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कॉन्ग्रेसी राज में किसानों का नरसंहार: 24 मौतें, 150+ घायल… आँसू गैस के बाद दनादन चली थीं गोलियाँ

दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन के नाम पर मोदी सरकार को बदनाम करने का काम जितनी तेजी से कॉन्ग्रेस कर रही है, उसे देख यही लगता है कि उनके लिए यह आंदोलन अपनी पहचान जिंदा रखने के लिए एक अवसर जैसा है। 

आए दिन हर कॉन्ग्रेसी नेता इस प्रदर्शन की बाबत उलटी-सीधी बयानबाजी कर रहे हैं। राहुल गाँधी स्वयं मोदी सरकार को क्रूर बता रहे हैं। हालाँकि इस बीच हैरानी इस बात की है कि आज किसानों की हितैषी बन बैठी कॉन्ग्रेस उस किसानों के नरसंहार, उस मुलताई कांड को भूल गई, जिसे आनी वाली 12 जनवरी को 18 साल पूरे हो जाएँगे।

12 जनवरी 1998 वही दिन है, जिसे याद करके आज भी मध्य प्रदेश की जनता सिहर जाए। इसी दिन राज्य में 24 किसानों को मौत के घाट उतारा गया था। उनकी गलती सिर्फ इतनी थी कि वह गेरुआ रोग के कारण खराब हुई अपनी फसलों की शिकायत लेकर सरकार के पास पहुँचे थे और उनसे समाधान चाहते थे। उनके इस प्रदर्शन का नेतृत्व समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक डॉ. सुनीलम कर रहे थे। 

किसानों की खस्ता हालात देखते हुए उन्होंने ही 25 दिसंबर 1997 को मुलताई में धरना देना शुरू किया था। धीरे-धीरे उनके साथ कई किसान नेता जुड़ते गए। किसान संघर्ष समिति का गठन हुआ और एक माँग पत्र बनाया गया। इन सब कोशिशों का सिर्फ़ यही मकसद था कि किसानों की बात सुन ली जाए और जो उनकी फसलें बर्बाद हुई हैं, उसके बदले सरकार मदद प्रदान करे।

बैठकें हुईं। आपसी बातचीत हुई। किसान नेताओं ने माँग रखी। लेकिन प्रशासन बिलकुल चुप था। देखते ही देखते 9 जनवरी 1998 का दिन आया। सैंकड़ों की तादाद में किसान बैतूल पुलिस ग्राउंड में जुट गए।

किसान चाहते थे कि उन्हें 1 एकड़ के बदले 5000 रुपए हर्जाना दिया जाए। लेकिन प्रशासन प्रस्ताव लेकर आया 1 एकड़ के बदले 400 रुपए देने का। किसानों ने मना कर दिया और अपनी कुछ अतिरिक्त माँगे बताईं, जैसे आधी कीमत पर राशन देना, खाद-बीज-कीटनाशक का कर्ज माफ कर देना आदि।

2 दिन तक प्रशासन अपनी शर्तों पर किसानों को मनाने का प्रयास करता रहा, लेकिन 12 जनवरी को किसानों ने विरोध-प्रदर्शन के तौर पर तहसील पर ताला लगाने का फैसला कर लिया। इस बीच कहते हैं कि कॉन्ग्रेस ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी कि किसानों पर पुलिस के हमले शुरू हो चुके थे। कई जगह आगजनी हुई थी, उनका इल्जाम भी प्रदर्शनकारियों पर मढ़ा गया था। उन्हें पकड़ कर जेल में बंद किया जाने लगा था। उन पर अराजकता फैलाने के इल्जाम लगने लगे थे। जिसे देख समझ कर किसानों में गुस्सा बढ़ता जा रहा था।

12 जनवरी को इसी गुस्से को जाहिर करने के लिए तहसील कार्यालय को घेरा गया और कथित तौर पर पथराव शुरू हुआ। बस, पुलिस जैसे मौके के तलाश में थी। उन्होंने पहले किसानों पर आँसू गैस छोड़े, लाठीचार्ज की और फिर बिना किसी पूर्व चेतावनी के फायरिंग शुरू हो गई।

अपनी खराब फसल के बदले मुआवजा माँगने वाले किसान घायल जमीन पर थे। 17 ने तो मौके पर दम तोड़ दिया था, लेकिन बाद में आँकड़े 24 बताए जाने लगे। धीरे-धीरे पता चला कि इस हमले में 150 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। कुछ बच्चे जो उसी रास्ते से गुजर रहे थे, वह भी पुलिसिया बर्बरता का शिकार हुए।

सबसे हैरानी की बात यह है कि 12 जनवरी 1998 को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह थे। वही दिग्विजय सिंह, जो आज ट्विटर पर आए दिन किसानों के नाम पर मोदी सरकार पर निशाना साध रहे हैं। किसानों के हमदर्द बने हैं। यही दिग्विजय, उस दौरान मुलताई कांड के समय चुनाव प्रचार कर रहे थे। मगर, प्रशासन के ख़िलाफ़ इनसे कुछ नहीं कहा जा रहा था।

दिग्विजय सिंह का मध्यप्रदेश में कार्यकाल

ध्यान रहे कि इस पूरे संहार से पहले और बाद में दिग्विजय सिंह के हाथ ही मध्य प्रदेश की डोर थी। 1998 में हुई 11वीं विधानसभा चुनाव में वह फिर 1 दिसंबर को 1998 को मुख्यमंत्री चुने गए थे और 7 दिसंबर 2003 तक कार्यभार संभाले रखा था। मगर, प्रशासन के ख़िलाफ़ उनसे कुछ नहीं कहा गया।

बाद में बलराम जाखड़ को कॉन्ग्रेस हाईकमान के बनाए जाँच दल में मुलताई भेजा गया। लौट कर उन्होंने बताया कि गलती प्रशासन की थी। तब जाकर दिग्विजय सरकार ने जिलाधिकारी रजनीश वैश्य और एसपी जीपी सिंह पर एक्शन लिया। कहने को पूरे मामले में प्रशासनिक जाँच के आदेश भी दिए गए लेकिन किसानों की स्थिति दिग्विजय राज में दयनीय बनी रही।

अंत में सारे किए धरे का ठीकरा सपा के सुनीलम पर फोड़ा गया। उन पर बाकायदा केस चले और आरोप मढ़ा गया कि उन्होंने किसानों को उकसाया। साल 2012 में सुनीलम को 7 साल की सजा हुई। जिस पर सुनीलम ने दिग्गी सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा:

`दिग्विजय सिंह ने मेरी हत्या के इरादे से ही 12 जनवरी 1998 को गोली चलवाई थी और मेरे खिलाफ 66 मुकदमे दर्ज कराने का मकसद सालों साल अदालत के चक्कर कटवाना तथा सजा दिलवाना ही था। आज मैं कह सकता हूँ कि वे तात्कालिक तौर पर ही सही, अपना षड्यंत्र पूरा करने में सफल हुए हैं।`

मध्य प्रदेश में किसानों की स्थिति आज भी बहुत बेहतर नहीं कही जा सकती लेकिन कॉन्ग्रेस शासन के अंत के बाद 2005 में शिवराज सरकार में वहाँ की स्थिति में सुधार देखने को मिलता है।

बराक ओबामा ने अपनी किताब में राहुल गाँधी को अनगढ़ छात्र बता कर बिलकुल सही विशेषण का प्रयोग किया। वो जनता को इंप्रेस करने के चक्कर में मोदी सरकार पर कीचड़ उछाल रहे हैं, लेकिन उनकी खुद की पार्टी मुलताई में हुए किसानों के संहार की जिम्मेदार मानी जाती है, वह आज तक उस पर बात नहीं करते।

CAG रिपोर्ट्स कहती हैं कि कॉन्ग्रेस सरकार 52000 करोड़ रुपए तक की गड़बड़ी कर चुकी है, जिसे किसानों की कर्जमाफी और उनके कल्याण के लिए सैंक्शन किया गया था। बावजूद इन सभी तथ्यों के कॉन्ग्रेस का कोई नेता इन पर मलाल नहीं खाता और मोदी सरकार से खुल कर शर्म करने को कहता है। कॉन्ग्रेस से यह सवाल तो बनता है कि मोदी सरकार किस बात की शर्म करे कि उनके सामने एक ऐसा विपक्ष है, जिसका मकसद जनसरोकार नहीं राजनीति बचाने के लिए अवसर खोजना है।

जहाँगीर ने काट डाले थे जिसके 2 बेटों के सिर… उस रहीम के मकबरे का 3000 मिस्त्री और 1.75 लाख घंटों में हुआ मरम्मत

आगरा के ताजमहल के बारे में तो सभी को पता है, जिसे मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने बनवाया था। लेकिन, उससे 5 दशक पहले ही अकबर के सेनापति और कवि अब्दुर रहीम खान-ए-खाना ने दिल्ली में अपनी बीवी माह बनु की याद में एक मकबरे का निर्माण करवाया था।

ये पहला ऐसा मुग़ल मकबरा था, जिसे किसी महिला की याद में बनवाया गया हो। जब रहीम की 1627 में मौत हो गई तो उसे भी यहीं उसकी बीवी के बगल में इसी मकबरे में दफनाया गया, जिसकी अब मरम्मत हुई है। ठीक उसी तरह, जैसे ताजमहल में मुमताज की कब्र के बगल में शाहजहाँ की कब्र है।

पिछले 6 वर्षों से रहीम के मकबरे में मरम्मत का कामकाज चल रहा था, जिसके बाद उसे इस सप्ताह खोल दिया गया है। भारत में राष्ट्रीय महत्व के किसी मकबरे को संरक्षित करने के लिए शायद ये सबसे लंबा मरम्मत कार्य चला होगा। रहीम के इस मकबरे के बारे में कहा जाता है कि ताजमहल की संरचना भी इससे ही प्रभावित थी, लेकिन जनता इससे दूर ही रही।

2014 में इंटरग्लोब फाउंडेशन ने आगा खान ट्रस्ट फॉर कल्चर (AKTC) के साथ मिल कर ‘रहीम के मकबरे के संरक्षण’ को अपना समर्थन दिया। ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) के साथ विमर्श के बाद इसके संरक्षण की रूपरेखा तैयार की गई। AKTC के CEO रतीश नंदा का कहना है कि उस समय ये मकबरा तुरंत ध्वस्त होने की स्थिति में था। इसके गुम्बद से लेकर अंदर और बाहर की संरचनाओं की मरम्मत की गई।

रहीम से जुड़े साहित्यों और रिसर्च के हिसाब से इसे तैयार करने के क्रम में इसके आसपास के इलाके को भी उसी हिसाब से तैयार किया गया। रहीम की युद्धकला, उनकी भक्ति और उनके लिखे साहित्यों के अध्ययन और उस पर रिसर्च के लिए एक टीम तैयार की गई। लगभग 3000 मिस्त्री, मजदूरों और डिजाइनरों ने 1.75 लाख घंटे इसकी मरम्मत पर खर्च किए, तब जाकर अब ये जनता के लिए खुल पाया है।

AKTC चाहता था कि इसके पूरे गुम्बद को संगमरमर का बनाया जाए, ताकि मुगलकालीन शोभा को आज के जमाने में देखी जा सके, लेकिन ASI ने आंशिक रूप से ही मार्बल के इस्तेमाल को मंजूरी दी। रहीम ने एक वाटर सप्लाई सिस्टम भी तैयार किया था। हिंदुत्व को लेकर उनकी समझ भी अच्छी थी। ऐसे में उनके इंजीनियर होने और हिन्दू धर्म के प्रति उनकी श्रद्धा को भी ध्यान में रखा गया है, ऐसा मरम्मत का कामकाज देखने वालों का कहना है।

रहीम, मुग़ल बादशाह अकबर के संरक्षक बैरम खान के बेटे थे। बैरम खान की मौत के बाद उसकी दूसरी पत्नी से अकबर ने शादी कर ली। इस हिसाब से रहीम अकबर के सौतेले बेटे भी हुए। अकबर के नवरत्नों में उनका भी नाम था। रहीम के दो बेटों को जहाँगीर ने मार डाला था, क्योंकि वो उसकी ताजपोशी के पक्ष में नहीं थे। कई दोहे लिखने वाले रहीम ने बाबरनामा का फारसी में अनुवाद किया। संस्कृत पर उनकी अच्छी पकड़ थी।

कहा जाता है कि राणा प्रताप के बेटे अमर सिंह ने रहीम को उसके परिवार के महिलाओं सहित धर लिया था। जब उन्हें मेवाड़ के दरबार में पेश किया गया तो प्रताप ने आदेश दिया कि इस कवि को तुरंत परिवार सहित रिहा किया जाए और उचित सम्मान दिया जाए। इसके बाद रहीम ने भी राणा प्रताप की प्रशंसा की। वही रहीम जब बूढ़े हुए तो जहाँगीर ने अपने आदमियों से उसके पास ‘खरबूजा’ भेजा। 70 साल के बाप ने रूमाल हटाया तो वहाँ खरबूजा नहीं, उसके बेटे का सिर था।

‘शौचालय की कमी की वजह से मुस्लिम बेटियों को छोड़नी पड़ती थी पढ़ाई, अब बदले हालात’: AMU में PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (दिसंबर 22, 2020) को सुबह 11 बजे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के शताब्दी समारोह को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सम्बोधित किया। 1964 में लाल बहादुर शास्त्री के बाद वो पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने AMU को सम्बोधित किया हो। आयोजन के दौरान उन्होंने डाक टिकट भी जारी किया। यूनिवर्सिटी में धर्मशास्त्र संकाय के प्रोफेसर रेहान अख्तर काजमी सहित कई प्रोफेसरों ने पीएम मोदी के सम्बोधन का स्वागत किया।

इस दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि अभी कोरोना के इस संकट के दौरान भी AMU ने जिस तरह समाज की मदद की, वो अभूतपूर्व है। उन्होंने कहा कि हजारों लोगों का मुफ्त टेस्ट करवाना, आइसोलेशन वार्ड बनाना, प्लाज्मा बैंक बनाना और पीएम केयर फंड में बड़ी राशि का योगदान देना, समाज के प्रति आपके दायित्वों को पूरा करने की गंभीरता को दिखाता है। बकौल पीएम मोदी, 100 वर्षों में AMU ने दुनिया के कई देशों से भारत के संबंधों को सशक्त करने का भी काम किया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि उर्दू, अरबी और फारसी भाषा पर यहाँ जो रिसर्च होती है, इस्लामिक साहित्य पर जो रिसर्च होती है, वो समूचे इस्लामिक वर्ल्ड के साथ भारत के सांस्कृतिक रिश्तों को नई ऊर्जा देती है। पीएम ने अपनी सरकार की सफलताओं की चर्चा करते हुए कहा कि आज देश जो योजनाएँ बना रहा है, वो बिना किसी मत-मजहब के भेद के हर वर्ग तक पहुँच रही हैं। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे बिना किसी भेदभाव, 40 करोड़ से ज्यादा गरीबों के बैंक खाते खुले।

प्रधानमंत्री ने आँकड़े गिनाते हुए कहा कि बिना किसी भेदभाव, 2 करोड़ से ज्यादा गरीबों को पक्के घर दिए गए, बिना किसी भेदभाव 8 करोड़ से ज्यादा महिलाओं को गैस मिला, बिना किसी भेदभाव आयुष्मान योजना के तहत 50 करोड़ लोगों को 5 लाख रुपए तक का मुफ्त इलाज संभव हुआ। उन्होंने कहा कि जो देश का है, वो हर देशवासी का है और इसका लाभ हर देशवासी को मिलना ही चाहिए, हमारी सरकार इसी भावना के साथ काम कर रही है।

पीएम मोदी ने AMU को मिनी इंडिया और ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ की तस्वीर बताते हुए कहा कि यहाँ उर्दू-हिन्दी-अरबी-संस्कृत पढ़ाई जाती है और साथ ही यहाँ की लाइब्रेरी में कुरान है तो गीता-रामायण के अनुवाद भी हैं। उन्होंने कहा कि AMU की दीवारों में भारत का इतिहास है और देश का नाम रौशन कर रहे यहाँ के छात्रों से जब वो विदेश में मिलते हैं, तो वो हँसी-मजाक व शेर-ओ-शायरी के अंदाज़ में बातें करते हैं। AMU शताब्दी समारोह में पीएम मोदी ने कहा:

“सरकार उच्च शिक्षा में दाखिलों की संख्या बढ़ाने और सीटें बढ़ाने के लिए भी लगातार काम कर रही है। वर्ष 2014 में हमारे देश में 16 IITs थीं। आज 23 IITs हैं। वर्ष 2014 में हमारे देश में 9 IIITs थीं। आज 25 IIITs हैं। वर्ष 2014 में हमारे यहाँ 13 IIMs थे। आज 20 IIMs हैं। मेडिकल शिक्षा को लेकर भी बहुत काम किया गया है। 6 साल पहले तक देश में सिर्फ 7 AIIMS थे। आज देश में 22 AIIMS हैं। शिक्षा चाहे ऑनलाइन हो या फिर ऑफलाइन, सभी तक पहुँचे, बराबरी से पहुँचे, सभी का जीवन बदले, हम इसी लक्ष्य के साथ काम कर रहे हैं। आज देश की नीति-नीयत में ‘सबका साथ, सबका विकास’ की भावना है, जिसमें देश उस पथ पर आगे बढ़ रहा है, जहाँ कोई मजहब पीछे न छूटे। सभी को समान अवसर मिले।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि पहले मुस्लिम बेटियों का स्कूल ड्रॉपआउट रेट 70% से ज्यादा हुआ करता था, लेकिन अब ये अब घट कर 30% के आसपास रह गया है। उन्होंने कहा कि पहले लाखों मुस्लिम बेटियाँ शौचायल की कमी की वजह से पढ़ाई बीच में ही छोड़ देती थीं, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। उन्होंने कहा कि अब जब पूरे विश्व की नजर भारत पर है, हमें समय गँवाए बिना ‘आत्मनिर्भर भारत’ का निर्माण करना है।

साथ ही उन्होंने छात्रों को सलाह दी कि वो स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने के मौके ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में रिसर्च करें, जिनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है। उन्होंने शताब्दी समारोह के माध्यम से छात्रों से कहा कि वो इनमें 75 आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी, 25 महिला स्वतंत्रता सेनानी के बारे में जानकारी इकट्ठा करें। उन्होंने पुरानी पांडुलिपी को डिजिटल क्षेत्र के जरिए दुनिया के सामने लाने का प्रयास करने को कहा।

पीएम ने कहा कि एक सशक्त महिला का हर फैसले में उतना ही योगदान होता है, जितना किसी और का। फिर चाहे बात परिवार को दिशा देने की हो या देश को। उन्होंने कहा, “मैं देश की अन्य शिक्षा संस्थानों से भी कहूँगा कि ज्यादा से ज्यादा बेटियों को शिक्षा से जोड़ें।” उन्होंने बताया कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में 21वीं सदी में भारत के छात्र-छात्राओं की जरूरतों को सबसे ज्यादा ध्यान में रखा गया है। उन्होंने भरोसा जताया कि हमारे देश के युवा ‘नेशन फर्स्ट’ के आह्वान के साथ देश को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।

प्रधानमंत्री ने कहा कि समाज में वैचारिक मतभेद होते हैं, लेकिन जब बात राष्ट्रीय लक्ष्यों की प्राप्ति की हो, तो हर मतभेद किनारे रख देने चाहिए। जब सभी युवा साथी इस सोच के साथ आगे बढ़ेंगे तो ऐसी कोई मंजिल नहीं, जो हम हासिल न कर सकें। उन्होंने याद दिलाया कि पिछली शताब्दी में इन्हीं मतभेदों के कारण न जाने कितना ही समय जाया हो गया। उन्होंने समझाया कि सियासत सोसाइटी का अहम हिस्सा है, लेकिन सोसाइटी में सियासत के अलावा भी दूसरे मसले हैं। सियासत और सत्ता की सोच से बहुत बड़ा, बहुत व्यापक किसी देश का समाज होता है।

बता दें कि AMU द्वारा पीएम मोदी को भेजे गए आमंत्रण से कुछ कट्टरपंथी, वामपंथी और लिबरल समाज के लोग बेहद आहत थे। कॉन्ग्रेस समर्थक साकेत गोखले ने इस पर अपनी निराशा व्यक्त करते हुए लिखा, “CAA विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा AMU छात्रों पर क्रूर हमले को एक साल हो गया है। और अब मोदी को एएमयू शताब्दी समारोह में अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। कितना रीढ़हीन प्रशासन है।” कई अन्य कट्टरपंथियों ने भी सोशल मीडिया में कड़वी प्रतिक्रिया दी थी।

पादरी और नन दोनों हत्यारे करार, सिस्टर अभया को मिला इंसाफ: 4 बजे भोर में देख लिया था आपत्तिजनक अवस्था में

28 साल के इंतजार के बाद आज (दिसंबर 22, 2020) तिरुवनंतपुरम की सीबीआई कोर्ट ने सिस्टर अभया की संदिग्ध मौत के मामले में अपना फैसला आखिरकार सुना ही दिया। कोर्ट ने इस केस में फादर थॉमस कोट्टूर (Father Thomas Kottoor) और सिस्टर सेफी (Sister Sephy) पर अभया सिस्टर को मारने के लिए आरोप तय कर दिए। अब इनकी सजा गुरुवार (दिसंबर 24, 2020) को तय की जाएगी।

बता दें कि साल 2019 में मुख्य गवाह के मुकरने के बाद भी फादर थॉमस और सिस्टर सेफी को दोषी बनाया गया है। अभियोजन पक्ष के लिए मुख्य गवाह से डील करना सबसे बड़ी चुनौती में से एक था। वहीं दूसरी ओर चर्च भी इन दोनों धार्मिक हस्तियों पर लगे आरोपों की गंभीरता समझने के बाद भी इन्हें निर्दोष बता रही थी।

क्या है सिस्टर अभया का पूरा मामला?

27 मार्च 1992 को सेंट पायस कॉन्वेंट (Pious X Convent) के कुएँ में सिस्टर अभया मृत मिली थी। इसी पायस कॉन्वेंट में पढ़ने वाली बिना थॉमस को सिस्टर अभया नाम दिया गया था। शुरुआत में मामले की जाँच स्थानीय पुलिस और राज्य अपराध शाखा ने की थी, जिसमें पहले पूरे मामले को आत्महत्या कहकर फाइल को बंद कर दिया गया। लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ता जोमोन पुथेनपुराकल के संघर्ष और कानूनी लड़ाई के बाद 29 मार्च, 1993 को इस मामले को सीबीआई को सौंप दिया गया।

CBI ने वर्ष 2008 में कोट्टूर, पूथरुकायिल और सेफी को हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया था। इस हत्या को आत्महत्या साबित करने के अगले दो दशकों तक इस केस में कोई नई जानकारी नहीं आई। इसके बाद सीधे 27 साल बाद यानी साल 2019 में इस मामले की फिर से सुनवाई शुरू हुई और एक-एक कर गवाह मुकरने लगे। 

सिस्टर अभया हत्या मामले में अहम फैसले से एक दिन पहले ही इस केस के मुख्य गवाह राजू उर्फ ​​अदकाका राजू ने एक समाचार चैनल को बताया कि उसे पुलिस अधिकारियों द्वारा इस अपराध के लिए कई दिनों तक प्रताड़ित किया।

दरअसल, सिस्टर की हत्या के दिन राजू, जो कि एक छोटा-मोटा चोर था, वह बिजली का सामान चुराने कॉन्वेंट में घुसा था और हादसे के दौरान कॉन्वेंट परिसर में मौजूद था। बाद में, राजू ने कथित तौर पर सीबीआई अधिकारियों को बताया कि उसने रहस्यमय परिस्थितियों में कॉन्वेंट में दो पादरी (प्रीस्ट) और एक नन को देखा। उसने बताया, “मुझे बहुत पीड़ा हुई। मुझे अपराध कबूलने के लिए कहा गया, लेकिन मैंने इनकार कर दिया। मैं चाहता हूँ कि सच्चाई सामने आए।”

सीबीआई ने इस मामले में कैथोलिक पादरी थॉमस कोट्टूर और सिस्टर सेफी पर चार्जशीट दायर की। इन लोगों पर हत्या, सबूत नष्ट करने, आपराधिक साजिश और अन्य आरोप लगाए गए। एक अन्य आरोपित फादर जोस पूथरुकायिल को पिछले साल अदालत ने सबूत न मिलने के कारण छोड़ दिया था।

इस मामले में वर्ष 2007 में CBI ने तीनों आरोपितों का NARCO टेस्ट भी किया और कहा गया कि इसकी रिपोर्ट के साथ भी छेड़छाड़ की गई। इसके बाद, आखिरकार वर्ष 2008 में आरोप-पत्र दायर किया गया और नवंबर, 2008 में तीनों आरोपितों को गिरफ्तार किया गया। हालाँकि, एक ही माह बाद उन्हें जमानत भी मिल गई।

आरोप पत्र में क्या है?

सीबीआई के आरोप-पत्र के अनुसार, घटना के दिन सिस्टर अभया एग्ज़ाम के लिए सुबह के चार बजे उठी और पानी लेने किचन में गईं। अभया ने दो पादरियों और एक नन- थॉमस कुट्टूर, जोस पूथरुकायिल, और सिस्टर सेफी को ‘आपत्तिजनक स्थिति’ में पाया। सिस्टर अभया ये बात किसी को बता न दें, इस डर से तीनों ने मिलकर उस पर हमला किया और सिस्टर अभया बेहोश हो गई। इसके बाद तीनों ने मिलकर उसे कुऍं में डाल दिया।

घटना के समय फादर थॉमस ने कथित तौर पर रसोई में उसका गला घोंट दिया, जबकि तीसरे आरोपित ने उस पर कुल्हाड़ी से वार किया। इसके बाद फादर जोस सहित तीनों लोगों ने फिर उसे एक कुएँ में फेंक दिया, जबकि वह तब भी जिन्दा थी। सिस्टर अभया की डूबने से मौत हो गई। हमले के समय एक पानी की बोतल किचन में गिर गई थी, उनके बाहर निकलते समय दरवाजे के नीचे एक कपड़ा मिला था और रसोई में विभिन्न स्थानों पर पाए गए अभया के चप्पल सभी सबूत का हिस्सा बने।

हत्यारा शहाबुद्दीन 3 दिन पहले मिला अपने बीवी-बच्चों से, 6 दिन पहले चंदा बाबू को नहीं नसीब हुआ बेटों का कंधा

सीवान का सांसद रहा मोहम्मद शहाबुद्दीन फ़िलहाल दिल्ली के तिहाड़ जेल में बंद है। दिल्ली हाईकोर्ट ने निर्देश पर उसे 18 घंटों के लिए अपने परिजनों से मुलाकात के लिए समय दिया गया। कड़ी सुरक्षा में उसे परिजनों से मुलाकात कराया गया। उच्च-न्यायालय ने सशर्त पैरोल के तहत उसे सुविधा दी थी कि वो 6-6 घंटे के लिए दिल्ली में कहीं भी मुलाकात कर सकता है। ये सब चंदेश्वर प्रसाद उर्फ़ चंदा बाबू की मृत्यु के बाद हो रहा है, जिनके 3 बेटों को शहाबुद्दीन ने मार डाला था।

चंदा बाबू ज़िंदगी भर अपने बेटों की हत्या के मामले में न्याय के लिए केस लड़ते रहे। न्यायपालिका, विधायिका या कार्यपालिका – कहीं से उन्हें कुछ नहीं मिला। बिहार में जंगलराज के दौरान जब शासन-प्रशासन के सभी अंग राजद सुप्रीमो के इशारे पर नाचा करते थे और शहाबुद्दीन उनका ही दुलारा हुआ करता था, ऐसे में भला कोई न्याय की उम्मीद करे भी तो कैसे। ये वो जमाना था, जब शहाबुद्दीन के खिलाफ चुनाव लड़ना भी मौत को दावत देने के समान था।

पूर्व सांसद शहाबुद्दीन के 90 वर्षीय अब्बा शेख मोहम्मद हसीबुल्लाह का सितम्बर 19 को निधन हो गया था। अपने अब्बा को सुपुर्द-ए-ख़ाक करने की रस्म में शामिल होने के लिए उसने हाईकोर्ट से अनुमति माँगी थी। निधन के दूसरे और तीसरे दिन अवकाश था, ऊपर से कोरोना काल के कारण इस पर सुनवाई नहीं हो सकी। शहाबुद्दीन सीवान नहीं जा सका, जिसके बाद उसने अपने अब्बा के ‘चालीसवें’ में वहाँ जाने की अनुमति माँगी।

जब उच्च-न्यायालय ने उसे सीवान भेजने के सम्बन्ध में दिल्ली और बिहार की सरकारों से रिपोर्ट माँगी तो दोनों ने ही हाथ खड़े कर दिए। ये बताता है कि बिहार तो दूर, दिल्ली का शासन-प्रशासन आज 90 के दशक के ख़त्म हुए 20 वर्ष बीत जाने के बावजूद शहाबुद्दीन के क्रियाकलापों पर लगाम कसने में खुद को नाकाम पाता है, खासकर जब वो जेल से बाहर हो। उसे तिहाड़ भी इसीलिए शिफ्ट किया गया था, क्योंकि बिहार के जेल से वो बेधड़क अपना साम्राज्य चला रहा था।

दोनों राज्यों ने यहाँ तक कह दिया कि अगर एक बटालियन जवान पूरे के पूरे लगा दिए जाएँ, फिर भी शहाबुद्दीन के बाहर आने के बाद क़ानून-व्यवस्था को संभालना मुश्किल है। शहाबुद्दीन के लोग अभी भी हर जगह हो सकते हैं, ये संभावना भी जताई जा रही है। वो एक बार बाहर निकलने पर किस-किस से किस कार्य के लिए संपर्क करेगा, किसी को नहीं पता। लेकिन, फिर भी वो परिजनों से मिलने के बहाने बाहर आने में कामयाब रहा।

कोर्ट ने दिल्ली सरकार को आदेश दिया था कि वो तय दिशा-निर्देशों के हिसाब से शहाबुद्दीन को उसके परिजनों से मिलवाए। इसी प्रक्रिया के तहत उसे बाहर लाया गया। सोमवार, बुधवार और शनिवार को उसने अपने परिजनों से मुलाकात की, दिल्ली में अपने ही एक करीबी के फ्लैट पर। कहा जा रहा है कि तीन साल दो महीने के बाद उसने अपनी बीवी हेना शहाब, बेटा मोहम्मद ओसामा, अम्मी और दोनों बेटियों से मुलाकात की।

उसकी बीवी हेना शहाब भी RJD की ही नेता है और 2 बार चुनाव लड़ कर हार भी चुकी है। इस दौरान शहाबुद्दीन जेल में ही था। मीडिया के सूत्र कह रहे हैं कि उसकी एक बेटी डॉक्टर है और एक डॉक्टर बनने वाली है। एक बेटी का तो निकाह भी एक डॉक्टर से ही लगभग तय हो गया है। शहाबुद्दीन को कोर्ट ने छूट दी थी कि वो दिल्ली में कहीं भी अपने परिजनों से मुलाकात कर सकता है, अपनी चुनी हुई जगह पर।

शहाबुद्दीन मामूली अपराधी नहीं है। पाकिस्तान और ISI तक से उसके सम्बन्ध सामने आ चुके हैं, ऐसे में वो देश के लिए भी खतरा है। लोगों की नजर में वो किसी आतंकी से कम नहीं। ऐसे में उसे जेल में ही अपने परिजनों से मुलाकात करने को कहा जा सकता था। बिहार और दिल्ली की सरकारों को कम से कम हाईकोर्ट से अनुरोध करना चाहिए था कि जेल में ही परिजनों को ले जाकर उससे मुलाकात करवाई जाए।

एक तरफ एक व्यक्ति 16 वर्षों से अपने बेटे की हत्या के लिए न्याय माँगते हुए दर-दर भटकता रहा, दूसरी तरफ उसकी मौत के बाद ही हत्यारा गैंगस्टर अपने परिजनों से मजे में मिल रहा है। एक तरफ चंदा बाबू ने रोते हुए ज़िंदगी बिताई, शहाबुद्दीन के खौफ के कारण कोई उनके साथ दिखना तक नहीं चाहता था, वहीं दूसरी तरफ शहाबुद्दीन जब-जब पूर्व काल में जेल से बाहर आया, उसका भव्य स्वागत किया गया।

16 अगस्त 2004 को चंदा बाबू के दो बेटे तेजाब से नहला दिए गए थे। 16 जून 2014 को बड़े बेटे की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। अब 16 दिसंबर 2020 को चंदा बाबू खुद दुनिया से विदा हो गए। चंदा बाबू ने उस वक्त शहाबुद्दीन के खिलाफ खड़ा होने का फैसला, किया जिस वक्त उसकी तूती बोलती थी। उसके डर से कोई भी खड़ा होने की हिम्मत नहीं कर पाता था। उस वक्त वे न केवल खड़े हुए, बल्कि अपना सब कुछ गवाँ भी दिया।

कासिम बना कर्मवीर, इस्लाम त्याग अपनाया हिंदू धर्म: अलीगढ़ में मिल रही कट्टरपंथियों से धमकी

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन कर कासिम का परिवार रविवार (दिसंबर 20, 2020) को हिंदू बन गया। घटना देहलीगेट क्षेत्र के झलकारी बाई नगर की है। कासिम ने इस धर्मांतरण को घर वापसी बताया है। 

आर्य समाज मंदिर में रविवार को शुद्धिकरण करवाने के बाद कासिम ने अपना नाम कर्मवीर रख लिया। उन्होंने अपने बेटे अयाज का नाम भी हिंदू धर्म के अनुसार बदल कर आशुतोष कर लिया। वह कहते हैं कि उनके पूर्वज हिंदू ही थे और उन्होंने अपने धर्म में घर वापसी की है, मगर अब उन्हें कट्टरपंथियों का डर लग रहा है। 

बता दें कि कासिम ने 8 साल पहले साल 2012 में अनीता कुमारी नाम की हिंदू महिला से प्रेम विवाह किया था। इसके बाद दोनों अपने घर से अलग हो गए। आज उनकी एक 7 साल की बेटी और साढ़े 4 साल का बेटा है। दोनों की परवरिश हिंदू धर्म के अनुसार हुई है। अनीता घर में हिदू रीति-रिवाजों के हिसाब से पूजा-पाठ करती थीं। इसी के बाद कासिम की इच्छा हिंदू धर्म की ओर जागृत हुई।

परिवार के साथ कासिम (साभार: zee news)

वह कहते हैं कि कोई धर्म गलत नहीं है। लेकिन शादी के बाद जब उन्हें हिंदू रीति-रिवाजों की जानकारी हुई, तो उन्हें बहुत अच्छा लगा। उनके मन में बात उठी कि उनके पूर्वज हिंदू थे। इसके बाद उन्होंने इस्लाम त्याग कर हिंदू धर्म अपनाने का निर्णय लिया। वह इस इच्छा को अपनी अंतरात्मा की आवाज बताते हैं।

कासिम के अनुसार, उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता नीरज भारद्वाज एवं अन्य लोगों से संपर्क करके हिंदू बनने की इच्छा जताई, जिसके बाद वह उन्हें उनकी पत्नी और बच्चों के साथ अधिकारियों के पास ले गए, लेकिन उनको किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। फिर उन्होंने आर्य समाज मंदिर जाने की सलाह दी गई।

घर वापसी कर हिंदू बने युवक का कहना है कि उन्होंने अनीता से निकाह नहीं, शादी की थी। उस समय भी उन्होंने फेरे लिए थे। मगर कुछ समय बाद जब उन्हें एहसास हुआ तो उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता नीरज भारद्वाज के जरिए सासनीगेट स्थित आर्य समाज मंदिर में शपथ पत्र देकर निवेदन किया। फिर रविवार को पंडितों की उपस्थिति में हवन-पूजन एवं मंत्रोच्चारण के बीच उन्होंने पूरे परिवार के साथ हिंदू धर्म अपना लिया।

बता दें कि इस धर्म परिवर्तन के बाद जहाँ कासिम से करमवीर बने युवक को अपने परिवार की चिंता सता रही है। वहीं इसमें सहयोग करने वाले नीरज भारद्वाज को भी कट्टरपंथियों की धमकी मिली है। दोनों लोग अपने परिवार की सुरक्षा के लिए प्रशासन से मदद की गुहार लगा रहे हैं। इसके अलावा कासिम ने और भी मुसलमानों से आग्रह किया है कि वह भी ‘घर वापसी’ करें।

AK-47 रखने वाला पूर्व कॉन्ग्रेसी MLA, जिसके समर्थन से केजरीवाल बने पहली बार CM… गिरफ्तार

रामबीर शोकीन मुंडका से विधायक थे। पहले कॉन्ग्रेस से जुड़े थे, बाद में निर्दलीय लड़े और केजरीवाल को पहली बार दिल्ली का मुख्यमंत्री बनाने के लिए समर्थन भी दिया। अब पुलिस की गिरफ्त में हैं।

पूर्व विधायक रामबीर शोकीन पर 2016 में MCOCA लगाया था। आरोप था – डकैती, वसूली और अवैध हथियार रखने का। 2016 में गिरफ्तार भी हुए थे लेकिन 2018 में पुलिस को चकमा दे कर भाग गए थे। अब फिर से गिरफ्तार कर लिए गए हैं।

रामबीर शोकीन पर आरोप था कि उनके पास से AK-47 राइफल बरामद हुआ था। 2018 में वो उत्तर प्रदेश पुलिस को चकमा देकर भाग गए थे। उत्तर प्रदेश पुलिस उन्हें इलाज के लिए दिल्ली के सफदरजंग हॉस्पिटल लेकर आई थी, जहाँ से वो भाग निकले थे।

आरोपित के भाग निकलने के बाद उत्तर प्रदेश की बागपत पुलिस ने उन्हें ढूँढने का प्रयास किया था, लेकिन वो नहीं मिला था। अंत में उत्तर प्रदेश पुलिस ने दिल्ली पुलिस को इस बारे में सूचित किया था।

आपको बता दें कि दिल्ली पुलिस ने पूर्व विधायक रामवीर शोकीन पर आरोप लगाया था कि उनके गार्डन से एके-47 राइफल मिली थी, जिसे कुख्यात बदमाश और दिल्ली का डॉन कहे जाने वाले नीरज बवानिया ने लूटी थी।

इस हाई प्रोफाइल केस में पूर्व विधायक रामवीर शोकीन को अस्पताल लेकर गए पुलिस वाले समन सिंह, राजेन्द्र कुमार और सुंदर कुमार को तब सस्पेंड कर दिया गया था।

BJP ने खत्म कर दी क्रिसमस की ‘छुट्टी’? ममता बनर्जी ने लगाया आरोप – Fact Check

पश्चिम बंगाल में अप्रैल/मई 2021 में विधानसभा चुनाव होने हैं और मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप झेलने वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अब ईसाइयों के सबसे बड़े त्यौहार से पहले पूछा है कि क्रिसमस के दिन ‘राष्ट्रीय अवकाश’ क्यों नहीं रहता है? उन्होंने दावा किया कि पहले क्रिसमस के दिन ‘राष्ट्रीय अवकाश’ रहता था, लेकिन भाजपा की सरकार ने इसे हटा दिया। उन्होंने दावा किया कि भावनाएँ सबके पास होती हैं और पूछा कि ईसाइयों ने आखिर बिगाड़ा ही क्या है?

TMC सुप्रीमो ने पूछा कि क्या भारत में धर्मनिरपेक्षता बची भी है? उन्होंने कहा, “मैं माफ़ी चाहती हूँ, लेकिन मुझे कहना पड़ेगा कि आज भारत में एक प्रकार की घृणा की राजनीति की जा रही है।” उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ लोग देश को बाँटने में लगे हुए हैं। सत्ता में आते ही जिस तरह से केंद्र की भाजपा सरकार ने क्रिसमस पर छुट्टियों को कैंसल कर दिया, उससे लगता है कि ईसाई समुदाय की भावनाओं के प्रति उसके मन में कोई सम्मान नहीं है।

बता दें कि इसी दिन दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्मदिवस होने के कारण भाजपा इस दिन को ‘सुशासन दिवस’ के रूप में भी मनाती है, इसीलिए विपक्षी दल आरोप लगाते हैं कि क्रिसमस पर सरकार ध्यान नहीं दे रही। ममता बनर्जी ने दावा किया कि पश्चिम बंगाल में ईद, दुर्गा पूजा और क्रिसमस मिल-जुल मनाया जाता है। वो यहाँ तक दावा कर बैठीं कि जिस संविधान का हम सब सम्मान करते हैं, भाजपा उसका सम्मान नहीं करती।

ममता बनर्जी ने ये बातें सोमवार (दिसंबर 21, 2020) को कोलकाता के पार्क स्ट्रीट क्षेत्र में एलन पार्क के उद्घाटन के मौके पर कही। इस दौरान उन्होंने भाजपा पर ‘झूठ का पुलिंदा’ फैलाने का आरोप लगाते हुए दावा किया कि पश्चिम बंगाल MSME सेक्टर में पहला स्थान रखता है और राज्य न सिर्फ कई सामाजिक कार्यों में सबसे आगे है, बल्कि सरकार की कई योजनाओं को विश्व स्तर पर अटेंशन मिला है।

क्या सचमुच भाजपा ने क्रिसमस को ‘राष्ट्रीय अवकाश’ की श्रेणी से हटा दिया? आइए, सच जानते हैं। ‘नेशनल पोर्टल ऑफ इंडिया’ पर भारत सरकार का कैलेंडर है, जिसमें आपको अवकाशों के बारे में बताया जाता है। इसमें राजपत्रित अवकाश को ‘G’ (Gazetted) और प्रतिबंधित अवकाश को ‘R’ (Restricted) लिख कर अंकित किया जाता है। इस तरह यहाँ पूरे साल में अवकाशों की सिर्फ दो ही श्रेणियाँ हैं।

इस पर क्रिसमस पर एक दिन नहीं, बल्कि 2 दिनों के अवकाश की सुविधा दी गई है। दिसंबर 24 को ‘क्रिसमस की पूर्व संध्या (R)’ और दिसंबर 25 को ‘क्रिसमस दिवस (G)’ अंकित किया गया है। इस तरह दिसंबर 24 को प्रतिबंधित अवकाश और दिसंबर 25 को राजपत्रित अवकाश की श्रेणी में रखा गया है। इसी तरह 26 जनवरी को ‘गणतंत्र दिवस (G)’, 15 अगस्त को ‘स्वतंत्रता दिवस (G)’ और 2 अक्टूबर को ‘महात्मा गाँधी जन्म दिवस (G)’ का अवकाश है।

गर्ल्स हॉस्टल में नहाती लड़कियों का न्यूड वीडियो बनाती थी नर्स, भेजती थी बॉयफ्रेंड को… ताकि वो शादी कर ले

बेंगलुरु में अजीब प्रेम का मामला सामने आया है। खबर है कि एक 25 साल की अश्विन नाम की महिला अपने 35 साल के बॉयफ्रेंड प्रभु को इम्प्रेस करने के लिए अपनी साथियों की न्यूड वीडियो बना कर उसे भेजती थी। अपनी इस गलती के पीछे महिला का तर्क है कि वो ये सब इसलिए करती थी ताकि प्रभु उससे शादी करने के लिए मान जाए।

प्राइवेट अस्पताल में स्टाफ नर्स के तौर पर काम करने वाली अश्विन और उसका बॉयफ्रेंड प्रभु अब पुलिस हिरासत में हैं। हॉस्टल के बाथरूम में एक महिला की वीडियो बनाते हुए सेक्योरिटी गार्ड ने अश्विन को पकड़ा था। इसके बाद 5 दिसंबर को उसे पुलिस ने हिरासत में लिया और पूछताछ हुई।

प्रारंभिक जाँच में पुलिस ने पाया कि अश्विन सिर्फ उसी दिन व उसी महिला की वीडियो नहीं बना रही थी, बल्कि अन्य महिलाओं की वीडियो भी बनाती थी और बाद में उन्हें प्रभु के साथ साझा करती थी। उसका कहना है कि वह सिर्फ वीडियो रिकॉर्ड करती थी लेकिन प्रभु उन वीडियो का क्या करता था, ये उसे नहीं मालूम।

डिप्टी पुलिस कमिशनर डी देवराज का कहना है, “ये बेहद गंभीर स्थिति है। हमें जल्दी एक्शन लेना होगा और पता लगाना होगा कि वीडियोज कहीं सोशल मीडिया पर अपलोड तो नहीं हुई या फिर महिलाओं को ब्लैकमेल करने के लिए तो इसका इस्तेमाल नहीं किया गया।”

अश्विन से प्राप्त सूचना के आधार पर पुलिस ने प्रभु को तमिलनाडु से हिरासत में लिया। पुलिस ने दोनों के मोबाइल फोन और मेमोरी कार्ड जब्त किए। जाँच के बाद पुलिस ने कहा कि अभी प्रभु ने वीडियोज को कहीं सर्कुलेट नहीं किया है। 

पुलिस कमिश्नर बताते हैं, “अश्विन तलाकशुदा है। वह प्रभु से शादी करना चाहती थी और इसलिए उसकी डिमांड पर साथियों की वीडियो रिकॉर्ड करके उसे इम्प्रेस करती थी।” पुलिस ने इस मामले में प्रभु पर अश्विन को वीडियो रिकॉर्ड करने के लिए उकसाने के आरोप में मुकदमा दर्ज कर लिया है। दोनों के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 354 सी के तहत केस रजिस्टर किया गया है। पुलिस का मानना है कि वीडियो बेचने के लिहाज से बनवाई गई थी।

रॉन्ग नंबर से शुरू हुआ था अफेयर

बता दें कि अश्विन और प्रभु एक दूसरे से साल 2017 में एक रॉन्ग नंबर डायल होने के कारण संपर्क में आए थे। बाद में दोनों दोस्त बने और अश्विन उससे शादी करने की इच्छा जाहिर करने लगी। शुरुआत में प्रभु भी शादी को तैयार हुआ, मगर जब उसे तलाक के बारे में पता चला तो वह पीछे हटने लगा। 

इसके बाद अश्विन ने प्रभु से कहा कि वह उसके लिए कुछ करना चाहती है, जिस पर प्रभु ने उसे वीडियो रिकॉर्ड करके उसे भेजने को कहा। समय बीतने के साथ उसकी डिमांड अधिक बढ़ गई। प्रभु ने शुरुआती बयान में कहा है कि वह सिर्फ वीडियो देख कर आनंद लेता था और बाद में उन्हें डिलीट कर देता था।

सिर्फ 1 दिन में 3800 नेताओं ने थामा BJP का हाथ: अमित शाह के बंगाल दौरे के बाद बदला समीकरण, सबका हुआ स्वागत

पश्चिम बंगाल में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने जानकारी दी है कि आसनसोल में सोमवार (दिसंबर 21, 2020) को हुई रैली के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों के 3800 कार्यकर्ताओं ने भाजपा का दामन थामा। इससे 2 दिन पहले मिदनापुर में हुई पूर्व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की रैली में शुभेंदु अधिकारी सहित 10 विधयकों और एक TMC सांसद भाजपा का हिस्सा बने थे। दिलीप घोष ने ट्वीट कर के इसकी जानकारी दी।

उन्होंने लिखा, “विभिन्न पार्टियों के 3800 कार्यकर्ता आसनसोल संगठन जिले के रानीगंज में हुई रैली में भाजपा परिवार का हिस्सा बने। हम आप सब का विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक दल में स्वागत करते हैं। हम सब मिल कर सोनार बांगला का निर्माण करेंगे।” 2021 के अप्रैल-मई में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले TMC और भाजपा राज्य में सीधी टक्कर में हैं, जहाँ तृणमूल पर हिंसा और धमकियों के जरिए भाजपा कार्यकर्ताओं को डराने के आरोप लग रहे हैं।

उधर पांडवेश्वर के विधायक जितेंद्र तिवारी ने अपने इस्तीफे पर यूटर्न ले लिया। कहा जा रहा है कि भाजपा किसी को भी शामिल नहीं करना चाहती है, इसीलिए उनकी एंट्री बंद की गई। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन राज्यमंत्री बाबुल सुप्रियो आसनसोल से ही सांसद हैं, जहाँ से जितेंद्र तिवारी चुन कर आते हैं। बाबुल सुप्रियो ने कहा कि वो ऐसे किसी भी नेता को भाजपा में नहीं आने देंगे, जिनका भाजपा कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित करने का इतिहास रहा है।

भाजपा की आक्रामक रणनीति से अब ममता बनर्जी खुद को नेपथ्य में रख कर प्रशांत किशोर और अभिषेक बनर्जी जैसे लोगों को आगे कर रही हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि एक तो प्रशांत किशोर के आने से TMC के वरिष्ठ नेता नाराज हैं, ऊपर से अम्फान चक्रवात से हुई तबाही के प्रबंधन में असफल रहने के कारण भी लोगों में राज्य सरकार से नाराजगी है। हिन्दू भाजपा की तरफ जा रहे हैं और मुस्लिमों को ओवैसी ने लुभाना शुरू कर दिया है।

उधर प्रशांत किशोर का कहना है कि बीजेपी दोहरे अंक में पहुँचने के लिए संघर्ष करेगी। बीजेपी ने पलटवार करते हुए कहा है कि चुनाव के बाद देश एक रणनीतिकार खो देगा। ध्यान रहे पीके 2021 में होने वाले बंगाल चुनाव के लिए टीएमसी की रणनीति बना रहे हैं। हाल में कई नेताओं ने उनके तौर-तरीकों का विरोध करते हुए टीएमसी छोड़ी है। भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय ने लिखा, ”भाजपा की बंगाल में जो सुनामी चल रही है, सरकार बनने के बाद इस देश को एक चुनाव रणनीतिकार खोना पड़ेगा।”