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370 बहाल होने तक नहीं लड़ूँगी चुनाव, जम्मू बनेगा ‘खेला होबे’ का गवाह: महबूबा मुफ्ती

जम्मू में स्थानीय प्रतिनिधिमंडलों से मिलने के बाद जम्मू-कश्मीर की पूर्व सीएम महबूबा मुफ्ती ने प्रशासन आलोचना करते हुए कहा कि अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद इस क्षेत्र में कोई विकास नहीं हुआ। तृणमूल कॉन्ग्रेस के ‘खेला होबे’ नारे का जिक्र करते हुए कहा कि जम्मू भी जल्द ही इसका गवाह बनेगा। इसके साथ ही उन्होंने जम्मू-कश्मीर का संविधान बहाल होने तक चुनाव नहीं लड़ने का भी संकल्प लिया। मुफ्ती ने आरोप लगाया कि बीजेपी ने ‘मंदिरों के शहर’ (जम्मू) को ‘शराब का शहर’ बना दिया है।

मुफ्ती ने कहा, “मैं जम्मू में विभिन्न प्रतिनिधिमंडल से मिली। हमें बताया गया था कि 370 व 35A खत्म होने के बाद जम्मू-कश्मीर में विकास दिखाई देगा और स्वर्ग बन जाएगा, लेकिन मुश्किलें बढ़ गई हैं। जब जम्मू-कश्मीर के लोगों ने भारत के साथ जाने का फैसला किया तो महाराजा ने कहा था कि पहचान की रक्षा के लिए कुछ कानून बने रहेंगे, लेकिन अब वे जम्मू-कश्मीर को लूटना चाहते हैं। वे मंदिरों के शहर को शराब का शहर बनाना चाहते हैं।”

यह पूछे जाने पर कि क्या वह फिर से सीएम बनेंगी, मुफ्ती ने इशारे से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, “पार्टी में हमारे पास कई सक्षम नेता हैं। हम लोकतांत्रिक प्रक्रिया को खारिज नहीं कर रहे हैं, मैंने जम्मू-कश्मीर के संविधान की शपथ और दोनों झंडा लिया है। जब तक जम्मू-कश्मीर और भारतीय संविधान एक साथ रहेंगे, मैं चुनाव नहीं लड़ूँगी। भाजपा जिन नीतियों का पालन कर रही है, उससे लोगों को खतरा महसूस हो रहा है। ‘खेला होबे’ यहाँ भी होगा।”

पश्चिम बंगाल में ‘खेला होबे’ नारे के साथ हुई हिंसा

चुनावी रुझान तृणमूल के पक्ष में आने के बाद से टीएमसी समर्थक जगह-जगह अपनी जीत के जश्न में हल्ला करते देखे गए थे। उन्होंने कोलकाता में स्थित भाजपा कार्यालय के बाहर भी भारी संख्या में इकट्ठा होकर ढोल बजाया था। वहीं, आरामबाग में भाजपा कार्यालय जलता हुआ देखा गया था।

उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल में 2 मई 2021 को विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद राजनीतिक हिंसा भड़क उठी थी। इस दौरान हिंसा की करीब 15 हजार घटनाएँ हुईं। इसमें 25 लोगों की मौत हो गई और करीब 7,000 महिलाओं के साथ बदसलूकी की गई। यह दावा सिक्किम हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रहे प्रमोद कोहली की अगुवाई वाली फैक्ट फाइंडिंग टीम की रिपोर्ट में किया गया है।

हाईकोर्ट पहुँचा मामला

पश्चिम बंगाल हिंसा का मामला हाईकोर्ट तक पहुँचा। कोलकाता हाईकोर्ट ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पश्चिम बंगाल सरकार को बड़ा झटका दिया था। कलकत्ता हाईकोर्ट ने 21 जून 2021 को राज्य में चुनाव के बाद जारी हिंसा की जाँच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) से कराने के अपने आदेश को वापस लेने या उस पर रोक लगाने वाली याचिका को खारिज कर दिया था।

बंगाल हिंसा की पीड़िताओं ने सुप्रीम कोर्ट को सुनाया दर्द

एक 60 वर्षीय महिला ने शीर्ष अदालत को बताया है कि 4-5 मई को पूर्व मेदिनीपुर में विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद टीएमसी के कार्यकर्ता उसके घर में जबरन घुस गए। लूटपाट करने से पहले 6 साल के पोते के सामने ही उसका गैंगरेप किया

वहीं, अनुसूचित जाति की एक 17 वर्षीय नाबालिग लड़की ने भी अपने साथ टीएमसी कार्यकर्ताओं द्वारा कथित गैंगरेप के मामले की सीबीआई या एसआईटी से जाँच करवाने की माँग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। 

पूर्णिमा मंडल नाम की एक अन्य पीड़िता ने अपनी याचिका में कहा था कि 14 मई को उसके पति धर्मा मंडल पर कुल्हाड़ी से हमला किया गया, क्योंकि उन्होंने बीजेपी के लिए प्रचार किया था। 16 मई को उनके पति की मौत हो गई। उनके साथ भी रेप की कोशिश भी की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार को जारी किया नोटिस

हिंसा के दौरान विपक्ष खासकर बीजेपी समर्थक निशाने पर थे। बीजेपी से जुड़े जिन लोगों की हत्या की गई, उनमें अभिजीत सरकार और हारन अधिकारी भी शामिल थे। हिंसा की सीबीआई जाँच या विशेष जाँच दल (SIT) के गठन को लेकर इनके परिजनों की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल सरकार को नोटिस जारी किया था।

याचिका पर सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि किस बेरहमी से इनकी हत्या की गई। अभिजीत सरकार की पत्नी जो इस घटना की चश्मदीद भी हैं ने बताया था, “भीड़ ने उनके गले में सीसीटीवी कैमरे का तार बाँधा, गला दबाया, ईंट व डंडों से पीटा और सिर फाड़कर माँ के सामने ही उनकी बेरहमी से हत्या कर दी। आँखों के सामने बेटे की हत्या होते देख उनकी माँ बेहोश होकर मौके पर ही गिर गईं।”

योगी सरकार की जनसंख्या नीति, एक बच्चे वाले ‘नियम’ से नाखुश VHP ने पत्र लिख इसे हटाने की माँग की

उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लाई गई नई जनसंख्या नीति को लेकर विश्व हिंदू परिषद ने सोमवार (12 जुलाई) को यूपी लॉ कमिशन को पत्र लिखा। राज्य विधि आयोग द्वारा तैयार किए गए इस मसौदे पर 19 जुलाई तक जनता से सुझाव और सिफारिशें माँगी गई हैं। इसके बाद विहिप द्वारा यह पत्र लिखा गया है। पत्र जनसंख्या नियंत्रण की दिशा में सही कदम उठाने के सरकार के फैसले का स्वागत करने के साथ शुरू होता है, लेकिन बिल में शामिल एक बच्चे की नीति पर कई कमियों को उजागर किया गया है।

दरअसल, विश्व हिंदू परिषद ने पत्र लिखकर उत्तर प्रदेश कानून आयोग से उत्तर प्रदेश जनसंख्या (नियंत्रण, स्थिरीकरण और कल्याण) बिल, 2021 के प्रस्तावित मसौदे से एक बच्चे की नीति को हटाने की सिफारिश की है। विश्व हिन्दू परिषद की ओर से कहा गया है कि दो बच्चों वाली नीति जनसंख्या नियंत्रण की ओर ले जाती है, लेकिन दो से कम बच्चों की नीति आने वाले समय में कई नकारात्मक प्रभाव पैदा कर सकती है।

पत्र का विवरण

कुल प्रजनन दर (टीएफआर) को एक निश्चित सीमा (1.7) के भीतर तक लाने के उद्देश्य पर पुनर्विचार करने के सुझाव के साथ पत्र की शुरुआत की गई। यह प्रासंगिक है कि कुल प्रजनन दर को प्रतिस्थापन दर के रूप में भी परिभाषित किया जाता है।

जनसंख्या नियंत्रण बिल पर विहिप का पत्र

विश्व हिन्दू परिषद द्वारा अपने पत्र में कहा कि अगर वन चाइल्ड पॉलिसी लाई जाती है, तो इससे सामाज में आबादी का असंतुलन पैदा होगा। ऐसे में सरकार को इस बारे में फिर से विचार करना चाहिए, वरना इसका असर नेगेटिव ग्रोथ पर हो सकता है। अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए विहिप ने पत्र में चीन का उदाहरण दिया, जिसने दो महीने पहले घटती और बुजुर्ग होती जनसंख्या से परेशान होकर प्रत्येक माता-पिता को तीन बच्चे पैदा करने की अनुमति दी थी।

जनसंख्या नियंत्रण विधेयक पर विहिप का पत्र

पत्र में लिखा गया है कि ऐसा कहा जाता है कि चीन में, एक बच्चे की नीति को कभी भी आधे से अधिक भावी माता-पिता पर लागू नहीं किया गया था। चीन की एक दशक में एक बार की गई जनगणना से पता चला था कि 1950 के दशक के बाद से पिछले दशक के दौरान जनसंख्या सबसे धीमी दर से बढ़ी है। अकेले 2020 में महिलाओं ने औसत रूप से 1.3 बच्चों को जन्म दिया है। 2016 में चीन ने अपनी दशकों पुरानी एक बच्चे की नीति को समाप्त कर दिया था।

विश्व हिन्दू परिषद द्वारा कहा गया है कि असम, केरल जैसे राज्यों में जनसंख्या के ग्रोथ में असंतुलन देखा गया है। ऐसे में उत्तर प्रदेश को इस तरह के कदम से बचना चाहिए और लाई गई ताजा जनसंख्या नीति में बदलाव करना चाहिए। उन्होंने इन राज्यों में बढ़ती असमानता का उदाहरण देते हुए कहा कि जहाँ हिंदुओं का टीएफआर 2.1 की प्रतिस्थापन दर से नीचे गिर गया वहीं, मुसलमानों का टीएफआर क्रमशः 2.33 और 3.16 था, जो एक समुदाय के सिकुड़ने और दूसरे के विस्तार को उजागर करता है।

जनसंख्या नियंत्रण विधेयक पर विहिप का पत्र

पत्र को समाप्त करते हुए, विहिप ने प्रस्तावित विधेयक के प्रासंगिक खंड की ओर इशारा किया, जिस पर पुनर्विचार की आवश्यकता थी।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के जनसंख्या नियंत्रण बिल 2021 के तहत जिनके पास दो से अधिक बच्चे होंगे, उन्हें न तो सरकारी नौकरी के लिए योग्य माना जाएगा और वे न ही कभी चुनाव लड़ पाएँगे। दरअसल, उत्तर प्रदेश की राज्य विधि आयोग ने सिफारिश की है कि एक बच्चे की नीति अपनाने वाले माता-पिता को कई तरह की सुविधाएँ दी जाएँ, वहीं दो से अधिक बच्चों के माता-पिता को सरकारी नौकरियों से वंचित रखा जाए।

इसके अलावा, एक संतान पर नसंबदी करवाने वाले दंपति को सरकार द्वारा एकमुश्त राशि के भुगतान का प्रस्ताव रखा गया है। एक मात्र बच्चा अगर लड़का है तो 80 हजार रुपए और लड़की है तो एक लाख रुपए दिए जाने की सिफारिश की गई है।

एक बच्चे के लिए लाभों की पूरी सूची

बता दें कि इस तरह के लाभों में स्नातक तक मुफ्त शिक्षा, आईआईएम और एम्स जैसे प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में एकल बच्चे को वरीयता और सरकारी नौकरी शामिल है।

आमिर खान ने लद्दाख में फैलाया कचरा? वीडियो वायरल होने पर लोगों ने कहा- उन्हीं से साफ कराएँ

अपने तलाक को लेकर चर्चा में आए आमिर खान एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार उन पर अपनी आगामी फिल्म लाल सिंह चड्ढा की शूटिंग के दौरान लद्दाख में प्रदूषण फैलाने का आरोप लगाया गया है। दरअसल, एक ट्विटर यूजर ने एक वीडियो शेयर कर बताया है कि लद्दाख के वाखा गाँव में फिल्म की शूटिंग के दौरान कथित तौर पर प्रदूषण फैलाया गया है।

@nontsay नाम के एक ट्विटर यूजर ने वीडियो शेयर करते हुए लिखा है कि लद्दाख के गाँव वाखा के ग्रामीणों के लिए यह उपहार दिया गया है। वीडियो में चारों ओर फैली पानी की बोतलें और अन्य कचरा दिखाई दे रहा है। साथ ही यूजर ने यह भी लिखा है कि वैसे तो आमिर खान सत्यमेव जयते के दौरान पर्यावरण संरक्षण की बड़ी-बड़ी बातें करते थे, लेकिन जब खुद की बारी आई तो यह हाल है। यूजर ने कहा कि ऐसा लगता है कि ये लोग (बॉलीवुड स्टार्स) अपनी सामाजिक जिम्मेदारी भूल चुके हैं।

सोशल मीडिया पर यह वीडियो आने के बाद कई लोगों ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। कुछ लोगों ने कहा कि उन्हीं से बुलाकर साफ करवाना चाहिए, ताकि आगे सबको सबक मिल सके।

वहीं, एक अन्य यूजर ने कहा कि पर्यटकों पर नियंत्रण आवश्यक है क्योंकि ये लोग जानते हैं कि ऐसा करके ये हमेशा बच ही जाएँगे।

एक ट्विटर यूजर ने तो यहाँ तक कहा कि इन्हें भारत से नहीं बल्कि तुर्की से मतलब है। एक दूसरे यूजर ने वीडियो शेयर करने वाले यूजर को सुझाव दिया कि उसे यह कचरा पैक करके आमिर खान के घर कूरियर कर देना चाहिए।

ज्ञात हो कि आमिर खान इस समय अपनी फिल्म लाल सिंह चड्ढा की शूटिंग कर रहे हैं। इसकी शूटिंग लद्दाख में भी हो रही है, जहाँ संभवतः एक युद्ध का सीन शूट किया जा रहा है जो लगभग 45 दिनों तक चलेगा। आमिर की इस फिल्म में उनके साथ करीना कपूर और टॉलीवुड के सुपरस्टार नागा चैतन्य भी हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आमिर खान की आगामी फिल्म लाल सिंह चड्ढा अमेरिकी अभिनेता टॉम हैंक्स की फॉरेस्ट गंप पर आधारित है।

NASA के ट्वीट पर आई प्रतिक्रियाएँ विज्ञान के प्रति समर्थन नहीं, हिंदुत्व के प्रति घृणा दर्शाती हैं

NASA ने अपने एक प्रोग्राम fall NASA इंटर्नशिप के लिए आवेदन आमंत्रित करते हुए ट्वीट क्या किया हिन्दू घृणा की बाढ़ सी आ गई। उसमें एक आवेदन भारतीय छात्रा प्रतिमा रॉय का भी था। प्रतिमा की जो फोटो NASA ने अपने ट्वीट के साथ लगाई उसमें प्रतिमा के टेबल पर हिन्दू देवियों की मूर्तियां थीं। इस पर अलग-अलग जगह से हिन्दू घृणा वाले ट्वीट आये। किसी ने इसे विज्ञान का नाश बताया तो किसी ने यह सवाल उठाया कि हिन्दू बच्चों को देवी-देवताओं के साथ इतना लगाव क्यों है? क्या उनके बिना ये बच्चे कुछ नहीं कर सकते? कोई कल्पनाशील महापुरुष अपनी प्रतिक्रिया में श्रीराम और पुष्पक विमान को भी ले आया तो किसी ने ट्वीट के जवाब में दिए अपने उत्तर में ‘संघियों’ को घसीट लिया। विरोध के जितने स्वर और प्रतिक्रिया, उनके उतने ही प्रकार।    

यह बहस (भले ही एक निरर्थक बहस) का विषय हो सकता है कि धर्म और विज्ञान एक साथ रह सकते हैं या नहीं? यह बहस भी निरर्थक ही होगी कि धर्म के रहते विज्ञान प्रगति कर सकता है या नहीं, क्योंकि विश्व भर में आजतक विज्ञान की जो प्रगति हमने देखी, सुनी या पढ़ी है वह धर्म के रहते ही हुई है। विज्ञान के आने से धर्म विश्व से विलुप्त नहीं हो गया। यदि भारतीय इतिहास को देखें तो पाएंगे कि सनातन धर्म ने शायद ही कभी विज्ञान का विरोध किया हो। दरअसल देखा जाए तो सनातन धर्म निज रूप में विज्ञान सम्मत धर्म रहा है। 

फिर प्रश्न यह उठता है कि एक धार्मिक व्यक्ति वैज्ञानिक हो सकता है या नहीं?  इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जिनमें धर्म में आस्था रखने वाले लोग वैज्ञानिक ही नहीं बड़े वैज्ञानिक या गणितज्ञ हुए हैं। भारत में तो हमारे ऋषियों और मुनियों ने ही विज्ञान की लगभग हर शाखा पर काम किया या अपने सिद्धांत प्रतिपादित किये। उन्होंने चिकित्सा विज्ञान से लेकर अणु विज्ञान और गणित से लेकर खगोल विज्ञान तक, विज्ञान की लगभग हर शाखा को प्रभावित किया। हाल के इतिहास पर दृष्टि डालें तो सबसे बड़ा उदाहरण गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन का है, जिन्होंने धर्म में निज आस्था और गणित के अपने समीकरणों के लिए किसी अलौकिक शक्ति से प्रेरणा और सहायता की बात की थी। 

धर्म और विज्ञान के एक साथ एक समय में विकसित होने की बात केवल भारत तक सीमित नहीं है। धर्म और दर्शन के प्रति आइजक न्यूटन के विचार जगजाहिर हैं। केवल NASA में ही नहीं, और स्पेस एजेंसी में काम करने वालों ने अपनी अंतरिक्ष यात्राओं से पहले अपनी चर्च यात्रा और प्रार्थना की बात कही और लिखी है। हाल के सबसे चर्चित शोधों में एक हिग्ग्स बोसोन (गॉड पार्टिकल) प्रयोग स्विट्जरलैंड के CERN लैब में हुआ, जहाँ भगवान शिव नटराज के रूप में विराजमान हैं। ऐसे में यह कहना कि हिन्दू धर्म विज्ञान के विरोध में खड़ा होता है, एक छिछला विचार है और इसका मूल शायद हिन्दू या हिंदुत्व के प्रति घृणा में है न कि विज्ञान के प्रति समर्थन में।

NASA के ट्वीट और उसके उत्तर-प्रत्युत्तर में समर्थन, घृणा, आलोचना से लेकर तर्क और कुतर्क तक, सब कुछ दिखाई दिया, पर जो बात एक बार फिर से साबित हुई वह है हिन्दुओं और हिंदुत्व के प्रति घृणा, जो सोशल मीडिया में हो या फिर परंपरागत मीडिया में, आजकल मिशन मोड में प्रस्तुत की जाती है। वैसे यह कोई नई प्रवृत्ति नहीं है पर जो बात नई है वह है कि आजकल इस मिशन में धर्मवादी, जातिवादी, बुद्धिवादी, विज्ञानवादी, अज्ञानवादी, बुद्धिजीवी, आन्दोलनजीवी, तथाकथित समाज सुधारक, आस्तिक प्रचारक और नास्तिक विचारक, सब अंशदान करते हैं। इस सोच के पीछे कारण शायद यह है कि हिंदुत्व के विरुद्ध जितने अधिक मोर्चे रहेंगे उतना अच्छा। ऐसे में जो विरोध पहले धर्मवादियों या वामपंथियों तक सीमित था, उसकी कई और शाखाएँ खुल गई हैं। सूचना युग में आक्रमण के समय अलग-अलग गुटों के बीच समन्वय वैसे भी पहले जितना कठिन नहीं रहा, इसलिए मिशन के रूप में यह काम आसान हो जाता है।     

ऐसा नहीं कि हिन्दू या हिंदुत्व के प्रति घृणा कोई नई बात है। यह पुरानी बात है। हाँ, हाल के वर्षों में जो नई बात सामने आई है वह घृणा से नहीं, बल्कि उसके प्रदर्शन से संबंधित है। पहले हिन्दू विरोधियों को घृणा के प्रदर्शन की आवश्यकता बहुत कम पड़ती थी, क्योंकि तब राजनीतिक सत्ता के साथ-साथ राजनीतिक और सामाजिक विमर्श की शक्ति इनके अधीन थी। तब ये इस बात से आश्वस्त थे कि न केवल हिन्दू बल्कि हिंदुत्व भी इनके नियंत्रण में है। ऐसे में ये हिन्दुओं से घृणा करते तो थे, पर दुनियाँ के सामने ऐसा करते हुए दिखना नहीं चाहते थे। अब इन्हें घृणा के प्रदर्शन की आवश्यकता इसलिए पड़ रही है, क्योंकि ये शक्ति इनके हाथ से निकलती जा रही हैं। 

आज जो दिखाई दे रहा है वह राजनीतिक सत्ता तथा राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के हाथ से निकलते हुए महसूस करने की कसमसाहट है। यह शायद इसलिए भी है क्योंकि इनके पास ऐसी स्थिति के लिए कोई योजना नहीं थी, जो हिन्दुओं या हिंदुत्व पर इनके नियंत्रण के चले जाने के बाद बनी है। या फिर इन्होंने ऐसी किसी स्थिति की कल्पना ही नहीं की थी।   

हिन्दुओं और हिंदुत्व के प्रति घृणा का जो प्रदर्शन आजकल जगह-जगह किया जाता है, उसे करने वालों ने हिन्दू घृणा के स्वरूपों को इतनी परिभाषाएँ दे रखी हैं कि उनके लिए सब कुछ सुविधाजनक और लचीला हो गया है। आवश्यकता पड़ने पर ये ब्राह्मण से घृणा को ही हिन्दू धर्म से घृणा बता सकते हैं और हिन्दू धर्म से घृणा को ब्राह्मणों से घृणा बता सकते हैं। आवश्यकता पड़ने पर संघ और मोदी के प्रति घृणा को हिन्दुओं और हिंदुत्व के प्रति घृणा बना सकते हैं और हिन्दुओं और हिंदुत्व के प्रति घृणा को संघ और मोदी के प्रति घृणा बना सकते हैं। यही कारण है कि अपनी इस घृणा को न्यायसंगत सिद्ध करने के लिए आज इन्हें अब एक या दो से अधिक मुखौटों की आवश्यकता पड़ती है। इसीलिए आज घृणा के इस प्रदर्शन में हर तरह के लोग शामिल हैं। 

घृणा का यह प्रदर्शन भविष्य में और तीव्र होगा। पिछले कुछ वर्षों में हिंदुत्व के प्रति देसी घृणा को विदेशी घृणा का समर्थन मिला है। अब तो अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और व्यक्ति खुलकर इसका हिस्सा बनते हुए नजर आते हैं। ऐसे में अब कुछ भी ढँका या छिपा हुआ नहीं रहता। NASA के ट्वीट के उत्तर में प्रतिमा रॉय और हिन्दू देवी देवताओं पर आई प्रतिक्रियाएँ भी इस बात को ही उजागर करती हैं कि विरोध करनेवालों का सरोकार विज्ञान के समर्थन में नहीं है। उनकी घृणा केवल हिंदुत्व के प्रति है, जिसे विज्ञान के समर्थन का मास्क पहना दिया गया है।

13 साल की मनमीत, 23 साल का शाहिद: ThePrint की ‘पत्रकारिता’, कश्मीरी सिख लड़की के धर्मांतरण को ठहराया सही

जम्मू-कश्मीर में सिख लड़कियों के धर्मांतरण के मामले को कई दिन बीतने के बाद इस केस में कुछ नई जानकारी सामने आई है। द प्रिंट की 9 जुलाई को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, सिख लड़की से कथित तौर पर जिस शाहिद नजीर भट्ट ने निकाह किया था, वह 2 जुलाई को रिहा हो गया है।

द प्रिंट की रिपोर्ट की हेडलाइन

ऐसे में द प्रिंट के पत्रकार ने उससे बात की और पूरे मामले में उसका पक्ष छापा। बयान में शाहिद ने कहा कि वह मनमीत कौर से 6 साल से प्यार करता था। यानी 29 साल का शाहिद 19 वर्ष की मनमीत को तबसे पसंद कर रहा था, जबसे वो मात्र 13 साल की थी और वह 23 साल का था। मामला साफ तौर पर ग्रूमिंग जिहाद का दिखता है।

मनमीत की उम्र को लेकर कन्फ्यूजन

द प्रिंट द्वारा एक्सेस किए गए दस्तावेजों के अनुसार मनमीत के आधार कार्ड में उसका जन्म वर्ष फरवरी 2003 मिला है, जिसके मुताबिक उसकी उम्र 18 साल 5 माह की बनती है। इसके अलावा अपने एफिडेविट में खुद मनमीत ने भी अपने आप को 19 साल का बताया है।

रिपोर्ट कहती है कि मनमीत ने हलफनामे में कहा कि उसने बिन किसी डर या दबाव के इस्लाम को स्वीकारा है और एक साल से वह इस्लाम का अनुसरण भी कर रही है। अब खबर में खुद ये बताया गया है कि लड़की 18-19 साल की है।

इसलिए अगर स्टोरी के मुताबिक छह साल के प्यार के दावे सही हैं, तो एक 13 साल की लड़की, संभवतः 12, और एक 23 वर्षीय व्यक्ति के बीच का रिश्ता सभ्य समाज के दायरे में वैसे भी नहीं आता है। मगर शाहिद का तो तर्क है कि मनमीत 22 साल की है और उसके माता पिता उसे 19 साल का बता रहे हैं।

द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार, ये रिश्ता तब शुरू हुआ जब मनमीत 13 साल की थी या शायद 12 की ही, और शाहिद तब 23 का था।

अपने पक्ष में शाहिद लड़की का बोन डेन्सिटी टेस्ट कराने को कहता है लेकिन इस बात को कहते हुए शायद वह भूल जाता है कि मनमीत ने खुद ही अपनी उम्र 19 की बताई है।

धर्मांतरण एंगल को खारिज करने वाले सिख से द प्रिंट की बात

द प्रिंट ने इस मामले में ‘ऑल पार्टी सिख कॉर्डिनेशन कमेटी’ के अध्यक्ष जगमोहन सिंह रैना से बात की, जिन्होंने पूरे मामले को ‘राजनीतिक लाभ’ के लिए किया गया ड्रामा करार दिया। रिपोर्ट में रैना को कोट करते हुए लिखा गया, 

“जब मनमीत का मामला मेरे सामने आया, तो मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया क्योंकि मुझे बताया गया था कि यह सहमति से था और महिला ने मुस्लिम व्यक्ति से धर्म परिवर्तन करके शादी की, लेकिन, फिर, किसी ने सिरसा को सूचित किया और उसने एक वीडियो पोस्ट कर दी। बाद में सोशल मीडिया ने इसे लव जिहाद का मुद्दा बना दिया।”

रैना ने कहा, “मैं हैरान था कि कितने सारे लोग इकट्ठा हुए और प्रदर्शन हुआ। उन्होंने कहा कि सिख महिला का बंदूक की नोक पर धर्मांतरण करवाया गया, जो बिलकुल गलत बात है। इसके बाद उन नेताओं ने महिला के परिवार से बात की और फोटो खिंचवाई, फिर कुछ मंत्रियों से मिले और महिला की किसी और के साथ शादी भी कर वा दी।” रैना के मुताबिक ये सब सिर्फ समुदायों के बीच दुर्भावना पैदा करने के लिए किया गया।

रिश्ते में क्या है समस्या

अब यहाँ ये बताने की जरूरत नहीं कि आखिर 13 साल की एक लड़की और 23 वर्ष के युवक के बीच के संबंध में समस्या क्या है। 13 साल की बच्ची नाबालिग की श्रेणी में आती हैं। इस उम्र में कोई इतना समझदार नहीं होता कि उचित निर्णय ले सके। इसलिए 18 वर्ष से पहले देश में मतदान करना, शराब पीना, या गाड़ी चलाना भी वैध नहीं माना जाता। सभ्य समाज मानता है कि उनका बच्चा अभी इतना परिपक्व नहीं हुआ कि उसे एक व्यस्क जितने अधिकार दिए जाएँ। यही कराण है कि बच्चों की जिम्मेदारी और बच्चों से जुड़े फैसले उनके बड़े एक अभिभावक के तौर पर लेते हैं।

इसलिए कानून की नजर में ऐसे रिश्ते सही नहीं है। अगर ऐसा माना गया तो बच्चों के प्रति आपराधिक मंशा रखने वाले को रास्ता मिलेगा। साथ ही बच्चों की सुरक्षा से खिलवाड़ होगा। ऐसे अपराधिक मानसिकता वाले बच्चों को बरगलाएँगे, उन्हें धमकाएँगे और ब्लैकमेल कर करके रिलेशन में उलझा लेंगे। ऐसी समस्या परिपक्व लड़कियों के साथ भी हो सकती है लेकिन बाल अवस्था के दौरान इसका डर ज्यादा होता है।

इसके अलावा ये भी गौर देने वाली बात है कि ग्रूमिंग जिहाद में मुख्यत: 13, 14, और 15 साल की लड़कियों को निशाना बनाया जाता है। इसका कारण यही है कि लड़कियाँ इस उम्र में आसानी ने बहकावे में आती हैं।

ऐसी स्थिति के बावजूद द प्रिंट इस रिश्ते को जस्टिफाई कर रहा है बिलकुल उसी तरह जैसा कि द वायर ने किया था जब कानपुर में ग्रूमिंग जिहाद के लिए SIT जाँच बैठाई गई थी। उस समय द वायर का कहना था कि 14 केस में से 8 मामले सहमति के थे जबकि हकीकत में 11 में से 8 मामले ऐसे थे, जिसमें नाबालिग पीड़िताएँ शामिल थीं। इसलिए नाबालिग लड़कियों के साथ दूसरे समुदाय के युवकों के प्रेम संबंध को सामान्य बताना लिबरल मीडिया के लिए कोई नई बात नहीं है।

शाहिद के कर्मों पर द प्रिंट की लीपा-पोती

ये देखना वाकई अचंभित करता है कि द प्रिंट की रिपोर्ट में उनका पक्ष शाहिद की ओर स्पष्ट झुका हुआ है। रिपोर्ट की हेडलाइन दी गई है, “मैं अपनी बीवी को वापस लाने के लिए लड़ूँगा- मुस्लिम युवक कश्मीर में ‘सिख धर्मांतरण विवाद’ से पीछे नहीं हटेगा।”

शाहिद का कोट लेते हुए प्रिंट ने छापा, “उन्होंने कानूनी तौर पर बनी मेरी बीवी को, मेरे प्यार को मुझसे छीना, वो भी तब जब मैं जेल में था। वो लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं। जब मैंने उसकी शादी की तस्वीरें देखीं तो मेरा दिल टूट गया, बाद में मैं जेल से आया। मुझे गुस्सा भी था और मैं लाचार भी था।”

वह कहता है, “मेरा निकाह हुआ था। मनमीत ने कोर्ट के सामने भी कहा कि उसने मुझसे अपनी इच्छा से निकाह किया। और मैं तब भी यहाँ हूँ, लाचार हूँ बिना अपनी पत्नी के, और वहाँ पीड़ित है। उसे बरगलाया गया है।क्या यही न्याय है।”

शाहिद ने अपने बयान में मनमीत के माता पिता को भी उसे बरगलाने का आरोपित बताया है और कहा है कि उसकी शादी बंदूक की नोक पर करवाई गई है। वह कहता है, “मैं तस्वीरों में मनमीत की आँखों में दर्द देख सकता हूँ।”

युवक आगे कहता है, “एक समय था जब मुझे लगा कि मैं दिल्ली जाऊँगा। लेकिन जिस तरह इन लोगों ने मामले का राजनीतिकरण किया है, मुझे मालूम है अगर मैं वहाँ गया तो मार डाला जाऊँगा, लेकिन मैं हार नहीं मानूँगा। मैं उसके बिना अपना जीवन की कल्पना नहीं कर सकता। भले ही मुझे सालों लगे कानूनी लड़ाई लड़ने में। वह मेरी पत्नी है, मेरा प्यार है, मैं उसे वापस लाकर रहूँगा।”

अब ये बात बेहद अजीब है कि शाहिद का नैरेटिव चलाने के लिए द प्रिंट ने उसे प्लेटफॉर्म दिया है। वो भी बिना किसी काउंटर वर्जन के, जबकि वे इस बात को खुद भी जानते होंगे कि अगर मनमीत का पक्ष सटीक है और रिश्ता 13 साल की उम्र में शुरू हुआ, तो शाहिद का कहा अपने कमजोर पड़ता है।

नोट: इस स्टोरी का मूल वर्जन आप इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

ई-रिक्शा की बैटरी से आतंकी मसीरुद्दीन ने तैयार कर लिया था DIY बम, बस टारगेट चुनना था बाकी: पूछताछ में खुलासा

एटीएस (ATS) कमांडो ने लखनऊ के काकोरी से पकड़े अलकायदा के दो संदिग्ध आतंकियों को गिरफ्तार करने के बाद देश में आतंक फैलाने की साज़िश को नाकाम कर दिया। जाँच एजेंसियाँ अलकायदा के इन दोनों संदिग्ध आतंकियों से पूछताछ कर रही हैं। पूछताछ में सामने आया है कि ये दोनों सिर्फ 3 हजार रुपए में प्रेशर कुकर बम तैयार कर रहे थे।

जिस मसीरुद्दीन उर्फ मुशीर को पकड़ा गया है, वह रिक्शे की बैटरी से बम बनाने में जुटा था। दोनों DIY मॉड्यूल यानी ‘Do it yourself’ मॉड्यूल पर काम कर रहे थे। इन्होंने अपने पैसों से खरीदकर बम बनाया था, इनकी कोशिश थी कि ई-रिक्शा में इस्तेमाल होने वाली बैटरी से बम बनाया जाए।

दोनों ने स्वीकार किया कि उन्होंने अल-कायदा के लिए काम किया था और वे आतंकी संगठन के इशारे पर बम बना रहे थे। कथित तौर पर, अल-कायदा के आतंकवादी इंटरनेट के जरिए उन तक पहुँचे थे। ये बम बनाने में सफल भी हो गए थे, अब बस टारगेट चुनने की प्रक्रिया चल रही थी।

मानव बम मॉड्यूल पर कर रहे थे काम

पकड़े गए दोनों आतंकियों के नाम मिनहाज अहमद और मसीरूद्दीन है, अलकयदा का ये मानव बम मॉड्यूल था, दोनों आतंकी अंसार गजवातुल हिंद ग्रुप से जुड़े थे। दोनों लंबे समय से लखनऊ में रह रहे थे, अहमद के पिता लखनऊ के दुबग्गा इलाके में मोटर वर्कशॉप का काम करते हैं और उसकी बीवी इंटीग्रल यूनिवर्सिटी में कार्यरत है। उसके घर से इस यूनिवर्सिटी का एक वाहन पास भी जब्त किया गया है। दोनों आतंकियों के पकड़े जाने के बाद यूपी- बिहार पुलिस ने सभी जिलों और रेलवे स्टेशनों पर अलर्ट जारी कर दिया।

एसीएस (होम) अवनीश अवस्थी ने आज तक से बात करते हुए बताया, “जाँच में अल कायदा के साथ संबंधों की पुष्टि हुई है। यह हमारे लिए एक बड़ी चुनौती है क्योंकि यह काफी बड़ा गठजोड़ है और हाँ, यूपी निशाने पर था। ये मॉड्यूल स्वतंत्र रूप से काम करते हैं क्योंकि उनके सिस्टम अलग हैं। इन सब से निपटने के लिए खुफिया एजेंसियों और एटीएस को काफी ताकत और हथियार दिए जाएँगे। मॉड्यूल घातक हो सकता था। हम पब्लिक डोमेन में ज्यादा शेयर नहीं कर सकते हैं। गिरफ्तार किए गए दोनों बड़ी योजना बना रहे थे और राज्य में काफी नुकसान कर सकते थे। वे हमेशा संवेदनशील क्षेत्रों को निशाना बनाते हैं जहाँ वे भारी नुकसान पहुँचा सकते हैं।”

उमर हलमंडी के हैंडलर के संपर्क में थे दोनों

उत्तर प्रदेश पुलिस के अनुसार, ये आतंकी अलकायदा के उत्तर प्रदेश मॉड्यूल के प्रमुख उमर हलमंडी के हैंडलर के संपर्क में थे। अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (कानून व्यवस्था) प्रशांत कुमार ने कहा, “वे लखनऊ सहित राज्य के विभिन्न शहरों में 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) से पहले आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने की योजना बना रहे थे।” कुमार ने कहा कि ये लोग मानव बमों के इस्तेमाल सहित विस्फोट की योजना बना रहे थे।

टेलीग्राम के जरिए आतंकियों ने संपर्क किया था

रिपब्लिक टीवी के अनुसार, इस मामले की आगे की जाँच से पता चला है कि आतंकवादी टेलीग्राम ऐप के जरिए अपने अंतरराष्ट्रीय आकाओं के संपर्क में थे। एटीएस अब पकड़े गए आतंकवादियों के टेलीग्राम और व्हाट्सएप चैट पर नजर रख रही है। आतंकवाद निरोधी दस्ते ने लैपटॉप, दस्तावेज और जले हुए कागज भी जब्त किए थे। विदेशी हैंडल के अलावा, दोनों उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में अन्य लोगों के संपर्क में थे।

टीवी के लाइव प्रसारण से ATS नाखुश

जब एडीजी प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान मीडिया से बातचीत कर रहे थे, तो वे इस बात से खुश नहीं थे कि ऑपरेशन का सीधा प्रसारण कई न्यूज चैनलों पर चलाया गया। उन्होंने कहा कि पुलिस अभियान समाप्त होते ही जरूरत के आधार पर जानकारी साझा करेगी। उन्होंने कहा, “ऐसे दिशा-निर्देश हैं जो सभी को राष्ट्रीय सुरक्षा के संचालन के लाइव फीड के प्रसारण से प्रतिबंधित करते हैं।” पुलिस अधिक जानकारी साझा करेगी यदि उन्हें लगता है कि इसे साझा किया जा सकता है।

रविवार (जुलाई 11, 2021) को करीब 11 घंटे से चले सर्च ऑपरेशन में भारी मात्रा में गोला-बारूद बरामद किया गया। इस तरह यूपी से अलकायदा से जुड़े आतंकवादियों की गिरफ्तारी देश में एक साल के भीतर तीसरे बड़े आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़ है। 

इससे पहले राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने पश्चिम बंगाल और केरल में अलकायदा के मॉड्यूल का खुलासा किया था। केरल के एर्नाकुलम और पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद से इन आतंकियों की गिरफ़्तारी हुई थी। ये लोग कोच्चि नौसेना बेस और शिपयार्ड्स को निशाना बनाने वाले थे। बिहार पुलिस भी लखनऊ में अलकायदा आतंकियों की गिरफ़्तारी के बाद अलर्ट पर है। देश के कई हिस्सों में अलकायदा के स्लीपर सेल मौजूद हैं, इनकी फंडिंग पर रोक लगा कर उनके नेटवर्क को ध्वस्त करना मुख्य चुनौती है।

एक भाजपा सांसद के अलावा कई अन्य भाजपा नेता इन आतंकियों के निशाने पर थे। आसपास के घरों में इन आतंकियों के साथियों के ठिकाने हो सकते हैं, इसीलिए उनकी भी तलाशी हो रही है। सीरियल ब्लास्ट की साजिश पाकिस्तान में रची गई थी और अफगानिस्तान में इस पर ‘रिसर्च’ हुआ था। आसपास के 500 मीटर के दायरे में सारे घरों को खाली करवा लिया गया। जल्द ही कई और खुलासे होने की संभावना है।

सिस्टर अभया की हत्या कर कुएँ में फेंकने वाले पादरी-नन को पेरोल, हाई कोर्ट ने केरल सरकार से माँगा जवाब

सिस्टर अभया हत्याकांड के दोषियों को पेरोल पर रिहा करने को लेकर केरल हाई कोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब माँगा है। जस्टिस ज़ियाद रहमान एए और के विनोद चंद्रन की डिवीजन बेंच ने इससे जुड़ी याचिका पर सोमवार (जुलाई 12, 2021) को सुनवाई की। याचिका में दोषियों को दी गई पैरोल तत्काल वापस करने की अपील की गई है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की तरफ से बताया गया कि दोषियों की आयु वर्ग के सभी व्यक्तियों को पेरोल पर रिहा किया गया था। कोट्टयम के सेंट पायस कॉन्वेंट में रहने वालीं सिस्टर अभया की लाश कुएँ से मिली थी। उसकी मौत के 28 साल बाद तिरुवनंतपुरम की सीबीआई अदालत ने 23 दिसंबर 2020 को पादरी फादर थॉमस और नन सिस्टर सेफी को हत्या का दोषी पाते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। मई में इन्हें पेरोल पर रिहा कर दिया गया था। इसे अवैध बताते हुए कोर्ट में रिट याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ता का पक्ष एडवोकेट पिराप्पनकोडे सुधीर ने रखा।

21 वर्षीय सिस्टर अभया का शव 27 मार्च 1992 को सेंट पायस कॉन्वेंट (Pious X Convent) के कुएँ में मिली थी। वैसे यह पहला मामला नहीं है जब केरल की वामपंथी सरकार पर चर्च के अपराधों और गुनहगारों के प्रति नरमी दिखाने के आरोप लगे हैं। पिछले दिनों फ्रांसिस्कन क्राइस्ट कॉन्ग्रेगेशन (FCC) द्वारा सिस्टर लूसी कलापुरा को बर्खास्त करने के कुछ दिनों के बाद ही वेटिकन ने उन्हें बहुत ही तुच्छ आरोप लगाकर चर्च से निष्कासित कर दिया। सिस्टर लूसी उस पाँच ननों में से एक थीं, जो बिशप फ्रेंको मुलक्कल पर रेप का आरोप लगाने वाली नन के साथ खड़ी थीं।

इससे कुछ दिनों पहले आरोपित बिशप को नोटिस जारी करने के बाद केरल पुलिस के एक अधिकारी का तत्काल तबादला कर दिया गया था। 19 अक्टूबर को पीड़िता ने मलयालम यूट्यूब चैनल क्रिश्चियन टाइम्स के ख़िलाफ़ कुराविलंगद पुलिस स्टेशन में शिक़ायत दर्ज कराई थी। उसने आरोप लगाया था कि बिशप फ्रैंको के इशारे पर चैनल उन्हें परेशान कर रहा है। कुराविलंगद पुलिस ने इस मामले का जाँच वैकोम पुलिस को सौंप दी थी।

वैकोम पुलिस स्टेशन के सब इंस्पेक्टर मोहनदास ने फ्रैंको को एक नोटिस जारी कर पूछा कि पीड़िता की शिक़ायत पर क्यों नहीं उनकी ज़मानत रद्द कर दी जाए। द न्यूज़ मिनट ने बताया था कि नोटिस जारी करने के बाद पुलिस अधिकारी का तबादला कोट्टायम अपराध शाखा में कर दिया गया।

12 साल की उम्र में RSS से जुड़े, अब बीजेपी के साथ ‘सेतु’ का करेंगे काम: जानिए कौन हैं अरुण कुमार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने रविवार (जुलाई 11, 2021) को संगठन में बड़ा बदलाव करते हुए अपने संयुक्त महासचिव अरुण कुमार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा/BJP) के साथ कॉर्डिनेशन का काम सौंपा है। इससे पहले RSS की ओर से भाजपा के साथ कॉर्डिनेशन का जिम्मा कृष्ण गोपाल के पास था। साल 2015 से वह इस काम को संभाल रहे थे।

मध्यप्रदेश के चित्रकूट में चल रही संघ की बैठक में यह घोषणा हुई। इसी साल की शुरुआत में, आरएसएस ने दत्तात्रेय होसबाले को महासचिव और अरुण कुमार के साथ रामदत्त चक्रधर को संयुक्त महासचिव के रूप में पदोन्नत करके अपने संगठनात्मक ढाँचे में एक पीढ़ीगत बदलाव किया था। लेकिन हालिया उलटफेर के बाद अरुण कुमार को नई जिम्मेदारी मिली।

इस बदलाव के बाद कृष्ण गोपाल संघ की दो प्रमुख शाखाओं के प्रभारी बने रहेंगे। पहला लघु उद्योग भारती जो एमएसएमई क्षेत्र से संबंधित है और दूसरा विद्या भारती, जिसे शिक्षा का जिम्मा सौंपा गया है। आरएसएस ने पश्चिम बंगाल के क्षेत्र प्रचारक प्रदीप जोशी को अखिल भारतीय सह संपर्क प्रमुख के रूप में भी प्रतिनियुक्त किया है।

बता दें कि संगठन ने जिन अरुण कुमार के कंधों पर इतनी बड़ी जिम्मेदारी दी है, उनका जन्म पूर्वी दिल्ली के झिलमिल इलाके में अप्रैल 1964 में हुआ था। इसके बाद मात्र 12 साल की उम्र में उन्होंने संघ ज्वाइन की। वह दौर आपातकाल का था लेकिन शाखा में जाने की उनकी शुरुआत उसी समय से हुई थी। इसके बाद वह 1982 में प्रचारक बने।

उनकी निष्ठा के कारण आगे चलकर उन्होंने जिला प्रचारक, विभाग प्रचारक और सह-प्रांतीय प्रचारक की जिम्मेदारी संभाली। उनका केंद्र दिल्ली, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर था। इसके बाद वे अखिल भारतीय के सह संपर्क प्रमुख बनकर सामने आए। उन्होंने जम्मू कश्मीर में भी खूब काम किया था। कहते हैं कि अनुच्छेद 370 हटाने में उन्होंने भी मुख्य भूमिका निभाई। इन्हीं उपलब्धियों को देखते हुए अब उन्हें अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है।

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के क्षेत्र और प्रांत प्रचारकों की चार दिवसीय बैठक शुक्रवार से चित्रकूट में जारी है। संघ प्रमुख मोहन भागवत सहित तमाम संघ के बड़े पदाधिकारी इसमें शिरकत कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार इस विचार मंथन से तमाम सामाजिक और देश के अन्य मुद्दों पर मंथन किया जाएगा। मालूम हो कि आरएसएस की ओर से दी गई जानकारी के अनुसार प्रति वर्ष यह बैठक सामान्यत: जुलाई में होती है। लेकिन पिछले वर्ष कोविड स्थिति के कारण ऐसा नहीं हुआ था।

अलकायदा आतंकियों की गिरफ्तारी पर अखिलेश यादव के बाद मायावती के सवाल, बोलीं- अब तक बेखबर क्यों रही UP पुलिस

उत्तर प्रदेश के लखनऊ में एटीएस ने बड़े ऑपरेशन को अंजाम देते हुए रविवार (11 जुलाई) को अलकायदा से जुड़े दो आतंकियों मशीरुद्दीन उर्फ मुशीर और मिनहाज अहमद को पकड़ा था। इन गिरफ्तारियों को लेकर समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव के बाद बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती ने यूपी पुलिस और बीजेपी पर सवाल उठाए हैं। मायावती ने सिलसिलेवार ट्वीट कर कहा कि संदिग्ध आतंकियों की गिरफ्तारी की आड़ में राजनीति नहीं होनी चाहिए।

बसपा सुप्रीमो ने लिखा, ”यूपी पुलिस का लखनऊ में आतंकी साजिश का भंडाफोड़ करने और इस मामले में गिरफ्तार दो लोगों के तार अलकायदा से जुड़े होने का दावा अगर सही है तो यह गंभीर मामला है। इस पर उचित कार्रवाई होनी चाहिए। इसकी आड़ में कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए, जिसकी आशंका व्यक्त की जा रही है।”

मायावती ने आगे लिखा, ”यूपी विधानसभा आमचुनाव के करीब आने पर ही इस प्रकार की कार्रवाई लोगों के मन में संदेह पैदा करती है। अगर इस कार्रवाई के पीछे सच्चाई है तो पुलिस इतने दिनों तक बेखबर क्यों रही? यह वह सवाल है जो लोग पूछ रहे हैं। अतः सरकार ऐसी कोई कार्रवाई न करे, जिससे जनता में बेचैनी और बढ़े।”

वहीं, इससे पहले उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अलकायदा आतंकियों की गिरफ्तारी को लेकर कहा था कि वो न तो यूपी पुलिस और न ही भाजपा की सरकार पर भरोसा कर सकते हैं।

गौरतलब है कि रविवार 11 जुलाई को ADG (कानून-व्यवस्था) प्रशांत कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि इन आतंकियों के पास से उन्हें बड़ी संख्या में विस्फोटक सामग्रियाँ बरामद हुई हैं। इस गिरोह के लोग लखनऊ और कानपुर में भी मौजूद हैं। ये सभी 15 अगस्त के आसपास उत्तर प्रदेश के कई शहरों को दहलाने की योजना बना रहे थे। पाकिस्तान में बैठे अलकायदा के सरगना उमर हलमंडी के इशारे पर ये सब हो रहा था। दोनों आतंकियों के साथियों की गिरफ्तारी के लिए ATS की जगह-जगह छापेमारी जारी है।

केरल-बंगाल के बाद UP में आतंकी मॉड्यूल: पाँव जमाने को बेचैन ISIS और अलकायदा, रेलवे-धार्मिक स्थल निशाना

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से दो अलकायदा आतंकियों की गिरफ़्तारी भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक नई चुनौती की तरह है, क्योंकि यूपीए काल में हैदराबाद और मुंबई से लेकर दिल्ली और पुणे तक में बम विस्फोट करने वाले आतंकी अब फिर से सक्रिय हो गए हैं और अपने नेटवर्क को मजबूत करने में लगे हुए हैं। चिंता वाली बात ये है कि अबकी सिर्फ पाकिस्तानी संगठन ही नहीं, बल्कि ISIS और अलकायदा भी मैदान में है।

इससे पहले केरल में इसी तरह के आतंकी मॉड्यूल का खुलासा हुआ था। सितंबर 2020 में आतंकवाद पर आई संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक रिपोर्ट में चेताया गया था कि भारतीय राज्य केरल और कर्नाटक में अच्छी-खासी संख्या में खूँखार वैश्विक आतंकी संगठन ISIS के आतंकवादी मौजूद हैं। साथ ही खुलासा किया गया था कि ISIL की भारतीय यूनिट ‘हिन्दू विलायाह’ के भी कम से कम 180 से लेकर 200 तक आतंकी सक्रिय हैं। बता दें कि इस आतंकी संगठन के गठन की घोषणा मई 2019 में हुई थी।

अगस्त-सितंबर 2020 में ही राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने केरल के एर्नाकुलम जिले और पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद से 10 आतंकियों को गिरफ्तार किया था। यह सारे आतंकवादी पाकिस्तान से लगातार संपर्क में थे। इसके अलावा गिरफ्तार किए गए आतंकवादी नई दिल्ली समेत देश के कई सरकारी संस्थानों को निशाना बनाने की तैयारी कर रहे थे। आतंकवादियों पास भारी मात्रा में हथियार बरामद किए गए थे। इसमें विस्फोटक बनाने की सामग्री, स्वदेशी आग्नेयास्त्र, शरीर कवच, जिहादी साहित्य और हथियार शामिल थे।

अगर इस घटना को लखनऊ से आतंकियों की गिरफ़्तारी से जोड़ कर देखें तो इस मामले में भी आतंकियों को विस्फोटक सामग्रियों के साथ गिरफ्तार किया गया है। ये सभी व्हाट्सएप्प और टेलीग्राम के जरिए अपने आकाओं से जुड़े हुए थे। उत्तर प्रदेश के कानपुर में भी इनका नेटवर्क मजबूत है, जहाँ से इनके कुछ साथियों की गिरफ़्तारी हो सकती है। ये भी जानने वाली बात है कि आतंकियों को अब भारतीय रेलवे सबसे सुरक्षित निशाना लग रहा है।

हाल ही में दरभंगा में हुए पार्सल ब्लास्ट को ही देख लीजिए। अगर आतंकियों के मंसूबे सफल हो गए होते तो बहुत बड़ी तबाही मचने की आशंका थी। दरभंगा वाले मामले में पाकिस्तान में बैठे शामली स्थित कैराना के इकबाल काना का नाम सामने आया था। जाली नोटों का किंगपिन बन चुके इक़बाल काना से मुस्लिम बहुल कैराना में आज भी कई लोग संपर्क में हैं। कैराना के लोग अक्सर पाकिस्तान जाते-आते रहते हैं।

ब्लास्ट भले ही दरभंगा में हुआ, लेकिन आतंकियों की गिरफ़्तारी तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद और उत्तर प्रदेश के शामली में स्थित कैराना से हुई है। अब तक इसमें सलीम, कफील नासिर, इमरान और इक़बाल काना जैसे आतंकियों के नाम सामने आए। ये सभी आतंकी शामली के ही निवासी हैं। धमाके के लिए रखे नाइट्रिक और सल्फ्यूरिक एसिड में आतंकियों के सोचे समय पर रिएक्शन नहीं हुआ, जिससे एक बड़ी तबाही टल गई।

आतंकियों की साजिश थी कि 15-16 जून की मध्य रात्रि में विस्फोट किया जाए। इसके लिए जगह के रूप में सिकंदराबाद स्टेशन से 132 KM दूर काजीपेट जंक्शन को चुना गया था। ऐसा होता तो जानमाल की बड़ी क्षति हो सकती थी। इसके लिए जगह के रूप में सिकंदराबाद स्टेशन से 132 KM दूर काजीपेट जंक्शन को चुना गया था। ट्रेन में अगर उसके चलने के 1:54 घंटे बाद विस्फोट होता तो नजारा भयावह हो सकता था।

ऐसे गिरोह का पूर्णरूपेण सफाया इस्लामी कट्टरवाद पर प्रहार कर के ही हो सकता है। कैराना, मुर्शिदाबाद और एर्नाकुलम जैसे कई जगह देश में हो सकते हैं, जहाँ की मुस्लिम जनसंख्या के ब्रेनवॉश की कोशिश में पाकिस्तानी आतंकी सरगना लगे होंगे। दरभंगा में फल-फूल रहा आतंकी स्लीपर सेल इसका उदाहरण है। दरभंगा ब्लास्ट के तार हैदराबाद तक जुड़े। उधर पंजाब में ‘किसान आंदोलन’ के बहाने खालिस्तानी सक्रिय हो गए हैं।

पिछले ही महीने पंजाब में एक तस्कर को गिरफ्तार किया गया था, जो पाकिस्तान, अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन स्थित आतंकी संगठनों और खालिस्तान समर्थक तत्वों से जुड़ा था। जब लखनऊ में आतंकी गिरोह का पर्दाफाश हो रहा है, ठीक उसी समय जम्मू कश्मीर के अनंतनाग में तैनात रहे 19 राष्ट्रीय राइफल्स से जुड़े एक जवान और करगिल में क्‍लर्क के रूप में कार्यरत 18 सिख लाइट इन्फेंट्री के एक क्लर्क को जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया गया।

मतलब साफ़ है, आतंकी अब भारतीय रेलवे को निशान बनाना चाहते हैं क्योंकि अधिकतर गरीब-मजदूर आजकल रेल से ही सफर करने में लगे हुए हैं और आतंकियों को लगता है कि उनकी एक साजिश भी सफल हो गई तो शायद बड़ी तबाही मचेगी। साथ ही राम मंदिर, काशी और मथुरा का नक्शा जब्त होना बताता है कि आतंकियों के निशाने पर भारत के हिन्दू धार्मिक स्थल भी लगातार बने हुए हैं।

सरकारों को ज़रूरत है कि वो ऐसे संवेदनशील इलाकों में नजर रखे, पुलिस की गश्ती बढ़ाए और जागरूकता अभियान चलाए, जहाँ इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा युवाओं को बरगलाने का खेल खेला जा रहा हो। रेलवे, हाइवे और धार्मिक स्थलों पर विशेष ध्यान रखने के अलावा स्लीपर सेल्स और आतंकियों के मददगार सफेदपोशों की पहचान करना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। क्योंकि आतंकियों की नजर अब सिर्फ कश्मीर नहीं, फिर से पूरे देश पर है।