उत्तर प्रदेश के बहराइच में 2 साल की बच्ची से दुष्कर्म का मामला उजागर हुआ है। वहाँ आरोपित ने बच्ची को उसके घर से देर रात सोते में उठाया और बाद में उसे स्कूल के शौचालय में खून से लथपथ अवस्था में छोड़कर भाग गया। जब ग्रामीणों ने बच्ची की खोजबीन शुरू की तो स्कूल के बाहर आरोपित को पकड़ा गया। पुलिस से बचने के लिए उसने भागने की कोशिश की लेकिन मुठभेड़ के बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
जानकारी के मुताबिक, 22 जून 2021 की रात 1 बजे 30 वर्षीय परशुराम पुत्र मंगेर ने बच्ची का अपहरण किया। घरवालों को शुरू-शुरू में लगा कि लड़की को कोई जंगली जानवर उठाकर ले गया है। लेकिन जब उसकी खोजबीन शुरू हुई तो घर से 100 मीटर की दूरी पर स्थित स्कूल के पास लोगों को आरोपित मिला। सख्ती से पूछने पर उसने बताया कि उसने लड़की को टॉयलेट में छिपाया है।
बच्ची को खून से लथपथ देख उसे फौरन नानपारा के कम्युनिटी हेल्थ सेंटर में भर्ती कराया गया। बाद में हालत गंभीर देख उसे जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया, जहाँ बच्ची ने दम तोड़ दिया। इस दौरान ग्रामीणों ने आरोपित को पुलिस हवाले किया लेकिन वहाँ उसने भागने की कोशिश की और पुलिस की मुठभेड़ में गोली लगने से घायल हो गया।
बहराइच पुलिस ने इस बाबत सोशल मीडिया ट्विटर पर अपडेट दिया। पुलिस ने बताया है कि आरोपित को पॉक्सो और एनएसए धाराओं के तहत गिरफ्तार कर लिया गया है। मेडिकल चेक अप के बाद आरोपित की कोर्ट में पेशी हुई।
पुलिस ने बताया कि आरोपित पुलिस की गिरफ्त से बचकर जंगल की तरह भाग रहा था, इसलिए उन्होंने हवा में फायरिंग की , लेकिन चेतावनी के बाद जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो पुलिस को उसे वापस पकड़ने के लिए पैर में भी गोली मारनी पड़ी।
घटना के बाद एसपी सुजाता सिंह ने घटनास्थल पर पहुँचकर पीड़ित बच्ची के परिवार से बात की। इलाके में तनाव की स्थिति देखते हुए पुलिस फोर्स तैनात कर दी गई है। साथ ही अपराध देखते हुए पुलिस ने आरोपित के विरुद्ध NSA लगाया है।
‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS)’ हैदराबाद की एक थीसिस में जम्मू कश्मीर में भड़की हिंसा के लिए भारतीय सेना को जिम्मेदार बताए जाने के बाद अब मामले ने तूल पकड़ लिया है।
थीसिस लिखने वाली अनन्या कुंडू ने लगातार अपने पेपर में कश्मीर क्षेत्र को ‘India occupied Kashmir’ बताया था। जिसके बाद इस थीसिस को लेकर लोग भारत सरकार से गुहार लगाने लगे थे कि संस्थान को फंडिग देनी बंद की जाए।
हालाँकि, जैसे-जैसे मामला दूर तक फैला, ये बात पता चली कि सिर्फ हैदराबाद के TISS में जमा की गई थीसिस में ही ऐसी विवादस्पद बात नहीं लिखी गई है बल्कि TISS के गुवाहटी कैंपस में भी एक ऐसा पेपर जमा हुआ जिसमें इस्लाम को बढ़ावा देने की बातें कही गई हैं और समझाया गया कि कैसे हर परेशानी का हल अल्लाह देते हैं।
स्कॉलर अभिनव प्रकाश ने इस पेपर के कुछ स्क्रीनशॉट शेयर किए हैं। इसे लिखने वाली लेखिका श्रेयसी मुखर्जी हैं। पेपर का टाइटल ‘Poetry of Resistance’ दिया गया है। इस पेपर में लेखिका ने बताया कि कैसे उन्होंने अपने सबजेक्ट के साथ रोमांटिक रिश्ते बना लिए थे और परेशान होने पर वह अल्लाह की शरण में गई थी।
साभार: अभिनव प्रकाश
लेखिका लिखती है, “अपनी फील्ड के लोग, संभवत: सब्जेक्ट के साथ, रोमांटिक रिश्ते बनाना, या यहाँ तक कि उसे दोस्त बनाना, लगभग ईशनिंदा होगी। लेकिन मैं इसके लिए तैयार थी। कश्मीर को क्लिनिकल प्वाइंट ऑफ व्यू से ऑब्जर्व करने से ज्यादा मैंने अपने पार्टनर को ऑब्जर्व करके बहुत सीखा, वह कभी-कभी मेरा सब्जेक्ट भी बना।”
श्रेयसी लिखती हैं, “कुछ चीजों को पढ़कर मैं अक्सर परेशान हो जाती थी और ऐसे क्षणों में मैंने इस्लाम को लेकर दिए गए उपदेश और उस पर छोटे-छोटे लेक्चर्स की शरण ली जिनमें ऐसी बात कही गई जो आज भी मेरे साथ हैं। ये जानकर कि अल्लाह मुझको कभी ऐसी किसी स्थिति में नहीं डालेंगे जहाँ से मेरे लिए निकलना असंभव हो, ये जानकर कि अल्लाह का न्याय हमेशा निष्पक्ष और सच्चा होता है, हमारे संघर्ष के साथ चीजें आसान होती जाती हैं और इसलिए जब भी मैं दुख में होती हूँ तो अल्लाह के शरण में जाना मेरे मन को शांत करता है और साथ ही मुझे एक समझ देता है कि चीजों के होने का उद्देश्य क्या था जो मुझे कहीं और से नहीं पता चलता।”
साभार: अभिनव प्रकाश
अपने पेपर में श्रेयसी आगे लिखती हैं, “और अगर मैं एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जिसने बार-बार धर्म को मानने से इंकार कर दिया, एक लंबे संघर्ष में एक थीसिस लिखने के प्रयास में इसका (इस्लाम का) सहारा ले सकती हूँ तो बाकी लोग क्यों नहीं अपने पूरे जीवन में इस्लाम से ताकत ले सकते।”
बता दें कि ये पेपर 2017 में पब्लिश हुआ था। लेकिन इसके अलावा और भी ऐसे विवादस्पद पेपर पब्लिश हो चुके हैं जिनमें कश्मीर पर विवादित बातें कही गईं। TISS तुलजापुर में ऐसे ही एक रिसर्च छपी। इसका शीर्षक था- “स्टेट्स कॉर्सिव एपरैट्स: ए स्टडी ऑफ मिलिट्री ऑक्यूपेशन इन कश्मीर”।
साभार: @BBTheorist/Twitter
एक अन्य थीसिस जो कश्मीर पर ही आधारित मिली, उसका शीर्षक देखिए- “प्रतिरोध के एक रूप में हिंसा: भारत-नियंत्रित-कश्मीर में 1989 के बाद के आत्मनिर्णय का एक अध्ययन।”
साभार: @BBTheorist/Twitter
एक पेपर में तो खुले तौर पर भारत से कश्मीर को आजाद करने की माँग की गई और भारत के विरुद्ध जंग को समर्थन दिया गया।
साभार: अभिनव प्रकाश
बता दें कि इन शोध पत्रों में से एक के ‘तर्कसंगत’ खंड में कहा गया है कि घाटी में संघर्ष 27 अक्टूबर, 1947 को भारत द्वारा किए गए जबरदस्त कब्जे का परिणाम है, जब तत्कालीन महाराजा रणबीर सिंह ने भारत के साथ एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए थे और लॉर्ड माउंटबेटन भारत सरकार और रियासत के बीच मध्यस्थ के तौर पर काम कर रहे थे।
लेखक कश्मीर पर तैयार किए गए अपने पेपर में बताते हैं कि कैसे कश्मीर ने ‘अधीनता’, ‘दमन’, ‘अत्याचार’, ‘सबसे खराब प्रकार’ की ‘सामूहिक कब्रें’ देखी हैं।
इससे पहले इस संबंध में अनन्या कुंडू ने अपने रिसर्च पेपर लिखा था, “भारत ने कश्मीर पर कब्जा करने के लिए यहाँ की आवाजों को दबाया और नैरेटिव को नियंत्रित किया। कश्मीर की कहानी कश्मीर नहीं, भारत ने लिखी। आज जिस कश्मीर को हम जानते हैं, वो भारतीय सोच के हिसाब से ही। महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा हुई। पितृसत्तात्मक भारतीय सेना कश्मीरी समाज को तोड़ने के लिए महिलाओं के शरीर को निशाना बनाती है। ये सैन्यीकरण और युद्ध का परिणाम ही है कि महिलाओं के खिलाफ यौन और शारीरिक हिंसा आम हो गई। भारत ने अगस्त 2019 में अनुच्छेद-370 हटा कर उसका विशेष राज्य का दर्ज छीन लिया। फिर लंबा कम्यूनिकेशन ब्लैकआउट हुआ। फिर कोरोना आपदा आई और वहाँ की महिलाओं के हालात और भी बदतर हो गए।”
उल्लेखनीय है कि जब इस संबंध में अभिनव प्रकाश ने पहले कुंडू का रिसर्च पेपर शेयर किया था, तो इसके बाद TISS ने स्टेटमेंट जारी किया था जिसमें लिखा गया था कि वह ऐसे शीर्षकों को बढ़ावा नहीं देते और इस संबंध में उपयुक्त एक्शन लिया जाएगा और सच की पड़ताल की जाएगी। लेकिन, सवाल उठता है कि आखिर ऐसे रिसर्च पेपर पब्लिश कैसे हुए अगर उन्हें कोई इंस्टिट्यूशनल सपोर्ट नहीं था।
कंचन गुप्ता को हाल में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की वरिष्ठ सलाहकार नियुक्त किया गया है। वह इस मामले में कहती हैं कि ये टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, 1936 में ‘सर दोराबजी टाटा ग्रेजुएट स्कूल ऑफ सोशल वर्क’ के रूप में स्थापित हुआ था, जो अब ‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सबवर्सिव सेपरैटिज्म’ में बदल गया है।
अब देखना है कि इन पेपर्स के सामने आने के बाद ऐसी रिसर्च जो अलगाववाद को बढ़ावा देती हों उसके लिए किसको जिम्मेदार ठहराया जाएगा या किसके खिलाफ कार्रवाई होगी।
एमसी कोड के बाद एक और रैपर वास्ताविक मफ़ाद ने हिंदू धर्म व हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाया है। दरअसल, रैपर वस्ताविक मफ़ाद ‘बी ए मफ़ाद’ नाम से एक यूट्यूब चैनल चलाता है। उसने अपने साथी रैपर के साथ कृष्ण का अपमान करते हुए बार-बार भगवान कृष्ण को गालियाँ दीं। साथी रैपर को झूठा कहते हुए मफ़ाद गाता है, “तू मटकी का सारा माखन खा गया माखनचोर, ओ नंदलाला की फट गई क्या।”
रैपर ने अगली पंक्ति में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए बेहद आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग किया जैसे, “मर गया तेरा नंदलाल नटखट, अब गोपियाँ भागेंगी छोड़के पनघट।”
आज के समय में हिंदू देवताओं, सनातन धर्म को गाली देना और उनका मजाक उड़ाना मानो सफलता का पैमाना बन गया है। YouTube पर 4 लाख सब्सक्राइबर वाले मफ़ाद ने अपने लगभग सभी 30 वीडियो में हिंदू देवताओं के खिलाफ अभद्र और अपमानजनक टिप्पणी की है। अपशब्दों से भरे अपने नए रैप सॉन्ग में मफ़ाद गाता है, “बन जाऊ इंद्र देव फाड़ के आ जाऊँ अंदर।” उसका दूसरा ‘हाई ऑन एब्यूज’ सॉन्ग हिंदू देवता भगवान राम और माँ सीता को अपमानित करता है।
मफ़ाद के काली जुबान वीडियो का स्क्रीनग्रैब
मफ़ाद के ब्लू टिक इंस्टाग्राम अकाउंट पर भी 134k फॉलोअर्स के साथ बड़ी संख्या में फॉलोअर्स हैं।
कौन हैं वास्तविक मफ़ाद
मफ़ाद का असली नाम गौरव है। वह दिल्ली का रहने वाला है, उसने रैपर बनने के लिए साल 2012 में अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी थी। तब से गौरव अपने कथित ‘म्यूजिक’ पर काम कर रहा है। उसने 2016 में ‘सच टू मच’ से अपना डेब्यू किया था। गौरव 2018 में अपने रैप सॉन्ग ‘सारे करो डैब’ से फेमस हुआ था। यह सॉन्ग गौरव, रैपर व गीतकार रफ्तार और सिंगर सोनू कक्कड़ ने मिलकर तैयार किया था।
हिंदी, इंग्लिश, पंजाबी और हरियाणवी में रैप करने वाले गौरव का कहना है कि उनके गाने युवा पीढ़ी को काफी पसंद हैं। उन्हें लगता है कि अजीब और समझने में मुश्किल गाने दर्शक ज्यादा पसंद करते हैं। गौरव के पिता एक स्कूल टीचर हैं, जबकि उनकी माँ एक हाउस वाइफ हैं।
रैपर एमसी कोड
गौरतलब है कि हिन्दू धर्म की पवित्र पुस्तकों महाभारत और भगवद्गीता पर अश्लील और आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद चर्चा में आए रैपर एमसी कोड (MC Kode) उर्फ आदित्य तिवारी को दिल्ली पुलिस ने हाल ही में मध्य प्रदेश से ढूँढ निकाला था। हिन्दू धर्म के अपमान वाले पुराने वीडियो सोशल मीडिया में वायरल होने के बाद एमसी कोड 2 जून 2021 को नई दिल्ली से लापता हो गया था।
Rapper #MCKode traced by @DCPSouthDelhi from Madhya Pradesh. He went missing after writing suicidal post on Instagram. On 4.06.21, his mother gave complaint in Mehrauli PS. He was being trolled for his old videos for allegedly hurting sentiments of few @SandhyaTimes4u@NBTDillipic.twitter.com/JnBwn4F1VZ
लापता होने के पहले एमसी कोड ने अपने इंस्टाग्राम एकाउंट से जीवन को समाप्त करने की धमकी देते हुए एक मैसेज पोस्ट किया था। रैपर ने कहा था कि वह केवल माफी माँग सकता है, क्योंकि उसके स्वार्थी कामों से निश्चित रूप से बहुत दुख हुआ होगा।
पूरे विश्व में रामायण का डंका बजाने वाले और भारत के ‘सांस्कृतिक दूत’ कहे जाने वाले राजेंद्र अरुण (Rajendra Arun) नहीं रहे। दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर वर्तमान पीएम नरेंद्र मोदी तक, सभी ने उनके कार्य की सराहना की थी। राजेंद्र अरुण को मॉरीशस (Mauritius) में रामायण सेंटर (Ramayana Centre) की स्थापना के लिए जाना जाता है, जो अपने-आप में दुनिया का पहले ऐसा संस्थान है।
मारीशस स्थित रामायण सेंटर की खासियत ये है कि इसकी स्थापना मॉरीशस संसद के एक एक्ट (एक्ट संख्या 7, सन् 2001) के तहत हुई है। जून 2001 में इसे लागू किया गया था। इस ‘रामायण सेंटर’ की स्थापना भगवन श्रीराम के काल का अध्ययन कर वहाँ से आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सीख लेने के लिए और इसके प्रचार-प्रसार के लिए किया गया। रामायण में सम्बन्ध रखने वाले सभी लोग इसके सदस्य बन सकते हैं और संस्थान के पास विदेश में किसी भी इस तरह के संस्थान के साथ साझेदारी की छूट है।
इस ‘रामायण सेंटर’ के माध्यम से रामकथा से जुड़े कंटेंट्स को प्रकाशित किया जाता है। फिर उसे बेचा या बाँटा जाता है। रामायण से जुड़े साहित्य की विवेचना और लेक्चर्स के लिए भी इसका प्रयोग होता है। मारीशस की सरकार ने इसे टैक्स में छूट दे रखी है और इसे मिलने वाले डोनेशन को भी पर भी कोई कर नहीं लगता। 7-11 सदस्यों वाली कमिटी इसका प्रबंधन करती है। देश-विदेश में रामकथा के प्रचार-प्रसार में इसे अच्छा कार्य किया है।
इसकी स्थापना से लेकर अब तक राजेंद्र अरुण ही इसके अध्यक्ष थे। उन्हें लोग ‘मॉरीशस के तुलसी’ के रूप में भी जानते थे। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निर्देश में उन्होंने कई पत्र-पत्रिकाओं में लेखन कार्य किया था। उनका जन्म उत्तर प्रदेश स्थित फैजाबाद जिले के नरवापितम्बरपुर गाँव में जुलाई 29, 1945 को हुआ था। सोमवार (जून 21, 2021) को लगभग 76 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।
प्रयाग विश्वविद्यालय से उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई। राजेंद्र अरुण ने पत्रकारिता को ही करियर के रूप में चुना और 1970 से ही हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में जुट गए। इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाले ‘जनता की आवाज़’ पत्रिका के वो प्रमुख संपादक थे। लेकिन, ईश्वर ने उन्हें किसी बड़े कार्य के लिए चुना था। 1973 में ‘विश्व पत्रकारिता सम्मेलन’ में वो मॉरीशस गए और वहाँ के तत्कालीन राष्ट्रपति शिवसागर रामगुलाम हिंदी भाषा को लेकर उनके प्रेम से खासे प्रभावित हुए।
तभी ‘रामायण सेंटर’ की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ। दो दर्जन से भी अधिक पुस्तकें लिखने वाले राजेंद्र अरुण ने रामायण पर गहन रिसर्च किया और इसके कई पहलुओं के बारे में दुनिया को बताया। वो रामायण पर ‘हरि कथा अनंता’, ‘भारत गुण गाथा’, ‘जग जननी जानकी’, ‘जग रोम-रोम में राम’, ‘रघुकुल रीति सदा’, ‘तजु संशय भजु राम’, ‘अथ कैकेयी कथा’ और ‘मानस में नारी’ जैसी कई पुस्तकें लिख चुके थे।
रामायण सेंटर,मॉरीशस के अध्यक्ष, पंडित राजेन्द्र अरुण जी के देहांत पर भारतीय उच्चायोग, मॉरीशस की ओर से दिवंगत आत्मा को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि। उनके परिजनों के प्रति हमारी गहरी संवेदना। उन्होंने नवीन शैली में रामायण के व्यावहारिक आदर्शों को विभिन्न माध्यमों से जन-जन तक पहुँचाया। pic.twitter.com/vdACAQeNJm
मॉरीशस की सरकार नहीं चाहती थी कि वो देश छोड़ कर जाएँ, इसीलिए उन्हें ‘जनता’ का संपादक बना कर वहीं रहने का अनुरोध किया गया। मॉरीशस से राजेंद्र अरुण ने धर्मयुग, कादंबिनी, साप्ताहिक हिंदुस्तान से लेकर कई प्रमुख अखबारों में मॉरीशस की साहित्यिक, सांस्कृतिक व रचनात्मक गतिविधियों व रामायण को लेकर कई ज्ञानवर्धक लेख लिखे। 1982 में उन्होंने ‘मॉरीशस ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (MBC)’ के रेडियो चैनल पर रामायण के साप्ताहिक व्याख्यान का कार्यक्रम ‘मंथन’ शुरू किया।
आज भी ये कार्यक्रम ‘मानस मंथन’ के रूप में लोगों का ज्ञान बढ़ाता है। ये ‘रामायण सेंटर’ का ही प्रभाव है कि वहाँ के स्कूली पाठ्यक्रम में भी रामायण को शामिल किया गया है। उन्होंने अपने गाँव समेत कई स्थलों पर इस सेंटर की शाखा का भी निर्माण कराते हुए इसे विस्तार दिया। राजेंद्र अरुण पाठकों और श्रोताओं को रामायण का पान ऐसे कराते थे, जैसे न तो ये ज्यादा गूढ़ लगे और न ही ज्यादा नाटकीय।
उत्तर प्रदेश में इस्लामी धर्मांतरण के एक बड़े गिरोह का पर्दाफाश होने के बाद विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने चिंता जताई है। संगठन ने कहा है कि इससे साफ हो गया है कि धर्मांतरण का जाल कितना गहरा, व्यापक, घिनौना और राष्ट्रव्यापी है। वीएचपी के संयुक्त महामंत्री सुरेंद्र जैन ने इस पर अंकुश लगाने के लिए केंद्रीय कानून बनाए जाने की वकालत की है।
जैन ने मंगलवार (22 जून 2021) को कहा कि धर्मांतरण पर रोक लगाने के लिए केंद्रीय कानून बनाना चाहिए। उन्होंने कहा, “नियोगी कमीशन और वेणु गोपाल कमीशन ने धर्मांतरण विरोधी केंद्रीय कानून बनाने की सिफारिश की थी। संविधान सभा के कई सदस्य भी इसी मत के थे। इसलिए केंद्र सरकार को अवैध धर्मांतरण रोकने के लिए एक कानून बनाने पर विचार करना चाहिए।”
— Vishva Hindu Parishad -VHP (@VHPDigital) June 22, 2021
उन्होंने कहा, “धर्मांतरण के कारण देश विभाजन की एक त्रासदी झेल चुका है और जेहादी आतंकवाद की पीड़ा का सामना कर रहा है। अब भारत को इस मानवता विरोधी षड्यंत्र से मुक्त कराने का समय आ गया है।” यूपी के मामले का हवाला देते हुए जैन ने कहा कि अभी तक भोले और मासूम लोग निशाने पर थे। अब मूक-बधिर बच्चों को टारगेट किया जा रहा। इनमें से कई बच्चे लापता हैं जिनका आतंकी गतिविधियों में इस्तेमाल किए जाने की आशंका है।
जैन ने कहा कि कोरोना काल में पीड़ितों की सहायता के लिए संपूर्ण देश पूरे समर्पण के साथ जुटा है, लेकिन जेहादी और मिशनरी धर्मांतरण के अपने घिनौने एजेंडे को लागू करने में लगे हुए हैं। उत्तर प्रदेश में धर्मांतरण विरोधी कानून होने के कारण इनका गिरोह पकड़ा गया, लेकिन जहाँ यह कानून नहीं है वहाँ तो उनके लिए मैदान खुला है। उन्होंने कहा कि टूलकिट गैंग इनकी सहायता के लिए हमेशा तत्पर रहता ही है।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश एटीएस ने सोमवार (21 जून 2021) को मूक-बाधिर छात्रों व कमजोर आय वर्ग के गरीबों-असहायों को धन, नौकरी व शादी करवाने का प्रलोभन देकर धर्मान्तरण कराने वाले एक बड़े गिरोह के दो मौलानाओं मोहम्मद उमर गौतम और जहाँगीर कासिम को गिरफ्तार किया था। इन दोनों पर अब तक करीब 1000 मूक बधिर, महिलाएँ और बच्चों को निशाना बनाकर धर्म परिवर्तन कराने का आरोप है। इस मामले में यूपी पुलिस ने आईएसआई और विदेशी फंडिंग होने का शक भी जताया था।
इस बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी इस मामले में कड़ा रुख अख्तियार करते हुए धर्मान्तरण के सभी आरोपितों के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत कार्रवाई करने की बात कही है। उन्होंने जाँच एजेंसियों से मामले की तह तक जाने को कहा है।
पाकिस्तान के साथ मिलकर जम्मू कश्मीर में लंबे समय तक अशांति फैलाने के आरोप में पकड़े गए अलगाववादी नेता शब्बीर शाह की बेल याचिका का प्रवर्तन निदेशालय ने दिल्ली कोर्ट में मंगलवार (जून 22, 2021) को जमकर विरोध किया। बेल याचिका के विरुद्ध कोर्ट के समक्ष अपना जवाब दाखिल करते हुए ईडी ने कहा कि शब्बीर शाह बड़ी आपराधिक गतिविधियों में शामिल रहा है और आतंक फैलाने के मामले में कई देशों से बड़े स्तर फंडिंग जुटाई है।
ED ने दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में शब्बीर शाह की जमानत के खिलाफ दाखिल हलफनामे में अपनी दलील दी कि शब्बीर शाह, हाफिज सईद समेत कई अंतरराष्ट्रीय आतंकियों और अपराधियों के संपर्क में था, जिनके जरिए वह लगातार कश्मीर में आतंक फैलाने की गतिविधियों को अंजाम देता आया है।
“Shabir Shah (in file photo) was involved in the generation of huge proceeds of crime from various countries including Pakistan to create unrest in Kashmir,” says Enforcement Directorate in a Delhi Court while opposing the separatist leader’s bail plea in a terror funding case pic.twitter.com/eJtZgvtSqX
ईडी ने यह भी बताया कि शब्बीर के ख़िलाफ़ जितने गंभीर आरोप हैं उन पर जाँच की जा रही हैं। साथ ही पाकिस्तान से संबंधित कॉल रिकॉर्ड्स को भी खंगाला जा रहा है। ईडी का आरोप है कि शाह हाफिज सईद के अलावा शफी शायर के साथ भी कॉन्टैक्ट में था, जो भारत की जेल से रिहा होकर पाकिस्तान भाग चुका है।
शाह की जमानत का विरोध करते हुए ईडी ने कोर्ट में दलील दी कि अगर इस वक्त आरोपित को रिहा किया गया तो भारत के खिलाफ रची जा रही साजिश का भंडाफोड़ करने की कोशिश बेकार जा सकती है। मालूम हो कि शब्बीर शाह की बेल याचिका पर ईडी के जवाब दाखिल करने वाले दिन शाह के वकील ही कोर्ट में मौजूद नहीं हुए। ऐसे में इस मामले की सुनवाई 29 जून तक के लिए टाल दी गई है।
गौरतलब है कि टेरर फंडिग मामले में शब्बीर शाह के अलावा मसरत आलम और आसिया अंद्राबी की भी गिरफ्तारी हुई है। इन्हें NIA कोर्ट में 14 जून को पेश किया गया था। इसके बाद कोर्ट ने तीनों आरोपितों को 30 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया।
बता दें कि अलगाववादी नेता के ख़िलाफ़ सबसे पहले मामला 2007 में दर्ज हुआ था। ये मामला 2005 में हुई मनी लॉन्ड्रिंग को लेकर था जिसे टेरर फाइनेंसिंग के उद्देश्य से किया गया। इसके बाद उसे 25 जुलाई 2017 को 2005 वाले इस मामले में गिरफ्तार किया गया। इसके बाद NIA ने जून 2019 में शाह को हिरासत में लिया। ये कोई अन्य टेरर फंडिग से जुड़े केस था जिसमें हाफिज सईद की संलिप्ता भी थी।
पंजाब कॉन्ग्रेस की कलह एक बार फिर से दिल्ली पहुँच गई है। पिछले कुछ दिनों से वहाँ गुटबाजी के माहौल ने जोर पकड़ा है। जहाँ मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने पंजाब कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा को अपने खेमे में लाने की कोशिश की है, वहीं कुछ नेता सिद्धू के ऊपर आलाकमान का हाथ मान रहे हैं। मंगलवार (जून 22, 2021) को कैप्टेन एक बार फिर से कॉन्ग्रेस के 3 सदस्यीय पैनल के सामने पेश होने दिल्ली पहुँचे।
राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के दफ्तर में डेढ़ घंटे तक ये बैठक चली। सभी की निगाहें अब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के साथ सीएम अमरिंदर की होने वाली बैठक पर टिकी हुई है। खड़गे, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और दिल्ली कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष जेपी अग्रवाल की समिति ने कैप्टेन से उनकी बात सुनी। सीएम अमरिंदर 1 दिन पहले ही दिल्ली पहुँच गए थे। 10 जून को पैनल अपनी रिपोर्ट सोनिया गाँधी को सौंप चुका है।
ये पैनल पंजाब में कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ से भी मिलेगा। जाखड़ की आज राहुल गाँधी के साथ भी बैठक तय है। हरीश रावत पंजाब में पार्टी के प्रभारी हैं। उन्होंने सिद्धू की बयानबाजी पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि पार्टी इसका संज्ञान लेगी। पंजाब के विधायक राजकुमार वेरका, सांसद औजला और कुलजीत नागरा ने भी राहुल गाँधी से मुलाकात की है। सिद्धू पहले ही कह चुके हैं कि वो ‘शो पीस’ बन कर नहीं रह सकते।
कैबिनेट मंत्री तृप्त राजिंदर सिंह बाजवा, सुखबिंदर सरकारिया, सुखजिंदर सिंह रंधावा, चरणजीत चन्नी, भारत भूषण आशू, रजिया सुल्ताना, साधु सिंह धर्मसोत के अलावा परगट सिंह, कीकी ढिल्लों, संगत गिलजियां, नवतेज चीमा और कुलबीर सिंह जीरा जैसे नेताओं की भी राहुल गाँधी के साथ बैठक होगी, जहाँ उनका मन टटोला जाएगा। कॉन्ग्रेस की कोशिश है कि सिद्धू को सरकार और संगठन में बड़ी भूमिका दिलवा कर संतुलन साधा जाए।
चर्चा ऐसी भी है कि कैप्टेन अमरिंदर सिंह असंतुष्ट होने की स्थिति में अपनी अलग पार्टी बना कर कॉन्ग्रेस का नुकसान कर सकते हैं, इसीलिए आलाकमान उन्हें भी नाराज़ नहीं करना चाह रहा। जब तक मुद्दा नहीं सुलझेगा, अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए नेताओं को जिम्मेमदारी नहीं बँट सकेगी। कॉन्ग्रेस के सूत्रों का कहना है कि कैप्टेन अमरिंदर भी गाँधी परिवार के करीबी रहे हैं, ऐसे में उनके अलग होने की अटकलें सही नहीं हैं।
Punjab Congress in-charge avoids question on Captain-Sidhu feud; says 'All will be well' https://t.co/OMuIMs7j89
बताया जा रहा है कि कैप्टेन अमरिंदर सिंह किसी भी कीमत पर सिद्धू को उप-मुख्यमंत्री के रूप में नहीं देखना चाहते हैं, वो उन्हें कोई महत्वपूर्ण विभाग देकर विवाद का निपटारा चाहते हैं। जबकि चुनाव में धुआँधार प्रचार करने वाले सिद्धू को सरकार और संगठन में बड़ी भूमिका चाहिए। उधर कमजोर भाजपा-अकाली में टूट के बाद पहली बार हो रहे विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की पार्टी भी कूद गई है।
दिल्ली के मुख्यमंत्री पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि AAP की जीत होती है तो पंजाब का मुख्यमंत्री कोई सिख बनेगा। पूर्व आईजी विजय प्रताप को उन्होंने अमृतसर में पार्टी में शामिल कराया। कोटकपुर गोलीकांड की जाँच के लिए बनी SIT के मुखिया विजय प्रताप ही थे, इसीलिए अब ये मामला भी गर्म है। केजरीवाल ने सिद्धू की भी तारीफ की है। जब सिद्धू ने भाजपा छोड़ी थी, तब भी उनके AAP में जानें की अटकलें थीं।
उधर मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा है कि सोनिया और राहुल गाँधी के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस पंजाब का चुनाव लड़ेगी। सिद्धू पहले ही सोनिया-राहुल को अपना बॉस बता चुके हैं। अमरिंदर सिंह ने 18 साल से ऊपर की उम्र के सभी लोगों को मुफ्त कोरोना वैक्सीन लगाने के फैसले पर पीएम मोदी को धन्यवाद कहा था। इस बयान के कई मायने निकाले गए। गुरु ग्रन्थ साहिब का अपमान करने वालों के प्रति नरम रुख का आरोप लगा भी सिद्धू गुट कैप्टेन पर हमलावर है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 जून 2021 को सर्वदलीय बैठक बुलाई है। जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक दलों के गठबंधन गुपकार गैंग ने इसमें शामिल होने की सहमति जताई है। हालाँकि इसके नेताओं ने अपना पुराना विलाप बंद नहीं किया है। गठबंधन की प्रमुख नेता और राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने पाकिस्तान को लेकर अपना प्रेम जाहिर किया है तो मुजफ्फर शाह ने आर्टिकल 370 का रोना रोया है।
गुपकार गैंग यानी पीपुल्स अलायंस फॉर गुप्कार डिक्लेरेशन (PAGD) के मुखिया पूर्व सीएम फारुक अब्दुल्ला हैं। इसमें नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी), पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी- मार्क्सवादी (सीपीआई-एम), जम्मू और कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट (जेकेपीएम) और जम्मू और कश्मीर अवामी नेशनल कॉन्फ्रेंस (JKANC) शामिल हैं।
The government is holding dialogue with the Taliban in Doha. They should hold dialogue in Jammu and Kashmir. They should also hold talks with Pakistan for resolution of issues: PDP chief and former J&K CM Mehbooba Mufti pic.twitter.com/uq9mSgcu4G
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ऑल पार्टी मीटिंग में फारूक अब्दुल्ला और महबूबा मुफ्ती सहित इस गठबंधन के सभी प्रमुख नेता मौजूद रहेंगे। हालाँकि, मीटिंग से पहले ही गुपकार गैंग ने साफ कर दिया है कि वह भारत सरकार द्वारा खत्म किए गए अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35-ए पर कोई समझौता नहीं करेगा।
एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, श्रीनगर में फारुक अब्दुल्ला के घर पर गुपकार की मीटिंग के बाद मुजफ्फर अहमद शाह ने कहा कि आर्टिकल 370 और 35ए पर कोई समझौता नहीं होगा। इससे पहले पीएजीडी के प्रवक्ता मोहम्मद युसूफ तारिगामी ने कहा था, “पीएजीडी के सभी नेताओं को निमंत्रण दिया गया है और इस बैठक में सभी के शामिल होने की संभावना है। लेकिन इसकी रणनीति को लेकर गठबंधन के नेता ही निर्णय लेंगे।”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राज्य में परिसीमन की प्रक्रिया के लिए सभी दलों से सहयोग की अपेक्षा कर रहे हैं ताकि प्रदेश में राजनीतिक प्रक्रियाओं को फिर से शुरू किया जा सके। वहीं महबूबा मुफ्ती सईद ने कहा, “सरकार दोहा में तालिबान के साथ बातचीत कर रही है। उन्हें जम्मू-कश्मीर में बात करनी चाहिए। उन्हें मुद्दों के समाधान के लिए पाकिस्तान से भी बातचीत करनी चाहिए।” गौरतलब है कि महबूबा मुफ्ती कश्मीर से जुड़े मसलों के समाधान के लिए बातचीत में पाकिस्तान को भी शामिल करने की पैरोकार रही हैं।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत हासिल कर तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) लगातार तीसरी बार सत्ता में आई। ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद से भाजपा सर्मथकों पर शुरू हुई हिंसा अब तक जारी है। राज्य में जारी हिंसा को लेकर सोशल मीडिया पर कई तस्वीरें और वीडियो भी सामने आई हैं। इन सबके बावजूद फेसबुक सक्रिय रूप से पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद से शुरू हुई सियासी हिंसा से जुड़ी खबरों को दबाने की कोशिश कर रहा है। बताया जा रहा है कि फेसबुक ममता बनर्जी के बंगाल में महिलाओं के साथ बलात्कार और प्रताड़ना की खबरों को साझा करने वाले यूजर्स के अकाउंट को लॉक कर रहा है।
मुंबई की रहने वाली वकील नेहा विभिन्न मुद्दों को लेकर अक्सर सोशल मीडिया पर अपनी आवाज उठाती रही हैं, लेकिन आज उन्हें खुद के लिए अपनी आवाज उठानी पड़ी। उन्होंने बताया कि फेसबुक ने उनके अकाउंट को 30 दिनों के लिए प्रतिबंधित कर दिया था, क्योंकि उन्होंने ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद पश्चिम बंगाल में जारी हिंसा को लेकर एक न्यूज रिपोर्ट साझा की थी। इसमें महिलाओं के साथ बलात्कार और उन्हें प्रताड़ित करने के बारे में विस्तृत रूप से बताया गया था।
I shared this article on Facebook and Facebook restricted my account for 30 days. So much for freedom of speech and expression. The reason is mind boggling though. Apparently I’m promoting sexual exploitation. https://t.co/z3vUWWtFaTpic.twitter.com/9DJ6XFRy0L
नेहा ने ट्विटर पर इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि न्यूज रिपोर्ट साझा करने के बाद फेसबुक ने उनके अकाउंट को 30 दिनों के लिए लॉक कर दिया था, जिसका कारण बेहद अजीब था। दरअसल, नेहा द्वारा शेयर की गई ऑर्गनाइजर न्यूज रिपोर्ट में बंगाल में भाजपा का समर्थन करने वाली महिलाओं पर होने वाली हिंसा का विवरण दिया गया था। वहीं, फेसबुक का कहना है नेहा ने उस लेख को यौन शोषण को बढ़ावा देने के लिए शेयर किया था।
नेहा ने लिखा, ”मैंने इस लेख को फेसबुक पर शेयर किया और फेसबुक ने मेरे अकाउंट को 30 दिनों के लिए प्रतिबंधित कर दिया। भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर बहुत कुछ हो रहा है। हालाँकि, वजह हैरान करने वाली है। जाहिर तौर पर मैं यौन शोषण को बढ़ावा दे रही हूँ।”
नेहा की फेसबुक पोस्ट सेंसर
आज सुबह 10:07 बजे नेहा को फेसबुक से एक नोटिफिकेशन मिला कि उनकी पोस्ट ने सामुदायिक मानकों का उल्लंघन (violated community standards) किया है। इसलिए उनका अकाउंट 30 दिनों के लिए लॉक कर दिया गया है। ऑपइंडिया से नेहा ने कहा, ”मैंने फेसबुक के इस फैसले के खिलाफ अपील की है। यह बेतुका है कि वे उन समाचार लेखों को सेंसर कर रहे हैं, जो पश्चिम बंगाल में महिलाओं और कमजोर वर्गों पर हो रही हिंसा को उजागर करते हैं।”
उन्होंने आगे कहा , “आईटी नियम, 2021 के अनुसार, फेसबुक को 24 घंटे के भीतर मेरी अपील को स्वीकार करना होगा और इसे 15 दिनों के भीतर निपटाना होगा। यदि वे इसमें देरी करते हैं या वे इस तरह के समाचार लेख को सेंसर करना जारी रखते हैं, तो नियमों के तहत इसकी शिकायत अधिकारी के पास भेजी जाएगी। मैं इस मामले को आगे लेकर जाऊँगी और अधिकारियों को भारतीय कानूनों का पालन करने के लिए फेसबुक की नीतियों से अवगत कराऊँगी।”
हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब फेसबुक ने पश्चिम बंगाल और राज्य में महिलाओं और कमजोर भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ हो रहे अत्याचारों की खबरों को सेंसर किया है। कुछ समय पहले फेसबुक पर शेयर किए गए ऑपइंडिया के एक लेख को भी सेंसर कर दिया गया था। लेख में एक भाजपा कार्यकर्ता के बारे में बताया गया था, जिसे रहस्यमय तरीके से एक पेड़ से लटका पाया गया था। टीएमसी के गुंडों पर उसकी हत्या किए जाने का संदेह था।
ऑपइंडिया की फेसबुक पोस्ट को सेंसर किया गया
उस समय फेसबुक ने निर्णय लिया कि ऑपइंडिया की पोस्ट उनके सामुदायिक दिशा-निर्देशों के खिलाफ है। फेसबुक ने हमारे पेज की पहुँच (reach of our page) को प्रतिबंधित कर दिया और पोस्ट को भी हटा दिया। फेसबुक ने उस पोस्ट को क्यों हटाया, जिसमें पेड़ से लटके मिले भाजपा कार्यकर्ता की मौत की खबर थी? फेसबुक को क्यों लगा कि यह पोस्ट उनके सामुदायिक दिशानिर्देशों के खिलाफ है? क्योंकि उन्होंने सोचा था कि लेख में छपी तस्वीर ने हिंसा को बढ़ावा दिया और महिमामंडित किया। दरअसल, इस लेख में एक प्रतीकात्मक फोटो का इस्तेमाल किया गया था। यह वास्तविक फोटो और वास्तविक अपराध की फोटो नहीं थी। इसका कोई चेहरा नहीं था। इसने हिंसा का जश्न नहीं मनाया। इस लेख ने तो केवल प्रतीकात्मक फोटो के माध्यम से हिंसा की खबर से अवगत कराया था।
बहुत सर्च करने पर हमें केवल फेसबुक का एक लिंक मिला, जिसमें मनमाने दिशा-निर्देश थे। फेसबुक अपनी बात पर अड़ा रहा और यह कहना जारी रखा कि यह पोस्ट उनकी गाइडलाइन्स के खिलाफ है और सेंसर किए जाने के योग्य है। इस प्रकार, बंगाल में भाजपा कार्यकर्ताओं के मारे जाने की खबर को दबा दिया गया।
नेहा की पोस्ट को सेंसर किए जाने और साथ ही उनके अकाउंट को लॉक करने के बाद यह स्पष्ट है कि फेसबुक शायद सक्रिय रूप से बंगाल में चुनाव के बाद से टीएमसी के गुंडों द्वारा जारी हिंसा की खबरों को दबाने की कोशिश कर रहा है। टीएमसी ने जीत के बाद से राज्य में कई राजनीतिक दलों, खासकर भाजपा के कार्यकर्ताओं पर जमकर हिंसा की। भाजपा का समर्थन करने वालों को अपने परिवारों के साथ पलायन के लिए मजबूर किया। राजनीतिक हिंसा से राज्य में भय का माहौल पैदा किया।
पश्चिम बंगाल में चुनावी नतीजों के बाद भड़की हिंसा ने न केवल लोगों से उनका आश्रय छीना बल्कि उन्हें डर-डरकर रहने को मजबूर भी कर दिया। ऐसे में सोमवार (21 जून) को जब कलकत्ता हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को शिकायत दर्ज न करने पर फटकारा तो पीड़ितों में न्याय का विश्वास जगा और अन्य पीड़ितों ने सामने आकर आपबीती सुनाई।
इंडिया टुडे से बात करते हुए, ममूनी शाह और उनके पति रवि शाह ने कहा कि 2 मई को टीएमसी की जीत के बाद उनकी पोल्ट्री शॉप को तोड़ दिया गया था। उसके बाद से वह अपने भवानीपुर इलाके में स्थित अपने घर अब तक नहीं लौट पाए। दोनों पति-पत्नी बताते हैं कि टीएमसी ने उनको पार्टी में शामिल होने को कहा था लेकिन उन्होंने तीन साल पहले चुपचाप भाजपा ज्वाइन कर लिया।
दंपत्ति बताती है, “टीएमसी को एक साल पहले इस बारे में पता चला और वह लोग उनको डराने धमकाने पर उतारू हो गए।” इस घटना के बाद रवि ने तो घर छोड़ दिया जबकि ममूनी वहीं रहती रहीं। रवि कहते हैं, “मैं घर नहीं लौट सका हूँ। जब मैं शिकायत दर्ज कराने भवानीपुर थाने गया तो पुलिस ने हाथ बँधे होने की बात कहकर शिकायत नहीं ली।”
वहीं ममूनी ने बताया कि वह उसी इलाके में रहती थीं। लेकिन मार्च में उन्हें होली के समय धमकी दी गई। उस समय उन्होंने टीएमसी समर्थकों को 10 किलो चिकन देने से मना कर दिया था। वह कहती हैं, “वे तब से हमें परेशान कर रहे हैं। उन्होंने 2 मई को दुकान में तोड़फोड़ की और अब दुकान के सामने बैरिकेडिंग कर दी गई है। मैं घर नहीं लौट पा रही हूँ।” टीएमसी के आतंक से परेशान होकर अब ये दंपत्ति टौलीगंज इलाके में रहते हैं। ये जगह भवानीपुर से बहुत दूर है।
‘TMC समर्थकों ने गल ढंग से छुआ, बच्चों के साथ पीटा भी’
चुनावी जीत के बाद राज्य में हुई हिंसा के क्रम में एक प्रताड़ना की कहानी पूर्व बर्धमान जिले के खंडघोष से भी है। वहाँ तीन दिन पहले पुलिस सुरक्षा में अपने घर लौटी राखी रॉय ने आरोप लगाया कि उन्हें फिर से टीएमसी समर्थकों द्वारा धमकाया जा रहा है।
रॉय ने दावा किया कि टीएमसी समर्थक कथित तौर पर रविवार रात उनके घर में घुसे, उनके साथ मारपीट की और उनके कपड़े फाड़ दिए और उन्हें जाने की चेतावनी दी। टीएमसी समर्थकों ने कहा कि वह वहाँ से चले जाएँ वरना यह उनके जीवन का आखिरी दिन होगा।
राखी बताती हैं कि उनके साथ हुई मार-पिटाई सोमवार की सुबह की बात है। जब सत्ता पक्ष के समर्थक वापस आए और बच्चों समेत उनकी दोबारा पिटाई कर दी। राखी कहती हैं, “उन्होंने मुझे पीटा और मुझे गलत तरीके से छुआ। उन्होंने मुझे इतनी बुरी तरह से पीटा कि इससे मेरी पीठ पर निशान बन गए हैं।” राखी कहती हैं कि अगर उन्होंने घर नहीं छोड़ा तो उनके पति को मार दिया जाएगा।
गौरतलब है कि राज्य सरकार ने कलकत्ता हाईकोर्ट से उनके फैसले पर रोक लगाने की माँग की थी जिसमें NHRC को हिंसा संबंधी जाँच के आदेश दिए गए थे। लेकिन हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज कर दिया। साथ ही राज्य सरकार को फटकार लगाई। 5 सदस्यीय पीठ ने कहा कि आखिर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पास कैसे 541 शिकायतें आई लेकिन राज्य के पास एक भी शिकायत नहीं आई।