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मस्जिद के पास से जुलूस निकालने पर बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमला, कट्टरपंथियों की भीड़ ने मंदिरों में की तोड़फोड़, कई घरों-दुकानों को लूटा

पाकिस्तान के बाद अब बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के मंदिरों को निशाना बनाया गया है। शनिवार (7 अगस्त) को बांग्लादेश में कुछ कट्टरपंथियों ने अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के कई घरों, दुकानों पर हमला किया और चार मंदिरों में तोड़फोड़ की। यह घटना बांग्लादेश के खुलना जिले के रूपशा उपजिला के शियाली गाँव की है।

बांग्लादेश हिंदू यूनिटी काउंसिल ने अपने ट्विटर हैंडल पर कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकियों द्वारा मंदिर में तोड़फोड़ की कुछ तस्वीरें शेयर की हैं। ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गई हैं। ट्वीट में लिखा है, ”खुलना जिले के रूपशा उपजिला में शनिवार को सैकड़ों कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकियों ने शियाली (Shiali) और गोवारा (Gowara) गाँव पर हमला किया। उन्होंने इलाके के सभी मंदिरों और 58 हिंदुओं के घरों में तोड़फोड़ की। पुलिस ने इस मामले में अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की है। यहाँ तक कि बांग्लादेश में किसी भी मीडिया ने इस घटना को सबके सामने लाना जरूरी नहीं समझा।”

समकाल (Samakaal) की एक रिपोर्ट के अनुसार, हमला शनिवार को शाम करीब 5:45 बजे किया गया। हथियारों से लैस आतंकियों ने घात लगाकर गाँव पर हमला किया था। हिंसा के दौरान 4 मंदिरों को तहस-नहस कर दिया गया और हिंदुओं के घरों में तोड़फोड़ की गई। इसके अलावा, आतंकियों ने 6 दुकानों को भी नष्ट कर दिया। घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस अधीक्षक (एसपी) समेत वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की टीम मौके पर पहुँची। घटना के बाद से गाँव के लोगों में भय व तनाव का माहौल है। स्थिति को नियंत्रित करने के लिए गाँव में पुलिस बल तैनात कर दिया है।

स्थानीय निवासियों और पूजा परिषद के नेताओं के मुताबिक, शुक्रवार (6 अगस्त) रात करीब नौ बजे महिला श्रद्धालुओं के एक समूह ने पूर्व पारा मंदिर से शियाली श्मशान घाट तक जुलूस निकाला था। उन्होंने रास्ते में एक मस्जिद पार की थी, इस दौरान इमाम (इस्लामी मौलवी) ने जुलूस का विरोध किया। इससे हिंदू भक्तों और मौलवी के बीच तीखी नोक-झोंक हुई। तय हुआ कि शनिवार को इस मामले को पुलिस के समक्ष उठाया जाएगा।

हथियारों से लैस आतंकियों ने हिंदुओं पर किया हमला, मंदिरों को किया अपवित्र

उस दिन गाँव में कई बदमाश हथियार, हंसिया, फावड़ा लेकर पहुँचे और जमकर तोड़फोड़ की। उन्होंने गणेश मल्लिक (फॉर्मेसी), श्रीबास मल्लिक (किराना), सौरभ मल्लिक (चाय और किराना), अनिर्बन हीरा (चाय की दुकान) और उनके पिता मजूमदार सहित स्थानीय हिंदुओं की दुकानों में तोड़फोड़ की। साथ ही शिबपद धार नाम के एक व्यक्ति के आवास को भी लूट लिया। बदमाशों ने उनके घर में ‘गोविंदा मंदिर’ को भी नष्ट कर दिया। जिन अन्य मंदिरों को अपवित्र किया गया, उनमें शियाली पुरबापारा का ‘हरि मंदिर’, दुर्गा मंदिर और शियाली महाश्मशान मंदिर शामिल हैं। मंदिर में रखी कई मूर्तियों को भी तोड़ दिया गया है।

यति नरसिंहानंद का ‘पुराना वीडियो’ वायरल: वामपंथी पत्रकार के ट्वीट का NCW ने लिया संज्ञान, कार्रवाई के लिए यूपी DGP को पत्र

राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को गाजियाबाद के डासना मंदिर के महंत यति नरसिंहानंद सरस्वती के खिलाफ संबंधित धाराओं में प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया है। यह निर्देश उनके कथित भाषण का वीडियो ट्विटर पर वायरल होने के बाद आया है।

स्रोत:@NCWIndia/ट्विटर

महिला आयोग ने पत्रकार से फिल्मकार बने विनोद कापड़ी द्वारा साझा किए गए एक वीडियो का हवाला दिया। इस वीडियो को देखकर महिला आयोग ने निष्कर्ष निकाला कि यति नरसिंहानंद ने “महिलाओं पर अनुचित टिप्पणी और उनके लिए अभद्र शब्दों का उपयोग किया था।” कापड़ी ने अपने ट्वीट में महिला आयोग को भी टैग किया था।

वीडियो में यति नरसिंहानंद ने कहा है, “ज्यादातर कॉलगर्ल हिंदू महिलाएँ होती हैं। ये वो महिलाएँ होती हैं, जो प्रेम के चक्कर में जेहादी मुस्लिमों के चंगुल में फँसकर अपनी फोटो खिंचवा बैठती हैं। उनके द्वारा कभी पैसे के लिए, कभी किसी अधिकारी को खुश करने के लिए तो कभी नेताओं के लिए भेजी जाती हैं। कितनी दुर्गति हो गई हमारी बहन-बेटियों की?” हालाँकि, इस वीडियो की सत्यता की ऑपइंडिया पुष्टि नहीं करता है।

गौरतलब है कि हाल के दिनों में यति नरसिंहानंद की हत्या के प्रयास हुए हैं। 2 जून को गाजियाबाद के डासना मंदिर के सेवादारों ने महंत यति नरसिंहानंद की हत्या के प्रयास के संदेह में विपुल विजयवर्गी और काशिफ नाम के दो लोगों को पकड़ा था। यति नरसिंहानंद सरस्वती ने एक ट्वीट में कहा था, “आज दो और सूअर पकड़े गए जो मेरी हत्या करने आए थे। मुझे मारना इतना आसान नहीं है।”

डासना मंदिर के पुजारी के करीबी अनिल यादव ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। पुलिस अधीक्षक डॉ इराज राजा ने बताया था कि दोनों संदिग्धों को गिरफ्तार कर लिया गया है। 17 मई को दिल्ली पुलिस ने 24 वर्षीय जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादी मोहम्मद डार उर्फ जहाँगीर की दिल्ली के पहाड़गंज से गिरफ्तारी थी। इसके बाद डासना देवी मंदिर के महंत यति नरसिघानंद सरस्वती की हत्या की साजिश का खुलासा हुआ था।

जमात-ए-इस्लामी के विरुद्ध टेरर फंडिंग केस में NIA की बड़ी कार्रवाई, J&K में 56 ठिकानों पर मारी रेड

जम्मू-कश्मीर में टेरर फंडिंग मामले में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए प्रतिबंधित संगठन जमात-ए-इस्लामी के खिलाफ दर्ज एक मामले में प्रदेश पुलिस और सीआरपीएफ की मदद से रविवार (अगस्त 8, 2021) को लगभग 56 स्थानों पर छापेमारी की।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, NIA के प्रवक्ता ने बताया कि एनआईए ने कश्मीर के सभी 10 जिलों और जम्मू प्रांत के 4 जिलों- रामबन, किश्तवाड़, डोडा और राजौरी में 56 स्थानों पर संयुक्त छापेमारी की। इस दौरान एजेंसी ने दस्तावेजों और डिजिटल उपकरणों को जब्त कर लिया। एजेंसी प्रवक्ता ने कहा, “प्रतिबंधित संगठन के पदाधिकारियों, सदस्यों और कथित तौर पर जमात-ए-इस्लामी द्वारा संचालित ट्रस्ट के कार्यालय परिसरों में आज तलाशी अभियान चलाया गया। अभियान के दौरान, संदिग्धों के परिसर से विभिन्न इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और आपत्तिजनक दस्तावेज जब्त किए गए।”

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी का हालिया एक्शन जमात-ए-इस्लामी के खिलाफ सबसे बड़ी कार्रवाई में से एक है। पूरी कार्रवाई के दौरान श्रीनगर में सौरा निवासी गाजी मोइन-उल इस्लाम के आवास और नौगाम में अलगाववाद का बीज बोने वाले फलाह-ए-आम ट्रस्ट पर भी छापेमारी हुई। इसके अलावा बांदीपोरा में पूर्व जमात अध्यक्ष के आवास, अनंतनाग जिले में मुश्ताक अहमद वानी पुत्र गुलाम हसन वानी, नजीर अहमद रैना पुत्र गुलाम रसूल रैना, फारूक अहमद खान पुत्र मोहम्मद याकूब खान और आफताक अहमद मीर, अहमदुल्ला पारे के ठिकानों पर भी छापेमारी हुई है। बडगाम जिले में डॉ मोहम्मद सुल्तान भट, गुलाम मोहम्मद वानी और गुलजार अहमद शाह समेत कई जमात नेताओं के आवासों पर छापेमारी हुई। 

उल्लेखनीय है कि केंद्र सरकार ने फरवरी 2019 में आतंकवाद रोधी कानूनों के तहत जमात-ए-इस्लामी को 5 साल के लिए इस आधार पर प्रतिबंधित किया था कि वह आतंकवादी संगठनों के ‘करीबी संपर्क’ में था और उसपर प्रदेश में अलगाववादी आंदोलन को बढ़ाने की आशंका थी। इसके अलावा अभी हाल में एनआईए ने 5 फरवरी 2021 को इस जमात-ए-इस्लामी पर अलगाववादी गतिविधियों में शामिल होने के लिए एक मामला दर्ज किया है। इस संगठन को हिजबुल मुजाहिदीन का राजनीतिक चेहरा कहा जाता है। इसका काम आतंकियों को प्रशिक्षण देना, वित्तीय मदद करना, शरण देना और हर संसाधन मुहैया कराना था। इसके अलावा इसे कई आतंकी घटनाओं के लिए जिम्मेदार माना जाता है।

राहुल गाँधी का अकॉउंट लॉक होने से भड़की कॉन्ग्रेस ने भी शेयर किया पीड़िता के परिवार की फोटो, Twitter को दी कार्रवाई की धमकी

राहुल गाँधी के ट्विटर अकॉउंट पर एक्शन से आहत कॉन्ग्रेस ने भी रेप पीड़िता की पहचान उजागर करते हुए रविवार (अगस्त 8, 2021) को ट्विटर इंडिया को अपना ट्विटर हैंडल लॉक करने की खुलेआम चुनौती दे दी है। राहुल गाँधी का ट्विटर अकाउंट NCPCR की नोटिस के बाद ट्विटर द्वारा लॉक किए जाने के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी ने यह चुनौती दी है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ऐसा माना जा रहा है कि दिल्ली के नांगल में 9 साल की एक बच्ची से रेप और हत्या की घटना में पीड़िता की पहचान उजागर करने की वजह से उनपर यह कार्रवाई की गई है।

कॉन्ग्रेस ने #मैं_भी_Rahul हैशटैग के साथ ट्वीट किया, ”ट्विटर इंडिया हमारा भी अकाउंट लॉक कर दो। हम आपको चुनौती देते हैं। न्याय के लिए लड़ने और सच को उजागर करने से हमें कुछ नहीं रोक सकता है।” ऐसी मुहीम चलाते हुए कॉन्ग्रेस ने एक बार फिर विवादित तस्वीर को शेयर किया है, जिसकी वजह से राहुल गाँधी के ट्विटर हैंडल को लॉक किया गया है।

गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी का ट्विटर हैंडल शनिवार को अस्थायी रूप से लॉक कर दिया गया था। कॉन्ग्रेस ने पहले अपने बयान में कहा था कि राहुल गाँधी के अकाउंट को सस्पेंड कर दिया गया है, लेकिन ट्विटर की ओर से इनकार किए जाने के बाद पार्टी ने कहा कि अकाउंट को लॉक किया गया है।

बता दें कि दिल्ली में कथित रेप पीड़िता के माता-पिता की फोटो ट्वीट कर पहचान उजागर करने के मामले में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने ट्विटर इंडिया को नोटिस जारी कर राहुल गाँधी के खिलाफ कार्रवाई करने की माँग की थी। इसके बाद कार्रवाई करते हुए ट्विटर ने उनके विवादित ट्वीट को हटा दिया था।

ट्वीट के बाद राहुल गाँधी के खिलाफ दिल्ली की नांगल बलात्कार पीड़िता की पहचान का खुलासा करने और इस प्रकार यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम की धारा 23, किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम की धारा 74, भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) का अधिनियम 228 ए का उल्लंघन करने के लिए दिल्ली पुलिस में उनके खिलाफ शिकायत दर्ज की गई थी।

हिंदुओं का चोला पहनो, हिंदू लड़कियों को फँसाओ और शुरू करो माइंडवॉश: JMB आतंकियों की गिरफ्तारी के बाद हुआ नए पैटर्न का खुलासा

पिछले वर्ष ढाका में आतंकी संगठन जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश की सदस्य आएशा जन्नत उर्फ प्रज्ञा देबनाथ के गिरफ्तार होने के बाद पश्चिम बंगाल में चल रहे धर्मांतरण और माइंडवॉश के घिनौने खेल का पर्दाफाश हुआ था। आएशा एक हिंदू लड़की थी जिसका 2009 में धर्मांतरण हुआ और वह करीब दस साल बाद आतंकी संगठन की सक्रिय सदस्य होने के कारण ढाका में पकड़ी। इसी क्रम में इसी संगठन के तीन सदस्य हाल में फिर बंगाल से पकड़े गए और जब कोलकाता पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने इनसे पूछताछ की तो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक जानकारी निकल कर सामने आई और ये भी पता चला कि आखिर प्रज्ञा जैसी लड़कियाँ आएशा में कैसे तब्दील हो रही हैं।

दरअसल, पिछले माह कोलकाता पुलिस की एसटीएफ ने नजीउर रहमान पावेल, मेकैल खान और रबीउल इस्लाम को गिरफ्तार किया था। ये तीनों जेएमबी के संचालक थे और मौका पाकर भारत में घुस आए थे। इसलिए इनकी गिरफ्तारी बड़ी कामयाबी मानी गई। मगर जब पूछताछ हुई तो तस्वीर कुछ और ही थी। हकीकत में आतंकी संगठन से जुड़े यह तीनों सदस्य न केवल अपनी असल पहचान छिपाकर बंगाल के रिहायशी इलाके हरिदेवपुर में अपार्टमेंट लेकर रह रहे थे बल्कि हिंदू लड़कियों को निशाना बना रहे थे ताकि इन्हें एक सेफ पहचान मिल सके। इन्होंने शक की नजरों से बचने के लिए खुद को व्यापारी, फल विक्रेता और मच्छरदानी बेचने वाले के तौर पर पेश किया हुआ था। इनमें नजीउर ने अपना नाम जयराम बेपारी रखा था और फिर मैकेल के साथ दो हिंदू महिलाओं को दोस्ती के जाल में फँसाकर उनसे शादी की योजना बना रहा था। 

आतंकी हिंदू धर्म का चोला पहनकर चला रहे मॉड्यूल

नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में कोलकाता स्पेशल टास्क फोर्स के अधिकारी कहते हैं, “आतंकी समूहों के लिए धर्म अब वर्जित नहीं है, बल्कि वे इसे अपनी पहचान छिपाने के लिए एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। धर्म बदलना अब इन आकाओं के लिए कोई महत्वपूर्ण बात नहीं है, बल्कि वे इंटेलिजेंस को चकमा देने के लिए इसका प्रभावी ढंग से उपयोग कर रहे हैं।”

अधिकारी बताते हैं कि इन आतंकियों के लिए शादी महत्वपूर्ण और प्रभावी साधन है। इससे इन्हें भारतीय पहचान मिलने में मदद तो मिलती ही है, साथ ही इन्हें एक स्थानीय पहचान भी प्राप्त होती है जो इनके लिए सुरक्षा कवच की तरह काम करती है। इससे स्थानीय लोग और स्वाभाविक रूप से पुलिस उनके अस्तित्व से अनजान रहती है।

बेरोजगारी का उठाया खूब लाभ

रिपोर्ट के मुताबिक, कोरोना महामारी में बढ़ी बेरोजगारी का आतंकी संगठनों ने खूब फायदा उठाया। न केवल जेएमबी, अंसारुल्लाह गुट, बल्कि आईएस जैसे अंतरराष्ट्रीय आतंकी गुट ने भी युवाओं को निशाना बनाते हुए अपना जाल फेंका। पुलिस की टीम ने स्वयं उन तीनों आतंकियों से पूछताछ के बाद बताया कि ये लोग कभी आमने-सामने मिलकर तो कभी ऑनलाइन बेरोजगार लड़के-लड़कियों को निशाना बना रहे थे।

बंगाल पुलिस में कम हैं स्लीपर सेल से निपटने वाले कॉन्सटेबल

पूछताछ के बाद निकलकर आई जानकारी ने जाँच अधिकारियों की चिंता बढ़ा दी है। राज्य के गृह विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि मेधावी बेरोजगारों का ब्रेनवॉश केवल जमीनी स्तर पर ही पुलिस द्वारा कंट्रोल किया जा सकता है। इसके लिए कॉन्सटेबल स्तर के कर्मियों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। मगर, दुर्भाग्य से बंगाल में ऐसा नहीं हुआ। बंगाल पुलिस में उन जवानों की कमी है जो स्लीपर सेल के खतरे से निपटने के लिए प्रशिक्षित हैं।

कोलकाता के छोटे गाँव की लड़की प्रज्ञा कैसे बनी JMB की आएशा जन्नत

यहाँ बता दें कि जेएमबी की आएशा भी कोलकाता के धनियाकाली पुलिस थाने के अंतर्गत आने वाले गाँव पश्चिम केशाबपुर की रहने वाली थी। पढ़ाई के दौरान उसकी सबसे अच्छी दोस्त मुस्लिम थी। उसके प्रभाव में बेहद खुफ़िया तरीके से प्रज्ञा (आएशा) का धर्म परिवर्तन कराया गया।

साल 2009 के दौरान धोखे से उसे इस्लाम धर्म कबूल कराया गया और फिर उसका नाम बदलकर रखा गया आएशा जन्नत मोहोना। इसके बाद उसमें मजहबी कट्टरता भरकर जेएमबी की सदस्यता दिलाई गई और काम सौंपा गया कि वह भी हिंदू लड़कियों को इस्लाम कबूल करने का लालच दे।

आएशा ने ये सब किया भी। उसने कट्टर मौलवी सलफी से हिंदू लड़कियों का परिचय करवाया और फिर उनके धर्मांतरण पर काम किया। आएशा को संगठन से फंड इकट्ठा करने की ज़िम्मेदारी भी मिली थी। लेकिन उसका मुख्य काम यही था कि सबसे पहले वह ऐसे युवाओं की पहचान करे जिन्हें आसानी से कट्टरपंथी बनाया जा सकता है। इसके बाद उन्हें जेएमबी की सदस्यता दिलवाना था।

राज्य से पकड़ा गया था JMB का टॉप कमांडर

साल 2020 में ही बंगाल के मुर्शिदाबाद में पुलिस ने इस्लामिक आतंकी और जमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश के टॉप कमांडर अब्दुल करीम उर्फ बोरो अब्दुल करीम को गिरफ्तार किया था। वह लंबे समय से देश भर में पहचान छिपाकर घूम रहा था। वह बोधगया विस्फोट में शामिल धुलियन मॉड्यूल का भी मेन लीडर था। उसका काम भी युवाओं को भ्रमित करके संगठन से जोड़ना था।

बेंगलुरु में गिरफ्तार हुआ अबू इब्राहिम

ऐसे ही साल 2020 में बेंगलुरु से भी एक गिरफ्तारी हुई। ये गिरफ्तारी ISIS संचालकों में से एक की थी। इसकी पहचान अबू इब्राहिम के तौर पर हुई। जो कभी अर्थशास्त्र का मेधावी छात्र था लेकिन बाद में सुजीत चंद्र देबनाथ बनकर बेंगलुरु में एक राजमिस्त्री के सहायक के तौर पर काम करके अपनी पहचान छिपाकर रहने लगा।

24 घंटे में 572 तालिबानी आतंकी ढेर, 300 से ज्यादा घायल: अफगानिस्तान में अमेरिका की मदद से बड़ा हवाई हमला

अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिक वापस लौट गए हैं। इसके बावजूद अमेरिका लगातार अफगान सेना की मदद कर रहा है। इसी बीच अफगानी सेना के जवानों को बड़ी कामयाबी मिली है। उन्होंने पिछले 24 घंटों के दौरान 572 आतंकवादियों को मार गिराया और 309 अन्य को घायल कर दिया है। अफगानिस्तानी रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता फवाद अमान ने रविवार (8 अगस्त) को ट्वीट कर इसकी जानकारी दी। अमान ने ट्वीट किया, ”नंगरहार, लगमन, गजनी, पक्तिया, पक्तिका, कंधार, उरुजगन, हेरात, फराह, जोजजान, सर-ए पोल, फरयाब, हेलमंद, निमरुज, तखर, कुंदुज, बदख्शां और कपिसा प्रांत में पिछले 24 घंटों के दौरान में अफगानिस्तान राष्ट्रीय रक्षा एवं सुरक्षा बल एएनडीएसएफ के अभियानों में 572 आतंकवादी मारे गए और 309 अन्य घायल हो गए।”

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका के बी-52 बमवर्षक विमानों ने शनिवार (7 अगस्त) को अफगानिस्तान के जवज्जान प्रांत की राजधानी शेबरगन में आतंकवादी संगठन तालिबान के ठिकानों पर हवाई हमले किए थे। बताया जा रहा है कि इस हमले में 200 से अधिक तालिबानी आतंकी ढेर हो गए थे।

फवाद अमान ने शनिवार देर रात ट्वीट कर इसकी जानकारी दी थी। उन्होंने ट्वीट किया, ”अमेरिकी बमवर्षक विमानों ने आज शाम जवज्जान प्रांत की राजधानी शेबरगन में तालिबानी ठिकानों पर एयर स्ट्राइक की, जिसमें 200 से अधिक आतंकी मारे गए।” उन्होंने बताया कि हवाई हमले में बड़ी मात्रा में आतंकवादियों के हथियार, गोला-बारूद और 100 से अधिक वाहन नष्ट हो गए हैं।

अमान ने अफगानिस्तानी जवानों के आज कई वीडियो शेयर किए हैं। अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद से एएनडीएसएफ और तालिबानी आतंकवादियों के बीच संघर्ष बढ़ गया है।

गौरतलब है कि तालिबान ने शनिवार को घोषणा की थी कि उसने दक्षिण-पश्चिमी प्रांत निमरूज और उत्तरी प्रांत जवज्जान पर कब्जा कर लिया है। निमरूज की राजधानी जरंज वर्ष 2016 के बाद पहला ऐसा प्रांतीय केंद्र बन गई है, जिस पर तालिबान ने कब्जा किया है।

‘अगली सदी तक विलुप्त हो जाएगा हिंदू धर्म’: स्तंभकार अभिजीत अय्यर मित्रा की भविष्यवाणी, जानिए इसके पीछे का तर्क

‘कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी…’ – हममें निश्चित रूप से कुछ खास है, जिसकी वजह से हमारा अस्तित्व मिट नहीं पाया (रोम, ईरान, मिस्र आदि जैसे प्राचीन सभ्यताओं और धर्मों की तुलना में)। अल्लामा इकबाल द्वारा लिखी गईं ये पंक्तियाँ उनके लोकप्रिय गीत ‘सारे जहां से अच्छा…’ का हिस्सा हैं। अक्सर इन पंक्तियों को इस आश्वासन के रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि पर्याप्त हिंदू जनसंख्या वाले दुनिया के एकमात्र देश भारत हजारों वर्षों से जीवित है और आगे भी जीवित रहेगा। इस तरह हिंदू और हिंदू धर्म का भी अस्तित्व बना रहेगा।

विडंबना यह है कि इकबाल ने खुद अपने लिखे इस गीत को कुछ ही वर्षों में नकार दिया था। उन्होंने एक और गीत ‘मुस्लिम हैं हम, वतन है सारा जहां हमारा’ लिखा, जो उनके पहले लिखे गीत ‘हिंदी हैं हम, वतन है हिंदुस्तां हमारा’ से पूरी तरह विरोधाभासी था। बाद में यही इकबाल द्वि-राष्ट्र सिद्धांत के प्रस्तावक बन गए, जिसके परिणामस्वरूप भारत का विभाजन हुआ और मुसलमानों के लिए एक अलग इस्लामी मुल्क का निर्माण हुआ। वर्तमान पाकिस्तान की भूमि और हिंदू उस व्यक्ति के दर्शन से नहीं बच सके, जिसकी पंक्तियों को हिंदुओं और हिंदुस्तान के अस्तित्व को आश्वस्त करने वाला माना जाता है।

हिंदुओं और हिंदू धर्म के अस्तित्व और भविष्य के बारे में बहस नई नहीं है। भारत विभाजन एक अच्छा उदाहरण है, जिससे पता चलता है कि कैसे हिंदुओं ने अपनी भूमि और विरासत का एक बड़ा हिस्सा रातों-रात खो दिया। विभाजन के बाद जो धर्मनिरपेक्ष भारत के रूप में बचा, उसमें हिंदुओं की जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट हिंदू ताकत में गिरावट के सबूत के रूप में दिखाता है, जो एक और विभाजन की ओर हमें ढकेल रहा है। हालाँकि, कुछ ‘उदारवादी’ इसे ‘साजिशी सिद्धांत’ बताकर खारिज करते रहते हैं, जबकि हर दशक में देश की कुल जनसंख्या में हिंदुओं की हिस्सेदारी लगातार गिरती जा रही है।

हालाँकि, जनसंख्या में घटती हिस्सेदारी दिखाना एक सरल अंकगणितीय प्रक्षेपण नहीं है, जिसमें भारत में हिंदुओं को अल्पसंख्यक बन जाने के वास्तविक समय की भविष्यवाणी की जा सके। स्तंभकार और रक्षा विश्लेषक अभिजीत अय्यर मित्रा का मानना ​​है कि यह प्रक्रिया जल्द ही एक ऐसे मोड़ पर पहुँच सकती है, जहाँ से अपरिवर्तनीय गिरावट आएगी और ‘हिंदू धर्म का अंत’ होगा। उनका मानना ​​​​है कि अगर हिंदू और हिंदू नेतृत्व इस खेल को नहीं समझे तो ऐसा एक सदी के भीतर ही हो जाएगा।

अभिजीत एक घंटे से अधिक समय के एक वीडियो टॉक में इस दिन की भविष्यवाणी की व्याख्या करते हैं। इसे पॉडकास्टर कुशाल मेहरा द्वारा होस्ट किया गया है, जिसे यहाँ देखा जा सकता है। अभिजीत भारत में हिंदुओं को अल्पसंख्यक बनाने के लिए कुछ शक्तिशाली लॉबी द्वारा की जा रही किसी बड़ी साजिश को यहाँ नहीं बता रहे हैं। वह इतिहास के माध्यम से स्वतंत्रता के बाद के आधुनिक भारत में क्या हुआ और ईसाई पूर्व यूरोप, इस्लाम आने से पूर्व के ईरान एवं मिस्र के धर्मों के साथ क्या हुआ, जिन्हें अब संग्रहालयों में स्थानांतरित कर दिया गया है, के बीच समानताएँ दिखाने का प्रयास कर रहे हैं।

वह बताते हैं कि भारत पर इस्लामी और बाद में ईसाई (औपनिवेशिक) आक्रमण के बावजूद यहाँ के मूल धर्म यानी हिंदू धर्म का सफाया क्यों नहीं हो सका, जबकि मध्य युग में इन्हीं आक्रमणकारियों द्वारा यूरोप, मिस्र, ईरान आदि के मूल धर्मों का सफाया कर दिया गया था। वह यह भी बताते हैं कि मध्य काल में उन देशों के मूल धर्मों का सफाया करने वाले कारक आज भारत में कैसे प्रचलन में हैं। इस तरह सदियों पहले विदेशी शासन के अधीन रहने की तुलना में आज हिंदू धर्म के लुप्त होने का खतरा कहीं अधिक है।

अभिजीत का तर्क है कि रोम, मिस्र, ईरान आदि में अब्राहमिक धर्म (इस्लाम और ईसाई) के पूर्व पगन धर्म था, जिसे हिंदू धर्म के समान होने का तर्क दिया जा सकता है। खुद को धर्मनिरपेक्ष बताने वाले धर्मों की अपेक्षा हिंदू धर्म इस तरह से बेहतर था कि मृत्यु और उसके बाद के जीवन के बारे में उसके दार्शनिक पहलू स्वयं धर्मशास्त्र का हिस्सा थे। इसने हिंदू धर्म को अब्राहमिक धर्मों की चुनौतियों का सामना करने के लिए सैद्धांतिक और धार्मिक रूप से मजबूत बनाया।

हालाँकि, हिंदू धर्म और मूर्तिपूजक पगन, दोनों धर्मों ने गलती की और बाद में आने वाले एकेश्वरवादी अब्राहमिक विश्वासों और दर्शन के खतरे को महसूस नहीं किया। हिंदू धर्म और उन पूर्व-अब्राहमिक धर्मों ने अब्राहमिक विश्वासों के साथ सह-अस्तित्व के लिए सामान्य आधार तलाशने की कोशिश की, जबकि अब्राहमिक धर्म सामान्य आधारों की खोज में बेहद कम रुचि रखते थे। इसके बजाय वे एकमात्र आधार तलाश करते थे, वह था भूमि पर नियंत्रण। सैद्धांतिक रूप से हम कह सकते हैं कि अब्राहमिक धर्म ने उस स्थान के मूल धर्मों का सफाया अपनी विशिष्टता और कट्टरता के कारण किया, जबकि अभिजीत का तर्क है कि उनका वास्तविक सफाया आर्थिक, भौगोलिक और राजनीतिक कारणों से हुआ।

अभिजीत ईसाई पूर्व यूरोप के विभिन्न उदाहरणों का हवाला देते हुए बताते हैं कि यूरोप की अधिकांश आबादी घोर गरीबी (ईसाई धर्म ने दुख और गरीबी को ईसा मसीह या गॉड के निकट आने के तरीकों के रूप में पेश किया है) और इन देशों के अधिक उपजाऊ वाले हिस्सों में अत्यधिक आबादी (जहाँ आक्रमणकारी न केवल कुलीन शासकों के रूप में आए थे, बल्कि बसने के इरादे से अपने साथ आबादी और पशुधन लेकर भी आए थे), ईसाई धर्म में मतांतरण की प्रमुख वजह थी। उनका कहना है कि उपजाऊ भूमि और उसके आसपास बनी संपत्तियों पर नियंत्रण रखने की इच्छा बड़े पैमाने पर धर्मांतरण में मददगार साबित हुईं।

इसके अलावा, कम उपजाऊ भूमि वाले क्षेत्र में, जहाँ बड़े पैमाने पर मतांतरण के माध्यम से संपत्तियों को नियंत्रित करने के अवसर कम थे, वहाँ अब्राहमिक धर्मों में धर्मांतरण उन सैनिकों का किया गया, जो मुख्यत: पैसे के बजाय अपने धर्म के लिए मरने को तैयार थे। अभिजीत का तर्क है कि इसी लिए शासकों के लिए मतांतरित लोगों की सेना बनाना और उसे रखना पहले की तुलना में सस्ता था।

जब बात भारत की आती है तो अभिजीत का तर्क है कि ये दोनों कारक यहाँ महत्वपूर्ण नहीं थे। सर्वप्रथम, यहाँ केवल कुलीन सैन्य वर्ग ही आक्रमण के साथ आया। पलायन के दौरान वह अपने साथ बड़ी आबादी और पशुओं को नहीं लाया। इस प्रकार मंदिरों के आसपास स्थित स्थानीय संपत्तियों को नियंत्रित करने का कोई उन पर दबाव नहीं था। जनता को मतांतरित करने और उनके कल्याण पर खर्च करने के लिए मजबूर होने की तुलना में शासकों के लिए स्थानीय आबादी से कर लेना (इस्लामी शासकों द्वारा जजिया के रूप में, ब्रिटिश शासकों द्वारा लगान आदि के रूप में) एक बेहतर विकल्प था। इसके अलावा, इस्लामी और ब्रिटिश, दोनों शासकों ने भी एक विशाल और लगातार बढ़ती हुई सेना को बनाए रखने की आवश्यकता महसूस नहीं की, जो पूरी आबादी को मतांतरित करने का एक बड़ा कारण होता। भारत में प्रजा या शासकों के लिए स्थानीय आबादी को बड़े पैमाने पर मतांतरित करने का कोई बड़ा कारण नहीं था।

हालाँकि, 1947 के बाद यह बदल गया है। अभिजीत कहते हैं कि ईसाई धर्म में धर्मांतरण के लिए बहुत बड़ा प्रोत्साहन है, क्योंकि भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान में केवल अल्पसंख्यकों को उनकी इच्छा के अनुसार स्कूल और कॉलेज चलाने की अनुमति है। वहीं, मुसलमानों को अपने लिए सेना बनाने और उसे रखने (संख्या के रूप में) की आवश्यकता महसूस होती है, क्योंकि वे हमेशा ‘डरा हुआ’ होते हैं और देश की धर्मनिरपेक्ष राजनीति ने उन्हें दशकों से इस मोड में रखा है। इस प्रकार आज बड़े पैमाने पर धर्मांतरण के ट्रिगर, पहले की तुलना में कहीं अधिक सक्रिय और प्रासंगिक हैं।

अभिजीत का कहना है कि सरकार द्वारा मंदिरों का राष्ट्रीयकरण ने, जिसके आसपास हिंदुओं की संपत्ति और आर्थिक पारिस्थितिकी तंत्र सबसे पहले पनपा था, इन चुनौतियों के लिए एक व्यवस्थित प्रतिक्रिया खोजने की हिंदुओं की क्षमता को घटा दिया है। इस प्रकार, जो आजादी से पहले और मध्यकाल में भी नहीं हुआ, वह वास्तव में आजादी के बाद हो रहा है। आज न केवल खतरे अधिक स्पष्ट हैं, बल्कि उनसे उबरने की क्षमता भी कमजोर हो गई है। इसलिए अभिजीत को विश्वास नहीं है कि हिंदू धर्म लंबे समय तक जीवित रह पाएगा।

जब एक व्यक्ति ने अभिजीत से पूछा कि अगर आपकी भविष्यवाणी सत्य होती है और जब भारत में हिंदू अल्पसंख्यक हो जाएँगे एवं बड़े पैमाने पर उनका उत्पीड़न होने लगेगा तो कौन-सा देश हिंदुओं को सुरक्षित पनाह देगा? इस पर अभिजीत ने कहा, “आपके पास कहीं जाने का रास्ता नहीं होगा”।

(इस आर्टिकल को अभिजीत ने नहीं लिखा है, बल्कि उनके तर्कों को संक्षिप्त और सारांश के रूप में प्रस्तुत किया गया है। अभिजीत से उनके ट्विटर @Iyervval पर संपर्क किया जा सकता है।)

‘भोले बाबा, हमारा निज्जू सबसे दूर भाला फेंके’: गाँव में किसी ने शिवरात्रि का व्रत रखा तो किसी ने शिवलिंग पर जल चढ़ाया

भारत के नीरज चोपड़ा ने टोक्यो में हुए ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीत कर पूरे देश का नाम रोशन कर दिया। लेकिन, हरियाणा के पानीपत के मतलौडा इलाके में स्थित खंडरा गाँव के लोगों की ख़ुशी का ठिकाना नहीं है। आखिर यही तो वो गाँव है, जहाँ का ‘निज्जू’ दुनिया के सबसे बड़े खेल टूर्नामेंट से गोल्ड मेडल लेकर आ रहा है। जी हाँ, नीरज चोपड़ा इस गाँव के लिए ‘निज्जू’ ही हैं। 2000 कि जनसंख्या वाले ये गाँव खुशी से झूम रहा है।

गाँव के कई लोगों ने उसके लिए शिवरात्रि का व्रत रखा था और भोला बाबा से प्रार्थना की थी कि उनका ‘निज्जू’ सबसे दूर भाला फेंके। लोगों का पहले ही कहना था कि अगर वो गोल्ड लेकर आते हैं तो पूरे गाँव की तस्वीर बदल जाएगी। युवा इसीलिए खुश हैं क्योंकि प्रदेश सरकार बड़े स्टेडियम या कोई अन्य सौगात गाँव को दे सकती है। किसी ने शिवरात्रि का व्रत रखा तो किसी ने उनकी सफलता के लिए शिवलिंग पर जल चढ़ाया।

गाँव के लोगों का कहना था कि नीरज चोपड़ा सेना का जवान है, इसीलिए अनुशासन मे रहते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उन्हें बिना दबाव के अपना शत-प्रतिशत देने को कहा था। अब ग्रामीण अपने ‘निज्जू’ का इंतजार कर रहे हैं, ताकि ‘चूरमा’ खिला कर उसका स्वागत कर सकें। खंडरा गाँव के अधिकतर लोग किसान हैं। जिस दिन नीरज चोपड़ा का फाइनल मुकाबला था, उस दिन इस गाँव में किसी शहर की तरह चहल-पहल थी।

दो दर्जन से भी अधिक मीडिया की गाड़ियाँ यहाँ लगी हुई थीं और एक बड़े से स्क्रीन पर पूरा गाँव ये मुकाबला देख रहा था। नीरज के पहले कोच जयवीर भी प्रफुल्लित थे। उनकी माँ का कहना था कि गाँव में ऐसा नजर उन्होंने कभी नहीं देखा। नीरज के चाचा का कहना था कि ये उनके भतीजे व परिवार कि वर्षों की मेहनत का परिणाम है। यहाँ तक कि गाँव के लोगों ने इस मुकाबले में नीरज चोपड़ा के विरोधी खिलाड़ियों को लेकर भी पूरी रिसर्च की हुई थी।

500 परिवारों वाले इस गाँव में एक अदद पलेग्राउंड तक नहीं है। यहाँ के युवा या तो खेतों में काम करते हैं, या फिर कमाने शहर चले जाते हैं। लेकिन, नीरज चोपड़ा के स्वर्ण पदक जीतने के मौके पर पटाखों की आवाज दूर-दूर तक जा रही थी और लोग आपस में मिठाइयाँ बाँटते नजर आए। एक ग्रामीण ने बताया कि एक दिन नीरज को उनके पिता ने एक कुर्ता दिया। खुश होकर वो वही पहन कर स्कूल चले गए, जिसके बाद क्लास के लड़के उन्हें ‘सरपंच’ बुलाने लगे।

नीरज चोपड़ा का पालन-पोषण एक संयुक्त परिवार में हुआ है, जिसमें 17 सदस्य हैं। उनकी दादी उन्हें भरपूर दूध, घी और मक्खन खाने के लिए दिया करती थीं। उनका वजन बढ़ जाने के बाद परिवार ने उन्हें जिम करने भेजा। परिवार का कहना है कि बाल सुलभ नीरज काभी स्टारडम की चकाचौंध में नहीं आएँगे। उनका कहना है कि घर आकर वो खेतों में ही काम करेंगे, क्योंकि सफलता उनके माथे पर नहीं चढ़ती।

नन और पादरी को भी देना होगा टैक्स, आर्टिकल-25 धर्म के आधार पर टैक्स में नहीं देता कोई छूट: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि अनुच्छेद-25 धर्म के आधार पर टैक्स में कोई छूट प्रदान नहीं करता है। कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए आगे कहा कि नन और पादरी के वेतन में टीडीएस की कटौती होगी। रिपोर्ट्स के अनुसार, जस्टिस एसवी भट्टी और जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस की खंडपीठ ने एकल पीठ के आदेश को बरकरार रखते हुए कहा कि इस तरह की टैक्स कटौती संविधान के अनुच्छेद-25 के तहत धर्म की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं करती है।

इसके साथ ही खंडपीठ ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि नन और पादरी अपने वेतन का इस्तेमाल नहीं करते हैं, बल्कि इसे अपनी धार्मिक मंडली को दे देते हैं। उन्होंने कहा कि यदि आय आयकर अधिनियम के तहत वेतन के रूप में आती है, तो इस पर टीडीएस कटौती की अनुमति है।

बाइबिल के कोट, “Render unto Caesar the things that are Caesar’s and unto God the things that are God’s” का हवाला देते हुए केरल हाईकोर्ट की बेंच ने कई पादरी और नन की दलीलों को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने टैक्स देने का विरोध किया था। अदालत ने कहा कि सरकारी और सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में काम करने के दौरान मिलने वाले वेतन पर टैक्स कटौती की अनुमति है। साथ ही उन्होंने कहा, “अनुच्छेद-25 धर्म के आधार पर टैक्स में कोई छूट प्रदान नहीं करता है।”

दरअसल, साल 1944 से सरकारी व सहायता प्राप्त संस्थानों द्वारा नन और पादरी को दिया जाने वाला वेतन टीडीएस यानी टैक्स कटौती के अन्तर्गत नहीं आता था। हालाँकि, इसे 2014 में संशोधित किया, जब आयकर अधिकारियों ने जिला कोषागार अधिकारियों (District Treasury Officers) को निर्देश दिया है कि सरकारी संस्थानों से वेतन प्राप्त करने वाले धार्मिक कर्मचारी भी टीडीएस के दायरे में आएँगे। इस फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ताओं ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने टीडीएस में छूट का दावा करने के लिए 1944 में और साथ ही 1977 में केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (Central Board of Direct Taxes) द्वारा जारी परिपत्रों का हवाला दिया।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि नन और पादरी कोई आय या संपत्ति रखने का हकदार नहीं हैं। उनकी सभी संपत्तियाँ, वेतन और पेंशन धार्मिक मण्डली को दे दी जाती है। उन्होंने कैनन कानून का भी हवाला दिया। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि कैनन कानून के अनुसार एक बार शपथ लेने के बाद नन या पादरी इसके तहत नागरिक नहीं माने जाते हैं। इस पर अदालत ने कहा कि कैनन कानून किसी भी परिस्थिति में आयकर अधिनियम पर हावी नहीं हो सकता है।

…न भाला है, यह गेहुअन करइत काला है: लंबे-नुकीले ‘मैस्कुलिन पैट्रिआर्कि’ पर यूँ बिफरा लिबरल गिरोह विशेष

टोक्यो ओलंपिक में नीरज चोपड़ा ने 87.58 मीटर दूर भाला क्या फेंका, इसका घाव भारत में बैठे लिबरल गिरोह के कुछ लोगों को महसूस हुआ। अब ये भाला कहाँ जाकर लगा है, ये तो देखने वाली बात होगी। लेकिन हाँ, कुछ सेक्युलर ब्रिगेड के पत्रकारों की टिप्पणियाँ ज़रूर हमारे पास आ गई हैं, जिन्हें हम आपके साथ साझा करना चाहेंगे। उससे पहले श्याम नारायण पांडेय की ये पंक्तियाँ देखिए, जो हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के भाले के बारे में बताता है:

क्षण देर न की तन कर मारा,
अरि कहने लगा न भाला है,
यह गेहुअन करइत काला है,
या महाकाल मतवाला है

हम सबसे पहले पहुँचे रवीश कुमार के पास, जो अपने घर में रखी हर नुकीली चीज को काले रंग से पेंट कर रहे थे। उन्होंने नीरज चोपड़ा के टोक्यो ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने की बात पर पूछा कि इससे राकेश टिकैत और योगेंद्र यादव जैसे ‘किसानों’ को क्या फायदा होगा? फिर उन्होंने भाला फेंकने को एक हिंसक गेम बताते हुए कहा कि अगर भाला किसी को लग जाता तो? उन्होंने इसे खतरनाक खेल करार दिया।

रवीश ने कहा, “जब मोदी सरकार किसी व्यक्ति को ओलंपिक में भाला फेंकने की अनुमति दे सकती है तो किसानों को क्यों नहीं भाला फेंकने दिया जा रहा? कहीं भाला दिखा कर ये सरकार हमें डरा तो नहीं रही? वो भाला ज़रूर अंबानी-अडानी की कंपनियों ने बनाया होगा। भाले की जाँच होनी चाहिए। नीरज चोपड़ा ‘राजपूताना राइफल्स’ से हैं। ये जातिवाद है। कश्मीर के बच्चे जब पत्थर फेंकते हैं तो सरकार उन्हें पीटती है, यहाँ भाला फेंकने पर जश्न क्यों मनाया जा रहा?”

लौटते समय रास्ते में हमें अजीत अंजुम भी मिल गए, जिन्होंने गोल्ड मेडल की बात सुनते ही सोना के महँगा होने पर आपत्ति जताई। हमने जब उन्हें बताया कि सोने के दाम तो कई दशकों से बढ़ रहे हैं तो वो खिसिया गए। उन्होंने कहा कि पूरे देश के लोग बेवकूफ हैं, जो पेगासस को छोड़ कर सोने का जश्न मना रहे हैं। फिर वो कुछ बुदबुदाते हुए अपनी एसी कार में बैठ कर निकल लिए। जाते-जाते कह गए कि गोल्ड मेडल तो सिर्फ ‘जी न्यूज’ पर आया है, देश में नहीं।

सरदर्द की दवा खा कर जब हम आगे बढ़े तो हमारा सामना सागरिका घोष. आरफा खानुम शेरवानी और बरखा दत्त जैसे पत्रकारों से हुआ, जो ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता’ का पोस्टर लगा कर मार्च निकाल रही थीं। उन्होंने अपने संयुक्त बयान में हमें बताया, “भाला लंबा और नुकीला होता है, इसीलिए ये ब्रह्मिनिकल पैट्रिआर्कि की निशानी है। भाला मैस्कुलिन है, क्या इसे हम भाली नहीं कह सकते? हिंदी में सोना शब्द ही पुल्लिंग है। इससे हमें दिक्कत है।”

‘बेरोजगार’ पुण्य प्रसून बाजपेयी और अभिसार शर्मा हमें एक साथ ही मिल गए, जो जंगलों की ख़ाक छान रहे थे। अभिसार शर्मा ने कहा कि पुलिस आए दिन प्रदर्शनकारियों पर भाले चटकाती है, अब इसे ओलंपिक में ले जाया गया है। हमने जब उन्हें बताया कि धान और गेहूँ की तरह भाला और लाठी अलग-अलग चीजें हैं, तो वो चौंक गए। वहीं बाजपेयी ने कहा कि वो महीने के अंत में पेमेंट आने के बाद ही इस पर टिप्पणी करेंगे। पेमेंट कहाँ से आए, इस पर उन्होंने कुछ बताने से इनकार कर दिया।

फिर हम राजदीप सरदेसाई के पास पहुँचे, जहाँ वो अपने अगले न्यूज़ शो की तैयारी में लगे थे। कोलकाता से आए स्पेशल रसगुल्ले खाते हुए राजदीप से हमने पूछा कि क्या वो नीरज चोपड़ा को बधाई नहीं देंगे? उन्होंने अपने कर्मचारियों को ये पता करने को कहा कि कहीं नीरज चोपड़ा को बधाई देने से ममता बनर्जी तो नाराज़ नहीं होंगी? TMC के दफ्तर से अनुमति मिलने के बाद उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि नीरज चोपड़ा का जन्म कॉन्ग्रेस काल में हुआ था, इसीलिए इसका श्रेय पीएम मोदी को नहीं मिल सकता।