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8 घंटे पहले अपंग हुई दुल्हन, दूल्हे ने रचाई स्ट्रेचर पर शादी: फिल्म ‘विवाह’ जैसी है असल जिंदगी की यह प्रेम कहानी

अक्सर आपने दहेज की माँग पूरी न होने या बारातियों की खातिरदारी सही से न होने पर मंडप पर या जयमाल होने के बावजूद शादी टूटने की खबर सुनी होगी, लेकिन हाल ही में प्रतापगढ़ के कुंडा इलाके में हुई एक अनोखी शादी ने इंसानियत और मोहब्बत की ऐसी मिसाल पेश की है, जिसे लोग बरसों तक याद रखेंगे।

15 साल पहले रिलीज हुई शाहिद कपूर और अमृता राव की फिल्म ‘विवाह’ की ही तरह यहाँ भी शादी के फेरों से महज 8 घंटे पहले एक हादसे में दुल्हन के पूरी तरह अपंग हो जाने के बावजूद दूल्हे अवधेश ने लड़की को कबूल कर जिंदगी भर उसका साथ देने की कसम खाई। इतना ही नहीं विवाह के लिए तय तारीख पर ही पत्नी को एम्बुलेंस से उसके घर बुलाकर स्ट्रेचर पर लेटी हुई हालत में उसने शादी की सभी रस्में भी अदा की। असली जिंदगी पर आधारित इस शादी के बारे में जिसने भी सुना उसकी आँखें भर आई।

साभार:सोशल मीडिया

कैसे हुआ हादसा

जिले के कुंडा इलाके की रहने वाली आरती मौर्य की शादी नजदीक के ही एक गाँव के अवधेश के साथ तय हुई थी। परिवार में जोरो-शोरो से शादी की तैयारियाँ चल रही थी। नाच गाना चल रहा था। रिश्तेदारों का आना शुरू हो चुका था। सबकुछ अच्छे से चल रहा था। बारात 8 दिसंबर को आनी थी। लड़का और लड़की दोनों पक्षों में विवाह से पहले की ज्यादातर रश्में हो चुकी थी। शादी का दिन भी आ गया और बारात की तैयारी होने लगी। परिवार के सदस्य मेहमाननवाजी में जुटे थे।

तभी एक ऐसा हादसा हुआ जिसनें खुशी के माहौल को मातम में बदल दिया। दोपहर के 1 बजे एक बच्चे को बचाने के चक्कर में दुल्हन आरती का पैर फिसल गया और वह छत से नीचे गिर गई। हादसे में आरती के रीढ़ की हड्डी पूरी तरह टूट गई। कमर और पैर समेत शरीर के दूसरे हिस्सों में भी चोट आई। आलम यह था कि पड़ोस के अस्पतालों ने आरती का इलाज करने से हाथ खड़े कर दिए। परेशान और घबराए घर वाले आरती को इलाज के लिए प्रयागराज के एक निजी अस्पताल में ले गए। हादसे के बाद शादी वाले घर में कोहराम मच गया। सभी का मनोबल टूट चुका था।

अस्पताल में एक्स रे के बाद मालूम चला कि उसके पाँव में फ्रैक्चर हो गया है और रीढ़ की हड्डी टूट गई है। घटना की सूचना दूल्हे के घर वालों को भी दी गई। खबर मिलते ही दूल्हा अवधेश और बाकी बाराती दुल्हन को देखने अस्पताल पहुँचें। खास बात ये कि दुल्हन के पक्ष के लोगों ने अवधेश से कहा कि वह आरती की जगह उसकी बहन से शादी कर लें लेकिन अवधेश ने कहा कि वह उससे ब्याह रचाएँगे जिससे कि तय हुआ है।

साभार: सोशल मीडिया

दूल्हे के इस फैसले को सुनकर सभी सन्न रह गए। वहीं लड़की के परिजनों के आँखों से आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। अस्पताल में डॉक्टरों को जब आरती की शादी की बात बताई गई तो डॉक्टरों ने उसे स्ट्रेचर पर घर ले जाने की अनुमति दे दी। जिसके बाद अवधेश और आरती की शादी हुई। स्ट्रेचर पर लेटे-लेटे आरती ने फेरे लिए। ऑक्सीजन और ड्रिप लगी होने की सूरत में ही उसकी माँग भरी गई। आम दुल्हनों की तरह आरती की भी विदाई हुई। यह अलग बात है कि ससुराल जाने के बजाय वह वापस अस्पताल लाई गई।

साभार:आजतक

अगले दिन होने वाले ऑपरेशन के फॉर्म पर खुद अवधेश ने पति के तौर पर दस्तखत किए। फिलहाल अस्पताल में आरती का इलाज चल रहा है। लड़की के ससुराल वालों का कहना है कि दुल्हन के इलाज में जो भी खर्चा आएगा वह उनके द्वारा उठाया जाएगा। तो दुल्हन के परिजनों का कहना है कि एक बार आरती ठीक हो जाए तो धूमधाम से बाकी रश्में करेंगे। वैसे एक बात तो किसी ने सही कही है कि जोड़ी ऊपर वाला बनाता है और उस रिश्ते को निभाने की हिम्मत भी वो दोनों को देता है।

साभार : आजतक

‘…उन्हें भी माओवादी बता देंगे’ – ₹430 करोड़ की लूट को जायज बता रहा रवीश, जबकि पकड़ाया वामपंथी

शनिवार सुबह-सुबह विस्ट्रॉन के iPhone मैन्यूफैक्चरिंग प्लांट में हुई हिंसा के संबंध में वामपंथी संगठन ‘स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया’ (SFI) के एक स्थानीय अध्यक्ष को गिरफ्तार किया गया। कॉमरेड श्रीकांत कोलार में एसएफआई का अध्यक्ष है। भाजपा सांसद एस मुनीस्वामी द्वारा दावा किया गया था कि हिंसा के पीछे एसएफआई का हाथ था। कॉमरेड श्रीकांत कोलार हिंसा भड़काने के लिए बाहर से लोग लेकर प्लांट में घुसा था।

वहीं, वामपंथी प्रोपेगेंडा पत्रकार रवीश कुमार का एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है, जिसमें उन्होंने एक प्रकार का ‘कवितामयी कथानक’ पेश करते हुए इन दंगों और हिंसा को जायज ठहराने की कोशिश की है।

रवीश ने अपने वीडियो में दावा किया कि आईफ़ोन निर्माता कम्पनी विस्ट्रोन में की गई तोड़फोड़ वहाँ काम कर रहे कर्मचारियों द्वारा सैलरी न मिलने के कारण की गई थी। इस वीडियो में रवीश कह रहे हैं,

“ये कंपनी ताइवान की है जहाँ दस हजार से ज्यादा लोगों को सैलरी नहीं दी जा रही या फिर कम कर दी गई। शनिवार को इन कर्मचारियों ने प्लांट के भीतर हंगामा कर दिया। इस कम्पनी ने दावा किया है कि साढ़े चार सौ करोड़ का नुकसान हुआ है। आर्थिक दबाव लोगों की जिन्दगी में किस कदर घुस आया है कि वो अब प्लांट के भीतर हिंसा करने पर उतारू हैं। उनके बारे में बात नहीं की जा रही न वो चर्चा के केंद्र में आ रहे हैं, जिस दिन आ जाएँगे, लोग उसे दिन उन्हें भी कहेंगे कि ये माओवादी हैं और ये टुकड़े-टुकड़े गैंग के हैं।”

मजेदार बात यह है कि रवीश ने इस हिंसा को सिर्फ जायज नहीं ठहराया बल्कि तंज करते हुए यह भी कहा कि इस हिंसा के पीछे शामिल लोगों को माओवादी या टुकड़े-टुकड़े गैंग का बता दिया जाएगा।

अब जब वामपंथी संगठन के नेता कॉमरेड श्रीकांत का नाम इस हिंसा के पीछे सामने आया है, तो क्या रवीश कुमार यह बात दोहरा पाएँगे? यह भी बड़ा सवाल है कि रवीश कुमार इसी तरह से हर हिंसा को कविता गा-गाकर जायज ठरना चाहते हैं?

उल्लेखनीय है कि भारत में विदेशी निवेश से डरने वाली कंपनियों के लिए कानून व्यवस्था एक बहुत बड़ा मुद्दा होती है। ऐसे में, एक भाजपा शासित प्रदेश में, जब कथित तौर पर वामपंथी संगठन वाले नेता बाहर से गुंडों को ला कर तोड़-फोड़ करते हैं, और ठीकरा ‘कर्मचारियों’ के सर फोड़ा जाता है, तब कम्पनियाँ यहाँ निवेश करने से हिचकती हैं।

इसे वामपंथी प्रोपेगेंडा पत्रकार रवीश ऐसे डिफेंड कर रहे हैं, जैसे हर गरीब को आर्थिक दबाव में आ कर फ़ैक्टरियाँ लूट लेनी चाहिए। अगर एक तरफ हिंसा और लूट होती रही, और दूसरी तरफ रवीश जैसे लोग बकैती करते हुए उसे जायज ठहराते रहें, तो बाहरी कंपनी किसी और भाजपा शासित राज्य (जैसे कि उत्तर प्रदेश) में निवेश करना चाहे, तो उसके लिए ऐसा एक वीडियो काफी है कि भाजपा वाले तो फ़ैक्टरियाँ लुटवा देते हैं।

जब ममता बनर्जी के सिर पर लालू ने बरसाई लाठियाँ, 16 टाँके लगे थे: क्या कार्यकर्ताओं के खून पर खड़ी होगी BJP?

पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के खिलाफ आयोजित मार्च के दौरान जान गँवाने वाले बीजेपी कार्यकर्ता का शव 9 दिन बाद जलपाईगुड़ी स्थित उनके घर पहुँचा। उलेन राय की मौत को लेकर बीजेपी ने बंगाल पुलिस पर टीएमसी गुंडों की तरह काम करने का आरोप लगाया था।

बंगाल में राजनीतिक हिंसा की भेंट चढ़ने वाले उलेन राय अकेले बीजेपी कार्यकर्ता नहीं है। संडे गार्डियन की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस साल जनवरी से 11 सितंबर तक बंगाल में कम से कम 14 बीजेपी कार्यकर्ताओं ने कथित तौर पर टीएमसी के हमलों में अपनी जान गँवाई। अक्टूबर के अंत में प्रकाशित एक मीडिया रिपोर्ट में बीजेपी बंगाल के महासचिव सायंतन बसु के हवाले से बताया गया है कि 2013 के बाद से राज्य में 123 पार्टी कार्यकर्ताओं की हत्या हुई है।

पत्रकार से बीजेपी नेता बने स्वप्न दासगुप्ता ने अक्टूबर की शुरुआत में यह संख्या 110 बताई थी। जुलाई 2020 में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने एक बुकलेट जारी की थी, जिसमें बीते 7 साल में राजनीतिक हिंसा में मारे गए 93 कार्यकर्ताओं का उल्लेख था। इनमें 5 महिलाएँ भी थीं। इस बुकलेट के हिसाब से सबसे ज्यादा बीजेपी कार्यकर्ता 2018 में मारे गए जब राज्य में पंचायती चुनाव होने थे।

राज्य में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं और एक बार फिर राजनीतिक हिंसा का सिलसिला तेज हो गया है। इसी 8 दिसंबर को स्वप्न दास नामक बीजेपी कार्यकर्ता का शव तूफानगंज के एक स्कूल बिल्डिंग में लटका मिला था। अपने हालिया बंगाल दौरे के दौरान बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा था कि तृणमूल कॉन्ग्रेस की राजनीतिक हिंसा के कारण पार्टी के 130 कार्यकर्ता अपनी जान गँवा चुके हैं, जिनमें से 100 कार्यकर्ताओं का तर्पण उन्होंने स्वयं किया है। दिलचस्प यह है कि इसी दौरे के दौरान नड्डा के काफिले को भी निशाना बनाया गया था। इस दौरान पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और बंगाल प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय की गाड़ी का शीशा चकनाचूर हो गया था।

वैसे तो बंगाल में राजनीतिक हिंसा नई बात नहीं है। लेकिन यह हैरान इसलिए करती है, क्योंकि मौजूदा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद इसकी पीड़ित रही हैं। आज उनकी सरपरस्ती में ही इसके परवान चढ़ने के आरोप लग रहे हैं। तो सवाल उठता है कि क्या राज्य में बीजेपी अपने कार्यकर्ताओं के खून पर ही खड़ी होगी?

इस सवाल का जवाब तलाशने से पहले 16 अगस्त 1990 की उस घटना पर नजर डालते हैं जिसमें ममता बनर्जी मरते-मरते बचीं थीं। यह जिस समय की बात है उस समय तृणमूल कॉन्ग्रेस का अस्तित्व नहीं आया था। ममता कॉन्ग्रेस (आई) की नेता थीं। तब कलकत्ता भी कोलकाता नहीं हुआ था और बंगाल में वामपंथियों का एकछत्र राज था। कॉन्ग्रेस (आई) ने सरकारी बस-ट्राम किराए में वृद्धि के खिलाफ 12 घंटे के कलकत्ता बंद का ऐलान किया था। इसी दौरान सत्ताधारी सीपीएम के गुंडों ने हमला किया। ममता बनर्जी को इतनी बेरहमी से पीटा गया कि उनके सिर में 16 टाँके लगे। बाँह पर प्लास्टर चढ़ा। ममता के सिर पर लाठियों की बरसात करने का आरोप सीपीएम के बाहुबली वर्कर लालू आलम पर लगा, जो तत्कालीन सरकार के नंबर दो बुद्धदेव भट्टाचार्य (जो बाद में मुख्यमंत्री भी बने) का खास बताया जात था।

दिवंगत सुषमा स्वराज ने 1996 में संयुक्त मोर्चा सरकार की विश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान इस घटना का जिक्र करते हुए लोकसभा में कहा था, “मुझे वह दृश्य जस का तस याद है। मेरी आँखों में वह दृश्य बसा हुआ है। एक व्हीलचेयर के ऊपर ममता बनर्जी को लाया गया। यहीं बैठी हुई थीं वो। चोटों से आए बुखार के कारण काँप रहीं थी। बराबर में बैठी दो सांसद महिलाओं ने उन्हें लाल कंबल ओढ़ाया था।”

वामपंथियों की राजनीतिक हिंसा से लड़ते-लड़ते जब ममता बनर्जी 2011 में सत्ता में आई तो उम्मीद थी कि यह सिलसिला बंद होगा। वो तस्वीरें भी सामने आईं थी, जिसमें लालू आलम मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से 1990 की अपनी गलती के लिए गिड़गिड़ाकर माफी माँग रहा था। 2019 में इस मामले में आलम को अदालत ने आरोप मुक्त भी कर दिया था। इसके बाद आलम ने कहा था कि उस समय सीपीएम ने उसे बलि का बकरा बनाया था।

यह बात भी सामने आई थी कि बाद में ममता खुद इस मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहती थीं। लेकिन, ऐसा लगता नहीं कि 16 अगस्त 1990 की उस घटना से उन्होंने कोई सबक सीखा। बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने इसे राजनीतिक विरोधियों को कुचलने का हथियार ही बना लिया है।

कई मायनों में इस मोर्चे पर वह वामपंथियों से भी आगे निकलती नजर आ रही हैं। 16 अगस्त 1990 की उस घटना के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने यह भी माना था कि बंद असरदार रहा और हिंसा करने वालों पर पुलिस को तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए थी। इसके उलट नड्डा के काफिले पर हमले के बाद ममता ने केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा तलब किए गए अधिकारियों को भेजने से इनकार कर दिया था। हिंसा को जायज ठहराने की कोशिश करते हुए कहा था, “उनके (बीजेपी) पास कोई और काम नहीं है। अकसर गृह मंत्री यहाँ होते हैं, बाकी समय उनके चड्डा, नड्डा, फड्डा, भड्डा यहाँ होते हैं। जब उनके पास कोई दर्शक नहीं होता है, तो वे अपने कार्यकर्ताओं को नौटंकी करने के लिए कहते हैं।”

सत्ता में रहते चीजों को देखने का नजरिया बदल जाता है। संभव है कि ममता बनर्जी भी उन लाठियों को भूल गई हों जिन्हें खाकर बाद में उनका नेतृत्व चमका था। हिंसा का यह सिलसिला बीजेपी के उभार की वजह बन सकता है। वैसे भी इतिहास खुद को दोहराता ही है।

यह बाबा की हैंडराइटिंग नहीं, वे खुद को गोली नहीं मार सकते: ‘सुसाइड’ करने वाले संत राम सिंह की नर्स

कृषि कानूनों के कथित विरोध में दिल्ली में चल रहे किसान आंदोलन के जरिए केंद्र सरकार को नकारात्मक रूप से पेश करने की कोशिश हो रही है। संत बाबा राम सिंह की मृत्यु के बाद सोशल मीडिया पर मोदी सरकार को क्रूर दिखाने के लिए तरह-तरह के पोस्ट किए गए। उनकी मृत्यु को शहादत से जोड़ा गया। कई राजनैतिक पार्टियों ने इसे आधार बना कर केंद्र सरकार को धिक्कारा। लेकिन संतराम की एक अनुयायी, जो पेशे से नर्स हैं ने इस पर सवाल उठाए हैं। वे कथित तौर पर बाबा का इलाज भी करती थीं।

सोशल मीडिया पर संत राम सिंह की आत्महत्या की खबरों के साथ-साथ इस नर्स की ऑडियो वायरल हो रही है। इसमें नर्स एक पंजाबी न्यूज चैनल को बता रही हैं कि वह लंबे समय से बाबा संत राम से जुड़ी हुई थीं। ये जो खबर आ रही है कि बाबा ने खुद को गोली मारी वो गलत है।

वह कहती हैं कि बाबा खुद को गोली मार ही नहीं सकते। इसके अलावा जो बाबा के नाम पर सुसाइड नोट जारी किया गया है, वह उनका नहीं है। यह उनकी हैंडराइटिंग नहीं है। वह कहती हैं कि जो शख्स सब को डटे रहने की सलाह देता हो, वो खुद को मार ही नहीं सकता।

अमरजोत कौल नाम की महिला के इस दावे के बाद बाबा संत राम सिंह की ‘आत्महत्या’ वाले दावे पर सवाल उठने लगे हैं। लोगों का पूछना है कि यदि सुसाइड नोट में लिखी गई राइटिंग बाबा की नहीं है तो इस बात की कैसे पुष्टि होगी कि उन्होंने आत्महत्या की या फिर उन्हें मारा गया। सोशल मीडिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं कि जब संत आत्महत्या जैसा अपराध कर ही नहीं सकते थे तो कहीं ये किसी की कोई साजिश तो नहीं?

बता दें कि कल से लेकर अब तक सोशल मीडिया पर इस मुद्दे पर तरह-तरह की बातें हुई हैं। विपक्षी पार्टियों ने हमेशा की तरह इस मुद्दे को भी खूब भुनाया। मोदी सरकार को क्रूर दिखाने के लिए ऐसे बिंदु ऱखे गए कि कोई भी शख्स अपने भीतर सरकार से नफरत करने लगे। लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर संत बाबा की मृत्यु को सोशल मीडिया ने किस आधार पर सुसाइड घोषित किया? क्या उनके परिजनों से इस संबंध में कोई बात हुई? या सिर्फ एक नोट के आधार पर उनकी अप्राकृतिक मौत को आत्महत्या घोषित कर दिया गया।

एक ऐसी घटना जिसे लेकर अमरजोत कौल जैसे बाबा के परिचित सवाल उठा रहे हैं, क्या उस पर आधिकारिक पुष्टि होना मीडिया के लिए कोई मायने नहीं रखता? क्या विपक्ष इतना अधीर हो गया है कि उनका सरोकार सिर्फ किसी मृत्यु पर राजनीति करने तक शेष है?

किसान आंदोलन की बाबत दावा किया जा रहा है कि अब तक कई किसान अपनी जान गँवा चुके हैं लेकिन सरकार के कान पर जूँ नहीं रेंग रही। राहुल गाँधी जैसे कॉन्ग्रेसी नेता मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कह रहे हैं कि मोदी सरकार क्रूरता की हर हद पार कर चुकी है। इसलिए अब वह जिद्द छोड़कर तुरंत कृषि विरोधी कानून वापस लेंं।

पालघर जैसी घटनाओं पर बिलकुल मौन रहने वाले कॉन्ग्रेस के रणदीप सुरजेवाला भी संत की कथित आत्महत्या पर सवाल उठाते हैं,

“हे राम, यह कैसा समय। ये कौन सा युग। जहाँ संत भी व्यथित हैं। संत राम सिंह जी सिंगड़े वाले ने किसानों की व्यथा देखकर अपने प्राणों की आहुति दे दी।”

रणदीप सुरजेवाला ने आगे कहा कि ये दिल झकझोर देने वाली घटना है। प्रभु उनकी आत्मा को शांति दें। उनकी मृत्यु, मोदी सरकार की क्रूरता का परिणाम है।

विचार करने वाली बात है कि दिल्ली मे चल रहे कृषि आंदोलन पर कॉन्ग्रेस जैसी पार्टी संवेदना दिखा रही है, जिनका अपने शासित राज्यों में किसानों के प्रति रवैया ढुलमुल रहा है। यदि याद हो तो ज्यादा समय नहीं बीता जब एक किसान ने आत्महत्या की थी और वीडियो में कह कर गया था कि उसकी मौत का जिम्मेदार कॉन्ग्रेस नेताओं को माना जाए।

क्या एक जैसी स्थितियों में कॉन्ग्रेस का दोहरा रवैया इनकी मंशा पर सवाल नहीं उठाता। क्या उन तथाकथित किसान नेताओं की बात पर विश्वास करना सही है जो कुछ समय पहले तक सरकार से अपील कर रहे थे कि ऐसे कानून लाए जाएँ और अब उन्हीं के विरोध में चक्का-जाम करने की धमकी दे रहे हैं।

बात यदि केवल इस प्रदर्शन की है तो केंद्र सरकार कम से कम किसानों से बातचीत करके समस्या का समाधान करने के आगे तो आ रही है, लेकिन विपक्ष क्या कर रहा है? वह सिर्फ़ एजेंडा चलाने के लिए बेचैन हैं। संत राम सिंह की मृत्यु पर कहीं से भी एक सवाल तक का न उठना इसी बात का प्रमाण है कि इन लोगों ने ठान लिया है आसपास होने वाली हर मृत्यु को किसान आंदोलन में आहूति की तरह दिखाया जाएगा और एक बार भी नहीं पूछा जाएगा कि आखिर सुसाइड नोट पर क्यों सवाल उठे? इसके पीछे का सच क्या है? अगर वाकई ये एक आत्महत्या है और बाबा ने खुद को स्वयं गोली मारी तो वो बंदूक कहाँ हैं? क्या उनके करीबियों से एक भी बार पुष्टि नहीं होनी चाहिए? मामले की जाँच नहीं होनी चाहिए?

शाहीन बाग दोबारा: किसान आंदोलन की राजनीति की बलि चढ़ा बुजुर्ग, सिंघू बॉर्डर पर हुई मौत

हाल फ़िलहाल में सामने आई तमाम ख़बरों से स्पष्ट है कि दिल्ली हरियाणा बॉर्डर पर जारी किसानों का विरोध प्रदर्शन ‘शाहीन बाग़’ बनने की राह पर है। चाहे वह कट्टरपंथियों की तस्वीरें लेकर उनकी रिहाई की माँग करना हो या प्रदर्शनकारियों द्वारा मीडियाकर्मियों पर हमला की कोशिश हो। इसी कड़ी में एक प्रदर्शनकारी किसान की मौत की ख़बर सामने आई है, उसकी मौत की वजह ठंड बताई जा रही है।   

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ मृतक प्रदर्शनकारी के तीन बच्चे भी थे। इसके पहले किसानों के धरने में शामिल संत राम सिंह ने खुद को कथित तौर पर गोली मार ली थी, जिससे उनकी मौत हो गई थी। बाबा राम सिंह मूल रूप से करनाल के रहने वाले थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने पंजाबी में लिखा एक सुसाइड नोट भी छोड़ा था। बताया जा रहा था कि संत राम सिंह दिल्ली बॉर्डर पर किसानों को कंबल बाँटने गए थे। 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ नवंबर अंत से शुरू हुए किसानों के विरोध प्रदर्शन में अब तक लगभग 20 किसानों की मृत्यु हो चुकी है। बीते दिन (16 दिसंबर 2020) कृषि कानून के ख़िलाफ चल रहे किसान आंदोलन से भी मीडिया पर हमले की तस्वीर सामने आई थी। इस बार हमला रिपब्लिक भारत की पत्रकार शाजिया निसार और जी न्यूज की एक महिला पत्रकार पर हुआ था। रोजी नाम की वकील ने शाजिया पर और जी न्यूज की महिला रिपोर्टर पर हुए हमले की वीडियो को शेयर करते हुए घटना को शर्मनाक बताया था। उन्होंने कहा था कि जैसे शाहीन बाग में किया गया था वैसा ही किसान आंदोलन में हो रहा है। 

ठीक इसी तरह सीएए और एनआरसी के खिलाफ़ हुए प्रदर्शन के दौरान कई बच्चों की मौत हुई थी। इसमें सबसे ज़्यादा उल्लेखनीय थी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर की घटना, जिसमें 43 दिन की दुधमुँही बच्ची की मृत्यु हो गई थी। जिले के देवबंद स्थित ईदगाह में सीएए और एनआरसी विरोधी प्रदर्शन जारी था जहाँ इस बच्ची की मृत्यु हुई थी, मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ इस दुधमुॅंही बच्ची को लेकर उसकी मॉं रोज प्रदर्शन में शामिल हो रही थी। इस तरह की कई घटनाएँ हुई थीं जिनमें बच्चों के अलावा कई निर्दोष लोगों की इस प्रदर्शन से पनपी अव्यवस्था के चलते मृत्यु हुई थी। 

और तो और तमाम कट्टरपंथी इस तरह की मौतों को कुर्बानी बता कर प्रलाप कर रहे थे, साथ ही इन मौतों की आड़ लेकर प्रदर्शन को को बढ़ावा दे रहे थे। ठीक ऐसा ही किसानों के विरोध प्रदर्शन में भी हो रहा है, यहाँ तक कि आंदोलन की आड़ में अपनी नफ़रत का नमूना पेश करते हुए छोटे बच्चों से नारे लगवाए जा रहे हैं। देश के संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के लिए सार्वजनिक रूप से जहर उगलवाया जाता है। जैसे शाहीन बाग में हो रहा था।  

आप एक शहर को बंद नहीं कर सकते: सुप्रीम कोर्ट ने किसान आंदोलन पर बनाई कमिटी

देश की राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर डटे किसानों का आंदोलन आज 22वें दिन भी जारी है। किसान केंद्र सरकार द्वारा लागू तीन नए कृषि कानूनों को वापस लेने की माँग पर डटे हैं। कानूनों के विरोध में दिल्ली सीमा पर डटे किसानों को हटाने से संबंधित याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में आज फिर सुनवाई हो रही है। कोर्ट ने ‘कानून की वैधता’ पर फिलहाल सुनवाई करने से मना कर दिया है।

तीन कृषि कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ का कहना है कि यह फिलहाल ‘कानूनों की वैधता’ तय नहीं करेगी। चीफ जस्टिस ने सबसे पहले पूछा कि हरीश साल्वे किसकी ओर से पेश हो रहे हैं और भारतीय किसान यूनियन की ओर से कौन पेश हो रहा है?

CJI ने कहा कि दुष्यंत तिवारी को छोड़कर कल (पीआईएल में किसानों के विरोध में) दिखाई देने वाले सभी अधिवक्ता आज नहीं दिख रहे हैं। उन्होंने कहा कि वो साल्वे, परिहार और अन्य याचिकाकर्ताओं (किसानों के विरोध में जनहित याचिका) पर सुनवाई करेंगे।

बृहस्पतिवार (दिसंबर 17, 2020) को दूसरे दिन की सुनवाई शुरू करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहली और एकमात्र चीज़ जो आज हम तय करेंगे, वह है किसानों का विरोध और नागरिकों के मौलिक अधिकार। कोर्ट ने कहा कि ‘कानून की वैधता’ का सवाल इंतजार कर सकता है।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “एक विरोध तब तक संवैधानिक है जब तक कि यह सार्वजनिक संपत्ति या किसी के जीवन को नुकसान नहीं करता। केंद्र और किसानों से बात करनी होगी, हम एक निष्पक्ष और स्वतंत्र समिति के बारे में सोच रहे हैं, जिसके समक्ष दोनों पक्ष अपनी कहानी का पक्ष दे सकते हैं।”

सबसे पहले हरीश साल्वे ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि इस प्रदर्शन के कारण दिल्लीवासी प्रभावित हुए हैं, ट्राँसपोर्ट पर प्रभाव के कारण सामान का मूल्य बढ़ रहा है और अगर सड़कें बंद रहती हैं तो दिल्ली वालों को काफी समस्या का सामना करना होगा।

हरीश साल्वे ने कहा कि प्रदर्शन के अधिकार का मतलब यह नहीं कि शहर ही बंद कर दिया जाए। इस पर चीफ जस्टिस की ओर से कहा गया कि हम इस मामले में देखेंगे कि किसी एक विषय की वजह से दूसरे के जीवन पर असर नहीं पड़ा चाहिए। उन्होंने कहा कि एक के मौलिक अधिकार से दूसरों के मौलिक अधिकारों को बैलेन्स किया जाना चाहिए। साल्वे ने यह भी कहा कि यह सही समय है जब इस अदालत को ‘विरोध के अधिकार’ के संदर्भ में घोषणा करनी चाहिए।

अदालत में प्रदर्शनकारियों द्वारा सड़क जाम करने केविषय पर भी बहस हुई। CJI ने सवाल किया कि क्या किसीने ये कहा कि वो दिल्ली की सभी सड़कें बंद कर देंगे। इस पर अटोर्नी जर्नल ने जवाब में कहा कि टिकरी, सिंघु ब्लाक कर दी गई हैं।

साल्वे ने कहा कि कोरोना काल में लोगों की जिंदगी खतरे में डाली जा रही हैं और भीड़ की हरकतों के लिए उन संगठनों को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, जिनके कहने से यह सब किया जा रहा है। इसके लिए हरीश साल्वे ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले का उदाहरण दिया जिसमें सार्वजानिक नुकसान पहुँचाने के लिए शिवसेना पर जुर्माना लगाया गया।

इस विषय पर CJI और वकील हरीश साल्वे की बहस –

CJI: क्या आप जानते हैं कि शिवसेना के खिलाफ बॉम्बे HC के फैसले का क्या हुआ?
साल्वे: मुझे लगता है कि इस अदालत ने हस्तक्षेप नहीं किया।
CJI: क्या जुर्माना वसूला गया?
साल्वे: मुझे पता है कि जुर्माना नहीं वसूला गया है।

इस पर अदालत ने कहा कि क्या आपको लगता है कि विरोध से पहले नुकसान की भरपाई करवाई जानी चाहिए? कोर्ट के सवाल के जवाब में हरीश साल्वे ने कहा, “मैंने ऐसा नहीं कहा लेकिन उन्हें पहचान लिया जाना चाहिए।”

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा कि किसानों को प्रदर्शन का अधिकार है, लेकिन ये कैसे हो इस पर चर्चा की जा सकती है। अदालत ने कहा कि हम प्रदर्शन के अधिकार में कटौती नहीं कर सकते हैं और प्रदर्शन का अंत होना जरूरी है। अदालत ने कहा कि हम किसान संगठनों से पूछेंगे कि विरोध करने की प्रकृति को बदलने के लिए क्या किया जा सकता है जो यह सुनिश्चित करेगा कि दूसरों के अधिकार प्रभावित नहीं हों?

पीठ ने कहा कि हम प्रदर्शन के विरोध में नहीं हैं लेकिन बातचीत भी होनी चाहिए। चीफ जस्टिस ने कहा कि हमें नहीं लगता कि किसान आपकी बात मानेंगे, अभी तक आपकी चर्चा सफल नहीं हुई है, इसलिए कमेटी का गठन आवश्यक है। अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने अपील की है कि 21 दिनों से सड़कें बंद हैं, जो खुलनी चाहि। वहाँ लोग बिना मास्क के बैठे हैं, ऐसे में कोरोना का खतरा है।


CJI ने इसके बाद कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम की ओर रुख किया, जो कि पंजाब सरकार की ओर से पेश हुए हैं। चिदंबरम ने घटना का राजनीतिकरण करते हुए कहा कि राज्य को अदालत के इस सुझाव पर कोई आपत्ति नहीं है कि लोगों का एक समूह किसानों और केंद्र सरकार के बीच बातचीत को सुविधाजनक बना सकता है। चिदंबरम ने कहा कि किसान अहंकारी सरकार से लड़ रहे और उन्हें दिल्ली आने से रोका गया।

पी चिदंबरम को जवाब देते हुए CJI ने कहा कि अगर इतनी बड़ी संख्या में लोग दिल्ली आ गए, तो उन्हें नियंत्रित कैसे किया जाएगा? अदालत की ओर से कहा गया है कि इतनी बड़ी भीड़ की जिम्मेदारी कौन लेगा, कोर्ट ये काम नहीं कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट में किसान आंदोलन को लेकर सुनवाई आज भी टल गई है। अदालत में किसी किसान संगठन के ना होने के कारण कमेटी पर फैसला नहीं हो पाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो किसानों से बात करके ही अपना फैसला सुनाएँगे और अब इस मामले की सुनवाई दूसरी बेंच करेगी।

ममता बनर्जी अपने घर की चिंता करें, उन्हें ऐसे मुस्लिम पसंद नहीं जो सोच-बोल सकें: ओवैसी

पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक बयानबाज़ी का दौर अपने चरम पर है। इसी कड़ी में एआईएमआईएम के मुखिया और हैदराबाद सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने बयान दिया है। ओवैसी ने ममता बनर्जी के एक बयान का जवाब देते हुए कहा कि मुस्लिम वोटर उनकी जागीर नहीं है। ओवैसी ने यह आरोप भी लगाया कि ममता बनर्जी को ऐसे मुस्लिम नहीं पसंद हैं, जो खुद के लिए सोच और बोल सकते हैं। 

दरअसल 15 दिसंबर 2020 को जलपाइगुड़ी में एक जनसभा को संबोधित करते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने असदुद्दीन ओवैसी पर बयान दिया था। संबोधन में ममता बनर्जी ने भाजपा और ओवैसी पर निशाना साधते हुए कहा था कि पश्चिम बंगाल में साम्प्रदायक सौहार्द बिगाड़ने और अल्पसंख्यकों के वोट का ध्रुवीकरण करने के लिए भाजपा एआईएमआईएम को लेकर आई है।

बंगाल की मुख्यमंत्री के अनुसार भाजपा ही एआईएमआईएम की फंडिंग करती है और यह बिहार चुनाव में साबित हो चुका है। ठीक ऐसा ही पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में भी होने वाला है, यह भाजपा की टीम बी है, जिस पर वह करोड़ों रुपए खर्च कर रहे हैं। इनकी योजना यही है कि चुनाव के दौरान हिन्दू वोट भाजपा ले जाएगी और मुस्लिम वोट एआईएमआईएम ले जाएगी।  

ममता बनर्जी के इस बयान का जवाब देते हुए असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, “अभी तक आपका सामना सिर्फ आज्ञाकारी मीर जफ़र और सादिक़ से ही हुआ था। आपको ऐसे मुस्लिम नहीं पसंद हैं, जो खुद के लिए सोच और बोल सकते हैं। आपने बिहार में हमारे वोटर्स का अपमान किया है। याद रखिए कि बिहार में अन्य राजनीतिक दलों के साथ क्या हुआ और वह अपनी असफलता का ठीकरा ‘वोट कटर्स’ के सिर फोड़ रहे थे। मुस्लिम वोटर्स आपकी जागीर नहीं हैं।”   

इसके अलावा ओवैसी का कहना था कि अभी तक ऐसा कोई इंसान पैदा नहीं हुआ, जो ओवैसी को रुपयों से खरीद सके। ओवैसी ने आगे कहा कि उनके (ममता बनर्जी) के सभी आरोप आधारहीन हैं, उन्हें अपने घर की चिंता करनी चाहिए। उनकी पार्टी के तमाम लोग भाजपा की तरफ जा रहे हैं। फ़िलहाल इस बयान को लेकर चुनावी और राजनीतिक चर्चाओं का दौर जारी है।

बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान सीमांचल क्षेत्र की 5 सीटें जीतने वाले एआईएमआईएम का निशाना पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की ओर है। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी प्रदेश के मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों (मुर्शिदाबाद और नार्थ दिनाजपुर) में शुरुआत से ही सक्रिय है।

पश्चिम बंगाल में ऐसी कई सीटें हैं, जिन पर अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी निर्णायक भूमिका में है। ऐसे में असदुद्दीन ओवैसी बड़ी सफलता की उम्मीद के साथ पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में उतर रहे हैं।    

किसान आंदोलन के कारण Y सुरक्षा मिलने की खबरों को सनी देओल ने किया खारिज, कहा- जुलाई से ही मिली हुई है

बॉलीवुड अभिनेता और गुरदासपुर से भाजपा सांसद सनी देओल ने मीडिया की उन खबरों को खारिज किया है जिनमें किसान आंदोलन के कारण उन्हें वाई श्रेणी की सुरक्षा प्रदान करने का दावा किया गया था। उन्होंने ट्वीट कर कहा है कि उन्हें यह सुरक्षा जुलाई से ही प्राप्त है।

उन्होंने अपने ट्वीट में बताया, “कल से, कुछ गलत मीडिया रिपोर्ट्स है कि मुझे हाल ही में Y सुरक्षा मिली है। मुझे जुलाई 2020 से यह सुरक्षा प्रदान की गई है। इस सुरक्षा प्रावधान को चालू किसानों के आंदोलन से जोड़ने का प्रयास किया गया है जो गलत है।”

उन्होंने आगे लिखा, “मैं अपने मीडिया सहयोगियों से अनुरोध करता हूँ कि किसी भी खबर को प्रकाशित करने से पहले तथ्यों को सत्यापित करें।”

बता दें कि कल से मीडिया में दावा किया जा रहा था कि किसान आंदोलन पर टिप्पणी करने के कारण केंद्र सरकार ने सनी देओल को बुधवार (दिसंबर 16, 2020) को वाई श्रेणी सेक्योरिटी प्रदान की है। इनमें कहा गया कि किसान आंदोलन पर उनकी टिप्पणी के बाद सरकार ने यह फैसला लिया है। इस आदेश के बाद अब सनी देओल के साथ दो कमांडो समेत 11 सरक्षाकर्मी रहेंगे और साथ में 2 PSO भी तैनात होंगे।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आईबी की रिपोर्ट और सनी देओल को लेकर थ्रेट परसेप्शन के आधार पर उन्हें गृह मंत्रालय की ओर से यह सुरक्षा दी गई है। उन्हें ये सुरक्षा उस समय मिली है, जब पंजाब में कृषि कानूनों का भारी विरोध हो रहा है और किसान संगठनों ने बीजेपी नेताओं के घेराव की बात कही है।

क्या कहा था सनी देओल ने?

पिछले दिनों 6 दिसंबर को नए कृषि कानूनों पर सनी देओल ने अपनी राय रखी थी। उन्होंने कानूनों का समर्थन करते हुए कहा था कि ये किसान और उनकी सरकार का मुद्दा है। किसान और सरकार आपस में बातचीत करके कोई न कोई मुद्दा जरूर निकाल लेंगे।

उन्होंने कहा था कि जो लोग इसका फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं, समस्याएँ पैदा कर रहे हैं। वह किसानों के हित में नहीं सोच रहे। उनका बस अपना एजेंडा है। सनी देओल ने कहा था कि उनकी सरकार और भाजपा किसानों के साथ है। इस पूरी समस्या का हल बातचीत से निकल जाएगा।

कोरोना संक्रमित सनी देओल की चुप्पी पर उठे थे सवाल

सनी देओल की टिप्पणी आने से पहले लोग लगातार उनकी चुप्पी पर सवाल उठा रहे थे। लेकिन 6 दिसंबर को जब उन्होंने अपना बयान जारी किया तो उसके बाद से तरह तरह की बातें होनी शुरू हो गईं। जिसके कारण उनके पठानकोट स्थित आवास के बाहर सुरक्षा बढ़ानी पड़ी।

याद दिला दें कि बीते दिनों सनी देओल के पिता और बॉलीवुड सुपरस्टार धर्मेंद्र ने भी ट्वीट कर किसानों के मसले पर चिंता जताई थी। लेकिन धर्मेंद्र ने ट्वीट में लिखा था कि ठंड के इस मौसम में किसान दिल्ली की सड़कों पर बैठे हैं। सरकार इसका जल्दी समाधान करे।

मनाली से पंजाब जाने की बजाए सनी आएँगे सीधे मुंबई

सनी देओल इन दिनों मनाली में हैं। उन्होंने 2 दिसंबर को जानकारी दी थी कि वो कोरोना संक्रमित हैं। उन्होंने ट्वीट में लिखा था,“मैंने कोरोना टेस्ट करवाया और रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। मैं एकांतवास में हूँ और मेरी तबीयत ठीक है। मेरा अनुरोध है कि आप में से जो भी लोग गत कुछ दिनों में मेरे संपर्क में आए हैं, कृपया स्वयं को आइसोलेट कर अपनी जाँच करवाएँ।”

भाजपा के प्रदेश कार्यकारिणी सदस्य विपिन महाजन ने बताया है कि कोरोना संक्रमित होने के बाद सनी देओल अभी मनाली में ही हैंं। तीन दिन बाद उनका क्वारंटाइन पीरियड खत्म होगा, जिसके बाद वह सीधा मुंबई जाएँगे। अभी वे पंजाब नहीं आएँगे। 

‘अपने ही दोगले होते हैं’ – AMU ने PM मोदी को दिया आमंत्रण, आपस में गाली-गलौज पर उतरे कट्टरपंथी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 22 दिसंबर को वीडियो लिंक के माध्यम से अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के शताब्दी समारोह में मुख्य अतिथि होंगे। इस कार्यक्रम में केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ के साथ ऑनलाइन समारोह में भाग लेंगे। यह पहला मौका है, जब नरेंद्र मोदी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के किसी भी प्रोग्राम में शामिल हो रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति अपना आभार व्यक्त करते हुए, AMU के कुलपति प्रोफेसर तारिक मंसूर ने कहा कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) समुदाय विश्वविद्यालय के शताब्दी समारोह (सौ साल पूरे) में भाग लेने को लेकर दी गई अपनी स्वीकृति के लिए आभारी है।

लेकिन AMU द्वारा पीएम मोदी को भेजे गए इस आमंत्रण से कुछ कट्टरपंथी, वामपंथी और लिबरल समाज के लोग बेहद आहत हैं। सोशल मीडिया पर इस खबर पर आ रही उदारवादियों की प्रतिक्रिया इस बात की गवाही दे रही हैं कि वह पीएम मोदी के AMU के समारोह का मुख्य अतिथि होने से बहुत निराश और हतोस्ताहित हैं। यही वजह है कि लिबरल्स अब एक-दूसरे को ही गाली देते नजर आ रहे हैं।

कॉन्ग्रेस समर्थक साकेत गोखले ने इस पर अपनी निराशा व्यक्त करते हुए लिखा, “CAA विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस द्वारा AMU छात्रों पर क्रूर हमले को एक साल हो गया है। और अब मोदी को एएमयू शताब्दी समारोह में अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया है। कितना रीढ़हीन प्रशासन है।”

शिरीन नाम के एक ट्विटर अकाउंट ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा है, “एएमयू प्रशासन के लिए यह शर्मनाक बात है कि उस पीएम को आमंत्रित किया, जिसने एक साल पहले ही कैंपस के अंदर छात्रों पर सबसे ज्यादा अत्याचार किए।”

इस यूजर ने कुलपति को ही निशाना बनाते हुए लिखा कि एएमयू के इतिहास में यह सबसे बड़ा ‘स्पिनर’ कुलपति है जिसने इससे पहले पुलिस को कैंपस के अंदर जाने दिया था।

सैयद जमाल ने लिखा है, “अपने ही दोगले निकले। तुम्हें शर्म आनी चाहिए एएमयू प्रशासन।”

सादिक मंसूर ने AMU प्रशासन पर कटाक्ष करते हुए दो तस्वीरें शेयर की हैं। जिसमें एक ओर AMU द्वारा पीएम मोदी को दिए गए आमंत्रण की तस्वीर है जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देखे जा सकते हैं। जबकि दूसरी ओर किसानों द्वारा किए जा रहे प्रदर्शनों में पीएम मोदी की तस्वीर पर जूतों की तस्वीर लगाई गई है।

आफरीन फातिमा, जो कि एक मुस्लिम और एक्टिविस्ट (ट्विटर पर मौजूद जानकारी के अनुसार) हैं, ने इस खबर पर अपना दुःख प्रकट करते हुए लिखा है, “एएमयू प्रशासन से मुझे घृणा होती है।
मुझे नहीं पता कि और क्या कहना है।”

उल्लेखनीय है कि एएमयू इस साल दिसंबर माह में अपने सौ साल पूरे कर रही है। गौरतलब है कि ‘सर’ सैयद अहमद खान ने मई 24, 1875 में सात विद्यार्थियों से मदरसा तुल उलूम के तौर पर इस यूनिवर्सिटी की बुनियाद रखी थी।

लिपी सागर की हत्या, 3 हफ्ते बाद लाश: बांग्लादेशी के साथ थी रिलेशनशिप में, गैरकानूनी रूप से रह रहा था भारत में

मुंबई पुलिस ने एक बांग्लादेशी व्यक्ति को उसके साथ रहने वाली महिला की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया है। घटना का आरोपित (24 साल का) गैरक़ानूनी अप्रवासी था और वह मृतका (26 साल की) के साथ फ़्लैट में रहता था। मृतका का शव घटना के 3 हफ्ते बाद डिकम्पोज़ स्थिति में बरामद किया गया। मृतका का शव 7 दिसंबर 2020 को नवी मुंबई कलम्बोली स्थित एक अपार्टमेन्ट से बरामद किया गया था। 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ महिला की हत्या 3 हफ्ते पहले की गई थी और आरोपित वारदात को अंजाम देने के बाद फ़्लैट बाहर से बंद करके फरार हो गया। मृतका लिपी सागर शेख उर्फ़ रीना शेख भी भारत में गैरक़ानूनी रूप से रह रही थी और हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में काम करती थी। उसके साथ दो अन्य बांग्लादेशी महिलाएँ भी रहती थीं। लॉकडाउन के दौरान तीनों की नौकरी चली गई थी, जिसके बाद रीना की दोनों दोस्त बांग्लादेश चली गई जबकि उसने रुकने का फैसला लिया। 

हाल ही में बांग्लादेश से वापसी होने के बाद रीना की दोनों दोस्तों को उसकी हत्या की जानकारी मिली। पुलिस को द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक़ जब दोनों वापस लौटीं, तब फ़्लैट बंद था और रीना का फोन पहुँच के बाहर था। उन्होंने मकान चाभी के लिए मकान मालिक से संपर्क किया और मकान मालिक ने कहा कि उसके पास कोई चाभी नहीं है क्योंकि रीना वहाँ लगातार रह रही थी। 

इसके बाद उन्होंने चाभी के लिए फ़्लैट के ब्रोकर से संपर्क किया। इस घटना की जानकारी पुलिस को दी गई और शुरुआती जाँच में पुलिस को पता चला कि रीना शेख एक बांग्लादेशी व्यक्ति के साथ रिलेशनशिप में थी। उसकी दोनों दोस्तों के बांग्लादेश वापस जाने के बाद वह रीना के साथ रह रहा था। घटना के बाद से ही वह फ़रार चल रहा था, जिसके बाद पुलिस ने धारा 302 के तहत मामला दर्ज करके मामले की जाँच शुरू कर दी थी।  

पुलिस के मुताबिक़, “जाँच के दौरान हमें जानकारी मिली कि आरोपित ने देश नहीं छोड़ा है और न ही वह बांग्लादेश गया है। हमने उसकी असल लोकेशन हासिल करने के लिए उसके सभी ठिकानों पर पड़ताल शुरू कर दी, कुछ ही समय बाद हमारी टीम ने उसे गिरफ्तार कर लिया। पूछताछ के दौरान उसने बताया कि वह रीना शेख के साथ रिलेशनशिप में था और उसे यह पता चला कि उसका किसी और के साथ अफेयर चल रहा है। इसके बाद उसने रीना की हत्या कर दी और फ़्लैट बाहर से बंद करके फ़रार हो गया। क्योंकि फ़्लैट बाहर से बंद था इसलिए घटना के 3 हफ्ते तक इसकी जानकारी किसी को नहीं मिली।” 

पुलिस को पूछताछ के दौरान यह भी पता चला कि तीनों महिलाएँ भारत में गैरक़ानूनी रूप से रह रही थीं। फ़िलहाल पुलिस ने रीना की दोनों दोस्तों को संबंधित धाराओं के अंतर्गत गिरफ्तार कर लिया है।