनोज वर्मा ने अपने धर्मांतरण के आरोप में अबू बकर समेत 4 लोगों के विरुद्ध शिकायत दी थी। पुलिस ने मामले को गंभीरता से लेते हुए सलंबा गाँव के अबू बकर को पकड़ा था जबकि बाकियों की तलाश चल रही थी। 

पीड़ित का कहना था कि धर्म परिवर्तन के बाद उसे सलंबा में ही बसा दिया गया और अन्य हिंदू युवकों को इस्लाम कबूल करवाने के काम में लगाया गया। कई माह तक आरोपितों ने उसे अपने साथ रखा और गोमाँस खिलाने का प्रयास करते थे। मना करने पर मारपीट होती थी।

धीरे-धीरे मनोज को हकीकत समझ आने लगी। उसने किसी तरह अपने पिता को ये सारी बातें बताई। जब पिता उससे मिलने आए तो उन पर भी धर्मांतरण का दबाव बनाया गया और पैसे का लालच देकर रोकने का प्रयास हुआ।

मनोज किसी तरह आरोपितों के चंगुल से निकला और दो दिन पहले पुलिस अधीक्षक को शिकायत दी। पीड़ित का कहना है कि ये आरोपित दावत-ए-इस्लाम और ग्लोबल पीस सेंटर चलाते हैं। ये सभी गरीब, छोटी जातियों के हिंदुओं, बेसहारा हिंदू धर्म के लोगों को बहला-फुसला कर इस्लाम कबूल करवाते है।

‘मौत का वक्त याद करो जब कब्र में उतारी जाओगी’: कश्मीर में सिर नहीं ढँकने पर मुस्लिम कट्टरपंथियों के निशाने पर 20 साल की RJ

जम्मू-कश्मीर के बारामूला की 20 वर्षीय समानिया भट्ट उत्तरी कश्मीर की सबसे कम उम्र की महिला रेडियो जॉकी (RJ) हैं। उन्होंने हाल ही में गवर्नमेंट डिग्री कॉलेज, बारामूला से मास कम्युनिकेशन में ग्रेजुएशन पूरा किया है। इसके बाद उन्होंने बारामूला के सोपोर में स्थित रेडियो चिनार 90.4 एफएम में नौकरी हासिल की। इस उपलब्धि के लिए जहाँ कुछ लोग समानिया की तारीफ कर रहे हैं, वहीं कट्टर इस्लामवादियों ने उन्हें निशाने पर ले लिया है।

जब से समानिया भट्ट को सबसे कम उम्र की रेडियो जॉकी के रूप में नियुक्त किया गया और उनके एक शो ‘हल्ला बोल विद आरजे समानिया’ की कुछ तस्वीरें वायरल हुईं, तब से इस्लामवादी और कट्टरपंथी सोशल मीडिया पर उनको निशाना बना रहे हैं। अधिकांश हमले उनकी पोशाक और सीआरपीएफ के रेडियो स्टेशन पर उनकी नियुक्ति को लेकर किए जा रहे हैं।

यासिर नाम के एक शख्स ने कहा कि एक समय था जब बारामूला को छोटा पाकिस्तान कहा जाता था। यह शर्म की बात है कि पश्चिमी संस्कृति ने इस क्षेत्र को जकड़ लिया है। वहीं, आसिफ राजा ने सवाल किया कि क्या आरजे बनने के लिए दुपट्टा हटाना जरूरी था? जावेद ने भी उन्हें टारगेट किया और भट्ट पर अपनी दकियानूसी सोच थोपने का प्रयास किया।

प्रिंस आशु नाम के एक यूजर ने ‘लानत’ लिखते हुए कहा, “उसे दीन के बारे में बात करनी चाहिए थी।” गाशु नाम के एक अन्य यूजर ने कहा, “हम कश्मीरी लोग उसकी सफलता की निंदा करते हैं, क्योंकि वह सीआरपीएफ समर्थित रेडियो स्टेशन में काम कर रही है।”

समानिया भट्ट पर किए गए कमेन्ट

हाल ही में समाचार एजेंसी एएनआई को समानिया ने बताया, “बचपन से पत्रकारिता मेरा जुनून था। मैं तीन साल से ‘कश्मीर डिस्पैच’ के साथ काम कर रही हूँ और जमीनी स्तर पर भी काम किया है। जब मुझे पता चला कि रेडियो चिनार का उत्तर कश्मीर में पहला रेडियो स्टेशन होगा, मैंने इसमें ट्राई करने के बारे में सोचा। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं रेडियो जॉकी बनूँगी या मैं कभी भी रेडियो स्टेशन में काम करूँगी।”

वह रेडियो चिनार पर ‘हल्ला बोल विद आरजे समानिया’ (Halla Bol with RJ Samaniya) नाम से एक प्रोग्राम चलाती हैं। रेडियो चिनार के प्रमुख साहिल मुजफ्फर ने बताया, “समानिया सोपोर व बारामूला की सबसे कम उम्र की महिला आरजे हैं, जो हमारी टीम की सदस्य हैं।” समानिया ने अपने संदेश में लड़कियों से कहा, “डरो मत और करते रहो अगर आपके पास काम करने का जुनून है तो आपको कोई रोक नहीं सकता।”

रेडियो चिनार: कश्मीर में सेना का पहला रेडियो स्टेशन

मार्च 2021 में भारतीय सेना ने सोपोर, बारामूला, उत्तरी कश्मीर में अपना पहला कॉम्यूनिटी रेडियो स्टेशन ‘रेडियो चिनार’ लॉन्च किया था। इसका उद्देश्य सेना और कश्मीर के लोगों के बीच की खाई को पाटना था। इसमें हंदवाड़ा, वाटलाब, सोपोर, बांदीपोरा, मानसबल, पट्टन, डेलिना और बारामूला जैसे महत्वपूर्ण स्थान शामिल हैं।

YouTube ने हमेशा के लिए हटाया ‘सब लोकतंत्र’ चैनल: रोहिंग्या व बॉलीवुड में ‘लव जिहाद’ के खिलाफ उठाई थी आवाज़

YouTube ने रचित कौशिक के चैनल ‘सब लोकतंत्र’ को हमेशा के लिए हटा दिया है। हाल ही में उन्होंने रोहिंग्या घुसपैठ व बॉलीवुड में ‘लव जिहाद’ के खिलाफ आवाज़ उठाई थी। रचित कौशिक ने भी YouTube का विरोध करने के लिए तंज का सहारा लिया और ट्विटर पर एक पोस्टर जारी करते हुए लिखा, “नहीं रहे बाबा, भले आदमी थे बाबा! जब तक थे, भले थे – ये खबर सुनकर Truth & Dare भी चल बसा।”

YouTube ने ‘बार-बार नियमों के उल्लंघन’ का लगाया आरोप

साथ ही उन्होंने ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ के हनन का विरोध करने के लिए अपनी तस्वीर शेयर की, जिसमें उनके मुँह पर क्रॉस का निशान बनाया हुआ था। असल में ‘सब लोकतंत्र’ के अलावा उनका एक और चैनल था, जिसका नाम था – ‘Truth & Dare’, जिसे हमेशा के लिए YouTube ने बैन कर दिया है। YouTube ने अपनी नोटिस में कहा कि इस चैनल ने चेतावनी के बावजूद कई बार नियमों का उल्लंघन किया।

YouTube ने कहा है कि प्लेटफॉर्म को सुरक्षित बनाना उसका कार्य है और दूसरे यूजरों को बचाने के लिए उसने इस चैनल को हटा दिया है। दोनों ही चैनलों को लगभग यही नोटिस देकर कहा गया कि आपने नियमों का बार-बार उल्लंघन किया है। साथ ही कहा है कि अगर आपको लगता है कि हमने गलत निर्णय ले लिया है तो आप इसके खिलाफ अपील कर सकते हैं। रचित कौशिक ने अपने दोनों चैनलों के बैन होने के सम्बन्ध में ऑपइंडिया से बात की।

रचित कौशिक ने ऑपइंडिया से रखी अपनी बात

ऑपइंडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “नए IT नियमों के तहत ऐसी कंपनियों के लिए अनिवार्य है कि वो एक भारतीय ग्रीवांस अधिकारी की नियुक्ति करें। गूगल और यूट्यूब ने इसे पहले ही मान लिया था। लेकिन, अब मैं जब उनसे उनके ग्रीवांस अधिकारी का एक्सेस माँग रहा हूँ तो वो मुझे नहीं मिल रहा है। उनके ग्रीवांस अधिकारी से कैसे संपर्क किया जाए, उनका ईमेल एड्रेस क्या है, ये सब कुछ नहीं बताया जा रहा है।”

इससे पहले दो बार ‘सब लोकतंत्र’ पर YouTube ने प्रहार किया था। एक बार फरहान अख्तर की फिल्म ‘तूफ़ान’ में ‘लव जिहाद’ के महिमामंडन के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए और एक बार रोहिंग्या घुसपैठियों के अपराध को कवर करने के लिए। नियमानुसार, दोनों स्ट्राइक्स के सक्रिय रहने की स्थिति में जब तीसरी बार ‘नियमों के उल्लंघन’ का मामला सामने आता है, तब उस चैनल को YouTube स्थायी रूप से हटा देता है।

लेकिन, रचित कौशिक का कहना है कि उनके चैनल पर कोई तीसरी स्ट्राइक नहीं आई और परमानेंट रिमूवल की कार्रवाई कर दी गई। उन्होंने बताया कि सीधा चैनल को टर्मिनेट किए जाने का ईमेल आया और उसमें कुछ नहीं बताया गया कि किन वीडियोज की वजह से ऐसा किया गया है। वहीं, ‘Truth & Dare’ नाम के चैनल को आज तक कोई चेतावनी नहीं दी गई लेकिन उसे सीधा हटा दिया गया।

रचित कौशिक का कहना है कि चूँकि उनका चैनल सटायर केंद्रित रहा है, इसीलिए हो सकता है कि उनकी किसी बात को YouTube समझ नहीं पाया हो। अक्सर वो मजाकिया अंदाज़ में अपनी बात रखते हैं। इसीलिए, उन्होंने भारतीय IT कानूनों के हिसाब से ग्रीवांस अधिकारी से संपर्क कराने को कहा, तो YouTube वालों ने कहा कि उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं है और उन्होंने वकीलों से संपर्क करने की सलाह दी।

ऐसा नहीं है कि रचित कौशिक ने पहली बार इस तरह की माँग की हो। इससे पहले भी जब उनके चैनल पर अस्थायी बैन लगा था तो उन्होंने ग्रीवांस अधिकारी से संपर्क कराए जाने की माँग की थी। उन्होंने इस सम्बन्ध में YouTube के साथ-साथ केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव को भी लिखा था, लेकिन उनकी तरफ से भी कोई जवाब नहीं आया। कई अन्य यूट्यूबर्स ने भी ‘सब लोकतंत्र’ को हमेशा के लिए बैन किए जाने की निंदा की है।

‘आज की ताज़ा खबर (AKTK)’ यूट्यूब चैनल चलाने वाले अनुज भारद्वाज ने इस घटना की निंदा करते हुए कहा कि जिस तरह से ‘सब लोकतंत्र’ को निशाना बनाया गया है, वो एक सामान्य कार्रवाई न होकर एक शातिर रवैया लगता है। उन्होंने कहा कि YouTube में कार्यरत किसी अधिकारी ने ये निर्णय ले लिया। उन्होंने इसे एक शातिराना अभियान बताते हुए कहा कि ये एक गंभीर व दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है।

रोहिंग्या व ‘तूफ़ान’ में ‘लव जिहाद’ के महिमामंडन पर उठाई थी आवाज़

इससे पहले जिस वीडियो को लेकर ‘सब लोकतंत्र’ के खिलाफ कार्रवाई हुई थी, उसमें उन्होंने रोहिंग्या घुसपैठियों को मिल रहे संरक्षण पर सवाल उठाया था। साथ ही ATS द्वारा दिल्ली से सटे गाजियाबाद से रोहिंग्या घुसपैठियों को हिरासत में लेने की घटना का जिक्र किया था, जो मानव तस्करी में लगे थे। इसी तरह के अन्य घुसपैठियों के पास राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय पहचान पत्र मिले। उन्होंने बताया इन सभी आरोपितों के कागज़ात भारत आने से पहले ही इन्हें मिल गए थे और सरकारी योजनाओं का लाभ भी दिया जा रहा था।

इससे पहले जुलाई 2021 के पहले हफ्ते में रचित कौशिक के यूट्यूब चैनल ‘सब लोकतंत्र‘ को 7 दिनों के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया था। YouTube का कहना था कि उनके चैनल ने ‘हेट स्पीच’ को आगे बढ़ाया है। इस बार भी ‘हेट स्पीच’ वाला राग ही यूट्यूब ने अलापा है। उस वीडियो में उन्होंने बताया था कि कैसे फरहान अख्तर की फिल्म ‘तूफ़ान’ के माध्यम से ‘लव जिहाद’ के गुप्त एजेंडे का महिमामंडन किया जा रहा है।

उन्नाव का मियाँगंज अब बनेगा मायागंज, CM योगी ने किया था नाम बदलने का वादा: अब ग्राम पंचायत ने भेजा यूपी सरकार के पास प्रस्ताव

जिलों और रेलवे स्टेशनों का नाम बदलने के बाद उत्तर प्रदेश में एक और नाम बदलने जा रहा है। प्रदेश के उन्नाव जिले की ग्राम पंचायत मियागंज का नाम बदलकर मायागंज करने की सिफारिश की गई है। जिले के डीएम रवींद्र कुमार ने इस संबंध में पंचायती राज विभाग के मुख्य सचिव को रिपोर्ट भेजी है। माना जा रहा है कि निकट भविष्य में मियागंज का नाम बदलकर मायागंज कर दिया जाएगा।

रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2017 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चुनाव प्रचार के दौरान ही इस ग्राम पंचायत का नाम बदलने का ऐलान किया था। 24 अगस्त को सरकार को भेजे गए पत्र के मुताबिक, ग्राम पंचायत मियागंज का नाम बदलकर मायागंज करने के लिए प्रस्ताव पारित किया जा चुका है। अब इस पर सरकार की मुहर लगते ही मियागंज ग्राम पंचायत मायागंज हो जाएगी। प्रशासन अब इसकी तैयारियों में जुट गया है।

अभी हाल ही में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले का नाम बदलकर हरिगढ़ किए जाने को लेकर सोमवार (16 अगस्त 2021) को नवगठित जिला पंचायत बोर्ड की बैठक में निर्णय लिया गया था। नाम बदलने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया गया और उसे सरकार के पास भेजा गया है।

मुगलसराय रेलवे स्टेशन से हुई थी नाम बदलने की शुरुआत

योगी सरकार ने सत्ता में आने के बाद बड़े बदलाव किए। इसी के तहत नाम बदलने शुरुआत मुगलसराय रेलवे स्टेशन का नामकरण करने के साथ हुई, जिसके तहत इस स्टेशन का नाम बदलकर पंडित दीन दयाल उपाध्याय कर दिया गया था। उसके बाद इलाहाबाद को प्रयागराज और प्रयाग घाट रेलवे स्टेशन का नाम प्रयागराज संगम रेलवे स्टेशन कर दिया गया था। इसके अलावा फैजाबाद शहर का नाम बदलकर भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या के नाम पर रख दिया गया था।

इतना ही नहीं मैनपुरी जिले का नाम मयनऋषि और झाँसी रेलवे स्टेशन का नाम वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई किए जाने का भी प्रस्ताव है।

गोल्डन थ्रो से पहले ‘गायब’ था नीरज चोपड़ा का भाला, पाकिस्तान के अरशद नदीम के पास मिला: जानिए क्या हो सकते हैं कारण

टोक्यो ओलंपिक के गोल्ड मेडलिस्ट नीरज चोपड़ा ने टाइम्स ऑफ इंडिया को दिए इंटरव्यू में खुलासा किया है कि जिस दिन उन्होंने स्वर्ण पदक जीता, उस दिन कुछ समय के लिए उन्हें उनका भाला नहीं मिल पा रहा था।

अरशद नदीम से अपना भाला लेने के बाद नीरज चोपड़ा

चोपड़ा ने बताया कि वह फाइनल राउंड की शुरुआत में अपने भाले को खोज रहे थे और उन्हें वह मिल नहीं रहा था। तभी, उन्होंने पाकिस्तानी एथलीट अरशद नदीम को अपने जैवलीन के साथ घूमते देखा। चोपड़ा ने नदीम से फौरन उनका भाला लौटाने को कहा। नदीम ने उन्हें उस भाले को दिया और फिर चोपड़ा ने खेल में पार्टिसिपेट किया। चोपड़ा कहते हैं कि इसी वाकये की वजह से वह पहली थ्रो के समय थोड़ा हड़बड़ाहट में थे।

क्लिप में देख सकते हैं कि नीरज चोपड़ा, नदीम के पास जाकर कैसे अपना जैवलीन ले रहे हैं। इस वीडियो को देखने के बाद सोशल मीडिया पर कयास लग रहे हैं कि आखिर अरशद नदीम, भारतीय एथलीट नीरज चोपड़ा का जैवलीन लेकर क्या कर रहे थे। कई लोगों को शक है कि कहीं अरशद कुछ गड़बड़ करने की कोशिश तो नहीं कर रहे थे।

मालूम हो कि पाकिस्तानी खिलाड़ियों पर अक्सर टैंपरिंग के आरोप लगे हैं। खासकर पाकिस्तानी क्रिकेटर्स पर बॉल के साथ छेड़छाड़ करने के आरोप नए नहीं हैं। इसलिए नेटीजन्स का डर निराधार नहीं हैं।

इस बात की संभावना है कि अरशद नदीम, नीरज के भाले पर नजर मार रहे थे। चोपड़ा को जहाँ भारत सरकार का पूरा समर्थन मिला हुआ था, वहीं पाकिस्तानी अरशद नदीम को अपनी सरकार का समर्थन न मिलने के कारण दुख था और वह इस बात से चिंतित भी थे।

इस बात का पता ठीक तब भी चला जब नीरज चोपड़ा ने गोल्ड जीता और पाकिस्तानियों ने बताना शुरू किया कि कैसे नीरज को बेस्ट ट्रेनिंग मिली जबकि उनके प्रतिभागी को सरकार का कोई समर्थन नहीं था।

टोक्यो ओलंपिक से कुछ समय पहले, चोपड़ा ने बताया भी था कि कैसे भारत सरकार ने उनके लिए यह सुनिश्चित किया था कि वह विदेश में जाकर ट्रेनिंग लें।

उन्होंने बताया था कि जब उन्हें यूरोप में ट्रेनिंग लेने जाना था तो कैसे भारत सरकार ने सख्त वीजा और यात्रा प्रतिबंधों के बावजूद उनके लिए हर चीज सुनिश्चित की थी। वहीं अरब न्यूज में प्रकाशित एक आर्टिकल बताता है कि कैसे नदीम ने पाकिस्तानी खिलाड़ियों के लिए सुविधाओं के अभाव और सरकार का समर्थन न मिलने पर अफसोस जताया था।

उन्होंने टोक्यो से अरब न्यूज़ को बताया था कि कैसे सरकार ने उन लोगों को बहुत कम समर्थन दिया। वह बोले, “दी गई सुविधाओं के साथ, हम केवल दिल जीत सकते हैं, पदक नहीं।” उन्होंने ये भी बताया कि कैसे पाकिस्तानी सरकार सिर्फ क्रिकेट की दीवानी है इसलिए वह अन्य खेलों पर ध्यान भी नहीं देते।

पाकिस्तान ओलंपिक संघ के चिकित्सा आयोग के सचिव डॉ असद अब्बास शाह ने अरब न्यूज़ से बातचीत में दावा किया था कि अरशद को चिंता थी क्योंकि वह एक Humble बैकग्राउंड से आते हैं। मीडिया से बात करते हुए डॉ शाह इस बात पर भी हैरान थे कि कैसे भारतीय खिलाड़ी अच्छे से तैयार थे। उन्होंने कहा “वे अपने साथ एक ओस्टियोपैथ, फिजियोथेरेपिस्ट, स्पोर्ट्स साइकोलॉजिस्ट, डॉक्टर, ऑर्थोपेडिक सर्जन और यहाँ तक ​​​​कि न्यूरोलॉजिस्ट भी लाए थे। उनके पास एक आर्केस्ट्रा है। हमारे पास क्या है? कुछ नहीं। ”

बता दें कि इस पूरे मामले के संबंध में ऑपइंडिया ने नीरज चोपड़ा और अरशद नदीम से बात करने की कोशिश की है। जैसे ही हमारी बात उनसे होगी और वो इस पूरे मामले पर अपना पक्ष रखेंगे हम अपनी इस रिपोर्ट को अपडेट करेंगे।

AMU के कुलपति ने कल्याण सिंह को दी श्रद्धांजलि: विरोध में यूनिवर्सिटी में लगे पर्चे, कहा- ‘मुस्लिमों की भावना आहत की’

यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री और राम मंदिर आंदोलन के अग्रदूत कल्याण सिंह के निधन पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के कुलपति तारिक़ मंसूर के शोक जताने पर कैंपस में नया विवाद खड़ा हो गया। विश्वविद्यालय परिसर में कई जगह कुलपति के विरोध में पर्चे लगाए गए हैं, जिसमें कहा गया है कि उन्होंने शोक व्यक्त कर छात्रों की भावनाओं को आहत किया है।

दरअसल, कल्याण सिंह का 21 अगस्त को निधन हो गया था। 22 अगस्त को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति द्वारा उनके निधन पर शोक संवेदना व्यक्त की गई। शोक संवेदना व्यक्त किए जाने की एएमयू के छात्रों ने निंदा की है।

AMU में लगे पर्चे (साभार-दैनिक जागरण)

हिंदी, इंग्लिश और उर्दू में लगाए गए पर्चे में लिखा गया है कि एएमयू कुलपति तारिक मंसूर द्वारा कल्याण सिंह के निधन पर शोक व्यक्त करना शर्मनाक है, क्योंकि कल्याण सिंह बाबरी विध्वंस की घटना में शामिल मुख्य पात्रों में से एक थे। इतना ही नहीं शोक संवेदना व्यक्त कर कुलपति ने न सिर्फ मुस्लिम समुदाय बल्कि यूनिवर्सिटी की भावनाओं को भी आहत किया है। कुलपति की शोक संवेदना ने न केवल पूरे अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के छात्रों को शर्मिंदा किया है बल्कि इसकी ऐतिहासिक परम्पराओं को भी ठेस पहुँचाया है जो न्याय और निष्पक्षता में यकीन रखती है। यूनिवर्सिटी के छात्र कुलपति के इस शर्मनाक व्यवहार की निंदा करते हैं। कुलपति ने एक ऐसे पार्टी के नेता को सपोर्ट किया है जो अपने निहित स्वार्थ फासिज्म का समर्थन करती है। उनका अपराध माफ़ी योग्य नहीं है।

AMU में लगे पर्चे (साभार-दैनिक जागरण)

बता दें कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. तारिक मंसूर ने कल्याण सिंह के निधन पर गहरा शोक व्यक्त हुए कहा था कल्याण सिंह ने देश के सार्वजनिक जीवन और उत्तर प्रदेश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें और उनके परिवार को इस अपार दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करें। कुलपति प्रोफेसर तारिक मंसूर ने कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह (लोकसभा सदस्य) से भी अपनी संवेदना और सहानुभूति व्यक्त की है।

यहाँ गौर करने वाली बात है कि कैंपस में जो पर्चे लगाए गए हैं, उस पर किसी संगठन या छात्र का नाम नहीं है। लेकिन कुछ छात्रों ने इसका समर्थन किया है। इस संबंध में विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर प्रोफेसर वसीम अली का कहना है कि विश्वविद्यालय परिसर में इस समय छात्र नहीं हैं। कैंपस खाली है। इसके पीछे किसी बहरी शरारती तत्वों का हाथ हो सकता है। हालाँकि, मंगलवार को विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस तरह के पर्चे हटवा दिए हैं। लेकिन कुछ लोगों ने इन पर्चों का फोटो खींचकर सोशल मीडिया पर भी डाल दिया है। अगर वह कानून उल्लंघन के दायरे में आता है तो उसकी भी जाँच की जाएगी। 

वहीं, कल्याण सिंह के निधन पर सपा और कॉन्ग्रेस के नेताओं द्वारा उन्हें श्रद्धांजलि नहीं देने पर भी राजनीतिक हलचल तेज है। पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को अंतिम विदाई देने के लिए कॉन्ग्रेस और सपा नेताओं के नहीं आने पर भाजपा ने दोनों ही दलों पर निशाना साधा है।