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राजस्थान की घूसखोर बिटिया ने हर किमी के लिए मॉंगे ₹1 लाख, किसान भड़के इसलिए 6 महीने अटकाया मुआवजा: 4000 पन्नों की चार्जशीट

राजस्थान के बांदीकुई की SDM रहीं पिंकी मीणा हाल ही में राजस्थान के जज नरेंद्र कुमार से शादी के कारण चर्चा में आई थी, जिसके लिए उसे जमानत भी मिली थी। अब उसके खिलाफ 4000 पन्नों की चार्जशीट दायर की गई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार चार्जशीट में बताया गया है कि हाइवे बनाने वाली कंपनियों से प्रति किलोमीटर 1 लाख रुपए की घूस पिंकी मीणा ने माँगी थी। पहली क़िस्त में उसने 6 लाख रुपए रिश्वत माँगी थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 10 लाख रुपए कर दिया।

दरअसल, पिंकी मीणा को पता चला था कि पड़ोस में ही स्थित दौसा सेक्शन के SDM पुष्कर मित्तल ने 10 लाख रुपए माँगे थे, इसीलिए उसने भी रकम बढ़ा दी। चार्जशीट ACB कोर्ट में दायर की गई है। कंपनियों पर घूस के लिए दबाव बनाने के लिए पिंकी ने किसानों का मुआवजा भी अटका रखा था। नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) के भारतमाला प्रोजेक्ट के लिए भूमि अधिग्रहण का जिम्मा उसे ही मिला था।

प्रशासन को किसानों को मुआवजा देने के लिए धनराशि भी दी गई थी। भूमि-अधिग्रहण होने के बाद उसे कंपनियों को सौंपना था और किसानों को मुआवजा दिलाना था। दोनों प्रक्रिया पिंकी मीणा के कारण अटकी रही। किसानों को भड़काने के लिए उसने मुआवजा नहीं दिया गया, ताकि कंपनियों का काम शुरू नहीं हो। इसी के लिए 1 लाख प्रति किमी की रिश्वत माँगी गई। काम बार-बार अटकने के कारण ही कंपनी ने शिकायत की।

इसमें पिंकी मीणा के अलावा IPS मनीष अग्रवाल और SDM पुष्कर का भी नाम लिया गया। पिंकी हाई कोर्ट से जमानत लेने में कामयाब रही हैं। पुष्कर अभी जेल में ही है। मनीष बहन की शादी के लिए अंतरिम जमानत पर बाहर है। पिंकी इतनी चालाक थी कि रिश्वत की रकम भी खुद न लेकर कंपनी को अमित नाम के कर्मचारी को सौंपने को कहा था। ACB (भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो) ने सबूत के रूप में डिजिटल टेप रिकॉर्डर के कंटेंट पेश किया है।

हाइवे कंपनी शिकायत का मन बना चुकी थी, इसीलिए उसने रुपए दिए ही नहीं। अमित और पूर्व SDM को आमने-सामने बिठा कर पूछताछ की गई, जिसमें ये राज़ खुला। पिंकी मीणा की तीन ऐसी बातचीत टेप की गई है, जिसमें उसने रिश्वत माँगी है। जयपुर चिथवाड़ी की रहने वाली पिंकी मीणा ने 2016 में प्रशासनिक आयोग की परीक्षा पास की थी।

एक पत्रकार जिसे धारदार हथियारों से काट डाला गया… आज अपराधियों की मजहबी पहचान छिपाने पर करते सवाल

इतिहास लिखने वालों के अपने स्वार्थ होते हैं। वे अपने हित के हिसाब से ड्राफ्ट बनाते हैं और उस पर अतीत की कहानियों को छाप देते हैं। इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करने वाले बहुत हैं। ये कोई भी हो सकते हैं। लेखक, इतिहासकार, कहानीकार एवं कलाकार… कोई भी। ये कुंठा से ग्रसित होकर बदनाम करेंगे। तथ्यों की हत्या कर देंगे। सत्य को लेखनी की मशाल से जलाकर निष्पक्ष होने का ढोंग करेंगे। इनके लिए निष्पक्ष होना कठिन नहीं, क्योंकि ये निष्पक्षता की एक ही सीधी गली में चलते हैं जो मजहबी दुकानों के सामने से गुजरती है।

आज 25 मार्च है। भारत के एक ऐसे पत्रकार की पुण्यतिथि जिसके जीवन की व्याख्या अपने नैरेटिव के हिसाब से सबने की। हिन्दी पत्रकारिता हो या अंग्रेजी, स्वार्थ और तुष्टिकरण के अँधेरे में सभी अपने हितों की खोज करते रहे। गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’, एक ऐसा नाम जो आज लिया तो जाता है किन्तु किस परिप्रेक्ष्य में, यह किसी को ज्ञात नहीं। वर्तमान समय के स्वघोषित निष्पक्ष पत्रकार आज कलम उठाएँगे और उसी बने-बनाए ड्राफ्ट पर अपनी कहानी छापेंगे।

धर्मनिरपेक्षता, निष्पक्षता और प्रश्न करने का अभिनय करने वाले पत्रकार गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ का नाम लेकर उन्हें उलाहना देंगे जो उनकी तरह नहीं हैं। जिस गणेश शंकर ने समाज के हित के लिए कलम उठाई और तत्कालीन समय में उत्पीड़न एवं अन्याय के विरोध में खड़े रहे, उनका नाम लेकर आज वो पत्रकार भी पत्रकारिता पर ज्ञान बाँटते हैं जो पीड़ित के नाम, उसकी मजहबी पहचान और उसकी कुछ विशेष निशानियों के आधार पर अपराध की इन्टेन्सिटी को तौलते हैं।

गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ वास्तविकता में निष्पक्ष थे। गाँधीवादी विचारों एवं क्रांतिकारी व्यक्तित्व का सम्मिश्रण थे वे। उन्होंने कभी नहीं देखा कि जिसकी आलोचना वे कर रहे हैं, वह किस धर्म का है, किस वर्ग का है। अमीर है अथवा गरीब। जमींदार है या पूँजीपति। उनके लिए तो बस अन्याय, अन्याय था और अन्याय करने वाला दोषी। यही होती है निष्पक्षता।

आज मात्र निष्पक्षता शब्द लिखने योग्य ही कौन है? वो जिनके लिए सेना के गरीब जवान के जीवन का कोई मूल्य नहीं और आतंकवादी, हेडमास्टर का बेटा, क्रिकेट फैन और गणित-भूगोल का शानदार विद्यार्थी हो जाता है। या फिर वो जो आपसी रंजिश में मरे मुसलमान की मौत को लेकर असहिष्णुता का नंगा नाच करते हैं और दिल्ली में मरने वाले अंकित शर्मा, रतनलाल, दिलबर नेगी को एक लाश मानकर दूर से ही निकल जाते हैं। डासना में ‘थप्पड़’ पर तो पत्रकारों की कलमें हिलने लगती हैं, स्याही समुद्री लहरों की भाँति आसमान छूने लगती है, लेकिन कमलेश तिवारी के गले को रेत दिए जाने पर इन्हीं पत्रकारों की आँखों के सामने इनकी कलमों की स्याही सूख जाती है। आजकल डिजिटल माध्यमों का जमाना है। स्याही की आवश्यकता भी नहीं, किन्तु कीबोर्ड पर उँगलियाँ भी नहीं चल पाती हैं। 

कौन निष्पक्ष, कौन धर्मनिरपेक्ष   

जो वन वे वाली धर्मनिरपेक्षता की आदर्श व्यवस्था की कल्पना करते हैं, मजहबी जिहाद पर आँखों को मूँदकर रखते हैं और जो झुंड बनाकर राष्ट्रवाद की पवित्र धारा को मलिन करने का प्रयास करते हैं, क्या ऐसे पत्रकार गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ का नाम भी लेने के अधिकारी हैं?

लेकिन ये ‘पत्रकार’ ऐसा करते हैं। वे गणेश शंकर का नाम लेकर अपने पापों को धोते हैं। ये ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि इन्हें इतिहास का अपने अनुसार उपयोग करना सिखाया गया है। ये लंबे लेखों और सुंदर शब्दों से गणेश शंकर को श्रद्धांजलि देते हैं और आँसू बहाते हैं। प्रश्न करते हैं कि यदि आज गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ होते तो कहाँ होते? तब इन्हीं की जमात का एक और स्वघोषित निष्पक्ष पत्रकार उत्तर देता है, ‘जेल में’।

इन पत्रकारों ने तब प्रश्न नहीं किया जब घोटालों से भारत बर्बाद हो रहा था। ये पत्रकार तब भी प्रश्न नहीं करते, जब इस्लामी आतंकवादी भारत के शहरों में घुसकर सैकड़ों काफिरों को मार देता है। इन पत्रकारों ने तब भी प्रश्न नहीं उठाए, जब हिन्दू आतंकवाद शब्द गढ़ा जा रहा था और मुंबई हमलों में पाकिस्तान की भूमिका को धुँधला किए जाने के षड्यंत्र किए जा रहे थे।

गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ की कलम और उनका अखबार ‘प्रताप’ आज भी पत्रकारों और पत्रकारिता के लिए आदर्श है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उन्होंने सत्य पर अडिग रहते हुए अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध लेखन का कार्य किया। अपने ओजस्वी लेखों से उन्होंने अंग्रेजी सरकार की जड़ें हिलाकर रख दी। वो तब का समय था। आज का समय अलग है।

अपने जीवन को गरीबों और मजदूरों के लिए समर्पित करने वाले गणेश शंकर आज क्या उज्ज्वला और पीएम आवास जैसी योजनाओं पर सरकार के समर्थन में नहीं होते? आर्थिक असमानता के विरुद्ध लेख लिखने वाले गणेश शंकर क्या रोजगार देने वाली मुद्रा योजना की सराहना नहीं करते? गणेश के ही उत्तर प्रदेश में जहाँ कानून-व्यवस्था का कोई नाम नहीं था और जहाँ डकैती, लूट, बलात्कार, अपहरण और फिरौती आम घटनाओं की तरह ही थी, उस प्रदेश में कानून-व्यवस्था का राज स्थापित कर अंग्रेजों जैसी शोषक प्रवृत्ति के समाजवादियों को खदेड़ने वाले योगी आदित्यनाथ का साधुवाद क्या गणेश नहीं करते?

गणेश शंकर प्रश्न पूछते। जरूर पूछते। लेकिन बंगाल और केरल में हो रही राजनैतिक हत्याओं पर। महाराष्ट्र के सियासी नाटक और महामारी की रोकथाम की असफलता पर। धार्मिक केंद्रों के रखरखाव और प्रबंधन में हिंदुओं के साथ हो रहे छल और अन्याय पर। गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ पत्रकारों की उस जमात से प्रश्न करते जो मुसलमान अपराधी का नाम लिखने से डरती है, जो किसी मजहबी नुमाइंदे के बलात्कारी होने पर खबरों के शीर्षक और फीचर इमेज में हिन्दू साधु के नाम और फोटो का प्रयोग करती है। गणेश शंकर हर उस पत्रकार से प्रश्न करते जो हिंदुओं को उनके धर्म के कारण दोयम दर्जे का मानता आया है। तब यही निष्पक्ष और क्रांतिकारी पत्रकार गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ को भी ‘भक्त’ कह देते।

उपद्रवियों की एक भीड़ को समझाने की कोशिश कर रहे गणेश शंकर विद्यार्थी को आज ही के दिन, 25 मार्च 1931 को तेज धार वाले हथियारों से काट डाला गया था। यही वो दिन था जब कानपुर में सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दिए जाने के विरोध में तत्कालीन काँग्रेस सदस्यों द्वारा जुलूस निकाला जा रहा था। यह जुलूस जब एक समुदाय विशेष के क्षेत्र से गुजरा तब अचानक ही दंगे भड़क उठे। जब गणेश को दंगों की जानकारी मिली तो वे अकेले ही उस मुस्लिम बहुल इलाके में दंगों को रोकने के लिए निकल पड़े किन्तु दंगों को रोकने के इस प्रयास का परिणाम हुआ उनकी हत्या। कानपुर के चौबे गोला चौराहे के पास चाकू घोंप कर गणेश शंकर ‘विद्यार्थी’ की हत्या कर दी गई। हत्या किस समुदाय के लोगों ने की इसका अंदाजा हत्या की क्रूरता से लगाया जा सकता है। गणेश शंकर एक सुधारवादी व्यक्ति थे, किन्तु बड़े धर्मपरायण और ईश्वरभक्त भी थे। जब तत्कालीन समाज में धर्मनिरपेक्षता के बीज पड़ रहे थे, तब गणेश अपनी धार्मिक पहचान को बनाए हुए थे।

समाज में शांति की इच्छा रखने वाला एक धर्मपरायण पत्रकार सही मायनों में क्रांतिकारी था। लिहाजा आप उन पत्रकारों को देखें और उनका नाम याद रखें जो गणेश शंकर का नाम लेकर धर्मनिरपेक्षता का ढोंग करते हैं। उनके नाम का उपयोग अपने स्वार्थ और अपनी झूठी पहचान को साधने का कार्य के लिए करते हैं। हम आपको गणेश शंकर विद्यार्थी की जीवनी भी उपलब्ध करा सकते थे, लेकिन हमने वर्तमान भारत के कुछ दोगले और छद्म पत्रकारों के उस झुंड से आपका परिचय कराया जो इतिहास के ऐसे ही कुछ पात्रों को अपने नैरेटिव के हिसाब से याद करता है और उनके नाम पर आपको भ्रमित करता है। 

याद रखिए सिर्फ प्रश्न पूछना ही पत्रकारिता नहीं है, अपितु सही प्रश्न पूछना और जिम्मेदार से प्रश्न पूछना ही वास्तविक पत्रकारिता है।

स्पोर्ट्स फंड से कश्मीर में आतंकवाद का खेला, हुर्रियत को ₹5 करोड़-लश्कर आतंकी को ₹10 लाख: महबूबा के करीबी की करतूत

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) द्वारा दायर की गई चार्जशीट से जम्मू कश्मीर में अलगाववादियों, आतंकियों और मुख्यधारा के नेताओं के बीच पर्दे के पीछे चल रहे गठबंधन का खुलासा हुआ है। पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती के करीबी और पीडीपी नेता वहीद-उर-रहमान पारा ने पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैय्यबा के आतंकी कमांडर अबू दुजाना को 10 लाख रुपए की फंडिंग उपलब्ध कराई थी। उक्त आतंकी भारतीय सुरक्षा बलों के कई जवानों की हत्या में वांछित था।

पारा के बारे में पता चला है कि वह नियमित रूप से आतंकियों और अलगाववादियों कि फंडिंग कर रहा था, ताकि घाटी में स्थिति खराब बनी रहे। साथ ही चार्जशीट में PDP द्वारा आतंकियों और अलगगववादियों के तुष्टीकरण की नीति के बारे में भी खुलासा किया गया है। बताया गया है कि वहीद पारा ने 2016 में लश्कर के कश्मीर यूनिट के सरगना पाकिस्तानी मूल के अबू दुजाना को वित्तीय मदद मुहैया कराई थी।

साथ ही उसने पाकिस्तान के एक और खूँखार आतंकी नवीद जट को भी घाटी में आतंक फैलाने के लिए साधन और समर्थन मुहैया कराया था। ये वही आतंकी है, जो पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या के मामले में प्रमुख संदिग्ध है। वहीं दुजाना के पर 15 लाख रुपए का इनाम था। उसने भारतीय सशस्त्र बलों के कई जवानों के साथ-साथ आम नागरिकों की जान भी ली थी। अगस्त 11, 2017 को पुलवामा में हुए एक मुठभेड़ में दुजाना को मार गिराया गया था।

उसके मारे जाने के बाद नवीद जट ने ही लश्कर के कमांडर के रूप में कमान संभाली थी। वो भी पाकिस्तानी मूल का ही था। फरवरी 6, 2018 को SHMS अस्पताल में एक पुलिस एस्कॉर्ट पार्टी पर हमला हुआ था। इस हमले में नवीद जट भी भाग निकला था और उसकी निगरानी में तैनात दो सुरक्षा गार्ड्स की हत्या कर दी गई थी। वह अनंतनाग में एक मुठभेड़ में 6 जवानों की हत्या का भी आरोपित था।

नवंबर 29, 2018 को उसे सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ में मारा गिराया था। वहीद पारा को सतत स्पोर्ट्स काउंसिल का अध्यक्ष भी बनाया गया था। लेकिन, उसने खेल को बढ़ावा देने के लिए आई 5 करोड़ रुपए की फन्डिंग को अलगाववादियों के लिए इस्तेमाल किया। उसने हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के गिलानी गुट को घाटी में पत्थरबाजी के लिए 5 करोड़ रुपए दिए। इन रुपयों से युवाओं को बहक कर घाटी में अराजकता फैलाई गई।

ये रुपए गिलानी के दामाद को दिए गए थे। ये वो समय था, जब बुरहान वानी के मारे जाने के बाद प्रदेश में स्थिति अशांत थी। उस वक़्त घाटी में पिछले कुछ सालों की सबसे बड़ी हिंसा देखने को मिली थी और इस फन्डिंग ने आग में घी का काम किया। 200 से अधिक लोग मारे गए थे और 11,000 घायल हुए थे, जिनमें 3000 सुरक्षा बलों के जवान थे। 2016 की इस अराजकता में वहीद पारा का करीबी अल्ताफ अहमद शाह आतंकियों से लगातार संपर्क में था।

वह अपने रिश्तेदार यूसुफ लोन गडोरा के माध्यम से भी आतंकियों की लगातार मदद कर रहा था। कुछ दिनों बाद हुई एक मुठभेड़ में गडोरा को मार गिराया गया था। साथ ही पारा ने सरकारी मशीनरी और सरकार में अपने पद का दुरुपयोग आतंकियों के लिए करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उसने अपनी सरकारी गाड़ी से आतंकियों को एके-47 और अन्य खतरनाक हथियारों की खेप पहुँचाई। साउथ कश्मीर में घुसपैठ वाले इलाका कुपवाड़ा में उसने हथियारों की सप्लाई की।

चूँकि वो सरकार में शामिल था, इसीलिए उसकी गाड़ी कि चेकिंग नहीं की जाति थी और वो अपनी एस्कॉर्ट पार्टी के साथ अक्सर कुपवाड़ा जाता था और आतंकियों को हथियार देता था। गुपकर रोड स्थित अपने घर में उसने हिजबुल आतंकी इरफान शफ़ी मीर के साथ कई बार बैठक की थी। ये वो जगह है, जहाँ कश्मीर के सारे VIP रहते हैं। इन्हीं बैठकों के दौरान उसने नवीद बाबू नामक आतंकी को देने के लिए इरफान को 10 लाख रुपए दिए।

एक जाँच अधिकारी ने बताया कि लोकसभा चुनाव के दौरान भी आतंकियों की मदद ली गई थी। जनवरी 11, 2020 को इरफान शफ़ी मीर गिरफ्तार हुआ और उसे आतंकियों का समर्थन करने वाले एक अन्य व्यक्ति पूर्व DSP देविंदर सिंह के साथ जम्मू के हीरानगर जेल में रखा गया है। इन लोगों के दो आतंकी और एक वकील साथियों ने पाकिस्तान यात्रा की योजना भी बनाई थी। अब पता लगाया जा रहा है कि पारा ने अपनी पार्टी के फंड का आतंकियों के लिए इस्तेमाल किया, या ‘खेलों इंडिया’ कैम्पेन का।

इसी बीच गुरुवार (मार्च 25, 2021) को PDP की मुखिया महबूब मुफ्ती भी ED के समक्ष पेश होंगी। उनसे एजेंसी के श्रीनगर के दफ्तर में पूछताछ होगी। उन्होंने निवेदन किया था कि उनसे दिल्ली में पूछताछ न की जाए। उससे पहले वो जाँच एजेंसी द्वारा मिले समन को रद्द कराने के लिए कोर्ट भी गई थीं, लेकिन वहाँ उनकी बात नहीं मानी गई। 22 मार्च को भी उन्हें पेश होना था, लेकिन उस दिन अन्य कार्यक्रमों का बहाना बना कर वो नहीं गई थीं।

बता दें कि ये पूरा मामला हिजबुल कमांडर नवीद बाबू के साथ पकड़े गए डीएसपी दविंदर सिंह व अन्य की गिरफ्तारी से जुड़ा है। राष्ट्रीय जाँच एजेंसी ने इसमें पीडीपी नेता वहीद उर रहमान को भी आरोपित बनाया है। रहमान ने हाल ही में डीडीसी चुनाव में पुलवामा से जीत हासिल की है, मगर इस केस के चलते अभी वह जेल में है। जाँच में ये भी पाया गया कि वह इरफान शफी मीर, दविंदर सिंह और सैयद नवीद मुश्ताक के साथ इस अपराधिक साजिश में शामिल था।

काशी में क्यों खेली जाती है चिता-भस्म की होली, भूतभावन महादेव अब भी आते हैं महाश्मशान मणिकर्णिका?

भूतभावन बाबा विश्वनाथ के बिना काशी अधूरी है। यही वजह है कि आदिकाल से ही महादेव की नगरी में होली सहित किसी उत्सव की शुरूआत भी ‘बाबा’ से ही होती है। रंगभरी एकादशी से ही बाबा के साथ अबीर-गुलाल खेलकर होली का आगाज हो जाता है। यहाँ यह बता देना जरूरी है कि ‘बाबा’ बनारस में भगवान भोलेनाथ, काशी विश्वनाथ को कहते हैं।

महाश्मशान की नगरी काशी में अन्नपूर्णा के रूप में निवास करने वाली देवी गौरी के पहली बार काशी आगमन के साथ ही बनारस में होली का आगाज़ हो जाता है। इसी दिन से बनारस में रंग खेलने का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है जो लगातार छह दिनों तक चलता है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार रंगभरी एकादशी के दिन ही भगवान शिव माता पार्वती से विवाह के बाद पहली बार काशी पधारे थे। इस खुशी में भगवान शिव के भक्त-गण रंग-गुलाल उड़ाते हुए और खुशियाँ मनाते हुए आए थे। यहाँ बता दें कि फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रंगभरी एकादशी कहा जाता है। इस वर्ष रंगभरी एकादशी बुधवार (मार्च 24, 2021) थी और महाश्मशान की होली गुरुवार (मार्च 25, 2021) को है।

मस्तानों की नगरी काशी में रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन महाश्मशान में होली खेली जाती है। यह दुनिया की सबसे अनूठी होली है। ऐसी मान्यता है कि जब भगवान शिव रंगभरी एकादशी के दिन माता पार्वती और पुत्र गणेश के साथ गौना कराकर काशी लौटते हैं तो उनका स्वागत सभी लोकों के लोग करते हैं लेकिन उसमें शिव के भूत-पिशाच भक्त गण और दृश्य-अदृश्य आत्माएँ मौजूद नहीं होतीं। इसलिए रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन महाश्मशान में महादेव अपने भक्तों के साथ भस्म से होली खेलते हैं। यह भस्म कोई साधारण भस्म नहीं होती, बल्कि इंसान के शव जलने के बाद पैदा होने वाली राख होती है।

इस सनातनी धरा की उसी परंपरा का निर्वाह करते हुए आज भी काशी में हर वर्ष रंगभरी एकादशी को बाबा विश्वनाथ का विशेष श्रृंगार किया जाता है। वे दूल्हे के रूप में सजाए जाते हैं। फिर विधिपूर्व​क हर्षोल्लास से बाबा विश्वनाथ के संग माता गौरा का गौना कराया जाता है। पूरी परंपरा का बनारस में विधिवत पालन होता है।

गौना के लिए जाते भक्त गण और बाबा काशी विश्वनाथ का भव्य शृंगार

काशीवासी आज भी बाराती, भक्त तो शिव के गण बनते हैं। महाशिवरात्रि पर जो गण बाराती बनकर शिवविवाह में शामिल हुए थे वही अब बाबा की पालकी लेकर गौना कराने निकलते हैं। माँ गौरी की विदाई कराकर शिव जब मंदिर की तरफ प्रस्थान करते हैं तो काशी में शिव के गण बने शिव-भक्त रंग-गुलाल उड़ाते हुए साथ चलते हैं।

बनारस में कहा जाता है कि महादेव कितनी भी मस्ती में क्यों न हों लेकिन अपने दृश्य-अदृश्य उन गणों को उत्सव में बिसरा दें यह हो नहीं सकता। वे गण जो थोड़े डरावने हैं। वही जो बिना बुलाए जब शिव बारात में सब चलें गए तो द्वारचार में माँ गौरा की माँ ऐसी बारात और बारातियों को देखकर बेहोश हो गई थीं। इसलिए, कहा जाता है कि गौना में ऐसे भूत-पिचास, अदृश्य आत्माएँ थोड़ी दूरी बना लेती हैं ताकि सब सकुशल संपन्न हो जाए।

मसाने की होली

अब अपने उन्हीं गणों के लिए भूतभावन भगवान महादेव गौना के अगले दिन यानी रंगभरी एकादशी के एक दिन बाद महाश्मशान मणिकर्णिका पर स्वयं अपने दृश्य-अदृश्य गणों के साथ उत्सव मनाने अर्थात होली खेलने आते हैं।

भारतीय सनातन संस्कृति की इसी परंपरा पर बात करते हुए पद्म विभूषण से सम्मानित पंडित छन्नूलाल मिश्र बताते हैं कि बनारस की होली भी बनारस के मिजाज के अनुसार ही अड़भंगी है। दुनिया का इकलौता शहर जहाँ अबीर, गुलाल के अलावा धधकती चिताओं के बीच चिता भस्म की होली होती है। घाट से लेकर गलियों तक होली के हुड़दंग का हर रंग अद्भुत होता है। महादेव की नगरी काशी की होली भी अड़भंगी शिव की तरह ही निराली है।

डमरू की नाद पर उत्सव का आगाज

वह कुछ याद करते हुए गुनगुनाने लगते हैं कि खेले मसाने में होरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी, भूत पिशाच बटोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी…। वह कहते हैं कि लखि सुंदर फागुनी छटा के, मन से रंग-गुलाल हटा के चिता भस्म भर झोरी… दिगंबर खेले मसाने में होरी….। आखिर ऐसा दृश्य कहाँ देखने को मिलेगा कि भगवान शिव के गण अपने झोली में चिता भस्म की राख भरकर मन भर होली खेलकर तृप्त हो जाते हैं। उनका कहना है कि काशी की होली में राग और विराग दोनों नजर आते हैं।

पंडित छन्नूलाल मिश्र ठहरकर कुछ समझाते हुए आगे गुनगुनाते लगते हैं कि गोप न गोपी श्याम न राधा, ना कोई रोक ना कवनो बाधा, ना साजन ना गोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी…। भावविभोर हो वह कह उठते हैं कि शिव की नगरी काशी की होली की बात ही निराली है। जब महादेव महाश्मशान में उतरते हैं तो भूतनाथ की मंगल-होरी, देखि सिहाएं बिरिज के गोरी, धन-धन नाथ अघोरी… दिगंबर खेलैं मसाने में होरी।

हरिश्चंद्र घाट के श्मशान में भस्म होली खेलते भक्त गण

परंपराओं के अनुसार, आज भी महाश्मशान मणिकर्णिका पर, भगवान शिव के स्‍वरुप बाबा मशाननाथ की पूजा कर श्‍मशान घाट पर चिता भस्‍म से उनके गण होली खेलते हैं। शैव-शाक्त, अवघड़ से लेकर तमाम महादेव के भक्त-गण इस अवसर का साक्षी होने के लिए कई जन्मों तक प्रतीक्षा करते हैं। कहा तो यह भी जाता है जब तक महादेव न बुलाएँ तब तक किसी को ऐसा सौभाग्य नहीं मिलता कि वह स्वयं काशी में महादेव संग होली खेलने का पुण्य अवसर प्राप्त करे।

काशी मोक्ष की नगरी है और दूसरी मान्‍यता यह भी है कि यहाँ भगवान शिव स्‍वयं तारक मंत्र देते हैं। लिहाजा यहाँ पर मृत्‍यु भी उत्‍सव है और होली पर चिता की भस्‍म को उनके गण अबीर और गुलाल की भाँति एक दूसरे पर फेंककर सुख-समृद्धि-वैभव संग शिव की कृपा पाने का उपक्रम भी करते हैं।  

खेले मसाने में होरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी
भूत पिसाच बटोरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी
लखि सुंदर फागुनी छटा के, मन से रंग-गुलाल हटा के चिता-भस्‍म भर झोरी,
दिगंबर खेले मसाने में होरी
गोपन-गोपी श्‍याम न राधा, ना कोई रोक ना कौनऊ बाधा ना साजन ना गोरी
दिगंबर खेले मसाने में होरी
नाचत गावत डमरूधारी, छोड़ै सर्प-गरल पिचकारी पीतैं प्रेत-धकोरी
दिगंबर खेले मसाने में होरी
भूतनाथ की मंगल-होरी, देखि सिहाएं बिरिज कै गोरी धन-धन नाथ अघोरी
दिगंबर खेलैं मसाने में होरी

खैर, चलते-चलते आपको यह भी बता दूँ कि होली बनारस और बिहार के गया में बुढ़वा मंगल तक चलता है। होली के बाद आने वाले मंगलवार को काशीवासी बुढ़वा मंगल या वृद्ध अंगारक पर्व भी कहते हैं। होली युवाओं के जोश का त्यौहार है, लेकिन बुढ़वा मंगल में बुजुर्ग लोगों का उत्साह भी दिखाई पड़ता है।

बुढ़वा मंगल पर सुर लहरियों से सराबोर करते काशी के धरोहर डॉ. राजेश्वर आचार्य

बनारस में बुढ़वा मंगल के अवसर पर गीत-संगीत की महफ़िलों के साथ मेला भी लगता है। बनारस के इस पारम्परिक मेले से प्रमुख साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र भी सम्बद्ध रहे हैं और आज भी बनारस के संगीत घराने के अलावा तमाम सम्बुद्ध काशीवाशी इस आयोजन का हिस्सा होते हैं।

CM योगी के ‘रिपोर्ट कार्ड’ को झुठलाने के लिए BBC ने बलवे की संख्या को बताया दंगा: UP पुलिस ने फैक्ट देकर किया ‘नंगा’

19 मार्च 2021 को उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार को चार साल पूरे हुए। इस मौके पर यूपी सरकार ने अपनी उपलब्धियों को गिनाया। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस मौके पर प्रेस कॉन्फ्रेंस की। यूपी सीएम ने कहा कि प्रदेश में अब कोई दंगा नहीं होता है, जो सरकार की उपलब्धि है।

यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश अब बीमारू राज्य की श्रेणी से हटकर सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनकर उभर रही है। यूपी सीएम ने कहा कि आज ईज़ ऑफ डूइंग की लिस्ट में भी यूपी नंबर दो पर है, हमने काफी लंबी छलाँग लगाई है। इस दौरान यूपी सरकार ने रिपोर्ट कार्ड भी पेश किया।

बीबीसी ने यूपी सरकार के दावों को गलत साबित करने के लिए एक रिपोर्ट पब्लिश किया, हालाँकि, यूपी पुलिस ने उन्हें आईना दिखा दिया। बीबीसी ने अपनी रिपोर्ट का हेडलाइन दिया, “योगी आदित्यनाथ के यूपी में चार साल के रिपोर्ट कार्ड के दावों की हक़ीक़त।”

बीबीसी ने दावा किया कि साल 2012 और 2015 में अपराध के बढ़ने की दर साल 2019 के मुकबाले कम थी। तब अपराध 1.5 प्रतिशत और 0.6 प्रतिशत की दर से बढ़े थे। योगी आदित्यनाथ ने साल 2017 में यूपी की सत्ता सँभाली थी। इस साल अपराधों में 10 फ़ीसदी की बढ़त हुई, अगले साल भी अपराध बढ़ने की दर 10 फ़ीसदी ही रही जबकि साल 2019 में ये 3 प्रतिशत थी।

बीबीसी रिपोर्ट का हिस्सा

इसके अलावा उन्होंने बीते चार सालों में प्रदेश में दंगा न होने की उत्तर प्रदेश सरकार के दावे को गलत बताया। इसके लिए उन्होंने एनसीआरबी के डाटा का हवाला दिया। उनका कहना है, “उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक दंगों की वारदातें 2018 के बाद से कम तो हुई हैं लेकिन अभी भी यूपी में दंगों से जुड़े मामले महाराष्ट्र और बिहार के बाद सबसे ज़्यादा दर्ज किए जाते हैं। एनसीआरबी के डाटा के मुताबिक यूपी में साल 2016 में 8016 दंगों से जुड़े मामले दर्ज हुए। साल 2017 में ये संख्या 8990 रही, जबकि साल 2018 में 8909 और 2019 में 5714 मामले दर्ज किए गए। योगी आदित्यनाथ ने साल 2017 में सत्ता सँभालने के बाद भी ये दावा किया था कि यूपी में दंगे बंद हो गए हैं, लेकिन आधिकारिक डाटा उनके दावों से ठीक उलट है।”

यूपी पुलिस ने उनके दावे का खंडन करते हुए सच्चाई बताई। यूपी पुलिस ने ट्वीट करते हुए लिखा, “आपके द्वारा NCRB रिपोर्ट के आधार पर 2016 से 2019 तक 8016, 8990, 8909, 5714 दंगो का उल्लेख किया गया है। सच्चाई यह है कि प्रदेश में विगत 04 वर्षों में कोई साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ है। जिस आँकड़े का उल्लेख आपके द्वारा किया गया है वह वस्तुतः बलवे की संख्या है जिसमें भी कमी आई है।” इस ट्वीट में उन्होंने साल 2016 से 2019 तक के क्राइम रेट का आँकड़ा भी शेयर किया है। जिसमें बताया गया है कि साल 2016 में 3.7, 2017 में 4.0, साल 2018 में 4.0 और साल 2019 में 2.5 है।

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश में अपराध और अपराधियों के खिलाफ योगी आदित्यनाथ की सरकार अक्सर जीरो टॉलेरेंस की बातें करती हैं। ऐसे में भाजपा की सरकार आने के बाद से पुलिस और अपराधियों के बीच कई मुठभेड़ हुए हैं, जिनमें आत्मरक्षा में पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ी और कई अपराधी मारे गए।

विपक्ष उत्तर प्रदेश में एनकाउंटर की संख्या को लेकर अक्सर सरकार को घेरता है और तमाम तथ्यों के सामने आने के बावजूद उन्हें फर्जी बताता है। ‘दैनिक जागरण’ के आँकड़ों के अनुसार, पिछले 4 वर्ष में उत्तर प्रदेश में अब तक 135 अपराधी एनकाउंटर में मारे जा चुके हैं।

इस वर्ष पिछले ढाई महीने में हुई ऐसी कई मुठभेड़ों में 6 अपराधी ढेर हो गए। वार्षिक आँकड़ों की बात करें तो 2017 में पुलिस और अपराधियों की मुठभेड़ में 28, वर्ष 2018 में 41, वर्ष 2019 में 34 जबकि वर्ष 2020 में 26 अपराधी मारे गए हैं। इनमें 111 ऐसे थे, जो इनामी बदमाश थे।

विभाजन के बाद पाकिस्तान में सीता रोड का नाम बदलकर हुआ था रहमानी नगर: तेज आँधी ने दिखाई पुरानी विरासत

पाकिस्तान में देवी सीता के नाम पर रखे गए रोड का नाम विभाजन के बाद बदल कर रहमानी नगर कर दिया गया। एक सोशल मीडिया यूजर ने इसकी जानकारी दी। दरअसल, हाल ही में आए तूफान ने बोर्ड के ऊपर लगे लोहे की शीट को उड़ा दिया, जिसके बाद रोड का असली नाम सामने आ गया, जो कि विभाजन से पहले देवी सीता के नाम पर रखा गया था।

पाकिस्तान के सिंध प्रांत में क्षेत्र के नाम को प्रदर्शित करते हुए एक पत्थर की संरचना के ऊपर रखी लोहे की टूटी हुई शीट की तस्वीर शेयर करते हुए, सोशल मीडिया यूजर ने लिखा, “दादू जिले में ‘सीता रोड’ के रूप में छोटा स्टेशन स्थापित किया गया था, लेकिन कुछ मजहबी तत्वों द्वारा विभाजन के बाद इसका नाम रहमानी नगर के रूप में बदल दिया गया। हालाँकि, कल आए तेज तूफान ने रहमानी नगर के साथ लगी लोहे की शीट को हटा दिया और मूल नाम उजागर कर दिया।”

चित्र को करीब से देखने से यह स्पष्ट होता है कि शुरू में ’सीता रोड’ को पत्थर की संरचना पर उकेरा गया था, जिसे बाद में एक धातु की शीट से ढँका गया था जिस पर उर्दू में ‘रहमानी नगर’ अंकित किया गया था। कल, कथित तौर पर क्षेत्र में चल रही तेज हवाओं ने पत्थर की संरचना के ऊपर लगी लोहे की शीट के एक हिस्से को हटा दिया, जिसके बाद जगह का मूल नाम उभर कर सामने आ गया।

हालाँकि, पाकिस्तान में ‘सीता रोड’ एकमात्र सड़क नहीं है जिसका नाम पाकिस्तान की पहचान को वापस लाने के लिए देश के विभाजन के बाद बदला गया था। इतने वर्षों में पाकिस्तान ने कई ऐसी सड़कों, पारंपरिक स्थानों का नाम बदल दिया है जो कभी हिंदुओं और सिखों के नाम पर थे। उदाहरण के लिए, कराची में राम बाग, आराम बाग बन गया, लाहौर में कृष्ण नगर का नाम बदलकर इस्लामपुर रखा गया, कसूर के वान राधा राम का नाम बदलकर हबीबाबाद कर दिया गया, जबकि भाई फेरू का नाम बदलकर फूल नगर कर दिया गया।

इसके अलावा, मध्य लाहौर में, जैन मंदिर चौक का नाम एक हिंदू मंदिर के नाम पर रखा गया था। मंदिर को 1992 में अयोध्या, भारत में बाबरी मस्जिद के विनाश का ‘बदला’ लेने के लिए ध्वस्त कर दिया गया था और इस स्थान का नाम बदलकर बाबरी मस्जिद चौक रख दिया गया था।

ऐसे कई और उदाहरण हैं। विभाजन के पूर्व लाहौर में, लक्ष्मी चौक शहर के सबसे बड़े दिवाली समारोहों में से एक की मेजबानी करता था। यह भी एक उर्दू पत्रकार के नाम पर मौलाना जफर अली खान चौक के नाम में बदल दिया गया, जिन्होंने अपने अखबार के माध्यम से अहमदिया समुदाय के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी।

मूल रूप से, इस्लामी चरमपंथ के कारण पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से अल्पसंख्यक हिंदुओं की दुर्दशा बढ़ती ही जा रही है। वर्षों से, हिंदू लड़कियों के अपहरण और इस्लाम में परिवर्तित होने के लिए मजबूर होने की कई रिपोर्टें हैं। इसके अलावा, हिंदू मंदिरों पर हमले किए जाने के कई उदाहरण हैं और हिंदू घरों को सरकार के मौन समर्थन के साथ जमीन पर बुलडोज़र चलाया जा रहा है।

‘अजान’ के शोर पर आपत्ति के बाद बोले योगी के मंत्री- अब बुर्के से मुस्लिम महिलाओं को दिलाएँगे मुक्ति

मस्जिदों पर होने वाली अजान को लेकर आपत्ति जताने वाले योगी सरकार के राज्य मंत्री आनन्द स्वरूप शुक्ल ने अब बुर्के को लेकर सवाल खड़े किए हैं। राज्य मंत्री ने ‘बुर्के को अमानवीय व्यवहार व कुप्रथा’ करार देते हुए कहा कि देश में तीन तलाक की तर्ज पर ‘मुस्लिम महिलाओं को बुर्के से भी मुक्ति दिलाई जाएगी।’ इस दौरान उन्होंने दावा किया कि अनेक मुस्लिम देशों में बुर्के पर पाबंदी है और यह अमानवीय व्यवहार व कुप्रथा है।

खबरों के मुताबिक, राज्य मंत्री आनन्द स्वरूप शुक्ला ने कहा कि विकसित सोच वाले लोग न तो बुर्का पहन रहे हैं और न ही इसे बढ़ावा दे रहे हैं। तो वहीं, अब इस कुप्रथा से भी देश की मुस्लिम महिलाओं को मुक्ति दिलाई जाएगी। कहा कि जैसे तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाकर मुस्लिम महिलाओं को मुक्ति दिलाई गई, वैसे ही इससे भी मुक्ति दिलाई जाएगी। इससे पहले योगी सरकार के मंत्री आनन्द स्वरूप शुक्ल ने भी लाउडस्पीकर की आवाज पर आपत्ति जताते हुए बलिया जिले के जिलाधिकारी को दो पन्नों की एक चिट्ठी भेजी थी।

चिट्ठी में कहा गया था कि मस्जिदों पर लगे लाउडस्पीकर से की जाने वाली तकरीरों से उन्हें योग, पूजा आदि करने में दिक्कत होती है। उन्होंने कहा कि लाउडस्पीकरों की ध्वनि की मात्रा अदालत के आदेशों के अनुसार निर्धारित की जानी चाहिए। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी चिट्ठी में कहा कि विद्यालय के प्रबंधक, छात्र-छात्राओं की तरफ से यह शिकायत की जा रही थी कि उनके गाँव मोहल्लों के बाहर मस्जिदों से दिन भर विभिन्न प्रकार के अनाउंसमेंट किए जाते हैं। इससे अनेक तरह की परेशानियाँ लोगों को हो रही हैं।

मंत्री आनन्द स्वरूप शुक्ल बताया कि उनके घर के पास ही एक मस्जिद है। यहाँ से दिन भर चंदा देने का संदेश प्रसारित किया जाता है। कहा कि लाउडस्पीकरों की आवाज से छात्रों, बुजुर्ग नागरिकों और रोगियों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। आम जनता को काफी ध्वनि प्रदूषण का सामना करना पड़ रहा है। इस दौरान उन्होंने लाउडस्पीकर को लेकर कोर्ट के आदेश के अनुपालन की बात कही है। कहा कि बलिया की मस्जिदों में लाउडस्पीकरों के ध्वनि की मात्रा इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेशों के अनुसार तय की जानी चाहिए, जबकि अनावश्यक लाउडस्पीकर को हटा दिया जाना चाहिए।

इससे पहले मस्जिद से आने वाली अवाज को लेकर हाल ही में यूपी के इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर संगीता श्रीवास्तव ने शिकायत की थी कि उनके आवास के समीप स्थित मस्जिद से सुबह के वक्त लाउडस्पीकर पर आने वाली अजान से उनकी नींद खराब होती है। उन्होंने इस पर रोक लगाने की माँग की थी।

जिसके बाद जिले के आईजी ने सख्त एक्शन लिया। उन्होंने रात के 10 बजे से सुबह के 6 बजे तक लाउडस्पीकर बजाने पर रोक लगाए जाने के आदेश दिए। आईजी का कहना था कि पॉल्युशन एक्ट के तहत रात 10 बजे से सुबह के 6 बजे कर लाउडस्पीकर बजाने पर पूरी तरह से बैन है।  

हिन्दू मंदिरों के सरकारी नियंत्रण से मुक्ति की मुहिम में सद्गुरु के साथ आए सहवाग, देश भर में अभियान चलाने की जरुरत

आज प्रत्येक व्यक्ति सद्गुरु से परिचित है। सद्गुरु एक संत, वक्ता, समाजसेवी एवं योग तथा धर्म प्रचारक के रूप में जाने जाते हैं। वे कोयंबटूर में आदियोगी भगवान शिव की विशालकाय प्रतिमा की स्थापना एवं कावेरी को पुनर्जीवित करने की अपनी पहल ‘कावेरी कॉलिंग’ के बाद लगातार जनहित और हिन्दू धर्म और मानवता को आगे बढ़ाने की दिशा में कार्य कर रहे हैं।

समय-समय पर समाज एवं हिंदुओं के लिए तत्परता से कार्य करने वाले सद्गुरु वर्तमान में तमिलनाडु में मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने की मुहिम चला रहे हैं। उनकी इस मुहिम को कई प्रबुद्धजनों का समर्थन प्राप्त हो रहा है। इसी कड़ी में क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग का नाम भी जुड़ गया है।  

हुआ असल मे ऐसा कि ट्विटर पर ऋषि कुमार (@K_Rishikumar) नाम के एक व्यक्ति ने चेन्नई के निकट स्थित पेरुमल मंदिर का एक वीडियो अपनी प्रोफाइल पर शेयर किया और उसके साथ लिखा, “हम नहीं जानते कि इस मंदिर के निर्माण के लिए कितने प्रयास हुए होंगे किन्तु आज इसे इस हालत में देखकर बहुत बुरा लग रहा है।” वीडियो में उस प्राचीन मंदिर की जर्जर हालत स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती है।

अपने कैप्शन के साथ उसने #FreeTNTemples का उपयोग किया जो सद्गुरु की मुहिम का एक हिस्सा है।

सद्गुरु ने इस वीडियो पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “कभी ये मंदिर था, भक्ति का, समर्पण का! अब ऐसा खंडहर है कि शराबियों और गंदगी फैलाने वालों के लिए भी सुरक्षित नहीं है। समय आ गया है कि तमिलनाडु के मंदिर मुक्त हों- #FreeTNTemples “

इसके साथ उन्होंने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री कार्यालय, एम.के. स्टालिन और वीरेंद्र सहवाग को टैग किया।

सद्गुरु के टैग करने के पश्चात वीरेंद्र सहवाग ने ट्वीट करके सद्गुरु का समर्थन किया। उन्होंने कहा, “हजारों वर्षों के इतिहास और महान पहचान वाले मंदिरों को ऐसी स्थिति में देखना दुःखद है। एक उचित प्रक्रिया के माध्यम से मंदिरों के प्रबंधन को भक्तों को सौंप देना चाहिए। इस ‘महत्वपूर्ण मुहिम’ में मैं सद्गुरु के साथ हूँ।”

सहवाग ने तो अपना समर्थन दे दिया है किन्तु अब आवश्यकता है कि सभी प्रबुद्ध एवं आमजन, मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कराने के लिए अपना समर्थन दें। तमिलनाडु समेत पूरे भारत भर में कई ऐसे छोटे-बड़े मंदिर हैं जो सरकारी नियंत्रण में हैं। नियंत्रण में रहने के कारण इनकी दुर्दशा हम सब ने किसी न किसी रूप में देखी है। ऐसे मंदिरों की संख्या लगभग 4 लाख है, जिनमें तिरुपति बालाजी, श्रीपद्मनाभस्वामी, गुरुवयूर, जगन्नाथ पुरी और वैष्णो देवी जैसे अति प्राचीन और महत्वपूर्ण मंदिर भी सम्मिलित हैं।

आंध्रप्रदेश में वायएस जगन रेड्डी की सरकार द्वारा तिरुपति में भगवान वेंकटेश्वर की संपत्ति को बेचने का निर्णय सुर्खियों में आया था जब हिंदुओं के विरोध के कारण यह निर्णय रद्द कर दिया गया था। मंदिरों की इस दुर्दशा के पीछे “हिन्दू धार्मिक एवं धर्मार्थ निधि अधिनियम (HRCE Act) 1951” है जिसका उद्देश्य ही था हिन्दू मंदिरों एवं धार्मिक संस्थाओं के प्रशासन एवं प्रबंधन को सरकारों की दया में छोड़ देना।

संविधान के अनुसार भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है जो सभी धर्मों के प्रति निष्पक्ष भाव रखता है। धर्मनिरपेक्षता का आधार है कि राज्य व्यक्ति और ईश्वर के बीच के संबंधों में कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा क्योंकि यह संबंध व्यक्ति के अंतःकरण का विषय है। किन्तु क्या ऐसा है?

व्यवहारिक तौर पर तो नहीं, क्योंकि धर्मनिरपेक्षता, हिंदुओं के केस में दम तोड़ देती है। हिन्दू धर्म को ही इस संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता का सर्वाधिक नुकसान झेलना पड़ा। इस तुष्टीकरण के सबसे बड़े शिकार हुए हिन्दू मंदिर और हिन्दू धार्मिक संस्थाएं।

आज सद्गुरु हिन्दू मंदिरों की इसी दुर्दशा के विरोध में #FreeTNTemples अभियान चला रहे हैं। भारत भर से लोग इस अभियान से जुड़ रहे हैं। यह अभियान न केवल तमिलनाडु अपितु पूरे भारतवर्ष में चलाया जाना चाहिए क्योंकि मंदिरों की संपत्ति पर सरकार नहीं अपितु मंदिर में विराजमान इष्टदेव का अधिकार होता है। सरकारों को मंदिरों की संपत्ति का उपयोग करने का कोई अधिकार नहीं है।  

पश्चिम बंगाल: मंच पर पीएम के पैर छूने बढ़ा बीजेपी कार्यकर्ता, मोदी ने पलटकर छू लिए उन्‍हीं के पाँव, वीडियो वायरल

पश्चिम बंगाल में बुधवार को चुनावी रैली के दौरान बेहद अद्भुत नजारा देखने को मिला। दरअसल, पूर्व मेदिनीपुर जिले के कांथी में मंच पर मौजूद जब एक भाजपा कार्यकर्ता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पाँव छूने के लिए आगे बढ़ा तभी पीएम पलटकर उनकी तरफ बढ़े और उन्हें झुककर प्रणाम किया साथ ही उनके पैर भी छूए।

भाजपा ने अपने ट्विटर अकाउंट पर इस वीडियो को साझा किया है और इसे संस्कार का भाव बताया है। पार्टी ने लिखा कि भाजपा एक ऐसा सुसंस्कृत संगठन है, जहाँ कार्यकर्ताओं में एक-दूसरे के प्रति समान संस्कार का भाव रहता है। पश्चिम बंगाल में चुनावी रैली के दौरान मंच पर जब एक भाजपा कार्यकर्ता पैर छूने आया, तो पीएम नरेंद्र मोदी ने भी पैर छूकर कार्यकर्ता का अभिवादन किया।

रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने झूठे आरोप लगाकर नंदीग्राम के लोगों का अपमान किया लोग उन्हें करारा जवाब देंगे। उन्होंने 10 मार्च की घटना का जिक्र करते हुए कहा कि आप पूरे देश के सामने नंदीग्राम और उसके लोगों को बदनाम कर रहे हैं। यह वही नंदीग्राम है जिसने आपको इतना कुछ दिया। नंदीग्राम के लोग आपको माफ नहीं करेंगे और आपको करारा जवाब देंगे। गौरतलब है कि 10 मार्च की घटना में ममता बनर्जी घायल हो गई थीं।

बता दें कि पश्चिम बंगाल की सभी 294 सीटों पर 27 मार्च से 29 अप्रैल के बीच आठ चरणों में विधानसभा चुनाव होंगे। पश्चिम बंगाल में मतदान 27 मार्च, एक अप्रैल, छह अप्रैल, दस अप्रैल, 17 अप्रैल, 22 अप्रैल, 26 अप्रैल और 29 अप्रैल को होंगे, जबकि दो मई को मतगणना होगी।

दिल्ली में यूपी की जमीन पर अमानतुल्ला खान ने बसाया था रोहिंग्याओं को, CM योगी ने बुलडोजर से कराया समतल

उत्तर प्रदेश में जब से योगी आदित्यनाथ की सरकार बनी है तब से प्रदेश में अवैध कब्जे पर लगातार कार्रवाई हो रही है, सीएम योगी का ‘ऑपरेशन नेस्तनाबूत’ अब यूपी के बाद देश की राजधानी दिल्ली पहुँच चुका है। सीएम योगी के निर्देश पर मदनपुर खादर में सिंचाई विभाग को अवैध अतिक्रमण से मुक्त कराया गया।

बुधवार (मार्च 24, 2021) सुबह, मदनपुर खादर क्षेत्र में खसरा नंबर 612 की भूमि पर अवैध रूप से कब्जा किए गए ढाँचों को ध्वस्त करने के लिए जेसीबी को भेजा गया। कई करोड़ रुपए की भूमि उत्तर प्रदेश के सिंचाई विभाग के स्वामित्व में है, जिस पर अवैध रोहिंग्या और बांग्लादेशियों द्वारा अतिक्रमण किया गया था।

अमानतुल्ला खान ने दिल्ली के मदनपुर खादर में बसने के लिए 300 से अधिक रोहिंग्याओं की मदद की थी। आज अवैध रूप से कब्जा किए गए ढाँचों को ध्वस्त करने के लिए योगी सरकार के आदेश पर जेसीबी भेजा गया। फ़िलहाल, कई करोड़ रुपए की भूमि से अवैध रोहिंग्या और बांग्लादेशियों द्वारा किए गए अतिक्रमण को बुल्डोजर से ढहाकर समतल कर दिया गया है।

यूपी के जल विभाग के मंत्री डॉ. महेंद्र सिंह ने विध्वंस अभियान का एक वीडियो शेयर किया है जिसमें कहा गया है कि यूपी सिंचाई विभाग के स्वामित्व वाली मदनपुर में 6 एकड़ जमीन पर वर्षों से अवैध कब्जे थे। उन्होंने कहा कि यूपी सरकार ने अवैध ढाँचों को ध्वस्त कर दिया है और अब जमीन को अपने नियंत्रण में ले लिया है।

उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा, “दिल्ली में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देशन पर जलशक्ति-सिंचाई विभाग की भू माफियाओं पर बड़ी कार्रवाई। दिल्ली के मदनपुर में सिंचाई विभाग की वर्षों से अतिक्रमित 6 एकड़ भूमि को अभियान चला कर कराया गया अतिक्रमण मुक्त।”

अमानतुल्ला खान ने मदनपुर खादर में बसने के लिए 300 से अधिक रोहिंग्याओं की मदद की थी

अवैध रूप से कब्जा की गई भूमि पर 300 से अधिक रोहिंग्याओं द्वारा अतिक्रमण किया गया था, जिन्होंने इस पर अवैध निर्माण किया था। दैनिक भास्कर द्वारा पिछले साल प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि राष्ट्रीय राजधानी के मदनपुर खादर क्षेत्र में श्मशान घाट पर रोहिंग्या लोग अवैध रूप से रह रहे थे। इसके अलावा, वे यूपी सरकार के सिंचाई विभाग के स्वामित्व वाली भूमि पर बसे थे।

रिपोर्ट के अनुसार, अवैध रोहिंग्या प्रवासियों को सभी सरकारी लाभ भी मिल रहे थे। लॉकडाउन के बीच, दिल्ली सरकार और ओखला विधायक अमानतुल्ला खान पर आरोप लगाया गया था कि उन्हें भारी मात्रा में राशन मुहैया कराया जाता है। मदनपुर खादर नई दिल्ली में ओखला निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत आता है। रिपोर्ट के अनुसार, बिजली, पानी का कनेक्शन भी इन्होंने चोरी छिपे करवा लिया था, जिसका भुगतान भी ये लोग नहीं कर रहे थे।

कोरोना काल में आप विधायक अमानतुल्लाह खान ने रोहिंग्याओं को राशन-पानी से लेकर जरुरत की चीजें मुहैया कराने में एड़ी-चोटी एक कर दिया था आसपास में ही रह रहे स्लम बस्तियों के लोग दाने-दाने को मोहताज थे, लेकिन इन रोहिंग्याओं को दिल्ली सरकार का विधायक आलीशान जिंदगी जीने के लिए मदद कर रहा था। ऑपइंडिया ने तब रिपोर्ट की थी कि कैसे ओखला में गरीबों ने अमानतुल्ला खान के निर्वाचन क्षेत्र में राशन वितरण में धार्मिक भेदभाव का आरोप लगाया था। स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया था कि उन्हें राशन इसलिए नहीं दिया गया क्योंकि वे हिंदू थे और ‘आप’ को वोट नहीं दिया था।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि स्थानीय निवासियों ने आरोप लगाया कि कालिंदी कुंज पुलिस स्टेशन के अधिकारी अवैध रोहिंग्याओं को मारिजुआना, स्मैक और अन्य अवैध पदार्थ बेचने के बारे में जानते थे लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने से बचते थे। कई आरडब्ल्यूए ने दिल्ली पुलिस से अवैध निपटान को हटाने का अनुरोध किया था, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ।