Thursday, August 5, 2021
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काशी में क्यों खेली जाती है चिता-भस्म की होली, भूतभावन महादेव अब भी आते हैं महाश्मशान मणिकर्णिका?

काशी मोक्ष की नगरी है और दूसरी मान्‍यता यह भी है कि यहाँ भगवान शिव स्‍वयं तारक मंत्र देते हैं। लिहाजा यहाँ पर मृत्यु भी उत्सव है और होली पर चिता की भस्‍म को उनके गण अबीर और गुलाल की भाँति एक दूसरे पर फेंककर सुख-समृद्धि-वैभव संग शिव की कृपा पाने का उपक्रम भी करते हैं।

भूतभावन बाबा विश्वनाथ के बिना काशी अधूरी है। यही वजह है कि आदिकाल से ही महादेव की नगरी में होली सहित किसी उत्सव की शुरूआत भी ‘बाबा’ से ही होती है। रंगभरी एकादशी से ही बाबा के साथ अबीर-गुलाल खेलकर होली का आगाज हो जाता है। यहाँ यह बता देना जरूरी है कि ‘बाबा’ बनारस में भगवान भोलेनाथ, काशी विश्वनाथ को कहते हैं।

महाश्मशान की नगरी काशी में अन्नपूर्णा के रूप में निवास करने वाली देवी गौरी के पहली बार काशी आगमन के साथ ही बनारस में होली का आगाज़ हो जाता है। इसी दिन से बनारस में रंग खेलने का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है जो लगातार छह दिनों तक चलता है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार रंगभरी एकादशी के दिन ही भगवान शिव माता पार्वती से विवाह के बाद पहली बार काशी पधारे थे। इस खुशी में भगवान शिव के भक्त-गण रंग-गुलाल उड़ाते हुए और खुशियाँ मनाते हुए आए थे। यहाँ बता दें कि फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रंगभरी एकादशी कहा जाता है। इस वर्ष रंगभरी एकादशी बुधवार (मार्च 24, 2021) थी और महाश्मशान की होली गुरुवार (मार्च 25, 2021) को है।

मस्तानों की नगरी काशी में रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन महाश्मशान में होली खेली जाती है। यह दुनिया की सबसे अनूठी होली है। ऐसी मान्यता है कि जब भगवान शिव रंगभरी एकादशी के दिन माता पार्वती और पुत्र गणेश के साथ गौना कराकर काशी लौटते हैं तो उनका स्वागत सभी लोकों के लोग करते हैं लेकिन उसमें शिव के भूत-पिशाच भक्त गण और दृश्य-अदृश्य आत्माएँ मौजूद नहीं होतीं। इसलिए रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन महाश्मशान में महादेव अपने भक्तों के साथ भस्म से होली खेलते हैं। यह भस्म कोई साधारण भस्म नहीं होती, बल्कि इंसान के शव जलने के बाद पैदा होने वाली राख होती है।

इस सनातनी धरा की उसी परंपरा का निर्वाह करते हुए आज भी काशी में हर वर्ष रंगभरी एकादशी को बाबा विश्वनाथ का विशेष श्रृंगार किया जाता है। वे दूल्हे के रूप में सजाए जाते हैं। फिर विधिपूर्व​क हर्षोल्लास से बाबा विश्वनाथ के संग माता गौरा का गौना कराया जाता है। पूरी परंपरा का बनारस में विधिवत पालन होता है।

गौना के लिए जाते भक्त गण और बाबा काशी विश्वनाथ का भव्य शृंगार

काशीवासी आज भी बाराती, भक्त तो शिव के गण बनते हैं। महाशिवरात्रि पर जो गण बाराती बनकर शिवविवाह में शामिल हुए थे वही अब बाबा की पालकी लेकर गौना कराने निकलते हैं। माँ गौरी की विदाई कराकर शिव जब मंदिर की तरफ प्रस्थान करते हैं तो काशी में शिव के गण बने शिव-भक्त रंग-गुलाल उड़ाते हुए साथ चलते हैं।

बनारस में कहा जाता है कि महादेव कितनी भी मस्ती में क्यों न हों लेकिन अपने दृश्य-अदृश्य उन गणों को उत्सव में बिसरा दें यह हो नहीं सकता। वे गण जो थोड़े डरावने हैं। वही जो बिना बुलाए जब शिव बारात में सब चलें गए तो द्वारचार में माँ गौरा की माँ ऐसी बारात और बारातियों को देखकर बेहोश हो गई थीं। इसलिए, कहा जाता है कि गौना में ऐसे भूत-पिचास, अदृश्य आत्माएँ थोड़ी दूरी बना लेती हैं ताकि सब सकुशल संपन्न हो जाए।

मसाने की होली

अब अपने उन्हीं गणों के लिए भूतभावन भगवान महादेव गौना के अगले दिन यानी रंगभरी एकादशी के एक दिन बाद महाश्मशान मणिकर्णिका पर स्वयं अपने दृश्य-अदृश्य गणों के साथ उत्सव मनाने अर्थात होली खेलने आते हैं।

भारतीय सनातन संस्कृति की इसी परंपरा पर बात करते हुए पद्म विभूषण से सम्मानित पंडित छन्नूलाल मिश्र बताते हैं कि बनारस की होली भी बनारस के मिजाज के अनुसार ही अड़भंगी है। दुनिया का इकलौता शहर जहाँ अबीर, गुलाल के अलावा धधकती चिताओं के बीच चिता भस्म की होली होती है। घाट से लेकर गलियों तक होली के हुड़दंग का हर रंग अद्भुत होता है। महादेव की नगरी काशी की होली भी अड़भंगी शिव की तरह ही निराली है।

डमरू की नाद पर उत्सव का आगाज

वह कुछ याद करते हुए गुनगुनाने लगते हैं कि खेले मसाने में होरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी, भूत पिशाच बटोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी…। वह कहते हैं कि लखि सुंदर फागुनी छटा के, मन से रंग-गुलाल हटा के चिता भस्म भर झोरी… दिगंबर खेले मसाने में होरी….। आखिर ऐसा दृश्य कहाँ देखने को मिलेगा कि भगवान शिव के गण अपने झोली में चिता भस्म की राख भरकर मन भर होली खेलकर तृप्त हो जाते हैं। उनका कहना है कि काशी की होली में राग और विराग दोनों नजर आते हैं।

पंडित छन्नूलाल मिश्र ठहरकर कुछ समझाते हुए आगे गुनगुनाते लगते हैं कि गोप न गोपी श्याम न राधा, ना कोई रोक ना कवनो बाधा, ना साजन ना गोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी…। भावविभोर हो वह कह उठते हैं कि शिव की नगरी काशी की होली की बात ही निराली है। जब महादेव महाश्मशान में उतरते हैं तो भूतनाथ की मंगल-होरी, देखि सिहाएं बिरिज के गोरी, धन-धन नाथ अघोरी… दिगंबर खेलैं मसाने में होरी।

हरिश्चंद्र घाट के श्मशान में भस्म होली खेलते भक्त गण

परंपराओं के अनुसार, आज भी महाश्मशान मणिकर्णिका पर, भगवान शिव के स्‍वरुप बाबा मशाननाथ की पूजा कर श्‍मशान घाट पर चिता भस्‍म से उनके गण होली खेलते हैं। शैव-शाक्त, अवघड़ से लेकर तमाम महादेव के भक्त-गण इस अवसर का साक्षी होने के लिए कई जन्मों तक प्रतीक्षा करते हैं। कहा तो यह भी जाता है जब तक महादेव न बुलाएँ तब तक किसी को ऐसा सौभाग्य नहीं मिलता कि वह स्वयं काशी में महादेव संग होली खेलने का पुण्य अवसर प्राप्त करे।

काशी मोक्ष की नगरी है और दूसरी मान्‍यता यह भी है कि यहाँ भगवान शिव स्‍वयं तारक मंत्र देते हैं। लिहाजा यहाँ पर मृत्‍यु भी उत्‍सव है और होली पर चिता की भस्‍म को उनके गण अबीर और गुलाल की भाँति एक दूसरे पर फेंककर सुख-समृद्धि-वैभव संग शिव की कृपा पाने का उपक्रम भी करते हैं।  

खेले मसाने में होरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी
भूत पिसाच बटोरी दिगंबर, खेले मसाने में होरी
लखि सुंदर फागुनी छटा के, मन से रंग-गुलाल हटा के चिता-भस्‍म भर झोरी,
दिगंबर खेले मसाने में होरी
गोपन-गोपी श्‍याम न राधा, ना कोई रोक ना कौनऊ बाधा ना साजन ना गोरी
दिगंबर खेले मसाने में होरी
नाचत गावत डमरूधारी, छोड़ै सर्प-गरल पिचकारी पीतैं प्रेत-धकोरी
दिगंबर खेले मसाने में होरी
भूतनाथ की मंगल-होरी, देखि सिहाएं बिरिज कै गोरी धन-धन नाथ अघोरी
दिगंबर खेलैं मसाने में होरी

खैर, चलते-चलते आपको यह भी बता दूँ कि होली बनारस और बिहार के गया में बुढ़वा मंगल तक चलता है। होली के बाद आने वाले मंगलवार को काशीवासी बुढ़वा मंगल या वृद्ध अंगारक पर्व भी कहते हैं। होली युवाओं के जोश का त्यौहार है, लेकिन बुढ़वा मंगल में बुजुर्ग लोगों का उत्साह भी दिखाई पड़ता है।

बुढ़वा मंगल पर सुर लहरियों से सराबोर करते काशी के धरोहर डॉ. राजेश्वर आचार्य

बनारस में बुढ़वा मंगल के अवसर पर गीत-संगीत की महफ़िलों के साथ मेला भी लगता है। बनारस के इस पारम्परिक मेले से प्रमुख साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र भी सम्बद्ध रहे हैं और आज भी बनारस के संगीत घराने के अलावा तमाम सम्बुद्ध काशीवाशी इस आयोजन का हिस्सा होते हैं।

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रवि अग्रहरि
अपने बारे में का बताएँ गुरु, बस बनारसी हूँ, इसी में महादेव की कृपा है! बाकी राजनीति, कला, इतिहास, संस्कृति, फ़िल्म, मनोविज्ञान से लेकर ज्ञान-विज्ञान की किसी भी नामचीन परम्परा का विशेषज्ञ नहीं हूँ!

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