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90 के हिन्दू नरसंहार से एयर स्ट्राइक, प्रेम, कौम और राजनीति तक, ‘बाला सेक्टर’ में सब दर्ज हैं

भारत का उत्तरी क्षेत्र, जहाँ कभी कश्यप ऋषि के नाम पर बसा था, जो खुद सूर्य के बेटे की राजधानी बना। कश्मीर, जहाँ कभी शैव पंथ ने जन्म लिया था। ये वही कश्मीर है जहाँ कि धरती पर दुर्वाशा ऋषि के शिष्यों ने शिव के कण कण को पूजा था। ये वही धरती है जहाँ शिव ने अमरनाथ की गुफा में पार्वती जी को अमरकथा सुनाई। ये वही धरती है जहाँ आचार्य अभिनव गुप्त ने आदि गुरु से शास्त्रार्थ किया।

इस धरती पर धीरे-धीरे विदेशी आक्रांताओं की नजर पड़ी और रक्त से इसका अभिषेक होने लगा। 1947 में जब देश के दो टुकड़े धर्म के आधार पर कर दिए गए, तो भारत का ये मुकुट त्रिशंकु रह गया। राजा हरिसिंह न इधर के थे, न उधर के औऱ वही हुआ जिसका डर था, इस कश्मीर की धरती ने भयंकर रक्तपात का दौर देखा।

जब भारत का अभिन्न अंग टूट कर पाकिस्तान के कब्जे में चला गया तो उसे पाक ऑक्यूपाइड कश्मीर कहा जाने लगा। फिर भी वहाँ के जेहादियों औऱ कठपुतली सरकार, जो सेना के अधीन रही है, को बर्दाश्त न हुआ औऱ लगातार घाटी में रक्तपात करवाया जाने लगा। साल दर साल फौज औऱ आतंकियों ने कश्मीर को स्वर्ग से नरक बना डाला और फिर आई वो 1990 की भयंकर रात जब पहली बार कश्मीर से वहाँ के हिन्दुओ को धर्म के आधार पर मार कर, इज्जत लूट कर भगाया गया।

‘बाला सेक्टर’ (Bala Sector) उसी 1990 के भयानक रक्तपात से शुरू होती है। जेहादियों के दल ने अपने ही रक्षक को कैसे मौत के घाट उतारा, कैसे एक व्यक्ति को सिर्फ इसलिए धर्म बदलना पड़ा क्योंकि उसके दोस्त की बेटी को उसे बचाना था। ये सब आपको पहले ही खण्ड में मिल जाएगा। उस भयंकर त्रासदी को लिखते समय आशीष त्रिपाठी जी के भी हाथ अवश्य काँपे होंगे, क्योंकि पढ़ते समय दिल बैठा जा रहा था।

कहानी हमें कश्मीर से बाहर भारत के उन क्षेत्रों में भी ले जाती है, जहाँ आज भी लोग पोलियो की दवा अपने बच्चों को इसलिए नहीं पिलाते कि कहीं वो नामर्द न बनजाए। एक कौम को जबरदस्ती कुछ मतान्ध लोगों ने कठपुतली बना कर उनके हर बौद्धिक विकास को रोक दिया है। नौलखिया के चरित्र के रूप में आपको एक ऐसा व्यक्ति दिखेगा जिसके लिए आप एक बार नही बार बार रोएँगे।

आशीष त्रिपाठी जी की विशेषता यह है कि उनकी कहानी एकदम हवा हवाई नहीं होती, बल्कि आप उस कहानी को पढ़ते समय स्वयं इस बात की तस्दीक कर देंगे कि हाँ ये सब मैंने खुद होते देखा है।गाँव की परंपरा में आज भी किसी से झगड़े होने पर उससे इतनी दुश्मनी नहीं की जाती कि घर आने पर उसका अपमान हो, ये बात आशीष त्रिपाठी जी ने अपने पहले उपन्यास ‘पतरकी’ के समय भी साबित की थी।

किताब में ऐसे बीसों प्रसङ्ग हैं, जब आप हंस-हंस के दोहरे हो जाते हैं। एक दृश्य में जब महिपाल का भाई भूपाल अपनी प्रेमिका से चुम्बन की दरख़्वास्त करके पेड़ पर उल्टा लटक जाता है और कहता है कि ये स्पाइडर मैन का स्टाइल है, तो आप एकदम खिलखिला कर हँसते हैं। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के प्रधानमंत्री सरफराज आपको एक बार भी बिना हँसाए आगे नही बढ़ने देंगे।

जब बालाकोट में भारतीय वायुसेना बम गिराती है तो उसके बाद सरफराज खुद को आलू की बोरियों के पीछे छुपा लेते हैं। यहाँ तो पक्का आपके मुँह से खाया-पीया निकल जाता है। भारत मे पल रहे वामपंथी शिक्षाविदों पर भी आशीष त्रिपाठी जी की कलम बेबाकी से चली है और उस पर सबसे बड़ी बात कि कहीं से भी नसीर का चरित्र बनावटी नहीं लगता बल्कि हमारे देश के ऐसे अनगिनत प्रोफेसर हम लोगों ने देखे हैं जो बच्चों में जहर घोलकर उन्हें देश के खिलाफ खड़े करते हैं।

टीवी पत्रकार के रूप में विशाखा औऱ राकेश कुमार आपको उन न्यूज चैनलों के चरित्रों को याद दिलवा देंगे, जिन्होंने एयर स्ट्राइक के बाद भारत की सेना से सबूत माँग लिए थे। महिपाल, आकाश और रविभूषण कौल का चरित्र गढ़ते समय शायद लेखक के दिमाग में मनोज वाजपेयी औऱ आशुतोष राणा रहे होंगे, क्योंकि मुझे तो हर दृश्य में वही दिख रहे थे।

बचपन के संस्कार कैसे हमे राष्ट्रवादी बनाने में सहायक होते हैं, ये बाबा बालकनाथ की महिपाल के गुरु के रूप में तैनाती करके लेखक ने बढ़िया से समझा दिया है। प्रेम के नाम पर हो रहे षड्यंत्र से आज कौन वाकिफ नहीं, फिर भी लोग न चाहते हुए भी इस झूठे दलदल में फंस जाते हैं, जिसे आशीष त्रिपाठी जी ने इतना शानदार रचा है कि कहानी की तीन महिला पात्रों को सिवाय छल के कुछ नहीं मिलता।

प्रेम के नाम पर सच मे षड्यंत्र ज्यादा होते हैं, यह समझने के लिए आपको सिर्फ कहानी पढ़नी है। उपन्यास की मुख्य महिला पात्रों में से एक परवीन के रूप में आपको आपके उपन्यास की नायिका मिलती है, जबकि रेहाना के रूप में आपको ऐसी महिला मिलती है जो पड़ोसी मुल्क की महिलाओ के प्रति गंदगी की पीड़ा झेल रही है। सलमा का चरित्र पढ़ कर कभी हम उस पर गुस्सा करते हैं तो कभी उस पर दया आती है। पड़ोसी मुल्क की फ़ौज की नशे औऱ भ्रष्टाचार में लिप्त व्यवस्था पर बेहतरीन कटाक्ष किए गए हैं।

खुद की तरक्की के लिए बेगुनाहों का कत्ल करने वाली पाकिस्तान की फ़ौज की डर की दास्तान भी हमें ‘बाला सेक्टर’ में बखूबी देखने को मिलती है। मुझे कुछ दृश्य बेहद शानदार लगे जिनमें से एक था हरियाणा पुलिस के इंस्पेक्टर लोकेश और उसके सिपाही पंकज का ‘रॉ’ की टीम को रोक कर उनका चालान करना। इस दृश्य में ठेठ पूर्वांचल के गाँव के रहने वाले आशीष त्रिपाठी जी ने हरियाणवी का बेहतरीन इस्तेमाल किया है।

वैसे मैं कहूँगा की लेखक ने न केवल हरियाणवी, बल्कि उर्दू, भोजपुरी, हिन्दी व अंग्रेजी का भी बेहतरीन इस्तेमाल किया है। दूसरा दृश्य था, जब नसीर साहब भारत को बदनाम करने के इरादे से पाकिस्तान जाते हैं और पीओके के प्रधानमंत्री उन्हें रिसीव करने आते है। उस समय वे नसीर से कहते हैं कि आपको असली बमबारी वाली जगह देखनी है या वो देखनी है जो न्यूज चैनलों ने दिखाई?सही मायने में लेखक ने बाला कोट एयर स्ट्राइक पर सवाल उठाने वालों के मुँह पर करारा तमाचा मारा है।

तीसरा दृश्य है, जब महिपाल अपनी पत्नी से मिल रहा होता है पीओके निकलने से पहले। उस समय उसकी पत्नी सुनीता पूछती है,”फिर कब आएँगे?” इस समय महिपाल के होंठ खुल नही पाते, भारतीय फौज का ये सबसे माहिर जासूस अपनी पत्नी के सामने आखिर टूट जाता है। उस दृश्य में दोनों के गले लगकर रोने पर आपके चेहरे पर अश्रुपूरित मुस्कान तैर जाती है। सबसे अधिक घृणा का पात्र बनता है तैमूर, जो अपनी बहन की इज्जत लुटने के बाद भी अपनी जान बचाने के लिए बलात्कारी के साथ हो लेता है।

असल मे जेहादियों के साथ आतंकी बनने के बाद उनके परिवार पर होने वाले अत्याचारों को इससे बेहतर शायद कभी किसी ने नही लिखा था। आशीष त्रिपाठी जी किसी मत सम्प्रदाय या देश के प्रति एकतरफा राय नहीं बनाते, बल्कि आप लोग पढ़ते हुए साफ महसूस करेंगे कि हूबहू ये चीज होती आई है। कहानी की नायिका परवीन जब अपने भाषण में भारतीय गृह मंत्री के वो वाक्य कहती है, “जब हम कश्मीर की बात करते हैं तो उसमें पीओके और अक्साई चीन भी आता है, औऱ इसके लिए जान भी दे देंगे।” तब आपके रौंगटे देश प्रेम से खड़े हो जाते हैं।

लड़ाई वाले दृश्य में जब महिपाल एक शत्रु को चाकुओं से गोदता है तो आपको लगता है आप फ़िल्म देख रहे हैं। कुल मिलाकर आपको कहानी पढ़नी नहीं है, आपको सिर्फ ये फ़िल्म की तरह देखनी है क्योंकि मुझे तो बिल्कुल हर दृश्य सजीव लग रहा था।

जाते जाते एक मजेदार बात, पाकिस्तान की बेबसी के हालात का एक मज़ेदार किस्सा है, जहाँ पीओके के पीएम कहते हैं अपने ड्राइवर से, “लाले दी जान गाड़ी बाला सेक्टर की तरफ बढ़ा दे”, मगर ड्राइवर ये कहकर मना करता है कि, ‘इन्हें बारह बजे तक पीएम हाउस होना चाहिए।’ पीएम कहता है, “मगर अभी तो दस बजे हैं”, तो ड्राइवर कहता है, “सर डाँट पड़ेगी।” पीएम कहता है, “और अगर मैं तुझे अपने किचन से पूरे पाव किलो टमाटर दूँ तो?” ड्राइवर चौंक कर कहता है, “आपके पास टमाटर है?” “और क्या मिंया? आखिर पीएम हूँ।”

पूरे उपन्यास में हर दूसरे पेज पर आपको कोट करने लायक एक से एक वाक्य मिलेंगे, उन्हें आप खुद ही पढ़कर महसूस कीजिएगा। अंत में, ‘बाला सेक्टर’ न केवल साहित्यिक बल्कि ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। उपन्यास में कहीं भी आपको कोई बात बोर नही करती, बल्कि 274 पेज का ये उपन्यास आप एक सिटिंग में पढ़ सकते हैं। उपन्यास के बदलते प्रसङ्ग आपको जोड़े रखते हैं।

भारतीय सेना, उनके जासूसों की शौर्य की कहानी के अतिरिक्त, कश्मीर के पाक अधिकृत हिस्से में हो रहे जुल्मों की बानगी भी है। प्रेम के नाम पर षड्यंत्र, प्रेम के नाम पर त्याग, प्रेम के नाम पर बेवकूफियाँ आपको कहानी से जोड़ लेती है। पेज क्वालिटी बेहद अच्छी है, उपन्यास का वजन इतना हल्का है कि आपको लगेगा नहीं कि ये 274 पेज में है।

किताब के पेजों में मार्जिन है, इसलिए आपको बिल्कुल उखाड़ कर पढ़ने की जरूरत नहीं है। आवरण पेज बिल्कुल क्लासिक है। लेखक की मंशा तभी स्पष्ट हो जाती है जब वो कहते हैं, “14 फरवरी 2019 को पुलवामा में शहीद हुए सीआरपीएफ के जवानों के साथ साथ, ज्ञात-अज्ञात उन सभी भारतीय वीरों को समर्पित, जिनके लिए भारत की एकता व अखंडता उनके प्राणों से बढ़कर है।”

लेखक ने अपनी बात मात्र डेढ़ पृष्ठ में खत्म करके इसे कोई कमी होने पर स्वयं का दोष व कोई अच्छी बात होने पर पाठकों का स्नेह कहकर अपना विशाल हृदय दिखाया है।

क्यों पढ़ें?

यदि आपको साहित्य से प्रेम है, यदि आपको भारत से प्रेम है, यदि आपको फौजियों की कहानियों से प्रेम है, यदि आपको गाँव से प्रेम है, यदि आप जानना चाहते हैं कि भारत का एक बौद्धिक वर्ग किस तरह भारत के खिलाफ षड्यंत्र रचता है। अंत में, उपन्यास के लेखक आशीष त्रिपाठी जी को बधाई देते हुए उन्हें नमन करता हूँ कि उन्होंने ऐसा शानदार उपन्यास रचा। पाठकों के लिए केवल इतना कहूँगा कि चूकने की आवश्यकता नहीं है, यह बेहतरीन उपन्यास है।

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यह पुस्तक समीक्षा लोकेश कौशिक द्वारा लिखी गई है, जो कि वर्तमान में चंडीगढ़ पुलिस में कार्यरत हैं

73% लोग कृषि कानूनों के समर्थन में, 56.59% चाहें तत्काल खत्म हो किसान आंदोलन: सर्वे ने बताया देश क्या चाहता है

जहाँ एक तरफ किसान संगठनों ने आंदोलन के नाम पर दिल्ली को बंधक बना रखा है और कह रहे हैं कि केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए तीनों कृषि कानूनों को वापस लिए बिना स्थिति में बदलाव नहीं होगा, वहीं दूसरी तरफ ‘न्यूज़ 18’ द्वारा कराए गए एक सर्वे में सामने आया है कि देश में अधिकतर लोग इन कृषि कानूनों से खुश हैं।

‘किसान आंदोलन’ चालू हुए 25 दिन हो गए हैं। कॉन्ग्रेस, AAP और अकाली दल लगातार आग में घी डालने के काम में लगे हुए हैं। मोदी सरकार ने कई दौर की बातचीत की, लेकिन कोई निष्कर्ष नहीं निकला। ‘न्यूज़ 18’ के सर्वे में सामने आया है कि 73.05% लोग इन कृषि सुधारों के समर्थन में हैं। इन लोगों का मानना है कि इन कानूनों से किसानों को फायदा होने वाला है। 48.71% लोगों ने इस आंदोलन को ‘राजनीति से प्रेरित’ करार दिया है।

इस तरह दो तिहाई से अधिक लोग केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के समर्थन में हैं और करीब आधे लोग किसान आंदोलन को राजनीति से प्रेरित मानते हैं। ‘न्यूज़ 18’ का दावा है कि इस सर्वे में कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश के हर कोने से लोगों की राय लेने का प्रयास किया गया है। कुल 2412 लोगों ने इस सर्वे में हिस्सा लिया और उनसे कुल 12 सवाल पूछे गए। तो लोगों का क्या सोचना है? आइए, जानते हैं।

लोगों का मानना है कि इन कृषि सुधार कानूनों से आने वाले दिन में किसानों के जीवन में बड़ा बदलाव आएगा और साथ ही वो इस कानून को देश व किसानों के हित में मानते हुए ये चाहते हैं कि ये आंदोलन जल्द से जल्द ख़त्म हो। 56.59% लोग चाहते हैं कि ये आंदोलन ख़त्म होना चाहिए। हालाँकि, 32.59% लोग ऐसे भी हैं जो सोचते हैं कि ये आंदोलन राजनीति से प्रेरित नहीं है और 18.7% लोगों ने इस मामले में कोई राय नहीं दी।

मीडिया संस्थान ने बताया है कि उसने इस सर्वे में कुल 22 राज्यों के लोगों की राय ली है। जिन राज्यों में खेती ज्यादा होती है, वहाँ के लोग इन कृषि कानूनों के समर्थन में और ज्यादा गोलबंद हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इन कृषि कानूनों को सब ज्यादा समर्थन मिला है। हालाँकि, पंजाब में इन कृषि कानूनों को लेकर समर्थन थोड़ा कम था, क्योंकि वहाँ कृषकों को स्वतंत्रता देने वाले कानून को राजनीतिक मसला बना दिया गया है।

कृषि कानूनों को लेकर ‘न्यूज़ 18’ का सर्वे

52.69% लोग चाहते हैं कि इन कृषि सुधार कानूनों को ख़त्म करने के लिए जोर-जबरदस्ती नहीं की जानी चाहिए और किसान संगठनों को सरकार से समझौता करना चाहिए। 60.90% लोगों का मत है कि इन कानूनों के लागू होने से किसानों को उनके उत्पाद का बेहतर मूल्य मिलेगा। 73.05% लोग कृषि सुधारों और कृषि में आधुनिकीकरण के पक्षधर हैं। 69.65% ने माना कि अब किसान APMC से बाहर उत्पाद बेच सकेंगे।

अफवाह फैलाई जा रही है कि इससे राज्यों के APMC (एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्किट कमिटी) की शक्ति कम हो जाएगी, या फिर वो निष्प्रभावी हो जाएँगे। जबकि, ऐसा नहीं है। इस बिल का उद्देश्य राज्यों की APMC को निष्प्रभावी करना है ही नहीं। ये किसानों को मौजूदा APMC का अतिरिक्त विपणन चैनल प्रदान करेगा। APMC अपने प्रचलन की दक्षता में और सुधार करें, इसके लिए ये क़ानून उन्हें प्रोत्साहित करेगा।

उधर, भारतीय किसान यूनियन (BKU एकता-उग्राहन) की विदेशी फंडिंग शक के घेरे में है। BKU (एकता-उग्राहन) ने दावा किया है कि उसे एक केंद्रीय एजेंसी ने उस रजिस्ट्रेशन का विवरण साझा करने को कहा है, जिसके तहत उसे विदेशी फंडिंग पाने की अनुमति मिली हुई है। उसे पिछले 2 महीनों में 8 लाख रुपए की फंडिंग मिली है। कहा जा रहा है कि BKU (एकता-उग्राहन) ने FCRA के नियमों का पालन नहीं किया है, ऐसे में उसे आई विदेशी फंडिंग वापस दानदाताओं के एकाउंट्स में लौट सकती है।

गॉंधी परिवार के एक और पुराने ‘राजदार’ का निधन, नेशनल हेराल्ड केस में भी आरोपित थे मोतीलाल वोरा

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता मोतीलाल वोरा का 93 साल की उम्र में दिल्ली में निधन हो गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार मोतीलाल वोरा (Motilal Vora) के स्वास्थ्य में परेशानी होने के कारण कल, रविवार (दिसंबर 20, 2020) रात उन्हें एस्कॉर्ट हॉस्पिटल में भर्ती करवाया गया था। कल ही उनका जन्मदिन था।

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने भी ट्वीट कर कहा, ”वोरा जी एक सच्चे कॉन्ग्रेसी और अद्भुत इंसान थे। हम उन्हें बहुत मिस करेंगे। उनके परिवार और दोस्तों के प्रति मेरी संवेदना है।”

मध्य प्रदेश के एक पूर्व मुख्यमंत्री, वोरा छत्तीसगढ़ से राज्यसभा सदस्य थे। उन्होंने 2018 तक 16 वर्षों के लिए अखिल भारतीय कॉन्ग्रेस कमेटी (AICC) के कोषाध्यक्ष के रूप में भी काम किया है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी द्वारा फेरबदल के बाद यह पद एक अन्य वरिष्ठ नेता अहमद पटेल को सौंप दिया गया था।

अक्टूबर माह में ही कोविड -19 पॉजिटिव पाए जाने के बाद गत 25 नवंबर को अहमद पटेल का गुरुग्राम के एक अस्पताल में निधन हो गया। वरिष्ठ अहमद पटेल के बाद मोतीलाल वोरा का निधन हुआ है। दोनों ही सोनिया गाँधी के साथ छाया की तरह रहे। 1995 के यूपी के कुख्यात गेस्ट हाउस कांड के समय मोतीलाल वोरा ही गवर्नर भी थे।

2019 के आम चुनावों के बाद राहुल गाँधी द्वारा कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से त्यागपत्र की घोषणा के बाद मोतीलाल वोरा को पार्टी के अंतरिम अध्यक्ष बनाए जाने की चर्चा भी सामने आई थी। इसके बाद ही सोनिया गाँधी को पार्टी अध्यक्ष चुना गया।

मोतीलाल वोरा नेशनल हेराल्ड नेशनल हेराल्ड मामले में भी सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, ऑस्कर फर्नाडीज, सुमन दुबे, सैम पित्रोदा और यंग इंडिया कंपनी के साथ आरोपित थे। मोतीलाल वोरा AJL के मैनेजिंग डायरेक्‍टर थे। इस कंपनी पर गाँधी परिवार का दखल है। यही AJL ही नेशनल हेराल्‍ड अखबार को चलाता है।

इस अखबार को साल 1939 में जवाहरलाल नेहरू ने शुरू किया था जबकि वर्ष 1956 में AJL एक कंपनी बनी। साल 2008 में इसके सारे पब्लिकेशंस बंद कर दिए गए। तब कंपनी पर 90 करोड़ रूपए का कर्ज था।

इंग्लैंड में कोरोना का खतरनाक प्रकार, भारत सरकार ने बंद की सभी उड़ान: यूरोपीय देशों के बॉर्डर भी सील

इंग्लैंड (यूनाइटेड किंग्डम) में कोरोना वायरस के एक नए प्रकार ( new strain of coronavirus) का पता चला है। कोरोना वायरस के इस नए प्रकार का संक्रमण दर बहुत ज्यादा है। इस खतरे को देखते हुए भारत सरकार ने जरूरी कदम उठाते हुए इंग्लैंड से आने वाली सभी उड़ानों को 31 दिसंबर की रात 11 बज कर 59 मिनट तक सस्पेंड कर दिया है।

भारत सरकार द्वारा लगाया गया यह सस्पेंशन 22 दिसंबर की रात 11 बज कर 59 मिनट से लागू होगी।

22 दिसंबर की रात 11 बज कर 59 मिनट से पहले पहुँचने वाली फ्लाइट से आए सभी यात्रियों का एयरपोर्ट पर ही RT-PCR टेस्ट किया जाएगा।

भारत में इस नए खतरे को देखते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय ने आज सोमवार (21 दिसंबर 2020) को इमरजेंसी मीटिंग बुलाई थी। यह मीटिंग जॉइंट मॉनिटरिंग ग्रुप के साथ हुई।

इस मीटिंग के बाद अरविंद केजरीवाल से लेकर अशोक गहलोत तक ने इंग्लैंड से आने वाली फ्लाइट को बंद करने का अनुरोध भारत सरकार से किया। हालाँकि ये वही राजनेता हैं, जो पहले के लॉकडाउन को लेकर राजनीति भी करते रहे हैं।

इंग्लैंड के अलावा कोरोना वायरस के इस नए प्रकार का संक्रमण नीदरलैंड, डेनमार्क, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका में भी पाया गया है। नीदरलैंड और बेल्जियम ने कोरोना वायरस के नए प्रकार का पता चलने के बाद इंग्लैंड से आने वाली उड़ानों पर रोक लगा दी है। इनके अलावा कई अन्य देश भी इंग्लैंड की उड़ानों पर रोक को लेकर सोच-विचार कर रहे हैं। यूरोप के कई देशों ने इंग्लैंड बॉर्डर को सील कर दिया है।

इंग्लैंड के मुख्य चिकित्सा अधिकारी प्रोफेसर क्रिस विट्टी ने कोरोना वायरस के नए प्रकार के बारे में कहा, “हमने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) को बता दिया है। साथ ही कोरोना वायरस के नए प्रकार के बारे में समझने के लिए उपलब्ध जानकारी का अध्ययन कर रहे हैं। हालाँकि फिलहाल इस बात को साबित करने का कोई साक्ष्य मौजूद नहीं है कि वायरस का यह नया प्रकार अधिक घातक है या नहीं।”

नहीं रहा बाबा का ढाबा… खोला उन्होंने नया रेस्टोरेंट: CCTV कैमरा और स्टाफ, मिली थी जान की धमकी

पिछले कुछ दिनों में बेहद चर्चा में रहे ‘बाबा का ढाबा’ (Baba ka Dhaba) के मालिक 80 वर्षीय कांता प्रसाद ने अब दिल्ली स्थित मालवीय नगर में एक नया रेस्टोरेंट शुरू कर दिया है। ये नया रेस्टोरेंट उन्होंने अपने ढाबे के ही पास शुरू किया है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कांता प्रसाद ने कहा, “हम बहुत खुश हैं, भगवान ने हमें आशीर्वाद दिया है। मैं मदद के लिए लोगों को धन्यवाद देना चाहता हूँ, मैं उनसे मेरे रेस्तराँ आने की अपील करता हूँ। हम यहाँ भारतीय और चायनीज फ़ूड बनाएँगे।”

गौरतलब है कि नए रेस्टोरेंट में बाबा ने सुरक्षा को देखते हुए सीसीटीवी कैमरा भी लगवाया है। हाल ही में कांता प्रसाद ने बाताया था कि उनकी जान को खतरा है और उनको कुछ दिनों से जान से मारने की धमकी दी जा रही है। लगातार मिल रही जान से मारने की धमकियों से परेशान होकर ढाबा मालिक कांता प्रसाद ने मालवीय नगर थाने में शिकायत दर्ज कराते हुए कहा कि कुछ जलनखोर लोग उन पर हमला कर रहे हैं क्योंकि वह रातोरात फेमस हो गए थे। प्रसाद ने कहा कि उनकी किसी से दुश्मनी नहीं है।

बताया जा रहा है कि ढाबा मालिक कांता प्रसाद ने अपने नए रेस्टोरेंट में 2 से 3 लोगों का स्टाफ भी रखा है। बाबा का कहना है कि वो इस नए रेस्टोरेंट में भी खुद ही खाना बनाएँगे।

पिछले महीने दिल्ली के जिस ‘बाबा का ढाबा’ ने देशभर में सुर्खियाँ बटोरीं, वह कुछ समय बाद ही पैसों के हेरफेर के आरोप में विवाद का भी विषय बन गया था। जिसके चलते बाबा को दुनिया भर में मशहूर करने वाले यूट्यूबर गौरव वासन ने ढाबा मालिक 80 वर्षीय बुजुर्ग कांता प्रसाद पर मानहानि का आरोप लगाया। दक्षिण दिल्ली के मालवीय नगर में ‘बाबा का ढाबा’ से जुड़े मामले की जाँच के बीच यूट्यूबर गौरव वासन ने कहा कि उन्हें बदनाम किया जा रहा है।

हालाँकि, बाबा का ढाबा के मालिक का कहना है कि अब अगर वो गलत साबित हुए तो गौरव वासन से माफ़ी माँग लेंगे क्योंकि आखिरकार गौरव ने उनकी मदद की है। बाबा का ढाबा के मालिक ने आरोप लगाया था कि गौरव ने उन्हें दान में मिली सारी रकम नहीं सौंपी।

गौरव का दावा था कि उन्होंने ढाबा मालिक को 3.78 लाख रुपए की राशि सौंपी थी। वासन ने ‘बाबा का ढाबा’ के मालिक का वीडियो बनाकर यूट्यूब पर अपलोड किया था जिसके बाद यह वीडियो वायरल हुआ और लोग ढाबा मालिक कांता प्रसाद की मदद के लिए आगे आए थे। हालाँकि वीडियो वायरल होने के करीब एक महीने बाद ढाबा मालिक कांता प्रसाद ने इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर और यूट्यूबर गौरव वासन के खिलाफ पैसों की हेराफेरी की शिकायत दर्ज कराई थी।

नई ‘गऊ प्रेमी’ प्रियंका गाँधी फेक न्यूज में उलझीं: कभी केरल में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने बीच सड़क पकाया था बछड़ा

प्रियंका वाड्रा गाँधी ने नया कीर्तिमान रचा है। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक पत्र लिखा है। लेकिन अफ़सोस! जिस मुद्दे पर रोष जताते हुए पत्र लिखा गया है, उससे जुड़ी जानकारी की तस्दीक नहीं की गई। पत्र में प्रियंका गाँधी ने लिखा है कि वह सोशल मीडिया पर वायरल हो रही गाय की लाशों की तस्वीर देख कर काफी निराश हैं। 

पत्र में उन्होंने बताया कि मृत गायों की यह तस्वीर उत्तर प्रदेश के ललितपुर की है। उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि गायों की मृत्यु कैसे हुई। फिर भी वह इस निष्कर्ष पर पहुँच गईं कि संभावित रूप से उनकी मृत्यु भुखमरी की वजह से हुई है। 

कुछ समय बाद पता चला कि ख़बर फ़र्ज़ी (फ़ेक) है और ऐसा कुछ हुआ ही नहीं। इसके बाद उत्तर प्रदेश के आधिकारिक फैक्ट चेकिंग हैंडल आईपीआरडी (IPRD) ने ट्वीट करते हुए कहा कि ललितपुर गोशाला के मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी (Chief Veterinary Officer) के मुताबिक़ गोशाला के भीतर, बाहर या आस-पास के क्षेत्र में गाय की कोई लाश नहीं मिली है।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को बहुत समय नहीं बचा है इसलिए कॉन्ग्रेस का गाय के प्रति स्नेह और समर्पण तत्काल प्रभाव से बढ़ गया है। प्रियंका गाँधी को कॉन्ग्रेस पार्टी की तरफ से मुख्यमंत्री पद के लिए प्रोजेक्ट किया जाता है। पर गऊ प्रेम दिखाने के लिए व्याकुल प्रियंका फ़ेक न्यूज़ के फेर में उलझ कर रह गईं।    

ठीक इसी तरह प्रियंका गाँधी के यशस्वी भ्राता राहुल गाँधी भी देश के बड़े चुनावों के दौरान मंदिर-मंदिर भागने का अभ्यास करते हुए नज़र आते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सूचना सलाहकार शलभमणि त्रिपाठी ने बिना देर किए गोरक्षा के मसले पर कॉन्ग्रेस का मूल चरित्र और पाखण्ड सार्वजनिक कर दिया। 

शलभमणि त्रिपाठी ने उस घटना का उल्लेख किया जब केरल में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने बीच सड़क पर आम जनता के सामने गाय के बछड़े की हत्या की और उसे पका कर खाया भी। यह निकृष्ट घटना साल 2017 में हुई थी। इसे अंजाम देते हुए पर्याप्त बर्बरता की गई थी इसलिए मुद्दे पर देशव्यापी विरोध हुआ था। घटना के लगभग 3 साल बाद उसी कॉन्ग्रेस को गाय की चिंता सता रही है। आखिरकार 2022 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव जो हैं।    

गजवा ए हिंद आएगा… कश्मीर को जीतेंगे, इंशाल्लाह काफिला बढ़ता (बाकी बचे भारत की ओर) रहेगा: शोएब अख्तर का वीडियो वायरल

पाकिस्तान के पूर्व क्रिकेटर शोएब अख्तर को लेकर पिछले दिनों कुछ धारणाएँ निर्मित हुई थीं। उन्हें लेकर माना जा रहा था कि वह दोनों देशों के बीच शांति बहाल करवाने वाली आवाजों में से एक हैं। उन्होंने जब दानिश कनेरिया के साथ पाक टीम में हुए भेदभाव पर आवाज उठाई, तब भी भारतीय मीडिया ने उन्हें प्रमुखता से कवर किया। इसके बाद अभी हाल में वह उस समय चर्चा में आए, जब उन्होंने वेंटिलेटर के लिए भारत से अपील करते हुए इंसानियत को देश और मजहब से ऊपर बताया।

अब पूरे दुनिया में रावलपिंडी एक्सप्रेस नाम से मशहूर पाकिस्तान के पूर्व तेज गेंदबाज  शोएब अख्तर की सच्चाई क्या है? ये एक बड़ा सवाल है। क्या वाकई वह वैसे ही हैं, जैसा कि उन्होंने अपने बयानों से खुद को दर्शाया या फिर वह केवल गुडबुक्स में रहने का प्रयास कर रहे हैं और उनकी हकीकत वो है, जो उनकी एक वायरल वीडियो में नजर आ रही है।

जी हाँ, सोशल मीडिया पर वायरल इस वीडियो की तारीख पुख्ता नहीं है लेकिन इसे यूट्यूब पर एक साल पहले अपलोड किया गया था और अब यह ट्विटर पर जम कर शेयर की जा रही है। इस वीडियो को देख कर वो सारे भ्रम दूर होते हैं, जो पिछले दिनों शोएब अख्तर के लिए निर्मित कर लिए गए थे। इस वीडियो में वह इस्लामी कट्टरपंथ के परिचायक बने नजर आ रहे हैं और गजवा ए हिंद का बखान कर रहे हैं।

समा टीवी को दिए इंटरव्यू में शोएब कहते हैं, “ये हमारी पाक किताब में लिखा है कि गजवा ए हिंद आएगा। अटक की नदी दोबारा खून से लाल रंग की होगी। अफगानिस्तान की सेना अटक पहुँचेंगी। उसके बाद शमल मशरिक से सेनाएँ उठेंगी। अलग-अलग दल उज्बेकिस्तानन आदि से पहुँचेंगे… जो लाहौर तक फैले ऐतिहासिक क्षेत्र खोरासन को दर्शाता है। बाद में वह ताकतें कश्मीर को जीतेंगी और फिर बाद इंशाल्लाह काफिला बढ़ता (बाकी बचे भारत की ओर) रहेगा।”

बता दें कि शमाल मशरिक एक उर्दू शब्द है, जिसका इस्तेमाल अरब पेनिसुला से उत्तर में स्थित भौगोलिक क्षेत्र बताने के लिए किया जाता है।

गौरतलब है कि शोएब अख्तर द्वारा वीडियो में इस्तेमाल की गई भाषा उन्हीं आतंकियों द्वारा भी प्रयोग की जाती है, जो भारत पर हमला करते हैं। कई हमले गजवा-ए-हिंद के तहत अब तक भारत में किए जा चुके हैं। इसी नारे के तहत समुदाय के युवकों का ब्रेनवॉश होता है और फिर उन्हें आत्मघाती हमलावर बनाया जाता है।

कहते हैं कि इस नारे का मतलब समझाते हुए इस्लामी कट्टरपंथी युवकों को कयामत से पहले होने वाले एक युद्ध का पाठ पढ़ाया जाता है, जो हिंदू और मुस्लिमों में होगा और उसमें हिंदुओं के भारत पर मुस्लिम फतह हासिल करेंगे।

इस्लामी भविष्यवाणाी के मुताबिक सीरिया से यह लड़ाई शुरू होगी। काले झंडे के साथ फौज खुरासन से आएगी और भारत को एक इस्लामी मुल्क में तब्दील किया जाएगा। पाकिस्तान के बहुसंख्यक इसी गजवा ए हिंद के मकसद को पूरा करने के सपने देखते हैं। ऐसे ही मनसूबों के चलते है वह देश के अल्पसंख्यकों को काफिर मानते हैं और इस्लाम कबूल करवाना अपना मजहबी कर्तव्य मानते हैं।

कॉन्स्टेबल इबरार ने महिला और उसकी 3 साल की बच्ची को किया अगवा: रो-रोकर मदद माँगते पति का Video वायरल

पाकिस्तान में बहुसंख्यक आबादी के अत्याचारों की सूची असंख्य है। हाल में वहाँ एक मामला उजागर हुआ जिसमें एक पुलिस कॉन्स्टेबल ने ईसाई समुदाय की महिला आयशा और उसकी 3 साल बेटी का अपहरण कर लिया। महिला का पति सुल्तान मसीह जब पुलिस के पास पहुँचा तो आला अधिकारियों ने सुनवाई की बजाए यह कहकर उसे लौटा दिया कि उसकी पत्नी ने कॉन्स्टेबल से निकाह कर लिया है।

अपनी पत्नी की निकाह के बारे में सुनने के बाद सुल्तान मसीह का बुरा हाल है। उसने रोते हुए एक वीडियो जारी की है, जो इस समय सोशल मीडिया पर वायरल है। इस वीडियो को पाकिस्तान के सामाजिक कार्यकर्ता राहत ऑस्टिन ने भी शेयर किया है।

राहत लिखते हैं, “एक ईसाई सुल्तान मसीह अपनी 3 साल की बेटी और अपनी पत्नी आयशा की तस्वीरों को दिखाते हुए रो रहा है, जिन्हें बलात्कार और धर्म परिवर्तन के लिए पाकिस्तान के पंजाब की इस्लामिया कॉलोनी बहावलपुर, से अपहरण कर लिया गया। यहाँ धर्मांतरण केसों में कोई तलाक, इच्छा या कानूनी प्रक्रिया की जरूरत नहीं होती।”

बता दें कि, सुल्तान इस वीडियो में अपना नाम पता और कम्युनिटी बताते हुए जानकारी देते हैं, “मेरी बीवी आयशा किरण जिसकी उम्र 30 साल है और मेरी बेटी मल्का सुल्तान जिसकी उम्र तीन साल है, दोनों 6 दिसंबर से घर से लापता हैं। जब मैंने दोनों की तलाश शुरू की तो मुझे पता चला कि मेरी बीवी औऱ मेरी बेटी को मोहम्मद इबरार नाम के कॉन्स्टेबल ने अगवा कर लिया है। इसकी बाबत मैंने एक एप्लीकेशन डीपीओ को दी। फिर वो एप्लीकेशन डीएसपी साहब को दी गई।”

सुल्तान कहते हैं कि अगले दिन जब वह डीएसपी के पास गए तो उन्हें बताया गया कि उनकी बीवी ने कॉन्स्टेबल मोहम्मद इबरार के साथ निकाह कर लिया है। इसके बाद उनके सामने उनकी बीवी के धर्म परिवर्तन और निकाह का प्रमाण पेश किया गया। वह वीडियो में बोलते हैं, “मेरे साथ बहुत जुल्म हुआ है। मेरी मुसलमान भाई-बहनों से, तमाम ईसाई भाई-बहनों और वर्तमान हुकूमत से अपील है कि मेरे बच्चों को मुझे वापस दिलवा दिया जाए।”

यहाँ बता दें कि ये अपहरण, धर्म परिवर्तन की कहानी सिर्फ आयशा या उनकी बेटी की नहीं है। अभी हाल में एक अन्य ईसाई नाबालिग लड़की का अपहरण का मामला भी पाक के लाहौर से आया है। जहाँ एक 42 साल के व्यक्ति ने बलात्कार और धर्म परिवर्तन के लिए 13 साल की बच्ची का अपहरण कर लिया।

शक के दायरे में किसान संगठन की विदेशी फंडिंग: 2 महीने में आए लाखों, खुद के अकाउंट में पैसा डालना चाहते हैं नेता

दिल्ली में चल रहा तथाकथित किसान आंदोलन अपने 25वें दिन में प्रवेश कर गया है। सरकार लगातार बातचीत का प्रस्ताव दे रही है, लेकिन किसान संगठनों ने अड़ियल रवैया अपना रखा है। आंदोलन को खालिस्तानी, इस्लामी कट्टरपंथी और अतिवादी वामपंथी ताकतों द्वारा हाइजैक किए जाने की बात पहले ही सामने आ चुकी है। लालच देकर महिलाओं को सड़क पर लाने की बात भी सामने आई है। अब भारतीय किसान यूनियन (BKU एकता-उग्राहन) की विदेशी फंडिंग शक के घेरे में है।

तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे विरोध-प्रदर्शन में बड़ी भूमिका निभाने वाले BKU (एकता-उग्राहन) ने दावा किया है कि उसे एक केंद्रीय एजेंसी ने उस रजिस्ट्रेशन का विवरण साझा करने को कहा है, जिसके तहत उसे विदेशी फंडिंग पाने की अनुमति मिली हुई है। BKU (एकता-उग्राहन) के राष्ट्रीय अध्यक्ष जोगिंदर सिंह उग्राहन ने कहा कि NRIs और भारतीयों से उसे अपार समर्थन मिल रहा है, जिस कारण केंद्रीय एजेंसियाँ उसे निशाना बना रही है।

उन्होंने पूछा कि विदेश में ट्रक चलाने से लेकर मजदूरी करने वाले लोगों तक अगर हमें डोनेशन भेज रहे हैं तो इसमें समस्या क्या है? BKU (एकता-उग्राहन) का दावा है कि उसे पिछले 2 महीनों में 8 लाख रुपए की फंडिंग मिली है, लेकिन उसे इसका कोई अंदाज़ा नहीं है कि इसमें से कितना विदेश से आया है। 6 दिसंबर 2020 को BKU (एकता-उग्राहन) ने एक अपील जारी कर विरोध-प्रदर्शन को आगे बढ़ाने हेतु फंडिंग की अपील की थी।

अब संगठन चाहता है कि उसे डोनेशन के रूप में जितनी भी धनराशि मिली है, उसे भारतीय किसान यूनियन के महासचिव सुखदेव सिंह कोकरिकलाँ के व्यक्तिगत बैंक एकाउंट में ट्रांसफर किया जाए। उन्होंने इसकी पुष्टि की है कि उनका बैंक खाता FCRA (विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम) के तहत रजिस्टर्ड है। ‘पंजाब एंड सिंध बैंक’ के फॉरेन एक्सचेंज विभाग ने भी बैंक खाते में आ रही फंडिंग को लेकर सवाल खड़े किए हैं।

शनिवार (दिसंबर 19, 2020) को रजिस्ट्रेशन की अंतिम तारीख थी, लेकिन अब वो भी चली गई। विशेषज्ञों का भी कहना है कि BKU (एकता-उग्राहन) ने FCRA के नियमों का पालन नहीं किया है, ऐसे में उसे आई विदेशी फंडिंग वापस दानदाताओं के एकाउंट्स में लौट सकती है। बैंक अधिकारियों का कहना है कि बिना केंद्रीय गृह मंत्रालय के समक्ष रजिस्ट्रेशन कराए कोई भी व्यक्ति या संगठन विदेशी फंडिंग नहीं प्राप्त कर सकता।

फ़िलहाल BKU (एकता-उग्राहन) ने अपने वकीलों से एक जवाब तैयार करने को कहा है। संगठन को लग रहा है कि विदेशी फंडिंग के लिए उसे सरकारी एजेंसियों से समन मिल सकता है, इसलिए पहले से ही जवाब की तैयारी की जा रही है। संगठन ने आरोप लगाया है कि सरकार बैंकों से जानकारी माँग रही है कि उसे कितनी फंडिंग मिली है। हालाँकि, सरकार की तरफ से ऐसा कुछ नहीं कहा गया है।

कुछ दिनों पहले इसी तरह ‘भारतीय किसान यूनियन (BKU) के भानु गुट के नेताओं में तकरार की खबर आई थी। प्रदेश अध्यक्ष योगेश प्रताप ने किसान नेता व संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष भानु प्रताप सिंह की बात मानने से इनकार कर दिया था। अब कई किसान सड़कों पर तीनों कृषि कानूनों के समर्थन में भी उतर आए हैं। उन्होंने कहा है कि ये कानून किसानों के हित में हैं और वो भी इसके समर्थन में बैठे रहेंगे।

व्यंग्य: अयोध्या में मस्जिद की जगह स्कूल या अस्पताल बनाने की माँग, गरीब देंगे दुआ

बाबरी न रही मगर अब अयोध्या में बाबरी से भी चार गुना बड़ी मस्जिद बनने जा रही है। बताया जा रहा है कि पाँच एकड़ जमीन पर मस्जिद के साथ ही अस्पताल भी बनाया जाएगा। सबसे बड़ी बात यह है कि यहाँ पर एक समय में दो हजार लोग नमाज पढ़ सकेंगे। लेकिन देश का उदारवादी वर्ग इस सबसे बेहद नाराज है।

लिबरल समुदाय का कहना है कि एक ओर जहाँ उन्हें हर साल धरना-प्रदर्शन के लिए नई जगह तलाश करनी पड़ रही हैं, क्या समुदाय विशेष की ये जिम्मेदारी नहीं थी कि वह धरना प्रदर्शनकारियों के नाम यह पाँच एकड़ जमीन कर देती।

वामपंथी, लिबरल्स और फेसबुक एनार्किस्ट गिरोह का कहना है कि जहाँ वो हमेशा ढपली बजा बजाकर मंदिर और मस्जिद की जगह अस्पताल, स्कूल बनाने की वकालत करते रहे, ऐसे में पाँच एकड़ जमीन पर मस्जिद का बनाया जाना उनके मानवाधिकारों की निर्मम हत्या है।

एक प्रगतिशील लिबरल और ट्विटर विचारक ने कहा कि मस्जिद की जगह यहाँ पर मानवाधिकार कार्यालय भी बनाया जा सकता था लेकिन इतनी बड़ी जगह को मजहब के नाम पर कुर्बान कर दिया जाना बताता है कि हम आज भी कितने पिछड़े हुए हैं। ‘वोक सुशील’ ने नाम न बताने की शर्त पर कहा कि एक समाज के तौर पर शर्मिंदा हैं।

गौरतलब है कि मस्जिद को पृथ्वी की तरह ही गोल आकार में बनाया जाना तय हुआ है। ऐसे में कुछ मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने हैरानी जताते हुए कहा है कि अगर कोई मजहब पृथ्वी को आज तक चपटा मानता आया है, उसकी ही एक पाक जगह को गोल बनाकर उसे पृथ्वी का आकार बताना देश में बढ़ती हुई असहिष्णुता का परिचायक है। उन्होंने कहा कि जरुर इस आकृति को बनाने के पीछे आरएसएस का भी हाथ है।

समुदाय विशेष का वर्ग ऐसा भी है को अभी तक भी इस पाँच एकड़ जमीन को भीख में मिली जमीन बताते हुए अपनी प्रतिक्रिया रख रहा है। कुछ लोगों का कहना है कि अगर इस पूरी जमीन को गरीबों के रहने के लिए बनाया जाता तो गरीब भी मजहब वालों को दुआ देते। इस पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने लोगों को बीच में टोकते हुए कहा कि शेल्टर होम बनाने का आइडिया सबसे पहले उन्होंने ही दिया था।

लिबरल्स का कहना है कि वो इसके खिलाफ भी धरना-प्रदर्शन करने की योजना बना रहे हैं क्योंकि फिलहाल सभी लोग कथित किसान आंदोलन में किसानों के साथ सेल्फी लेने में व्यस्त हैं। लिबरल्स गिरोह का कहना है कि वो अयोध्या में बनने जा रही मस्जिद की जगह गरीबों के लिए स्कूल और पूरी पाँच एकड़ जमीन पर अस्पताल बनाने के लिए जमकर ढपली बजाएँगे और इंटरनेट पर पिटीशन दायर करेंगे। कुछ लोगों को यह भी भय है कि नई मस्जिद के लिए नींव खोदते समय कहीं बुनियाद में बैठा बाबर बिरियानी बनाते ना मिल जाए।