भारतीय मूल के समीर बनर्जी विंबलडन जूनियर विजेता बन गए हैं। ‘विंबलडन बॉयज’ का ख़िताब जीतने के बाद उनकी लोकप्रियता में भी इजाफा हुआ है। उन्होंने पिछले सप्ताह लंदन में आयोजित हुए इस टूर्नामेंट के ‘बॉयज सिंगल’ कैटेगरी में ये ख़िताब अपने नाम किया। रविवार (11 जुलाई, 2021) को उन्होंने ‘ऑल इंग्लैंड क्लब’ के फाइनल में अमेरिकी-भारतीय खिलाड़ी समीर बनर्जी ने अमेरिका के ही विक्टर लिलोव को 7-5, 6-3 से हराया।
17 वर्ष के समीर बनर्जी पिछले 6 वर्षों में जूनियर विंबलडन चैंपियनशिप की ट्रॉफी अपने नाम करने वाले पहले अमेरिकी खिलाड़ी हैं। साथ ही वो पिछले 12 वर्षों में युकी भांबरी के बाद जूनियर सिंगल्स का ख़िताब जीतने वाले पहले ऐसे टेनिस खिलाड़ी हैं, जो भारतीय मूल के हैं। समीर बनर्जी के पिता कुणाल असम से ताल्लुक रखते हैं और उनकी माँ उषा आंध्र प्रदेश से हैं। उन्होंने अपना नाम उन भारतीय या भारतीय मूल के खिलाड़ियों की सूची में दर्ज किया, जिन्होंने ये ख़िताब जीत रखा है।
1954 में रामनाथ कृष्णन ने जूनियर सिंबलडन चैंपियनशिप की ट्रॉफी अपने नाम की थी। ऐसा करने वाले वो पहले खिलाड़ी थे। उनके बेटे रमेश कृष्णन ने पिता की इस उपलब्धि को 1970 में दोहराया। 1990 में लिएंडर पेस ने ये कारनामा किया। रमेश कृष्णन ने 1970 में ही जूनियर फ्रेंच ओपन के फाइनल में भी विजय हासिल की थी। वहीं 1990 में ही लिएंडर पेस ने भी यूएस ओपन का टाइटल जीता था।
लिएंडर पेस जैसे बड़े खिलाड़ी के नक्शेकदम पर चलने की बात पर समीर बनर्जी ने कहा कि ये उनके लिए गर्व की बात है। उन्होंने उन सभी भारतीय प्रशंसकों का धन्यवाद किया, जिन्होंने पूरे टूर्नामेंट के दौरा उनकी हौंसला-अफ़ज़ाई की। उन्होंने बताया कि वो कई बार भारत गए हैं और नई दिल्ली के हौज खास में स्थित आरके खन्ना स्टेडियम में टेनिस भी खेला है। उन्होंने कहा कि भले ही वो अमेरिका की तरफ से खेलते हों, लेकिन वो भारत का प्रतिनिधित्व भी करते हैं।
Remember the name – Samir Banerjee ??
The American wins his first junior Grand Slam singles title by beating Victor Lilov in the boys' singles final#Wimbledonpic.twitter.com/Xc3ueczg5m
मात्र 5-6 साल की उम्र में ही समीर बनर्जी ने खेल में रुचि लेनी शुरू कर दी थी। वीकेंड्स पर वो अपने पिता के साथ खेलने जाते थे। तब वो बेसबॉल और फुटबॉल भी खेला करते थे। लेकिन, उम्र के साथ-साथ उन्हें टेनिस काफी अच्छा लगने लगा और वो इस तरफ आकर्षित होने लगे। उन्होंने कहा कि इसमें हार-जीत उन पर ही निर्भर करता है और इस खेल में जो चुनौतियाँ हैं, उन्हें वो पसंद करते हैं।
उन्होंने कहा कि भविष्य में उन्हें बड़े-बड़े टूर्नामेंट्स में भाग लेना होगा और आशा है कि वहाँ भी वो जीतेंगे। समीर बनर्जी फ़िलहाल न्यू जर्सी में रहते हैं। वो आने वाले महीनों में राजनीतिक विज्ञान या अर्थशास्त्र में कोलंबिया यूनिवर्सिटी से डिग्री के लिए पढ़ाई करेंगे, इसीलिए वो खेल से कुछ समय के लिए ब्रेक लेंगे। समीर बनर्जी ने अपनी जीत पर कहा कि बड़े लक्ष्य की जगह जब वो वो कम उम्मीदों के साथ मैदान में उतरते हैं, तो कमाल करते हैं।
हम सब के लिए जुलाई के महीने की यादें लगभग एक जैसी हैं। नई-नई शुरू हुई बारिश और गर्मी की छुट्टी के बाद वापस से खुले स्कूल। लेकिन महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई की यादें जुलाई को लेकर शायद हमसे थोड़ी अलग हैं। मुंबई ने जुलाई में इस्लामिक आतंकवाद का वो खौफनाक मंजर देखा है, जो आज भी उसकी जीवटता को झकझोर देता है। पहले 11 जुलाई 2006 को मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए सीरियल ब्लास्ट और उसके बाद 13 जुलाई 2011 को हुए तीन बम धमाकों ने मुंबई ही नहीं बल्कि पूरे भारत को हिलाकर रख दिया था। 13 जुलाई 2011 को मुंबई में हुए बम धमाके इंडियन मुजाहिद्दीन ने, मुंबई के ही 26/11 आतंकी हमलों के आरोपित अजमल कसाब के जन्मदिन को यादगार बनाने के लिए किए थे।
9 मिनट में 3 बम ब्लास्ट
13 जुलाई को मुंबई में बम विस्फोट कराने का पूरा प्लान इंडियन मुजाहिद्दीन के फाउंडर यासीन भटकल का था। मुंबई के व्यस्ततम इलाकों में 10-15 मिनट के अंतराल में 3 बम विस्फोट हुए थे। उस दिन बुधवार था और शाम का समय था। कभी न सोने वाली मुंबई उस शाम उसी चहल-पहल में मशगूल थी, जो रोज हुआ करती थी। कर्मचारी काम करके अपने घरों को लौट रहे थे। महिलाएँ अपने बच्चों को लेकर घूमने निकली थीं। तब ऐसा कोरोना वायरस का भी कोई झंझट नहीं था, हाँ मुंबई को तेज बारिश का डर जरूर रहा होगा लेकिन फिर भी मुंबई कभी भविष्य की चिंता नहीं करती कि वर्तमान का आनंद लेना ही भूल जाए!
लेकिन 13 जुलाई 2011 को शायद मुंबई को यह अंदाजा नहीं था कि उसके वर्तमान का एक ऐसा पल आने वाला है, जो उसके भविष्य को हमेशा के लिए रक्तरंजित यादों से बुना हुआ बना देगा। पहला धमाका दक्षिणी मुंबई में हुआ, शाम 06:54 बजे। यह धमाका झावेरी बाजार की खाऊ गली में एक मोटरसाइकिल में प्लांट किए गए बम से हुआ। पहले तो कोई कुछ समझ ही नहीं पाया। लोगों की चहल-पहल, भगदड़ में तब्दील हो गई। चारों ओर सिर्फ चीखें ही सुनाई दे रही थीं। इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, एक मिनट बाद ही ओपेरा हाउस इलाके में प्रसाद चैंबर और पंचरत्न बिल्डिंग के बाहर एक टिफिन बॉक्स में रखे गए बम से जोरदार धमाका हो गया। ओपेरा हाउस का यह इलाका मुंबई के व्यस्ततम इलाकों में से एक है। यहाँ एक समय में सैकड़ों की संख्या में लोगों की आवाजाही रहती है। जब दूसरा धमाका हुआ, तब मुंबई के लोगों को यह आशंका हो गई थी कि मुंबई एक बार फिर आतंकियों के निशाने पर आया है। इसके बाद तीसरा धमाका 07:05 बजे दादर के कबूतर खाना इलाके के पास बस स्टैंड में एक बिजली के खंभे पर लटकाए गए बम के कारण हुआ। हालाँकि पुलिस ने दो जिंदा बम ग्रांट रोड सांताक्रूज से बरामद कर लिए थे।
कहा जाता है कि ये बम धमाके जिनमें आईईडी का इस्तेमाल हुआ था, मुंबई में पहले हुए धमाकों से ज्यादा ताकतवर थे। जिन तीन जगहों पर ये धमाके हुए, वहाँ की जमीनें हिल गई थीं। इमारतों के काँच टूट गए थे। विस्फोट के सीधे संपर्क में आए लोगों के शरीर के अंग कई मीटर तक बिखरे पड़े थे। चारों ओर सिर्फ चीखें थी। मुंबई एक बार फिर अपने लोगों की लाशों को गिन रही थी। खून से सने हुए क्षत-विक्षत शव प्रतीक्षा कर रहे थे कि कब उन्हें समेटा जाएगा और उनके अपनों को सुपुर्द किया जाएगा। खून से लथपथ घायल लोग बेसुध पड़े हुए थे। इन धमाकों में 31 लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी थी, वहीं लगभग 500 लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे।
कसाब का जन्मदिन मनाया था आतंकियों ने
26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए क्रूरतम आतंकी हमले के आरोपित अजमल आमिर कसाब का जन्मदिन 13 जुलाई को ही था। उस समय कसाब को फाँसी की सजा हो चुकी थी। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक 13 जुलाई 2011 को मुंबई के ये धमाके कसाब की ‘शान’ में ही कराए गए थे। इंडियन मुजाहिद्दीन के फाउंडर यासीन भटकल ने कहा था कि उसे इन धमाकों पर गर्व है। इन बम धमाकों की पूरी प्लानिंग यासीन भटकल ने ही की थी। इसके बाद दिल्ली, बेंगलुरु और बाकी महानगरों में भी हाई अलर्ट जारी कर दिया गया था।
इन धमाकों के बाद कई लोगों से पूछताछ हुई। धमाकों की जाँच का जिम्मा एटीएस को सौंप दिया गया था। जाँच के दौरान 18 राज्यों में सुराग की तलाश की गई थी। धमाकों के आरोपित यासीन भटकल को एक अंडरकवर ऑपरेशन के बाद नेपाल सीमा से 28 अगस्त 2013 को गिरफ्तार कर लिया गया था, जिसे बाद में फाँसी की सजा सुनाई गई थी। इसके पहले 11 जुलाई 2006 को मुंबई की लाइफलाइन कहे जाने वाली लोकल ट्रेन को निशाना बनाकर सीरियल बम ब्लास्ट किया गया था। खार और बांद्रा रोड स्टेशन में 7 मिनट के दौरान 7 धमाके हुए थे। इन धमाकों में 189 लोगों की मौत हो गई थी जबकि लगभग 900 लोग घायल हो गए थे। इससे पहले भी 1993, 2002, 2003 में भी मुंबई में लगातार बम धमाके होते रहे।
बिहार में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उप-मुख्यमंत्री रेणु देवी आमने-सामने आ गए हैं। दरअसल, उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार द्वारा लाए गए जनसंख्या नियंत्रण कानून के ड्राफ्ट को लेकर नीतीश से सवाल पूछा गया था, जिसके जवाब में उन्होंने कहा था कि इसके लिए महिलाओं का शिक्षित होना ज्यादा ज़रूरी है। हालाँकि, राज्य में उनकी डिप्टी और सत्ता में जदयू की साझीदार भाजपा की रेणु देवी इत्तिफ़ाक़ नहीं रखतीं।
रेणु देवी ने एक लिखित बयान जारी कर कहा है कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए महिलाओं से ज्यादा पुरुषों को जागरूक किए जाने की ज़रूरत है। सीएम नीतीश कुमार ने कहा था कि अगर महिलाएँ पढ़ी-लिखी होंगी तो उनके अंदर ज्यादा जागृति होगी और प्रजनन दर अपने आप कम हो जाएगी। जबकि रेणु देवी ने कहा कि पुरुषों के भीतर नसबंदी को लेकर डर की स्थिति है और वो नसबंदी नहीं कराना चाहते।
रेणु देवी ने आँकड़े गिनाते हुए कहा कि बिहार के कई जिलों में पुरुषों में नसबंदी की दर मात्र 1% है। उन्होंने कहा, “अक्सर यह देखा गया है कि बेटे की चाहत में पति और ससुराल वाले महिला पर अधिक बच्चे पैदा करने का दबाव बनाते हैं। इससे परिवार का आकार बड़ा होता चला जाता है। ये ज़रूरी है कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए पुरुषों एवं महिलाओं के बीच भेदभाव समाप्त किया जाए। तभी हम इसमें सफल होंगे।”
जबकि नीतीश कुमार ने बिहार में जनसंख्या नियंत्रण कानून को गैर-ज़रूरी बताया था। वहीं रेणु देवी ने उत्तर प्रदेश में आए कानूनी डाफ्ट की सराहना करते हुए कहा कि बिहार में प्रजनन दर वहाँ से भी अधिक है, इसीलिए यहाँ भी इसी तरह का कानून बनना चाहिए। उप-मुख्यमंत्री ने अपने बयान में ये भी कहा कि बिहार देश के सर्वाधिक आबादी वाले राज्यों में से एक है। उन्होंने आश्वासन दिया कि राज्य सरकार द्वारा बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के शिविरों में भी गर्भ-निरोधक गोलियों के वितरण, परिवार नियोजन के उपायों की जानकारी और सुरक्षित प्रसव की व्यवस्था की जाएगी।
उन्होंने लोगों को सलाह दी कि वो बेटा-बेटी को एक ही समझें। साथ ही बताया कि फ़िलहाल बिहार में प्रजनन दर 3.0 है। उन्होंने कहा कि विशेषज्ञ भी मानते हैं कि अनियंत्रित जनसंख्या विकास में बाधक होती है, इसीलिए खुशहाली के लिए जनसंख्या का स्थिर होना बेहद आवश्यक है। उन्होंने कहा कि मातृ और शिशु मृत्यु दर में कमी लाने, कुपोषण में कमी, साक्षरता दर बढ़ाने और परिवार नियोजन के बारे में व्यापक जागरूकता लाने के काम राज्य में हो रहे हैं और इसके अच्छे परिणाम मिले हैं, लेकिन इसमें और तेज़ी लाने की ज़रूरत है।
बिहार की उप-मुख्यमंत्री ने कहा कि महिलाओं के रिप्रोडक्टिव हेल्थ के लिए सरकारी अस्पतालों में कई सुविधाएँ दी जाती हैं, लेकिन इन सुविधाओं का लाभ वास्तविक ज़रूरतमंदों तक तभी पहुँचेगा जब पुरुष जागरूक होंगे। उन्होंने कहा कि इसके लिए चलाए जा रहे अभियानों में युद्धस्तर की तेज़ी लाने की आवश्यकता है। उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के साथ-साथ ‘लैंगिक असमानता (Gender Inequality)’ पर भी काम करने पर बल दिया।
बता दें कि यूपी के नए ड्राफ्ट में दो से अधिक बच्चे पैदा करने पर सरकारी नौकरियों में आवेदन और प्रमोशन का मौका नहीं मिलेगा। 77 सरकारी योजनाओं और अनुदान से भी वंचित रखने का प्रावधान है। अगर यह लागू हुआ तो एक साल के भीतर सभी सरकारी अधिकारियों कर्मचारियों स्थानीय निकाय में चुने जनप्रतिनिधियों को शपथ-पत्र देना होगा कि वह इसका उल्लंघन नहीं करेंगे। अगर अभिभावक सरकारी नौकरी में हैं और नसबंदी करवाते हैं तो उन्हें कई सुविधाएँ देने की सिफारिश की गई है।
कर्नाटक के प्रसिद्ध मैसूर शहर से 12 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है श्री चामुंडेश्वरी मंदिर। 1000 साल से भी अधिक पुराना यह मंदिर माँ दुर्गा के चामुंडा रूप को समर्पित है। माँ दुर्गा ने यह रूप देवताओं को महाशक्तिशाली राक्षस महिषासुर के अत्याचार से मुक्त कराने के लिए लिया था। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जिस चामुंडी पहाड़ी पर यह मंदिर स्थित है, उसी स्थान पर माता चामुंडा ने महिषासुर का वध किया था। इसके अलावा यह तीर्थ स्थान 18 महा शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।
चामुंडी पहाड़ी पर स्थित इस क्षेत्र का इतिहास
देवी माहात्म्य में जिन माता चामुंडा का प्रमुख रूप से वर्णन किया गया है, वही इस सदियों पुराने मंदिर की मुख्य देवी हैं। देवी पुराण और स्कन्द पुराण में इस दिव्य क्षेत्र का वर्णन किया गया है। पुराणों के अनुसार जब महिषासुर ने ब्रह्माजी की तपस्या से वरदान हासिल कर लिया तो वह देवताओं पर ही अत्याचार करने लगा था।
ब्रह्माजी ने महिषासुर को वरदान दिया था कि उसका वध एक स्त्री के माध्यम से ही होगा। यह जानकार सभी देवता माँ दुर्गा के पास पहुँचे और इस समस्या का समाधान करने के लिए कहा। तब माँ दुर्गा ने महिषासुर का वध करने के लिए चामुंडा का रूप धारण किया। इसके बाद इसी स्थान पर माता चामुंडा और महिषासुर में भयानक युद्ध हुआ और अंततः माता चामुंडा ने उस राक्षस का वध कर दिया।
इसके अलावा इस क्षेत्र को 18 महा शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। जहाँ देवी सती के मृत शरीर के अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठ स्थापित हुए। अलग-अलग मान्यताओं के अनुसार इनकी संख्या 51 अथवा 52 है लेकिन इनमें से 18 शक्तिपीठों को महा शक्तिपीठ कहा जाता है। ये अत्यधिक महत्व के देवी स्थान माने गए हैं। इनमें से ही एक है चामुंडेश्वरी मंदिर, जहाँ माता सती के बाल गिरे थे। पौराणिक समय में इस क्षेत्र को क्रौंच पुरी के नाम से भी जाना जाता था, जिसके कारण इस स्थान को क्रौंच पीठम भी कहा जाता है।
चामुंडेश्वरी मंदिर का निर्माण
श्री चामुंडेश्वरी मंदिर का निर्माण 12वीं शताब्दी में होयसल वंश के शासकों द्वारा कराया गया। इसके बाद विजयनगर साम्राज्य के शासकों के द्वारा भी इस मंदिर का लगातार जीर्णोद्धार कराया गया। मंदिर का सात मंजिला गोपुरा भी 17वीं शताब्दी के दौरान विजयनगर शासकों के द्वारा निर्मित कराया गया है।
माता चामुंडेश्वरी, मैसूर के महाराजाओं की कुलदेवी मानी जाती हैं, यही कारण है कि मैसूर के महाराजाओं ने मंदिर के लिए कई तरह के योगदान दिए हैं। सन् 1827 के दौरान कृष्णाराजा वाडेयर तृतीय ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। माँ दुर्गा के अनन्य भक्त वाडेयर ने मंदिर के लिए सिंह वाहन, रथ और बहुमूल्य रत्न अर्पित किए।
मंदिर का निर्माण द्रविड़ वास्तुशैली में हुआ है। मंदिर में प्रवेश करने से पहले ही महिषासुर की एक बड़ी सी प्रतिमा स्थापित है। जिसमें राक्षस के एक हाथ में तलवार और दूसरे हाथ में एक विशाल सर्प है। इसके अलावा जब सीढ़ियों के माध्यम से मंदिर के लिए जाते हैं तो रास्ते में एक विशाल नंदी की प्रतिमा स्थापित की गई है। 15 फुट ऊँचे इस नंदी का निर्माण एक ही पत्थर से किया गया है। नवरंग हॉल, अंतराल मंडप और प्रकार मंदिर के प्रमुख हिस्से हैं। मंदिर के गर्भगृह पर विमानम का निर्माण किया गया है, जिसके शिखर पर 7 स्वर्ण कलश स्थापित हैं।
मंदिर का प्रमुख त्यौहार नवरात्रि है। साल में दो बार बार मनाए जाने वाले इस त्यौहार के दौरान मंदिर में पहुँचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या लाखों में पहुँच जाती है। इसके अलावा आषाढ़ महीने के शुक्रवार को भी यहाँ भक्तों की संख्या बढ़ जाती है।
मैसूर का दशहरा पूरे भारत में प्रसिद्ध है और यह इस मंदिर का मुख्य त्यौहार भी है। चामुंडेश्वरी मंदिर में मनाया जाने वाला दशहरा इसलिए भी खास है क्योंकि इस दिन माता चामुंडेश्वरी की झाँकी निकाली जाती है। माता चामुंडा इस दिन स्वर्णिम पालकी में बैठकर भ्रमण के लिए निकलती हैं।
कैसे पहुँचें?
मैसूर के चामुंडी पहाड़ी स्थित इस मंदिर का नजदीकी हवाईअड्डा बेंगलुरू में स्थित है, जो यहाँ से 139 किलोमीटर दूर स्थित है। बेंगलुरु न केवल भारत बल्कि विदेशों के कई शहरों से भी वायुमार्ग के माध्यम से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा मैसूर में भी रेलवे स्टेशन है, जो भारत के लगभग सभी बड़े शहरों से रेलमार्ग से जुड़ा हुआ है। मैसूर जंक्शन से मंदिर की दूरी लगभग 13 किलोमीटर है।
कर्नाटक के राज्य परिवहन की सेवा का उपयोग करते हुए न केवल कर्नाटक बल्कि अन्य राज्यों से भी मैसूर पहुँचा जा सकता है। चामुंडी पहाड़ी तक पहुँचने के लिए परिवहन के अनुकूल सड़क का निर्माण किया गया है। हालाँकि मंदिर तक पहुँचने के लिए लगभग 1,000 सीढ़ियों का निर्माण भी किया गया है और श्रद्धालु भक्ति-भाव के चलते अक्सर इन सीढ़ियों का उपयोग करके मंदिर तक पहुँच कर माता चामुंडा के दर्शन करते हैं।
शिवसेना की एक महिला पार्षद ने अपना पद बचाने के लिए अपने ही बच्चे को पराया बता दिया। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (12 जुलाई, 2021) को इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए इस तरह की हरकतें नहीं की जानी चाहिए। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना की उक्त महिला नेता की चुनावी अयोग्यता को बरक़रार रखा। वो सोलापुर नगर निगम से पार्षद चुनी गई थीं।
दो से अधिक बच्चे होने के कारण उनका चुनाव रद्द कर दिया गया था और पार्षदी से अयोग्य घोषित कर दिया गया था। बॉम्बे हाईकोर्ट से निराशा हाथ लगने के बाद वो सुप्रीम कोर्ट पहुँची थीं। जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस हेमंत गुप्ता की पीठ ने शिवसेना की अनीता मागर से पूछा कि आपने सिर्फ पार्षदी बचाने के लिए अपने बच्चे को नकार दिया? साथ ही नसीहत दी कि चुनाव जीत कर एक पद पाने के लिए अपने बच्चे को अस्वीकार न करें।
इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट ने माना था कि इसके पर्याप्त सुबूत हैं कि नामांकन पत्र दाखिल करने की तारीख को मागर और उनके पति के तीन बच्चे थे, इसलिए सार्वजनिक कार्यालय चलाने के लिए राज्य सरकार के दो बच्चों वाले नियम के तहत उन्हें अयोग्य करार दिया गया था। मागर ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सुप्रीम कोर्ट में उनके वकील ने दावा किया कि तीसरा बच्चा उनके पति के भाई का है, ऐसे में उनके दो ही जैविक बच्चे हैं।
वकील ने ये दलील भी दी कि उस बच्चे के अधिकार के लिए सुप्रीम कोर्ट को अनीता मागर के पक्ष में फैसला सुनाना चाहिए, क्योंकि उसके माता-पिता को लेकर सवाल पैदा हो गया है। साथ ही ये दलील भी दी कि जन्म प्रमाण पत्र में बच्चे के माता-पिता का नाम अलग है। सुप्रीम कोर्ट ने इन दावों से असंतुष्ट होकर स्पष्ट कहा कि चुनाव जीतने के लिए ये कहानी बनाई गई है। स्कूल के रिकॉर्ड में कोर्ट ने पाया कि अनीता मागर ही उस बच्चे की माँ हैं।
The Bombay High Court has upheld a 2018 order of a civil court that set aside the election of Shiv Sena leader Anita Magar as corporator of the Solapur Municipal Corporation in Maharashtra, after it came to light that she had more than two children.https://t.co/FChNmgPzS5
जन्म प्रमाण-पत्र को बाद में कानूनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बदल दिया गया, ऐसा कोर्ट ने भी माना। सुप्रीम कोर्ट ने अनीता मागर को अपने बच्चे के बारे में सोचने की सलाह देते हुए कहा कि हम आपकी मदद नहीं कर सकते। 2018 में निचली अदालत ने भी ऐसा ही फैसला सुनाया था। सोलापुर के उक्त वार्ड में दूसरे स्थान पर रहीं प्रत्याशी ने उनके चुने जाने को कोर्ट में चुनौती दी थी। 3 वर्ष से ये मामला अदालतों में चल रहा था।
इससे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट में अनीता मागर ने दलील दी थी कि अस्पताल की तरफ से ये गलती हुई कि तीसरे बच्चे को उनका बता दिया गया और रिकॉर्ड में यही दर्ज किया गया। जबकि हाईकोर्ट ने पाया कि नया जन्म प्रमाण-पत्र तब बनवाया गया, जब 2012 में महिला के पति पार्षदी का चुनाव लड़ने वाले थे। सोलापुर के वार्ड संख्या 11 से जीततीं अनीता मगर के खिलाफ दूसरे स्थान पर रहीं भाग्यलक्ष्मी महंता ने उनके खिलाफ सिविल कोर्ट में याचिका दायर की थी।
दिल्ली के मजलिस पार्क मेट्रो स्टेशन के पास है एक बस्ती। इस बस्ती में रहते हैं करीब 350 हिंदू परिवार। ये परिवार पाकिस्तान से अपना घर-द्वार छोड़कर आए हैं। इन्हीं में से एक परिवार भावना के पिता का भी है।
भावना 13 साल की है। 8वीं में पढ़ती है। 7 साल पहले परिवार के साथ भारत आई। उसकी स्मृतियों में पाकिस्तान नहीं है। पर उसे याद है कि जब वह मजलिस पार्क में रहने आई थी तो यहाँ गड्ढे थे। उनमें जमा पानी था। न शौचालय था। न पीने का पानी। यदि कुछ था तो वह थी गंदगी, धूल, कीचड़ और मच्छर।
भावना के देखते-देखते अब यह जगह इंसानों की बस्ती सी लगती है। शौचालय है। पीने का साफ पानी भी। सोलर लाइट और साफ-सफाई भी। इस बदलाव की नींव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 69वें जन्मदिन पर आयोजित एक कार्यक्रम से पड़ी। इसे विश्व हिंदू परिषद (VHP), सेवा भारती जैसे संगठनों के सहयोग से ‘दिल्ली राइडिंग क्लब’ और सोशल आंत्रप्रेन्योर संजय राय शेरपुरिया ने मुमकिन बनाया है। अब भावना की दो ही शिकायत रह गई है। पहली स्कूल उसकी बस्ती से दूर है। दूसरी, उसकी बस्ती को बिजली की आपूर्ति नहीं होने के कारण होने वाली दिक्कतें।
पाकिस्तान से आए हिंदू: भावना, केतन कच्छी, रादू बाई, धूरो बाई और रायधन
यह कहानी केवल भावना की नहीं है। उन सैकड़ों लोगों की है जो यहाँ रहते हैं। 60 साल के रादू बाई बताते हैं कि यहाँ पाकिस्तान से आकर हिंदुओं के रहने का सिलसिला 2013-14 के आसपास शुरू हुआ था। यह सिलसिला वैश्विक कोरोना संक्रमण के आने तक जारी था। यहाँ रह रहे अधिकतर हिंदू पाकिस्तान के सिंध प्रांत से आए हुए हैं। सिंध के हैदराबाद, मीरपुर खास, तंडोलिया, मटिहारी, नसुरपुर, तंडवादम, सांगर जैसी जगहों पर कभी इनके घर थे। लेकिन धार्मिक अल्पसंख्यक होने की वजह से आए दिन होने वाली प्रताड़ना ने इन्हें भागने को मजबूर किया।
कल्पना करिए उस पीड़ा की जो 30 साल के रायधन बताते हैं। उनके अनुसार बहुसंख्यक मुस्लिम उनसे काम करवाते थे, पर मजदूरी नहीं देते थे। इस बात की गारंटी नहीं होती थी कि घर से निकलने के बाद सही सलामत लौट भी जाएँगे।
पर ऐसा नहीं है कि जान बचाकर पाकिस्तान से भागने में कामयाब होते ही इनकी जिंदगी बदल गई। मजलिस पार्क में डेरा डालने के बाद भले जिंदगी पर वह खतरा नहीं था जिससे ये पाकिस्तान से भागे थे, लेकिन जिंदा रहना यहाँ भी किसी चुनौती से कम नहीं था। गूगल करते ही आपको कुछ समय पहले की वे रिपोर्टें मिल जाएँगी जो बताती हैं कि ये किस दुर्दशा में जी रहे थे। दिल्ली सरकार के विरोध में इनके प्रदर्शन की खबरें मिल जाएँगी।
2021 की 11 जुलाई को जब मैं इस बस्ती में पहुँचा तो इनका जीवन काफी हद तक पटरी पर आ चुका था। इनकी बस्ती तक क्रिकेटर शिखर धवन पहुँच चुके थे। लॉकडाउन में कामकाज छूटने के बाद भी इन्हें रोटी की चिंता नहीं थी। राशन ही नहीं, भोजन की आपूर्ति भी की जा रही थी जो यहाँ के निवासियों के मुताबिक अभी भी जारी है। वैसे दिन बदलने पर अब कभी-कभार दूसरे लोग भी राशन और अन्य मदद लेकर इनके पास फोटो सेशन के लिए पहुँच जाते हैं।
बस्ती का मंदिर, बस्ती में सिलाई का प्रशिक्षण लेती बच्चियाँ, कच्छी गोदड़ी का नमूना (ऊपर से नीचे)
इन सुखद बदलावों को लेकर बात करने पर अब यहाँ के लोगों की आँखे चमक उठती है। 55 साल के केतन कच्छी के जेहन में 2019 का 17 सितंबर अब भी कैद है। वे बताते हैं, “बस्ती में बीजेपी का प्रोग्राम था। मंत्री राजनाथ सिंह (गिरिराज सिंह) आए थे। उसी दिन संजय भाई ने बस्ती गोद लिया था। इसके बाद ये सब काम हुआ है।” यहाँ के लोग बताते हैं कि इस कार्यक्रम के बाद से दिल्ली राइडिंग क्लब के साथ विहिप और सेवा भारती के लोगों का उनकी बस्ती में लगातार आना लगा रहा।
बस्ती में बदलाव की शुरुआत सबसे पहले जल निकासी की व्यवस्था से हुई। पीने का पानी आया। बस्ती में मंदिर का निर्माण किया गया। स्वच्छता पर जोर दिया गया। शौचालय की व्यवस्था और घरों के बाहर वृक्षारोपण हुआ। इन सबकी वजह से अब आप यहाँ के किसी घर के आँगन हो आइए तो आपको अपने बचपन के दिन, अपना गाँव और फूस के घर वाला वह आँगन अचानक से याद आ जाएगा।
उल्लेखनीय है कि कच्छी अपनी बस्ती में जिस आयोजन से बदलाव की शुरुआत होने की बात कर रहे हैं वह 17 सितंबर 2019 को प्रधानमंत्री मोदी का 69वें जन्मदिन पर हुआ था। इसे ‘सेवा दिवस’ के तौर पर बीजेपी ने मनाया था और देशभर में कार्यक्रम आयोजित हुए थे, जिसमें सेवा की शपथ ली गई थी। मजलिस पार्क की इस बस्ती में उस दिन केंद्र सरकार के मंत्री और बिहार के बेगूसराय से सांसद गिरिराज सिंह पहुँचे थे।
शेरपुरिया ने ऑपइंडिया को बताया, “2019 में जब मैं इस बस्ती में पहुँचा था तो मुझे भी इनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी। मैंने बस्ती के हालात देखे और उन लोगों से बात की तो पता चला कि पाकिस्तान में तमाम कष्ट भोगने के बाद वे बेहतर जिंदगी की उम्मीद लेकर भारत आए थे। लेकिन यहाँ भी उनकी जिंदगी बदतर थी। इसके बाद हमने इनके जीवन में बदलाव का संकल्प लिया और इसके लिए दो तरह की योजनाएँ बनाई। एक शॉर्ट टर्म और दूसरी लॉन्ग टर्म की। सबसे पहले अक्षय पात्रा के सहयोग से यह सुनिश्चित किया गया कि इनके नियमित रूप से भोजन की व्यवस्था हो। इसके बाद धीरे-धीरे विकास के अन्य काम शुरू किए गए। अब हमारा फोकस इनके लिए रोजगार की व्यवस्था करने पर है।”
उन्होंने बताया कि इस पूरे प्रयास में विश्व हिंदू परिषद और सेवा भारती जैसे संगठनों का भी भरपूर योगदान रहा है। रोटरी क्लब जैसी संस्थाओं के मदद से यहाँ की महिलाओं के लिए सिलाई प्रशिक्षण की भी व्यवस्था की गई। इन्हें प्रशिक्षण देने के लिए नियमित तौर पर इंस्ट्रक्टर आते रहते हैं। गौरतलब है कि कोरोना काल में शेरपुरिया द्वारा की गई ‘लकड़ी बैंक’ नामक पहल की सराहना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो चुकी है।
पाकिस्तानी हिंदुओं की बस्ती में क्रिकेटर शिखर धवन और नीचे दिल्ली राइडिंग क्लब के शेरपुरिया
बस्ती में रह रहे लोगों के लिए नियमित रोजगार की व्यवस्था के क्रम में कई लोगों को बैक्ट्री रिक्शा मुहैया कराई गई है। कुछ को फल-सब्जी लगाने के ठेले मिले हैं। इनके हुनर ‘कच्छी गोदड़ी’ को बाजार मुहैया कराने के प्रयास हो रहे हैं। शेरपुरिया के अनुसार अब इन्हें उद्योग भारती और खादी ग्रामोद्योग से जोड़ने की कोशिश हो रही है।
फिर भी कई परेशानियाँ बनी हुई हैं। जैसा कि 35 साल के धूरो बाई बताते हैं कि उन्हें पुलिस और स्थानीय प्रशासन से सहयोग नहीं मिलता। बस्ती तक आई बिजली को भी करीब दो महीने पहले काट दिया गया है। इससे बहुत दिक्कत होती है। धूरो बाई अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं पर स्कूल बस्ती से दूर होने के कारण छोटे बच्चों को काफी परेशानी होती है। वे कहते हैं, “हम वोटर होते तो सब लोग यहाँ दौड़े आते।” उन्होंने बताया कि बस्ती के ज्यादातर लोग मजदूरी करते हैं जो नियमित तौर पर नहीं मिलता। उनका कहना है कि यदि उन लोगों के लिए नियमित रोजगार की व्यवस्था कर दी जाए तो उनका जीवन काफी आसान हो जाएगा।
बस्ती का मुख्य मार्ग और पेयजल आपूर्ति की बस्ती में की गई व्यवस्था
पर जिंदगी उम्मीदों का नाम है। सो इनकी उम्मीदें भी जिंदा है। मोदी सरकार के नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के बाद इन्हें लगता है कि पूरी तरह भारतीय होना बस कुछ दिनों की बात है। पाकिस्तान में धर्म की वजह से प्रताड़ना झेलने वाले ये लोग अब हिंदू होने के गौरव का भी अहसास करने लगे हैं। यह तब भी दिखा जब बस्ती से विदा करते हुए इन लोगों ने ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाए!
सैटेलाइट डेटा इमेजरी से पता चला है कि सैकड़ों चीनी जहाज दक्षिण चीन सागर और पश्चिम फिलीपीन सागर के कुछ हिस्सों में मानव कचरा और अपशिष्ट जल को हर दिन उड़ेल रहे हैं।
अंतरिक्ष से दिखाई देता है
संयुक्त राज्य अमेरिका में स्थित एक सॉफ्टवेयर कंपनी सिम्युलैरिटी के संस्थापक और सीईओ लिज़ डेर ने कहा कि इन क्षेत्रों में मानव अपशिष्ट का संचय इतना तीव्र है कि वह इसे अंतरिक्ष से देख सकते हैं। बता दें कि लिज़ डेर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) तकनीकों को बनाने और भू-स्थानिक इमेजरी एवं डेटा का विश्लेषण करने में माहिर हैं।
दक्षिण चीन सागर में फेंकी गई मानव गंदगी दिखाने वाली सेटेलाइट तस्वीरें (साभार: GMA News online)
लिज़ डेर ने अपने दावे की पुष्टि करने के लिए पिछले पाँच वर्षों में एकत्रित उपग्रह तस्वीरों का उपयोग करते हुए और स्थान-विशेष को चिन्हित करते हुए बताया कि कहाँ-कहाँ दक्षिण चीन सागर और पश्चिम फिलीपीन सागर के हिस्सों में चीनी जहाजों से उड़ेले गए कचरे का ढेर है। यह प्रवाल भित्तियों (coral reef) को नुकसान पहुँचा रहा है, जिसे ठीक होने में दशकों लगेंगे।
मानव अपशिष्ट से प्रवाल भित्तियों को क्षति
दक्षिण चीन सागर में चीन की कार्रवाइयों पर एक फिलीपीन ऑनलाइन न्यूज फोरम में बोलते हुए लिज डेर ने कहा कि केवल 17 जून को कम से कम 236 जहाजों को देखा गया, जबकि इस क्षेत्र को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यूनियन बैंकों के रूप में जाना जाता है। बता दें कि दक्षिण चीन सागर पर चीन वर्षों से संप्रभुता का दावा कर रहा है।
लिज डेर ने कहा, “जब जहाज नहीं चलते हैं, तो मल ढेर हो जाता है। सैकड़ों जहाज जो स्प्रैटली में ठहरे हुए हैं, वे कच्चे सीवेज को उन चट्टानों पर डंप कर रहे हैं, जिन पर वे कब्जा कर चुके हैं। पिछले पाँच वर्षों में प्रवाल भित्तियों को हुई क्षति स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती है।”
सिम्युलैरिटी के सीईओ ने कहा कि स्प्रैटली द्वीप के कुछ क्षेत्रों में क्लोरोफिल-a (Chlorophyll-a) में वृद्धि के पीछे मानव अपशिष्ट है। कंपनी के अनुसार, क्लोरोफिल-a के कंसनट्रेशन से समुद्री क्षेत्र में हानिकारक शैवाल गतिविधि हो सकती है।
फिलीपींस ने दक्षिण चीन सागर की चट्टान से 200 से अधिक चीनी जहाजों को वापस लेने की माँग की
जानकारी के मुताबिक मार्च 2021 में, फिलीपींस के रक्षा सचिव डेल्फ़िन लोरेंजाना ने दक्षिण चीन सागर से 200 से अधिक चीनी जहाजों को पूरी तरह से वापस ले जाने की माँग की थी। रक्षा सचिव लोरेंजाना ने एक बयान में कहा था, “हम चीन से इस घुसपैठ को रोकने और हमारे समुद्री अधिकारों का उल्लंघन करने वाली और हमारे संप्रभु क्षेत्र में अतिक्रमण करने वाली इन जहाजों को तुरंत वापस बुलाने का आह्वान करते हैं।”
फिलीपींस सरकार की समर्थक मीडिया के अनुसार, लगभग 220 चीनी जहाजों ने व्हिटसन रीफ (जिस पर चीन भी दावा करता है) में लंगर डाला है। इस मीडिया रिपोर्ट में व्हिटसन बे पर इन चीनी जहाजों की तस्वीरें भी जारी की गईं हैं।
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने सोमवार (12 जुलाई) को मवेशियों की हत्या और बिक्री पर रोक लगाने के लिए राज्य विधानसभा में मवेशी संरक्षण से संंबंधित विधेयक ‘असम मवेशी संरक्षण विधेयक 2021’ पेश किया। सरमा ने कहा कि नए कानून का उद्देश्य सक्षम अधिकारियों द्वारा तय स्थानों के अलावा अन्य जगहों पर बीफ की बिक्री और खरीद पर रोक लगाना है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि एक नया कानून बनाने और पूर्व के असम मवेशी संरक्षण अधिनियम, 1950 को निरस्त करने की आवश्यकता थी, जिसमें मवेशियों के हत्या, उपभोग और परिवहन को विनियमित करने के लिए पर्याप्त कानूनी प्रावधानों का अभाव था। नए कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि उन क्षेत्रों में बीफ के व्यापार की अनुमति नहीं दी जाए, जहाँ मुख्य रूप से हिंदू, जैन, सिख और बीफ नहीं खाने वाले समुदाय रहते हैं या किसी मंदिर एवं हिंदुओं की धार्मिक संस्था के 5 किलोमीटर के दायरे में आते हैं।
विधेयक में उचित दस्तावेज के अभाव में मवेशियों को एक जिले से दूसरे जिले ले जाने और अन्य जगहों पर बीफ की बिक्री व खरीद को अवैध बनाने का प्रस्ताव है। साथ ही नए प्रस्तावित कानून ‘असम मवेशी संरक्षण विधेयक 2021’ के तहत अपराध गैर जमानती होगा।
दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति को कम से कम तीन साल और अधिकतम 8 साल तक की कैद या 3 लाख रुपए से 5 लाख रुपए तक का जुर्माना व दोनों हो सकता है। नए कानून के तहत अगर कोई दोषी दूसरी बार उसी या संबंधित अपराध का दोषी पाया जाता है तो उसकी सजा दोगुनी हो जाएगी।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस कानून को लाने का उद्देश्य पड़ोसी बांग्लादेश में गायों की तस्करी को नियंत्रित करने और गायों के अंतरराज्यीय परिवहन पर प्रतिबंध लगाना है। विधेयक में मवेशियों के परिवहन पर कुछ छूट है। जैसे मवेशियों को चरागाह, कृषि या पशुपालन के उद्देश्य से जिले के अंदर कहीं भी ले जाने के लिए किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी।
विधेयक के अनुसार, पशु चिकित्सा अधिकारी केवल तभी प्रमाण पत्र जारी करेगा, जब मवेशी जो कि गाय नहीं है और उसकी आयु 14 वर्ष से अधिक हो। गाय, बछिया या बछड़े का तभी वध किया जा सकता है जब वह स्थायी रूप से अपाहिज हो।
वहीं, लाइसेंस प्राप्त और मान्यता प्राप्त बूचड़खानों को ही मवेशियों को काटने की अनुमति दी जाएगी। यदि अधिकारियों को वैध दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं तो नया कानून राज्य के भीतर या बाहर गोवंश के परिवहन पर रोक लगाएगा। यह कानून पूरे असम में मवेशियों जैसे बैल, गाय, बछिया, बछड़े, नर और मादा भैंस और भैंस के कटड़ों पर लागू होगा।
उत्तर प्रदेश में मौजूदा रबी मार्केंटिंग सत्र 2021-22 के दौरान न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर 12.98 लाख किसानों से रिकॉर्ड मात्रा में 56.41 लाख मीट्रिक टन गेहूँ की खरीद की गई। यह राज्य के इतिहास में गेहूँ की अब तक की सबसे अधिक खरीद है।
राज्य के किसानों को एमएसपी के रूप में कुल 11,141.28 करोड़ रुपए का भुगतान किया जा चुका है। वर्तमान सत्र में हुई खरीद में रबी मार्केटिंग सत्र 2020-21 की तुलना में 58% की वृद्धि हुई है। तब 6.64 लाख किसानों से 35.77 लाख मीट्रिक टन गेहूँ खरीदा गया था।
उपभोक्ता कार्य, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने बताया कि उत्तर प्रदेश में खरीफ मार्केटिंग सत्र 2020-21 के दौरान धान की भी रिकॉर्ड खरीद हुई थी। खरीफ मार्केटिंग सत्र 2020-21 के दौरान उत्तर प्रदेश के 10.22 लाख किसानों से 66.84 लाख मीट्रिक टन धान की रिकॉर्ड खरीद की गई थी। यह राज्य के इतिहास में धान की अब तक की सर्वाधिक खरीद है।
यहाँ पर यह ध्यान देने वाली बात है कि गेहूँ की खरीद का कार्य वर्तमान रबी मार्केटिंग सत्र (RMS 2021-22) के लिए इसकी खरीद वाले अधिकांश राज्यों में पूरा हो चुका है। 8 जुलाई 2021 तक 433.32 लाख मीट्रिक टन गेहूँ की खरीद की गई है (जो कि अब तक की खरीद का सबसे उच्चतम स्तर है, क्योंकि इसने RMS 2020-21 के पिछले उच्च स्तर 389.92 लाख मीट्रिक टन गेहूँ की खरीद के आँकड़े को पार कर लिया है)।
पिछले साल की इसी अवधि में 387.50 लाख मीट्रिक टन गेहूँ खरीदा गया था। लगभग 49.16 लाख किसान मौजूदा रबी मार्केटिंग सत्र में MSP मूल्यों पर हुए खरीद कार्यों से लाभान्वित हो चुके हैं और उन्हें 85,581.02 करोड़ रुपए का भुगतान किया जा चुका है।
धान की खरीद वर्तमान खरीफ सत्र 2020-21 में इसकी बिक्री वाले राज्यों में सुचारू रूप से जारी है। 8 जुलाई 2021 तक 866.05 लाख मीट्रिक टन से अधिक धान का क्रय किया जा चुका है (इसमें खरीफ फसल का 707.59 लाख मीट्रिक टन और रबी फसल का 158.46 लाख मीट्रिक टन धान शामिल है), जबकि पिछले वर्ष की इसी अवधि में 756.80 लाख मीट्रिक टन धान खरीदा गया था।
मौजूदा खरीफ विपणन सत्र में लगभग 127.72 लाख किसानों को पहले ही MSP मूल्य पर 1,63,510.77 करोड़ रुपए का भुगतान करके खरीद कार्य से लाभान्वित किया जा चुका है। धान की खरीद भी सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुँच गई है और इसने खरीफ मार्केटिंग सत्र 2019-20 के पिछले उच्च स्तर 773.45 लाख मीट्रिक टन के आँकड़े को पार कर लिया है।
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार द्वारा लाई जा रही नई जनसंख्या नीति का साधु-संतों की सर्वोच्च संस्था अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने समर्थन किया है। परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरि ने जनसंख्या नियंत्रण बिल का स्वागत करते हुए मुस्लिम धर्मगुरुओं से सवाल किया है। उन्होंने कहा, ”आखिर बच्चा पैदा करने में अल्लाह की क्या देन है?” उन्होंने आगे कहा कि मुस्लिम समाज में भले ही तीन महिलाओं से निकाह करने की छूट हो, लेकिन तीनों पत्नियों से 2 ही बच्चे पैदा करने की इजाजत मिलनी चाहिए।
महंत गिरि ने मुस्लिम धर्मगुरुओं से इस कानून को हृदय से स्वीकार करने की अपील की। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि वे कम बच्चे पैदा करने के लिए मुस्लिम लोगों को जागरूक करें। उन्होंने कहा कि पत्नी भले ही तीन हों, लेकिन बच्चे दो ही हों।
देश में जनसंख्या विस्फोट पर चिंता जाहिर करते हुए महंत नरेंद्र गिरि ने कहा, ”जनसंख्या विस्फोट देश और प्रदेश में कई प्रमुख समस्याओं का कारण है। इस पर तत्काल रोक लगाना जरूरी है।” उन्होंने कहा कि जनसंख्या कम से शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर होंगी।
अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष ने कहा कि सभी धर्मों के लोग मिलकर ही इस समस्या से निजात पा सकते हैं। जनसंख्या नियंत्रण में जाति और मजहब को बीच में ना लाते हुए सबको जनसंख्या नियंत्रण के लिए लाए जा रहे कानून का पालन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि नया कानून सबके लिए बाध्यकारी होना चाहिए।
उन्होंने विश्व जनसंख्या दिवस (11 जुलाई) पर कहा कि अगर दो के बाद कोई तीसरा बच्चा पैदा करता है तो उसके वोट दे ने के अधिकार को खत्म किया जाए, आधार कार्ड बनाने पर रोक लगाई जाए, चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित किया जाए। साथ ही उसे सरकार की तमाम योजनाओं के लाभ भी ना दिए जाएँ। महंत गिरि ने कहा कि तभी इस कानून का सही मायने में सख्ती से पालन हो सकता है।
बता दें कि उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण कानून का मसौदा तैयार किया है। राज्य विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस आदित्यनाथ मित्तल ने इसे तैयार किया है। आयोग ने ड्राफ्ट पर 19 जुलाई तक जनता से उनकी राय माँगी है। इस बिल के कानून बनते ही यूपी में भविष्य में जिनके 2 से ज्यादा बच्चे होंगे, उन्हें सरकारी नौकरी नहीं मिलेगी और वो कभी चुनाव भी नहीं लड़ पाएँगे। इसके अलावा उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलेगा।