Home Blog Page 3724

‘एक ही प्लेट में खा रहे थे कॉन्ग्रेस नेता और राहुल गाँधी का कुत्ता’: किस्सा उस बैठक का, जिसने 8 राज्यों से कॉन्ग्रेस को साफ़ कर दिया

असम के नए मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा कभी कॉन्ग्रेस में थे, लेकिन 2015 में उनके भाजपा में शामिल होने के साथ ही पूरे उत्तर-पूर्व की राजनीतिक तस्वीर बदल गई और कॉन्ग्रेस वहाँ के सभी राज्यों से साफ़ हो गई। अब स्थिति ये है कि असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, नागालैंड, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम और सिक्किम – आठों राज्यों में भाजपा गठबंधन की सरकार है। अब हिमंत बिस्वा सरमा ने एक किस्सा सुनाया है कि कैसे उनका कॉन्ग्रेस से मोहभंग हुआ।

उन्होंने बताया है कि कब उन्हें एहसास हुआ कि बस अब बहुत हो गया, वो ‘इस आदमी (राहुल गाँधी)’ के साथ काम नहीं कर सकते। इसके लिए उन्होंने एक बैठक का किस्सा सुनाया। उन्होंने राहुल गाँधी को धन्यवाद देते हुए कहा कि उनके कारण ही वो कॉन्ग्रेस से निकले, इसीलिए आज वो मुख्यमंत्री हैं और उन्हें राज्य की सेवा का अवसर मिला है। उन्होंने कहा कि अगर राहुल गाँधी ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया होता तो शायद ये संभव नहीं था।

असम के मुख्यमंत्री ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के कार्यक्रम ‘एक्सप्रेस अड्डा’ में उस बैठक के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि इस बैठक के बारे में बात करते हुए उनसे ज्यादा खुश व्यक्ति कोई नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा कि वो बैठक कहीं अकेले में नहीं हुई थी, बल्कि उससे पहले सोनिया और राहुल गाँधी से उनकी कई बार बातचीत हुई थी। गुलाम नबी आज़ाद और मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे नेता भी इस बातचीत का हिस्सा रहे थे।

52 वर्षीय हिमंत बिस्वा सरमा ने बताया कि कॉन्ग्रेस के साथ मनमुटाव और बातचीत का प्रकरण करीब एक वर्ष तक चला, जिसके बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया और सोनिया गाँधी से मिलने गए। सोनिया गाँधी ने उन्हें अपने बेटे राहुल से मिलने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि राहुल गाँधी के साथ उनकी वो बैठक काफी बुरी रही थी, लेकिन उन्होंने इन चीजों को कभी सार्वजनिक नहीं किया और खुद तक ही रखा।

बकौल हिमंत बिस्वा सरमा, जब भी वो राहुल गाँधी के सामने कोई मुद्दा उठा रहे थे या अपनी बात रख रहे थे, तो वो ‘तो क्या? (So What?)’ कह कर उसका जवाब दे रहे थे। उन्होंने याद करते हुए बताया कि 20 मिनट की इस बैठक में उन्हें कम से कम 50 बार ‘So What’ सुनने को मिला। जब भी हिमंत कुछ कहना चाहते थे, यही जवाब मिलता। असम सीएम ने इसे ‘सामंती संस्कृति’ करार दिया। लेकिन, जिस बैठक की यहाँ बात हो रही है, वो ये बैठक नहीं है।

दरअसल, राजस्थान विधानसभा के स्पीकर सीपी जोशी ने हिमंत बिस्वा सरमा और कॉन्ग्रेस आलाकमान के बीच सुलह कराने के लिए एक फॉर्मूला तैयार किया और फिर समाधान के उद्देश्य से सरमा अन्य नेताओं के साथ उनसे मिलने पहुँचे। उस बैठक में असम के तत्कालीन वयोवृद्ध मुख्यमंत्री तरुण गोगोई और असम में कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अंजन दत्ता भी मौजूद थे। बताते चलें कि अब ये दोनों ही नेता दिवंगत हो चुके हैं।

उस दौरान असम के आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराने पर चर्चा हुई। हिमंत बिस्वा सरमा ने बताया कि उन्होंने सकारात्मक रूप से इस बैठक की शुरुआत की थी और कॉन्ग्रेस पार्टी के हित की बातें कर रहे थे। लेकिन, उन्होंने बताया कि पूरी बातचीत के दौरान राहुल गाँधी बैठक में कोई रुचि ही नहीं दिखा रहे थे और अपने कुत्ते के साथ खेल रहे थे। हिमंत बिस्वा सरमा ने बताया कि उन्हें बाद में पता चला कि उसका नाम ‘पीडी’ है।

2016 के विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस को असम की सत्ता से उखाड़ फेंकने में बड़ी भूमिका निभाने वाले हिमंत बिस्वा सरमा ने बताया, “बैठक के दौरान वहाँ उपस्थित नेताओं के लिए चाय-कॉफी लाई गई। राहुल गाँधी के कुत्ते ने टेबल के पास जाकर उस पर रखी प्लेट से एक बिस्किट निकाल लिया और खाने लगा। फिर राहुल गाँधी मेरी तरफ देख कर मुस्कुराने लगे। मैं ये सोच रहा था कि वो भला मुझे देख कर क्यों ऐसा कर रहे हैं?”

दरअसल, हिमंत बिस्वा सरमा इस हाथ में चाय का कप लेकर इस बात का इंतजार कर रहे थे कि राहुल गाँधी कब कुत्ते द्वारा जूठी की गई उस प्लेट के बदले दूसरी प्लेट मँगवाएँगे। उन्होंने 5 मिनट तक इंतजार किया लेकिन फिर देखा कि तरुण गोगोई और सीपी जोशी जैसे वरिष्ठ नेता उसी प्लेट से बिस्किट उठा कर खा रहे हैं। सरमा ने कहा कि वो हमेशा राहुल गाँधी से मिलने तो नहीं जाते थे, लेकिन उस दिन उन्हें एहसास हुआ कि ये सामान्य है।

हिमंत बिस्वा सरमा ने सुनाया राहुल गाँधी के साथ अपनी अंतिम बैठक का किस्सा (वीडियो साभार: Indian Express)

उन्हें ऐसा भान हुआ कि राहुल गाँधी की हर बैठक में ऐसा ही होता होगा। उन्होंने कहा, “उसी दिन मुझे इसका एहसास हुआ कि अब बहुत हुआ, अब मैं इस व्यक्ति के साथ नहीं रह सकता। लेकिन, मैं उनका धन्यवाद भी करता हूँ। मैं आज इस पद पर हूँ, तो इसका श्रेय उस बैठक को भी जाता है और इस तथ्य को भी कि राहुल गाँधी को मेरा कॉन्ग्रेस में होना पसंद ही नहीं था।” बता दें कि सरमा ने कॉन्ग्रेस में 22 साल बिताए थे।

LLB और Ph.D जैसी डिग्रियाँ हासिल कर के कभी गुवाहाटी हाईकोर्ट में बतौर अधिवक्ता प्रैक्टिस करने वाले हिमत बिस्वा सरमा 2001 में पहली बार जलुकबारी से विधायक बने थे और अगले ही साल उन्हें मंत्री पद सौंपा गया। तरुण गोगोई की सरकारों में उन्होंने कई बड़े मंत्रालय संभाले। उन्होंने जुलाई 2014 में ही कॉन्ग्रेस के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन एक साल तक चली बातचीत की प्रक्रिया में अपने कटु अनुभव के बाद अगस्त 2015 में भाजपा में आ गए।

’11 हजार बेघर, 40 हजार प्रभावित’: बंगाल हिंसा पर 114 SC/ST प्रोफेसरों ने राष्ट्रपति को लिखा पत्र

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद हुई हिंसा मामले में अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) वर्ग के 114 प्रोफेसरों ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिखा है। इस पत्र में टीएमसी पर कार्रवाई की अपील की गई है।

टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार रोहन दुआ ने यह पत्र ट्विटर पर शेयर किया है। इस पत्र के मुताबिक चुनाव के बाद राज्य में भड़की हिंसा ने 11 हजार लोगों को बेघर कर दिया है। इनमें अधिकांश अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग से हैं। पत्र बताता है कि, 40,000 लोग इस हिंसा से प्रभावित हुए और 1627 बर्बर हमले दर्ज किए गए।

इसमें लिखा है कि हिंसा के दौरान 5000 से अधिक घर जला दिए गए। वहीं 26 लोग मारे भी गए। इसके बाद 2000 से अधिक लोगों को जो असम, झारखंड और ओडिशा में शरण लेनी पड़ी।

पत्र के मुताबिक, तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं ने राज्य पुलिस के साथ मिलकर उस दौरान अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों पर न केवल जमकर अत्याचार किया बल्कि वहाँ हिंसा भड़काई, लोगों को मारा, औरतों से रेप किया और जमीन पर कब्जा कर लिया। इसलिए वह चाहते हैं कि एससी/एसटी समुदाय को बचाने के लिए मामले में हस्तक्षेप किया जाए।

साथ ही पत्र में कहा गया है कि एससी/एसटी समुदाय के जो लोग इससे प्रभावित हुए हैं उनके घर दोबारा से बनवाकर उनके पुनर्वास पर काम किया जाए। साथ ही पीड़ितों को तत्काल प्रभाव से मेडिकल व अन्य सुविधाएँ और सुरक्षा दिया जाए। 

बता दें कि सेंटर फॉर सोशल डेवलपमेंट (सीएसडी) के बैनर के तहत यह पत्र लिखा गया है। इस पर डीयू के अफ्रीकन स्टडीज विभाग के पूर्व हेड प्रोफेसर सुरेश कुमार और डीयू में ही लाइब्रेरी साइंस से जुड़े प्रोफेसर केपी सिंह के पहले पन्ने पर हस्ताक्षर हैं।

गौरतलब हो कि इससे पहले इस मुद्दे 46 सेवानिवृत्त अधिकारियों ने राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद को पत्र लिखकर मामले में SIT गठित करने की माँग की थी। साथ ही राज्य में हुई इस व्यापक राजनीतिक हिंसा के मद्देनजर 2093 महिला वकीलों ने भी भारत के मुख्य न्यायाधीश एन वी रमन्ना को पत्र लिखकर मामले में संज्ञान लेने की अपील की थी।

‘सर सलामत तो पगड़ी हजार’: स्टूडेंट्स की कॉन्फ्रेंस में PM मोदी की सरप्राइज एंट्री, ओलंपिक से लेकर शाहरुख खान तक की हुई बात

शिक्षा मंत्रालय द्वारा गुरुवार (3 जून 2021) को CBSE छात्रों और उनके अभिभावकों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का आयोजन किया गया था। अचानक से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसमें शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने छात्रों और अभिभावकों से चर्चा की और परीक्षा रद्द होने पर उनके विचार जाने। पीएम मोदी से चर्चा के दौरान छात्र उत्साहित नजर आए और उन्होंने खुलकर पीएम मोदी से बात की।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान पीएम मोदी ने अचानक पहुँच कर कहा कि वे आशा करता हैं कि छात्र मजे में होंगें। पीएम मोदी ने कहा, “आशा करता हूँ कि मैंने आपको डिस्टर्ब नहीं किया।” इसके बाद बेंगलुरु के मल्लेश्वरम के एक छात्र अभिराम ने परीक्षा रद्द करने पर पीएम मोदी का धन्यवाद करते हुए कहा, “सर सलामत तो पगड़ी हजार।” अभिराम ने पीएम मोदी को बताया कि वह अपने आप को फिट रखने के लिए 30 मिनट तक योग और व्यायाम करता है।

छात्रों से चर्चा के दौरान पीएम मोदी ने छात्रों से उनकी रुचि और उनकी दिनचर्या के बारे में प्रश्न किया। इसके अलावा उन्होंने छात्रों से कहा कि परीक्षा समाप्त होने के बाद वे इस समय का सदुपयोग करें और ओलंपिक में जा रहे भारतीय खिलाड़ियों के बारे में पढ़ें।

छात्रों से चर्चा के दौरान एक मजेदार वाकया भी देखने को मिला जब एक छात्र की माँ ने कहा कि शाहरुख खान से मिलने की इतनी खुशी नहीं हुई जितनी पीएम मोदी से बात करके हो रही है।

01 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में इस साल होने वाली 12वीं की CBSE की परीक्षाओं को रद्द करने का निर्णय लिया था। यह निर्णय कोरोना वायरस संक्रमण के चलते लिया गया था। CBSE द्वारा 12वीं की परीक्षाओं को रद्द करने के बाद मध्य प्रदेश, गुजरात, हरियाणा और उत्तराखंड ने भी बोर्ड परीक्षाएँ रद्द कर दी हैं।   

पूरा वीडियो इस लिंक पर क्लिक करके देखा जा सकता है।

एक अस्पताल ऐसा भी: इलाज के दौरान किसी कोरोना मरीज की मौत नहीं, 94% का आयुर्वेदिक उपचार

कोरोना संक्रमण के दौरान दिल्ली सहित देश की कई हिस्सों से अस्पतालों में संक्रमितों की मौत के बाद लापरवाही जैसे इल्जाम सामने आए हैं। लेकिन राष्ट्रीय राजधानी में एक अस्पताल ऐसा भी जहाँ भर्ती होने के बाद सभी के सभी संक्रमित ठीक होकर अपने घर लौटे। इनमें से ज्यादातर को उपचार के दौरान एलोपैथी दवाइयों का सेवन तक नहीं करना पड़ा।

इस अस्पताल का नाम- ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ आयुर्वेद (AIIA) है। साल 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका उद्घाटन किया था। यहाँ क्लिनिकल रिसर्च के लिए 200 बेड्स का रेफरल अस्पताल, 25 विशेष विभाग और आठ अंतर-अनुशासनात्मक अनुसंधान प्रयोगशालाओं के साथ 12 क्लीनिक हैं।

जानकारी के मुताबिक, कोरोना से संक्रमित करीब 600 मरीजों का यहाँ इलाज हुआ है। अच्छी बात ये है कि इनमें से अधिकांश यहाँ से ठीक होकर घर लौटे। एक मरीज को लेकर बताया जा रहा है कि उसकी तबीयत बिगड़ गई थी, इसलिए उसे दूसरे अस्पताल में रेफर कर दिया गया। वहाँ भी उसे बचाया न जा सका और उसकी मौत हो गई। 

अस्पताल ने कुल 592 माइल्ड और मॉडरेट कैटेगरी के मरीजों का इलाज किया। प्रशासन का कहना है कि इलाज के लिए जो संक्रमित वहाँ भर्ती हुआ वह ठीक होकर घर गए। इनमें से 94 फीसद मरीजों को तो प्योर आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट देकर ठीक किया गया। 6% ऐसे भी मरीज रहे जिनकी बीमारी देखते हुए उन्हें एलोपैथ का इलाज दिया गया। इसमें वह मरीज भी शामिल है, जिसे गंभीर हाल में रेफर करना पड़ा था।

AIIA की निदेशक डॉ तनुजा नेसारी ने पीटीआई से बातचीत में बताया, “संस्थान में 94 प्रतिशत से अधिक रोगियों को शुद्ध आयुर्वेदिक उपचार प्रदान किया गया था, और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के दिशा-निर्देशों के अनुसार जहाँ कहीं भी जरूरत थी एलोपैथी का उपयोग किया गया। यही हमारी सफलता का कारण है। हमने एक समग्र और एकीकृत दृष्टिकोण अपनाया है।”

उन्होंने बताया,

“600 मरीजों में से 200 मरीज कोरोना की दूसरी लहर में अस्पताल में भर्ती हुए। लेकिन सबसे अच्छा ये था कि यहाँ आयुर्वेद और एलोपैथी दोनों इलाज है। एलोपैथी या आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट लैब से आए टेस्ट देखने के बाद ही किया जाता है। यहाँ कोई भी दवाई आँख बंद कर नहीं दी जाती। हर केस मॉनिटर होता है। ये आधुनिक फैसिलिटी है। हमारे पासे पैथोलॉजी और रेडियोलॉजी लैब हैं। हम सीटी स्कैन, सीआरपी और डी-डाइमर टेस्ट लगातार करवाते हैं। इसके बाद संयुक्त रूप से निर्णय लिया जाता है कि मरीज को आयुर्वेदिक इलाज देंगे या फिर एलोपैथी। पहले हम आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट ऑक्सीजन थेरेपी के साथ देते हैं। अगर जरूरत पड़ती है तो एलोपैथी की मदद लेते हैं। इसमें ICMR दिशा-निर्देशों के मुताबिक स्टेरॉएड आदि शामिल हैं।”

इस अस्पताल में 40 आयुर्वेद और 5 एलोपैथी के डॉक्टर हैं। अस्पताल में ICU हैं और एम्स व राजीव गाँधी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के डॉक्टर समय-समय पर ऑनलाइन परामर्श देते हैं। उदारहरण के लिए वह डॉक्टर्स को बताते हैं कि उन्हें ऑक्सीजन स्तर गिरने पर तत्काल क्या करना है और ज्यादा गंभीर केसों पर उनके यहाँ रेफर कर देना है। 

उन्होंने कहा कि एआईआईए ने अपने एक से दो प्रतिशत रोगियों को ही ज्यादा देखभाल के लिए कहीं और रेफर किया है। यहाँ मरीज के रहने की अवधि 9 से 10 दिन है, जबकि अस्पतालों ने बताया है कि मध्यम लक्षणों वाला एक कोविड रोगी 10-14 दिनों तक भर्ती रहता है और एक गंभीर रोगी को मेडिकल ऑक्सीजन पर निर्भरता के कारण एक महीने तक का समय लग सकता है।

डॉ. नेसारी के मुताबिक उनके संस्थान में 99.99% मरीज पूरी तरह से ठीक हुए। कोरोना के मरीजों के लिए 47 बेड वाले इस अस्पताल में इलाज आयुर्वेदिक दवा, योग, हवन और प्राणायाम के दम पर किया जाता है। मरीजों को योग, प्राणायाम कराया जाता है। अस्पताल का स्टॉफ भी योग और प्राणायाम करता है। सुबह के वक्त यज्ञ और हवन किया जाता है। मरीजों को अस्पताल का स्टाफ ठीक होने के लिए प्रोत्साहित भी करता है। गिलोई, कुछ हर्ब्स, आयुष 64, आयुष काढ़ा और अश्वगंधा मरीजों के इलाज में दिया जाता है। इनके अलावा आपात स्थिति में यहाँ सुवर्णकल्प, स्वस चिंतामणि, स्वर्ण भूपति सहित आयुर्वेदिक दवाओं का उपयोग किया जाता है। साथ ही रोगियों के लिए ट्रीटमेंट शेड्यूल में प्रार्थना, योग, ध्यान, आयुर्वेद, गरारा, हल्का व्यायाम और दवाएँ दी जाती हैं।

कोरोना कोई बीमारी नहीं… अल्लाह के सामने गिड़गिड़ाकर माफी माँगने से ही खत्म होगी: SP सांसद शफीकुर्रहमान बर्क

मुरादाबाद से समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसद एसटी हसन के बाद अब संभल के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने भी विवादित बयान दिया है। सपा सांसद बर्क का कहना है कि कोरोना कोई बीमारी नहीं है, बल्कि आजादे इलाही है जो अल्लाह के सामने गिड़गिड़ाकर माफी माँगने से ही खत्म होगी।

बर्क ने कहा कि कोरोना अगर बीमारी होती तो इसका इलाज मिल गया होता। कोरोना की यह बीमारी आजादे इलाही है जो अल्लाह के सामने गिड़गिड़ाकर माफी माँगने से ही खत्म होगी। वे यहीं नहीं रुके। सपा सांसद ने यह भी कह दिया कि मौजूदा भाजपा सरकार ने न केवल इस्लामिक कानून शरीयत के साथ खिलवाड़ किया है, बल्कि लड़कियों से रेप, मॉब लिंचिंग और कई जुल्म-ज्यादतियाँ करवाई की जिसके कारण ही कोरोना जैसी आसमानी आफत आई है।

सपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने कहा कि उन्होंने तो पहले ही कह दिया था कि कोरोना कोई बीमारी है ही नहीं। बर्क ने कहा कि उन्होंने पहले ही मुस्लिमों के लिए मस्जिदों और ईदगाहों में नमाज पढ़ने की माँग की थी लेकिन सरकार ने इसकी इजाजत नहीं दी और आज सरकार की इन्हीं गलतियों के कारण आसमानी आफत आई है। बर्क अक्सर अपने बयानों के कारण चर्चा में रहते हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राम मंदिर के शिलान्यास को गैर-कानूनी करार दिया था और कहा था कि सत्ता और हिन्दुत्व के बल पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई से फैसला लिखाया गया है।

इससे पहले सपा सांसद डॉक्टर एसटी हसन ने विवादित और गैर-जिम्मेदाराना बयान दिया था। उन्होंने कोरोना वायरस संक्रमण के दौरान हुई मौतों और पिछले दिनों देश में आए दो चक्रवातों के लिए मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराया था और कहा था कि यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि भाजपा सरकार ने शरीयत में दखल दी है।

2 बार नाकाम रही, तीसरी बार शाहिदा ने शौहर का कर दिया काम तमाम; शव के 4 टुकड़े कर किचन में दफनाया

मुंबई पुलिस ने हत्या के एक चौंकाने वाले मामले का खुलासा किया है। कई दिनों से गायब रईस का शव उसके घर के किचन से बरामद किया है। उसकी हत्या के आरोप में उसकी 28 वर्षीय बीवी शाहिदा और उसके प्रेमी अमित विश्वकर्मा को गिरफ्तार किया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अपने नाजायज रिश्ते को छिपाने के लिए दोनों ने मिलकर रईस का बेरहमी से कत्ल कर बाद में किचन में दफन कर दिया।

दहिसर में रहने वाली इस महिला की कारस्तानी शायद कुछ दिन छिप जाती लेकिन उसकी 6 साल की बेटी ने सारा भंडाफोड़ कर दिया। मुंबई पुलिस के जोन 11 के DCP विशाल ठाकुर के ने बताया कि उत्तर प्रदेश के गोंडा निवासी रईस का निकाह साल 2012 में शाहिदा से हुआ था। निकाह के बाद दोनों मुंबई आकर दहिसर पूर्व के खान कंपाउंड में किराए के घर में रहने लगे। दोनों के 2.5 साल का बेटा तथा 6 साल की बेटी भी थी।

रईस दहिसर में ही रेलवे स्टेशन के पास एक कपड़े की दुकान में नौकरी करता था। पुलिस के अनुसार रईस की गैरमौजूदगी में अनिकेत उर्फ अमित उसके घर आता-जाता था। उसके शाहिदा के साथ नाजायज रिश्ते बन गए थे। जब इसका शक रईस को हुआ तो पति-पत्नी में झगड़ा होने लगा। रोज-रोज की झंझट से छुटकारा पाने के लिए शाहिदा ने अपने प्रेमी के साथ उसको रास्ते से हटाने का फैसला किया।

गिरफ्तारी के बाद शाहिदा ने बताया कि उसने पूर्व में भी दो बार रईस को जान से मारने की कोशिश की थी लेकिन नाकामायब रही। बीते 20 मई को जब रईस घर से बाहर निकला तो अमित उसके घर आ गया। दोनों आपत्तिजनक अवस्था में थे कि अचानक रईस घर पहुँच गया। इसके बाद उसकी शाहिदा के साथ मारपीट हुई। इसी दौरान शाहिदा ने चाकू घोंपकर उसकी हत्या कर दी। बाद में अमित के साथ मिलकर उसका गला काटा।

इस बीच रईस-शाहिदा की 6 साल की बेटी ने सबकुछ देख लिया। महिला ने बच्ची को धमकाया और कहा कि अगर उसने कुछ बताया तो उसे भी काटकर दफना देगी। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, शाहिदा ने रईस के शव के चार टुकड़े कर किचन में दफना दिया और उसका फोन अपने पास रख लिया।

शाहिदा की बातों पर और रईस के अचानक गायब होने पर जब उसके दोस्तों को शक हुआ तो उनमें से किसी ने दहिसर थाने में मुकदमे को दायर करवाया। मामले में जाँच शुरू हुई और पुलिस ने बच्ची से अकेले में पूछताछ की। बच्ची की गवाही ने सबको हक्का-बक्का कर दिया। बच्ची के बयान के आधार पर घर की किचन खुदवाकर रईस की लाश को बरामद कर लिया गया। बाद में शाहिदा ने भी अपना जुर्म कबूल लिया और पुलिस ने उसे और उसके प्रेमी को गिरफ्तार कर लिया।

सेंट्रल विस्टा पर विलाप, राजस्थान में ₹125 करोड़ के प्रोजेक्ट का शिलान्यास: कॉन्ग्रेस की हिप्पोक्रेसी का ताजा नमूना

जब से मोदी सरकार ने सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को हरी झंडी दी है तब से ही राहुल गाँधी, उनकी कॉन्ग्रेस पार्टी और पार्टी के कई नेता इस प्रोजेक्ट को रोकने के लिए केंद्र सरकार के खिलाफ लामबंद हो रहे हैं। कॉन्ग्रेस पार्टी और शशि थरूर जैसे उसके नेताओं ने सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को ‘क्रिमिनल वेस्टेज’ कहते हुए इस पूरी परियोजना को ही रद्द करने की माँग की।

जहाँ एक ओर कॉन्ग्रेस सेंट्रल विस्टा को ‘जनता के पैसों की बर्बादी’ बता रही है, वहीं दूसरी ओर राजस्थान में कॉन्ग्रेस की ही सरकार ने में 125 करोड़ रुपए की पुनर्निर्माण परियोजनाओं को मँजूरी दी है। राजस्थान सरकार द्वारा जारी किए गए एक विज्ञापन में बताया गया है कि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत 03 जून 2021 को जोधपुर में तीन परियोजनाओं का शिलान्यास करेंगे।

राजस्थान कॉन्ग्रेस के द्वारा दिया गया विज्ञापन

राजस्थान सरकार द्वारा मँजूर की गई तीन परियोजनाएँ हैं: सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, इंटरनेशनल स्टैन्डर्ड ऑडिटोरियम और बरकतुल्लाह खान स्टेडियम का पुननिर्माण। इनके लिए क्रमशः 45 करोड़ रुपए, 60 करोड़ रुपए और 20 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की गई है। इसके अलावा इसके विज्ञापन पर भी कई करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं।   

जैसे ही राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार का यह विज्ञापन सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, यूजर्स ने कॉन्ग्रेस की हिप्पोक्रेसी पर जमकर निशाना साधा। सोशल मीडिया यूजर्स ने कहा कि कॉन्ग्रेस सेंट्रल विस्टा को जनता के पैसों की बर्बादी कहती है, लेकिन राजस्थान में खुद पुनर्विकास परियोजनाओं में करोड़ों खर्च कर रही है। केन्द्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी समेत कई यूजर्स ने राजस्थान में वैक्सीन की बर्बादी पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि वैक्सीन की बर्बादी पर चुप रहने वाले महामारी के दौर में भी पुनर्विकास परियोजनाओं पर करोड़ों खर्च करने के लिए तैयार हैं।

राजस्थान के अलावा कॉन्ग्रेस के गठबंधन वाली महाराष्ट्र की महाविकास अघाड़ी सरकार ने भी नरीमन पॉइंट में विधायकों के आवास (हॉस्टल) के लिए 900 करोड़ रुपए का टेंडर निकाला था। महाराष्ट्र सरकार के इस निर्णय की आलोचना की गई क्योंकि यह टेंडर ऐसे समय में निकाला गया जब राज्य Covid-19 महामारी के भीषण दौर में था और कई आर्थिक समस्याएँ सामने खड़ी थीं।  

हालाँकि मोदी सरकार पर सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को लेकर लगातार हमला करने वाले राहुल गाँधी महाराष्ट्र और राजस्थान सरकार द्वारा महामारी के समय करोड़ों रुपए खर्च किए जाने के मामले पर चुप हो जाते हैं। जबकि सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को मँजूरी चायनीज कोरोना वायरस संक्रमण के शुरू होने से पहले ही दे दी गई थी।  

जिसने PM मोदी के लिए कहा था- बोटी-बोटी कर देंगे, उस इमरान मसूद को कॉन्ग्रेस ने बनाया AICC सचिव

हिंदू और मोदी विरोधी बयानों को लेकर चर्चा में रहने वाले इमरान मसूद को कॉन्ग्रेस ने राष्ट्रीय सचिव बनाया है। बतौर ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस कमेटी (AICC) के सचिव उन्हें दिल्ली की जिम्मेदारी दी गई है। गुरुवार 3 जून 2021 को कॉन्ग्रेस ने ​5 नामों की घोषणा की जिन्हें AICC सचिव के तौर पर अलग-अलग राज्यों की जिम्मेदारी दी गई है। इनमें एक नाम मसूद का भी है। 2014 के लोकसभा चुनावों से मसूद ने नरेंद्र मोदी की बोटी-बोटी करने की धमकी दी थी।

टाइम्स नाऊ की रिपोर्ट बताती है कि कोरोना काल में इमरान मसूद के काम को देखते हुए उन्हें यह जिम्मेदारी दी गई है। खबर के अनुसार, पार्टी जानती है कि इस नियुक्ति से उनकी आलोचना होगी क्योंकि मसूद हमेशा ही नेगेटिव कारणों से मीडिया चर्चा में रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस कमेटी ने कुछ संगठनात्मक बदलाव किए हैं। इसमें कॉन्ग्रेस के अल्पसंख्यक विभाग के चेयरमैन पद जिम्मेदारी इमरान प्रतापगढ़ी को दी गई है। इसके अलावा कुछ AICC सचिवों की भी नियुक्ति हुई है।

पार्टी के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल की ओर से जारी विज्ञप्ति के अनुसार, कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने इन सचिवों की नियुक्ति की है। सप्तगिरि उलका को छत्तीसगढ़, दीपिका पांडे को उत्तराखंड, संजय दत्त को हिमाचल प्रदेश और ब्रजलाल बिहारी को बिहार की जिम्मेदारी मिली है।

इमरान मसूद को लेकर हुए विवाद

बता दें कि इससे पहले 2019 के लोकसभा चुनावों में इमरान मसूद को कॉन्ग्रेस ने उत्तर प्रदेश की चुनाव समिति का हिस्सा बनाने का निर्णय लिया था। साल 2014 में उन्हें सहारनपुर से प्रत्याशी के तौर पर उतारा था। उस समय मसूद ने सार्वजनिक रैली में घोषणा की थी कि वह ‘नरेंद्र मोदी के टुकड़े-टुकड़े कर देगा’।

इसके अलावा साल 2019 में ही इमरान मसूद अपनी बीवी के साथ समारो में डांस करने के कारण चर्चा में आए थे। उस समय, इमरान की डांस वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मुस्लिम संगठनों और मौलानाओं ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई थी। साथ ही मौलानाओं ने ये भी कहा था कि ये सब इस्लाम के ख़िलाफ़ है इसलिए इमरान को माफी माँगनी चाहिए।

वीडियो में कॉन्ग्रेसी नेता को उड़े जब-जब जुल्फें तेरी पर डांस करते देखा गया था। वीडियो को देखने के बाद इत्तेहाद उलेमा-ए-हिंद के अध्‍यक्ष मौलाना कारी मुस्तफा देहलवी ने मीडिया से हुई अपनी बातचीत में कहा, “इमरान मसूद की पत्‍नी को इस तरह के गानों पर नाचना, खुलेआम बेपर्दा होकर डांस करना जायज नहीं है, यह हराम है और इस्‍लाम इसकी इजाजत नहीं देता है। इस्‍लाम में इसकी मनाही है। इन लोगों को फौरी तौर पर अल्‍लाह से तौबा करनी चाहिए और माफी माँगनी चाहिए, यह बहुत बड़ा जुर्म है।” 

मॉडल टेनेंसी ऐक्ट: नल कौन बदलेगा? पुताई कौन करवाएगा? – किराएदार और मकान मालिक दोनों की सुरक्षा की गारंटी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार (2 जून, 2021) को हुई केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में मॉडल किराएदारी अधिनियम या मॉडल टेनेंसी ऐक्ट (MTA) के मसौदे को मंजूरी दे दी गई है। सरकार ने कहा कि इस कानून की सहायता से देश भर में मकानों को किराए पर देने और इससे संबंधित प्रक्रियाओं के कानूनी ढाँचे को दुरुस्त करने में आसानी होगी।

मॉडल टेनेंसी ऐक्ट का उद्देश्य 2022 तक सभी को मकान देने के लक्ष्य में सहायता करना है। साथ ही MTA देश में मकान मालिकों और किराएदारों के विवादों को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभा सकता है। मॉडल टेनेंसी ऐक्ट का खाका सबसे पहले 2019 में बजट के दौरान रखा गया था।

क्या है मॉडल टेनेंसी ऐक्ट और क्यों हुई इसकी आवश्यकता

  • मॉडल किराएदारी अधिनियम या मॉडल टेनेंसी ऐक्ट एक मॉडल कानून है, जिसकी अधिसूचना आवासन एवं शहरी कार्य मंत्रालय द्वारा जारी की गई थी और इसे राज्यों के पास फीडबैक के लिए भेजा गया था। यह मॉडल कानून राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए एक गाइडिंग कानून का काम करेगा। चूँकि संविधान के अनुसार भूमि तथा उससे संबंधित अधिकार राज्य सूची के विषय हैं, अतः राज्यों को इस पर कानून बनाने का अधिकार प्रदान किया गया है।
  • भारत में साल 2022 तक सभी को आवास की सुविधा देने का लक्ष्य रखा गया है। इसमें किराए पर घर लेने की सुविधा भी शामिल है क्योंकि देश की बड़ी जनसंख्या अपने घर को छोड़ कर दूसरे राज्यों में काम की तलाश में जाती है। उन राज्यों में ये लोग अपना खुद का घर बनाने या खरीदने की तुलना में किराए पर रहना पसंद करते हैं। हालाँकि किराए की इस व्यवस्था में न तो किराएदार का शोषण हो और न ही मकान मालिक का नुकसान हो, इसके लिए इस मॉडल टेनेंसी कानून की आवश्यकता पड़ी।
  • किराएदारी व्यवस्था में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के निर्धारण के लिए इस मॉडल कानून का मसौदा जारी किया गया।
  • प्रधानमंत्री आवास योजना (अर्बन) के अंतर्गत राज्यों के द्वारा एक मेमोरंडम ऑफ अंडरस्टैन्डिंग (MoU) साइन किया गया, जिसमें कहा गया कि राज्य या केंद्र शासित प्रदेश मॉडल टेनेंसी ऐक्ट के अनुसार या तो नया कानून बनाएँगे या पहले से जो कानून बने हुए हैं, उनमें संशोधन करेंगे।

क्या हैं कानून के प्रमुख बिन्दु

मॉडल टेनेंसी ऐक्ट के अंतर्गत मकान मालिकों और किराएदारों से संबंधित कई मुद्दों पर स्पष्ट रूप से विवादों के निपटान, जिम्मेदारियों और किराए के निर्धारण के विषय में बताया गया है। इन्हें किराएदारी व्यवस्था के प्रत्येक पहलू के आधार पर समझा जा सकता है।

कानून का कार्यक्षेत्र: यहा ध्यान देने योग्य बात यह है कि मॉडल टेनेंसी ऐक्ट ग्रामीण और शहरी दोनों ही क्षेत्रों के लिए समान रूप से कार्य करेगा। इसके अलावा कानून के कार्यक्षेत्र को वृहद और सर्वमान्य बनाने के लिए इसके अंतर्गत एक ऐसे डिजिटल प्लेटफॉर्म के निर्माण की बात की गई है, जो स्थानीय भाषाओं या राज्य की भाषाओं में कार्य करेगा। इससे देश के किसी भी कोने में एग्रीमेंट या अन्य दस्तावेजों को लेकर किसी प्रकार की कोई समस्या उत्पन्न नहीं होगी। इसके साथ ही यह घरेलू एवं व्यवसायिक, दोनों ही परिस्थितियों में लागू होगा।

एग्रीमेंट सबसे पहली आवश्यकता: किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में मॉडल टेनेंसी ऐक्ट के लागू होने या पहले से उपस्थित कानूनों में संशोधन होने के बाद बिना एग्रीमेंट के किसी भी संपत्ति को किराए पर लेना या देना असंभव हो जाएगा। इसके अलावा यदि मकान मालिक एग्रीमेंट के मुताबिक किराएदार को पूर्व नोटिस देता है तो किराएदार को घर या व्यवसायिक संपत्ति को खाली करना पड़ सकता है।

मकान मालिक और किराएदार की जिम्मेदारी: संपत्ति में किसी भी प्रकार के निर्माण, पेंट-पुताई, बाहरी इलेक्ट्रिकल सुधार और संबंधित रख-रखाव की जिम्मेदारी मकान मालिक की होगी जबकि नाली, दरवाजे और खिड़कियाँ, घर के अंदर के स्विच और सॉकेट, गार्डन और रसोई (किराएदार द्वारा उपयोग की जा रही) के रख-रखाव और मरम्मत की जिम्मेदारी किराएदार की होगी। इसके अलावा मकान मालिक को किराए में दी गई अपनी संपत्ति का जायजा लेने के लिए 24 घंटे का पूर्व नोटिस देना होगा।

सुरक्षा जमा निधि: मकान मालिक किराए पर दी गई अपनी संपत्ति के एवज में अधिकतम दो महीने का किराया ही सुरक्षा निधि (Security Deposit) के रूप में ले सकेंगे। इसके अलावा व्यवसायिक संपत्तियों के मामले में किराएदारों को 6 महीने की अवधि के लिए सुरक्षा निधि जमा करनी होगी।

विवादों का निपटारा: मॉडल टेनेंसी ऐक्ट के तहत एक तय समय-सीमा में विवादों के निपटारे के लिए शिकायत निवारण तंत्र की स्थापना पर जोर दिया गया है। साथ ही ऐक्ट में विवादों के त्वरित निपटान के लिए रेंट अथॉरिटी, रेंट कोर्ट और रेंट ट्रिब्यूनल की स्थापना के प्रावधान भी किए गए हैं। मॉडल टेनेंसी ऐक्ट में रेंट कोर्ट और रेंट ट्रिब्यूनल द्वारा विवादों के निपटारे के लिए 60 दिनों की समय सीमा तय की गई है। इस ऐक्ट की धारा-30 में स्पष्ट रूप से यह कहा गया है कि कोर्ट या ट्रिब्यूनल बनने के बाद यह मामले दीवानी अदालतों में नहीं जाएँगे। इससे इनके त्वरित निपटान में सहायता मिलेगी।

मॉडल टेनेंसी ऐक्ट के फायदे

  • केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने 2011 की जनसंख्या के आँकड़ों के अनुसार बताया कि देश में लगभग 1 करोड़ घर खाली पड़े हैं, जो किराएदारी व्यवस्था में शामिल किए जा सकते हैं।
  • मॉडल टेनेंसी ऐक्ट के राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में लागू होने के पश्चात किराएदारों और मकान मालिकों के परस्पर हितों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी। अर्थात न तो किराएदारों का उत्पीड़न किया जा सकेगा और न ही मकान मालिकों को नुकसान होगा।
  • इस ऐक्ट के तहत मकान मालिकों को किराएदारों द्वारा अपनी संपत्ति पर कब्जा जमाने के भय से मुक्ति मिलेगी और अधिकांश मकान मालिक अपने खाली पड़े घरों को किराए पर देने के लिए आगे आएँगे।
  • डिजिटल प्लेटफॉर्म और एग्रीमेंट की अनिवार्यता से इस ऐक्ट में पारदर्शिता की पर्याप्त व्यवस्था की गई है।
  • चूँकि यह एक मॉडल कनून है, ऐसे में राज्य तथा केंद्र शासित प्रदेश अपनी परिस्थितियों एवं जरूरतों के हिसाब से कानून बना सकते हैं।  
  • इस कानून के अस्तित्व में आने के बाद देश में कई हाउसिंग सोसायटी में भी किराएदारी व्यवस्था के लागू करने का रास्ता साफ हो जाएगा।
  • चूँकि यह कानून पुराने किराएदारी कानूनों को समाप्त करने के लिए नहीं कहता है, इसलिए राज्य मॉडल टेनेंसी ऐक्ट की तर्ज पर ही पुराने कानूनों में संशोधन के लिए स्वतंत्र हैं।

साल 2015 में प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) की शुरुआत की गई थी, जिसका लक्ष्य है 31 मार्च 2022 तक सभी गरीबों को आवास उपलब्ध कराना। इसके तहत 20 मिलियन किफायती आवास के निर्माण का लक्ष्य रखा गया है। इस योजना के दो अंग हैं,  प्रधानमंत्री आवास योजना (अर्बन) और प्रधानमंत्री आवास योजना (रुरल)।

मॉडल टेनेंसी ऐक्ट के अस्तित्व में आने के बाद इस लक्ष्य को पूरा करने में सहायता मिलेगी। क्योंकि जैसा कि पहले ही बताया गया है कि अधिकांश प्रवासी कामगार अपना निजी घर बनाने के स्थान पर किराए पर घर लेना ज्यादा पसंद करते हैं और यदि मॉडल टेनेंसी ऐक्ट उचित सुरक्षा और बेहतर जवाबदेही सुनिश्चित कर पाया तो न केवल लाखों प्रवासी कामगारों को रहने का ठिकाना मिलेगा बल्कि मकान मालिकों की आय के स्रोत के भी खुलेंगे।

‘रामदेव को नहीं रोक सकते’: DMA से दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा- कोरोना की दवाई खोजें, समय बर्बाद न करें

एलोपैथ पर बाबा रामदेव के बयान और पंतजलि के कोरोनिल के खिलाफ दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन (DMA) ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। दिल्ली हाई कोर्ट ने आज (जून 3, 2021) योग गुरु की बातों को एक राय बताते हुए कहा कि इसे अभिव्यक्ति की आजादी के तौर पर देखा जाना चाहिए।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार DMA द्वारा फाइल किए गए मुकदमे पर जस्टिस सी हरि शंकर की एकल पीठ ने सुनवाई की। कोर्ट ने बाबा रामदेव के बयान पर कहा, “यह एक राय है…कोई भी मामला जहाँ बयानों पर रोक लगाने की बात हो उसे अनुच्छेद 19 (1) (ए) के तहत परीक्षण किया जाता है। ये एक अधिकार है…इस्तेमाल की गई भाषा आपत्तिजनक हो सकती है।”

कोर्ट ने आगे कहा, “मुझे नहीं लगता कि आपका एलोपैथिक पेशा इतना नाजुक है.. ये किसी का विचार है कि एलोपैथिक दवाओं की अक्षमता के कारण इतने लोग मारे गए हैं। मुझे लगता है कि यह अनुच्छेद 19(1)(ए) के अंतर्गत आता है।”

कोर्ट ने कहा कि व्यक्ति अपनी राय रख सकते हैं। इसके लिए उनके खिलाफ मुकदमा दायर नहीं किया जा सकता है। अदालत ने कहा,

“अगर मुझे लगता है कि कुछ विज्ञान फर्जी है, कल मुझे लगता है कि होम्योपैथी नकली है…तो क्या आपका मतलब है कि वे मेरे खिलाफ मुकदमा दायर करेंगे? यह जनता की राय है।रामदेव एक व्यक्ति हैं।उन्हें एलोपैथी पर विश्वास नहीं है। उनका मानना ​​​​है कि योग और आयुर्वेद से सब कुछ ठीक हो सकता है। अब ये सही या गलत हो सकता है। एलोपैथिक किसी के लिए काम करती है और किसी के लिए नहीं, यह सबका अपना-अपना नजरिया है। हम इस मामले में नोटिस जारी कर सकते हैं, लेकिन हम रामदेव को रोक नहीं सकते हैं।”

अदालत ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद बाबा रामदेव को अन्य बातों के साथ पतंजलि की कोरोनिल पर ये जानकारी फैलाने के लिए कि वो एक कोविड ट्रीटमेंट है, समन जारी किया। इसके अलावा कोर्ट ने कहा कि वह बिना रामदेव बाबा का पक्ष जानें कोई भी आदेश पास नहीं कर सकते।

कोर्ट ने DMA की ओर से पेश वकील से यह भी सवाल किया, “क्या ये धारा 91 का केस है? आप यहाँ कुछ भी नहीं कह सकते हैं। आप कहते हैं, “हे भगवान! रामदेव ने कुछ कह दिया… आप लोगों को तो इस समय महामारी से बचाने के तरीके खोजने चाहिए न कि कोर्ट में आकर समय बर्बाद करना चाहिए।”

DMA की ओर से दलीलें और कोर्ट के तर्क

वरिष्ठ वकील राजीव दत्ता ने इस मामले को डॉक्टरों के अधिकार से जोड़ा और जब कोर्ट ने पूछा कि क्या बाबा रामदेव का बयान जनमानस को नुकसान पहुँचा रहा है, तो वकील ने कहा, “यह सदस्यों को प्रभावित कर रहा है। खुले में दिया गया बयान प्रभाव डालता है। वह डॉक्टरों के नाम ले रहे हैं। वह विज्ञान को फर्जी बता रहे हैं। वो भी इस महामारी में…”

दत्ता ने बताया कि रामदेव कोरोनिल को कोरोना से ठीक होने वाली दवाई बता रहे हैं। इसी पर जस्टिस बोले, “मुझे नहीं लगता कि आपका एलोपैथिक पेशा इतना नाजुक है।” उन्होंने कहा, “मान लेते हैं कि उन्होंने जो कहा है वह गलत, भ्रामक, शरारती हैं… फिर भी मैं समझता हूँ कि यह आम जनता को प्रभावित करने वाला एक बयान है। इसके लिए सीपीसी के तहत प्रावधान है। धारा 95 सीपीसी के अलावा जनहित के तहत मुकदमा दायर नहीं किया जा सकता।”

सुनवाई में दत्ता ने कहा कि केंद्र सरकार भी यह बयान दे चुकी है कि कोरोनिल कोविड-19 से नहीं बचाती और इसका ऐसे प्रचार नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि बाबा रामदेव इसके इम्युनिटी बूस्टर होने पर स्पष्टीकरण दें। कोर्ट ने दत्ता के इस तर्क पर कहा कि बाबा रामदेव इस पर बयान दे चुके हैं। अब आपकी शिकायत का क्या मतलब। वह तो कहते ही हैं कि ये एक इम्यूनिटी बूस्टर है।

दत्ता फिर दलील देते हैं कि कोरोनिल से पतंजलि ने 25 करोड़ रुपए बनाए। इस पर कोर्ट ने पूछा तो क्या उन्हें इसका दोष दिया जाए कि लोगों ने कोरोनिल खरीदी? न्यायधीश हरि शंकर ने कहा कि कोरोनिल इलाज है या नहीं ये अदालत नहीं कह सकती, ये कहना मेडिकल विशेषज्ञों का काम है।

इस पूरी सुनवाई में दत्ता ने अंतरिम राहत के लिए दबाव डाला और माँग की कि रामदेव को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से आपत्तिजनक सामग्री प्रकाशित करने से रोका जाए और बिना शर्त माफी माँगने को कहा जाए।

दत्ता ने कोर्ट से यह भी कहने को कहा कि कोरोनिल कोविड​​​​-19 के इलाज के रूप में काम नहीं करता है और इस बात को आयुष मंत्रालय भी कह चुका है। हालाँकि इस पर कोर्ट ने कहा, “मंत्रालय ऐसा नहीं कहता। उसने कोई निष्कर्ष नहीं दिया है… जहाँ तक ​​मुझे पता है, एक घोषणा देना… यह एक शामिल प्रक्रिया है। इसके लिए व्यापक अध्ययन और शोध की आवश्यकता होगी।”

आगे ऐसा बयान जारी न करें

बता दें कि इस पूरे मामले पर बाबा रामदेव की ओर से वरिष्ठ वकील राजीव नायर पेश हुए। उन्होंने बताया कि रामदेव ने 22 मई को अपने बयान वापस ले लिए थे। इस पर अदालत ने कहा, “आगे अपने मुवक्किल को ऐसा कोई बयान न देने के लिए कहें।” जस्टिस ने यह भी कहा, “मुझे उनके कोरोनिल पर बयान देने से कोई आपत्ति नहीं है… नायर एक बहुत सम्मानित वरिष्ठ हैं। मुझे यकीन है कि उनके मुवक्किल उनकी बात सुनेंगे।” कोर्ट ने कहा कि इस मामले में हम कोई भी आदेश जारी नहीं कर रहे हैं और हमें पूरी उम्मीद है कि भविष्य में उनके क्लाइंट कोई बयान नहीं जारी करेंगे।”