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आपत्तिजनक अवस्था में थे 2 फादर-1 नन, 19 साल की सिस्टर ने देखा तो कुल्हाड़ी से वार; कुएँ में फेंका: 28 साल बाद आई फैसले की घड़ी

28 साल पहले हुई 19 साल की नन सिस्टर अभया की संदिग्ध मौत के मामले में फैसले की घड़ी आ गई है। मंगलवार (दिसंबर 22, 2020) को तिरुवनंतपुरम में केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) की अदालत फैसला सुनाएगी। केरल के कोट्टायम में सेंट पायस कॉन्वेंट (Pious X Convent) में सिस्टर अभया का शव कुएँ से मिला था। ख़ास बात यह है कि इतने वर्षों तक चर्च भी इस अपराध के आरोपितों को निर्दोष बताती रही।

सेंट पायस कॉन्वेंट (Pious X Convent) के कुएँ से सिस्टर अभया 27 मार्च 1992 को मृत मिली थी। इसी पायस कॉन्वेंट में पढ़ने वाली बिना थॉमस को सिस्टर अभया नाम भी दिया गया। शुरुआत में मामले की जाँच स्थानीय पुलिस और राज्य अपराध शाखा ने की थी, जिसमें कहा गया था कि अभया ने आत्महत्या की है और फाइल को बंद कर दिया गया।

लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ता जोमोन पुथेनपुराकल के संघर्ष और कानूनी लड़ाई के बाद 29 मार्च, 1993 को इस मामले को सीबीआई को सौंप दिया गया। CBI ने वर्ष 2008 में कोट्टूर, पूथरुकायिल और सेफी को हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया था।

इस हत्या को आत्महत्या साबित करने के अगले दो दशकों तक इस केस में कोई नई जानकारी नहीं आई। इसके बाद सीधे 27 साल बाद इस मामले की फिर से सुनवाई शुरू हुई और एक-एक कर गवाह मुकरने लगे। सिस्टर अभया हत्या मामले में अहम फैसले से एक दिन पहले ही इस केस के मुख्य गवाह राजू उर्फ ​​अदकाका राजू ने एक समाचार चैनल को बताया कि उसे पुलिस अधिकारियों द्वारा इस अपराध के लिए कई दिनों तक प्रताड़ित किया गया।

दरअसल, सिस्टर की हत्या के दिन राजू, जो कि एक छोटा-मोटा चोर था, वह बिजली का सामान चुराने कॉन्वेंट में घुसा था और हादसे के दौरान कॉन्वेंट परिसर में मौजूद था। बाद में, राजू ने कथित तौर पर सीबीआई अधिकारियों को बताया कि उसने रहस्यमय परिस्थितियों में कॉन्वेंट में दो पादरी (प्रीस्ट) और एक नन को देखा। उसने बताया, “मुझे बहुत पीड़ा हुई। मुझे अपराध कबूलने के लिए कहा गया, लेकिन मैंने इनकार कर दिया। मैं चाहता हूँ कि सच्चाई सामने आए।”

सीबीआई ने इस मामले में कैथोलिक पादरी थॉमस कोट्टूर और सिस्टर सेफी पर चार्जशीट दायर की। इन लोगों पर हत्या, सबूत नष्ट करने, आपराधिक साजिश और अन्य आरोप लगाए गए। एक अन्य आरोपित फादर जोस पूथरुकायिल को पिछले साल अदालत ने सबूत न मिलने के कारण छोड़ दिया था।

इस मामले में वर्ष 2007 में CBI ने तीनों आरोपितों का NARCO टेस्ट भी किया और कहा गया कि इसकी रिपोर्ट के साथ भी छेड़छाड़ की गई। इसके बाद, आखिरकार वर्ष 2008 में आरोप-पत्र दायर किया गया और नवंबर, 2008 में तीनों आरोपितों को गिरफ्तार किया गया। हालाँकि, एक ही माह बाद उन्हें जमानत भी मिल गई।

क्या हुआ था 28 साल पहले

सीबीआई के आरोप-पत्र के अनुसार, घटना के दिन सिस्टर अभया एग्ज़ाम के लिए सुबह के चार बजे उठी और पानी लेने किचन में गईं। अभया ने दो पादरियों और एक नन- थॉमस कुट्टूर, जोस पूथरुकायिल, और सिस्टर सेफी को ‘आपत्तिजनक स्थिति’ में पाया। सिस्टर अभया ये बात किसी को बता न दें, इस डर से तीनों ने मिलकर उस पर हमला किया और सिस्टर अभया बेहोश हो गई। इसके बाद तीनों ने मिलकर उसे कुऍं में डाल दिया।

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मामले में तीन मुख्य अभियुक्त – फादर जोस पूथरुकायिल, फादर थॉमस कुट्टूर, और सिस्टरसेफी (चित्र साभार: दी न्यूज़ मिनट)

घटना के समय फादर थॉमस ने कथित तौर पर रसोई में उसका गला घोंट दिया, जबकि तीसरे आरोपित ने उस पर कुल्हाड़ी से वार किया। इसके बाद फादर जोस सहित तीनों लोगों ने फिर उसे एक कुएँ में फेंक दिया, जबकि वह तब भी जिन्दा थी। सिस्टर अभया की डूबने से मौत हो गई। हमले के समय एक पानी की बोतल किचन में गिर गई थी, उनके बाहर निकलते समय दरवाजे के नीचे एक कपड़ा मिला था और रसोई में विभिन्न स्थानों पर पाए गए अभया के चप्पल सभी सबूत का हिस्सा बने।

इस भयावह केस की चर्चा के गर्म रहने के बावजूद, चर्च भी यह कहते हुए आरोपितों के साथ खड़ी रही कि वे निर्दोष थे। CBI ने 177 गवाहों की भी एक सूची बनाई थी लेकिन अगस्त, 2019 में सुनवाई के पहले दिन ही पता चला कि जिन तीन गवाहों को बुलाया गया, उनमें से दो की मौत हो चुकी है जबकि तीसरा गवाह मुकर गया।

जिन दो गवाहों को दूसरे दिन बुलाया गया, उनमें से एक की मौत हो चुकी थी, और दूसरा गवाही देने से ही मुकर गया। सिस्टर अभया के माँ-बाप थॉमस और लीलाम्मा, दोनों की वर्ष 2016 में मौत हो चुकी है।

सिस्टर अभया के साथ की 67 ननों ने केरल के तत्कालीन मुख्यमंत्री के करुणाकरण के पास अपील की कि इस मौत को हत्या मानकर इसकी जाँच की जाए। सबसे पहले, केरल पुलिस ने मामले की जाँच की और इसे आत्महत्या करार दिया। बाद में क्राइम ब्रांच ने भी यही बात कही। भारी हंगामे के बाद यह मामला फिर सीबीआई को सौंप दिया गया था। पिछले महीने केंद्र सरकार ने सीबीआई एसपी नंदकुमार नायर के साथ कई अन्य लोगों की भी सेवा को बढ़ाया था, जिन्होंने इस मामले की जाँच की थी।

बेंगलुरु दंगे: PFI और SDPI के 17 नेताओं को NIA ने गिरफ्तार किया, अगस्त में बड़े पैमाने पर हुई थी हिंसा

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों, डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया (SDPI) और पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI) के 17 नेताओं को गिरफ्तार किया है। इन सभी पर आरोप है कि ये 11 अगस्त 2020 को बेंगलुरु स्थित केजी हल्ली पुलिस स्टेशन के नज़दीक बड़े पैमाने पर हुए दंगों और हिंसा की घटनाओं के षड्यंत्र में शामिल थे। 

NIA का कहना है कि अभी तक इस मामले में 187 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है और मामले की जाँच जारी है। 

दंगों के कुछ दिन बाद सितंबर 2020 में सरकार ने घटना से जुड़े तथ्यों की तफ्तीश के लिए ‘फैक्ट फाइंडिंग कमेटी’ का गठन किया था। कमेटी की जाँच में यह बात सामने आई कि सांप्रदायिक हिंसा की सिलसिलेवार घटनाएँ सुनियोजित और संगठित थी। इसके अलावा ये विशेष रूप से उस क्षेत्र में रहने वाले हिन्दुओं को निशाना बनाने के उद्देश्य से अंजाम दी गई थी। 

रिपोर्ट्स के मुताबिक़ हिंसा, उपद्रव और अराजकता की इन घटनाओं का षड्यंत्र स्वीडन के दंगों और साल की शुरुआत में हुए दिल्ली-हिन्दू विरोधी दंगों की तर्ज पर था। फैक्ट फाइंडिंग कमेटी को पड़ताल के दौरान पता चला कि स्थानीय आबादी ने दंगों को प्रभावी बनाने में अहम भूमिका निभाई और उन्हें पहले ही इसकी जानकारी थी। कमेटी ने यह भी कहा कि SDPI और PFI ने इन दंगों की योजना तैयार करने से लेकर इन्हें अंजाम देने में सबसे अहम किरदार निभाया।     

SDPI और PFI के ठिकानों पर NIA का छापा 

पिछले महीने की शुरुआत में एनआईए ने बेंगलुरु दंगों से संबंधित तमाम ठिकानों पर छापा मारा था, जिसमें SDPI के 4 दफ्तर शामिल थे। SDPI इस्लामी कट्टरपंथी संगठन PFI का राजनीतिक संगठन है। NIA द्वारा जारी किए गए बयान के मुताबिक़ बेंगलुरु में हुए सांप्रदायिक दंगों के संबंध में एजेंसी ने बेंगलुरु, कर्नाटक में लगभग 43 जगहों पर छापा मारा था। छापेमारी अभियान के दौरान NIA ने SDPI/PFI से जुड़ी तमाम विवादित सामग्री और तलवार, चाक़ू और लोहे की रॉड जैसे कई हथियार बरामद किए थे।

कर्नाटक के कॉन्ग्रेस विधायक के भतीजे नवीन द्वारा सोशल मीडिया पर पैगम्बर मोहम्मद के कथित अपमानजनक पोस्ट को लेकर उग्र इस्लामी भीड़ ने पूरे बेंगलुरु को दंगों की आग में झोंक दिया था। विधायक के आवास और डीजे हल्ली के एक थाने में कट्टरपंथी उपद्रवियों ने उत्पात मचाया, जिन्होंने कई पुलिस और निजी वाहनों को भी आग लगा दी और लूटपाट भी मचाई। 

11 अगस्त 2020) की शाम कॉन्ग्रेस विधायक अखंडा श्रीनिवास मूर्थी के आवास पर संप्रदाय विशेष की हज़ारों की भीड़ इकट्ठा हुई। कुछ ही देर में भीड़ ने पूरे घर को तबाह कर दिया। इसके बाद डीजे हल्ली और केजी हल्ली पुलिस थाने पर भी जम कर तोड़फोड़ की। पुलिस द्वारा की गई जवाबी कार्रवाई में कुल 4 लोगों की जान गई थी और 6 लोग घायल हुए थे। दंगे में 60 पुलिसकर्मी घायल हुए थे। NIA ने SDPI नेता मुज़म्मिल पाशा पर बेंगलुरु दंगों के दौरान भीड़ को भड़काने का आरोप लगाया था। 

दंगों के कुछ ही समय बाद हालात काफी विचित्र हो गए जब दो अलग-अलग इस्लामी भीड़ ने केजे हल्ली और डीजे हल्ली पुलिस थाने पर इकट्ठा हो गई थी। इस्लामी भीड़ ने बाहर से दरवाज़ा बंद करके पुलिस थाने पर जम कर पत्थरबाजी की जिसमें लगभग 10 वाहन, (दो डीसीपी की गाड़ियां) क्षतिग्रस्त हुए थे। इसके अलावा इस्लामी भीड़ ने मौके पर मौजूद कई गाड़ियों को आग के हवाले भी किया। जिस तरह इस्लामी भीड़ के हाथों में पेट्रोल बम और हथियार मौजूद थे उससे स्पष्ट था कि दंगों की पूरी घटना सुनियोजित थी।     

दिल्ली के रिलीफ फंड में आए ₹34 करोड़, खर्च सिर्फ ₹17 करोड़, कोरोना नियंत्रण पर केजरीवाल सरकार ने एक पैसा भी नहीं खर्चा

कोरोना वायरस से लड़ने के नाम पर दिल्ली सरकार के एलजी/सीएम रिलीफ फंड में 3469.99 लाख (34 करोड़ 69 लाख 99 हजार) रुपए आए। इसमें से दिल्ली सरकार ने मात्र 1702.44 लाख (17 करोड़ 2 लाख 44 हजार) रुपए ही खर्च किए। आश्चर्यजनक तौर पर कोरोना संक्रमण को रोकने पर इसमें से एक भी पैसा खर्च नहीं किया गया। यह खुलासा एक आरटीआई (सूचना का अधिकार) के जवाब से हुआ है।

आरटीआई के तहत दिल्ली सरकार से इस साल मार्च से लेकर 16 नवंबर तक रिलीफ फंड में आए पैसे और खर्च का ब्यौरा माँगा गया था।

RTI में प्राप्त जवाब

RTI कार्यकर्ता विवेक पांडेय द्वारा नवम्बर, 2020 में सीएमओ दिल्ली से एक आरटीआई दायर कर इस सम्बन्ध में जवाब माँगा गया था। लेकिन इसके आँकड़े हैरान कर देने वाले हैं। विवेक पांडेय को इस RTI का जवाब दिसंबर 15, 2020 को मिला। RTI में मिले जवाब का यदि मोटा-मोटा हिसाब लगाया जाए तो दिल्ली सरकार को कोरोना के नाम पर लगभग 34 करोड़ फंड अब तक मिल चुका है। इसमें से अरविन्द केजरीवाल सरकार मात्र 17 करोड़ रुपए ही खर्च कर पाई है।

ऑपइंडिया से बातचीत करते हुए RTI में प्राप्त जानकारी का विवरण देते हुए विवेक ने बताया कि उन्होंने इस RTI में पूछे गए सवालों में से मात्र एक का ही जवाब दिया गया है। आरटीआई कार्यकर्ता ने बताया कि उन्होंने एक आरटीआई दिल्ली राजस्व विभाग को भी भेजी, जिसका अभी तक भी जवाब नहीं आया है।

RTI में पूछे गए सवाल

विवेक के अनुसार, इसके अलावा जिस RTI का जवाब दिल्ली सरकार की ओर से दिया गया है, उनमें भी उन्हें कोरोना वायरस के लिए खर्च किए गए आँकड़ों का पूरा विवरण नहीं भेजा गया है। विवेक का कहना है कि उन्होंने यह सवाल भी पूछा था कि कोरोना वायरस से निपटने के लिए किस विभाग और किस कार्य में दिल्ली सरकार द्वारा यह फंड खर्च किया गया था, लेकिन उन्हें इस सम्बन्ध में जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई।

कोरोना वायरस महामारी की शुरुआत से लेकर अब तक दिल्ली सरकार द्वारा LG-CM राहत फंड में ओवरऑल कितना खर्च किया गया, इस सम्बन्ध में भी विवेक को कोई जवाब नहीं दिया गया है। उनका कहना है कि अगर आप के (दिल्ली सरकार) पास इतनी बड़ी राशि आई थी, तो अब तक इतना कम अमाउंट ही क्यों खर्च किया गया?

RTI कार्यकर्ता के अनुसार, दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल सरकार हमेशा यही शिकायत करती है कि हमें काम नहीं करने दिया जाता है और हमारे पास पैसा नहीं है, लेकिन जब मार्च से अब तक इतनी बड़ी राशि उनके पास कोरोना वायरस से निपटने के लिए मौजूद थी, तो फिर इसका इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया?

उन्होंने कहा कि दिल्ली में कोरोना वायरस को लेकर शुरू से ही बहुत बुरी स्थिति रही है, केंद्र ने भी राज्य की मदद की, बावजूद इसके अरविन्द केजरीवाल सरकार अपने फंड का इस्तेमाल क्यों नहीं कर पाई?

केजरीवाल सरकार ने अकेले मार्च में विज्ञापन पर कर डाले 103.76 करोड़ रुपए खर्च

इससे पहले, RTI एक्टिविस्ट विवेक द्वारा ही दायर की गई एक और RTI से खुलासा हुआ था कि दिल्ली सरकार ने 2012-13 से अब तक विज्ञापनों पर 659.02 करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है। इसका 77% वर्ष 2015 से केजरीवाल के कार्यकाल के दौरान खर्च किया गया।

इस साल अप्रैल और अक्टूबर के बीच, दिल्ली सरकार ने 99.69 करोड़ रुपए खर्च किए हैं, जबकि सबसे अधिक खर्च वित्तीय वर्ष 2019-20 में हुआ। इस दौरान आम आदमी पार्टी सरकार द्वारा 199.99 करोड़ रुपए विज्ञापन पर खर्च किए गए।

दिल्ली सरकार द्वारा 2019-20 में विज्ञापन पर खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा अकेले मार्च के माह में किया गया, जब केजरीवाल सरकार द्वारा एक महीने पहले हुए विधानसभा चुनावों के बाद अपने प्रशासन के प्रचार पर 103.76 करोड़ रुपए खर्च कर डाले।

एशिया के सबसे बड़े मिर्च मार्केट में आंध्र प्रदेश के किसान को मिली अब तक की सबसे बड़ी कीमत

आंध्र प्रदेश के एक किसान को डब्बी (Dabbi) मिर्च की अब तक की सबसे बड़ी कीमत मिली है। वह अपनी उपज बेचने कर्नाटक के बैदागी स्थित एशिया के सबसे बड़े मिर्च मार्केट में गुरुवार को पहुँचे थे। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार उन्हें 36,999 रुपए प्रति क्विंटल की दर से अपनी उपज बेची। यह डब्बी मिर्च का अब तक का सबसे बड़ा भाव है।  

आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले स्थित अवुलादत्ता गाँव के निवासी किसान गुलेप्पा ने मिर्च की फसल ‘किशोर एंड कंपनी’ को रिकॉर्ड दाम पर बेची। 

गुलेप्पा ने बताया, “पहली बार मैं अपनी उपज बेचने कर्नाटक स्थित एशिया के सबसे बड़े मिर्च मार्केट बैदागी में आया था। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मुझे अपनी उपज की इतनी कीमत मिलेगी। पिछले साल मैंने अपनी फसल गुंटूर में बेची थी लेकिन मुझे उसका सही दाम नहीं मिला था। मिर्च के पैदावार पर करीब 10,500 रुपए प्रति क्विंटल मैंने खर्च किए थे।”

बीते हफ्ते इसी किस्म (वैरायटी) की मिर्च 35,555 रुपए प्रति क्विंटल के दाम पर बेची गई थी, लेकिन यह एक वैरायटी की मिर्च की पैदावार के लिए किसी किसान को किया गया सर्वाधिक भुगतान है। 2019 में इस किस्म की मिर्च के लिए 33,333 रुपए प्रति क्विंटल का भुगतान किया गया था।मीडिया रिपोर्ट के अनुसार डब्बी मिर्च का व्यापार पिछले महीने कर्नाटक के बैदागी (Byadagi) में शुरू हुआ था, लेकिन ग्राम पंचायत चुनावों की वजह से इसकी आवक प्रभावित हुई। गुरुवार (17 दिसंबर 2020) को इस मार्केट में मिर्च के कुल 60,957 बोरियाँ आई थीं, इसी कड़ी में आंध्र प्रदेश के किसान गुलेप्पा अपनी फसल बेचने के लिए आए थे।

भारत की तमाम तरह की मिर्च में दूसरा सबसे बड़ा कारोबार

बैदागी मिर्च काफी मशहूर है और इसकी पैदावार मुख्यतः कर्नाटक में ही होती है। इसका नाम बैदागी नाम की जगह पर रखा गया है जो कि कर्नाटक के हावेरी जिले में स्थित है। इस मिर्च की सालाना बिक्री लगभग 300 करोड़ रुपए की है जिसका कारोबार पूरे देश में तमाम तरह की मिर्च में दूसरे पायदान पर आता है। इस मिर्च मार्केट में पूरे कर्नाटक समेत पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश के किसान भी आते हैं। 

बैदागी मिर्च के दो प्रकार होते हैं, डब्बी और कड्डी। बैदागी डब्बी छोटी और गोल मटोल होती है। यह अपने रंग, स्वाद और फ्लेवर के लिए मशहूर है और इसमें बीज की संख्या कम होती है यानी यह कड्डी मिर्च की तुलना में कम तीखी होती है। यह ज़्यादातर मसाले तैयार करने में इस्तेमाल की जाती है। तमाम बड़ी खाद्य कंपनी अपने उत्पादों के लिए इस वैरायटी का ही इस्तेमाल करते हैं। इसका उपयोग कई सौंदर्य उत्पादों जैसे लिपस्टिक और नेल पॉलिश में भी किया जाता है।     

बिहार: मस्जिद में 75 वर्षीय बुजुर्ग का गला रेता शव मिला, लोगों का दावा- मानसिक हालत ठीक नहीं थी, खुदकुशी की

बिहार के नालंदा में एक 75 वर्षीय बुजुर्ग मोतीउर रहमान ने मस्जिद में गला रेत कर आत्महत्या कर ली। घटना बिहार थाना क्षेत्र के इमादपुर मोहल्ले स्थित मस्जिद की है। मोतीउर रहमान के परिजनों के मुताबिक़ वे पिछले कई दिनों से मस्जिद में ही रह रहे थे और उनकी दिमागी हालत ठीक नहीं थी।

दरअसल रविवार (20 दिसंबर 2020) की सुबह जब कई मजदूर इमादपुर मस्जिद में जारी निर्माण कार्य करने गए तो वहाँ उन्हें मोतीउर रहमान का खून से लथपथ शव नज़र आया और मौक़ा-ए-वारदात से एक चाकू भी बरामद किया गया। इसके बाद मोतीउर रहमान को तुरंत बिहारशरीफ सदर अस्पताल में भर्ती कराया गया जहाँ डॉक्टर्स ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। घटना की जानकारी मिलते ही बिहार थाना के सब इंस्पेक्टर खुर्शीद आलम सदर अस्पताल पहुँचे और उन्होंने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ मृतक बुजुर्ग के दामाद मोहम्मद अनीस ने बताया, “सुबह के लगभग 5:30 बजे वह घर से निकले थे। सुबह की नमाज़ के बाद उनका शरीर मस्जिद के निर्माणधीन दूसरे तल पर पाया गया। वह कुछ समय पहले कोलकाता में काम कर रहे थे, हाल ही में बिहारशरीफ वापस आए थे।” अनीस के मुताबिक़ पिछले कुछ समय से वह काफी अवसाद में थे। वहीं बिहार शरीफ नगर निगम के पूर्व डिप्टी मेयर गुलरेज़ अंसारी का कहना था कि मोतीउर रहमान की दिमागी हालत ठीक नहीं थी। संभावित तौर पर इसके चलते उन्होंने आत्महत्या की है। 

थानाध्यक्ष दीपक कुमार ने भी इस घटना के संबंध में बात करते हुए जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मृतक का किसी से विवाद नहीं था, पुलिस मामले के अन्य पहलुओं की जाँच कर रही है। परिजनों के अनुसार मोतीउर का घर से संबंध सिर्फ खाने तक सीमित था, वह कुछ समय से अजीब बातें करने लगे थे। जिसकी वजह से लोग उन्हें बात-बात पर छेड़ने भी लगे थे, बदले में वह लोगों को धमकी देते थे।

राहुल वर्मा बन मोहम्मद तौफीक ने हिंदू युवती से रचाई शादी, सोशल मीडिया में तस्वीरें शेयर होते ही खुला राज

उत्तर प्रदेश में एक और ग्रूमिंग जिहाद (लव जिहाद) का मामला सामने आया है। कन्नौज जिले में तौफीक नाम के युवक ने अपनी मज़हबी पहचान छुपा कर एक हिन्दू युवती को प्रेम जाल में फँसाया। इसकी जानकारी मिलने पर युवती के परिजनों ने युवक को अपने समुदाय का समझ उससे बेटी की हिन्दू रीति-रिवाजों से शादी कर दी। शादी की तस्वीरें सोशल मीडिया में साझा किए जाने के बाद युवक की असलियत सामने आई। यह बात सामने आते ही परिजनों के पैरों तले ज़मीन ही खिसक गई और उन्होंने युवक के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज कराया। पुलिस ने तौफीक को गिरफ्तार कर लिया है।

कन्नौज के गुरसहायगंज कोतवाली क्षेत्र के निवासी पीड़ित युवती शिक्षिका है। वह नज़दीक स्थित कस्बे के निजी स्कूल में बच्चों को पढ़ाती है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ कन्नौज के खांडेदेवर गाँव के रहने वाले तौफीक खान ने राहुल वर्मा नाम से फेसबुक आईडी बनाकर युवती से बातचीत शुरू की। चैटिंग करते हुए तौफीक ने युवती का नंबर ले लिया और दोनों के बीच बातचीत होने लगी। आरोपित तौफीक ने युवती को अपने प्रेम जाल में फँसा लिया और इस बात की जानकारी मिलने पर युवती के परिजन शादी के लिए तैयार हो गए। 

शादी के ज़िक्र पर शिक्षिका के पिता ने तौफीक से कहा कि वह अपने घर वालों को बुला ले। इस पर बहाना करते हुए तौफीक ने कहा कि उसका अपने माता-पिता से विवाद चल रहा है। पिछले 7 वर्षों से वह अपने घर जयपुर नहीं गया है और लखनऊ में ही प्रॉपर्टी डीलिंग का काम करता है। युवती के परिजनों ने आरोपित के बारे में जानकारी इकट्ठी की, लेकिन इसके बावजूद उन्हें यह नहीं पता चला कि खुद को राहुल वर्मा बताने वाले व्यक्ति की असल पहचान क्या है। 10 दिसंबर 2020 को लखनऊ में युवती के पिता ने हिन्दू रीति-रिवाज़ों से बेटी की शादी तौफीक से कर दी।

आरोपित ने शादी के कार्ड में अपना नाम राहुल वर्मा पुत्र राजेश वर्मा निवासी लखनऊ लिखवाया था। जब युवती के भाई ने शादी की तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा की तब आरोपित युवक की सच्चाई सामने आई। शिक्षिका के परिजनों को पता चला कि जिस व्यक्ति को वह राहुल वर्मा समझ रहे थे, वह असल में नज़दीक के गाँव खाड़ेदेवर का निवासी तौफीक खान है। इस घटना पर पुलिस अधीक्षक (कन्नौज) प्रशांत कुमार वर्मा का कहना है कि तौफीक नाम के युवक ने अपनी पहचान छुपा कर युवती से शादी की है।

थाना प्रभारी राजा दिनेश सिंह ने बताया कि पुलिस ने तौफीक को गिरफ्तार कर लिया है और युवती को सुरक्षा प्रदान की गई। कड़ी सुरक्षा के बीच तौफीक को अदालत में पेश करके उसका बयान दर्ज कराया गया था। आरोपित तौफीक पर विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश 2020 की धारा 419, 420, 496 और भारतीय दंड संहिता की धारा 295 ए के तहत मामला दर्ज कर लिया गया है।

नींद से जागो आरफा खानम शेरवानी! भक्त तो बस हलाला-शिर्क पढ़ ही रहे हैं, कई मुस्लिम वही कर रहे हैं

मध्यप्रदेश के ग्वालियर में आदिल खान नाम के युवक ने साल की शुरूआत में अपनी बीवी को तीन तलाक दिया था। बीवी की गलती ये थी कि उसने अपने शौहर यानी आदिल से शिकायत की थी कि ससुर और देवर उस पर गलत नजर रखते। बस इतनी सी बात पर आदिल ने उसे चरित्रहीन बता दिया। बाद में अपने ही अब्बा के साथ हमबिस्तर होने के लिए मजबूर करने लगा। जब महिला तैयार नहीं हुई तो उसे ढाई साल के बच्चे के साथ घर से बाहर कर दिया। इसके बाद उसे तीन तलाक दिया गया और दोबारा रिश्ता बनाने के लिए हलाला करने को मजबूर किया गया।

उत्तराखंड के हल्द्वानी में एक मुस्लिम महिला ने अपने शौहर समेत 4 लोगों पर शिकायत दर्ज करवाई। ये मामला भी तीन तलाक और हलाला से जुड़ा था। महिला का निकाह उस्मान नाम के व्यक्ति से हुआ था। लेकिन कुछ दिन बाद उस्मान ने उसे तलाक दे दिया और पूरा ससुराल मिल कर उस पर जेठ या ससुर से हलाला करवाने के लिए दबाव बनाने लगा। महिला ने तंग होकर शौहर उस्मान, जेठानी शहनाज, जेठ इकराम व ससुर के खिलाफ मारपीट, धमकी, जबरन गर्भपात कराने, दहेज उत्पीडऩ करवाया।

हरियाणा के नूँह में अब्दुल समी को गिरफ्तार किया गया था। समी ने साल 2017 में अपनी बीवी को दहेज न मिलने पर तलाक दिया था। लेकिन कुछ दिन बाद उसे अपने पास यह कहकर बुला लिया कि वह कोई न कोई रास्ता खोज लेंगे। इसके बाद जब महिला ससुराल पहुँची तो उसके ननदोई जावेद ने उसका बलात्कार कर लिया। शिकायत करने पर सास ने कहा कि उसके ससुर ने उसका हलाला करवाया है। अब आगे ये घटना नहीं होगी।

निकाह, हलाला, तीन तलाक से जुड़े ये मामले आप पाठकों के लिए नहीं हैं। ये तीन केस आरफा खानम शेरवानी (Arfa Khanum Sherwani) के लिए हैं।

  • – वही आरफा जो पत्रकारिता जगत में सेकुलरिज्म के नाम पर इस्लाम का बोलबाला करने के लिए पहचानी जाती हैं।
  • – वही आरफा खानम जो देश में इस्लामोफोबिया के बैनर तले हिंदूफोबिया फैलाने का घृणित कार्य लंबे समय से करती आ रही है। 
  • – वही आरफा जिन्हें बर्दाश्त नहीं है कि इस देश में मजहब विशेष द्वारा फैलाई कुरीतियों पर कभी कोई दूसरे समुदाय का व्यक्ति अपनी राय रखे।

यही आरफा खानम शेरवानी एक बार फिर से हिंदुओं का मखौल उड़ाने के लिए ट्विटर पर आई हैं। इस बार उनका कहना है कि पिछले 6 वर्षों में (मोदी सरकार में) जितना इस्लाम भक्तों ने पढ़ा है उतना तो शायद इस्लाम मानने वालों ने भी न पढ़ा हों।

उपरोक्त घटनाओं का जिक्र केवल इसलिए किया गया है कि आरफा को यह समझ आ जाए कि मजहब विशेष पर उठती ऊँगली निराधार नहीं है। समाज में ऐसी तमाम खबरें हैं जिनको देखने के बाद मजहब विशेष के ‘ज्ञान’ और उससे जुड़ी कुरीतियों पर चाहते न चाहते हुए भी सवाल उठने स्वभाविक हैं।

पत्रकारिता को इस्लाम प्रचार के एक मीडियम के अतिरिक्त कुछ न समझने वाली आरफा खानम शेरवानी देश के प्रधानमंत्री पर सवाल उठाते हुए 20 दिसंबर 2020 को कहा था कि जब पीएम गुरुद्वारे पहुँच गए हैं तो अच्छा होगा कि वह क्रिसमसक्रिस्मस पर चर्च भी जाएँ। क्या वे जाएँगे?

शेरवानी के इस ट्वीट का जवाब उन्हें यूजर्स ने बखूबी दिया। गरुड़ प्रकाशन के संस्थापक संक्रांतु सानु ने इस्लामी कट्टरपंथ को उजागर करते हुए कहा कि आदर समान रूप से दिया जाता है, लेकिन अब्राहिम एकेश्वरवाद में ऐसा नहीं है। उन्होंने आरफा को सलाह दी थी कि उन्हें एक नई पाक किताब की जरूरत है। 

मगर, इस नोकझोंक के बीच आरफा को एक यूजर का ट्वीट नहीं भाया। समीर नाम के यूजर ने जाकिर हुसैन का वीडियो शेयर करते हुए बताया कि उनके मजहब में तो ‘मेरी क्रिसमस’ कहना भी शिर्क़ है तो इसलिए वो अपनी चीजों को सहीं करें और बाकी को ज्ञान न दें। इस पर आरफा बौखला गईं और उन्होंने तंज भरे अंदाज में लिखा:

“निकाह, तलाक़, हलाला, गज़वा-ए-हिंद, और अब शिर्क..पिछले 6 सालों में भक्तों ने जितना इस्लाम पढ़ लिया है उतना तो इस्लाम के मानने वालों ने भी शायद ही पढ़ा हो।”

आरफा खानम का यह केवल एक ट्वीट आखिर किसके पक्ष में है ये एक बड़ा चर्चा का विषय होना चाहिए। वह इस एक ट्वीट में दो निशाने साध रही हैं। पहला वह अपने सेकुलर दोस्तों के सामने हिंदुओं का मखौल उड़ा रही हैं और दूसरा वह एक नैरेटिव तैयार कर रही हैं जहाँ उनके फॉलोवर्स को मालूम चले कि निकाह, हलाला, तलाक, गजवा-ए-हिंद पर बात सिर्फ़ इस्लामोफोबिया फैलाने के लिए किया जा रहा है।

हालाँकि, तस्वीरों को फोटोशॉप के जरिए आकर्षक बनाने वाली आरफा शायद भूल गई हैं कि इस्लामी कट्टरपंथ को डिफेंड करना आज के समय में इतना आसान नहीं। पिछले 6 सालों में ‘भक्तों’ ने जो इन विषयों पर मुखर होकर बोलना शुरू किया है, उसी का नतीजा है कि आज इन कुरीतियों पर चर्चा मुमकिन है। वरना शेरवानी जैसी पढ़ी-लिखी महिलाएँ भी हैं समाज में, जिनका मन अब भी गर्त में रहने को उबाल मारता रहता है।

विमर्श का विषय है कि यदि सिर्फ़ पिछले 6 सालों में भक्तों ने सिर्फ़ मजहबी कुरीतियों पर मुखर होकर बोलना शुरू किया है तो शेरवानी इस तरह के तंज कसने लगीं। उन्होंने तब आखिर कुछ बोलने की हिम्मत क्यों नहीं की जब उनके समुदाय के लोग इन शब्दों को परिभाषित करते रहे।

क्यों गजवा-ए-हिंद के कॉन्सेप्ट पर आज तक उन्होंने सफाई पेश नहीं की? क्यों आतंकी समूहों के नारों पर उन्होंने स्पष्टीकरण नहीं दिया? क्यों ग्वालियर में कोई आदिल खान अपनी बीवी को चरित्रहीन कहता रहा और आरफा चुप रह गईं? क्यों नूँह में किसी अब्दुल समी के पिता ने अपनी बहू का हलाला करवाया और आरफा शांत रहीं? क्यों उस्मान के परिजनों के ख़िलाफ़ आरफा के मुँह से एक शब्द तक नहीं निकला?

मजहब की ठेकेदार क्या वह तभी तक हैं जब कोई दूसरा उस पर सवाल उठाएँ? अपने समुदाय के लोग किस तरह उसे बदनाम कर रहे हैं उससे आरफा खानम का क्यों सरोकार नहीं है? हिंदू इस्लाम को बदनाम नहीं कर रहे हैं। इसकी मट्टी पलीद उसी कट्टरपंथ ने की है जिसकी कठपुतली बनकर आरफा ‘ज्ञानवाचक’ बनती हैं।

वरिष्ठ पत्रकार होने के बाद यदि उनके एजेंडे पर एक नजर घुमाएँ तो पता चलता है कि वास्तविकता में ‘भक्तों’ ने मोदी समर्थक होने के बाद पीएम मोदी का बखान नहीं किया जितना इन लोगों ने उनका नाम लेकर उनका प्रचार कर दिया है। जिस तरह से पिछले कुछ सालों में आरफा जैसे पत्रकारों ने आलोचना के नाम पर पीएम मोदी का सब्जेक्ट बनाया है, उससे साफ पता चलता है कि यदि ये सब मोदी सरकार में वाकई देशहित के मुद्दों पर फोकस करते तो इनकी पत्रकारिता का तेल निकल जाता।

आरिफ मोहम्मद खान से इस्लामी ज्ञान लेना इसीलिए आरफा को मँजूर नहीं था क्योंकि वह देशहित में अपना बयान दे रहे थे और मुसलमान होने के मायने समझा रहे थे। उनके लिए शायद असली ज्ञानदाता जाकिर नाइक जैसे कट्टरपंथी हैं जिन्हें ‘मेरी क्रिसमस’ कहना शिर्क लगता है और जिन्हें गजवा-ए-हिंद का कॉन्सेप्ट एक पवित्र हकीकत लगता है।

ऐसी ही महिलाओं के कारण देश की अन्य मुस्लिम महिलाएँ अब भी उन्हीं हलाला, निकाह, तलाक, शिर्क जैसे शब्दों में निहित संघर्षों से जूझ रही हैं जिनसे उभारने की लड़ाई कौम की पढ़ी-लिखी महिलाओं को करनी चाहिए थी। मगर वह क्या कर रही हैं? ट्विटर पर कट्टरपंथ को विकराल रूप देना।  

टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पढ़िए। पता चलेगा कि कौम की महिलाएँ कहाँ जा रही हैं। मुस्लिम महिलाओं का साक्षरता दर देश के किसी भी अन्य धार्मिक समूह की महिलाओं के कम है, जबकि इसी समुदाय के 3 से 35 साल के सबसे ज्यादा ऐसा युवा हैं जिन्होंने शिक्षा प्रोग्रामों से खुद को कभी जोड़ा ही नहीं।

इन सबका जवाब कौन देगा? कैसे जस्टिफाई किया जाएगा इस अंतर को कि जब देश में लड़कियों के लिए अलग से शिक्षा अभियान चल रहे हैं तब लड़कियाँ कहाँ पिछड़ रही हैं? इसमें भी गलती सरकार की है या फिर एक निश्चित कौम और उसकी विचारधारा की या आरफा जैसी महिलाओं की। आज गरीबी के आधार पर भी इस फर्क का स्पष्टीकरण नहीं दिया जा सकता है, क्योंकि देश की अनुसूचित जनजातियों की स्थिति भी मुस्लिम महिलाओं से साक्षरता दर में बेहतर है।

तलाक, हलाला, गजवा-ए-हिंद के सामने सती प्रथा, देवदासी, बलि प्रथा, गोमूत्र व गोबर, जाति प्रथा, छुआछूत, दहेज प्रथा, बाल विवाह, वर्ण-लिंग भेदभाव, पर सवाल उठाना बहुत आसान है, लेकिन उससे मुश्किल इस बात का जवाब देना है कि जब देश के अधिकांश हिंदू अपने धर्म में प्रचलित कुरीतियों को धिक्कार चुके हैं, तब आरफा खानम क्यों इन पर स्पष्टीकरण देने के लिए हिंदुओं का मखौल उड़ा रही हैं?

आखिर पढ़ी-लिखी लड़की चाहे किसी भी धर्म की हो तलाक, हलाला को कैसे डिफेंड कर सकती है। आखिर गजवा-ए-हिंद में निहित संदेश को कैसे मजाक में लिया जा सकता है जिसमें कहा ही ये जाता हो कि खून की नदियाँ बहेंगी। भारत पर कब्जा किया जाएगा।

उन उलेमाओं के समर्थन में बात रखना जो तीन तलाक के समाप्त होने पर ये कह देते हैं, “संसद से पास हुआ तीन तलाक कानून शरीयत में हस्तक्षेप है।” उनसे आप क्या सामाजिक हित की उम्मीद लगाएँगे। याद करिए पिछले साल मुस्लिम लॉ बोर्ड के तीन तलाक पर आए बयानों को और पूछिए आरफा से कि क्यों वह इन सभी मुद्दों पर प्रश्न उठाने को पत्रकारिता नहीं मानती हैं और क्यों उनके लिए पत्रकार होने का अर्थ सिर्फ़ राष्ट्रीय मुद्दों पर गलत ढंग से चर्चा करना रह गया है।

‘आई लव यू सुजाता, मेरी लड़ाई TMC से है आप से नहीं’: भाजपा और पति को छोड़ TMC जाने वाली पत्नी को सौमित्र खान का भावुक संदेश

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद सौमित्र खान (Saumitra Khan) ने 2021 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) में शामिल होने के कुछ ही घंटों बाद अपनी पत्नी सुजाता मंडल खान (Sujata Mondal Khan) को तलाक का नोटिस भेजने का फैसला किया है।

सुजाता मंडल खान कोलकाता में सोमवार (दिसंबर 21, 2020) को TMC में शामिल हुईं, जिससे उनके परिवार में कलह पैदा हो गया है। अब बिष्णुपुर के सांसद सौमित्र खान ने सुजाता मंडल खान को तलाक का नोटिस भेजने का फैसला किया है। तलाक नोटिस भेजने के फैसले के दौरान सुजाता खान की कार और बरजोरा स्थित घर की सुरक्षा वापस ले ली गई है।

सौमित्र खान वर्तमान में भारतीय जनता युवा मोर्चा के अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल के बिश्नुपुर से सांसद हैं। उनकी पत्नी सुजाता मंडल खान सत्तारूढ़ पार्टी के सांसद सौगत राय और प्रवक्ता कुणाल घोष की मौजूदगी में TMC में शामिल हुईं।

रिपोर्ट्स के अनुसार, TMC में शामिल होने के बाद, सुजाता मंडल खान ने कहा कि भाजपा लोगों को उचित सम्मान और सम्मान नहीं देती है। सुजाता मंडल खान ने कहा, “अब केवल अवसरवादी और दागी लोग ही शीर्ष पर हैं। मुझे भाजपा में कोई सम्मान नहीं मिला।”

भाजपा पर निशाना साधते हुए सुजाता मंडल खान ने कहा कि भगवा पार्टी में 6 मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं और 13 उपमुख्यमंत्री पद के चेहरे हैं। उन्होंने भाजपा पर कठिन परिश्रम करने वाले पार्टी कार्यकर्ताओं को उचित श्रेय नहीं देने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि भाजपा के सदस्य के रूप में वह तब शर्मिंदा महसूस करती थीं जब भाजपा के सीएम चेहरे को लेकर सवाल उठाए जाते थे।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले सुजाता मंडल खान के TMC में जाने पर प्रतिक्रिया देते हुए सौमित्र खान ने तृणमूल कॉन्ग्रेस पर अपने परिवार को तोड़ने का आरोप लगाया। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पत्नी भाजपा सांसद की पत्नी के रूप में सम्मानित थीं।

भाजपा नेता सौमित्र खान ने बेहद भावुक स्वरों में रोते हुए कहा, “आप एक भाजपा सांसद की पत्नी के रूप में सम्मानित थीं। TMC परिवारों को तोड़ सकती है.. आप (सुजाता मंडल खान) ने मुझे वोट दिलवाए, और मेरी जीत का हिस्सा हैं। लेकिन मैं अब उन्हें अपने नाम और उपनाम से मुक्त करता हूँ।”

खान ने कहा कि जिन्होंने उनके घर को तोड़ा वो उन्हें माफ नहीं करेंगे। इसके साथ ही उन्होंने कहा, “मैं आपसे प्यार करता हूँ सुजाता। मेरी लड़ाई आपके खिलाफ नहीं बल्कि तृणमूल कॉन्ग्रेस से है। मैं एक व्यक्ति के लिए लाखों लोगों के सपने नहीं तोड़ सकता।”


भाजपा नेता ने भाजपा के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करते हुए कहा कि भारतीय जनता युवा मोर्चा (पश्चिम बंगाल) का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद उन्होंने अधिक माँग नहीं की। उन्होंने यह भी बताया कि सत्तारूढ़ दल ने चुनाव जीतने के बाद उनके खिलाफ 36 फर्जी मामले दर्ज किए, और उन्हें 30 लाख रूपए का कर्ज लेने के लिए मजबूर किया गया।

‘मैरी क्रिसमस’ कहना हराम, तुम जहन्नुम में जाओगे: मुस्लिम युवक को घृणा का पाठ पढ़ाते जाकिर नाइक का Video वायरल

भारतीय कानूनी एजेंसियों के डर से भागने वाला इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर नाइक अक्सर विवादित और मजहबी टिप्पणियाँ करता रहता है। फ़िलहाल उसका एक वीडियो सोशल मीडिया में चर्चा में बना हुआ है। यह वीडियो अप्रैल 2019 का है। इसमें वह अदेल अहमद नाम के युवक को ‘पाप’ करने पर चेता रहा है।

अहमद की गलती यह थी कि उसने अपने दोस्तों को ‘मैरी क्रिसमस’ (Merry Christmas) कहा था। अहमद जिस देश का (यूनाइटेड किंगडम) निवासी है, वहाँ की बहुसंख्यक आबादी ईसाई है और इस मौके पर बधाई देना पूरी दुनिया में बेहद आम है। लेकिन कट्टरपंथी नाइक के मुताबिक़ ऐसा करना इस्लाम के उसूलों से बग़ावत करने जैसा है। 

वीडियो में कट्टरपंथी जाकिर कहता है, “अपने उद्देश्य तक पहुँचने के लिए तुम गलत ज़रिया नहीं चुन सकते हो। जो उनके लिए हराम है वह तुम्हारे लिए भी हराम है। जब तुम किसी को मैरी क्रिसमस कहते हुए इसकी बधाई देते हो तो इसका मतलब है कि तुम स्वीकार कर रहे हो कि वो (जीसस) भगवान की संतान है और ऐसा करना शिर्क (पाप) है। ऐसा इसलिए क्योंकि वहाँ के लोग मानते हैं कि जीसस क्राइस्ट भगवान की संतान हैं। चाहे वह ईसाई धर्म से जुड़ी प्रक्रियाओं का हिस्सा हों या नहीं, वो लोग इसलिए ख़ुशी मनाते हैं क्योंकि यह जीसस का जन्मदिन है।” 

‘मैरी क्रिसमस’ की बधाई देना 100 फ़ीसदी गलत: जाकिर नाइक 

जाकिर का मानना है कि अल्लाह ने यह दुनिया बनाई है, इसलिए अल्लाह के अलावा किसी की भी इबादत करना (जीसस क्राइस्ट की भी) हराम है। इसके बाद इस्लामी कट्टरपंथी कहता है कि क्या ईसाई समुदाय के लोग पूरी बाइबिल में ऐसा हिस्सा दिखा सकते हैं, जहाँ जीसस ने खुद कहा हो कि वह ईश्वर की संतान है। क्रिसमस पर अपनी बात दोहराते हुए जाकिर नाइक कहता है, “क्या मैरी क्रिसमस कहना गलत है? मैं तुम्हें बता रहा हूँ ये सरासर गलत है! मेरे हिसाब से ये 100 फ़ीसदी गलत है।” 

जाकिर का दावा ‘तुम अपने लिए जहन्नुम में जगह बना रहे हो’ 

अपनी जहरीली बातों को आगे बढ़ाते हुए कट्टरपंथी जाकिर कहता है, “अगर तुम्हें नहीं पता कि क्रिसमस की बधाई देने का क्या मतलब है और तुम ऐसा कर रहे हो तो शायद अल्लाह माफ़ कर दे। अगर तुम पेप्सी को शराब समझ कर पी लेते हो तो शायद अल्लाह तुम्हें माफ़ कर दे। लेकिन अगर तुम क्रिसमस के बारे में जानते हुए भी संबंध बनाने की कोशिश में लगे हुए हो तब तुम जहन्नुम में अपने लिए जगह बना रहे हो। अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए गलत ज़रिया मत अपनाना, तुम्हें कुरान और सुन्नाह (पैगंबर मोहम्मद के जीवन पर आधारित साहित्य) के रास्ते पर चलना होगा।”   

जाकिर नाइक और उसके जहरीले बोल 

इसके पहले एक ‘मुसलमान भाई’ ने पूछा था कि क्या भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में एक मुस्लिम नौकरशाही का हिस्सा बन सकता है। इसके जवाब में जाकिर ने कहा, “यदि तुम दीन (मजहब) का पालन कर सकते हो तो स्वीकार्य है, अन्यथा नहीं।” इसके बाद समुदाय विशेष के एक अन्य शख्स ने पूछा कि क्या उनके लिए IAS बनना संभव है? इस्लामिक उपदेशक ने इसका जवाब देते हुए कहा, “यह असंभव नहीं है लेकिन मुश्किल है।” इस धारणा के तहत कि एक समुदाय विशेष का IAS अधिकारी निश्चित रूप से अपने सहकर्मियों से भयभीत होगा, नाइक ने कहा, “जब वे आप पर, इस्लाम पर या पैगंबर पर हमला करते हैं, तो क्या आप उन्हें वापस जवाब दे सकते हैं? क्या आपके पास जवाब देने की हिम्मत है? यदि आप डरपोक और शर्मीले हैं, तो ऐसी नौकरी न करें। यदि आप उन्हें जवाब दे सकते हैं और बोल्ड हैं, तो इसके साथ आगे बढ़ें।”

कट्टरपंथी इस्लामी उपदेशक जाकिर नाइक के लिए इस तरह के दावे करना कोई नई बात नहीं है। एक बार उसने कहा था कि “समुदाय विशेष का पक्ष लेने” और “दमनकारियों के बदसूरत चेहरे को दिखाने” के उनके नेक प्रयासों के बावजूद, NDTV के स्टार पत्रकार रवीश कुमार को ‘जन्नत’ में जगह नहीं मिलेगी। गैर-इस्लामी दिल के कितने भी अच्छे क्यों न हों, उन्हें जाना नरक में ही है।

90 के हिन्दू नरसंहार से एयर स्ट्राइक, प्रेम, कौम और राजनीति तक, ‘बाला सेक्टर’ में सब दर्ज हैं

भारत का उत्तरी क्षेत्र, जहाँ कभी कश्यप ऋषि के नाम पर बसा था, जो खुद सूर्य के बेटे की राजधानी बना। कश्मीर, जहाँ कभी शैव पंथ ने जन्म लिया था। ये वही कश्मीर है जहाँ कि धरती पर दुर्वाशा ऋषि के शिष्यों ने शिव के कण कण को पूजा था। ये वही धरती है जहाँ शिव ने अमरनाथ की गुफा में पार्वती जी को अमरकथा सुनाई। ये वही धरती है जहाँ आचार्य अभिनव गुप्त ने आदि गुरु से शास्त्रार्थ किया।

इस धरती पर धीरे-धीरे विदेशी आक्रांताओं की नजर पड़ी और रक्त से इसका अभिषेक होने लगा। 1947 में जब देश के दो टुकड़े धर्म के आधार पर कर दिए गए, तो भारत का ये मुकुट त्रिशंकु रह गया। राजा हरिसिंह न इधर के थे, न उधर के औऱ वही हुआ जिसका डर था, इस कश्मीर की धरती ने भयंकर रक्तपात का दौर देखा।

जब भारत का अभिन्न अंग टूट कर पाकिस्तान के कब्जे में चला गया तो उसे पाक ऑक्यूपाइड कश्मीर कहा जाने लगा। फिर भी वहाँ के जेहादियों औऱ कठपुतली सरकार, जो सेना के अधीन रही है, को बर्दाश्त न हुआ औऱ लगातार घाटी में रक्तपात करवाया जाने लगा। साल दर साल फौज औऱ आतंकियों ने कश्मीर को स्वर्ग से नरक बना डाला और फिर आई वो 1990 की भयंकर रात जब पहली बार कश्मीर से वहाँ के हिन्दुओ को धर्म के आधार पर मार कर, इज्जत लूट कर भगाया गया।

‘बाला सेक्टर’ (Bala Sector) उसी 1990 के भयानक रक्तपात से शुरू होती है। जेहादियों के दल ने अपने ही रक्षक को कैसे मौत के घाट उतारा, कैसे एक व्यक्ति को सिर्फ इसलिए धर्म बदलना पड़ा क्योंकि उसके दोस्त की बेटी को उसे बचाना था। ये सब आपको पहले ही खण्ड में मिल जाएगा। उस भयंकर त्रासदी को लिखते समय आशीष त्रिपाठी जी के भी हाथ अवश्य काँपे होंगे, क्योंकि पढ़ते समय दिल बैठा जा रहा था।

कहानी हमें कश्मीर से बाहर भारत के उन क्षेत्रों में भी ले जाती है, जहाँ आज भी लोग पोलियो की दवा अपने बच्चों को इसलिए नहीं पिलाते कि कहीं वो नामर्द न बनजाए। एक कौम को जबरदस्ती कुछ मतान्ध लोगों ने कठपुतली बना कर उनके हर बौद्धिक विकास को रोक दिया है। नौलखिया के चरित्र के रूप में आपको एक ऐसा व्यक्ति दिखेगा जिसके लिए आप एक बार नही बार बार रोएँगे।

आशीष त्रिपाठी जी की विशेषता यह है कि उनकी कहानी एकदम हवा हवाई नहीं होती, बल्कि आप उस कहानी को पढ़ते समय स्वयं इस बात की तस्दीक कर देंगे कि हाँ ये सब मैंने खुद होते देखा है।गाँव की परंपरा में आज भी किसी से झगड़े होने पर उससे इतनी दुश्मनी नहीं की जाती कि घर आने पर उसका अपमान हो, ये बात आशीष त्रिपाठी जी ने अपने पहले उपन्यास ‘पतरकी’ के समय भी साबित की थी।

किताब में ऐसे बीसों प्रसङ्ग हैं, जब आप हंस-हंस के दोहरे हो जाते हैं। एक दृश्य में जब महिपाल का भाई भूपाल अपनी प्रेमिका से चुम्बन की दरख़्वास्त करके पेड़ पर उल्टा लटक जाता है और कहता है कि ये स्पाइडर मैन का स्टाइल है, तो आप एकदम खिलखिला कर हँसते हैं। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के प्रधानमंत्री सरफराज आपको एक बार भी बिना हँसाए आगे नही बढ़ने देंगे।

जब बालाकोट में भारतीय वायुसेना बम गिराती है तो उसके बाद सरफराज खुद को आलू की बोरियों के पीछे छुपा लेते हैं। यहाँ तो पक्का आपके मुँह से खाया-पीया निकल जाता है। भारत मे पल रहे वामपंथी शिक्षाविदों पर भी आशीष त्रिपाठी जी की कलम बेबाकी से चली है और उस पर सबसे बड़ी बात कि कहीं से भी नसीर का चरित्र बनावटी नहीं लगता बल्कि हमारे देश के ऐसे अनगिनत प्रोफेसर हम लोगों ने देखे हैं जो बच्चों में जहर घोलकर उन्हें देश के खिलाफ खड़े करते हैं।

टीवी पत्रकार के रूप में विशाखा औऱ राकेश कुमार आपको उन न्यूज चैनलों के चरित्रों को याद दिलवा देंगे, जिन्होंने एयर स्ट्राइक के बाद भारत की सेना से सबूत माँग लिए थे। महिपाल, आकाश और रविभूषण कौल का चरित्र गढ़ते समय शायद लेखक के दिमाग में मनोज वाजपेयी औऱ आशुतोष राणा रहे होंगे, क्योंकि मुझे तो हर दृश्य में वही दिख रहे थे।

बचपन के संस्कार कैसे हमे राष्ट्रवादी बनाने में सहायक होते हैं, ये बाबा बालकनाथ की महिपाल के गुरु के रूप में तैनाती करके लेखक ने बढ़िया से समझा दिया है। प्रेम के नाम पर हो रहे षड्यंत्र से आज कौन वाकिफ नहीं, फिर भी लोग न चाहते हुए भी इस झूठे दलदल में फंस जाते हैं, जिसे आशीष त्रिपाठी जी ने इतना शानदार रचा है कि कहानी की तीन महिला पात्रों को सिवाय छल के कुछ नहीं मिलता।

प्रेम के नाम पर सच मे षड्यंत्र ज्यादा होते हैं, यह समझने के लिए आपको सिर्फ कहानी पढ़नी है। उपन्यास की मुख्य महिला पात्रों में से एक परवीन के रूप में आपको आपके उपन्यास की नायिका मिलती है, जबकि रेहाना के रूप में आपको ऐसी महिला मिलती है जो पड़ोसी मुल्क की महिलाओ के प्रति गंदगी की पीड़ा झेल रही है। सलमा का चरित्र पढ़ कर कभी हम उस पर गुस्सा करते हैं तो कभी उस पर दया आती है। पड़ोसी मुल्क की फ़ौज की नशे औऱ भ्रष्टाचार में लिप्त व्यवस्था पर बेहतरीन कटाक्ष किए गए हैं।

खुद की तरक्की के लिए बेगुनाहों का कत्ल करने वाली पाकिस्तान की फ़ौज की डर की दास्तान भी हमें ‘बाला सेक्टर’ में बखूबी देखने को मिलती है। मुझे कुछ दृश्य बेहद शानदार लगे जिनमें से एक था हरियाणा पुलिस के इंस्पेक्टर लोकेश और उसके सिपाही पंकज का ‘रॉ’ की टीम को रोक कर उनका चालान करना। इस दृश्य में ठेठ पूर्वांचल के गाँव के रहने वाले आशीष त्रिपाठी जी ने हरियाणवी का बेहतरीन इस्तेमाल किया है।

वैसे मैं कहूँगा की लेखक ने न केवल हरियाणवी, बल्कि उर्दू, भोजपुरी, हिन्दी व अंग्रेजी का भी बेहतरीन इस्तेमाल किया है। दूसरा दृश्य था, जब नसीर साहब भारत को बदनाम करने के इरादे से पाकिस्तान जाते हैं और पीओके के प्रधानमंत्री उन्हें रिसीव करने आते है। उस समय वे नसीर से कहते हैं कि आपको असली बमबारी वाली जगह देखनी है या वो देखनी है जो न्यूज चैनलों ने दिखाई?सही मायने में लेखक ने बाला कोट एयर स्ट्राइक पर सवाल उठाने वालों के मुँह पर करारा तमाचा मारा है।

तीसरा दृश्य है, जब महिपाल अपनी पत्नी से मिल रहा होता है पीओके निकलने से पहले। उस समय उसकी पत्नी सुनीता पूछती है,”फिर कब आएँगे?” इस समय महिपाल के होंठ खुल नही पाते, भारतीय फौज का ये सबसे माहिर जासूस अपनी पत्नी के सामने आखिर टूट जाता है। उस दृश्य में दोनों के गले लगकर रोने पर आपके चेहरे पर अश्रुपूरित मुस्कान तैर जाती है। सबसे अधिक घृणा का पात्र बनता है तैमूर, जो अपनी बहन की इज्जत लुटने के बाद भी अपनी जान बचाने के लिए बलात्कारी के साथ हो लेता है।

असल मे जेहादियों के साथ आतंकी बनने के बाद उनके परिवार पर होने वाले अत्याचारों को इससे बेहतर शायद कभी किसी ने नही लिखा था। आशीष त्रिपाठी जी किसी मत सम्प्रदाय या देश के प्रति एकतरफा राय नहीं बनाते, बल्कि आप लोग पढ़ते हुए साफ महसूस करेंगे कि हूबहू ये चीज होती आई है। कहानी की नायिका परवीन जब अपने भाषण में भारतीय गृह मंत्री के वो वाक्य कहती है, “जब हम कश्मीर की बात करते हैं तो उसमें पीओके और अक्साई चीन भी आता है, औऱ इसके लिए जान भी दे देंगे।” तब आपके रौंगटे देश प्रेम से खड़े हो जाते हैं।

लड़ाई वाले दृश्य में जब महिपाल एक शत्रु को चाकुओं से गोदता है तो आपको लगता है आप फ़िल्म देख रहे हैं। कुल मिलाकर आपको कहानी पढ़नी नहीं है, आपको सिर्फ ये फ़िल्म की तरह देखनी है क्योंकि मुझे तो बिल्कुल हर दृश्य सजीव लग रहा था।

जाते जाते एक मजेदार बात, पाकिस्तान की बेबसी के हालात का एक मज़ेदार किस्सा है, जहाँ पीओके के पीएम कहते हैं अपने ड्राइवर से, “लाले दी जान गाड़ी बाला सेक्टर की तरफ बढ़ा दे”, मगर ड्राइवर ये कहकर मना करता है कि, ‘इन्हें बारह बजे तक पीएम हाउस होना चाहिए।’ पीएम कहता है, “मगर अभी तो दस बजे हैं”, तो ड्राइवर कहता है, “सर डाँट पड़ेगी।” पीएम कहता है, “और अगर मैं तुझे अपने किचन से पूरे पाव किलो टमाटर दूँ तो?” ड्राइवर चौंक कर कहता है, “आपके पास टमाटर है?” “और क्या मिंया? आखिर पीएम हूँ।”

पूरे उपन्यास में हर दूसरे पेज पर आपको कोट करने लायक एक से एक वाक्य मिलेंगे, उन्हें आप खुद ही पढ़कर महसूस कीजिएगा। अंत में, ‘बाला सेक्टर’ न केवल साहित्यिक बल्कि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। उपन्यास में कहीं भी आपको कोई बात बोर नही करती, बल्कि 274 पेज का ये उपन्यास आप एक सिटिंग में पढ़ सकते हैं। उपन्यास के बदलते प्रसङ्ग आपको जोड़े रखते हैं।

भारतीय सेना, उनके जासूसों की शौर्य की कहानी के अतिरिक्त, कश्मीर के पाक अधिकृत हिस्से में हो रहे जुल्मों की बानगी भी है। प्रेम के नाम पर षड्यंत्र, प्रेम के नाम पर त्याग, प्रेम के नाम पर बेवकूफियाँ आपको कहानी से जोड़ लेती है। पेज क्वालिटी बेहद अच्छी है, उपन्यास का वजन इतना हल्का है कि आपको लगेगा नहीं कि ये 274 पेज में है।

किताब के पेजों में मार्जिन है, इसलिए आपको बिल्कुल उखाड़ कर पढ़ने की जरूरत नहीं है। आवरण पेज बिल्कुल क्लासिक है। लेखक की मंशा तभी स्पष्ट हो जाती है जब वो कहते हैं, “14 फरवरी 2019 को पुलवामा में शहीद हुए सीआरपीएफ के जवानों के साथ साथ, ज्ञात-अज्ञात उन सभी भारतीय वीरों को समर्पित, जिनके लिए भारत की एकता व अखंडता उनके प्राणों से बढ़कर है।”

लेखक ने अपनी बात मात्र डेढ़ पृष्ठ में खत्म करके इसे कोई कमी होने पर स्वयं का दोष व कोई अच्छी बात होने पर पाठकों का स्नेह कहकर अपना विशाल हृदय दिखाया है।

क्यों पढ़ें?

यदि आपको साहित्य से प्रेम है, यदि आपको भारत से प्रेम है, यदि आपको फौजियों की कहानियों से प्रेम है, यदि आपको गाँव से प्रेम है, यदि आप जानना चाहते हैं कि भारत का एक बौद्धिक वर्ग किस तरह भारत के खिलाफ षड्यंत्र रचता है। अंत में, उपन्यास के लेखक आशीष त्रिपाठी जी को बधाई देते हुए उन्हें नमन करता हूँ कि उन्होंने ऐसा शानदार उपन्यास रचा। पाठकों के लिए केवल इतना कहूँगा कि चूकने की आवश्यकता नहीं है, यह बेहतरीन उपन्यास है।

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यह पुस्तक समीक्षा लोकेश कौशिक द्वारा लिखी गई है, जो कि वर्तमान में चंडीगढ़ पुलिस में कार्यरत हैं