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कश्मीर में आतंकी ठिकाने ऐसे भी: घर के गोशाला में मिला लश्कर का सुरंग से जुड़ा तहखाना

जम्मू-कश्मीर के पंपोर में पुलिस और सुरक्षाबलों के बड़ी कामयाबी मिली है। लश्कर के आतंकियों की मौजूदगी की सूचना पर चलाए गए तलाशी अभियान के दौरान एक घर में तहखाना मिला। इसका इस्तेमाल आतंकी ठिकाने के तौर पर करते थे। अभियान के दौरान एके-47 की 26 राउंड गोलियाँ मिली और एक को गिरफ्तार किया गया।

अवंतीपोरा पुलिस ने 50 आरआर और 110 बीएन सीआरपीएफ के साथ मिलकर रविवार (जनवरी 10, 2021) पंपोर के अवंतीपोरा के चंधेरा पंपोर गाँव में एक घर में बनी गौशाला की तलाशी ली जिसमें आतंकियों ने एक तहखानानुमा ठिकाना बना रखा था। यहाँ से आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ी सामग्री और एके 47 की 26 राउंड गोलियाँ बरामद हुई हैं। 

न्यूज एजेंसी ANI के मुताबिक मामले में एक गिरफ्तारी भी हुई है। सुरक्षाबलों ने आतंकियों के मददगार आदिल अहमद शाह को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने बताया कि भूमिगत ठिकाने का निर्माण गाँव चंदहरा पंपोर में एक घर में किया गया था। इसका आकार बंकर की तरह था, जिसमें 5 लोगों के बैठने की जगह थी। यह तहखाना 10 फीट ऊँचा और 5 फीट चौड़ा था और तहखाने का सिरा 6 फीट लंबी सुरंग से जुड़ा था। इसको एक छोटे से ढक्कन से ढका गया था।

पुलिस को ठिकाने पर लश्कर-ए-तैयबा के आतंकियों की मौजूदगी की सूचना मिली थी, जिसके बाद वहाँ सर्च ऑपरेशन चलाया गया। पुलिस के अनुसार, गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है।

इससे पहले एक अन्य घटना में भारतीय सेना के बम निरोधक दस्ते ने जम्मू-कश्मीर के पूँछ जिले के मेंढर सेक्टर में मोटरसाइकिल पर फिट किए गए 2.4 किलोग्राम इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस (आईईडी) का समय पर पता लगाने के साथ उसे पूरे नियंत्रण के साथ नष्ट कर दिया

पूँछ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रमेश अनगरल ने बताया, “शनिवार की रात करीब 10 बजे पुलिस दल को गोहलद रीलान-मेंढर रोड के किनारे आईईडी की उपस्थिति का पता चला था जिसे बम निरोधक दस्ते द्वारा नियंत्रित विस्फोट कर नष्ट कर दिया गया।” प्रारंभिक जाँच का हवाला देते हुए अधिकारी ने कहा कि मोटरसाइकिल के साथ आईईडी को एक संदिग्ध आतंकवादी द्वारा वहाँ छोड़ा गया था जिसके बाद उसके पास ही के जंगल में भाग जाने की आशंका जताई जा रही है।

‘अडानी सेब’: तीन नए कानूनों के पास होते ही अडानी ने कृषि सेक्टर पर जमा लिया कब्जा?

तीन नए कृषि बिलों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों को शिकायत है कि मोदी सरकार कृषि क्षेत्र को कॉरपोरेट सेक्टर, मुख्य रूप से अडानी और अंबानी को को सौंप रही है। वहीं सोशल मीडिया पर इसी बात को लेकर दावा किया जा रहा है कि अडानी ने भारत में अब सेब की खेती पर कब्जा कर लिया है।

कुछ लोगों ने आज पता लगाया है कि बाजार में आए सेब अडानी ब्रांडेड है और इससे यह निष्कर्ष निकाला कि मोदी ने नए कृषि कानूनों के जरिए अडानी को यह सेक्टर तोहफे में दिया है।

ट्विटर पर अजय (MalabarHornbill) नाम के एक सोशल मीडिया यूजर ने अपने प्रोफाइल पर अडानी सेब की तस्वीरें पोस्ट कीं। उसने लिखा, “अडानी सेब!! और मोदी सरकार यह झूठ बोलकर किसानों को आश्वस्त कर रही थी कि कॉर्पोरेट कृषि क्षेत्र पर कब्जा नहीं करेंगे।”

साभार: ट्विटर

इसी तरह का एक पोस्ट जम्मू-कश्मीर प्रदेश कॉन्ग्रेस सेवादल ने किया। जिसमें उन्होंने कहा, “कश्मीरी सेब अडानी के नहीं। बहुत ज्यादा विकास।” इसी तरह के पोस्ट फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी साझा किए गए थे।

साभार: फेसबुक
ट्विटर से लिया गया स्क्रीनशॉट

सोशल मीडिया पर शेयर की जा रही तस्वीर में सेबों के ऊपर अडानी और फार्म पिक शब्द लिखा हुआ दिख रहा है। यह सच है कि फार्म पिक अडानी समूह का हिस्सा है। कंपनी कृषि उत्पादों का व्यवसाय करती है, जो उत्पादकों से सेब खरीदती है और उन्हें देश भर के बाजार में बेचती है।

लेकिन ऐसा नहीं है कि तीन कृषि कानूनों को पारित किए जाने के बाद कंपनी ने हाल ही में ऐसा करना शुरू किया है। कंपनी लगभग एक दशक से भी ज्यादा समय से ऐसा कर रही है। सिर्फ यहीं कंपनी नहीं, ऐसी कई कंपनियाँ हैं जो किसानों से कृषि उत्पादों को खरीदती हैं और उन्हें बाजार में बेचती हैं। ऐसा नहीं है कि यह केवल मोदी सरकार के दौरान शुरू हुआ है।

अडानी के सेब का इतिहास

भारत में कंज्यूमर लंबे समय से फार्म पिक द्वारा खरीदकर और आयात किए गए सेब और अन्य फलों को कंज्यूम कर रहे हैं। यह ब्रांड अडानी एग्री फ्रेश लिमिटेड के तहत आता है। इसे कंपनी में दिसंबर 2004 में शामिल किया गया था, यानी जब यूपीए-1 सत्ता में थी। अडानी एंटरप्राइजेज वेबसाइट के अनुसार, कंपनी हिमाचल प्रदेश में 15,000 किसानों से सेब खरीदती है।

इस कंपनी ने हिमाचल प्रदेश के तीन स्थानों ( रोहड़ू, सैंज और रेवली) पर कंट्रोल एटमॉस्फियर स्टोरेज की सुविधाएँ स्थापित की हैं। ब्रांड फार्म पिक के तहत, कंपनी सेब, नाशपाती, कीवी, संतरे, अंगूर और कई अन्य फलों का कारोबार करती है।

फार्म पिक की वेबसाइट के अनुसार, कंपनी कनाडा, अमेरिका, यूरोप, चीन, दक्षिण अफ्रीका, चिली, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड से भी सेबों का आयात कर रही है। भारतीय सेब के मुख्य स्रोत में हिमाचल प्रदेश के शिमला और किन्नौर जिलों का उल्लेख किया गया है।

अडानी समूह को अपनी उपज बेचने वाले 15,000 किसान क्षेत्र के 700 गाँवों में फैले हुए हैं और इसमें 90 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसान शामिल हैं। AAFL ने इन किसानों को लॉजिस्टिक और तकनीकी सहायता प्रदान की है, जिससे इन किसानों को उपज में काफी बढ़त हासिल हुई है और इससे इन क्षेत्रों में घाटा भी कम हो रहा है।

वहीं 2013 में जब हिमाचल प्रदेश में सेब की बंपर पैदावार हुई थी और बाजार में इसका कीमत 33 रुपए प्रति किलो तक कम हो गया था, तब भी दो थोक खरीदार फार्म पिक और कॉनकॉर (कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया) बाजार मूल्य से अधिक इन सबों का भुगतान कर रहे थे। इकोनॉमिक टाइम्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, कॉनकॉर ने 53 रुपए प्रति किलोग्राम की कीमत पर इसका भुगतान किया, वहीं फार्म पिक ने 50 रुपए प्रति किलोग्राम के साथ शुरुआत की और बाद में इसे बढ़ाकर 60 रुपए प्रति किलोग्राम कर दिया था।

अडानी ग्रुप के और प्रोडक्ट

अडानी समूह केवल सेब तक ही सीमित नहीं है। समूह ने 1999 में विल्मर इंटरनेशनल (सिंगापुर की एक कंपनी) के साथ हाथ मिलाया और फॉर्च्यून फूड्स के स्वामित्व वाले अडानी विल्मर का गठन किया। फॉर्च्यून ब्रांड को वर्ष 2000 में लॉन्च किया गया था। इसके अलावा कंपनी कई कृषि उत्पादों में सौदा करती है, जिसमें खाद्य तेल, चीनी, दाल, आटा, जैसे कई उत्पाद शामिल हैं।

निष्कर्ष

उल्लेखनीय है कि अडानी सेब बाजार में मौजूद है। इन सेबों को बेचने वाला ब्रांड फार्म पिक कोई नया ब्रांड नहीं है। कंपनी सालों से काम कर रही है। नए कृषि कानून लागू होने के बाद अडानी सेब को बाजार में लॉन्च करने का दावा फेक है, जो केंद्र सरकार को नीचा दिखाने और लोगों को गुमराह करने के लिए वायरल किया जा रहा है।

नाबालिग से फरदीन और उसके दोस्तों ने किया रेप, फिर कर दी हत्या: 4 गिरफ्तार, बांग्लादेश की घटना

बांग्लादेश की कलाबगन पुलिस ने ढाका में 17 साल की एक लड़की की निर्ममता से गैंगरेप और भीषण हत्या के आरोप में फरदीन इफ्तेखार और तीन अन्य लोगों को गिरफ्तार किया है। नाबालिग लड़की कलाबगन इलाके के मास्टरमाइंड स्कूल में ‘O’ लेवल की छात्रा थी। न्यूज 24 की रिपोर्ट के मुताबिक फरदीन पीड़िता का ब्वॉयफ्रेंड था और वे 2 महीने से रिलेशनशिप में थे।

गुरुवार (जनवरी 07, 2021) की रात आरोपित अपने परिवार के सदस्यों की अनुपस्थिति में पीड़िता को अपने घर ले गया। कथित तौर पर, फरदीन ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर बेरहमी से सामूहिक बलात्कार किया और फिर पीड़ित की हत्या कर दी। रेप के दौरान अत्यधिक खून बहने की वजह से वह बेहोश हो गई थी। पीड़िता के पिता के मुताबिक इसके बाद आरोपित अपना दोष छुपाने के लिए उसे हॉस्पिटल ले गया, लेकिन उसकी मौत हो गई। पीड़िता का शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है।

(Video Courtesy: News 24)

पीड़िता की माँ की घटना पर प्रतिक्रिया

जमुना टीवी ने बताया कि लड़की अपने दोस्तों के साथ ग्रुप स्टडी के लिए दोस्तों के साथ बाहर गई थी। इसी दौरान फरदीन उसे लालच देकर कलाबगन में अपने घर पर ले गया। पीड़िता की माँ ने कहा, “बच्चे रिलेशनशिप में आने पर मरते नहीं हैं। मेरे बच्चे की मृत्यु क्यों हुई? अगर उसका यौन उत्पीड़न नहीं किया गया था, तो वह क्यों मर जाएगी? उसका इतना ज्यादा खून क्यों बहा?” 

उन्होंने आरोपित द्वारा किए गए दावों से इनकार किया कि अनुष्का उसके साथ रिलेशनशिप में थी। उन्होंने कहा, “जब मैंने अपनी बेटी को देखा, तो उसका चेहरा पीला पड़ गया था। उसका काफी खून बह रहा था।” जमुना टीवी ने आगे बताया कि उसके पेट पर चोट के निशान थे। पीड़िता के पिता की शिकायत के बाद पुलिस हरकत में आई और फरदीन एवं तीन अन्य आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस को दिए बयान में मुख्य आरोपित ने अपना अपराध कबूल कर लिया है।

(Video Courtesy: Jamuna TV)

अभियुक्त ने मजिस्ट्रेट के सामने कबूला अपराध

शुक्रवार (जनवरी 08, 2021) को फरदीन को ढाका के मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट में पेश किया गया, जहाँ उसने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 164 के तहत अपना इकबालिया बयान दिया। अनुष्का के गैंगरेप-मर्डर केस में फरदीन के लिए पुलिस ने 10 दिन की कस्टडी माँगी थी। जिला मजिस्ट्रेट न्यायाधीश मामूनुर रशीद ने उसका बयान दर्ज करने के बाद आरोपित को जेल भेज दिया।

बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटन न हिय के सूल: वाजपेयी की हिंदी ‘परंपरा’ को आगे ले जा रहे मोदी

‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटन न हिय के सूल।’ आज हिंदी का दिन है तो भाषा के महत्व को इस दोहे से ज्यादा बेहतर नहीं समझा जा सकता। हिंदी केवल भाषा नहीं बल्कि यह जीवन जीने का एक तरीका है। हिंदी हमारी पहचान है, हमारी संस्कृति है, और हमारी सभ्यता है।

हिंदी का एक गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। पूरे विश्व में हिंदी की एक अलग पहचान है। आज का दिन हिंदी भाषा और हिंदी भाषी लोगों, दोनों के लिए बेहद ही खास दिन है, जिसे ‘विश्व हिन्दी दिवस’ के रूप में देश-विदेश में मनाया जाता है।

विश्व हिन्दी दिवस को मनाने का मुख्य उद्देश्य हिंदी को विश्व में प्रचारित-प्रसारित करना, हिंदी के प्रति जागरूकता पैदा करना, इसके प्रति अनुकूल वातावरण तैयार करना, हिंदी के प्रति लोगों में अनुराग पैदा करना और इसे अंतरराष्ट्रीय पटल पर विश्व-भाषा के रूप में स्थापित करना है।

विदेशों में स्थित भारतीय दूतावास और देश में स्थित सभी सरकारी कार्यालय इस दिन को विशेष रूप से मनाते हैं। इस शुभ अवसर पर विभिन्न विषयों पर हिन्दी में व्याख्यान आयोजित किए जाते हैं। हिंदी विषय पर कविताओं, निबंध प्रतियोगिता समेत अनेकों सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।

जो अधिकारी या कर्मचारी पूरे वर्ष में अधिक से अधिक काम हिंदी में किए होते हैं, वे पुरस्कृत भी होते हैं। हालाँकि करोना महामारी के कारण भले ही सार्वजनिक कार्यक्रमों में कमी आई है, लेकिन कई वर्चुअल कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिसमें दुनिया भर से अनेकों हिंदी भाषा प्रेमी हिस्सा ले रहे हैं। हिन्दी में व्याख्यान ऑनलाइन आयोजित किए जा रहे हैं।

आइए अब बात करते है कुछ अतीत के पन्नों की, जब इस गौरवपूर्ण भाषा के प्रचार-प्रसार को लेकर अनेकों परिस्थितियों का निर्माण हुआ था। सबसे पहले तो हम बात करेंगे दिवगंत प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में भाषण देने की परंपरा की शुरुआत की थी। इस परंपरा को हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगे ले जा रहे हैं।

विश्व में हिन्दी के विकास तथा इसे प्रचारित-प्रसारित करने के उद्देश्य से विश्व हिन्दी सम्मेलनों की शुरुआत की गई थी। माना जाता है कि पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ था, इसीलिए इस दिन को ‘विश्व हिन्दी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा 10 जनवरी को प्रति वर्ष विश्व हिन्दी दिवस के रूप मनाये जाने की घोषणा की गई थी। जिसके बाद से विदेश मंत्रालय ने विदेशों में 10 जनवरी 2006 को पहली बार ‘विश्व हिन्दी दिवस’ मनाया था।

बहुत बार लोग ‘हिंदी दिवस’ और ‘विश्व हिंदी दिवस’ में भ्रमित हो जाते हैं। बता दें कि ‘हिंदी दिवस’ और ‘विश्व हिंदी दिवस’ दो अलग तिथियाँ तथा दिवस हैं। देश में हिंदी भाषा के प्रसार-प्रचार हेतु 14 सिंतबर को ‘हिंदी दिवस’ मनाया जाता है।

1949 में इसी दिन संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्रदान किया था। तभी से इस दिन को ‘हिंदी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। सम्पूर्ण भारतीयों के लिए वह गर्व का क्षण था जब भारत की संविधान सभा ने हिंदी भाषा को देश की आधिकारिक राजभाषा के रूप में अपनाया था।

‘विश्व हिंदी दिवस’ का उद्देश्य पूरे विश्व में हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार करना तथा पूरे विश्व को हिंदी भाषा के माध्यम से एक सूत्र में बाँधना है। हमारी संस्कृति वसुधैव कुटुंबकम् की अवधारणा को आत्मसात करती है, जिसमें हिंदी भाषा का एक अमूल्य योगदान है।

पूरी दुनिया में हिंदी सबसे प्राचीन एवं प्रभावशाली भाषाओं में से एक है। ऐसे में हमें अपनी हिंदी भाषा को बोलने और लिखने में गर्व महसूस करना चाहिए। सवाल है कि क्या हम इस दिशा में सफल हो पाए हैं? हम सभी को खुद से यह प्रश्न करना चाहिए और सोचना चाहिए कि कैसे हमारी मातृ-भाषा को अंतर्राष्ट्रीय पटल पर और भी मजबूती मिले।

अप्रवासी भारतीय भाई-बहनों का भी यह कर्त्तव्य बनता है कि इस दिशा में एक सजग प्रयास करें। हम सभी को यह समझना पड़ेगा कि हिन्दी ना केवल एक भाषा है, बल्कि एक आशा है। हमें वचन लेना चाहिए कि हिन्दी में हम सभी काम करेंगे और इस अद्भुत भाषा का नाम करेंगे।

उर्दू में लिखा जाता था मनमोहन सिंह का भाषण, क्योंकि हिंदी पढ़ नहीं पाते पूर्व प्रधानमंत्री

विश्व हिंदी दिवस (World Hindi Day) के मौके पर यह जानना दिलचस्प है कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह हिंदी नहीं पढ़ पाते हैं। उन्होंने जितने भी भाषण हिंदी में दिए वह उर्दू में लिखे गए थे, जिससे वह उसे पढ़ सकें। मनमोहन सिंह हिंदी बोल ज़रूर लेते थे, लेकिन पढ़ना नहीं सीख पाए।

मनमोहन सिंह को यदि हिन्दी में भाषण देना होता था तो उन्हें तैयारी करने में समय लगता था। इस बारे में रिपोर्ट्स भी मौजूद हैं कि उन्होंने ​हिंदी में दिए गए अपने पहले भाषण की तैयारी करने में पूरे 3 दिन लगाए थे।

ऐसे तमाम वीडियो जिनमें वह ​हिंदी बोल रहे हैं, इस बात पर गौर किया जा सकता है कि उनका भाषण उर्दू में लिखा गया था, जिससे वह आसानी से पढ़ पाएँ। 

ऊपर मौजूद वीडियो के 17 मिनट 18 सेकेंड बीत जाने पर देखा जा सकता है कि उनका भाषण उर्दू में लिखा हुआ है। 

डॉ. मनमोहन सिंह का उर्दू में लिखा ​हिंदी भाषण

इसका मतलब डॉ. मनमोहन सिंह की उर्दू भाषा पर अच्छी पकड़ थी इसलिए उनके ​हिंदी के भाषण उर्दू में लिखे होते थे। 

अविभाजित भारत में पैदा हुए थे पूर्व प्रधानमंत्री

1936 में पैदा हुए डॉ. मनमोहन सिंह का जन्म पंजाब प्रांत के गाह में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है। बहुत कम उम्र में उनकी माता जी की मृत्यु हो गई थी, जिसके बाद उनकी दादी ने उनका पालन-पोषण किया। 12 साल की उम्र तक वह ऐसे गाँव में रहते थे जहाँ बिजली नहीं थी। इस बीच वह लैम्प की रोशनी में पढ़ते थे। 14 साल की उम्र में विभाजन के बाद वह भारत आ गए और अमृतसर में रहने लगे।

बतौर प्रधानमंत्री उनके कार्यकाल के दौरान ऐसी रिपोर्ट्स आई थीं कि पाकिस्तान सरकार गाह को भारत के साथ कूटनीति के हिस्से के तौर पर उपयोग कर रही थी। मनमोहन सिंह की इच्छा थी कि वह अपने जन्मस्थान पर जाएँ, लेकिन भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव के हालातों की वजह से ऐसा ही नहीं हो पाया था।   

नानी गाम से लौट आए राहुल गाँधी: नए साल पर इटली में क्या सब किया, कहाँ मनाई छुट्टियाँ?

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार राहुल गाँधी नया साल मनाकर रविवार (10 जनवरी, 2021) को देश लौट आए। हालाँकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं हुआ है कि वह इटली में किस जगह गए हुए थे। रिपोर्ट्स ने उनके भारत लौटने की पुष्टि की है। लोगों का मानना है कि जिस अज्ञात स्थान पर राहुल गाँधी नए साल से पहले रवाना हुए थे, वह इटली का मिलान शहर है। उनकी माँ सोनिया गॉंधी इतालवी मूल की ही हैं।

राहुल गाँधी के देश लौटने की जानकारी समाचार एजेंसी एएनआई के नेशनल ब्यूरो चीफ नवीन कपूर ने ट्विटर पर दी है।

गौरतलब है कि राहुल गाँधी 27 दिसंबर 2020 को कॉन्ग्रेस के स्थापना दिवस से ठीक एक दिन पहले देश छोड़ विदेश रवाना हो गए थे। राहुल गाँधी ने ऐसे समय में विदेश यात्रा की थी, जब उनकी पार्टी ‘किसान’ विरोध-प्रदर्शन का जोरशोर से समर्थन करने में जुटी थी।

बता दें राहुल गाँधी किसानों के विरोध को लेकर बहुत मुखर थे और पंजाब कॉन्ग्रेस नेता तो उन विरोधियों को भी अपना समर्थन दे रहे थे, जिन्होंने राष्ट्रीय राजधानी को बंधक बना लिया है। हालाँकि, केंद्र सरकार को हर मामले में जिम्मेदार ठहरा रहे राहुल गाँधी चुपके से बिना किसी को बताए, पार्टी कार्यकर्ताओं और प्रदर्शनकारियों को छोड़कर विदेश निकल लिए थे।

इस विदेश यात्रा की खबर आते ही सोशल मीडिया पर राहुल के राजनीति को लेकर गंभीर न होने की चर्चा शुरू हो गई थी। माना जा रहा था कि वह मिलान में अपने ननिहाल नया साल मानने गए हुए थे।

राहुल की विदेश यात्राओं की टाइमिंग पर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं। बिहार विधानसभा चुनावों में अपमानजनक हार के बाद राहुल गाँधी की मिलान यात्रा, उनकी पहली विदेश यात्रा थी। उनके ऐसे रवैए के बावजूद यह अनुमान लगाया जा रहा है कि राहुल गाँधी देश लौटने के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी का कार्यभार सँभालेंगे।

‘अब बच्चे पैदा करने की मशीन नहीं रह गईं उइगर औरतें’: ट्विटर ने पहले दी सफाई फिर चीनी दूतावास का ट्वीट हटाया

अमेरिका स्थित चीनी दूतावास ने एक ट्वीट किया। इसमें चीन के शिनजियांग प्रान्त स्थित यातना शिविरों में रखी गई उइगर औरतों के लिए दावा किया गया था कि वे अब ‘स्वच्छंद’ हैं और अब वह बच्चे ‘पैदा करने की मशीन’ नहीं रह गई हैं। ट्वीट के सामने आते ही इसकी जम कर आलोचना हुई, जिसके बाद ट्विटर ने भी इस ट्वीट को हटा दिया। 

डिलीट किया गया ट्वीट

गुरुवार (7 जनवरी 2021) को अमेरिका स्थित चीनी दूतावास ने ट्विटर पर चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के मुख पत्र चाइना डेली (China Daily) का एक लेख साझा किया। इस लेख में दावा किया गया था कि चीन ने उस क्षेत्र में ‘मजहबी कट्टरपंथ’ समाप्त कर दिया है।

चीनी दूतावास द्वारा किया गया ट्वीट जो अब डिलीट किया जा चुका है

लेख में आगे दावा किया गया था कि उइगर औरतों ने अपने मर्ज़ी से नसबंदी का विकल्प चुना है, जिससे उस क्षेत्र में जन्म दर में काफी गिरावट आई है। इसके अलावा लेख में तमाम पश्चिमी बुद्धिजीवियों और राजनेताओं के दावे को खारिज किया गया था, जिसके मुताबिक़ चीन में उइगरों की जबरन नसबंदी कराई जा रही है। 

ट्वीट में यह लिखा हुआ था, “शोध के दौरान यह पाया गया है कि धार्मिक कट्टरपंथ ख़त्म करने की प्रक्रिया के दौरान शिनजियांग में उइगर महिलाओं की सोच को बंधनमुक्त कराया गया। उनके बीच लैंगिक समानता और प्रजनन संबंधी स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता फैलाई गई जिससे वह सिर्फ बच्चे पैदा करने की मशीन बन कर नहीं रह जाएँ। अब उइगर औरतें ज़्यादा स्वतंत्र और आत्मविश्वास में हैं।” 

चीनी दूतावास द्वारा किए गए इस ट्वीट के बाद वहाँ पर उइगरों के साथ किए जाने वाले बर्ताव को लेकर सोशल मीडिया पर काफी विरोध हुआ। साथ ही इस बात को लेकर भी चीन की आलोचना हुई कि वह पूरे गर्व के साथ इस जबरन नसबंदी के बारे में सोशल मीडिया पर टिप्पणी कर रहा है।         

ट्विटर ने पहली बार में इस ट्वीट को हटाने की जगह यह कहा कि चीनी सरकार का यह ट्वीट चीन में उइगरों के साथ किए जाने वाले बर्ताव की प्रशंसा करता है इसलिए यह आधिकारिक नीतियों का उल्लंघन नहीं करता है। 

सभी जानते हैं कि ट्विटर नियमों की अनदेखी करने का हवाला देकर अक्सर कंटेंट हटाता है जैसा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के मामले में हुआ। नफ़रत भरे कंटेंट को लेकर ट्विटर की नीति कहती है, यूज़र्स धर्म, जाति या नस्ल के आधार पर “किसी समूह के प्रति हिंसा को बढ़ावा नहीं दे सकते हैं” और “लोगों के प्रति अमानवीय बर्ताव की बात नहीं कर सकते हैं”। 

ट्विटर द्वारा इस पर कोई कार्रवाई नहीं किए जाने पर तमाम नेटिज़न्स ने चीन के शिनजियांग प्रांत में उइगरों के साथ होने वाले अत्याचार की निंदा ही नहीं की, बल्कि इस ट्वीट को नहीं हटाने के लिए ट्विटर की भी आलोचना की। 

एक यूज़र ने कहा कि कम से कम ट्विटर को इस कंटेंट को किसी श्रेणी में डाल देना चाहिए कि इसमें दावों के साथ छेड़छाड़ की गई है या उनमें बदलाव किया गया है। 

चीन में मौजूद उइगरों को लेकर चीनी दूतावास ने जिस तरह का ट्वीट किया उस पर तमाम इस्लामियों और वोक्स के ट्वीट करने के बाद माइक्रोब्लॉगिंग साइट दबाव से घिर गया था।

chinese embassy tweet uyghur dehumanise women removed         

PM मोदी की तरकश के 4 तीर, वामपंथी सोशल प्लेटफॉर्म्स के पास नहीं है जिनकी काट: जानिए क्यों नहीं चलेगा अमेरिका वाला तिकड़म

“देखो ट्रम्प ने ट्विटर पर फलाँ चीज लिख दी, हमारे मोदीजी तो ऐसे बेबाक बोल ही नहीं पाते”- आपने पिछले 4 वर्षों में इस तरह के कमेंट्स खूब देखे होंगे, जहाँ नरेंद्र मोदी के समर्थक ही इस बात से नाराज दिखे कि आखिर वो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की तरह सोशल मीडिया में मुखर क्यों नहीं रहते। खासकर आज डोनाल्ड ट्रम्प के साथ विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने जो किया है, उसके बाद ये चर्चा हो रही है कि क्या भारत में पीएम मोदी के साथ भी ऐसा हो सकता है?

ये चर्चा राष्ट्रवादियों से पहले दुनिया भर के वामपंथियों ने ही शुरू कर दी थी। उनका कहना है कि पीएम मोदी ने गुजरात और दिल्ली में ‘2000 +50 से अधिक मुस्लिमों की हत्याएँ’ करवाई हैं, इसीलिए उन्हें सोशल मीडिया पर प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। इसके लिए ‘मोदी नेक्स्ट’ का ट्रेंड भी चलाया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ क्यों ऐसा नहीं किया जा सकता है, इससे पहले जानते हैं कि ट्रम्प के साथ क्या हुआ।

सत्ता जाते ही सोशल मीडिया में मुश्किलों में पड़े डोनाल्ड ट्रम्प

डोनाल्ड ट्रम्प शुरू से ट्विटर पर मुखर रहे हैं और अमेरिका की जनता तक अपनी पहुँच का माध्यम भी इसे बनाया। विभिन्न अवसरों पर, चाहे वह उत्तर कोरिया के किम जोंग उन की बात हो या जो बायडेन की, ट्रम्प सभी को सोशल मीडिया के माध्यम से जवाब देने के लिए मशहूर हैं। उनकी अंतरराष्ट्रीय छवि भी इसी किस्म की बन गई है। कैपिटल लेटर्स और बोल्ड में किए गए उनके ट्वीट्स अक्सर ख़बरों का हिस्सा बनते रहे हैं।

लेकिन राष्ट्रपति के रूप में लगातार दूसरी बार पद सँभालने का उनका सपना जो बायडेन की जीत के साथ ही टूट गया और उनकी मुश्किलें शुरू हो गईं। उनके समर्थक तो ट्विटर से प्रतिबंधित होकर पहले ही ‘Parler’ एप पर जा चुके थे। अब ट्विटर, फेसबुक और इंस्टाग्राम ने डोनाल्ड ट्रम्प के हैंडल्स को सस्पेंड/ब्लॉक कर दिया। वो ‘Parler’ पर गए तो उस एप को ही गूगल ने प्ले स्टोर से हटा दिया। एप्पल ने भी नोटिस थमा दिया।

इस तरह से कई बड़ी तकनीकी कंपनियों ने ऐसा घेरा डाला कि डोनाल्ड ट्रम्प के बयानों और उनके ही फैंस तक उनकी पहुँच पर विराम लग गया। मीडिया का एक बड़ा धड़ा पहले ही उनका अप्रत्यक्ष बहिष्कार करता रहा है, ऐसे में उनके बयानों को वो किस रूप में प्रकाशित करेगा- ये भी अलग सवाल है। तकनीक के इस युग में सिलिकन वैली ने राजनीति में ऐसा दखल दिया है कि दुनिया का सबसे ताकतवर पद कहे जाने वाली कुर्सी पर बैठा व्यक्ति भी लाचार हो गया है।

मोदी के साथ यही तिकड़म आजमा सकती हैं सोशल मीडिया कंपनियाँ?

जहाँ तक भारत की बात है, समस्या यहाँ भी है। राष्ट्रवादियों को ‘शैडो बैन’ किया जाता है, अर्थात उनकी रीच कम कर दी जाती है। उनके हैंडल्स सस्पेंड कर दिए जाते हैं। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख पर पाकिस्तानी और चीनी एजेंडा फैलाने की ख़बरें आई हैं। दंगों की घटनाओं में हिन्दुओं को दोषी ठहराया जाता है। वामपंथियों का बोलबाला यहाँ भी सोशल मीडिया पर है। लेकिन, जहाँ तक नरेंद्र मोदी की बात है, वे इससे अछूते हैं।

फेसबुक या ट्विटर या गूगल, इनमें से कोई भी नरेंद्र मोदी पर उस तरह हाथ नहीं डाल सकता या ट्रम्प के साथ जो हुआ उसका 1% भी नहीं कर सकता, क्योंकि वे पूरे भारत के नेता हैं और ये देश USA की तरह कुछ टुकड़ों को दिया गया नाम नहीं है, बल्कि 130 करोड़ लोगों का एक अखंड राष्ट्र है। भाजपा की संगठन क्षमता और संघ का अनुशासित कैडर कभी इसे बर्दाश्त नहीं करेगा और लोकतांत्रिक तरीके से ही इन कंपनियों को पस्त कर देगा।

अब आते हैं इसके सबसे बड़े पहलू पर। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कभी सोशल मीडिया पर इसीलिए आक्रामक नहीं दिखते, क्योंकि उनके पास जनता तक अपनी बात पहुँचाने के लिए कई माध्यम हैं। 2013-14 में जब उन्हें सोशल मीडिया की ज़रूरत थी, तभी उन्होंने इसका भरपूर इस्तेमाल कर लिया है और अब वो जानते हैं कि सोशल मीडिया अकेले कोई चुनाव नहीं जिता सकता।

विपक्षी दल अब तक इसी ग़लतफ़हमी में जी रहे हैं कि 2014 में केवल सोशल मीडिया ने ही भाजपा को चुनाव जिता दिया था और वो अपने आईटी सेल्स को मजबूत करने के चक्कर में जमीन पर लगातार भाजपा से मात खा रहे हैं। मोदी अब 3D रैलियों से बूथ प्रबंधन तक पहुँच गए हैं, जबकि विपक्षी ट्वीट्स के लाइक्स और रिट्वीटस गिनने में लगे हुए हैं। मोदी के तरकश में एक नहीं, आज हजार तीर हैं।

मोदी के तरकश के 4 तीर, जिन्हें किसी सोशल मीडिया की ज़रूरत नहीं

प्रधानमंत्री का देश की जनता के सब गरीब, निचले और सुदूर इलाकों के तबकों तक पहुँचने का सबसे बड़ा माध्यम है, रेडियो। वे ‘मन की बात’ के जरिए रविवार को जनता को सम्बोधित करते रहते हैं। इस दिन सभी की छुट्टियाँ होती हैं और लोग उन्हें इत्मीनान से सुनते हैं। जलवा ऐसा है कि रेडियो सम्बोधन का सभी टीवी न्यूज़ चैनल लाइव प्रसारण करते हैं और सैकड़ों न्यूज़ पोर्टल और दर्जनों अख़बार उनके सम्बोधन को प्रकाशित करते हैं।

देश की जनता से वे ‘मन की बात’ ऐसे बात करते हैं, जैसे वे घर के ही कोई बुजुर्ग हों। कोरोना काल में हमने इसका उदाहरण देखा, जब लोगों ने सतर्कता को लेकर उनकी हर बात मानी। ‘मन की बात’ एक ऐसा माध्यम है, जिसे उनसे कोई छीन नहीं सकता। फेसबुक और ट्विटर पर इसका टेक्स्ट और ऑडियो ग्राफिक्स के साथ आ जाता है, जिससे सोशल मीडिया पे भी लोग इसे सुन लेते हैं। ये सोशल मीडिया जायंट्स इसमें कुछ नहीं कर सकते।

नरेंद्र मोदी की खुद की वेबसाइट भी है और खुद का एप्लिकेशन भी है। ‘नरेंद्र मोदी डॉट इन (NarendraModi.In)’ और नमो एप ऐसे माध्यम हैं, जिनके बारे में आपको लग सकता है कि इनकी क्या ज़रूरत है? लेकिन, अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प प्रकरण के बाद लोग अब इन माध्यमों की सार्थकता को पहचानने लगे हैं। यहाँ पीएम मोदी के हर सम्बोधन का वीडियो और टेक्स्ट उपलब्ध करा दिया जाता है। मीडिया के लिए तमाम संसाधन डाल दिए जाते हैं।

सारे प्रमुख मीडिया चैनलों की भी मज़बूरी है कि जो कभी नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू तक लेने से हिचकते रहते थे, अब उन्हें उनका पूरा भाषण चलाना पड़ता है। देश की जनता प्रधानमंत्री को सुनती है और ये न्यूज़ चैनल्स इसे बखूबी समझते हैं। नमो एप, नरेंद्र मोदी डॉट इन और ‘मन की बात’- पीएम मोदी की तरकश के ये 3 ऐसे तीर हैं, जो यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम और ट्विटर हैंडल्स के बिना भी चलते रहेंगे।

हाँ, नरेंद्र मोदी विपक्षी नेताओं पर आक्रोशित होते हैं और अपना आक्रोश बखूबी जताते हैं। विरोधियों के आक्षेपों पर पलटवार करते हैं और खूब करते हैं। हिन्दुओं के लिए ‘श्मशान’ की बात भी उठाते हैं और तमाम वादे भी करते हैं। लेकिन, उनके पास इसके लिए बहुत बड़ा माध्यम है। वो है उनकी रैलियाँ। नरेंद्र मोदी अपनी रैलियों में आक्रामक तरीके से विपक्ष को जवाब देते हैं और आमने-सामने लाखों जनता से संवाद करते हैं।

कहने की ज़रूरत नहीं है कि इन रैलियों का सीधा प्रसारण हर टीवी न्यूज़ चैनलों पर होता है और पीएम मोदी के हर सोशल मीडिया एकाउंट्स पर इसके क्लिप्स डाले जाते हैं। लाखों-करोड़ों लोग इन्हें शेयर करते हैं। बाकी भाजपा आईटी सेल को लेकर किंवदंतियाँ विपक्षी नेताओं में मशहूर हैं ही। आज की तारीख़ में मोदी सोशल मीडिया और मीडिया के कारण नहीं हैं, बल्कि मोदी से इन्हें फायदा है क्योंकि जनता मोदी के साथ है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोशल मीडिया पर इसी सौम्यता का नतीजा है कि डोनाल्ड ट्रम्प को लेकर जहाँ दुनिया भर के कई कूटनीतिज्ञों तक में नकारात्मकता का भाव है, वो विभिन्न योजनाओं को लेकर मोदी की प्रशंसा करते नहीं अघाते। पीएम मोदी ने सोशल मीडिया को अपने सरकार की योजनाओं की सफलता और आँकड़ों को दुनिया भर में पहुँचाने का माध्यम बनाया है। जैसे, वो बताते हैं कि जितनी कनाडा की जनसंख्या है, उतनों के भारत में जन-धन बैंक खाते खुल गए हैं।

भारत में अमेरिका वाली तरकीब नहीं भिड़ा सकते हैं SM जायंट्स

निष्कर्ष ये कि भारत में प्रधानमंत्री के पद को को देश ने और संविधान ने इतनी शक्तियाँ दी हैं कि अगर भारत के खिलाफ साजिश में या प्रोपेगेंडा फैलाने में अगर कोई सोशल मीडिया कंपनी शामिल भी है तो उस पर शिकंजा कसा जा सके। भारत की जनता इस काबिल है कि वो देशविरोधी गतिविधियों पर सरकार से शिकायत दर्ज करा सके, कोर्ट जा सके और जन-आंदोलन शुरू कर सके। दुनिया को बता सके कि क्या गलत है और क्या सही।

भारत, अमेरिका नहीं है और ना ही मोदी, ट्रम्प हैं। दूसरा निष्कर्ष ये है कि भारत में जिस तरह से स्टार्टअप्स को बढ़ावा दिया जा रहा है और तकनीकी प्रतिभाओं को निखारा जा रहा है, उससे आने वाले दिनों में यहाँ ही कई सोशल मीडिया के लोकप्रिय माध्यम खड़े हो जाएँ तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। और सबसे बड़ी बात ये है कि दुनिया भर की गतिविधियों पर पीएम मोदी की पैनी नजर रहती है और वो हर चुनौती के लिए पहले से तैयार रहते हैं।

‘सीता राम के पास जाकर बोलीं… सौभाग्य था रावण ने हरण किया’: देवी सीता पर TMC सांसद की अपमानजनक टिप्पणी

हिंदू देवी-देवताओं पर अपमानजनक टिप्पणी करना जैसे ट्रेंड बन गया है। अब तृणमूल कॉन्ग्रेस के सांसद कल्याण बनर्जी ने देवी सीता के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया है।

कल्याण बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए कहा, “सीता राम के पास जाकर बोलीं कि मेरा सौभाग्य था कि रावण ने मेरा हरण किया। अगर तुम्हारे भगवाधारी चेलों ने मेरा हरण किया होता तो मेरा हाल यूपी के हाथरस जैसा होता।”

बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इसके बाद भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से तुष्टिकरण को लेकर सवाल किया। उन्होंने पूछा कि क्या हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचाकर ही ममता दीदी की तुष्टिकरण की राजनीति करना चाहती हैं?

भाजपा नेता और मेघालय के राज्यपाल तथागत रॉय ने भी कल्याण बनर्जी पर देवी सीता के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने का आरोप लगाते हुए वीडियो पोस्ट किया। वहीं बीजेपी के चुनाव प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने कल्याण बनर्जी पर कटाक्ष करते हुए कहा कि बीजेपी की लोकप्रियता के कारण टीएमसी में दरार है। उन्होंने कहा, “ये सब बकवास और मूर्खतापूर्ण टिप्पणी है। मैं इस पर प्रतिक्रिया भी नहीं दूँगा क्योंकि इस तरह की बकवास, फालतू लोग ही करते हैं। मैं बस यही सलाह देना चाहूँगा कि उन्हें मनोचिकित्सक के पास जाना चाहिए।”

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब कल्याण बनर्जी ने इस तरह का विवादित बयान दिया है। इससे पहले उन्होंने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के ऊपर विवादित टिप्पणी की थी। टीएमसी नेता ने निर्मला सीतारमण की तुलना ‘काली नागिन’ से की थी।

TMC नेता कल्याण बनर्जी ने जुलाई में अपने संसदीय क्षेत्र बांकुड़ा में एक रैली के दौरान कहा था, ”काली नागिन (विषैला साँप) के काटने से जिस तरह लोगों की मौत होती है उसी तरह निर्मला सीतारमण के कारण लोग मर रहे हैं। उसने अर्थव्यवस्था को नष्ट कर दिया है। उसे शर्म आनी चाहिए और अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। वह सबसे खराब वित्त मंत्री है।”

इसके अलावा पीएम पर निशाना साधते हुए कल्याण बनर्जी ने कहा था, “यह नरेंद्र मोदी 2019 से पहले यहाँ आए थे। उन्होंने वादा किया था कि बेहतर भारत बनाएँगे। उन्होंने अपना वादा निभाया? जीडीपी ग्रोथ गिरकर 1 फीसदी हो गई है। नरेंद्र मोदी और उनकी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की जय हो।”

BHU में इंजीनियरिंग के छात्रों को पढ़ाया जाएगा वैदिक विज्ञान, वेदों में बताई गई पद्धतियों के आधार पर मौसम की गणना भी

पूरी दुनिया मानती है कि भारत के चारों वेद प्राचीन विज्ञान पर आधारित हैं और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लिखे गए हैं। ‘सर्वविद्या की राजधानी’ कहा जाने वाला बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) अब इसे सार्थक करने जा रहा है क्योंकि यहाँ इंजीनियरिंग के छात्रों को भी वैदिक विज्ञान से रूबरू कराया जाएगा। नए सत्र में इसके लिए कोर्स की तैयारी भी कर ली गई है। इसके लिए अस्सिस्टेंट प्रोफेसर के पदों पर नियुक्ति भी की जानी है।

NBT की खबर के अनुसार, वैदिक विज्ञान केंद्र के समन्वयक प्रफेसर उपेंद्र त्रिपाठी ने जानकारी दी है कि आवेदन करने वाले अभ्यर्थियों के लिए इंजीनियरिंग से रिसर्च के साथ ही 12वीं तक संस्कृत की शिक्षा को अनिवार्य किया गया है। मौसम विज्ञान केंद्र में मौसम से जुड़ी गणनाएँ भी वेदों के आधार पर की जाएगी। भारत के ऋषि-मुनि प्राचीन काल में सनातन धर्म में ज्योतिष, अंक शास्त्र के साथ वेदों के आधार पर गणना करने में सफल रहते थे।

उनकी गणनाएँ और आकलन एकदम सटीक होते थे। BHU के नवनिर्मित भवन में उसी वैदिक पद्धतियों और तकनीकों के आधार पर मौसम की गणना की जाएगी। यहाँ वैदिक विज्ञान केंद्र की सौगात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ही दी थी। इस भवन का शिलान्यास और लोकार्पण, दोनों ही उनके ही हाथों से हुआ था। भवन को शोध कार्य के लिए और हाइटेक बनाया जा रहा है। यहाँ एक आधुनिक लैब भी बनने वाला है।

वैदिक इंस्ट्रूमेंटेशन इंजीनियरिंग स्टडीज नामक कोर्स की बात करें तो ये दुनिया में पहली बार होगा जब टेक्नोक्रेट वेदों में बताए गए प्रौद्योगिकी पर अध्यापन और शोध कार्य करेंगे। इसके अंतर्गत वैदिक प्रौद्योगिकी के प्रयोगशाला में काम आने वाले यंत्रों व उपकरणों का संचालन व निर्माण भी किया जाएगा। जल शोधन तकनीक, धातु विज्ञान, सूर्य विज्ञान, विमान विद्या और नौका शास्त्र सहित कई पद्धतियों पर शोध कार्य होगा।

वैदिक विज्ञान के आधार पर BHU में होगी मौसम की गणना

दैनिक जागरण की खबर के अनुसार, इस केंद्र के अभ्यर्थियों के लिए संस्कृत का ज्ञान अनिवार्य रखा गया है, क्योंकि वेद इसी भाषा में हैं। बीटेक और एमटेक के लिए जो योग्यता माँगी गई है, वो तकनीकी कोर्स की ही है। इसके लिए आवेदन की अंतिम तारीख शुक्रवार (जनवरी 8, 2021) तक थी। यूपी सरकार ने इंजीनियरिंग के अलावा कई अन्य अध्यापन के पदों पर भर्तियों के लिए आवेदन माँगे हैं।

भारत में तो हमेशा से प्रकृति की पूजा होती आई है। यहाँ वैदिक काल से ही ये चला आ रहा है। दुनिया की सबसे प्राचीन पुस्तक ऋग्वेद में अग्नि की स्तुति के साथ ही शुरुआत की जाती है। विशेषज्ञ कहते रहे हैं कि गणित एक ऐसा माध्यम है, जिसके द्वारा एक नास्तिक भी ईश्वर की पूजा कर सकता है। इसी मामले में भारत हमेशा से सभ्यताओं से आगे रहा है। ऋषि-मुनियों ने प्राचीन काल में गणित और प्रकृति के संबंधों को समझा है और ईश्वर तक पहुँचने का माध्यम बनाया है।