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डंडा क्यों नहीं करती मोदी सरकार? सोशल मीडिया के तानों से अलग हकीकत, अब डूबे या उबरे ट्विटर के हाथ

भारत सरकार के साथ ट्विटर इंडिया के मतभेद ख़त्म नहीं हो रहे। मतभेद अलग-अलग रूप में लगातार सामने आ रहे हैं। उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू के अकाउंट से ब्लू टिक हटाने से शुरू हुआ खेल केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद का अकाउंट लॉक करने तक पहुँच गया है।

बीच में और बहुत सी घटनाएँ हुईं जिन्हें सबने देखा है। ट्विटर द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के पदाधिकारियों के अकाउंट से भी ब्लू टिक हटाया गया। हालाँकि शिकायत के बाद ट्विटर द्वारा उसे बहाल कर दिया गया। पर इस घटना ने हमें ट्विटर की मानसिकता में झाँकने का एक मौका दिया। इसके अलावा हमने देखा कि कैसे भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रवक्ता संबित पात्रा के ट्ववीट को ट्विटर ने किस तरह से चिन्हित किया और उसे लेकर क्या विवाद हुए। दिल्ली पुलिस द्वारा ट्विटर इंडिया को दिए गए नोटिस का उत्तर भी संतोषजनक नहीं दिखाई दिया।

सरकार द्वारा लाया गया सूचना प्रौद्योगिकी का नया कानून और नियमों के पालन और उससे सम्बंधित विवाद न्यायालय तक पहुँच चुका है। न्यायालय के आदेश पर ट्विटर इंडिया की प्रतिक्रिया हम सबने देखी। नए कानून के तहत ट्विटर इंटरमीडियरी का अपना दर्जा पहले ही खो चुका है। हाल ही में ग़ाजियाबाद केस में कुछ लोगों द्वारा फैलाए गए फेक न्यूज़ और फेक वीडियो को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ट्विटर इंडिया पर किए गए एफआईआर पर भी ट्विटर का जवाब संतोषप्रद नहीं रहा है। केंद्र सरकार के हर संवाद पर उसका अभी तक का रवैया ढुलमुल रहा है।

एक तरफ कंपनी दिल्ली हाई कोर्ट को बताती है कि वह भारत के नए कानून और नियमों का पालन करने के लिए तैयार और दूसरी तरफ यह भी कहती है कि वह सरकार से बातचीत कर रही है। ट्विटर की ये बातें विरोधाभासी हैं। प्रश्न यह उठता है कि किसी देश के कानून पर कोई व्यक्ति या संस्था सरकार से क्या बात करेगी? यहाँ प्रश्न कानून मानने या न मानने का है न कि कानून और उससे सम्बंधित नियमों को लेकर बातचीत करने का। यदि सरकार केवल ट्विटर के लिए भी कोई कानून बनाती तब भी बातचीत के लिए कोई जगह नहीं रहती।

ट्विटर इंडिया और उसके पदाधिकारियों का रवैया न केवल भारत सरकार बल्कि ट्विटर पर उपस्थित आम भारतीय को भी भ्रमित करने वाला दिखाई देता है। यह समझ में नहीं आता कि कंपनी बार-बार अपने बयान क्यों बदल रही है? ‘हम भारतीय कानूनों का पालन करेंगे’ से शुरू होकर ‘हम अमेरिका में बनी कंपनी की नीति के अनुसार ही चलेंगे’ तक पहुँचने में ट्विटर को किसी तरह का विरोधाभास नजर क्यों नहीं आ रहा?

ट्विटर इंडिया के पदाधिकारियों के लिए यह समझना क्या सचमुच मुश्किल है कि वे समय-समय पर क्या कह रहे हैं? ऐसा प्रतीत होता है जैसे कंपनी और उसके पदाधिकारियों के अभी तक के आचरण का मूल इस बात में है कि इधर-उधर की बातें करके सरकार से समय लेना चाहिए। प्रश्न यह उठता है कि एक इतनी बड़ी वैश्विक कंपनी और उसके पदाधिकारी क्या सचमुच इसे समाधान मानते हैं? आखिर ऐसा क्यों है कि सब कुछ समझते हुए भी वे ऐसा कर रहे हैं? उनके मैनेजिंग डायरेक्टर को क्या सचमुच लगता है कि उनके अपने ट्विटर बॉयो से मैनेजिंग डायरेक्टर हटा देना इन विवादों का समाधान हो सकता है? या उन्हें यह लगता है कि पद से हट जाना उन्हें उनकी जिम्मेदारियों से मुक्त कर देगा? मैनेजिंग डायरेक्टर द्वारा यह सब करने के बाद अब खबर यह है कि ट्विटर इंडिया के ग्रीवांस रेड्रेसल ऑफिसर ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है।

ऐसा क्यों है कि इतने बड़े-बड़े कॉर्पोरेट लीडर को ये हरकतें बचकानी नहीं लगती? नए कानूनों के पालन की बात पर ट्विटर पहले ही फ्रीडम ऑफ स्पीच वाला हथकंडा अपनाने का प्रयास कर चुका है जो कानून के पालन को लेकर न्यायालय द्वारा की टिप्पणी की वजह से चल नहीं पाया। यह समझना भी मुश्किल नहीं कि ट्विटर इंडिया और उसके पदाधिकारी सरकार से ‘डील’ करने के ये टेम्पलेट दरअसल हमारी मेनस्ट्रीम मीडिया से उधार ले रहे हैं। उनके फ्रीडम ऑफ स्पीच की रक्षा करने के दावे पर मुझे याद आया कि कैसे एक न्यूज़ चैनल ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) और आयकर विभाग द्वारा चैनल के फिनान्सेस की जाँच के बाद फ्रीडम ऑफ स्पीच को तथाकथित तौर पर कुचले जाने का मुद्दा उठाया था। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि ट्विटर इंडिया भी पहले से आजमाया गया एक घिसा-पिटा तरीका अपना रहा है।

ट्विटर का अभी तक का व्यवहार इस प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करने वाले एक आम भारतीय को यह सोचने पर विवश करता है कि आखिर ट्विटर की मंशा क्या है? अमेरिकी चुनाव में ट्विटर की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। अमेरिका की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने के आरोप ट्विटर पर लगते रहे हैं। भारत में ट्विटर इंडिया के पदाधिकारियों पर भी पारदर्शिता की कमी का आरोप लगता रहा है। भारत में अभी तक ट्विटर को हेड करने वाले जितने लोग रहे हैं उनपर हमेशा किसी न किसी तरह का आरोप लगता रहा है।

विचारधारा को लेकर इन पदाधिकारियों का आचरण भी किसी से छिपा नहीं है। अपने पहले भारत दौरे पर जैक डॉर्सी ने क्या विवाद किया था वह लोग अभी तक भूले नहीं हैं। ऐसे में ट्विटर इस्तेमाल करने वाला एक आम भारतीय उसे संशय की निगाह से देखता है तो उसकी क्या गलती है? यदि सरकार को यह शंका रहती है कि यह प्लेटफॉर्म अमेरिका की ही तरह भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में किसी तरह का हस्तक्षेप कर सकती है तो इसमें सरकार की क्या गलती है?

अब प्रश्न यह उठता है कि इस गतिरोध का समाधान क्या है? भारत में ट्विटर इस्तेमाल करने वालों की बड़ी संख्या है। सरकारी और निजी सूचना के आदान-प्रदान में एक माध्यम के तौर पर ट्विटर की बड़ी भूमिका रही है, इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। पर क्या केवल इस बात को आगे रखकर ट्विटर भारतीय कानूनों का पालन न करने का खतरा उठा सकता है? शायद नहीं। ट्विटर को एक जिम्मेदार माध्यम और कंपनी की तरह आचरण करना ही होगा। भारतीय सरकार से हम किसी अन्य छोटे देश की सरकार जैसा आचरण की आशा नहीं रख सकते। अभी तक भारत सरकार का ट्विटर के प्रति रवैया एक जिम्मेदार सरकार का रहा है। ऐसे में ट्विटर को अपने आचरण पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। 

केंद्र सरकार और उसके मंत्रियों को आए दिन ताने सुनने पड़ते हैं। समर्थकों को इस बात की शिकायत है कि सरकार ट्विटर के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। पर उन्हें यह समझने की आवश्यकता है कि किसी सरकारी कार्रवाई की बात तक आएगी जब ट्विटर भारतीय कानून या नियमों का पालन करने से मना कर देगा। न्यायालय को दिया गया ट्विटर का आधिकारिक बयान यही रहा है कि वह भारतीय कानूनों का पालन करने के लिए तैयार है। ऐसे में वह अपने किसी नियम का हवाला देकर एक मंत्री के ट्विटर अकाउंट के साथ क्या करता है, वह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना न्यायालय को दिया गया उसका बयान। वैसे भी जब मामला न्यायालय में है तब एक जिम्मेदार सरकार का न्यायिक प्रक्रिया के तहत न्यायालय की कार्रवाई का इंतज़ार ही तर्कसंगत है।

14वीं सदी का प्राचीन शिव मंदिर जो जलमग्न हो गया था दशकों पहले, आया बाहर: पूजा के लिए भक्तों का ताँता

ओडिशा के मलकानगिरि जिले के दमगुडा गाँव में 60 साल तक पानी में डूबे रहने के बाद प्राचीन शिव मंदिर पानी के बाहर आ गया है। करीब 14वीं सदी के दौरान बना यह मंदिर स्वाभिमान अंचल के चित्रकोंडा क्षेत्र में आता है। मंदिर का निर्माण शैव सम्प्रदाय के दौरान किया गया था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सन 1961 में बालीमेला बाँध परियोजना का निर्माण कार्य चल रहा था, जिसके कारण यह मंदिर जलमग्न हो गया था। करीब 6 दशक बीतने के बाद जलाशय का जलस्तर घटने से यह फिर से ऊपर आ गया है। यहाँ पर प्राचीन शिव मंदिर के अलावा भी हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों को खोजा गया है।

प्राचीन मंदिर के बारे में इतिहासकार देबाशीष पात्रा ने बताया कि इसका निर्माण 14वीं सदी के अंत में मट्टमयूर संप्रदाय के दौरान किया गया था। बाँध के अधिकारियों ने इस रिजर्वायर को खाली करवाया है, जिससे यह मंदिर दोबारा से सामने आ गया है।

जिस वक्त मंदिर का निर्माण किया गया था, उस दौरान राज्य में शैव सम्प्रदाय की लहर चल रही थी। उस दौरान प्रदेश में भगवान शिव के कई मंदिरों का निर्माण कराया गया था। इस प्राचीन शिव मंदिर को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि जयपोर मलिक मर्दन सिंह देव ने अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार करने के लिए इस मंदिर का निर्माण करवाया था।

राज्य की दूसरी सबसे बड़ी संरचना

इस प्राचीन शिव मंदिर को राज्य की दूसरी सबसे विशाल संरचना माना जा रहा है। कुछ इतिहासकारों का यह भी मानना है कि उदादी क्षेत्र में मंदिर का निर्माण नंदापुर के शासकों ने 15वीं सदी में करवाया था। कथित तौर पर श्री चैतन्य ने भी साल 1510 में चित्रकोंडा का दौरा किया था।

मंदिर के बारे में जानकारी देते हुए एक ग्रामीण जगन्नाथ हंटल ने बताया, “छह दशकों से अधिक समय तक पानी के भीतर रहने के बाद भगवान गणेश और ‘पक्षीराज गरुड़’ की पाँच फीट की मूर्ति के साथ मंदिर सामने आ गया है। इससे इस क्षेत्र का प्राचीन इतिहास सामने आ गया है। हमारे पूर्वज हमें बताते थे कि दमगुडा में एक मंदिर था, जिसे राजाओं ने बनवाया था। मंदिर का पानी से बाहर आना इस बात की ओर संकेत है कि इस क्षेत्र के निवासियों के लिए अच्छा समय आ गया है।”

वहीं चित्रकोंडा के तहसीलदार टी पद्मनाव डोरा ने मंदिर को लेकर कहा कि वो इसके बारे में संस्कृति विभाग से संपर्क कर मंदिर और मूर्तियों को बचाने का आग्रह करेंगे। इस बीच मंदिर में पूजा के लिए भक्तों का ताँता लगने लगा है।

पढ़ा-लिखा राज्य है केरल, इसलिए ISIS की भर्ती का केंद्र: DGP ने कहा- आतंकियों को भी डॉक्टर-इंजीनियर की जरूरत

केरल के पुलिस महानिदेशक (DGP) लोकनाथ बेहरा ने स्वीकार किया है कि राज्य के कई युवा आतंकी संगठनों में शामिल हुए हैं। उन्होंने कहा कि केरल में आतंकियों ने अपने संगठनों में भर्ती के लिए जमीन तैयार कर ली है। उन्होंने कहा कि कट्टरपंथ केरल में एक बड़ी समस्या है और इससे निपटने के लिए पुलिस तरह-तरह के प्रयास कर रही है। DGP लोकनाथ बेहरा बुधवार (जून 30, 2021) को रिटायर होने वाले हैं।

उन्होंने इससे पहले टीवी चैनलों के साथ एक कार्यक्रम में भाग लेते हुए स्वीकार किया कि केरल में ISIS का प्रभाव बढ़ना चिंता का विषय है। कट्टरपंथियों को इसमें भर्ती किया जा रहा है। हालाँकि, उन्होंने ये भी दावा किया कि अब ये प्रक्रिया धीमी हुई है। उन्होंने कहा कि ISIS केरल के लोगों को अपने संगठन में इसीलिए भर्ती करना चाहता है, क्योंकि ये एक उच्च-शिक्षित राज्य है और आतंकी संगठनों को इंजीनियरों-डॉक्टरों की भी जरूरत है।

उन्होंने बताया कि ख़ुफ़िया सूत्रों के हवाले से पुलिस को ये जानकारी मिली है। बकौल लोकनाथ बेहरा, केरल पुलिस ने व्यवस्थित तरीके से इससे निपटने के लिए कार्य किया है। उन्होंने बताया कि केरल के ‘आतंकवाद निरोधी दस्ता (ATS)’ ने ऐसे लोगों को चिह्नित कर उनके परिजनों की सहायता से उनकी काउंसलिंग कराई, जिनके आतंकी संगठनों में शामिल होने की संभावना थी। उन्होंने बताया कि 21 परिवारों के ISIS के नियंत्रण वाले इलाकों में जाने की खबर के बाद सतर्क केरल पुलिस ने अच्छा काम किया है।

उन्होंने दावा किया कि केरल ने देश के सबसे बेहतरीन ATS में से एक का गठन किया है और वो पर्दे के पीछे से अच्छा कार्य कर रही है। उन्होंने कहा कि ज्यादा चिंता की बात तो नहीं है, लेकिन हम शांत भी नहीं रह सकते। केरल के DGP लोकनाथ बेहरा ने कहा कि वामपंथी आतंकियों के लिए आत्मसमर्पण की नीति लाई गई थी, लेकिन ये विफल हो गई है। नक्सलियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए ने आधुनिक हलिकॉप्टरों की खरीद के लिए ग्लोबल टेन्डर जारी किया गया है।

उन्होंने कहा कि आतंकवादी गतिविधियों के लिए UAPA लगाने में भी पुलिस को नहीं हिचकना चाहिए, क्योंकि क्योंकि ये एक संसद से पारित कानून है और कार्यपालिका को इसका पालन करना है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के साथ उनके रिश्ते एकदम ‘प्रोफेशनल’ हैं। उन्होंने इस आरोप से भी किनारा किया कि वो राज्य में सत्ताधारी CPM और भाजपा के बीच पुल के रूप में कार्य करते हैं।

उन्होंने कहा कि केरल के सीएम के साथ उन्होंने 5 वर्षों तक काम किया है और उनके साथ प्रोफेशनल रिश्ते हैं। उन्होंने कहा कि सीएम हमेशा राज्य की कानून-व्यवस्था की फ़िक्र करते हैं और प्रोफेशनल मुद्दों पर ही दोनों में बात होती है। सोना तस्करी मामले पर उन्होंने कहा कि केंद्रीय एजेंसियाँ जाँच कर रही हैं और राज्य पुलिस उनका सहयोग कर रही है। हालाँकि, वो CBI चीफ का पद न मिलने पर नाराज भी दिखे।

गुजरात की 15 साल की लड़की का UP में धर्मांतरण: नाम मिला- मासूम बेगम, सलीम से निकाह; 3 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश की फिरोजाबाद पुलिस ने रविवार (27 जून 2021) को 15 साल की एक लड़की से रेप और धर्मांतरण के आरोप में तीन लोगों को गिरफ्तार किया। पीड़िता गुजरात की रहने वाली है। आरोपितों को गिरफ्तार कर पुलिस ने लड़की की भी बरामदगी कर ली है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार रामगढ़ थाना क्षेत्र का सलीम गुजरात के भरूच स्थित एक फैक्टरी में काम करता है। फैक्टरी के पास ही पीड़िता के पिता का कैंटीन था, जहाँ वह आता-जाता रहता था। पीड़िता का इलाज कराने का झाँसा देकर वह बाप-बेटी को 6 जून को फिरोजाबाद ले आया और अपने घर पर ही उनको रखा।

दो दिन बाद लड़की लापता हो गई। उसकी कोई खबर नहीं मिलने पर पिता गुजरात लौट गए और पुलिस को मामले की जानकारी दी। इसके बाद वे लौटकर दोबारा आए और फिरोजाबाद पुलिस को घटना के बारे में बताया।

इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए 21 वर्षीय सलीम, उसके पिता अब्दुल गफ्फार और उसके जीजा रहमान को गिरफ्तार कर नाबालिग को बरामद कर लिया। तीनों के खिलाफ उत्तर प्रदेश धर्मान्तरण कानून समेत अन्य धाराओं के तहत कार्रवाई की गई है। पिता और बहनोई के साथ मिलकर उसने नाबालिग लड़की का धर्मान्तरण कराया। उसे नया नाम मासूम बेगम दिया। निकाह कर लिया।

एसएसपी अशोक कुमार ने बताया, “आरोपित सलीम भरूच में मजदूर के तौर पर काम करता है और लड़की के पिता की कैंटीन का रेगुलर कस्टमर था। इसी दौरान उसकी मुलाकात लड़की से हुई। सलीम लड़की से झूठ बोलकर उसे फिरोजाबाद अपने रिश्तेदार के यहाँ ले आया। यहाँ अपने पिता अब्दुल गफ्फार और जीजा के साथ मिलकर लड़की पर इस्लाम कबूलने और निकाह करने का दवाब डाला।” लड़की के पिता की तहरीर के आधार पर तीन आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है।

नाबालिग का जबरन धर्म परिवर्तन कराने और उससे निकाह करने के मामले में पुलिस ने आईपीसी की धारा 363 (अपहरण की सजा), 366 (अपहरण व महिला को शादी के मजबूर करना), 368 (अवैध तरीके से बंधक बनाना), 376 (रेप) के तहत केस दर्ज किया गया है। इसके अलावा आरोपितों के खिलाफ POCSO एक्ट के सेक्सन 3/4 और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्मान्तरण कानून -2020 के सेक्सन 3/5(1) के तहत कार्रवाई की गई है।

मामले में एसएचओ अनूप कुमार तिवारी ने कहा, “विक्टिम ने अपने बयान में जबरन धर्मान्तरण और यौन शोषण को कन्फर्म किया है। उसे मेडिकल जाँच के लिए भेजा गया है। जल्द ही पीड़ित को कोर्ट में पेश किया जाएगा। हम इस मामले की जाँच कर रहे हैं कि कहीं तीनों आरोपित किसी गिरोह का हिस्सा तो नहीं हैं।”

स्कूल में उर्दू-अरबी पढ़ने का दबाव, NCPCR ने तलब की रिपोर्ट: हरिश्चंद्र बना हसमत अली, सलीम की ड्राइवरी करते विजय भी बना मुस्लिम

उत्तर प्रदेश के ‘आतंकवाद निरोधी दस्ता (ATS)’ द्वारा गिरफ्तार किए गए दोनों मौलानाओं के नेटवर्क का एक-एक कर खुलासा तो हो ही रहा है, साथ ही ऐसे लोग भी सामने आ रहे हैं जिन्हें इस इस्लामी धर्मांतरण गिरोह ने अपने शिकार बनाया था। फतेहपुर के नूरुल हुदा इंग्लिश स्कूल इस्लामी धर्मांतरण की गतिविधियों के केंद्र के रूप में सामने आया है, जिसके बाद स्थानीय प्रशासन ने इसकी जाँच भी की।

स्कूल में उर्दू-अरबी पढ़ने के लिए बनाया जाता था दबाव?

रविवार (जून 27, 2021) को अधिकारियों ने इसकी जाँच की। राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग (NCPCR) ने तीन दिन के भीतर इस स्कूल को लेकर रिपोर्ट माँगी है। टीम -शिक्षिकाओं, छात्र-छात्राओं और व अभिभावकों को बुला कर लगभग 50 लोगों के बयान दर्ज कराए। साथ ही पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफ़ी भी कराई गई। CCTV फुटेज कब्जे में ले ली गई है, लेकिन हैरान करने वाली बात ये है कि उसमें से प्रार्थना सभा स्थल और कक्षा की फुटेज गायब है।

दरअसल, मौलाना मोहम्मद उमर गौतम और उसके साथी जहाँगीर की गिरफ़्तारी के बाद इस स्कूल की एक पूर्व शिक्षिका कल्पना सिंह ने प्रशासन से शिकायत की थी कि यहाँ बच्चों पर उर्दू-अरबी जबरन पढ़ने का दबाव बनाया जाता है और उन्हें इस्लामी धर्मांतरण के लिए प्रेरित किया जाता है। NCPCR के स्वतः संज्ञान लेने और रिपोर्ट तलब करने के बाद अधिकारीगण साढ़े 3 घंटों तक स्कूल में रहे और जाँच-पड़ताल की।

इस दौरान प्रधानाचार्य, आठ शिक्षक-शिक्षिकाओं और हिंदू बच्चों-अभिभावकों के बयान दर्ज किए गए। ‘दैनिक जागरण’ की खबर के अनुसार, अभी तक धर्मांतरण वाली कोई बात सामने नहीं आई है। आगे जाँच के बाद नए तथ्य सामने आ सकते हैं।

8 साल पहले हरिश्चंद्र बन गया था हसमत अली

उधर इसी शहर के पृथ्वीपुरम इलाके में 8 साल पहले हरिश्चंद्र नाम का एक व्यक्ति इस्लाम अपना कर हसमत अली बन गया था। ATS को स्थानीय लोगों ने भेजी जानकारी में बताया है कि विरोध होने पर वो पठान मोहल्ले में रखने लगा था।

वह भी एक स्कूल के माध्यम से ही मौलाना मोहम्मद उमर गौतम के संपर्क में आया था। हरिश्चंद्र के भाई राम सिंह ने जानकारी दी है कि परिवार को अब उससे कोई मतलब नहीं है। राजस्व के रिकॉर्ड चेक किए गए तो उसमें हरिश्चंद्र उर्फ़ हसमत लिखा हुआ है।

सलीम की ड्राइवरी करते-करते विजय ने अपनाया इस्लाम

उधर पुरमई गाँव में धर्मांतरण गिरोह के ही विजय सोनकर को जेल भेजा गया। उसकी पत्नी ने बताया कि वो 2 साल पहले रोजगार की तलाश में हल्द्वानी गया था।

वहाँ से लौटने के बाद उसके चाल-ढाल बदले-बदले से लगने लगे। रिश्तेदारों ने जब उसे समझाया तो वो सब से झगड़ा करने लगा। साथ ही वो परिजनों का भी इस्लामी धर्मांतरण कराना चाहता था और इसके लिए दबाव बना रहा था। असल में वो हल्द्वानी में रामपुर के रहने वाले सलीम के ड्राइवर के रूप में काम करता था। उसके कहने पर ही उसने धर्मांतरण किया। उसके खिलाफ यूपी के धर्मांतरण कानून और मारपीट की धाराओं में FIR दर्ज की गई है।

200 साल पहले ‘जहर’ था टमाटर, मुकदमा चला, लाल रंग भी मुसीबत: जानिए, कैसे हुई रसोईघर में एंट्री

भारत में लगभग हर सब्जी में टमाटर का इस्तेमाल किया जाता है। इसके साथ ही टमाटर का सूप, जूस और सलाद को भी बड़े चाव से खाया-पीया जाता है, लेकिन क्या आप इसका इतिहास जानते हैं? आपको जानकार हैरानी होगी कि आज हर किसी की रसोई में अपनी खास जगह बना चुके टमाटर को करीब 200 साल पहले 28 जून 1820 को यूरोप में बिना जहर वाली सब्जी घोषित किया गया था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूरोप और अमेरिका में लंबे समय तक टमाटर को जहरीला माना जाता था। इसमें ज्यादा मात्रा में लैड पाया जाता था, इसलिए इसे पॉइजन एपल निक नेम दिया गया था। 15वीं सदी से लेकर 18वीं सदी तक यानी करीब तीन सदियों तक टमाटर से लोग नफरत करते रहे, जिसके चलते पश्चिमी दुनिया में इसे ‘पापी’ फल का खिताब मिल गया था। हिस्ट्री चैनल की एक वेबसाइट पर लिखे लेख के अनुसार टमाटर शब्द यूटो-एज़्टेकन नहुआट्ल शब्द ( Uto-Aztecan Nahuatl word), ‘टोमैटल‘ से लिया गया है, जिसका अर्थ है swelling fruit।

लाल रंग के फल इंसानों के लिए सही नहीं

एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के न्यू जर्सी के सेलम में जॉन गेराड नाम के एक सर्जन थे, जो फलों की खेती भी करते थे। बताया जाता है कि उन्होंने जब पहली बार टमाटर की खेती की, तो उसमें टोमैटिन नाम का एक टॉक्सिन बेहद कम मात्रा में पाया गया है। दरअसल, टोमैटिन होने की वजह से ही टमाटर को लोग जहरीला मानते थे, लेकिन उससे किसी को नुकसान नहीं पहुँचता है। बताया जाता है कि टमाटर से नफरत करने का एक और कारण था उसका लाल रंग। उन दिनों लाल रंग के फलों को इंसानों के लिए सही नहीं माना जाता था।

28 जून 1820 को अदालत में बुलावा

इससे भी ज्यादा हैरानी वाली बात यह है कि टमाटर पर जहरीला होने का आरोप लगाकर उसके ऊपर केस तक कर दिया गया था। साल 1820 में न्यू जर्सी के सेलम के एक कोर्ट में टमाटर पर मुकदमा किया गया और उसे पेश होने के लिए कहा गया था। 28 जून, 1820 को अदालत में टमाटर को बुलाया गया था। उस दौरान हर कोई टमाटर पर जहरीले होने का आरोप लगा रहा था और उससे जवाब माँग रहा था। वहीं, एक इंसान ऐसा भी था, जिसने टमाटर का पक्ष लिया था। उसका नाम कर्नल रॉबर्ट गिबन जॉनसन था। उन्होंने अदालत में टमाटर को बेकसूर साबित किया था।

टमाटर की पेशी वाले दिन खचाखच भरी अदालत में जॉनसन अपने हाथों में एक टमाटर से भरी हुई टोकरी लेकर पहुँचे थे। हर कोई टकटकी लगाकर बस उन्हें ही देखे जा रहा था, क्योंकि सब तो टमाटर के पेश होने का इंतजार कर रहे थे। बस फिर क्या था, जॉनसन ने ना आव देखा ना ताव वह अदालत में सबके सामने एक-एक करके टमाटर खाने लगे। इस दौरान वहाँ मौजूद लोगों को लगा कि आज तो जॉनसन नहीं बचने वाला है. वह आत्महत्या करने पर उतारू है।

जहरीला नहीं, इसके कई फायदे

इस रोचक कहानी में मोड़ तब आया, जब टमाटर खाने के काफी देर बाद भी जॉनसन को कुछ नहीं हुआ। ये सब देखकर सभी लोग हैरान रह गए। जॉनसन ने उन्हें बताया कि टमाटर जहरीला नहीं है, बल्कि इसके कई फायदे हैं। इसके बाद से लोगों के मन से टमाटर का खौफ निकल गया। पश्चिमी दुनिया में टमाटर की खेती ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया और आज वहाँ लगभग हर बगीचे में आपको टमाटर दिख जाएँगे।

आपने शायद ही सोचा होगा कि टमाटर जैसे रसदार फल के जहरीला होने के पीछे ये कारण हो सकता है। खैर, अब आप इसका इतिहास जान चुके हैं, तो जमकर सब्जी में टमाटर का इस्तेमाल किजिए, सलाद खाइए। इससे ना केवल आपके खाने का स्वाद बढ़ेगा, बल्कि टमाटर का जूस आपके इम्यून सिस्टम को मजबूत करने में मदद करेगा। साथ ही आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होगी, जिससे आपका शरीर किसी भी वायरस या बीमारी से लड़ने में सक्षम होगा।

धर्मेंद्र चतुर का इस्तीफा, कैलिफोर्निया के जेरेमी केसल को ट्विटर ने बनाया ग्रीवेंस ऑफिसर

नए आईटी नियमों को लेकर केंद्र सरकार के साथ जारी खींचतान के बीच माइक्रोब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म ट्विटर (Twitter) के भारत में नियुक्त किए गए अंतरिम शिकायत अधिकारी धर्मेंद्र चतुर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उनकी हाल ही में इस पद पर नियुक्ति की गई थी। चतुर के बाद अब ट्विटर ने कैलिफोर्निया के रहने वाले जेरेमी केसल के भारत में नया शिकायत अधिकारी नियुक्त किया है।

जेरेमी केसल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के ‘ग्लोबल लीगल पॉलिसी’ डायरेक्टर हैं। दरअसल, देश के नए आईटी रूल-2021 के अनुसार भारतीय यूजर्स की शिकायतों पर कार्रवाई के लिए सोशल मीडिया कंपनियों में शिकायत अधिकारी की नियुक्ति जरूरी है। धर्मेंद्र चतुर की इस पद पर नियुक्ति नए आईटी नियमों के तहत ही की गई थी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्विटर ने फिलहाल इस मामले में किसी भी तरह का बयान देने से इनकार कर दिया है। इसके साथ ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से चतुर का अकाउंट भी डिलीट हो गया है। अब वहाँ पर उनका नाम नहीं है। जबकि, नए आईटी नियमों के तहत ट्विटर पर अधिकारी का नाम और पता होना आवश्यक है।

25 मई से लागू हो चुका है नया आईटी रूल

देश में 25 मई 2021 से नया आईटी रूल लागू हो चुका है। इसके बाद भी ट्विटर ने नियमों के तहत आवश्यक अधिकारियों की नियुक्ति नहीं की थी। इससे उसने डिजिटल कंपनियों को मिलने वाले संरक्षण का अधिकार खो दिया। नए नियमों के मुताबिक, 50 लाख से अधिक यूजर वाली सभी सोशल मीडिया कंपनियों के लिए शिकायतों के निपटान के लिए अधिकारी की नियुक्ति करना अनिवार्य है। इसके अलावा इन अधिकारियों के नाम, पते और कॉन्टैक्ट डिटेल्स को भी शेयर करना होगा।

नए नियमों के पालन को तैयार ट्विटर

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर ने इसी महीने 5 जून 2021 को केंद्र सरकार की नोटिस के जवाब में बताया था कि वो देश के नए आईटी नियमों का पालन करेगा। साथ ही जल्द ही मुख्य अनुपालन अधिकारी की नियुक्ति भी करेगा।

जम्मू कश्मीर में पत्नी और बेटी सहित पूर्व SPO की हत्या: घर में घुस आतंकियों ने मारी गोली, 15 दिन में तीसरी ऐसी घटना

जम्मू कश्मीर में आतंकियों ने एक पूर्व ‘स्पेशल पुलिस अधिकारी (SPO)’ के घर पर हमला बोला और पत्नी और बेटी सहित उनकी हत्या कर दी। ये घटना पुलवामा जिले के अवंतीपोरा स्थित हरिपरिगाम गाँव में हुई है। आतंकी SPO फैयाज अहमद के घर में घुस गए और उनके व उनके परिजनों पर ताबड़तोड़ गोलियाँ चलाईं। इस हमले में उन्हें, उनकी पत्नी और बेटी गंभीर रूप से घायल हो गए। अस्पताल में इलाज के दौरान तीनों की मौत हो गई।

सुरक्षा एजेंसियों ने बताया है कि पूरे क्षेत्र को घेर कर तलाशी अभियान चलाया जा रहा है। ये घटना रविवार (जून 27, 2021) को हुई। ‘टाइम्स नाउ’ की खबर के अनुसार, उनकी बेटी की भी मौत हो चुकी है।

ये घटना तब सामने आई है, जब एक दिन पहले ही जम्मू के वायुसेना स्टेशन पर ड्रोन से दो विस्फोटक उपकरण गिराए गए। ये अपनी तरह का देश में पहला आतंकी हमला था। रविवार को रात 1:37 और फिर 1:42 में इन विस्फोटक उपकरणों को गिराया गया। पास में ही एक एयरक्राफ्ट हेंगर था, जो इस विस्फोट से बच गया लेकिन स्टेशन की छत को नुकसान पहुँचा। अभी ये भी साफ़ यहीं है कि इसे ड्रोन से गिराया गया या किसी अन्य एरियल प्लेटफॉर्म से।

ये वायुसेना स्टेशन पाकिस्तान की सीमा से मात्र 14-15 किलोमीटर की ही दूरी पर स्थित है। पाकिस्तान की तरफ से अब तक सबसे ज्यादा दूरी जिस ड्रोन ने तय की थी, वो 12 किलोमीटर भीतर तक पहुँचा था। आशंका है कि इस ड्रोन को भारतीय सरजमीं से ही नियंत्रित किया जा रहा था। धमाके की आवाज़ 1 किलोमीटर के रेडियस में सुनाई दी, जिससे लोग डर गए। IAF के एक वॉरंट ऑफिसर और एक लीडिंग एयरक्राफ्ट्समैन, दो अधिकारी घायल हुए

ये दोनों बम ब्लास्ट की आवाज़ सुन कर बाहर आए थे और उन्हें मामूली चोटें आईं। इससे कुछ घंटों पहले ही जम्मू कश्मीर पुलिस ने लश्कर-ए-तैय्यबा के एक आतंकी को जम्मू किलो IED के साथ गिरफ्तार किया। जम्मू के किसी भीड़भाड़ वाले इलाके में विस्फोट की साजिश थी। ये सब तब हो रहा है, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ ही दिनों पहले जम्मू कश्मीर के कई नेताओं के साथ बैठक कर के उनकी बात सुनी।

हाल में जम्मू कश्मीर के पुलिस अधिकारियों पर हमले की ये पहली घटना नहीं है। जून 17, 2021 को राजधानी श्रीनगर में जावेद अहमद नामक पुलिसकर्मी को उनके घर में ही गोली मार दी गई थी। सैदपुरा में हुई इस घटना के बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।

वहीं जून 22, 2021 को परवेज अहमद डार नामक पुलिस इंस्पेक्टर की हत्या कर दी गई थी। वो श्रीनगर के मेनगांवजी नौगाम क्षेत्र में नमाज पढ़ने जा रहे थे, तभी उन्हें गोली मार दी गई। CCTV फुटेज से पता चला कि उनकी हत्या के लिए आतंकियों ने पिस्टल का इस्तेमाल किया था। वो अपने पीछे पत्नी के अलावा एक 13 साल की बेटी और 10 साल के बेटे को छोड़ गए। उस घटना के बाद भी क्षेत्र को घेर कर तलाशी अभियान चलाया गया था।

उज्जैन का मंगलनाथ मंदिर: जहाँ कुंडली के मंगल दोष निवारण के लिए आते हैं श्रद्धालु, होता है भात श्रृंगार

महाकाल की नगरी कही जाती है, अवन्तिका अर्थात वर्तमान समय का उज्जैन। अनंतकाल से ही उज्जैन का धार्मिक महत्व सर्वोच्च रहा है जो हिंदुओं के लिए 7 सबसे पवित्र स्थानों में से एक है। उज्जैन में कई ऐसे मंदिर स्थित हैं जिनका इतिहास सहस्त्राब्दियों पुराना है और जो पौराणिक महत्व के हैं। इनमें से एक मंदिर है, मंगलनाथ जहाँ देश से ही नहीं बल्कि विदेशों से भी लोग अपनी कुंडली के मंगल दोष के निवारण के लिए आते हैं। मोक्षदायिनी क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित इस मंदिर की विशेषता है यहाँ होने वाली ‘भात पूजा’, तो आइए आपको इस मंदिर के महत्व और प्राचीन इतिहास के बारे में बताते हैं।

पौराणिक इतिहास  

मत्स्य पुराण के अनुसार मंगलनाथ ही मंगल का जन्म स्थान माना गया है। कहा जाता है कि अंधकासुर नामक दैत्य को भगवान शिव का वरदान प्राप्त था कि उसके रक्त की बूंदों से सैकड़ों दैत्य जन्म लेंगे। इसी वरदान के चलते अंधकासुर पृथ्वी पर उत्पात मचाने लगा। इस पर सभी ने भगवान शिव से प्रार्थना की। उन्होंने अंधकासुर के अत्याचार से सभी को मुक्त करने के लिए उससे युद्ध करने का निर्णय लिया। दोनों के बीच भयानक युद्ध हुआ। इस युद्ध में भगवान शिव का पसीना बहने लगा जिसकी गर्मी से धरती फट गई और उससे मंगल का जन्म हुआ। इस नवउत्पन्न मंगल ग्रह ने दैत्य के शरीर से उत्पन्न रक्त की बूंदों को अपने अंदर सोख लिया। इसी कारणवश मंगल का रंग लाल माना गया है।

यह मंदिर बहुत पुराना है लेकिन इसके जीर्णोद्धार का श्रेय सिंधिया राजघराने को जाता है। दरअसल मंगलनाथ मंदिर में भगवान शिव ही मंगलनाथ के रूप में विराजमान हैं। मंदिर के गर्भगृह में भगवान शिव, एक शिवलिंग के रूप में स्थापित हैं। वैसे तो सम्पूर्ण उज्जैन ही सनातन ज्ञान का एक महान केंद्र है लेकिन महाकाल मंदिर और मंगलनाथ दोनों ही खगोल अध्ययन के केंद्र भी माने गए हैं।

मंगल दोष निवारण

इस मंदिर में किसी भी तरह के अमंगल को मंगल में बदलने का सामर्थ्य है। यहाँ भारत ही नहीं अपितु विदेशों में रहने वाले लोग भी अपनी कुंडली के मंगल दोष के निवारण के लिए आते हैं। जिन लोगों को ज्योतिषशास्त्र और कर्मकांड में भरोसा है उनके लिए यह मंदिर विशेष महत्व का है।

मंगलनाथ मंदिर में मंगल की शांति के लिए विधि-विधान से पूजा-पाठ का आयोजन किया जाता है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है यहाँ की भात पूजा। इस विशेष पूजा के दौरान मंदिर में स्थापित भगवान शिव का भात श्रृंगार किया जाता है। कुंडली में मंगल दोष के निवारण के लिए भक्तों के द्वारा मंदिर में भात पूजा कराई जाती है। अत्यंत पवित्र क्षिप्रा नदी के तट पर स्थित होने के कारण इस मंदिर का और यह होने वाली पूजा का महत्व और भी बढ़ जाता है। इसके अलावा इस मंदिर में नवग्रह पूजा भी संपन्न होती है।

मंगलनाथ मंदिर में भगवान शिव का भात श्रृंगार (फोटो : yatradham.org)

हर मंगलवार को इस मंदिर में भक्तों का तांता लगा रहता है लेकिन कुछ विशेष पर्वों पर यहाँ श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ जाती है, जैसे महाशिवरात्रि, अंगारक चतुर्थी और श्रावण मास।

कैसे पहुँचे?

उज्जैन में भी हवाईअड्डा है लेकिन यहाँ का सबसे नजदीकी व्यस्त हवाईअड्डा अहिल्याबाई होल्कर इंदौर है जो यहाँ से लगभग 55 किमी की दूरी पर है। इंदौर के इस हवाईअड्डे से दिल्ली, मुंबई, पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद, भोपाल और कोलकाता जैसे शहरों के लिए नियमित उड़ाने हैं। उज्जैन पश्चिम रेलवे जोन का एक व्यस्त रेलवे स्टेशन है। यहाँ से भारत के सभी बड़े शहरों के लिए ट्रेनें उपलब्ध हैं। उज्जैन जंक्शन से मंगलनाथ मंदिर की दूरी लगभग 6 किमी है। इसके अलावा उज्जैन सड़क मार्ग से भली-भाँति सभी बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है। मध्यप्रदेश की शानदार सड़कें और राष्ट्रीय राजमार्ग उज्जैन को इंदौर, भोपाल, मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद, ग्वालियर, कोटा, जयपुर और ऐसे ही बड़े शहरों से जोड़ते हैं।

जर्मनी में सोमाली आप्रवासी ने ‘अल्लाह-हू-अकबर’ चिल्लाते हुए लोगों पर चाकू से किया हमला: 3 की मौत, 5 घायल

जर्मनी के वुर्जबर्ग शहर में शुक्रवार (25 जून) को एक सोमाली अप्रवासी ने चाकू से लोगों पर हमला कर दिया, जिसमें 3 लोगों की मौत हो गई और 5 लोग घायल हो गए। यह हमला शाम करीब पाँच बजे शहर के बीचों-बीच बार्बरोसा स्क्वायर में हुआ।

रिपोर्टों के अनुसार, आरोपित की पहचान सोमालिया के 24 वर्षीय आप्रवासी के रूप में हुई है। वह 2015 से वुर्जबर्ग शहर में रह रहा था। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, आरोपित के पास एक बड़ा चाकू था जिसका इस्तेमाल उसने राहगीरों पर हमला करने के लिए किया। हमले में एक बच्चे और उसके एक अभिभावक समेत तीन लोगों की मौत हो गई। एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि पीड़ितों पर हमला करने से पहले आरोपित ने ‘अल्लाह-हू-अकबर‘ के नारे लगाए।

इस घटना की प्रत्यक्षदर्शी जूलिया रन्ज ने बताया, “हमलावर के पास एक बहुत बड़ा चाकू था और वह लोगों पर हमला कर रहा था। फिर कई लोगों ने उस पर कुर्सियाँ, छाते, सेलफोन फेंककर उसे रोकने की कोशिश की। फिर पुलिस पहुँची और ऐसा लगता है कि गोली भी चलाई गई।” लोअर फ्रैंकोनिया पुलिस के अनुसार आरोपित के पैर में गोली मारने के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया था।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में एक शख्स बैग का इस्तेमाल कर आरोपित को काबू करने की कोशिश कर रहा है। वीडियो में सोमाली आप्रवासी को नंगे पाँव और हाथ में एक बड़ा चाकू लिए हुए देखा गया।

एक अन्य वीडियो में बार्बरोसा स्क्वायर पर लाठी एवं कुर्सियाँ लिए हुए स्थानीय लोगों को हमलावर का पीछा करते हुए देखा गया है। पुलिस ने स्पष्ट किया है कि अब कोई दूसरा संदिग्ध नहीं है। पुलिस ने बताया कि आरोपित पीड़ितों को नहीं जानता था और चाकू से हुए इस हमले के पीछे के मकसद की जाँच की जा रही है।

बवेरिया के सुरक्षा अधिकारी जोचिम हेरमैन ने इस घटना के बारे में बात करते हुए कहा कि पुलिस को आरोपित की जानकारी थी। हेरमैन ने कहा, “हाल के महीनों में उसकी हिंसक प्रवृत्तियों सहित उसकी स्थिति पर नजर रखी जा रही थी और कुछ दिनों पहले ही उसे अनिवार्य मानसिक उपचार के लिए भेजा गया था।” हेरमैन ने बताया कि हमले के पीछे ‘इस्लामी कट्टरपंथ’ से इंकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि प्रत्यक्षदर्शियों ने आरोपित को ‘अल्लाह हू अकबर’ चिल्लाते हुए सुना था।

उन्होंने बताया, “यह हमला एक संभावित ‘इस्लामी कट्टरपंथी मकसद’ की ओर इशारा करता है, जो जाँच का एक हिस्सा है।” उन्होंने कहा कि तीन लोगों की मौत हो गई, जबकि अन्य 5 घायलों की हालत गंभीर बनी हुई है। उन्होंने कहा कि यह नहीं पता है कि हमले के बाद वे कब तक बचे रहेंगे।

वुर्जबर्ग 1,30,000 लोगों की जनसंख्या वाला एक शहर है और म्युनिख एवं फ्रैंकफर्ट के बीच स्थित है। जर्मनी ने साल 2015 में गरीबी से जूझ रहे और युद्धग्रस्त देशों के शरणार्थियों के लिए अपनी सीमाएँ खोल दी थीं। संयोग से आरोपित उसी साल वुर्जबर्ग शहर में रहने के लिए आया था।

यूरोप में प्रवासी संकट के दौरान जर्मनी की चांसलर एंजेला मर्केल ने घोषणा की थी कि शरणार्थियों को रखने के लिए देश के पास पर्याप्त ‘आर्थिक ताकत‘ है। उन्होंने यह भी दावा किया था कि देश में आने वाले शरणार्थियों के लिए कोई अधिकतम सीमा निर्धारित नहीं है। हालाँकि, इस मामले में संघीय राज्यों से परामर्श न करने के कारण मर्केल आलोचनाओं की शिकार भी हुई थीं। जर्मनी में शरणार्थियों के लगातार आने के बाद कई रिपोर्ट्स में यह बताया गया था कि शहरों में अपराध में बढ़ोत्तरी देखने को मिली। फरवरी 2016 में सरकार ने यह भी स्वीकार किया था कि लगभग 13% शरणार्थियों की जानकारी सरकार के पास नहीं है और ये या तो अवैध रूप से देश में रहने लगे या दूसरे यूरोपीय देशों में चले गए।