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‘किसान’ आंदोलन से ₹27000 करोड़ का नुकसान: दिल्ली और आस-पास के राज्यों में 80000 ट्रकों की आवाजाही प्रभावित

दिल्ली और इसके आस पास चल रहे ‘किसान आंदोलन’ के चलते बीते एक महीने से ज़्यादा समय में दिल्ली तथा उससे सटे राज्यों उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब एवं राजस्थान को लगभग 27,000 करोड़ रुपए के व्यापार का नुकसान हुआ है। ट्रेडर्स बॉडी ने इसकी  जानकारी दी है। 

कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) ने कहा कि नए कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमा पर किसान एक महीने से अधिक समय से आंदोलन कर रहे हैं। इस वजह से दिल्ली से कई राज्यों को जोड़ने वाली सड़कें बंद हैं। 

ट्रेडर्स बॉडी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बीसी भरतिया और उसके राष्ट्रीय महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि पंजाब और हरियाणा से दिल्ली आने वाले माल की आपूर्ति पर काफी फर्क पड़ा है। इन दोनों राज्यों से विभिन्न वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित हुई है। उन्होंने कहा कि आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई निर्बाध रूप से जारी रखने के लिए काम किया जा रहा है। इसके लिए अन्य राज्यों से दिल्ली में सामान लेकर आने वाले वाहनों को राजमार्ग को छोड़कर अन्य वैकल्पिक मार्गों से काफी लंबा चक्कर लगा कर दिल्ली आना पड़ रहा है।

सीएआईटी प्रमुख ने मीडिया को बताया कि पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और देश के अन्य राज्यों से दिल्ली आने वाले सामानों की आपूर्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। उन्होंने कहा कि दिल्ली में प्रतिदिन लगभग 50 हजार ट्रक देश भर के विभिन्न राज्यों से सामान लेकर आते हैं। लगभग 30 हजार ट्रक प्रतिदिन दिल्ली से बाहर अन्य राज्यों के लिए सामान लेकर जाते हैं। 

किसान आंदोलन के चलते न केवल दिल्ली सामान आने पर बल्कि दिल्ली से पूरे देश में सामानों के जाने पर भी काफी प्रभाव पड़ा है। ऐसे में जितनी जल्दी सरकार और किसान नेताओं के बीच चर्चा के जरिए समाधान निकल जाए, उतना अच्छा होगा।

इस बीच, संयुक्त किसान मोर्चा के नेताओं ने कहा है कि अगर सरकार ने 4 जनवरी को अगले दौर की वार्ता के दौरान उनकी माँगों को पूरा नहीं किया तो वे अपना आंदोलन तेज करेंगे। किसान आंदोलन के वरिष्ठ नेता दर्शन पाल ने भी कहा कि पेट्रोल पंप और उनके द्वारा संचालित शॉपिंग मॉल सहित कुछ औद्योगिक समूहों की वस्तुओं और सेवाओं का बहिष्कार जारी रहेगा। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि आंदोलन के हिस्से के रूप में प्रमुख राजमार्गों पर टोल प्लाजा को निशाना बनाया जाएगा।

किसान आंदोलन की आगे की रणनीति के बारे में बात करते हुए क्रांतिकारी किसान यूनियन के अध्यक्ष दर्शन पाल ने कहा था, “23 जनवरी को हम विभिन्न राज्यों में राज्यपालों के घरों की ओर मार्च निकालेंगे और अगर सरकार के साथ बैठक में कोई ठोस हल नहीं निकला तो आने वाली 26 जनवरी को दिल्ली में ‘ट्रैक्टर किसान परेड’ आयोजित की जाएगी।”

किसानों और केंद्रीय सरकार के बीच आज होगी 7वीं वार्ता

प्रदर्शनकारी किसान और केंद्र सरकार सोमवार (जनवरी 4, 2020) को सातवें दौर की वार्ता करेंगे। गतिरोध खत्म करने के लिए अब तक 6 दौर की वार्ता विफल रही है। छठे दौर की बैठक के बाद केंद्र सरकार और नए किसान कानूनों के खिलाफ प्रदर्शनकारी किसानों के बीच चार माँगों में से दो पर सहमति बनी थी। हालाँकि, किसानों ने दावा किया है कि वे तब तक विरोध प्रदर्शन को समाप्त नहीं करेंगे जब तक कि उनकी अन्य दो माँगें पूरी नहीं होतीं। वो दो माँगें हैं- नए कृषि कानूनों को रद्द करना और एमएसपी पर कानून बनाना।

‘जहाँ भी बीजेपी को देखो, पीटकर भगा देना’: बंगाल में भाजपा नेता की कार को घेरा, फायरिंग में बाल-बाल बचे

पश्चिम बंगाल के आसनसोल में रविवार (जनवरी 3, 2020) की रात भाजपा नेता कृष्णेंदु मुखर्जी (Krishnendu Mukherjee) की कार पर फायरिंग करने का मामला सामने आया है। उन्होंने इसका आरोप सत्ताधारी टीएमसी के गुंडों पर लगाया है। बीजेपी राज्य समिति के सदस्य कृष्णेंदु मुखर्जी ने बताया कि उन पर उस समय गोलियाँ चलाई गईं जब वह कार से अपने घर लौट रहे थे।

सामने आई तस्वीरों से पता चलता है कि भाजपा नेता पर हमला करीब से किया गया। उनकी गाड़ी में गोली लगने के निशान बन गए हैं। उन्होंने बताया रविवार को लगभग 11 बजे कोलकाता से घर लौट रहे थे। उसी समय तीन बदमाशों ने उनकी कार को घेर लिया और घने कोहरे में उनकी ओर गोली चलाई। 

खबरों के अनुसार, बदमाशों ने कार का दरवाजा खोलने की भी कोशिश की। मगर उनका प्रयास असफल रहा और बीजेपी नेता बाल-बाल बच गए। मुखर्जी ने कहा कि गोली चलने के बाद उनका ड्राइवर मदद के लिए चिल्लाया और उसने लगातार हॉर्न बजा कर स्थानीयों का ध्यान इस ओर करवाया, जिसे देख हमलावर मौके से भाग गए।

मुखर्जी ने इस घटना के लिए टीएमसी को जिम्मेदार ठहराया है। वहीं टीएमसी ने इससे इनकार किया है। टीएमसी के आसनसोल दक्षिण के विधायक तपस बनर्जी ने कहा कि मुखर्जी जबरन वसूली, तस्करी और यहाँ तक ​​कि हत्या के मामलों में आरोपित हैं और लंबे समय से फरार थे। यह घटना उनकी पुरानी रंजिश का नतीजा हो सकती है।

वहीं बीजेपी नेता ने कहा, “मुझे संदेह है कि तृणमूल के उपद्रवियों ने इस घटना को अंजाम दिया। मुझे हटाना उनके हित में है। मैं असुरक्षित महसूस कर रहा हूँ। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि कानून और व्यवस्था की स्थिति कहाँ तक पहुँची है। मैंने शीर्ष नेतृत्व को सूचित किया है। मैंने पुलिस को सीसीटीवी फुटेज दिए हैं। पुलिस जाँच कर रही है।”

उल्लेखनीय है कि एक ओर जहाँ भाजपा नेता पर गोलीबारी की घटना सामने आई है। वहीं, दूसरी ओर टीएमसी नेता की भड़काऊ वीडियो को भाजपा ने अपने ट्विटर पर शेयर किया है। इस वीडियो में टीएमसी नेता खुलेआम भगवा पार्टी के कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ लोगों को भड़का रहे हैं। वीडियो में सुन सकते है कि टीएमसी नेता कहते हैं, “जहाँ भी तुम बीजेपी को देखो, मै बता रहा हूँ, उन्हें पीटकर भगा देना। उन्हें पता होना चाहिए कि हम उन्हें स्वीकार नहीं करेंगे।”

बता दें कि 2021 विधानसभा चुनाव से पहले बंगाल में अब तक 136 भाजपा कार्यकर्ता अपनी जान गँवा चुके हैं। पिछले दिनों भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के काफिले पर ईंट और पत्थर फेंके गए थे। हालाँकि उनकी गाड़ी बुलेट प्रूफ थी जिसकी वजह से उन्हें चोट नहीं लगी थी।

बंगाल से केंद्र सरकार का पैसा भेजा गया बांग्लादेश: TMC नेता समसुल अरफिन ने रची थी साजिश, बनवाए थे फर्जी जॉब कार्ड

पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बहुल जिले मुर्शिदाबाद में महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम 2005 (मनरेगा) योजना में धाँधली की खबर सामने आई है। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक प्रशासन द्वारा जारी आंतरिक जाँच में पता चला है कि स्थानीय टीएमसी नेता ने मनरेगा स्कीम को चूना लगाते हुए अपने बांग्लादेशी रिश्तेदारों को 7 लाख रुपए भेजा। 

आरोपित टीएमसी नेता और नाबाग्राम ब्लॉक में गुरपशला ग्राम पंचायत के उप प्रमुख समसुल अरफिन ने मनरेगा से पैसा इकट्ठा करने के लिए अपने रिश्तेदारों के नाम से फर्जी जॉब कार्ड बनवाए थे। कथित तौर पर, अरफिन ने समान लाभार्थियों के नाम के वेरिएंट का उपयोग करके नकली जॉब कार्ड बनाए और एटीएम कार्ड का उपयोग करके बैंकों और डाकघरों से पैसे निकाले। हिंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, उसने धोखाधड़ी से प्राप्त धन अपने रिश्तेदारों को ट्रांसफर कर दिया, जिनमें से 13 बांग्लादेशी नागरिक हैं।

लिखित शिकायत के बाद, एक पूर्व खंड विकास अधिकारी (नबाग्राम) ने आंतरिक जाँच की और पाया कि गुरपशला ग्राम पंचायत के उप प्रमुख और अन्य कर्मचारी सदस्य धन के दुरुपयोग में शामिल थे। पूर्व बीडीओ ने अरफिन और अन्य के खिलाफ शिकायत दर्ज की। जिसके बाद दिसंबर 2019 में नबाग्राम पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की गई थी।

वर्तमान बीडीओ पंकज दास के अनुसार भारती दंड संहिता की धारा 34, 406, 409, 420 और 486 के तहत मामला दर्ज किया गया। अधिकारियों ने कहा कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद, अरफिन ने अग्रिम जमानत के लिए कलकत्ता उच्च न्यायालय का रुख किया। अदालत ने याचिका खारिज कर दी, लेकिन आरोपित अरफिन को गिरफ्तार नहीं किया गया। एक पुलिस अधिकारी ने गिरफ्तारी का आश्वासन देते हुए माना कि कुछ कर्मचारियों की मदद से अरफिन ने सरकारी धन का गबन किया। 

मामले पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ

मामले के बारे में बात करते हुए, TMC के प्रवक्ता अपूर्वा सरकार ने कहा, “अगर उप प्रमुख सरकारी धन के कथित गबन में शामिल है, तो प्रशासन को उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने का अधिकार है। हम उसमें ढाल नहीं बनेंगे। ”

बांग्लादेशियों को लाभ पहुँचाने के लिए सरकारी धन के दुरुपयोग पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए, कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मीर बादाम अली ने कहा, “कुछ कर्मचारियों की मदद से अरफिन ने सरकारी धन का गबन किया। कुछ लाभार्थी नाबालिग भी हैं। टीएमसी नेता ने बांग्लादेशी नागरिकों को केंद्र सरकार की एक परियोजना से पैसा बनाने में मदद की।”

चक्रवाती तूफान अम्फान के मुआवजे में भ्रष्टाचार

गौरतलब है कि इस साल जून में पश्चिम बंगाल में चक्रवाती तूफान अम्फान के दौरान दिए जाने वाले मुआवजे में भी टीएमसी नेताओं पर बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का आरोप लगा था, जिसके बाद सीएम ममता बनर्जी को मजबूरन जाँच का आदेश देना पड़ा।

राज्य सरकार ने उन 5 लाख पीड़ितों में से हर एक को, जिनके घर नष्ट हो गए थे, 20000 रुपए देने की घोषणा की थी। लेकिन सीएम के पास 2000 से अधिक शिकायतें भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए दर्ज की गई थीं।

कई टीएमसी ग्राम पंचायत सदस्यों और उनके रिश्तेदारों, जिनके पास पक्के मकान थे और उन्हें कोई नुकसान नहीं हुआ था, उन्हें राहत राशि मिली थी, जबकि जो वाकई में पीड़ित थे, उन्हें इसका लाभ नहीं मिला। कुछ TMC नेताओं ने बिना किसी नुकसान के भी इसका लाभ उठाया और इसे यह कहते हुए जायज ठहराया कि राहत नागरिकों के बीच वितरण के लिए है, इसीलिए उन्होंने भी इसका लाभ उठाया। कई आरोपों के बाद राज्य सरकार ने जाँच का आदेश दिया था। बाद में, उच्च न्यायालय ने CAG से मामले की जाँच करने को कहा था।

शौहर मुफ़्ती अनस ने ही वायरल कर दी सना खान की हनीमून वाली न्यूड तस्वीरें? सोशल मीडिया पर किए जा रहे दावे का सच

अभिनेत्री सना खान हाल ही में निकाह के बाद हनीमून के लिए जम्मू-कश्मीर गई थीं, जहाँ की यात्रा की उन्होंने अपने सोशल मीडिया हैंडल्स से पल-पल की जानकारी दी थी। सना खान ने इस्लाम का हवाला देते हुए मनोरंजन जगत को अलविदा कह दिया था। अब उनकी कुछ न्यूड व आपत्तिजनक तस्वीरें वायरल हो रही हैं। इनके बारे में दावा किया जा रहा है कि ये उनके शौहर मौलाना मुफ़्ती अनस ने ही वायरल की है।

इन तस्वीरों को शेयर करते हुए लोग दावा कर रहे हैं कि सना खान के शौहर ने ही हनीमून की तस्वीरें वायरल कर दी हैं और इन तस्वीरों को उन्होंने ही अपने फोन के कैमरे से क्लिक किया था। एक ट्विटर यूजर ने इन तस्वीरों को कोट करते हुए पूछा, “भला कोई व्यक्ति अपनी बीवी की ही हनीमून वाली तस्वीरें कैसे सोशल मीडिया पर डाल सकता है?” फेसबुक पर एक व्यक्ति ने दावा किया कि सना खान ने ऐसी तस्वीरें वायरल कर इस्लाम को नुकसान पहुँचाया है।

अब आपको बताते हैं कि सच्चाई क्या है। असल में जो तस्वीरें शेयर की जा रही हैं, वो सना खान के हनीमून की हैं ही नहीं। फोटो कोलाज को काफी करीब से देखने पर पता चलता है कि उस पर ‘ABP News’ का लोगो लगा दिया गया है। ये इसीलिए किया गया है, ताकि प्रदर्शित किया जा सके कि इन तस्वीरों को लाइव चल रहे न्यूज़ चैनल के वीडियो से स्क्रीनशॉट लिया गया है। जबकि, इसे ABP की ही एक खबर से उठाया गया है।

TOI ने अपनी पड़ताल में पाया कि ABP ने इस सम्बन्ध में दिसंबर 14, 2020 को खबर प्रकाशित की थी, जिसमें सना खान के हनीमून की तस्वीरें थीं, लेकिन इनमें से एक भी आपत्तिजनक नहीं थी। इन्हीं तस्वीरों में से एक को उठा कर उसके साथ अन्य तस्वीरें लगा कर ये दावा वायरल किया गया। असल में ऊपर संलग्न किए गए ट्वीट में जो पहली तस्वीर है, उसे ‘वजह तुम हो’ फिल्म से उठाया गया है।

गाने से उठा कर कोलाज में लगा दी गई थी तस्वीर

बता दें कि सना खान भी इस फिल्म का हिस्सा थीं। मीडिया में अक्सर डिस्प्ले के लिए ‘प्रतीकात्मक चित्र’ का इस्तेमाल किया जाता है और ऐसा सभी संस्थान करते हैं। इसीलिए सना खान वाली खबर में फीचर इमेज को ही उठा कर ये दावा कर दिया गया कि ये हनीमून की है। इसका कोलाज बना कर सोशल मीडिया के कुछ यूजरों ने उठा लिया और फिर दावा करने लगे कि सना खान के शौहर ने ही उनकी न्यूड तस्वीरें वायरल कर दी हैं।

दिसंबर 21, 2020 को सना खान ने एक वीडियो में निकाह के एक माह पूरे होने की जानकारी देते हुए अपनी खुशी जाहिर की थी। सना ने बताया था कि मुफ्ती अनस से निकाह करना उनका अब तक का सबसे बेस्ट निर्णय था। उन्होंने लिखा था, “पिछले महीने इसी दिन मैंने कुबूल है कहा था। आज एक महीना हो चुका है, बस ऐसे ही हँसते-हँसते पूरी जिंदगी निकल जाए। मैंने जिंदगी का बेस्ट फैसला लिया है। ये दुपट्टा मेरी सासू माँ ने मेरे लिए बनाया था।”

कहाँ गए जैक मा, लुसी क्यों बनी फेस? कम्युनिस्ट सरकार की आलोचना के बाद से चीनी अरबपति के साथ क्या हो रहा

चीन की कम्युनिस्ट सरकार और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के ख़िलाफ़ बोलने वाले चीनी अरबपति जैक मा के साथ एक अजीब घटना हुई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक एक अफ्रीकन टैलेंट शो से अचानक गायब कर उनकी जगह किसी और को दे दी गई। शो के वेबपेज से भी उनकी तस्वीर हटा दी गई और प्रमोशनल वीडियो से भी उन्हें अलग कर दिया गया।

अफ्रीकन बिजनेस हीरोज नाम के शो का ग्रांड फिनाले नवंबर में हुआ था। इसके कुछ दिन बाद ही चीन के अरबपति ने चीन के नियामकों और उनके स्वामित्व वाले बैंकों की तीखी आलोचना की थी। उनके भाषण के बाद चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने जैक मा के बयानों के ख़िलाफ़ कड़ी प्रतिक्रिया दी और जैक मा की एंट कंपनी को मिलने वाली 37 बिलियन डॉलर की आरंभिक सार्वजनिक पेशकश (initial public offering) चीन अधिकारियों द्वारा निलंबित कर दी गई। वॉल स्‍ट्रीट जनरल की रिपोर्ट के मुताबिक जैक मा के एंट ग्रुप के आईपीओ को रद्द करने का आदेश सीधा चीनी राष्‍ट्रपति शी जिनपिंग की ओर से आया था। 

इस निलंबन के बाद जैक मा सार्वजनिक स्थलों पर नहीं दिखे यानी वह पूरे दो माह से गायब हैं। इधर, चीनी अधिकारियों ने अलीबाबा के ख़िलाफ़ एंटी-मोनोपॉली की जाँच की घोषणा कर दी है। वहीं जैक मा के शो की यदि बात करें तो उससे गायब होने के पीछे अलीबाबा के प्रवक्ता ने बताया कि शो शेड्यूल के कारण जैक मा अफ्रीका के बिजनेस हीरो कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बन पाए। मगर, अलीबाबा के प्रवक्ता के इस बयान से कई लोग सहमत नहीं हैं।

लोग इस बात को नहीं मान पा रहे कि जैक एक ऐसा प्रोग्राम केवल शेड्यूल के कारण छोड़ सकते हैं जिसका प्रमुख चेहरा ही वह खुद थे। सैयद अकबरुद्दीन लिखते हैं कि ये स्थिति बिलकुल ऐसी है जैसे कौन बनेगा करोड़पति से अमिताभ बच्चन गायब हो जाएँ, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि शेड्यूल को लेकर उनका विवाद हो गया हो।

बता दें कि जैक मा को लुसी पेंग से रिप्लेस किया गया है। वह भी अलीबाबा का ही एक हिस्सा है। लेकिन जैक मा के न होने से शो के प्रतिभागी में से एक का कहना है कि जैक मा के साथ चीन में कुछ हो रहा है इसलिए वह यहाँ नहीं आ पाए और उनकी जगह लुसी आई हैं।

56 साल के जैक मा एक समय में कम्युनिस्ट पार्टी के सबसे बड़े पोस्टर बॉय थे। लेकिन जब उन्होंने चीनी प्रशासन के ख़िलाफ़ बोलना शुरू किया तो दोनों के रिश्तों में खटास आ गई। दुनियाभर में करोड़ों लोगों के आदर्श रहे जैक मा ने सरकार से आह्वान किया था कि ऐसे सिस्‍टम में बदलाव किया जाए जो ‘बिजनस में नई चीजें शुरू करने के प्रयास को दबाने’ का प्रयास करता है। उन्‍होंने वैश्विक बैंकिंग नियमों को ‘बुजुर्ग लोगों का क्‍लब’ करार दिया था। 

गौरतलब है कि इससे पहले शी जिनपिंग की आलोचना करने वाले प्रॉपर्टी बिजनसमैन रेन झिकियांग लापता हो गए थे। उन्‍होंने कोरोना से सही से नहीं निपटने के लिए शी जिनपिंग को ‘मसखरा’ बताया था। बाद में उन्‍हें 18 साल के लिए जेल भेज दिया गया। चीन के एक अन्‍य अरबपति शिआन जिआनहुआ वर्ष 2017 से नजरबंद हैं।

J&K: पत्थरबाजी में 90% गिरावट, 370 हटने से पहले पत्थरबाज खूब मचाते थे हुल्लड़

जम्मू-कश्मीर में कट्टरपंथियों द्वारा सेना और सुरक्षबलों पर होने वाली पत्थरबाजी की घटनाओं में साल 2016 से लेकर साल 2020 तक 90% की गिरावट दर्ज की गई है। यह जानकारी खुद पुलिस महानिदेशक दिलबाग सिंह ने मीडिया के साथ साझा की है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस महानिदेशक दिलबाग सिंह ने कहा कि साल 2019 की तुलना में इस साल हुई पत्थरबाजी की घटनाओं में 87.13% की गिरावट हुई है। साल 2019 में, पत्थरबाजी की 1,999 घटनाएँ हुईं थीं, जिनमें से 1,193 बार यह पत्थरबाजी केंद्र सरकार द्वारा साल 2019 के अगस्त माह में जम्मू और कश्मीर के विशेष दर्जे को रद्द करने की घोषणा के बाद हुईं।

पुलिस महानिदेशक के अनुसार, “साल 2019 में हुई पत्थरबाजी की घटनाओं और वर्ष 2020 की तुलना में 87.13% की गिरावट दर्ज की गई। 2020 में 255 बार पत्थरबाजी की घटनाएँ हुई हैं।”

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2018 और 2017 में 1,458, और 1,412 बार पत्थरबाजी की घटनाएँ सामने आईं थीं। अधिकारियों के अनुसार, 2016 की तुलना में, 2020 में ऐसी घटनाओं में गिरावट 90% रही है।

वर्ष 2016 में, 2,653 पत्थरबाज़ी के मामलों की सूचना मिली थी। यह वही साल है जब आतंकवादी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन के एक कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद पूरे कश्मीर में हिंसक विरोध प्रदर्शन शुरू हुए थे। जबकि, 2015 में, जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी की 730 घटनाएँ हुईं थीं। सेना ने बताया था कि नोटबंदी के बाद भी पत्थरबाजी की घटनाओं में भारी कमी आई थी।

5 अगस्त, 2019 को केंद्र ने अनुच्छेद 370 को रद्द कर दिया, जिसके अंतर्गत जम्मू कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा हासिल था। इस फैसले के साथ ही जम्मू-कश्मीर के विभाजन से 2 केंद्र शासित प्रदेश- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख बने हैं।

घाटी में उग्रवाद में गिरावट के बाद, विरोध प्रदर्शन के दौरान कट्टरपंथियों ने पत्थर को एक ‘लोकप्रिय’ हथियार का विकल्प बनाया है। पत्थरबाजी का हथियार जम्मू-कश्मीर में 2008 के अमरनाथ-भूमि आंदोलन के बाद से प्रचलित होती गई।

इसके बाद से देशभर के कई हिस्सों में समुदाय विशेष ने पत्थरबाजी को अपने विरोध का एक सुलभ जरिया बनाया है। यही नहीं, दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों में पत्थरों का भारी मात्रा में इस्तेमाल किया गया। पत्थरबाजी का यह चलन साल 2010, 2016 और 2019 में सबसे ज्यादा देखा गया।

डीजीपी दिलबाग सिंह ने कहा, “कानून और व्यवस्था की स्थिति नियंत्रण में है। 2021 के लिए हमारा संकल्प जम्मू और कश्मीर में शांति बनाए रखना और स्थिति को नियंत्रित एवं मजबूत करना है।”

पत्थरबाजी पर मध्य प्रदेश में नया कानून | Ajeet Bharti on MP law on stone-pelting

“पत्थरबाजी कोई साधारण अपराध नहीं। इससे लोगों की जान भी जा सकती है, भय और आतंक का माहौल पैदा होता है, भगदड़ मचती है। ये साधारण अपराधी नहीं होते हैं। इनके ख़िलाफ़ अभी तक मामूली कार्रवाई होती थी, लेकिन अब कड़ी सजा का प्रावधान कर…”

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चीन को झटका, तिब्बतियों ने पूरी दुनिया में किया मतदान: Sikyong चुनाव के लिए भारत के साथ ट्रंप का भी सख्त फैसला

चीन के ख़िलाफ़ अमेरिका की नई तिब्बती नीति और समर्थन कानून के पास होने के बाद रविवार (जनवरी 3, 2021) को विश्व्यापी स्तर पर निर्वासित तिब्बती संसद के लिए मतदान आरंभ हुआ। भारत समेत कई देशों में रहने वाले सैंकड़ों तिब्बतियों ने इस मतदान प्रक्रिया में हिस्सा लिया। 

निर्वासित तिब्बती नेता लोबसांग सांगेय (Lobsang Sangay) ने व्यापक स्तर पर हुए मतदान के मद्देनजर कहा कि ये चीन के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि तिब्बत में लोकतंत्र कितना अटल है। तिब्बती नेता लोबसांग ने कहा, “यह बीजिंग को साफ संदेश है कि कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह तिब्बतियों को जितना भी दबा लें, लोकतंत्र तिब्बत में अनिवार्य रहेगा।” 

उन्होंने भारत में बने Tibetan Government-in-Exile (निर्वासन में तिब्बती सरकार) के अध्यक्ष होने के नाते जिसे सेंट्रल तिब्बती प्रशासन भी कहा जाता है, इस मतदान को लेकर बोला कि इससे तिब्बतियों को आशा का संदेश दिया गया है।

लोबसांग सांगेय ने रविवार को हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में अपना मतदान दिया। यहीं TGIE (Tibetan Government-in-Exile) का हेडक्वार्टर भी है। इन चुनावों में 2 उम्मीदवार हैं। यूएस समेत कई देशों में रहने वाले निर्वासित तिब्बती इनमें से जिसे ज्यादा वोट देंगे, उसके हाथ अगले 5 साल यानी 2026 तक के लिए पद की कमान चली जाएगी।

सांगेय ने कहा, “परम पावन दलाई लामा ने हमें उपहार के रूप में लोकतंत्र दिया है। पुरानी पीढ़ी ने इसे संरक्षित रखा और युवा पीढ़ी इसके लिए अभ्यस्त है। ये आगे भी ऐसे ही सशक्त होगी और तिब्बत के आजादी अभियान को मजबूत करेगी।”

बता दें कि लोबसांग को साल 2011 में इस शीर्ष पद के लिए निर्वाचित किया गया था। इसके बाद उन्होंने 2016 में भी इस पद पर अपनी जगह को बनाए रखा। लेकिन अब, वह अध्यक्ष पद के लिए नए चेहरे की उम्मीद कर रहे हैं। उनकी भाषा में कहें तो अगले Sikyong की। हालाँकि, बीजिंग इन चुनावों में महत्व नहीं देता है और कई बार दिल्ली में संदेश देकर ऐसे मतदान रुकवाने की गुहार लगा चुका है।

तिब्बतियों के अधिकार के लिए अमेरिका लेकर आया नया कानून

उल्लेखनीय है कि इस वर्ष तिब्बती संसद के 17वें चुनाव अधिक महत्वपूर्ण इसलिए भी हो जाते हैं क्योंकि अभी हाल में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सत्ता से हटने से पहले तिब्बत की धार्मिक आज़ादी को समर्थन देते हुए एक नया कानून पास किया था, जिसका चीन ने विरोध भी किया। नए कानून को बनाने से पहले यूएसआईडी पहले ही फंड शुरू कर चुका था। ट्रंप काल में लाए गए इस नए कानून का नाम- Tibetan Policy and Support Act of 2020 है। इसे चीन के ख़िलाफ़ अमेरिका की विदेश नीति की नई शुरुआत की तरह देखा जा रहा है। 

इस कानून में कई बड़ी बातें कही गई हैं लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सिर्फ तिब्बत के लोगों को ही अपना अगला दलाई लामा चुनने का अधिकार है और इस प्रक्रिया में चीन किसी तरह का कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। इसके अलावा इसमें ये भी कहा गया है कि तिब्बत के लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए अमेरिका एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन बना सकता है। बावजूद अगर चीन की सरकार ने अगला दलाई लामा चुनने की कोशिश की, तो अमेरिका उस पर आर्थिक प्रतिबंध भी लगा सकता है।

तिब्बत की निर्वासित सरकार 

तिब्बत की निर्वासित सरकार और संसद को आमतौर पर केंद्रीय तिब्बती प्रशासन कहते हैं, जो भारत से ही अपना काम कर रही है। इसके पीछे का इतिहास लंबा है। दरअसल, तिब्बत में चीन के कब्जे के बाद वहाँ के तिब्बती चीन के अधीन रहने को मजबूर हैं। ये कब्जा चीन ने साल 1959 में किया था।

इसके कुछ ही हफ्ते बाद वहाँ के नेता और धर्म गुरु दलाई लामा भाग कर भारत आ गए थे। उनके साथ ही यहाँ आई थी तिब्ब्तियों की एक बड़ी आबादी। जो अब हिमाचल के धर्मशाला से लेकर देश के कई हिस्सों में बस चुकी है। यहीं रहते हुए दलाई लामा ने चीन के खिलाफ आजादी की जंग छेड़ी हुई है, जिससे चीन अक्सर भौखलाया रहता है।

‘हलाल’ शब्द सरकारी दस्तावेज से एक झटका में गायब: इस्लामी संस्थाओं के सर्टिफिकेट का खेल बंद, मोदी सरकार का बड़ा फैसला

भारत सरकार के ‘कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority)’ या APEDA ने अपने रेड मीट मैन्युअल में से ‘हलाल’ शब्द को ही हटा दिया है और इसके बिना ही दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके लिए लम्बे समय से अभियान चला रहे हरिंदर एस सिक्का ने सोशल मीडिया पर इस सम्बन्ध में जानकारी दी।

उन्होंने इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री पीयूष गोयल को धन्यवाद दिया। सरकार के इस कदम के बाद अब ‘हलाल’ सर्टिफिकेट की ज़रूरत समाप्त हो जाएगी और सभी प्रकार के वैध मीट कारोबारी अपना पंजीकरण करा सकेंगे। हरिंदर सिक्का ने इसे बिना किसी भेदभाव के ‘एक देश, एक नियम’ के तहत लिया गया फैसला बताया और कहा कि ये ‘हलाल’ मीट परोस रहे रेस्टॉरेंट्स के लिए भी एक संदेश है।

APEDA ने अपने ‘फूड सेफ्टी मैनेजमेंट सिस्टम’ के स्टैंडर्ड्स और क्वालिटी मैनेजमेंट के डॉक्यूमेंट में बदलाव किया है। पहले इसमें लिखा हुआ था कि जानवरों को ‘हलाल’ प्रक्रिया का कड़ाई से पालन करते हुए जबह किया जाता है, जिसमें इस्लामी मुल्कों की ज़रूरतों को ध्यान में रखा जाता है। अब इसकी जगह लिखा गया है, “मीट को जहाँ आयात किया जाना है, उन मुल्कों की ज़रूरतों के हिसाब से जानवरों का जबह किया गया है।”

ये बदलाव इस डॉक्यूमेंट के पेज संख्या 8 में किया गया है। वहीं दूसरी तरफ पेज 30 पर जहाँ पहले लिखा था, “इस्लामी संगठनों की मौजूदगी में जानवरों को हलाल प्रक्रिया के तहत जबह किया गया है। प्रतिष्ठित इस्लामी संगठनों के सर्टिफिकेट लेकर मुस्लिम मुल्कों की जरूरतों का ध्यान रखा गया है”, वहाँ अब लिखा है, “आयातक देश के ज़रूरतों के अनुसार जानवरों को जबह किया गया है।” पेज संख्या 35, 71 और 99 पर भी बदलाव किया गया है।

पेज संख्या 35 पर पहले लिखा था कि इस्लामी शरीयत के हिसाब से पंजीकृत इस्लामी संगठन की कड़ी निगरानी में हलाल प्रक्रिया के तहत जानवरों को जबह किया गया है और उनकी निगरानी में ही इसका सर्टिफिकेट भी लिया जाता है। इस पूरी पंक्ति को ही हटा दिया गया है।

वहीं पेज संख्या 71 पर जेलेटीन बोन चिप्स को स्वस्थ भैंस को हलाल प्रक्रिया के तहत जबह किए जाने के बाद तैयार किए जाने की बात लिखी थी। इसे बदल कर भी ‘आयातक देश की ज़रूरतों के अनुरूप’ कर दिया गया है। साथ ही ‘हलाल’ शब्द को हटा कर लिखा गया है कि पोस्टमॉर्टम जाँच के बाद ही इसे तैयार किया गया है।

पेज संख्या 99 पर पूरी प्रक्रिया का फ्लो चार्ट था, जहाँ ‘हलाल’ शब्द को ‘Slaughter’ (जबह) से रिप्लेस कर दिया गया है। अब APEDA के रेड मीट मैन्युअल में आपको कहीं ‘हलाल’ शब्द नहीं मिलेगा। सिर्फ एक मीट प्रोसेसिंग कम्पनी ‘हलाल इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड’ नाम से रजिस्टर्ड है, जिसका जिक्र है।

हलाल पर बवाल

करीब 6 महीने पहले सोशल मीडिया पर सरकारी दस्तावेजों में हलाल शब्द को लेकर बवाल हुआ था। तब सरकारी विभाग को इस पर आकर सफाई भी देनी पड़ी थी।

कब APEDA को ऊपर वायरल हुए इमेज पर सफाई देते हुए कहना पड़ा था कि हलाल मीट के निर्यात को लेकर भारत सरकार की ओर से कोई जबरन नियम नहीं था बल्कि यह आयात करने वाले देशों (जो ज्यादातर मुस्लिम देश हैं) के नियमों के अनुरूप था। हालाँकि APEDA के रेड मीट मैन्युअल को कुछ ऐसे लिखा गया था, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा होती थी और यह लगता था कि भारत सरकार ही मीट को हलाल तरीके से प्रोसेस करने के लिए बाध्य करती है। इसी भ्रम को दूर करने के लिए भारत सरकार ने उपरोक्त बदलाव किया है।

क्या होगा बदलाव

APEDA के रेड मीट मैन्युअल के कारण मीट व्यापार में धार्मिक भेदभाव होता था। हलाल प्रक्रिया का पालन करने के कारण हिंदू नाम के बिजनेसमैन चाह कर भी इसमें आगे नहीं बढ़ पाते थे। हलाल सर्टिफिकेशन की आड़ में भी उनका शोषण होता था। रोजगार में गैर-मुस्लिमों के साथ भेदभाव होता था।

इसका कारण था हलाल के लिए थोपे गए इस्लामी नियम। इसके सबसे आपत्तिजनक शर्तों में से एक है कि हलाल मांस के काम में ‘काफ़िरों’ (‘बुतपरस्त’, गैर-मुस्लिम, जैसे हिन्दू) को रोज़गार नहीं मिलेगा। यह आर्थिक पक्ष हलाल को केवल एक भोजन पद्धति ही नहीं, एक पूरी समानांतर अर्थव्यवस्था बना देता है, जो गैर-मुस्लिमों को न केवल हाशिये पर धकेलती है, बल्कि परिदृश से ही बाहर कर देती है।

हाल ही में ये भी खबर आई थी कि दिल्ली के ऐसे होटल या मीट की दुकान जो SDMC (दक्षिण दिल्ली म्युनिशपल कॉर्पोरेशन) के अंतर्गत आते हैं, उन्हें अब हलाल या झटका बोर्ड टाँग कर रखना जरूरी होगा। SDMC की सिविक बॉडी की स्टैंडिंग कमिटी ने यह प्रस्ताव गुरुवार (24 दिसंबर 2020) को पास कर दिया। इस प्रस्ताव में यह भी लिखा है कि हिंदू और सिख के लिए हलाल मीट खाना वर्जित है।

पत्थरबाजों की संपत्ति से होगी अब नुकसान की भरपाई: MP में शिवराज सरकार ने नया कानून बनाने का किया फैसला

मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह सरकार ने राज्य में पत्थरबाजों के ख़िलाफ़ सख्त कानून बनाने का निर्णय कर लिया है। राज्य सरकार ने कहा है कि पत्थरबाजी सामान्य अपराध नहीं है। ऐसा करने वाले समाज के दुश्मन हैं और ऐसे लोगों को छोड़ा नहीं जाएगा।

मुख्यमंत्री चौहान ने रविवार (जनवरी 3, 2021) को मीडिया से बात करते हुए इसका जिक्र किया। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में सजा के लिए कड़े कानून बना रहे हैं। इसमें उपद्रवियों के लिए सजा का प्रावधान होगा, साथ ही आरोपित को पीड़ित व्यक्ति को क्षतिपूर्ति भी देनी होगी।

बता दें कि मध्य प्रदेश सरकार ने उज्जैन, इंदौर और मंदसौर जैसे इलाकों में आपसी झड़प और पत्थरबाजी की घटनाओं को देखने के बाद यह निर्णय लिया । उन्होंने कहा कि पत्थरबाजी कोई साधारण अपराध नहीं है। इससे लोगों की जान भी जा सकती है, इससे भय और आतंक का माहौल पैदा होता है, भगदड़ मचती है, अव्यवस्थाएँ होती हैं। वह बोले कि इस तरह के अपराधी साधारण अपराधी नहीं होते हैं और इन्हें छोड़ा नहीं जाएगा। इनके ख़िलाफ़ अभी तक तो मामूली सी कार्रवाई होती थी, लेकिन अब कड़ी सजा का प्रावधान करने के लिए कानून बनेगा।

वह बोले कि पथराव करने वाले अक्सर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने और आगजनी करने का भी सहारा लेते हैं। यहाँ तक कि घरों और दुकानों को भी जलाते हैं। सीएम ने कहा, “लोगों को लोकतंत्र में शांति से अपने मुद्दों को उठाने का अधिकार है, लेकिन किसी को भी सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की स्वतंत्रता नहीं है।”

मुख्यमंत्री ने कहा है कि इन नए कानून के अंतर्गत अगर जरूरत पड़ी तो आरोपितों की संपत्ति को नीलाम करवा कर भी क्षति की भरपाई होगी। इस नए कानून के निर्माण के लिए निर्देश दे दिए गए हैं। जल्द ही इन पर काम शुरू होगा।

गौरतलब है कि अभी हाल में मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित बेगमबाग इलाके में ‘रामनिधि संग्रहण’ रैली निकालने के दौरान मुस्लिम समुदाय के अराजक तत्वों ने हिन्दू संगठन पर पथराव किया था। इस घटना के बाद संज्ञान लेते हुए पुलिस ने उन लोगों पर कड़ी कार्रवाई की थी। खबरों के अनुसार, पुलिस और नगरपालिका की संयुक्त टीम ने उस घर को ध्वस्त कर दिया था, जिसके आस-पास मौजूद होकर कुछ महिलाएँ और बच्चे यात्रा निकालने वालों पर पथराव कर रहे थे।