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‘4 हिंदू महिलाओं का धर्मांतरण कराओ वरना जान से मार देंगे’: शौहर के ‘लव जिहाद कैंपेन’ की बीवी ने खोली पोल

उत्तर प्रदेश के लखनऊ में रहने वाली एक मुस्लिम महिला ने अपने शौहर और सास पर गंभीर आरोप लगाए हैं। महिला ने इंदिरा नगर थाने में पति सैयद हसनैन अशरफ और सास शादिया के खिलाफ लव जिहाद कैंपेन चलाने का केस दर्ज कराया है।

महिला ने पुलिस को बताया कि उसका शौहर और सास गैर मुस्लिम महिलाओं को अपने जाल में फँसाकर उनका धर्म परिवर्तन करवा रहे हैं। उसने बताया कि हसनैन बेंगलुरु में एक दरगाह का सज्जादानशीन (दरगाह का बड़ा फकीर) है। उसको धर्मांतरण के लिए विदेशों से फंडिंग हो रही है। इस काम में उनके रिश्तेदार भी शामिल हैं।

इंस्पेक्टर अजय प्रकाश त्रिपाठी के मुताबिक, महिला ने बताया है कि शौहर ने उसे जान से मारने की धमकी दी है। हसनैन ने उससे कहा है कि चार हिंदू महिलाओं का धर्मांतरण करवाओ। अगर उसने ऐसा नहीं किया तो वह उसके लंदन में रहने वाले भाई समेत पूरे परिवार को खत्म कर देगा। जब महिला ने उसकी बात मानने से इनकार कर दिया, तो उसके शौहर ने उसे पीट-पीटकर घर से निकाल दिया।

हिंदू महिलाओं को फँसाता है

इंस्पेक्टर ने बताया कि खुरमनगर की रहने वाले पीड़ित महिला उम्मे कुलसूम ने आरोप लगाया कि बेंगलुरु में रहने वाला उसका पति हिंदू महिलाओं को अपने जाल में फँसाता है। फिर उन्हें शादी का झाँसा देकर उनका धर्म परिवर्तन कराता है। दरगाह पर हर धर्म के लोग आते हैं, जिसका फायदा उठाकर वह लोगों का ब्रेनवॉश कर उनका धर्म परिवर्तन करवाता है।

गर्भवती थी तो ऋचा से कर ली निकाह

रिपोर्ट्स के मुताबिक पीड़िता ने आपबीती सुनते हुए पुलिस से कहा कि 2019 में उसका निकाह अशरफ से हुआ था। निकाह के कुछ दिनों बाद ही वह उसके साथ मारपीट करने लगा था। उसका पति और सास शादिया हर दिन उस पर दबाव बनाते थे कि वह हिंदू महिलाओं को अपनी दोस्त बनाए और उन दोनों से मिलवाए। जब महिला इसका विरोध करती तो पति उसके पूरे परिवार को जान से मारने की धमकी देता था। महिला ने आगे कहा, “जब मैं गर्भवती थी, तब उसने ऋचा पाहवा नाम की लड़की से निकाह कर लिया था और उसका नाम बदलकर मदिहा रख दिया था।”

मुझे गर्भपात कराने को कहा

पीड़िता के अनुसार, जब पति और सास का इससे भी मन नहीं भरा तो उन्होंने उससे दहेज की माँग शुरू कर दी। वह कहती है, “गर्भवती होने पर मेरा भ्रूण परीक्षण कराया गया। जैसे ही उन्हें पता चला मेरे गर्भ में बेटी है, उन्होंने मुझे गर्भपात कराने को कहा। साथ ही यह भी बोला कि अगर तू गर्भपात नहीं कराएगी तो उसके पालन-पोषण के लिए 25 लाख रुपए अपने मायके से ला। इस पर लंदन में नौकरी करने वाले मेरे भाई ने 7.50 लाख रुपए भेज कर मेरी बेटी की जान बचाई।”

बता दें कि इस मामले में इंदिरा नगर थाना पुलिस ने धर्म संपरिवर्तन अधिनियम, दहेज प्रताड़ना, जान से मारने की धमकी समेत अन्य धाराओं में मुकदमा दर्ज करके जाँच शुरू कर दी है। इसके साथ ही पुलिस ने यूपी एटीएस को भी सूचित कर दिया है।

आमिर खान के तलाक के बाद भांजे इमरान खान की शादी भी चर्चा में, पत्नी अवंतिका ने लिखा- आप भाग नहीं सकते

बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान के तलाक के बाद अब उनके भांजे इमरान खान अपने वैवाहिक जीवन को लेकर चर्चा में हैं। बताया जा रहा है कि इमरान और उनकी पत्नी अवंतिका मलिक के बीच भी कुछ ठीक नहीं चल रहा है। दरअसल, अवंतिका ने आमिर खान और किरण राव के तलाक के बाद इंस्टाग्राम पर एक स्टोरी पोस्ट की थी जिसके बाद मीडिया में अनुमान लगने शुरू हो गए।

अपनी स्टोरी में अवंतिका ने Juno Diaz का लिखा शेयर किया था। इसमें कहा गया था, “इतने सालों ने मुझे यही सिखाया है कि आप कभी भाग नहीं सकते, कभी नहीं।” उनके इस पोस्ट के बाद से मीडिया में कयास लगाए जा रहे हैं कि उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से अपने पति पर निशाना साधा है।

अवंतिका ​मलिक की इंस्टाग्राम पोस्ट का स्क्रीनशॉट

रिपोर्ट्स के मुताबिक, लंबे समय तक रिलेशनशिप में रहने के बाद इमरान ने अपनी गर्लफ्रेंड अवंतिका से साल 2011 में शादी कर ली थी। दोनों की शादीशुदा लाइफ अच्छी चल रही थी, लेकिन साल 2018 से लेकर 2019 तक दोनों के संबंधों में दरार पड़ने की खबरें मीडिया में जोर पकड़ने लगी थीं।

उस दौरान ऐसी खबरें भी सामने आई थी कि अवंतिका ने अपने पति इमरान का घर छोड़ दिया है और अब वे अपने माता-पिता के साथ रहती हैं। हालाँकि, सोशल मीडिया पर खासा एक्टिव रहने वाली अवंतिका ने अपने रिश्ते को लेकर स्पष्ट रूप से अभी तक कुछ भी नहीं कहा है। मालूम हो कि इमरान खान का बॉलीवुड करियर कुछ खास नहीं रहा है। उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री से संन्यास ले लिया है। उनकी और अवंतिका की एक बेटी भी है।

बता दें कि हाल ही में बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान ने अपनी दूसरी पत्नी किरण राव से तलाक लेने की घोषणा की थी। उन्होंने कहा था, “हम साथ में खुश रहे, हँसे। हमारा रिश्ता विश्वास, प्यार और सम्मान के मामले में लगातार बढ़ता ही रहा। अब हमने निर्णय लिया है कि अब हम जीवन के नए अध्याय की शुरुआत करेंगे, लेकिन पति-पत्नी के रूप में नहीं।” बकौल आमिर खान और किरण राव, उनका ये नया जीवन उनके बेटे आजाद के अभिभावक के रूप में होगा, एक परिवार के रूप में होगा।

₹1 करोड़ की स्मैक के साथ नफीस, ₹25 लाख की चरस के साथ अख्तर अली: UP पुलिस ने 2 दिन में की 2 ड्रग तस्करों की गिरफ्तारी

उत्तर प्रदेश के बहराइच में पुलिस व एसएसबी की संयुक्त टीम ने कल (6 जुलाई 2021) गश्त के दौरान एक स्मैक तस्कर को गिरफ्तार किया। छानबीन में पुलिस को इसके पास से 1 करोड़ 7 लाख रुपए की स्मैक बरामद हुई। पुलिस ने आरोपित को पकड़कर जेल भेज दिया है। इस बीच जिला पुलिस के हत्थे 7 जुलाई को एक और तस्कर चढ़ा जिसके पास से 25 लाख रुपए की चरस बरामद हुई।

जानकारी के अनुसार, भारत-नेपाल सीमा पर स्थित रुपईडीहा बॉर्डर एक खुली सीमा है। जहाँ बॉर्डर की सुरक्षा में एसएसबी व पुलिस के जवान मुस्तैद हैं। सीमा की सुरक्षा के लिए 6 जुलाई को रुपईडीहा थाने के वरिष्ठ उपनिरीक्षक रूदल बहादुर सिंह व एसएसबी के एएसआई दीप सिंह भाटी दल बल के साथ गश्त कर रहे थे। उसी दौरान उनको माल गोदाम रोड के पास से एक युवक दिखाई पड़ा। टीम ने रोका तो वह भागने लगा।

पुलिस को युवक का ऐसा बर्ताव देख शक हुआ और पुलिस ने उसका पीछा किया। लगभग घंटे भर की भागदौड़ के बाद टीम ने घेराबंदी करके युवक को गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ में उसकी पहचान नफीस के तौर पर हुई। जब पुलिस ने इसकी छानबीन शुरू की तो इसके पास से 1 करोड़ 7 लाख की स्मैक बरामद हुई।

एसएसपी ग्रामीण अशोक कुमार ने मामले के संबंध में बताया कि आरोपित ने अपने आपको सहजना रुपईडीहा का निवासी बताया है। उसके ख़िलाफ़ केस दर्ज करके उसे जेल भेज दिया गया। इस मामले में यूपी पुलिस ने भी ट्वीट करके जानकारी दी है। ट्वीट में लिखा है, “बहराइच पुलिस एवं एसएसबी के संयुक्त प्रयास द्वारा एक मादक पदार्थ तस्कर को गिरफ्तार करते हुए उसके कब्जे से लगभग ₹01 करोड़ 07 लाख की स्मैक बरामद की गई है।”

उल्लेखनीय है कि बहराइच जिले में मादक पदार्थ की तस्करी करने के मामले में पुलिस ने एक अन्य गिरफ्तारी भी की है। पुलिस ने विदेशी बाजार में 25 लाख कीमत वाले 1.250 किलो चरस के साथ अख्तर अली नाम के युवक को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने आरोपित के ख़िलाफ़ NDPS कानून की धारा 8/20 लगाने के बाद उसको कोर्ट में पेश किया।

‘पैर रगड़ता, अश्लील बातें करता और पैंट ढीली करता’: ईसाई प्रोफेसर 5 छात्राओं के यौन उत्पीड़न के आरोप में गिरफ्तार

तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली ( Tiruchirappalli) स्थित बिशप हेबर कॉलेज (Bishop Heber College) के तमिल भाषा के प्रोफेसर सीजे पॉल चंद्रमोहन को स्नातकोत्तर विभाग की 5 छात्राओं के यौन शोषण के मामले में बुधवार (7 जुलाई 2021) को गिरफ्तार कर लिया गया है। उनपर कई महिलाओं का पहले भी यौन शोषण करने का आरोप लगा था।

रिपोर्ट के मुताबिक, त्रिची पुलिस ने विवादित प्रोफेसर को बिशप हेबर कॉलेज से गिरफ्तार किया। हाल ही में कॉलेज से स्नातक कर रही पाँच छात्राओं ने तमिल डिपार्टमेंट के प्रमुख पॉल चंद्रमोहन के खिलाफ यौन शोषण की शिकायत दर्ज कराई थी।

त्रिची स्थित बिशप हेबर कॉलेज, दक्षिण भारत के चर्च के तिरुचिरापल्ली तंजावुर सूबा द्वारा स्थापित किया गया था। वही इसके प्रबंधन का कमकाज भी देखता है। कॉलेज के प्रिंसिपल के पास दर्ज कराई गई पाँच पन्ने की शिकायत में 5 पोस्ट ग्रेजुएट छात्राओं ने आरोप लगाया है कि पॉल चंद्रमोहन उनके पास बैठकर उन्हें सेक्सुअल और अश्लील चुटकुले सुनाकर नियमित तौर पर उनका यौन शोषण करता था।

शिकायती पत्र में कहा गया है, “कक्षा के समय के दौरान वह लड़कियों के बेहद करीब बैठते थे, अश्लील बातें और दोहरे अर्थों वाली सेक्सुअल टिप्पणियाँ करते थे। इसी कारण स्टूडेंट उनसे नफरत करते हैं। क्लास के दौरान एक बार उन्होंने अपनी शर्ट-पैंट को इतना अधिक ढीला कर दिया था कि वहाँ बैठे स्टूडेंट असहज हो गए थे।”

पीड़ित छात्राओं ने आरोप लगाया है कि पॉल चंद्रमोहन कई तरीके से यौन उत्पीड़न करते थे, जैसे कि उनके पैरों के साथ अपने पैरों को रगड़ते थे। पत्र में कहा गया है कि एक बार चंद्रमोहन ने कहा था कि वह छात्राओं को उन अनुभवों के बारे में बताएँगे, जो पार्कों में प्रेमी-प्रेमिकाओं को अंतरंग होने के दौरान मिलता है। छात्राओं ने ये भी आरोप लगाया है कि प्रोफेसर चंद्रमोहन उन्हें कॉलेज में अपने पर्सनल केबिन में आने के लिए मजबूर करते थे।

सहायक प्रोफेसर नलिनी करती थीं पॉल चंद्रमोहन की मदद

पीड़ित छात्राओं का कहना है कि तमिल विभाग में सहायक प्रोफेसर नलिनी अक्सर उन्हें एचओडी चंद्रमोहन के पास जाने से पहले अपना चेहरा धोने और मेकअप लगाने के लिए मजबूर करती थीं। पत्र में छात्राओं ने कहा है कि इसी यौन उत्पीड़न के कारण उन्हें कॉलेज छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

छात्राओं के यौन उत्पीड़न की शिकायत के बाद कॉलेज ने वकील जयंतीरानी की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की है, जिसके बाद आरोपित प्रोफेसर पॉल चंद्रमोहन को निलंबित कर दिया गया है। पुलिस ने भी मामले की छानबीन शुरू कर दी है।

‘तमिल क्रिश्चियन लिटरेचर’ में पीएचडी कर चुके पॉल चंद्रमोहन बीते 20 सालों से लगातार कॉलेज में पढ़ा रहे हैं। बिशप हेबर कॉलेज में घटी यौन शोषण की घटना चेन्नई के लोयोला कॉलेज के यौन उत्पीड़न के मामले की तरह है।

मोदी 2.0 में खिले 43 नए ‘कमल’, 2024 पर सीधी नजर: विस्तार के नए दरवाजों पर दस्तक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट का विस्तार बहुप्रतीक्षित था। लेकिन वैश्विक कोरोना संक्रमण की वजह से उपजे हालात की वजह से यह टलती रही। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद मीडिया में इस विस्तार को लेकर कयासों का दौर जोर-शोर से शुरू हुआ। अटकलों के बाजार में कई नाम आए। कई गए। कुछ के नाम तो सूत्रों के हवाले से फाइनल तक बताए गए और आखिर में वे चर्चा में भी नहीं रहे। 12 मंत्रियों के इस्तीफे की तो किसी ने सोची नहीं थी। खासकर, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महकमों में इतने बड़े बदलाव को लेकर।

ऐसे में 2021 की 7 जुलाई को राष्ट्रपति भवन में 43 नए मंत्रियों की शपथ के साथ तस्वीर अब स्पष्ट हो चुकी है। इस तस्वीर से यह बात फिर पुख्ता हुई है कि किसी जमाने में ‘कौन मंत्री बनेगा’ यह तय करने वाली मीडिया को इसकी भनक तक नहीं थी कि आखिर में क्या होना है। वैसे ​ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे कुछेक नाम गिना मुख्यधारा की मीडिया अब भी चाहे तो अपनी पीठ थपथपा सकती है।

अब जरा इस शपथ के बाद मोदी कैबिनेट में आए महत्वपूर्ण बदलावों पर गौर करते हैं;

  • यह अब तक की सबसे युवा कैबिनेट है। मंत्रियों की औसत आयु 61 से घटकर 58 हो गई है। वाजपेयी काल की छाप से भी करीब-करीब कैबिनेट मुक्त हो गई है। उस दौर के राजनाथ सिंह और मुख्तार अब्बास नकवी ही अब इस कैबिनेट में बचे हैं।
    आज जिन 43 लोगों ने शपथ ली है उनमें से 15 कैबिनेट रैंक के हैं। 7 को प्रमोशन मिला है। इसके साथ ही केंद्रीय कैबिनेट के सदस्यों की संख्या 77 हो गई है। देश के 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश का इस मंत्रिमंडल में प्रतिनिधित्व है।
    अनुसूचित जाति (SC) से 12 मंत्री हैं। ये अलग-अलग 8 राज्यों से आते हैं। इसी तरह अनुसूचित जनजाति (ST) से आने वाले मंत्रियों की संख्या 8 हो गई है। ये भी अलग-अलग आठ राज्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
    अति पिछड़ी जातियों (OBC) से कुल 27 मंत्री हैं और ये 15 राज्यों से आते हैं। 5 अलग-अलग राज्यों से अल्पसंख्यक समुदाय के 5 लोग मंत्री हैं। लेकिन, पूववर्ती सरकारों की तरह इस सरकार में अल्पसंख्यक का मतलब मुस्लिम तुष्टिकरण नहीं है। लिहाजा एक मुस्लिम, एक सिख, एक ईसाई और दो बौद्धों को प्रतिनिधित्व मिला है।
    29 मंत्री अलग-अलग जातियों मसलन, ब्राह्मण, क्षत्रिय, भूमिहार, कायस्थ, बनिया, खत्री, लिंगायत, रेड्डी, मराठा, पटेल वगैरह हैं। 11 महिला इस कैबिनेट की अब सदस्य हैं और ये अलग-अलग 9 राज्यों से आती हैं।
    शपथ लेने वाले नए मंत्रियों में से आठ उत्तर प्रदेश से और पाँच गुजरात से हैं। ये वे राज्य हैं जो मोदी के भारतीय राजनीति के पटल पर छा जाने के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण किरदार अदा कर चुके हैं। बंगाल से चार लोगों को मौका देकर संदेश दिया गया है कि मिशन बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद भी बीजेपी की प्राथमिकता है। महाराष्ट्र और कर्नाटक से भी 4-4 लोगों को मौका मिला है।

यानी मोदी सरकार का प्रतिनिधित्व देशव्यापी और समाजव्यापी है। करीब एक दशक पहले तक इतनी व्यापकता लिए हुए बीजेपी के नेतृत्व वाली किसी केंद्र सरकार की कल्पना भी मुमकिन नहीं लगती थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नारे ‘सबका साथ, सबका विकास’, की तरह यह कैबिनेट सबकी सरकार होने का संदेश देती है। मोदी की उभार और यूपी में पिछले कुछ चुनावों में बीजेपी की जबर्दस्त जीत के पीछे महिला मतदाताओं का अहम रोल रहा है। 11 महिलाओं की भागीदारी बताती है कि बीजेपी के चुनावी रणनीति के केंद्र में अब भी आधी आबादी बनी हुई है।

शिवसेना और अकाली दल जैसी पार्टियों के एनडीए छोड़ने के बावजूद मोदी ने बताया है कि वे सहयोगियों के साथ चलने को तैयार हैं, लेकिन उनके दबाव में आने को नहीं। यही कारण है कि दो साल बाद भी नीतीश कुमार की जदयू को मनचाहा भाव नहीं मिला है, जबकि इसी जदयू को बिहार विधानसभा चुनावों में कम सीट आने के बावजूद पार्टी ने सरकार का नेतृत्व करने का मौका दिया था। 2019 में केवल एक कैबिनेट बर्थ की वजह​ से जदयू ने मोदी मंत्रिमंडल का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया था। उस समय पार्टी ने कहा था कि वह मजबूती के साथ हिस्सा बनेगी। दो साल बाद अब एक ही बर्थ कबूल कर जदयू कैबिनेट का हिस्सा बन गई है।

पशुपति पारस को मौका देकर यह संदेश दिया गया है कि बीजेपी न जदयू को ज्यादा भाव देने के मूड में है और न चिराग पासवान को। वहीं अनुप्रिया पटेल को दोबारा मौका दे सहयोगियों को भी संदेश दिया गया है कि यदि वे साथ चलने को तैयार हैं तो देर-सबेर उन्हें सरकार में उचित हिस्सेदारी भी मिलेगी। पिछले दिनों हिमंत बिस्वा सरमा को असम का मुख्यमंत्री बनाकर पार्टी ने दूसरे दलों के संभावनाशील चेहरों को जो संदेश दिया था, ज्योतिरादित्य सिंधिया के शपथ से वे संकेत और मजबूत हुए हैं। यह विपक्ष में एक नए भगदड़ को न्योता दे सकता है।

इन सबसे इतर इस बदलाव कोरोना संक्रमण की वजह से लोगों के मन में पैदा हुई निराशा को दूर करने का दमखम है। गवर्नेंस और विकास को लेकर मोदी सरकार की प्रतिबद्धता को नए आयाम देने का अवसर भी।

कुल मिलाकर मोदी के नेतृत्व में बीजेपी नीत एनडीए ने 2024 की दिशा में कदम तेज कर दिए हैं। इस बदलाव से उपजी सफलता ही उस समय मोदी कैंपेन का आधार हो सकती है। सहकारिता मंत्रालय के गठन के पीछे भी यही दृष्टि नजर आती है। युवा जोश, क्षेत्रीय संतुलन और चुनावी समीकरणों के लिहाज से भी ये बदलाव जमीन से जुड़े दिखते हैं और सर्वार्थ सिद्धि योग में नए मंत्रियों का शपथ, जैसे सोने पे सुहागा।

लिबरलों की नज़र में आज-कल, दिन भी अँधेरी रात है… क्योंकि मोदी ने छीने सामूहिक शर्मिंदगी के वे दिन

लिबरलों में समाज और देश की ओर से शर्मिंदा होने की होड़ लग गई है। कोई मानवता की ओर से अपना सिर शर्म से झुका ले रहा है तो कोई समाज की ओर से। कोई ऐज अ नेशन शर्मिंदा हो ले रहा है तो कोई ऐज अ ह्यूमन बीइंग। कोई यह कहते हुए शर्मिंदा हो रहा है कि; हाय, हम सब जिम्मेदार हैं तो कोई यह कहते हुए शर्मिंदा हो रहा है कि; इतिहास हमें माफ़ नहीं करेगा। पिछले सात-आठ वर्षों में लोग किसी न किसी बहाने शर्मिंदा होते रहे हैं। शर्मिंदा होने के लिए विशिष्ट घटनाएँ न मिलें तो साधारण घटनाओं को विशिष्ट बना लेते हैं ताकि शर्मिंदा हुआ जा सके। 

कई बार लगता है कि दो लिबरल मिलते होंगे तो उनके बीच की बातचीत कुछ यूँ होती होगी; 

यार बड़ा झमेला है लाइफ में। सबकुछ सही चल रहा है। एक तो ये सरकार इतनी बोरिंग है कि काम के अलावा कुछ करती ही नहीं। दर्जनों लोग रोज गरियाते हैं पर एक ठो एफआईआर भी नहीं करती। मैं तो कहता हूँ कि 66A में ही किसी को अरेस्ट कर लो ताकि हम समय-समय पर शर्मिंदा हो लिया करें पर इससे वह भी नहीं होता। साढ़े सात महीने बाद परसों स्वामी की डेथ पर शर्मिंदा होने का मौका मिला। मिला तो क्या, साला खुद ही बनाना पड़ा। नेचुरल डेथ को मर्डर न कहते तो इस बार भी शर्मिंदा नहीं हो पाते। माने खुद ही सोचो, पिछली बार शर्मिंदा तब हुए थे जब श्वेताभ जी की बेल एप्लीकेशन रिजेक्ट हुई थी। साढ़े सात महीने पहले।

अरे पूछो मत, लगता है जैसे कोरोना ने जीवन का लक्ष्य ही छीन लिया है। पहले एक्टिविटी रहती थी तो बीच-बीच में शर्मिंदा होने का मौका मिलता रहता था और शर्मिंदा होकर लगता था कि लाइफ में एक परपज है। कोरोना आने के बाद तो वह भी नहीं रहा। मैं भी पिछली बार प्रोफ़ेसर श्वेताभ के बेल एप्लीकेशन रिजेक्ट होने पर शर्मिंदा हुआ था। अरे मैं क्या हुआ था, हम दोनों साथ ही तो हुए थे। याद है वो दिल्ली हाट में चाय पीते हुए दोनों एक ही साथ ट्वीट करके शर्मिंदा हुए थे। फिर तुमने मुझे आर टी किया था और मैंने तुम्हें। बस, उसके बाद यही परसों हुए। 

अरे, बाल-बाल बचे। हम तो ये गाज़ियाबाद वाली घटना पर पूरे हिन्दू समाज के बिहाफ पर शार्मिंदा होने का ट्वीट भी ड्राफ्ट कर चुके थे। फिर पता चला कि ई फैक्ट चेकरवा उस घटना का फैक्ट चेक किया है। हम समझ गए कि इस पर शर्मिंदा हुए त खतरे है।

का मरदे आप भी। जब ट्वीट ड्राफ्ट कर दिए थे त ठेल देना चाहिए था। इतना सोचेंगे तो कैसे चलेगा? एक तो सरकार और कोरोना वैसे ही कम चांस दे रहे हैं और इधर आप डर रहे हैं।

अरे भाई, बात समझो। बबवा का इस्टेट है। बबवा और दाढ़ी में बड़ी अंतर है। और ये मत भूलो कि कहाँ रहते हो।   

हाल यह है कि किसी लिबरल को कॉल करो तो यह डर लगा रहता है कि उधर से सूचना मिलेगी कि; भैया, अभी ह्वाट्सएप्प ग्रुप में बिजी हैं। बाद में फ़ोन कीजिये बा एक काम कीजिये, कल फ़ोन कर लीजिये। आज उनका सामूहिक रूप से शर्मिंदा होने का प्लान है तो सारा दिन चल सकता है। दिन भर ट्रेंडिंग करवाने का भी प्लान है। इसलिए यही ठीक होगा कि कल ही फ़ोन करें। 

शर्मिंदा प्रसाद जी का ट्विटर टी एल देख रहा था। उन्होंने ट्वीट में लिखा था; 84 साल के स्वामी के साथ जो हुआ वह हमारे डेमोक्रेसी, जस्टिस सिस्टम और समाज की मानवीयता इन सभी पर एक सवाल है, दाग है। शर्म है।      

बताइये, शर्मिंदा प्रसाद जी ने अपराध और कानून की बात दरकिनार करके लोकतंत्र, न्याय व्यवस्था और समाज पर सवाल, दाग और शर्म, तीनों चेंप दिए। पढ़कर लगा जैसे 83 साल की उम्र के बाद देश का कानून अपराध करने की छूट देते हुए कहता है कि; भैया, 83 पार कर चुके हो, अब तुम कोई भी अपराध करने के लिए स्वतंत्र हो। कोई अड़चन आई तो देश भर के लिबरल मिलकर समाज और देश को शर्मिंदा करके छोड़ेंगे। मानवाधिकार के हनन पर अमेरिकी अखबार और न्यूज़ साइट पर कॉलम लिखेंगे और आपके अपराध की चर्चा न करके समाज, देश और मानवता, तीनों से अपराध बोध की नदी में डुबकी लगवाएंगे। निश्चिन्त रहें, आपके अपराध की चर्चा किसी ने की तो उसे लिबरल समाज से निकाल बाहर किया जायेगा और कोई उसके साथ सिगरेट नहीं पीयेगा।

कई बार लगता है जैसे इनके व्हाट्सएप्प ग्रुप की शर्तें कुछ ऐसी होती होंगी; केवल उन्हीं को ग्रुप में रखा जाएगा जिनके पास शर्मिंदा होने का कम से काम पाँच वर्षों का अनुभव हो। या फिर; ऐसे लिबरलों को वरीयता प्राप्त होगी जो पंद्रह मिनट के शॉर्ट नोटिस पर शर्मिंदा हो लेते हैं। या फिर; समाज के बिहाफ पर शर्मिंदा होने वाले इस ग्रुप के एडमिन भी बनाए जाएँगे और जो देश के बिहाफ पर शर्मिंदा होने की क्षमता रखते हैं उनका प्रमोशन करके उन्हें सुपर थर्टी शर्मिंदा लोगों के ग्रुप में एंट्री मिलेगी। 

अपराध की बात न करने से शर्मिंदा होने में सुभीता होता है। इनके ट्रेनिंग सेशन के दौरान श्रेष्ठ लिबरल का स्ट्रिक्ट निर्देश होता होगा; खबरदार अपराध की बात की तो। उस तरफ देखो भी मत। तुम्हारा काम है खुद शर्मिंदा होने के बहाने समाज को शर्मिंदा होने के लिए ललकारना। अपराध की बात करते हुए नक्सली को डिफेंड करोगे तो समाज तुम्हारे ऊपर चढ़ जाएगा और तुम्हें सच में शर्मिंदा करके छोड़ेगा। ये बुर्जुआ लोग बड़े घाघ होते हैं। ऐसे में कभी अपराध का अ भी मत बोलना। और हाँ, अकेले शर्मिंदा होने में खतरा है। हमेशा सामूहिक तौर पर शर्मिंदा होना है। सफल शर्मिंदगी का यही मंत्र है।

ये शर्मिंदा हुए जा रहे हैं। जहाँ मौका नहीं है तो मौके का निर्माण कर लेंगे पर शर्मिंदा होना जरूरी है। 

क्या गिलोय के सेवन से हो रहा लीवर फेल? आयुष मंत्रालय ने खोली नए अध्य्यन की पोल: जानें क्या है सच्चाई

कोरोना संक्रमण से बचाव और इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए इस समय लाखों लोग गिलोय का सेवन कर रहे हैं। इसी बीच हाल में एक रिपोर्ट सामने आई जिसने बताया कि मुंबई में सितंबर से दिसंबर 2020 के बीच कम से कम 6 ऐसे रोगी सामने आए जिनके लिवर को गिलोय के सेवन से गंभीर नुकसान पहुँचा था, लेकिन आयुष मंत्रालय ने इस भ्रामक स्टडी को खारिज कर दिया है।

यह स्टडी जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंड एक्सपेरिमेंटल हेपेटोलॉजी में प्रकाशित हुई थी। इसका शीर्षक ‘कोविड-19 महामारी में हर्बल इम्यून बूस्टर-इंड्यूस्ड लीवर इंजरी- एक केस सीरीज’ था। इस अध्ययन को आभा नागराल, कुणाल अध्यारु, ओंकार एस रुद्र, अमित घरत और सोनल भंडारे ने लिखा था। यह अध्ययन सितंबर और दिसंबर 2020 के बीच किया गया था। इसके बाद इस साल मार्च तक और 2 जुलाई को इसे प्रकाशित किया गया।

अध्ययन में बताया गया, “हमने (लेखकों) तीव्र हेपेटाइटिस और गिलोय युक्त एक विशिष्ट फॉर्मूलेशन की मदद से हाल ही में जोखिम लेते हुए 18 वर्ष से अधिक आयु के बाहरी रोगियों और इन मरीजों को शामिल किया। हमने सीरोलॉजिकल जाँच और विल्सन रोग (अनुवांशिक बीमारी) द्वारा एक्यूट वायरल हेपेटाइटिस ए, बी, सी और ई को भी बाहर रखा। मरीजों के अल्ट्रासोनोग्राफी और यकृत बायोप्सी सहित कई प्रकार की जाँच की गई।” इसके बाद उन्होंने इस बात का दावा किया कि गिलोय के सेवन से लीवर को खतरा हो सकता है।

अध्ययन का स्क्रीनशॉट

इस विवादास्पद अध्ययन को इंडिया टुडे और द टाइम्स ऑफ इंडिया सहित कई समाचार पोर्टलों द्वारा कवर किया गया था।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट का स्क्रीनग्रैब
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट का स्क्रीनग्रैब

आयुष मंत्रालय ने शोध पत्र में बताई खामियाँ

अब इसी रिपोर्ट पर एक प्रेस रिलीज जारी करते हुए आयुष मंत्रालय ने कहा कि गिलोय जैसी जड़ी-बूटी को जहरीली प्रकृति का बताने से पहले, लेखकों को पौधों की सही पहचान करने की कोशिश करनी चाहिए थी, जो उन्होंने नहीं की। आयुष मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, “इस अध्ययन में उल्लेख किया गया है कि आमतौर पर गिलोय ओई गुडुची के रूप में जानी जाने वाली जड़ी-बूटी लिनोसपोर कॉर्डिफोलिया (आईसी) के इस्तेमाल से मुंबई में छह रोगियों के लीवर फेल हो गए।”

मंत्रालय ने कहा कि गिलोय को लिवर फेल होने से जोड़ना भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली के लिए भ्रामक और विनाशकारी दुष्प्रचार करना है, क्योंकि आयुर्वेद में जड़ी-बूटी गुडुची या गिलोय का उपयोग लंबे समय से किया जा रहा है। विभिन्न विकारों के मामले में गिलोय का प्रभाव बेहद अच्छा रहा है।

आयुष मंत्रालय के मुताबिक, “अध्ययन का विश्लेषण करने के बाद, यह भी देखा गया कि अध्ययन के लेखकों ने जड़ी-बूटी की सामग्री का विश्लेषण नहीं किया है, जिसका रोगियों द्वारा सेवन किया गया था। यह सुनिश्चित करना लेखकों की जिम्मेदारी बन जाती है कि रोगियों द्वारा ली जाने वाली जड़ी-बूटी गिलोय है कि कोई अन्य जड़ी-बूटी।” उन्होंने कहा कि वास्तव में, ऐसे कई अध्ययन हैं, जो बताते हैं कि जड़ी-बूटी की सही पहचान न करने से गलत परिणाम हो सकते हैं। एक समान दिखने वाली जड़ी-बूटी टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया का लिवर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

मंत्रालय ने बताया कि लेखकों ने जड़ी-बूटियों की प्रजातियों की सही पहचान नहीं की। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि रोगियों ने कौन सी खुराक ली थी या उन्होंने इस जड़ी बूटी को अन्य दवाओं के साथ लिया था या नहीं। अध्ययन में रोगियों के पिछले और वर्तमान मेडिकल रिकॉर्ड को ध्यान में नहीं रखा गया है। अधूरी जानकारी पर आधारित प्रकाशन गलत सूचना के द्वार खोलेंगे और आयुर्वेद की सदियों पुरानी प्रथाओं को बदनाम करेंगे। आयुष मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि गिलोय और इसके सुरक्षित उपयोग पर सैकड़ों अध्ययन हैं। गिलोय आयुर्वेद में सबसे अधिक निर्धारित दवाओं में से एक है। किसी भी क्लीनिकल स्टडी में इसके इस्तेमाल से कोई भी प्रतिकूल घटना सामने नहीं आई है। 

प्रेस रिलीज बताया गया है कि आयुष मंत्रालय ने जर्नल ऑफ क्लिनिकल एंड एक्सपेरिमेंटल हेपेटोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन के आधार पर एक मीडिया रिपोर्ट पर ध्यान दिया है, जो कि लिवर के अध्ययन के लिए इंडियन नेशनल एसोसिएशन की एक सहकर्मी की समीक्षा की गई पत्रिका है। इस अध्ययन में उल्लेख किया गया है कि आमतौर पर गिलोय या गुडुची के रूप में जानी जाने वाली जड़ी बूटी टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया (टीसी) के उपयोग से मुंबई में छह मरीजों में लिवर फेलियर का मामला देखने को मिला।

‘प्रॉफेट मोहम्मद एक्ट’ की माँग: मुस्लिम और अम्बेडकरवादी संगठनों ने दी देशव्यापी प्रदर्शन की धमकी, पहले से है धारा 295(A)

महाराष्ट्र में रज़ा अकादमी और तहफ़ुज़ नमूस-ए-रिसालत बोर्ड व प्रकाश अंबेडकर के नेतृत्व वाले वंचित बहुजन अघाड़ी (VBA) ने महाराष्ट्र सरकार पर ‘पैगंबर मुहम्मद बिल’ लाने के लिए दवाब बनाने की कोशिश की है। ताकि पैगंबर मुहम्मद समेत दूसरे धर्मों के प्रतीकों के खिलाफ ईशनिंदा कानून लाया जा सके।

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस बिल के ड्राफ्ट को तैयार कर लिया गया है। इस बिल को ‘पैगंबर मुहम्मद बिल’ के रूप प्रमोट किया जा रहा है। इसका टाइटल ‘पैगंबर मुहम्मद और अन्य धार्मिक प्रमुखों की निंदा अधिनियम, 2021’ या ‘अभद्र भाषा (रोकथाम) अधिनियम, 2021’ रखा गया है।

महाराष्ट्र में अपना दबदबा रखने वाले मुस्लिम संगठन रज़ा अकादमी ने एक तरह से चेतावनी दी है कि ‘तहफ़ुज़ ए नमूस ए रिसालत’ विधेयक विधानसभा में पारित किया जाए। अन्यथा वो देशव्यापी विरोध प्रदर्शन करेंगे।

वहीं ऑल इंडिया सुन्नी जमीयतुल उलेमा के अध्यक्ष मौलाना मोइन अशरफ कादरी (मोइन मियाँ) ने कहा, “यह हमारा सुझाव है, लेकिन सरकार इस बिल को जो नाम देना चाहे दे सकती है। हमारी माँग है कि हमारे पवित्र पैगंबर और सभी देवी-देवताओं और धर्मगुरुओं की निंदा, उपहास और अपमान को रोकने के लिए कड़ा कानून होना चाहिए। साम्प्रदायिक लड़ाइयाँ इसलिए हो रही हैं क्योंकि हमारा मौजूदा कानून उपद्रवियों को रोक पाने में असफल है।”

संविधान की धारा 295 (A) और ‘रंगीला रसूल’ का केस

भारत में ईशनिंदा से जुड़ा कोई कानून नहीं है। लेकिन, भारतीय दंड संहिता में एक कानून ऐसा है जो जानबूझकर किसी की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वालों के खिलाफ जेल और जुर्माने का प्रावधान करता है। आईपीसी की धारा 295 (A) के तहत अगर आरोपित ने ‘जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण इरादे से’ किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई है तो उसे जुर्माने के साथ 3 साल तक की सजा हो सकती है।

इंडियन पीनल कोड की धारा 295 (A) का मामला बहुत ही दिलचस्प रहा है। इसकी शुरुआत वर्ष 1923 में गुलाम भारत में हुई थी। उस दौरान कट्टरपंथी मुस्लिमों ने भगवान श्री कृष्ण समेत दूसरे देवी देवताओं को लेकर अपमानजनक और अश्लील भाषा का इस्तेमाल करते हुए ‘कृष्ण तेरी गीता जलानी पड़ेगी’ और ‘यूनिसेवी सादी का महर्षि’ नाम की दो अत्यधिक विवादित पुस्तकें प्रकाशित की। पहले में भगवान श्री कृष्ण तो दूसरे में आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती को लेकर बहुत ही अपमानजनक टिप्पणी की गई थी। खास बात ये है कि इस पुस्तक को एक अहमदी मुस्लिम ने लिखा था। उस समय तक धारा 295(A) अस्तित्व में नहीं था।

मुस्लिमों की इस हरकत के जवाब में महाशय राजपाल के करीबी दोस्त पंडित चामुपति लाल ने इस्लामिक पैगंबर मोहम्मद की एक छोटी सी जीवनी लिखी। ‘रंगीला रसूल’ के शीर्षक वाला यह छोटा पैम्फलेट पैगंबर मोहम्मद के जीवन पर एक व्यंग्यपूर्ण कहानी थी। इसकी संवेदनशीलता को देखते हुए पंडित चामुपति ने महाशय राजपाल से वादा लिया कि वह कभी भी इसके लेखक के नाम को उजागर नहीं करेंगे।

यह पैम्फलेट ऐतिहासिक रूप से हदीसों के इतिहास पर आधारित था और पूरी तरह से सटीक था। लेकिन इससे लाहौर के मुस्लिम पूरी तरह से आक्रोशित हो उठे। यह ऐसा मामला था कि लोगों ने इसे हाथों-हाथ लिया और इसका पहला संस्करण बहुत ही जल्द बिक गया। इसके प्रकाशित होने के करीब एक महीने के बाद जून 1924 में महात्मा गाँधी ने अपने साप्ताहिक ‘यंग इंडिया’ जर्नल में इसकी कड़ी निंदा करते हुए कहा था कि यह राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है।

इस मामले में लाहौर उच्च न्यायालय ने एक फैसले में कहा था कि यह लेख मुस्लिम समुदाय को ‘आक्रोशित’ करने वाला था। कानूनी तौर पर इसका अभियोजन इसलिए संभव नहीं है, क्योंकि धारा 153 (A) के तहत लेखन विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच दुश्मनी या नफरत का कारण नहीं बन सकता। कोर्ट के फैसले के बाद मुस्लिमों के आक्रोश ने तत्कालीन शाषकों को कानून बदलने और धारा 295 (A) लागू करने के लिए मजबूर कर दिया था।

घटना के बाद 6 सितंबर, 1929 को इल्म उद दीन नाम के एक 19 वर्षीय मुस्लिम बढ़ई ने अपनी दुकान के बाहरी बरामदे में बैठे हुए महाशय राजपाल की छाती पर आठ बार हमला किया। चोट लगने से महाशय राजपाल की मौत हो गई।

सबसे खास बात यह थी कि इल्म उद दीन खुद अनपढ़ था और उसने अपने जीवन में रंगीला रसूल या कोई दूसरी किताब नहीं पढ़ी थी। बावजूद इसके मुस्लिम संगठनों और मौलानाओं ने उसके अंदर इतनी नफरत भर दिया था कि उसने महाशय राजपाल की हत्या कर दी। उसे लगा कि राजपाल ने ‘ईशनिंदा’ की है।

जब इल्म उद दीन को हत्या का दोषी ठहराया गया था तो उर्दू कवि इकबाल और जिन्ना ने हत्या जैसे जघन्य अपराध को एक शानदार धार्मिक कार्य बताते हुए उसकी सराहना की थी।

हत्यारे इल्म उद दीन को धार्मिक नायक बताते हुए ‘गाजी’ के रूप में उसका महिमामंडन किया गया। पाकिस्तान में उसकी एक मजार भी है। मजार में वार्षिक उर्स आयोजित किया जाता है। वहाँ पर मुस्लिम ‘गाजी इल्म उद दीन’ को श्रद्धाँजलि देते हैं।

ध्यान देने वाली बात यह है कि ईशनिंदा कानून नहीं होने के बावजूद कट्टर मुस्लिमों को पैगंबर के कथित ‘अपमान’ के बदले के तौर पर हत्या और आगजनी करने से रोका नहीं गया। कई साल पहले पैगम्बर मुहम्मद को लेकर दिए गए बयान के बदले के तौर वर्ष 2019 में हिंदू महासभा के पूर्व नेता कमलेश तिवारी के घर में घुसकर कट्टरपंथी मुस्लिमों ने उनकी बेरहमी से हत्या कर दी थी।

वर्ष 2020 में एक विधायक के रिश्तेदार ने कथित तौर पर मोहम्मद पैगंबर पर फेसबुक में टिप्पणी कर दी थी, जिसके बाद हिंसक भीड़ ने दो पुलिस स्टेशनों को आग लगा दी। इसी तरह से 2015 में फ्रेंच मैगजीन शार्ली हेब्दो के ऑफिस में घुसकर 12 लोगों की हत्या कर दी गई थी।

दिल्ली HC ने वामपंथी मीडिया पोर्टलों द वायर, क्विंट, ऑल्टन्यूज को अंतरिम राहत देने से किया इनकार, नए IT नियमों को दी थी चुनौती

दिल्ली हाई कोर्ट ने आज (जुलाई 7, 2021) वामपंथी न्यूज पोर्टल द वायर, द क्विंट और फैक्ट चैकिंग वेबसाइट ऑल्टन्यूज को अंतरिम राहत देने से मना कर दिया। इन वेबसाइटों ने नए आईटी नियमों के पालन के लिए जारी हुए नोटिस और अपने ऊपर एक्शन के डर से याचिका दायर की थी।

कोर्ट में वेबसाइटों की ओर से नए आईटी नियमों को चुनौती देते हुए कहा गया था कि उन्हें नियमों के पालन के लिए नया नोटिस जारी किया गया है या फिर उन्हें जबरन कार्रवाई के लिए तैयार रहने को कहा गया है।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में चीफ जस्टिस डीएन पटेल और जस्टिस ज्योति सिंह की पीठ ने सुनवाई की। उन्होंने इन पोर्टल्स को अंतरिम राहत देने से इंकार करते हुए केंद्र सरकार से जवाब माँगा। साथ ही मामले को 20 अगस्त तक के लिए टाल दिया।

बता दें कि नए नियमों से अंतरिम राहत के लिए हालिया आवेदन Pravda फाउंडेशन द्वारा दायर किया गया था, जो कि AltNews की मूल कंपनी है। इस मामले की जब सुनवाई हुई तो अवकाशकालीन पीठ ने अंतरिम राहत के लिए फाउंडेशन के आवेदन को नियमित पीठ के समक्ष 7 जुलाई को सूचीबद्ध करने का फैसला किया। जिसके बाद आज इस पर सुनवाई हुई।

याचिका में आईटी नियमों को अनुच्छेद 19(1), 19(1)(g), 14 और 21 का उल्लंघन बताकर चुनौती दी गई थी। न्यूज साइटों का कहना था कि नए आईटी नियम सरकार को उनपर निगरानी रखने की मंजूरी देते हैं जो कि मूल सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 के दायरे से बाहर में आता है।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले केंद्र सरकार की ओर से भी देश के अलग-अलग हाई कोर्ट्स में नए आईटी नियमों को चुनौती देने वाली याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर करने की माँग की गई है। ये याचिकाएँ दिल्ली और मद्रास हाई कोर्ट समेत देश के कई न्यायालयों में पेडिंग हैं।

हिंदू युवती ने घरवालों से लड़कर की आरिफ से शादी, 3 माह बाद अधजली अवस्था में हाईवे पर मिली

उत्तर प्रदेश के जालौन जिले में हाईवे से हिंदू युवती को जलाकर फेंकने की घटना प्रकाश में आई है। युवती ने 3 महीने पहले ही एक मुस्लिम समुदाय के लड़के से भागकर शादी की थी। पीड़िता की स्थिति को नाजुक देखते हुए उसे मेडिकल कॉलेज झाँसी में भर्ती कराया गया। पुलिस अब युवती के फरार पति आरिफ की तलाश में जुटी है।

घटना मंगलवार (6 जुलाई, 2021) दोपहर को सामने आई। जब 23 साल की युवती बुरी तरह जलने के बाद कानपुर-झाँसी हाईवे के ग्राम अजनारा के पास राधे ढाबा के सामने बेसहारा अवस्था में पड़ी सिसक रही थी। ढाबे के मालिक भानु राजपूत ने युवती की हालत देखकर फौरन इसकी जानकारी पुलिस को दी, जिसके बाद युवती को अस्पताल लाया गया, जहाँ पता चला पीड़िता 30 फीसद झुलस चुकी है।

ढाबे के आसपास के दुकानदारों का कहना है कि युवती करीब डेढ़ से 2 घंटे तक सड़क किनारे पड़ी तड़प रही थी। पुलिस के आने के बाद ही लोग भी उसे उठाने आगे आए। घटना की बाबत एएसपी ने बताया कि किस वजह से युवती को जलाया गया है, इसकी पूरी जानकारी आगे की पड़ताल के बाद ही सामने आ सकेगी।

वहीं, पुलिस को दिए बयान में लड़की ने खुद को झाँसी के पूंछ थानाक्षेत्र के ग्राम सेसा का बताया है। शिकायत में उसने अपने पति आरिफ का नाम लेते हुए कहा कि उसने आरिफ से प्रेम विवाह किया था। शादी के 1 माह बाद से ही आरोपित युवक उसको तमाम यातनाएँ देता था और विवाह के 3 माह बाद तो उसने उसे जला ही दिया।

पीड़िता का बयान दर्ज करने के बाद पुलिस ने उसके परिजनों को मामले में सूचित कर दिया है। सीओ सिटी का कहना है कि वह मामले में गहनता से पड़ताल कर रहे है। युवती ने अपने बयान में जिस आरिफ का नाम लिया है, उसकी तलाश की जा रही है।

पीड़िता के मुताबिक उसने घरवालों के खिलाफ जाकर उरई के बजरिया निवासी आरिफ खान के साथ कोर्ट मैरिज की थी। उस दौरान उसके पिता ने अपहरण और एससी-एसटी एक्ट के तहत मुकदमा कराया था लेकिन लड़की ने बयान दिया था कि उसने अपनी मर्जी से शादी की है जिसके बाद मुकदमा समाप्त हो गया।

पुलिस के अनुसार, युवक राजस्थान में कुछ काम करता है, पीड़िता भी उसके साथ वहीं रहती थी। हाल में आरिफ ने उसे जलाया और हाईवे पर फेंक दिया। गंभीर हालत के कारण वह पुलिस के सामने ज्यादा कुछ नहीं बोल पाई। लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार लोग इस मामले को धर्मांतरण से भी जोड़ कर देख रहे हैं। माना जा रहा है कि आरिफ ने महिला पर धर्म परिवर्तन का दबाव डाला और मना करने पर उसे जला दिया।