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दिल्ली HC ने वामपंथी मीडिया पोर्टलों द वायर, क्विंट, ऑल्टन्यूज को अंतरिम राहत देने से किया इनकार, नए IT नियमों को दी थी चुनौती

दिल्ली हाई कोर्ट ने आज (जुलाई 7, 2021) वामपंथी न्यूज पोर्टल द वायर, द क्विंट और फैक्ट चैकिंग वेबसाइट ऑल्टन्यूज को अंतरिम राहत देने से मना कर दिया। इन वेबसाइटों ने नए आईटी नियमों के पालन के लिए जारी हुए नोटिस और अपने ऊपर एक्शन के डर से याचिका दायर की थी।

कोर्ट में वेबसाइटों की ओर से नए आईटी नियमों को चुनौती देते हुए कहा गया था कि उन्हें नियमों के पालन के लिए नया नोटिस जारी किया गया है या फिर उन्हें जबरन कार्रवाई के लिए तैयार रहने को कहा गया है।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में चीफ जस्टिस डीएन पटेल और जस्टिस ज्योति सिंह की पीठ ने सुनवाई की। उन्होंने इन पोर्टल्स को अंतरिम राहत देने से इंकार करते हुए केंद्र सरकार से जवाब माँगा। साथ ही मामले को 20 अगस्त तक के लिए टाल दिया।

बता दें कि नए नियमों से अंतरिम राहत के लिए हालिया आवेदन Pravda फाउंडेशन द्वारा दायर किया गया था, जो कि AltNews की मूल कंपनी है। इस मामले की जब सुनवाई हुई तो अवकाशकालीन पीठ ने अंतरिम राहत के लिए फाउंडेशन के आवेदन को नियमित पीठ के समक्ष 7 जुलाई को सूचीबद्ध करने का फैसला किया। जिसके बाद आज इस पर सुनवाई हुई।

याचिका में आईटी नियमों को अनुच्छेद 19(1), 19(1)(g), 14 और 21 का उल्लंघन बताकर चुनौती दी गई थी। न्यूज साइटों का कहना था कि नए आईटी नियम सरकार को उनपर निगरानी रखने की मंजूरी देते हैं जो कि मूल सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 के दायरे से बाहर में आता है।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले केंद्र सरकार की ओर से भी देश के अलग-अलग हाई कोर्ट्स में नए आईटी नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर करने की माँग की गई है। ये याचिकाएँ दिल्ली और मद्रास हाई कोर्ट समेत देश के कई न्यायालयों में पेडिंग हैं।

हिंदू युवती ने घरवालों से लड़कर की आरिफ से शादी, 3 माह बाद अधजली अवस्था में हाईवे पर मिली

उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में हाईवे से हिंदू युवती को जलाकर फेंकने की घटना प्रकाश में आई है। युवती ने 3 महीने पहले ही एक मुस्लिम समुदाय के लड़के से भागकर शादी की थी। पीड़िता की स्थिति को नाजुक देखते हुए उसे मेडिकल कॉलेज झाँसी में भर्ती कराया गया। पुलिस अब युवती के फरार पति आरिफ की तलाश में जुटी है।

घटना मंगलवार (6 जुलाई, 2021) दोपहर को सामने आई। जब 23 साल की युवती बुरी तरह जलने के बाद कानपुर-झाँसी हाईवे के ग्राम अजनारा के पास राधे ढाबा के सामने बेसहारा अवस्था में पड़ी सिसक रही थी। ढाबे के मालिक भानु राजपूत ने युवती की हालत देखकर फौरन इसकी जानकारी पुलिस को दी, जिसके बाद युवती को अस्पताल लाया गया, जहाँ पता चला पीड़िता 30 फीसद झुलस चुकी है।

ढाबे के आसपास के दुकानदारों का कहना है कि युवती करीब डेढ़ से 2 घंटे तक सड़क किनारे पड़ी तड़प रही थी। पुलिस के आने के बाद ही लोग भी उसे उठाने आगे आए। घटना की बाबत एएसपी ने बताया कि किस वजह से युवती को जलाया गया है, इसकी पूरी जानकारी आगे की पड़ताल के बाद ही सामने आ सकेगी।

वहीं, पुलिस को दिए बयान में लड़की ने खुद को झाँसी के पूंछ थानाक्षेत्र के ग्राम सेसा का बताया है। शिकायत में उसने अपने पति आरिफ का नाम लेते हुए कहा कि उसने आरिफ से प्रेम विवाह किया था। शादी के 1 माह बाद से ही आरोपित युवक उसको तमाम यातनाएँ देता था और विवाह के 3 माह बाद तो उसने उसे जला ही दिया।

पीड़िता का बयान दर्ज करने के बाद पुलिस ने उसके परिजनों को मामले में सूचित कर दिया है। सीओ सिटी का कहना है कि वह मामले में गहनता से पड़ताल कर रहे है। युवती ने अपने बयान में जिस आरिफ का नाम लिया है, उसकी तलाश की जा रही है।

पीड़िता के मुताबिक उसने घरवालों के खिलाफ जाकर उरई के बजरिया निवासी आरिफ खान के साथ कोर्ट मैरिज की थी। उस दौरान उसके पिता ने अपहरण और एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा कराया था लेकिन लड़की ने बयान दिया था कि उसने अपनी मर्जी से शादी की है जिसके बाद मुकदमा समाप्त हो गया।

पुलिस के अनुसार, युवक राजस्थान में कुछ काम करता है, पीड़िता भी उसके साथ वहीं रहती थी। हाल में आरिफ ने उसे जलाया और हाईवे पर फेंक दिया। गंभीर हालत के कारण वह पुलिस के सामने ज्यादा कुछ नहीं बोल पाई। लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार लोग इस मामले को धर्मांतरण से भी जोड़ कर देख रहे हैं। माना जा रहा है कि आरिफ ने महिला पर धर्म परिवर्तन का दबाव डाला और मना करने पर उसे जला दिया।

हसन, हैदर, इमदादिल सहित 8 अवैध बांग्लादेशी फर्जी पहचान के साथ गिरफ्तार: जल निकासी पाइप के जरिए किया भारत में प्रवेश

आंध्र प्रदेश के राजामहेंद्रवरम और विजयवाड़ा रेलवे स्टेशनों पर शुक्रवार (2 जुलाई 2021) को रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) और पुलिस ने आठ अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को पकड़ा। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस को खुफिया अधिकारियों से सूचना मिली थी कि कुछ बांग्लादेशी नागरिकों ने भारत में अवैध रूप से प्रवेश किया है और ये सभी हावड़ा-चेन्नई मेल और हावड़ा-वास्कोडीगामा अमरावती एक्सप्रेस ट्रेनों में यात्रा कर रहे थे।

पुलिस ने बताया कि चार-चार लोगों के समू​ह में यात्रा कर रहे इन आठ लोगों ने भारत-बांग्लादेश सीमा पर जल निकासी पाइप के जरिए देश में प्रवेश किया था। गिरफ्तार अप्रवासियों के दावे के अनुसार, अब यह पता लगाने के लिए जाँच चल रही है कि क्या अंतरराष्ट्रीय सीमा पर कोई जल निकासी पाइप हैं, या उन्होंने कुछ भूमिगत मार्गों से भारत में प्रवेश किया है।

आरोपित मोहम्मद हासन (33), उसके भाई हैदर अली खान (37), इमदादिल खान (21) और एक अन्य रिश्तेदार स्यूदुल्लाह शेख (25) को हावड़ा-गोवा वास्कोडीगामा एक्सप्रेस में बिना पासपोर्ट के यात्रा करते हुए गिरफ्तार किया गया। एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने बताया कि उन्होंने अवैध रूप से देश में घुसने की बात कबूल की है। वहीं, आरपीएफ के सब-इंस्पेक्टर एल विश्वनाथ द्वारा गिरफ्तार किए गए शेख सद्दाम (25), मोहम्मद अली अमीन (19), मोहम्मद सकायत हुसैन (37) और खय्यूम खान (25) के चार लोगों का समूह काम करने के लिए चेन्नई जा रहे थे।

खुफिया एजेंसी से मिली जानकारी

बताया जा रहा है कि कोरोना महामारी की पहली लहर के दौरान प्रतिबंधों में ढील दिए जाने के बाद बांग्लादेश के नागरिकों ने कथित तौर पर अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर ली थी। देश में प्रवेश करने के बाद वे कथित तौर पर पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक और अन्य राज्यों के विभिन्न हिस्सों में बस गए और तब से निर्माण स्थलों पर दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम कर रहे हैं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इन बांग्लादेशियों द्वारा इस्तेमाल किए गए मोबाइल फोन एंड्रॉयड डिवाइस वाले नहीं थे। जब्त किए गए मोबाइल फोन को अवैध प्रवासियों के संपर्कों का पता लगाने के लिए फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) भेज दिया गया है।

इसके अतिरिक्त, विजयवाड़ा और राजामहेंद्रवरम पुलिस ने सूचित किया है कि उन्होंने विदेश मंत्रालय, बांग्लादेश दूतावास और ढाका में भारतीय दूतावास को इन गिरफ्तारियों से अवगत करा दिया है। अवैध अप्रवासियों की पुलिस हिरासत की माँग को लेकर अदालत में याचिका दायर करने की व्यवस्था भी की जा रही है।

फर्जी पहचान पत्र

पुलिस ने बताया कि गिरफ्तार किए गए लगभग सभी अवैध अप्रवासियों के पास पासपोर्ट नहीं है, लेकिन उनके पास से आधार कार्ड, पैन कार्ड और नकली पते वाले मतदाता पहचान पत्र जैसे फर्जी पहचान पत्र मिले हैं। ध्यान दें कि इससे पहले भी हमने आपको उत्तर प्रदेश में सामने आए ऐसे ही मामलों की सूचना दी थी।

गौरतलब है कि जून 2021 में उत्तर प्रदेश एटीएस ने अवैध रूप से भारत में बांग्लादेशियों की घुसपैठ कराने के मामले में 4 रोहिंग्या अवैध प्रवासियों हाफिज शमीउल्लाह, अज़ीज़ुल रहमान, मोहम्मद इस्माइल और मुफ़िज़ुर रहमान को गिरफ्तार किया था। पुलिस ने कहा था कि आरोपित ने फर्जी दस्तावेजों जैसे वोटर आईडी, आधार कार्ड, पासपोर्ट आदि की मदद से बांग्लादेश में बसे रोहिंग्याओं को भारत आने में मदद की थी।

एक अन्य मामले में उत्तर प्रदेश एटीएस ने गाजियाबाद में रहने वाले नूर आलम और आमिर हुसैन नाम के दो रोहिंग्याओं को जाली कागजात के साथ गिरफ्तार किया था। एडीजी कानून व्यवस्था प्रशांत कुमार ने खुलासा किया था कि नूर आलम देश में रोहिंग्या लोगों को अवैध रूप से प्रवेश कराकर उन्हें यहाँ की भारतीय नागरिकता दिलाने का मास्टरमाइंड है। दोनों आरोपित मूल रूप से म्यांमार के हैं। वहीं नूर, 6 जनवरी 2021 को गिरफ्तार हुए रोहिंग्या अजीजुल्लाह का बहनोई है। अजीजुल्लाह की गिरफ्तारी के बाद से एटीएस नूर की तलाश कर रही थी। आज तक की रिपोर्ट के अनुसार, अवैध प्रवासियों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसके लिए उन्हें आर्थिक सहायता भी मिल रही है।

‘दलितों को फुसला कर अपनी तरफ खींच रहे हिंदुत्ववादी’: कुलपति की रेस में ‘हिंदुत्व का मोहिनी मंत्र’ वाले प्रोफेसर, विरोध में छात्र

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में एक नगर है – झूसी। झूसी में ‘गोविंद वल्लभ (GB) पंत सोशल साइंस इंस्टिट्यूट’ है। इसी कॉलेज में प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं बद्री नारायण तिवारी। वो सामाजिक इतिहास (Social History) और मनुष्य के सांस्कृतिक विकास का विज्ञान (Cultural Anthropology) पढ़ाते हैं। लेकिन, उन्हें लेकर विवाद यहाँ नहीं, प्रयागराज से 435 किलोमीटर दूर मोतिहारी में हो रहा है, जहाँ उनके कुलपति बन कर आने की संभावना से लोग नाराज़ हैं।

मोतिहारी में स्थित ‘महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय’ शुरू से विवादों में रहा है। फ़िलहाल केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इसके नए कुलपति की नियुक्ति को लेकर प्रक्रिया शुरू कर दी है। रमेश पोखरिया निशंक के इस्तीफे के बाद इस प्रक्रिया में देरी होनी तय है। इसी तरह 2018 के अंत में भी कुलपति अरविंद कुमार अग्रवाल शैक्षणिक गड़बड़ियों के आरोप में अपना इस्तीफा दे दिया था।

जो 5 नाम सेलेक्शन कमिटी को भेजे गए हैं, उनमें ‘बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU)’ के एक प्रोफेसर के अलावा प्रयागराज स्थित जीबी पंत इंस्टिट्यूट के बद्री नारायण तिवारी का नाम प्रमुख है।

मोतिहारी स्थित महात्मा गाँधी सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी के छात्रों को आशंका है कि प्रोफेसर बद्री नारायण को यहाँ का वाइस चांसलर बना कर भेजा जा सकता है, इसीलिए उन्होंने पहले ही विरोध शुरू कर दिया है। विरोध उनके पढ़ाने के रवैये या प्रशासनिक क्षमता को लेकर नहीं, बल्कि विचारधारा में यू-टर्न को लेकर है। कहा जा रहा है कि कभी ‘हिंदुत्व का मोहिनी मंत्र’ नामक पुस्तक लिख चुने बद्री नारायण अब पद की लालसा के लिए RSS (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) को खुश करने की जुगत में लगे हैं।

आइए, हम संक्षेप में बताते हैं कि उनकी इस पुस्तक में क्या था। 2014 में प्रकाशित ये पुस्तक हिन्दुओं और इसके अभिन्न अंग दलितों को बाँटती हुई नजर आती है। भाजपा की तरफ लोगों के उन्मुख होने को इस पुस्तक में खतरे की घंटी बताया गया था और इससे आगाह करने का दावा किया गया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि भाजपा कार्यकर्ता विभिन्न समुदायों/जातियों के बीच दीवार खड़ी करने का कार्य कर रहे हैं।

उनका कहना था कि दलित समाज को लोककथाओं में मुस्लिमों के प्रति शत्रुता की भावना दिखाई देती है, लेकिन फिर भी वो मुस्लिमों के साथ मिलजुल कर रहते हैं। उन्होंने आरोप लगाया था कि सांप्रदायिक ताकतें दलितों को हिन्दू पहचान से जोड़ने का काम कर रही हैं, जमीन पर समाज को तोड़ रही हैं। उन्होंने लिखा था कि हिंदुत्ववादी ताकतें घृणा की राजनीति कर के देश के सामाजिक ढाँचे को तहस-नहस कर रही हैं।

तो ऐसी हिन्दू विरोधी मानसिकता है प्रोफेसर बद्री नारायण तिवारी की! एक ऐसे पुस्तक का लेखक, जिसमें आरोप लगाया गया था कि हिन्दू झूठी कथाओं के जरिए दलितों को फुसला कर अपनी तरफ खींच रहे हैं। ‘दलित इतिहास की हिंदुत्ववादी पुनर्व्याख्या’ जैसे शब्दों का उन्होंने प्रयोग किया है। उन्होंने लिखा है कि भाजपा ने रामायण से शबरी, निषादराज, महाभारत से एकलव्य और धीरे-धीरे उनके जातीय नायकों को राम और लक्ष्मण के अवतार बता कर यह जताने का प्रयास किया कि उन्हें सवर्ण हिन्दुओं ने नहीं, तुर्क और मुगल आक्रांताओं ने सदियों प्रताड़ित किया है।

उन्होंने संघ पर राजा सुहेलदेव को सांप्रदायिक बनाने का आरोप लगाया। शबरी के गुणगान से भी उन्होंने अपनी पुस्तक में आपत्ति जताई थी और कहा था कि जॉन नेस्फील्ड के रामायण में शबरी है ही नहीं। पहली बात तो ये कि रामायण का अपने हिसाब से व्याख्या करने वाला कोई अंग्रेज कैसे भला भारतीय संस्कृति के पक्ष में बातें कर सकता है? और हाँ, किसी को रामायण पढ़नी हो तो वो वाल्मीकि को पढ़ेगा, नेस्फील्ड की क्यों?

अब आते हैं असली मुद्दे पर। प्रोफेसर संजीव कुमार शर्मा का बतौर कुलपति कार्यकाल ख़त्म होने के बाद मोतिहारी के ‘महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय (MGCUB)’ के छात्र और स्थानीय युवा क्यों नहीं चाहते हैं कि बद्री नारायण तिवारी इस पद पर आएँ। छात्रों का आरोप है कि प्रोफेसर बद्री नारायण ने बार-बार अपनी पुस्तक में हिन्दू धर्म और हिंदुत्व को अलग-अलग दिखा कर बदनाम करने की कोशिश की है।

राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के तिरहुत प्रमंडल के जिलाध्यक्ष राहुल केदार सिंह का कहना है कि पिछले 6 वर्षों से दो-दो कुलपतियों के विवादित कार्यकाल के कारण विश्वविद्यालय का विकास नहीं हो पाया है और अब इसे एक योग्य और अच्छे विचारधारा वाले शिक्षाविद की कुलपति के रूप में ज़रूरत है। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म के प्रति अनाप-शनाप बकने वाले बद्री नारायण अब ‘नए-नए संघी’ बने हैं, ऐसे में इस तरह के व्यक्ति के आने से छात्रों का नुकसान ही है।

बता दें कि मोतिहारी के इस विश्वविद्यालय का एक बड़ा हिस्सा अब भी अस्थायी परिसर में चल रहा है। राहुल केदार सिंह का कहना है कि ‘संघ की गोद में बैठ कर गंगा नहाने’ की सोचने वाले कुलपति का यहाँ आना सहन नहीं किया जाएगा। जब राजद के नेता हिन्दू विरोधी होने को लेकर किसी का विरोध करें, तो समझ लीजिए मामला कितना पेचीदा है। ‘चंपारण छात्र संघ’ के संयोजक विकास जी भी इस आशंका से नाराज़ हैं।

उन्होंने कहा कि बापू की कर्मभूमि पर अवसरवादियों के लिए कोई जगह नहीं है। उन्होंने बद्री नारायण को ‘मौसम वैज्ञानिक’ बताते हुए कहा कि 2014 से पहले हिंदुत्व को लेकर ज़हर उगलने वाला व्यक्ति का कुलपति बनना ठीक नहीं है। विकास जी ने कहा कि RSS में ये लोग रोहिंग्या शरणार्थी की तरह हैं जो संगठन में तबतक ही टिके होंगे जबतक इनके निजी हितों की पूर्ति होती रहे। उन्होंने कहा कि हिन्दू की परिभाषा तक न जानने वाला व्यक्ति कुलपति बन कर आया तो विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा नष्ट हो जाएगी और इस पर ताला लग जाएगा।

वहीं शिक्षक निखिल विवेक का पूछना है कि हिंदुत्व को गुंडागर्दी से जोड़ने वाले व्यक्ति से भला एक अच्छा शैक्षिक वातावरण देने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? ‘चम्पारण छात्र संघ’ के कुछ सदस्य राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिख कर बद्री नारायण के खिलाफ विरोध दर्ज कराने वाले हैं। विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रों लालसाहब और मुकुंद का कहना है कि इस तरह का विवादित चेहरा यूनिवर्सिटी में नहीं आना चाहिए।

हाल ही में अपनी पुस्तक ‘रिपब्लिक और हिंदुत्व’ के वर्चुअल विमोचन के दौरान बद्री नारायण से पूछा गया था कि हिंदुत्व और हिन्दू धर्म को वो एक देखते हैं या फिर अलग-अलग? इसका जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि पुस्तक को लिखने के समय उनके मन में भी ये सवाल चल रहा था। उन्होंने उलटे इसका अर्थ समझने के लिए कार्यक्रम में उपस्थित RSS की नेशनल एग्जीक्यूटिव के सदस्य राम माधव से यही सवाल पूछ दिया।

‘हिंदुत्व’ नाम पर दो-दो पुस्तकें लिख चुके बद्री नारायण तिवारी को ये पता ही नहीं था कि हिन्दू धर्म की परिभाषा क्या है और हिंदुत्व क्या है। उन्होंने गोलमोल जवाब देते हुए कहा कि उनकी किताब सामाजिक पहलुओं को छूती है, उसमें फिलॉसॉफी नहीं है। बद्री नारायण से ये पूछा जा सकता है कि फिर किताब के नाम में ‘हिंदुत्व’ क्यों है? राम माधव ने जवाब देते हुए ‘हिंदुत्व’ शब्द को वीर सावरकर का क्रिएशन बताते हुए कहा कि सावरकर हिंदुत्व को ‘Hinduism’ से जोड़ कर नहीं देखना चाहते थे।

हालाँकि, ऑपइंडिया इसकी पुष्टि नहीं करता है कि बद्री नारायण का नाम पूर्वी चम्पारण के मोतिहारी स्थित ‘महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय’ के कुलपति के रूप में फाइनल हो गया है। बल्कि छात्रों और स्थानीय युवाओं को ये आशंका है कि चूँकि बद्री नारायण तिवारी का नाम विचाराधीन है और वो दावेदारों में से एक है, तो कहीं उन्हें ही न कुलपति बना कर मोतिहारी भेज दिया जाए। उनके हिन्दू विरोधी इतिहास को लेकर विरोध हो रहा है।

मर गया दलित कृष्णा: कुरैशी और उसके साथियों ने घेरकर किया था हमला, राजस्थान की घटना

राजस्थान के झालावाड़ में एक दलित युवक कृष्णा वाल्मिकी की हत्या का मामला प्रकाश में आया है। दो पक्षों के बीच हुए विवाद में 1 जुलाई 2021 को हल्दीघाटी रोड पर कृष्णा पर जानलेवा हमला हुआ था। मंगलवार (6 जुलाई 2021) को उपचार के दौरान उसकी मौत हो गई। 

पुलिस ने इस संबंध में अब तक 6 लोगों को गिरफ्तार किया है। इनकी पहचान सागर कुरैशी, रईस, इमरान, सोहेल, शाहिद कुरैशी और अख्तर अली के तौर पर हुई है। स्थिति संवेदनशील देखते हुए इलाके में पुलिस बल की तैनाती कर दी गई है। 

जानकारी के मुताबिक, कृष्णा वाल्मिकी मोची मोहल्ला का निवासी था। उसकी सूरजपोल दरवाजा क्षेत्र में रहने वाले सागर कुरैशी से लड़ाई थी। इसी का बदला लेने के लिए सागर अपने एक दर्जन साथियों के साथ हल्दीघाटी रोड पर आया और कृष्णा को बुरी तरह पीटकर फरार हो गया।

बाद में उसको झालावाड़ राजकीय जिला चिकित्सालय में भर्ती कराया गया। जहाँ हालत नहीं सुधरने पर उसे जयपुर रेफर किया गया। लेकिन वहाँ इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। मामले के संबंध में जिला पुलिस अधीक्षक डॉ. किरण कंग सिद्धू ने बताया कि 1 जुलाई को शहर के हल्दीघाटी रोड पर झालरापाटन निवासी कृष्णा पर जान से मारने की नीयत से हमला हुआ था।

पुलिस ने सागर कुरैशी को गिरफ्तार कर लिया है। वहीं उसके साथियों को पकड़कर भी जेल भेज दिया गया है। हमले की बाबत सहायक पुलिस अधीक्षक अमित कुमार ने कहा कि झालरापाटन में कुछ समय पहले सागर कुरैशी पर हमला हुआ था। उसने ठीक होने के बाद दूसरे गुट पर हमला किया और कृष्णा को अलग से हल्दीघाटी रोड पर निशाना बनाया।

आरोपितों की गिरफ्तारी करके जेल भेजा जा चुका है। इस संबंध में घायल अवस्था में कृष्णा ने शिकायत लिखवाई थी। अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर प्रकरण में हत्या करने की धारा जोड़कर जाँच की जाएगी। घटनाक्रम के आरोपित पहले भी कई अपराधों को अंजाम दे चुके हैं।

बता दें कि घटना के बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था। इसमें सभी आरोपित कृष्णा को कार से उतार कर बुरी तरह मार रहे थे। बाद में वह उसे अधमरी अवस्था में छोड़कर फरार हो गए थे।

वीडियो में देख सकते हैं कि कृष्णा जमीन पर गिरा हुआ है। वहीं बाकी सारे आरोपित उस पर लाठी चला रहे हैं। माँ बहन की गालियाँ वीडियो में सुनाई पड़ रही हैं। ये वीडियो लगभग 45 सेकेंड की है। इतनी देर में वीडियो में नजर आ रहे आरोपितों ने कृष्णा के हर अंग पर पूरे दम के साथ लाठी मारी।

घटना की सूचना मिलने के बाद प्रशासन हरकत में आया और पुलिस बल की तैनाती कर आरोपितों को पकड़ा गया। वीडियो बनाकर उसे वायरल करने वाले की पहचान की जा रही है। उसके ख़िलाफ़ भी धारा 302 के तहत मामला दर्ज किया जाएगा।

सेंसर में अटक गई थी ‘गंगा जमुना’, नेहरू से वाया इंदिरा हुई थी बात: जानिए दिलीप कुमार को क्या देना पड़ा ‘रिटर्न’

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के चुनिंदा शुरुआती सुपरस्टार अभिनेताओं में से एक दिलीप कुमार अब हमारे बीच नहीं हैं। बॉलीवुड जगत में उनका 58 साल का करियर किसी सुनहरी याद जैसा है। आज जब हम बॉलीवुड पर ‘खान(ओं)’ की तीकड़ी को राज करता हुआ देखते है, तो ये बात जानना दिलचस्प है कि दिलीप कुमार इस तीकड़ी से बहुत पहले इंडस्ट्री के वह ‘खान’ बन गए थे जिन्होंने न केवल देश की जनता के दिलों पर राज किया बल्कि पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी को भी अपना फैन बना लिया।

दरसअल, दिलीप कुमार का असली नाम ‘यूसुफ खान’ था जिनका जन्म पाकिस्तान के पेशावर में 11 दिसंबर, 1922 में हुआ था। उनके पिता चूँकि फिल्म और शो आदि के ख़िलाफ़ थे तो उन्होंने अपने पिता की ‘पिटाई के डर’ से अपना नाम ‘दिलीप कुमार’ रखा और इसके बाद फ़िल्मी जगत में उनका करियर आसमान छूता गया। वह समय के साथ आगे बढ़ते गए और तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के हीरो बनते गए।

सन् 1961 की बात है दिलीप कुमार को इंडस्ट्री में कदम रखे दो दशक होने वाले थे और उनकी फिल्म गंगा जमुना रिलीज के लिए तैयार थी। लेकिन इस बीच सेंसर बोर्ड ने उस पर रोक लगा दी और कम से कम  फिल्म में 250 कट माँगे। इसके बाद एक्टर ने अपनी फैन इंदिरा गाँधी से मदद की गुहार लगाई और तात्कालीन पीएम नेहरू के साथ 15 मिनट की बात की और उसके बाद फिल्म रिलीज के लिए पास कर दी गई।

इसी प्रकार दिलीप कुमार की बायोग्राफी ‘स्टार लीजेंड ऑफ इंडियन सिनेमा: द डेफिनिटिव बायोग्राफी’ में लेखक बन्नी रुबेन ने उन्हें लेकर कई खुलासे किए हैं। किताब में बताया गया है कि कैसे 1950 में हिंदी फिल्मों में अश्लील दृश्यों को लेकर धर्मयुद्ध छेड़वाली कॉन्ग्रेस सांसद लीलावती मुंशी ने राज्यसभा में दिलीप कुमार के बालों को मुद्दा बना दिया था और कहा था कि इसका प्रभाव भारतीय युवाओं पर पड़ता है।

लीलावती की आवाज का ही प्रभाव था कि सरकार सिनेमैटिक एक्ट 1959 में बदलाव करके फिल्मों से किसिंग सीन हटाने पड़े। लेकिन दिलीप कुमार के हेयरस्टाइल का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाया और जिस सदन में उन्हें ‘युवाओं पर गलत छाप’ छोड़ने वाला कहा गया था वह उसी सदन में कुछ साल बाद हिस्सा हो गए। साल 2000 में कॉन्ग्रेस ने उन्हें महाराष्ट्र से नॉमिनेट किया था जहाँ नेहरू काल में कभी लीलावती मुंशी सदस्य हुआ करती थी।

इसके बाद एक किताब और आई, जिसमें अर्थशास्त्री व ब्रिटिश सांसद लॉर्ड मेघनाड देसाई ने दिलीप कुमार को नेहरू का हीरो कहा। किताब का नाम था, “नेहरू हीरो: दिलीप कुमार इन द लाइफ ऑफ इंडिया।” इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार नेहरू को दिलीप कुमार, राज कपूर, देव आनंद-तीनों अभिनेता बेहद पसंद थे। संयोग से ये तीनों आज के समय के पाकिस्तान में जन्मे थे और बाद में इन्होंने मुंबई में घर बनाया। सन् 1950 में INC की कॉन्फ्रेंस को संबोधित करने के लिए निमंत्रित किया गया। 1957 में नेहरू के तीनों पसंदीदा एक्टर्स ने उनकी इच्छा के अनुसार वीके कृष्ण मेनन के लिए नॉर्थ मुंबई सीट पर कैंपेन किया। लेकिन 1962 में भारत-चीन युद्ध के बाद तीनों ने मेनन से दूरियाँ बना ली। नतीजन 1967 में वह चुनाव हार गए।

दिलीप कुमार ने शुरूआती दिनों में राजनीति से दूरी बनाए रखी लेकिन समाज के प्रति हितकारी कार्य करने के लिए हमेशा अग्रसर रहे। हाँ, मौका आने पर उन्होंने अपने करीबी राजनेाओं के लिए कैंपेन किया। 1994 में वह पीएम विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ रहे, फिर 1996 में उन्होंने राजस्थान अलवर में कॉन्ग्रेस प्रत्याशी के लिए कैंपेन किया और फिर 1999 में मनमोहन सिंह की कैंपेनिंग में नजर आए। 

1996 के समय की रिपोर्ट् कहती हैं कि दिलीप को राजनीति में लाने के भरसक प्रयास हो रहे थे, जिसके कारण साल 2000 में वह राज्यसभा पहुँच गए। सत्ता में भाजपा थी। दिलीप भले ही सदन की कार्यवाही में नियमित तौर से भाग नहीं लेते थे लेकिन उन्होंने संसदीय कार्यवाही और विकास कार्यों दोनों में योगदान दिया। दिलीप कुमार स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर संसद की स्थायी समिति में थे, इसी समिति ने 2006 में भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम में संशोधन के लिए रिपोर्ट तैयार की थी।

90 के दशक में दिलीप कुमार को शिवसेना ने निशाने पर लिया था जब उन्हें पाकिस्तान ने सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान ‘निशान ए इम्तियाज’ से नवाजा। शिवसेना का कहना था कि वह ये सम्मान न लें। लेकिन दिलीप की दोस्ती तत्तकालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी से थी, जिनके परामर्श के बाद उन्होंने वह सम्मान स्वीकारा। इसके 1991 में उन्हें पद्म भूषण मिला और साल 2015 में नरेंद्र मोदी सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया।

मोदी सरकार से 12 मंत्रियों की छुट्टी, रविशंकर और जावड़ेकर का भी इस्तीफा: ये 43 लेने जा रहे हैं शपथ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी कैबिनेट का विस्तार करने जा रहे हैं। बुधवार (7 जुलाई 2021) शाम 6 बजे नए मंत्री शपथ लेंगे। इनके नाम की सूची पहले ही राष्ट्रपति भवन भेजा जा चुकी है। पीएम के दूसरे कार्यकाल में कैबिनेट में ये पहला बड़ा विस्तार है। नई कैबिनेट में 43 चेहरों को मौका मिलेगा। विस्तार से पहले कई मंत्रियों से उनका इस्तीफा भी लिया गया है।

एएनआई ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि राष्ट्रपति ने 12 मंत्रियों के इस्तीफे स्वीकार कर लिए हैं। इनमें आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद और पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का नाम भी शामिल है।

समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार 43 लोगों को मंत्री पद की शपथ दिलाई जाएगी। इनमें ज्योतिरादित्य सिंधिया, पशुपति कुमार पारस, भूपेंद्र यादव, अनुप्रिया पटेल, शोभा करंदलाजे, मीनाक्षी लेखी, अजय भट्ट, अनुराग ठाकुर, अन्नपूर्णा देवी जैसे नाम भी शामिल हैं। पूरी लिस्ट आप नीचे पढ़ सकते हैं।

ये लेंगे शपथ

  1. 1. नारायण राणे 2. सर्बानंद सोनोवाल 3. वीरेंद्र कुमार 4. ज्योतिरादित्य सिंधिया 5. आरसीपी सिंह 6. अश्विनी वैष्णव 7. पशुपति कुमार पारस 8. किरण रिजिजू 9. राजकुमार सिंह 10. हरदीप सिंह पुरी 11. मनसुख मंडाविया 12. भूपेंद्र यादव 13. पुरुषोत्तम रूपाला 14. जी किशन रेड्डी 15. अनुराग ठाकुर 16. पंकज चौधरी 17. अनुप्रिया पटेल 18. सत्यपाल सिंह बघेल 19. राजीव चंद्रशेखर 20. शोभा करंदलाजे 21. भानुप्रताप सिंह वर्मा 22. दर्शना विक्रम जरदोश 23. मीनाक्षी लेखी 24. अन्नपूर्णा देवी 25. ए नारायण स्वामी 26. कौशल किशोर 27. अजय भट्ट 28. बीएल वर्मा 29. अजय कुमार 30. देवसिंह चौहान 31. भगवंत खूबा 32. कपिल पाटिल 33. प्रतिमा भौमिक 34. सुभाष सरकार 35. भगवत कृष्ण राव कराड़ 36. राजकुमार रंजन सिंह 37. भारती प्रवीण पवार 38. विश्वेश्वर टुडू 39. शांतनु ठाकुर 40. महेंद्र भाई मुंजापारा 41. जॉन बारला 42. एल मुरुगन 43. नीतीश प्रामाणिक

उल्लेखनीय है कि विस्तार से पहले कई नेताओं ने मोदी कैबिनेट से इस्तीफा भी दिया है। इनमें शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक, श्रम एवं रोजगार मंत्री संतोष कुमार गंगवार, महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री देबश्री चौधरी भी शामिल हैं। इसके अलावा प्रताप सारंगी और स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन भी इस्तीफा दे चुके हैं।

मोदी कैबिनेट में विस्तार की अटकलें काफी समय से लगाई जा रही थी। कई नाम चर्चा में थे। लेकिन अब सूची सामने आने के बाद इस पर विराम लग गया है। एक दिन पहले मंगलवार को केंद्रीय मंत्री थावरचंद गहलोत को गवर्नर बनाया गया था।

फ्रांस में भी ट्विटर पर कोर्ट सख्त, हेट स्पीच रोकने के लिए उठाए गए कदमों का ब्यौरा देने के निर्देश

अड़ियल रवैए के कारण भारत में संकटों में उलझी माइक्रो-ब्लॉगिंग साइट ट्विटर को फ्रांसीसी अदालत ने भी फटकार लगाई है। अदालत ने ट्विटर को सोशल मीडिया पर नस्लवाद, लिंगभेद और अन्य प्रकार के घृणास्पद पोस्ट से निपटने के लिए उठाए गए सभी कदमों का विवरण देने को कहा है।

न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के अनुसार, कई फ्रांसीसी सोशल मीडिया एक्टिविस्ट समूहों ने पिछले साल ट्विटर को अदालत में यह जानने के लिए घसीटा था कि वह अपने प्लेटफॉर्म पर घृणित सामग्री को रोकने के लिए क्या कर रहा है। भेदभाव विरोधी कार्यकर्ताओं (anti-discrimination activists) ने सोशल मीडिया कंपनी पर घृणित टिप्पणियों को रोकने में लगातार विफल रहने का आरोप लगाया था।

मजिस्ट्रेट फैब्रिस वर्ट की अध्यक्षता वाली फ्रांसीसी अदालत ने मंगलवार (6 जुलाई 2021) को भेदभाव-विरोधी कार्यकर्ता समूह के पक्ष में फैसला सुनाया। उन्होंने ट्विटर को कार्यकर्ता समूह उन सभी कदमों से संबंधित दस्तावेज सौंपने का आदेश दिया जो मई 2020 से हेट स्पीच रोकने के लिए उठाया गया है। अदालत ने कहा, “ट्विटर को सभी प्रशासनिक, संविदात्मक, टेक्निकल या कर्मिशियल दस्तावेज सौंपने चाहिए, जिसमें साइट पर होमोफोबिक, नस्लवादी और सेक्सिस्ट पोस्ट के खिलाफ एक्शन लेने का विवरण दिया गया हो।”

अदालत ने माइक्रो-ब्लॉगिंग साइट से फ्रांस में मध्यस्थों को नियुक्त करने के पीछे के कारण की व्याख्या करने के लिए भी कहा, जो उन पोस्टों की जाँच करते हैं और कंटेंट मॉडरेटर हैं, जिन्हें यूजर्स घृणित साम्रगी के रूप में चिह्नित करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि ट्विटर के वैश्विक संचालन को कार्यकर्ताओं की जाँच के लिए खोलने का अदालत का फैसला सिर्फ फ्रांस तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया भर में है।

अदालत ने ट्विटर को फैसले का पालन करने के लिए दो महीने का समय दिया है। ट्विटर ने कहा है कि वह अदालत के आदेश का अध्ययन कर रहा है। ट्विटर ने कहा, “हमारी पहली प्राथमिकता हमारे मंच का इस्तेमाल करने वाले लोगों की सुरक्षा को आश्वस्त करना है। हम एक सुरक्षित इंटरनेट बनाने, ऑनलाइन नफरत फैलाने वालों के खिलाफ शिकंजा कसने, सार्वजनिक बातचीत में अभद्र भाषा के प्रयोग को रोकने के लिए प्रतिबद्ध हैं।”

इसी बीच फ्रांस यहूदी छात्र संघ (यूईजेएफ), जिसने ट्विटर के खिलाफ 5 अन्य समूहों के साथ मिलकर मामला दर्ज किया था, इस फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने कहा, “ट्विटर को अंततः जिम्मेदारी लेनी होगी, तर्क-वितर्क करना बंद करना होगा और नैतिकता को लाभ व अंतरराष्ट्रीय विस्तार से पहले रखना होगा।”

हाल ही में सोशल मीडिया की दिग्गज कंपनियों की न केवल ऑनलाइन दुर्व्यवहार को लेकर आलोचना की गई है, बल्कि उन अकाउंट को बढ़ावा देने का भी आरोप लगाया गया है, जो हिंसा भड़काते हैं। इसके अलावा एक खास विचारधारा के लोगों को बढ़ावा देने का आरोप भी है।

हालाँकि, भारत, नाइजीरिया सहित कई देश इन बड़ी-तकनीकी कंपनियों के मनमाने कामकाज के प्रति सजग हो गए हैं। वे सोशल मीडिया कंपनियों को घरेलू कानूनों के प्रति जवाबदेह बनाने के लिए नए सख्त कानून लागू करने की कोशिश कर रहे हैं। उदाहरण के लिए भारत में मोदी सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों के कामकाज में पारदर्शिता लाने के लिए नए आईटी नियम लागू किए हैं। लेकिन, ट्विटर नीतियों का हवाला दे इन नियमों का पालन करने में विफल रहा है।

‘बेकार है सत्यनारायण व भागवत कथा, विज्ञान के खिलाफ है’: गुजरात में AAP के प्रदेश अध्यक्ष के खिलाफ FIR

गुजरात में आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रदेश अध्यक्ष गोपाल इटालिया के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। उन पर हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाने के आरोप लग रहे हैं। ‘हिन्दू आईटी सेल’ के अनुज मिश्रा ने ये मामला दर्ज कराया है। ‘हिन्दू आईटी सेल’ ने सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी दी कि गोपाल इटालिया के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई है, जिसे FIR में तब्दील किया गया है। साथ ही गुजरात पुलिस से कड़ी कार्रवाई की माँग की।

शिकायत में कहा गया है कि गोपाल इटालिया के राज्य में सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में प्रशंसक हैं, ऐसे में उन्होंने एक वीडियो के जरिए हिन्दू देवी-देवताओं और रीति-रिवाजों का मजाक उड़ाया है, जिसे कई लोगों ने देखा। आरोप है कि गोपाल इटालिया ने कहा था, “अगर आपको मेरी बातें पसंद नहीं हैं तो आप मुझे ब्लॉक कर के निकल लीजिए, क्योंकि मुझे आपकी ज़रूरत नहीं है।” इसके बाद उन्होंने हिन्दू पर्व-त्योहारों का नाम लिया।

गोपाल इटालिया ने कहा, “लोग सत्यनारायण कथा और भागवत कथा जैसी बहुत सारी गैर-जरूरी चीजों पर रुपए खर्च कर रहे हैं। इन चीजों का कोई उपयोग ही नहीं है और ये अवैज्ञानिक हैं। अब भी लोगों को ये नहीं पता है कि ये सब कर के उन्हें क्या लाभ मिलेगा। ये सब कर के लोग दूसरों का समय भी जाया करते हैं। अगर हम इन चीजों पर 5 पैसा भी खर्च करते हैं, तो हमें मनुष्य की तरह जीवन जीने का कोई अधिकार नहीं है।”

गोपाल इटालिया ने आगे कहा था, “मैं ऐसे लोगों से शर्मिंदा हूँ (सत्यनारायण कथा और भागवत कथा कराने वाले)। मुझे इनसे काफी गुस्सा आता है। रीति-रिवाजों और संस्कृति के नाम पर हिजड़ों की तरह तालियाँ बजाने वालों की हमें कोई ज़रूरत नहीं है। कोई साधु मंच से कुछ बोल देगा और हमें हिजड़ों की तरह तालियाँ बजानी हैं?” शिकायत में कहा गया है कि AAP गुजरात के अध्यक्ष का वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अब भी उपलब्ध है।

FIR के अनुसार, ये वीडियो जंगल में आग की तरह देश-विदेश में फ़ैल रहा है और गोपाल इटालिया के फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब हैंडलों से चारों तरफ फ़ैल रहा है। शिकायत के अनुसार, इस वीडियो को जानबूझ कर सिर्फ और सिर्फ हिन्दुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए बनाया गया है। इसीलिए, निवेदन किया गया है कि हिन्दुओं के हितों का ध्यान रखते हुए उनके खिलाफ ठोस कार्रवाई की जाए।

उनके बयान से कई पुजारियों और कथावाचकों ने नाराजगी जताई। हाल ही में वो सोमनाथ मंदिर का दर्शन करने पहुँचे थे, लेकिन लोगों के विरोध के कारण उन्हें वहाँ से भागना पड़ा। वहीं उन्होंने अब हिन्दू समाज से माफ़ी भी माँगी है। इटालिया ने बयान दिया था कि आम आदमी मेहनत करके खाता है लेकिन पुजारी, कथावाचक, लोगों को भविष्य बताने वाले लोग बैठे-बैठे लोगों को ठगते हैं।उन्होंने इसे ‘धर्म का धंधा’ बताया था।

हालाँकि, गोपाल इटालिया के ये बयान पुराने हैं। तब वो गुजरात में AAP के प्रदेश अध्यक्ष भी नहीं बने थे। उन्होंने अपने बयान में तब कहा था कि कथावाचक व पुजारी आम आदमी को धर्म का डर दिखाते हैं तथा उन से रुपए ऐंठते हैं। भाजपा के मीडिया प्रभारी यग्नेश दवे ने उनके वीडियो को सोशल मीडिया पर अपलोड करके उन्हें हिंदू विरोधी बताया था। ये सब तब हो रहा है, जब दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया हाल ही में गुजरात दौरे से लौटे हैं।

इटालिया का एक और वीडियो वायरल हुआ है जहाँ उसके द्वारा हिन्दू परंपराओं के बारे में अनाप-शनाप बातें कही जा रही हैं। इटालिया ने दावा किया कि अमीर व्यापारी कथा और सत्संग के नाम पर लोगों से पैसे लूटते हैं। इटालिया ने कहा, “ये कथाकार सिर्फ सूरत में ही कथाएं क्यों करते हैं? अगर तुम इतने ही बड़े हो तो जाकर सीमा पर कथा करो। पाकिस्तान और बांग्लादेश सीमा पर जाकर कथा करो लेकिन यहाँ के लोगों को छोड़ दो।”

‘परमबीर सिंह ने मुझे आत्महत्या के झूठे केस में फँसाया’: एसीपी ने खोले पूर्व पुलिस कमिश्नर के भ्रष्टाचार सहित कई ‘गुप्त राज’

मुंबई के पूर्व पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह पर भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के आरोप लगे हैं। इससे आने वाले दिनों में उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं। रिपब्लिक टीवी को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में एसीपी एस निपुंगे ने परम बीर सिंह पर भ्रष्टाचार करने और आत्महत्या के मामले में उन्हें फँसाने का आरोप लगाया है। निपुंगे फिलहाल नासिक के ग्रामीण क्षेत्र में एसीपी के पद पर तैनात हैं।

परमबीर सिंह का भिवंडी में रैकेट

निपुंगे मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह पर यह आरोप उस दौरान लगाया था, जब ठाणे जिले के भिवंडी में ट्रैफिक विभाग के एसीपी थे। इस दौरान उन्होंने परमबीर सिंह के काले धंधों को उजागर कर दिया था। इसके बाद न केवल उनका ट्रांसफर कर दिया गया था, बल्कि उन्हें आत्महत्या के लिए उकसाने के झूठे मामले में भी फँसाया गया था।

रिपब्लिक टीवी को दिए इंटरव्यू में एसीपी निपुंगे ने बताया, “भिवंडी में कई गोदाम हैं, जिस कारण उस क्षेत्र से मल्टी-एक्सल गाड़ियाँ गुजरती हैं। इन वाहनों के दिन में इस इलाके में प्रवेश पर प्रतिबंध था। हालाँकि, जब मैं वहाँ तैनात था तो मैंने इलाके में लगने वाले ट्रैफिक जाम को देखा और इसकी पड़ताल शुरू की। कई ड्राइवरों के बयान लेने के बाद पता चला कि उन्हें फेक रसीद देने के बदले कुछ पैसे देने को कहा जाता था। जब मैं इसकी पड़ताल कर ही रहा था तो मुझे डीसीपी का फोन आया कि इन बयानों को लेना बंद करो इससे सीपी (परम बीर सिंह) नाराज हो सकते हैं। इस घटना के तीन दिन बाद ही मेरा ट्रांसफर कर दिया गया।”

आत्महत्या का झूठा केस

पुलिस अधिकारी ने बताया कि परमबीर सिंह उससे बौखलाए हुए थे और 2017 में उन्होंने महिला कॉन्स्टेबल सुभद्र पवार की आत्महत्या के मामले में फँसा दिया।

निपुंगे ने बताया, “उस महिला कॉन्स्टेबल का एक कॉन्स्टेबल के साथ संबंध था, लेकिन वो उसे शादी का झाँसा देकर उसके साथ रिलेशन में था। इस पर वह कॉन्स्टेबल मेरी बहन के तौर पर मेरे पास आई तो मैंने उसे शिकायत करने को कहा। इसके कुछ दिनों बाद वह मृत पाई गई। हैरानी की बात है कि मुझे इस मामले में सिर्फ इसलिए आरोपी बनाया गया था, क्योंकि मैंने उससे बातचीत की थी।”

उन्होंने आगे खुलासा किया कि कॉन्स्टेबल के शव का पोस्टमार्टम करने से पहले उसके आत्महत्या की खबर प्लांट की गई। कथित आत्महत्या की तस्वीर पाने वाले निपुंगे ने दावा किया है कि वास्तव में वो आत्महत्या नहीं, बल्कि हत्या थी। यह हत्या का मामला था न कि आत्महत्या का। उन्होंने परमबीर सिंह पर साठगाँठ करने और हत्या की वारदातों को आत्महत्या के तौर पर पेश करने का आरोप लगाया है।

पुलिस अधिकारी ने चौंकाने वाला खुलासा करते हुए कहा, “महिला कॉन्स्टेबल की आत्महत्या का पोस्टमार्टम करने वाले डॉ गाडगे ने उसे फाँसी लगाकर की गई आत्महत्या करार दिया था। डॉ गाडगे ने ही मनसुख हिरेन की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट भी बनाई थी और उनके डूबने से मौत की घोषणा की थी।”

उन्होंने ये भी कहा कि जब भी कोई आत्महत्या का विवादित मामला सामने आता है तो उसमें परमबीर सिंह के शामिल होने का खुलासा होता है। चाहे वह सुशांत सिंह राजपूत, दिशा सालियान, मनसुख हिरेन या फिर इस कॉन्स्टेबल का हो।

नासिक में तैनात एसीपी निपुंगे ने बताया है कि आत्महत्या के झूठे मामले में जमानत नहीं मिल पाने और निलंबन के बाद उन्होंने परमबीर सिंह के ‘दाहिने हाथ’ माने जाने वाले अधिकारी काले का स्टिंग किया। इसमें वह कैमरे पर यह कहते हुए पकड़े गए थे कि जो भी परमबीर सिंह के रास्ते में आता है वह मुश्किल में पड़ जाता है। ये स्पष्ट हो गया है कि परमबीर से पंगा नहीं लेना चाहिए।

निपुंगे ने बताया है कि उन्होंने काले की स्टिंग के दौरान का वो वीडियो जमा किया है, जिसमें उन्होंने (काले) परमबीर सिंह के भ्रष्टाचार और अवैध गतिविधियों में शामिल होने और उनकी साँठगाँठ के बारे में कबूल किया है।

निलंबन का परिवार पर पड़ा गहरा असर

परमबीर सिंह के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने में देरी करने के सवाल पर निपुंगे ने कहा कि उनकी गिरफ्तारी और निलंबन का उनके परिवार पर गहरा असर पड़ा था। उनकी माँ का देहांत हो गया जबकि उनकी बड़ी बेटी डिप्रेशन में चली गई। पुलिस अधिकारी ने कहा कि जब वो जेल से बाहर आए तो उस दौरान परमबीर सिंह ठाणे में ही थे। कोई भी अधिकारी उनके खिलाफ नहीं जा सकता था।

एसीपी निपुंगे ने परमबीर सिंह पर घूस लेकर अधिकारियों को मनचाही पोस्टिंग देने का आरोप भी लगाया है। उन्होंने कहा, “परमबीर सिंह अपनी ड्यूटी से कहीं ज्यादा अवैध गतिविधियों में शामिल रहे हैं।”

एसीपी निपुंगे ने अपनी शिकायत मुख्यमंत्री, गृह मंत्री, नासिक थाने और पुलिस महानिदेशक को भेजी है, लेकिन मामले में अब तक एफआईआर दर्ज नहीं हो सकी है।

गौरतलब है कि इस साल फरवरी, 2021 में मुकेश अंबानी के घर एंटीलिया के सामने कार में बम मिलने के बाद परमबीर सिंह का ट्रांसफर कर दिया गया था। इस मामले के बढ़ने के बाद परमबीर सिंह ने एक पत्र लिखकर महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख पर पुलिस अधिकारियों के जरिए मुंबई के व्यापारियों से हर महीने 100 करोड़ रुपए की वसूली करने के आरोप लगाए थे।