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‘नॉटी, दो टके के लोग’: कंगना पर फट पड़ीं मुंबई की मेयर, ऑफिस तोड़ने पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने लगाई थी फटकार

बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत की संपत्ति पर बीएमसी कार्रवाई के खिलाफ़ हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद शिवसेना नेता और मुंबई की मेयर किशोरी पेडनेकर ने अभिनेत्री पर हमला बोला है।

मीडिया से बात करते हुए किशोरी ने कहा, “हम लोग भी हैरान हुए हैं कि एक नॉटी (इस शब्द का अर्थ संजय राउत के लिए हरामखोर है) जो रहती हिमाचल प्रदेश में है और यहाँ आकर हमारी मुंबई को पीओके कहती है। ऐसे दो टके के लोग अदालत को भी राजनीति का अखाड़ा बनाना चाहते हैं, वो गलत हैं, क्योंकि ऐसे बेकार व्यक्ति अदालतों को राजनीतिक युद्ध के मैदान में बदलना चाहते हैं।”

बीएमसी मेयर का कहना है कि वो कंगना को जानती तक नहीं हैं और उन्होंने कभी कंगना की फिल्में नहीं देखीं। उन्होंने बीएमसी की कार्रवाई को ‘बदले की कार्रवाई’ होने से नकारा। उन्होंने कहा, “कार्रवाई इसलिए हुई है क्योंकि कार्रवाई लायक कुछ था। मैं व्यक्तिगत रूप से यह भी नहीं जानती कि वह कौन थी। मैंने उसकी फिल्में कभी नहीं देखीं, क्योंकि समय नहीं है।”

इससे पहले जब कोर्ट का फैसला आया था तब भी पेडनेकर ने बीएमसी का बचाव किया था। उन्होंने कहा था कि बीएमसी की कार्रवाई निगम के नियमों के अनुसार है। उन्होंने कंगना रनौत मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश का आकलन करने के लिए बीएसी लीगल टीम के साथ बैठक की थी।

बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला

यहाँ बता दें कि मुंबई महानगर पालिका (BMC) के खिलाफ लड़ाई में अभिनेत्री कंगना रनौत को बॉम्बे हाई कोर्ट में बड़ी जीत मिली है। हाई कोर्ट ने कंगना के बंगले पर बीएमसी की कार्रवाई को अवैध और दुर्भावना से परिपूर्ण माना है और बीएमसी का नोटिस रद्द कर दिया है।

हाई कोर्ट ने बीएमसी को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि यह बदले की भावना के तहत की गई कार्रवाई थी। बॉम्बे हाईकोर्ट के जज ने टिप्पणी करते हुए कहा, “कंगना रनौत के मुंबई को पीओके बनाने वाले बयान के अगले दिन एक नेता का बयान आता है और फिर कंगना को नोटिस देकर महज 24 घंटे का समय दिया जाता है। कार्रवाई होने के बाद अखबार में लिखा जाता है कि बदला ले लिया।”

कंगना रनौत और शिवसेना नेता संजय राउत का मामला

याद दिला दें कि गत सितंबर में शिवसेना नेता और कंगना रनौत के बीच जुबानी जंग छिड़ी हुई थी। उस समय राउत ने कंगना को मुंबई में आने से मना किया था, जिस पर कंगना ने कहा था कि वह मुंबई आएँगी और उन्हें वहाँ आने से कोई नहीं रोक सकता। इसके बाद न्यूजनेशन पत्रकार से बात करते हुए राउत ने कंगना के लिए हरामखोर शब्द का इस्तेमाल किया था। बाद में मामला तूल पकड़ने पर उन्होंने तर्क दिया था कि इसका अर्थ उनकी भाषा में नॉटी या बेईमान होता है।

इसके बाद राउत ने कई जगह इस शब्द का इस्तेमाल किया, लेकिन अंत में कोर्ट ऐसे बयान पर संतुष्ट नहीं हुई और शिवसेना नेता की भाषा की निंदा की। आज बीएमसी कार्रवाई पर बॉम्बे हाईकोर्ट के जज जस्टिस एसजे कैथावाला और आरआई छागला की बेंच ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा, “जिस तरह से यह तोड़फोड़ की गई वह अनाधिकृत था। ऐसा गलत इरादे से किया गया था। ये याचिकाकर्ता को कानूनी मदद लेने से रोकने का एक प्रयास था।” अदालत ने अवैध निर्माण के बीएमसी के नोटिस को भी रद्द कर दिया है।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक समिति बनाने को कहा है जो कंगना रनौत को हुए नुकसान का आँकलन करेगी और फिर BMC से इसकी वसूली की कार्रवाई शुरू की जाएगी। तब तक अदालत ने कंगना को रहने लायक निर्माण कार्य करने की अनुमति दी है। साथ ही बीएमसी को कहा है कि आगे से किसी भी नागरिक पर ऐसी कार्रवाई करने से पहले 7 दिन का नोटिस दिया जाए।

गाजीपुर में सड़क पर पड़े मिले गायों के कटे सिर: लोगों का आरोप- पहले डेयरी फार्म से गायब होती हैं गायें, फिर काट कर फेंक देते हैं सिर

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने की घटनाएँ लगातार सामने आ रही है। पिछले दिनों बेगमपुर के एक मंदिर में देवी-देवताओं की मूर्ति से उनके सिर अलग करने की घटना सामने आई थी। अब दिल्ली के गाजीपुर की सड़कों पर गायों के कटे हुए सिर मिलने की खबर सामने आ रही है।

ऑपइंडिया के पास गाजीपुर घटना से संबंधित एक वीडियो आई है। इसमें गायों के कटे सिर जमीन पर पड़े साफ दिख रहे हैं। हम अपनी इस खबर में उस वीडियो को साझा नहीं कर रहे, लेकिन वीडियो में क्या है यह हम आपको बताते हैं।

क्या है वीडियो में?

वीडियो में नजर आ रहा है कि 4-5 गायों का सिर जमीन पर काट कर फेंक दिया गया और दूर तक खून की धार बह रही हैं। लोगों ने पुलिस को फोन करके घटनास्थल पर बुलाया है और उनसे शिकायत कर रहे हैं कि इससे पहले भी दो-तीन बार ऐसी घटनाओं को अंजाम दिया जा चुका है, लेकिन कभी कोई कार्रवाई नहीं हुई।

वीडियो में स्थानीय लोग कह रहे हैं इलाके के विधायक जल्द ही घटनास्थल पर पहुँचने वाले हैं, लेकिन पुलिस उन सिरों को जल्द से जल्द वहाँ से हटवाने में लगी है। लोग इस मामले को उजागर करने के लिए अपील कर रहे हैं कि पहले मीडिया और विधायक को आ जाने दिया जाए तभी वह इन कटे सिरों को हटाएँ।

इस बीच पुलिस और स्थानीय लोगों में कहासुनी भी होती है। लेकिन पुलिस गायों के सिर ढकने का कार्य करती रहती है। वीडियो में एक युवक बताता है कि गाजीपुर थाने से 100 मीटर दूरी पर आए दिन गायों को काटने का काम होता रहता है। इतने में पुलिस अपनी गाड़ी में गायों के कटे सिर को रखकर थाने जाने लगती है।

लोग गुस्से में कहते हैं कि वह थाने तक जाएँगे कि आखिर कैसे चौराहे पर गाय काटी जा सकती है। वीडियो बनाने वाले आरोप लगाते हैं कि इस अपराध को करने वालों में डर नहीं है, उनकी सेटिंग हो रखी है।

इसके अलावा ऑपइंडिया को मिली जानकारी के अनुसार वीडियो भेजने वाले स्रोत का कहना है कि ऐसी वारदात लगातार 1 साल से हो रही है। पुलिस प्रशासन को भी बार-बार ध्यान कराया गया और रोड जाम किया गया, लेकिन फिर भी वारदात नहीं रुक रही है। आए दिन गाजीपुर डेयरी फार्म से गाय उठती है और काट कर यूँ ही फेंक दी जाती है।

बता दें कि इस वीडियो के सामने आने के बाद ऑपइंडिया ने मामले की पुष्टि के लिए गाजीपुर थाने में संपर्क किया। थाने से बताया गया कि इस मामले में मुकदमा दर्ज हो गया है। आगे की पड़ताल चल रही है। लोकेशन और आरोपित संबंधित जानकारी पूछे जाने पर बताया गया कि विस्तार से एसएचओ ही जानकारी दे सकते हैं। लेकिन एसएचओ प्रेम सिंह नेगी ने मामला सुनकर फोट काट दिया और दोबारा उनसे हमारा संपर्क नहीं हो सका। थाने से हमें इस केस में दर्ज हुई एफआईआर संख्या (501) मालूम चली। हालाँकि, ऑनलाइन हमने जब इसे निकालने का प्रयास किया तो कोई रिकॉर्ड शो नहीं हुआ।

ऑपइंडिया इस संबंध में पुलिस से लगातार संपर्क करने की कोशिश कर रही है। संपर्क होने पर हम इस खबर को अपडेट करेंगे।

बंगाल: ममता के MLA मिहिर गोस्वामी बीजेपी में शामिल, शनिवार को शुभेंदु अधिकारी के आने की अटकलें

पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक उथल पुथल तेज हो गई है। सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के असंतुष्ट विधायक मिहिर गोस्वामी बीजेपी में शामिल हो गए हैं। ममता बनर्जी कैबिनेट से इस्तीफा देने वाले शुभेंदु अधिकारी के भी शनिवार को बीजेपी में शामिल होने की अटकलें लगाई जा रही है।

दिल्ली में बीजेपी महासचिव और बंगाल के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय की मौजूदगी में गोस्वामी पार्टी में शामिल हुए। दक्षिण कूचबिहार से विधायक गोस्वामी जब शुक्रवार को बीजेपी सांसद निशिथ प्रमाणिक के साथ दिल्ली के लिए रवाना हुए थे, तभी से इसकी अटकलें लग रही थी।

इससे पहले टीएमसी ने उनकी नाराजगी दूर करने की कोशिश की थी। लेकिन गुरुवार को एक फेसबुक पोस्ट में गोस्वामी ने कहा था कि उनका अब टीएमसी के साथ जुड़े रहना मुश्किल है।

वहीं परिवहन मंत्री के पद से इस्तीफा देने वाले शुभेंदु अधिकारी के भी बीजेपी में शामिल होने को लेकर अटकलें लग रही हैं। हालाँकि टीएमसी सांसद सौगत राय ने इसे खारिज किया है। राय का कहना है, “शुभेंदु ने पार्टी से या विधायक पद से इस्तीफा नहीं दिया है। मैं आपको आश्वस्त करता हूँ कि ये बिलकुल झूठ है कि शुभेंदु, दिल्ली में मोहन भागवत से मिलने जा रहे हैं।”

शुभेंदु अधिकारी टीएमसी के बड़े नेताओं में से एक हैं। नंदीग्राम आंदोलन का प्रमुख चेहरा शुभेंदु अधिकारी पार्टी से 2 बार सांसद रह चुके हैं। उन्होंने अपने कौशल से मिदनापुर इलाके को टीएमसी का गढ़ बनाया। मेदिनीपुर, झारग्राम, पुरुलिया, बांकुरा और बीरभूम जैसे जिलों में टीएमसी के प्रभाव के पीछे उनका ही हाथ माना जाता है।

सिंगूर के विधायक रबीन्द्रनाथ भट्टाचार्जी भी टीएमसी से नाराज चल रहे हैं। उन्होंने भी पार्टी छोड़ने की धमकी दे रखी है। वे पार्टी के ब्लॉक अध्यक्ष पद से अपने करीबी को हटाए जाने से नाराज बताए जाते हैं।

गौरतलब है कि टीएमसी को सत्ता में पहुॅंचाने में सिंगूर और नंदीग्राम में करीब एक दशक पहले हुए आंदोलन की मुख्य भूमिका मानी जाती है। शुभेंदु और रबीन्द्रनाथ इन आंदोलनों के प्रमुख चेहरे थे। ऐसे में इनके बागी तेवरों से लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का ममता बनर्जी का सपना मुश्किल हो गया है।

जहाँ ममता बनर्जी ने खोदी थी वामपंथ की कब्र, वहीं उनकी सियासत को दफनाने की तैयारी में शुभेंदु अधिकारी

करीब एक दशक पहले सिंगूर और नंदीग्राम में हुए आंदोलन ने पश्चिम बंगाल की सियासत से वामपंथ को उखाड़ फेंका था और सत्ता के केंद्र में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) को बिठा दिया। राज्य में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर सिंगूर और नंदीग्राम चर्चा के केंद्र में हैं। 

अटकलें लगाई जा रही है कि इन दोनों जगहों पर टीएमसी के भीतर जो बगावत शुरू हुई है उसका ममता बनर्जी जल्द समाधान नहीं तलाश पाईं तो लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटने का उनका सपना बिखर जाएगा।

यही कारण है कि नंदीग्राम के विधायक शुभेंदु अधिकारी के इस्तीफे की खबरें सामने आते ही उन्हें मनाने की कोशिशें भी शुरू हो गई हैं। पार्टी सांसद सौगत राय का कहना है:

“शुभेंदु ने पार्टी से या विधायक पद से इस्तीफा नहीं दिया है। मैं आपको आश्वस्त करता हूँ कि ये बिलकुल झूठ है कि शुभेंदु, दिल्ली में मोहन भागवत से मिलने जा रहे हैं।”

उधर, सिंगूर विधायक रबीन्द्रनाथ भट्टाचार्जी पहले ही पार्टी छोड़ने की धमकी दे चुके हैं। रबीन्द्रनाथ वही चेहरा हैं जिन्होंने नैनो कारखाने के ख़िलाफ टीएमसी के आंदोलन में उनका साथ दिया था। जानकारी के अनुसार, ब्लॉक अध्यक्ष के पद से अपने करीबी को हटाए जाने की वजह से भट्टाचार्जी नाराज हैं। उनका कहना था कि भ्रष्टाचार से जुड़े लोगों को पार्टी ने सिंगूर ब्लॉक तृणमूल कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष बनाया है, जिसका हम लोग विरोध करते है। अगर पार्टी इस विषय पर कोई ठोस कदम नहीं उठाएगी तो हमलोग आगे की रणनीति अपनाएँगे।

सवाल है कि आखिर बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक समीकरण क्यों इतनी तेजी से बनते-बिगड़ते दिख रहे हैं। आखिर क्यों वह सब लोग ममता सरकार से दूरी बना रहे हैं, जिन्होंने बंगाल में वामपंथी शासन को उखाड़ फेंकने में न केवल टीएमसी की मदद की थी, बल्कि नंदीग्राम-सिंगूर के आंदोलनों में अहम भूमिका अदा की थी।

साल 2011 के चुनावों को यदि याद करें तो पता चलता है कि इन दोनों जगहों पर चुनाव से ठीक पहले हुए आंदोलन टीएमसी के लिए जैकपॉट बने थे। पार्टी ने सिंगूर और नंदीग्राम में औद्योगीकरण के ख़िलाफ मुहिम चलाई थी। तब चूँकि स्थानीय भी वाम शासन से त्रस्त थे और चिह्नित भूमि पर औद्योगिक परियोजना चालू करने के ख़िलाफ थे तो उन्हें टीएमसी समेत सभी आंदोलनकारियों का जमकर साथ दिया।

सिंगूर में चलाए गए नैनो परियोजना के ख़िलाफ अभियान में ममता सरकार का दावा था कि इस प्रोजेक्ट के लिए इस्तेमाल की जाने वाली जमीन काफी ऊपजाऊ है और वहाँ कई फसलें हो सकती हैं। इस अभियान में टीएमसी के साथ कई संगठन शामिल थे। धीरे-धीरे इसी अभियान की आग नंदीग्राम तक भड़की नजर आई थी और ‘कृषि जमीन बचाओ समिति’ की अगुवाई में नंदीग्राम ने जो आंदोलन देखा, उसमें लगभग दर्जनों लोगों की बलि चढ़ी थी। हैरानी इस बात की थी कि नंदीग्राम में केमिकल सेज के लिए केवल जमीन अधिग्रहण की सूचना देने भर से आंदोलन भड़क गया था।

आज दुखद यह है कि उस समय बड़े दावों के साथ जनता को अपने पक्ष में करने वाली टीएमसी सत्ता में आने के बाद उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर पाई। टीएमसी के 10 साल के कार्यकाल के बाद सिंगूर और नंदीग्राम का दोबारा केंद्र में आ जाना उन सभी बयानों को दोबारा ताजा कर देता है जिस पर तत्कालीन मुख्यमंत्री व मार्क्सवादी नेता बुद्धदेव चर्चा कर रहे थे। उन्होंने एनडीटीवी को दिए अपने इंटरव्यू में पार्टी की चरमराई स्थिति पर बात करते हुए नंदीग्राम और सिंगूर को अपनी सबसे बड़ी भूल कहा था।

क्या 10 साल बाद इन चुनावों में वही स्थिति ममता सरकार की होने वाली है? भाजपा नेता लॉकेट चटर्जी का तो कहना है कि सिंगूर से तृणमूल कॉन्ग्रेस का उत्थान हुआ था और सिंगूर से ही ममता बनर्जी का पतन होगा। सिंगूर के किसान 10 साल पहले जिस हाल में थे, आज भी उसी हाल में जी रहे हैं। 

आज शुभेंदु अधिकारी के इस्तीफे के बाद कयास लग रहे हैं कि इस हलचल के कारण ममता की करीब 20 सीटों पर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ेगा। उनकी नाराजगी पार्टी को बहुत बड़ा नुकसान पहुँचा सकती है। उनकी पहचान बंगाल में काफी ताकतवर के रूप होती है। वह एक सशक्त राजनीतिक परिवार से आते हैं। उनका प्रभाव न सिर्फ उनके क्षेत्र पर है, बल्कि पूर्वी मिदनापुर के आस-पास के जिलों में भी उनका राजनीतिक दबदबा है। 

नंदीग्राम आंदोलन का प्रमुख चेहरा शुभेंदु अधिकारी पार्टी से 2 बार सांसद रह चुके हैं। उन्होंने अपने कौशल से मिदनापुर इलाके को टीएमसी का गढ़ बनाया। ऐसे में हम अंदाजा लगा सकते हैं कि उनका पार्टी को छोड़ना ममता सरकार पर कितना बड़ा आघात होगा। यही कारण है कि उन्हें मनाने प्रशांत किशोर तक खुद उनके घर पहुँच गए थे। लेकिन प्रशांत की ये कोशिश बेकार गई और शुभेंदु ने उनसे मुलाकात नहीं की।

पिछले साल तक भाजपा खुद शुभेंदु को पार्टी से जुड़ने का ऑफर दे रही थी, लेकिन अब मीडिया में सूत्रों के हवाले से बताया जा रहा है कि शुभेंदु स्वयं ही भाजपा की ओर हाथ बढ़ाने वाले हैं। वे शनिवार को बीजेपी में शामिल हो सकते हैं। मेदिनीपुर, झारग्राम, पुरुलिया, बांकुरा और बीरभूम जैसे जिलों में टीएमसी के प्रभाव के पीछे उनका ही हाथ माना जाता है।

गरीब कल्याण रोजगार अभियान: प्रवासी श्रमिकों को रोजगार देने में UP की योगी सरकार सबसे आगे

कोरोना महामारी की वजह से पूरे देश में तालाबंदी (लॉकडाउन) की गई थी। नतीजा यह निकला कि जो जहाँ था वहीं फँस गया। शुरुआत में इसे कुछ हफ़्तों के लिए ही लगाया गया था, लेकिन महामारी का दायरा बढ़ने की वजह से इसकी अवधि बढ़ानी पड़ी थी। इससे सबसे अधिक प्रभावित हुए प्रवासी और दिहाड़ी श्रमिक। 

प्रतिदिन मेहनत करके जीवन-यापन करने वालों का दर्द समझते हुए केंद्र सरकार ने गरीब कल्याण रोजगार अभियान के तहत 125 दिन के रोजगार कार्यक्रम का ऐलान किया। इसकी शुरुआत 20 जून 2020 से हुई थी। फ़िलहाल सरकार इस योजना को आधार बना कर प्रवासी श्रमिकों को 125 दिन से अधिक का रोजगार प्रदान करने की तैयारी कर रही है और साथ ही इस योजना को सभी राज्यों में बढ़ाने की संभावना तलाश रही है। 

उत्तर प्रदेश सरकार का सबसे उम्दा प्रदर्शन 

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने ‘गरीब कल्याण रोजगार अभियान’ के अंतर्गत उल्लेखनीय रूप से बेहतर प्रदर्शन किया है। इस योजना का क्रियान्वन 21 जून से शुरू कर दिया गया था और अब तक उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने इस योजना पर 9,329.57 करोड़ रुपए खर्च किए हैं और इसके जरिए 10,58,17,358 पर्सन डेज़ (person-days) का सृजन किया है।

सितंबर 2020 में उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने जल शक्ति मंत्रालय के तहत शुरू किए गए कार्यक्रमों में कुल 8 पुरस्कार जीते थे। इसके अलावा उत्तर प्रदेश ने ‘गंदगी मुक्त भारत योजना’ को लागू करने में दूसरा पायदान हासिल किया था और प्रवासी कामगारों को रोजगार देने के मामले में पहला स्थान हासिल किया था।   

उत्तर प्रदेश में केंद्र सरकार की योजना के तहत पूरे किए गए कार्य

क्या है गरीब कल्याण रोजगार अभियान?  

31 मई 2020 को देश को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रवासी श्रमिकों के लिए इस योजना का ऐलान किया था जिसके तहत उन्हें रोजगार दिया जाना था। यह योजना उन 6 प्रदेशों के लिए शुरू की गई थी, जहाँ प्रवासी मजदूरों की संख्या अनुमान से अधिक थी। इसमें बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान शामिल थे। इन 6 प्रदेशों के लगभग 116 जिलों में इस योजना के तहत उल्लेखनीय बढ़ोतरी देखी गई थी। केंद्र सरकार ने इस योजना के लिए कुल 50 हज़ार करोड़ रुपए जारी किए थे। 

12 मंत्रालय, 25 कार्य और गतिविधियाँ

इस योजना के तहत कुल 12 मंत्रालय रोजगार प्रदान कर रहे हैं और इस योजना को बढ़ावा दे रहे हैं। ये हैं- ग्रामीण विकास विभाग, पेयजल और स्वच्छता विभाग, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, पंचायती राज मंत्रालय, दूरसंचार मंत्रालय, नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा विभाग, रेल मंत्रालय, कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग, पर्यावरण मंत्रालय, वन और जलवायु परिवर्तन विभाग, पेट्रोलियम मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय हैं।  

उत्तर प्रदेश में केंद्र सरकार की योजना के तहत पूरे किए गए कार्य

इस योजना के तहत कुल 25 श्रेणियों में रोजगार प्रदान किए जाएँगे, जिसमें सामुदायिक केंद्र, ग्राम पंचायत भवन, वित्त आयोग फंड के काम, राष्ट्रीय राजमार्ग के काम, जल संरक्षण के काम, कुओं का निर्माण, पौधारोपण, बागवानी, आँगनबाड़ी केंद्र, ग्रामीण आवास, ग्रामीण कनेक्टिविटी, रेलवे संबंधी कार्य, भारत नेट के अंतर्गत ऑप्टिकल फाइबर बिछाना, जल जीवन मिशन के तहत काम, तालाब, मवेशियों, बकरियों और मुर्गियों के लिए शेड निर्माण शामिल है। 

उत्तर प्रदेश में केंद्र सरकार की योजना के तहत पूरे किए गए कार्य

इस योजना के तहत सरकार सिर्फ रोजगार ही नहीं प्रदान कर रही है, बल्कि कामगारों को उनकी पसंद के आधार पर प्रशिक्षित भी कर रही है। इसके अलावा सरकार का प्रयास है कि लोगों को अपने स्थानीय शहरों या उसके आसपास रोजगार के अवसर मिले जिससे उन्हें काम करने के लिए किसी अन्य जगह नहीं जाना पड़े। अब तक सरकार इस योजना पर 39,292.81 करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है और 6 राज्यों में 50,78,68,671 पर्सन-आवर्स (person hours) का सृजन किया है।

12वीं शताब्दी में विष्णुवर्धन के शासनकाल में बनी महाकाली की मूर्ति को मिला पुन: आकार, पिछले हफ्ते की गई थी खंडित

कर्नाटक के हसनपुरा जिले में स्थित डोदगादवल्ली (Doddagaddavalli) मंदिर में बनी महाकाली की मूर्ति को पिछले शुक्रवार (नवंबर 20, 2020) को असामाजिक तत्वों द्वारा खंडित कर दिया गया था। अब एक हफ्ते बाद इस मामले में जानकारी आई है कि वहाँ मूर्ति की मरम्मत का काम हो गया है और महाकाली की मूर्ति को उसके वास्तविक आकार में दोबारा ढाल दिया गया है।

यह जानकारी स्तंभकार मोनिदिपा बोस डे ने दी है। उन्होंने लिखा, “क्षतिग्रस्त हुई डोदगादवल्ली महाकाली प्रतिमा को उसके मूल आकार में बहाल कर दिया गया है।”

गौरतलब है कि महाकाली मूर्ति को खंडित करने का मामला शुक्रवार को उस दौरान संज्ञान में आया था जब स्थानीय लोग मंदिर पहुँचे थे और उन्होंने प्रतिमा को टूटा पाया था। मंदिर की हालत देखकर ऐसा अंदाजा लगाया गया था कि उपद्रवी मंदिर में छिपे खजाने की तलाश में आए थे और उन्होंने सुरक्षा व्यवस्था कम देखते हुए मूर्ति तोड़ डाली।

12 वीं सदी की इस मूर्ति को टूटा हुआ देखने के बाद प्राचीन इतिहास और पुरातत्व विशेषज्ञ, डॉ. शाल्वपिल अयंगर ने हसन न्यूज से बात करते हुए कहा था कि डोदगादवल्ली चतुशकुता मंदिर की भद्रकाली या दक्षिणा काली प्रतिमा को उपद्रवियों द्वारा नष्ट कर दिया गया। यह हमारी विरासत को बड़ा नुकसान है। इस मंदिर का निर्माण 1113 ई0 में होयसल वंश के विष्णुवर्धन के शासनकाल में हुआ था। यह महालक्ष्मी का एक अनूठा मंदिर है और भद्रकाली की प्रतिमा दक्षिण गर्भगृह में रखी गई है।

उन्होंने आगे मंदिर की महत्ता पर बात करते हुए कहा, “सरकार को उपद्रवियों को कड़ी सजा देनी चाहिए। इस समय भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) हेरीटेज वीक मना रहा है, लेकिन उसी समय यह विरासत क्षतिग्रस्त हो गई है। यह हमारी विरासत और इतिहास का बहुत नुकसान है। एएसआई को इस बड़े नुकसान का जवाब देना चाहिए और उन्हें ही इस अपूरणीय क्षति के लिए जिम्मेदार होना चाहिए।”

यहाँ बता दें कि पिछले कुछ समय से भारतीय संस्कृति और उसकी विरासत पर हमले के कई मामले देखने को मिले हैं। 12 वीं सदी में बनाई गई महाकाली की मूर्ति पर हमला इसी का एक उदाहरण है। पिछले दिनों 6 सितंबर 2020 तारीख को अंतरवेदी में श्री लक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी मंदिर में एक सदी से भी पुराना रथ जलाकर राख कर दिया गया था। इसके अलावा 14 फरवरी 2020 को नेल्लोर में श्री प्रसन्ना वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर के रथ को कुछ उपद्रवियों ने देर रात जलाया था। 21 जनवरी 2020 को कुछ उपद्रवियों ने पूर्वी गोदावरी जिले के पीथापुरम शहर में देवी-देवताओं की मूर्तियों और बैनरों को क्षतिग्रस्त कर दिया था। 

कॉन्ग्रेस का कोढ़ है धर्मांतरण, रोकने को देर से बने कानून कितने दुरुस्त?

बराबरी का अधिकार संविधान ही छीन लेता है। जब अनुच्छेद 25(1) में कहा जाता है कि “सभी लोग”, ध्यान दीजिये, सभी लोग, सिर्फ “भारतीय नागरिक” नहीं, कोई भी अपने पंथ को मानने, उसका अभ्यास करने और उसके प्रचार के लिए स्वतंत्र है तो ये भारत में बाहर कहीं से आकर धर्म प्रचार करने वाले प्रचारकों को अनैतिक छूट देना ही है।

विश्व में जहाँ कोई भी हिन्दुओं का, ईरान से भगाए गए विस्थापितों का, बहाई समुदाय का, सिखों का, जैनियों का कोई देश है ही नहीं, वहाँ ऐसी छूट का मतलब क्या है ? सीधी से बात है विदेशी प्रचारकों के पास जहाँ कई-कई देशों का खुला समर्थन है वो बेहतर स्थिति में आ जाएँगे और भारत में बसने वाले कई दबे-कुचले समुदाय हाशिए पर धकेल दिए जाएँगे। प्रचारकों के पास देशों के अर्थव्यवस्था का समर्थन होगा और हाशिए पर के इन समुदायों के पास सिर्फ आत्मरक्षा की नैतिक जिम्मेदारी। हमलावरों के खिलाफ ये लड़ाई कभी बराबर की तो थी ही नहीं!

केंद्र में ज्यादातर कॉन्ग्रेस का शासन रहा है, कई राज्य भी लगातार कॉन्ग्रेस शासित रहे हैं। धर्म परिवर्तन पर चर्चा तो काफी पहले, संविधान बनते समय ही शुरू हो गई थी, मगर जबरन धर्म परिवर्तन पर कॉन्ग्रेस ने नियम-कानून आश्चर्यजनक रूप से पचास साल तक नहीं बनाए थे। धर्म और रिलिजन पर संविधान सभा की बैठकों में इस परिवर्तन के बाबत चर्चाएँ हो रही थी (6 दिसम्बर, 1949)। इस दिन चर्चा करते हुए पंडित लक्ष्मी कान्त मिश्रा ने कहा था कि भारत में अभी रिलिजन ज्यादा से ज्यादा अज्ञान, गरीबी और महत्वाकांक्षा को कट्टरपंथ के झंडे तले भुनाने का तरीका है। उनकी सलाह थी कि अपनी रिलीजियस-मजहबी आबादी को बढ़ा कर उसका राजनैतिक लाभ उठाने का मौका किसी को नहीं दिया जाना चाहिए।

ध्यान रहे कि ये दिसंबर 1949 की चर्चा है। उनके तुरंत बाद बोलते हुए एच.वी. कामथ ने कहा था कि सरकार किसी रिलिजन को अनैतिक लाभ ना दे, लेकिन उसके काम से किसी के अपने धर्म के प्रचार-प्रसार और अभ्यास में दिक्कत भी नहीं आनी चाहिए। उन्होंने “रिलिजन” के “वास्तविक अर्थ” की बात करते हुए ये बताने की कोशिश की थी कि कैसे “धर्म” वास्तविक अर्थों में धार्मिकता की सही परिभाषा देता है।

धर्म परिवर्तन के मामले में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चाओं में रहे ग्राहम स्टेंस नाम के मिशनरी की हत्या का मामला देखें तो भी इस सम्बन्ध में कई बातें खुलेंगी। इस मामले का फैसला सुनाते हुए जस्टिस पी.सदाशिवम लिखते हैं, “ये निर्विवाद सत्य है कि किसी और की आस्थाओं में दखलंदाजी, किसी भी किस्म का बल प्रयोग, उकसावे, लालच, या इस वहम में कि उसका मजहब, दूसरे के मजहब से बेहतर है, सरासर गलत है।” इसके अलावा यही बात चीफ़ जस्टिस ए.एन.रे भी रेवरेंड स्टेनिस्लौस बनाम मध्य प्रदेश सरकार के मुक़दमे में कर चुके हैं। इस मुक़दमे में 1960 के दौर के दो कानूनों, मध्य प्रदेश धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम और ओडिशा फ्रीडम ऑफ़ रिलिजन एक्ट को संवैधानिक माना गया था, जिसे इसाई मिशनरी अपने काम में एक बड़ी बाधा मानते हैं।

अदालतों ने बार-बार ये स्पष्ट किया है कि आपको अपने पंथ-मजहब के प्रचार का अधिकार तो है, लेकिन किसी भी तरह से धर्म परिवर्तन करवाने को मौलिक अधिकार नहीं कहा जा सकता। राज्यों के स्थानीय नियम देखें तो जबरन धर्म परिवर्तन को भारतीय दंड संहिता की धारा 295A और 298 में संज्ञेय अपराध की श्रेणी में रखा गया है। इन प्रावधानों की वजह से इस धूर्ततापूर्ण और जान-बूझकर दूसरों की भावना को ठेस पहुँचाने वाली हरकत को दंडात्मक अपराध माना गया है।

आजादी के पहले बनाए गए, राजाओं के ज़माने के कानून देखें तो रायगढ़ स्टेट कन्वर्शन एक्ट (1936), पटना फ्रीडम ऑफ़ रिलिजन एक्ट (1942), सरगुजा स्टेट अपोस्टेसी एक्ट (1945) या उदयपुर स्टेट एंटी कन्वर्शन एक्ट (1946) वगैरह में धोखे से या लालच देकर ईसाई बनाए जाने के खिलाफ कम और ईसाइयों के प्रति होने वाली हिंसा के कानून ज्यादा हैं।

पक्षपातपूर्ण रवैए से काफी नुकसान होने के बाद जब हिन्दुओं ने आवाज उठानी शुरू की तब, आजादी के कई साल बाद, धार्मिक आजादी से सम्बंधित विधेयकों को जगह मिली है। अरुणाचल प्रदेश में 1978 में धार्मिक स्वतंत्रता सम्बन्धी विधेयक आया और गुजरात में ये 2003 में आया। हिमाचल प्रदेश फ्रीडम ऑफ़ रिलिजन एक्ट (2006) के साथ हिमाचल प्रदेश जबरन धर्म परिवर्तन रोकने का प्रयास करने वाला पहला कॉन्ग्रेस शासित राज्य बना।छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में भी नियमों में संशोधन कर के 2006 में डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के पास तीस दिनों में धर्म परिवर्तन की सूचना देने का नियम लागू किया गया।

मगर इतने दिनों की देर के बाद अब पहला सवाल तो ये है कि जिस विषय में संविधान निर्माताओं को 1949 से पता था, उस पर कानून बनाने में नेताओं ने इतनी देर आखिर की क्यों? फिर सवाल ये भी है कि अब जब ये नियम बनने शुरू भी हुए हैं तो क्या ये काफी हैं, या हमें बहुत देर से और बहुत थोड़ा देकर बहलाया जा रहा है?

FIR में अर्णब पर लगाए आरोप साबित नहीं कर पाई मुंबई पुलिस: SC ने बॉम्बे हाई कोर्ट को भी लगाई फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी को बड़ी राहत दी है। कोर्ट ने शुक्रवार (नवंबर 27, 2020) को कहा कि महाराष्ट्र पुलिस द्वारा दायर एफआईआर के प्रथम मूल्यांकन में अन्वय नाइक सुसाइड केस में आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप स्थापित नहीं होते।

शुक्रवार को जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदिरा बनर्जी की अध्यक्षता वाली बेंच ने अर्णब को दी गई अंतरिम बेल के लिए विस्तृत कारण बताते हुए अपना फैसला सुनाया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र पुलिस, अन्वय नाइक सुसाइड केस में रिपब्लिक टीवी प्रमुख के खिलाफ आरोप सिद्ध नहीं कर पाए, इसलिए ये जरूरी था कि अर्णब को जमानत दी जाए। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि प्रथम दृष्टया अर्णब गोस्वामी के खिलाफ़ दर्ज एफआईआर और आईपीसी की धारा 306 के अंतर्गत कोई नेक्सस नहीं मिला।

कोर्ट ने कहा कि यह नहीं कहा जा सकता है कि अपीलकर्ताओं ने आर्किटेक्चरल फर्म के मुखिया को आत्महत्या के लिए उकसाया। सर्वोच्च न्यायालय ने हाईकोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर वह प्रथम दृष्टया इसका अवलोकन कर रहे थे, तो क्या उन्हें यह नहीं दिखा कि एफआईआर और धारा 306 के बीच कोई संबंध नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट को लगाई फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने अर्णब गोस्वामी को बेल देने के मामले में हाइकोर्ट के इंकार पर उन्हें फटकारा और उनसे फाइनल कॉल लेने को कहा कि एफआईआर रद्द होनी चाहिए या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बॉम्बे HC एक नागरिक की स्वतंत्रता की रक्षा करने में अपना कर्तव्य निभाने में नाकाम रहा, जो शिकायत कर रहा था कि उसे उसके टीवी चैनल में व्यक्त किए गए विचारों के लिए महाराष्ट्र सरकार द्वारा टार्गेट किया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतों को यह सुनिश्चित करना होगा कि राज्य आपराधिक कानून का इस्तेमाल नागरिकों को परेशान करने या उनकी स्वतंत्रता को खतरे में डालने के लिए एक उपकरण के रूप में न करे।

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए यह भी कहा कि आपराधिक कानून, उत्पीड़न का औजार नहीं बनना चाहिए, जमानत मानवता की अभिव्यक्ति है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि जमानत का उपाय न्याय प्रणाली में मानवता की एकमात्र अभिव्यक्ति है। 

न्यायालय ने कहा कि अगर किसी की निजी स्वतंत्रता का हनन हुआ हो तो वह न्याय पर आघात होगा। पीठ ने कहा, “उन नागरिकों के लिए इस अदालत के दरवाजे बंद नहीं किए जा सकते, जिन्होंने प्रथम दृष्टया यह दिखाया है कि राज्य ने अपनी शक्ति का दुरुपयोग किया।”

न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने जमानत आवेदनों की संख्या के संबंध में राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के लंबित आँकड़े भी सामने रखे। उन्होंने कहा कि हर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को इन डेटा का इस्तेमाल करना चाहिए ताकि वह न्यायसंगत रूप से न्याय दें सकें। उदारता केवल कुछ लोगों के लिए उपहार नहीं है। कोर्ट ने अपीलों का निपटारा करते हुए कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आगे की कार्यवाही तक लागू रहेगा।

अर्णब गोस्वामी ने अपने ऊपर लगे आरोपों को बताया फर्जी

सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी काफी भावुक हो गए। उन्होंने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा कि जो केस उनके खिलाफ दर्ज हुआ, वो बिलकुल गलत है और गढ़ा गया है। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय का फैसला बताते हुए कहा कि शीर्ष अदालत ने साबित कर दिया है कि उन्हें अवैध तरीके से पकड़ा गया था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को इतिहास में याद रखा जाने वाला कहा। इसके साथ ही उन्होंने महाराष्ट्र सरकार और मुंबई पुलिस के लिए कहा कि उन्हें ताकत का गलत इस्तेमाल करके रिपब्लिक को टारगेट करना बंद कर देना चाहिए।

11 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने दी थी गोस्वामी को जमानत

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 11 नवंबर को रिपब्लिक टीवी के एडिटर इन चीफ को जमानत देकर रिहा किया था। कोर्ट ने गोस्वामी की जमानत याचिका पर फैसला सुनाते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को तकनीकी आधार पर गलत बताया था। कोर्ट ने अर्णब गोस्वामी और दो अन्य आरोपितों को 50,000 रुपए के बांड पर अंतरिम जमानत पर रिहा किया था। वहीं पुलिस आयुक्त को यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देशित किया था कि आदेश का तुरंत पालन किया जाए।

याद दिला दें कि महाराष्ट्र पुलिस ने अर्णब को 4 नवंबर को अन्वय नाइक मामले में गिरफ्तार किया था। अन्वय ने अपने सुसाइड केस में अर्णब पर उनका बकाया पैसा न चुकाने का आरोप मढ़ा था। बाद में रायगढ़ पुलिस ने इस केस में 2019 में क्लोजर रिपोर्ट के साथ बंद हुए मामले को खोलते हुए अर्णब के खिलाफ़ कार्रवाई शुरू की थी।

संघियों-मनुवादियों को खत्म करने के लिए लश्कर-तालिबान से मदद की ग्राफिटी: मेंगलुरु की सड़कों पर खुलेआम चेतावनी

साल 2008 में हुए 26/11 के आतंकवादी हमलों की बरसी के मौके पर मेंगलुरु की दीवारों पर भयावह बातें लिखी (ग्राफिटी) हुई थीं। जिसमें चेतावनी दी गई थी कि ‘संघी और मनुवादियों’ को ख़त्म करने के लिए लश्कर-ए-तैय्यबा और तालिबान की मदद ली जा सकती है। 

मेंगलुरु की दीवार पर लिखी गई चेतावनी
(साभार – ANI)

ग्राफिटी में ऐसा लिखा हुआ था, “हमें इस बात के लिए मजबूर नहीं किया जाए कि हमें संघियों और मनुवादियों का सामना करने के लिए लश्कर-ए-तैय्यबा और तालिबान की मदद लेनी पड़े।” दीवार के एक हिस्से में हैशटैग बना हुआ है जिसमें लश्कर का समर्थन करते हुए ‘लश्कर जिंदाबाद’ लिखा था। पुलिस के मुताबिक़ यह ग्राफिटी 27 नवंबर की देर रात या सुबह के आस पास देखी गई थी। 

ऑपइंडिया से बात करते हुए पुलिसकर्मियों ने इस संबंध में विस्तार से जानकारी दी। पुलिस वालों ने बताया कि ग्राफिटी मेंगलुरु के सर्किट रोड स्थित अपार्टमेंट पर बनाई गई थी। कदरी पुलिस थाने ने इस प्रकरण के संबंध में मामला दर्ज कर लिया है और सीसीटीवी फुटेज के आधार पर जाँच शुरू कर दी है। 

इसके कुछ समय बाद पुलिस ने बताया था कि ग्राफिटी को ढक दिया गया है। 

इस मामले की जाँच करने वाले कदरी थाने के पुलिस अधिकारी ने बताया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 153 और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने से संबंधित अन्य धाराओं के तहत अज्ञात लोगों के विरुद्ध मामला दर्ज किया जा चुका है। 

इस ग्राफिटी में मनुवेदी (manvedi) शब्द को पेंट किया गया था जिसका अर्थ होता है ‘मनुवादी’। तमाम हिन्दू विरोधी तत्व हिंदुत्व से लड़ने का दावा करते हैं और ऐसे हिंदू जो अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करते हैं उन्हें मनुवादी कहते हैं। ऐसे लोगों का यह भी कहना है कि हिन्दू मनुस्मृति का पालन करते हैं जो कि ब्राह्मणों द्वारा दूसरे वर्गों को नीचा दिखाने के लिए तैयार किया गया दस्तावेज़ है।  

इसके अलावा वामपंथी और इस्लामी जमात अपनी कुंठा के परिणामस्वरूप हिंदुओं के लिए ‘संघी’ शब्द का उपयोग करते हैं और इनका मानना है कि ऐसे लोग भाजपा को वोट देते हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सिद्धांतों पर चलते हैं। दिन प्रतिदिन यह स्पष्ट होता जा रहा है कि इस तरह का वैचारिक जहर उन हिंदुओं के लिए है जो कट्टरपंथी इस्लामी और वामी विचारों को अस्वीकार कर देते हैं।        

हिन्दू युवती के पिता का आरोप मुश्ताक मलिक के परिवार ने किया अपहरण: पुलिस ने नकारा ‘लव जिहाद’ एंगल, जाँच जारी

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर स्थित स्याना नगर में ग्रूमिंग जिहाद का मामला सामने आया है जिसमें एक मुस्लिम युवक ने 21 साल की हिन्दू युवती का उसके घर से अपहरण कर लिया। युवती के परिजनों द्वारा दर्ज की गई शिकायत में उनका कहना है कि पड़ोस में रहने वाले मुस्लिम परिवार ने उनकी बेटी का अपहरण किया है और उसकी जान को ख़तरा है। 

दर्ज कराई गई शिकायत में लड़की के पिता ने आरोप लगाया है कि 24 नवंबर को दो मुस्लिम लड़कियाँ उनके घर आई थीं। बाद में दोनों लड़कियों (हिना, लाइबा) ने उनकी बेटी को अपने साथ चलने के लिए कहा और फिर वह चली गई। जब उनकी बेटी शाम तक घर वापस नहीं आई तब उन्होंने अपनी बेटी को खोजना शुरू किया। 

युवती के माता पिता ने शिकायत में यह भी कहा कि उनके परिवार के परिचित राकेश कुमार द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक़ उनकी बेटी को पिछली बार फैज़ल, अरशद और सोनू के साथ एक कार में देखा गया था। उस कार को शहर से बाहर जाते हुए देखा गया था। हिना और लाइबा समेत नामित तीनों युवकों के पिता का नाम मुश्ताक मलिक है। ग्रूमिंग जिहाद (लव जिहाद) का आरोप लगाते हुए युवती के पिता ने कहा फैज़ल, अरशद और सोनू उनकी बेटी को ले गए हैं और उसकी जान ख़तरे में है। उन्होंने यह भी कहा कि तीनों युवकों की आपराधिक पृष्ठभूमि भी है। 

पुलिस ने खारिज किया ‘ग्रूमिंग जिहाद’ एंगल  

दूसरी तरफ पुलिस ने ग्रूमिंग जिहाद या जबरन अपहरण के पहलू को नकारते हुए कहा है कि हिन्दू युवती मुस्लिम युवक के साथ पहले से ही रिलेशनशिप में थी। एसएसपी संतोष कुमार सिंह का इस मुद्दे पर कहना है कि युवती का कथित आरोपित के साथ संबंध था। इसके बाद ग्रूमिंग जिहाद की बात को नकारते हुए उन्होंने कहा कि युवती उस युवक के साथ मर्ज़ी से गई है। 

युवती के घर वालों की शिकायत के आधार पर पुलिस ने फैज़ल, इरशाद, सोनू, हिना, लाइबा और मुश्ताक मलिक पर अपहरण के दौरान मदद करने के लिए मामला दर्ज कर लिया है। भारतीय दंड संहिता की धारा 120 और 366 के अंतर्गत मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने इस मामले से जुड़े कई लोगों से पूछताछ कर रही है और आरोपित के परिवारों वालों को भी पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है। 

अभी तक यह बात स्पष्ट नहीं हो पाई है कि जब पुलिस इस मामले में ग्रूमिंग जिहाद का पहलू खारिज कर चुकी है तब आरोपित के परिजनों को पूछताछ के लिए हिरासत में क्यों लिया। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि फ़िलहाल मामले की जाँच चल रही है और तमाम तथ्य सामने आने हैं इसलिए पुलिस कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं कर रही है।  

‘लव जिहाद’ के विरुद्ध यूपी सरकार का क़ानून 

पिछले कुछ समय में देश के कई क्षेत्रों में ग्रूमिंग जिहाद/लव जिहाद के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई है। इस तरह के मामलों में शादी के दौरान जबरन धर्मांतरण रोकने के लिए उत्तर प्रदेश की योगी सरकार क़ानून लेकर आ रही है। 24 नवंबर को योगी सरकार ने एक अध्यादेश पारित किया था जिसकी मदद से शादी के दौरान जबरन या धोखा देकर कराया जाने वाला धर्मांतरण रोका जा सके। 

इस अध्यादेश का नाम  ‘उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म समपरिवर्तन प्रतिषेध अध्यादेश 2020’ है। इसके तहत दोषी पाए जाने पर 10 साल तक की जेल और 15 हज़ार रुपए तक का आर्थिक जुमाना हो सकता है। इसके पहले प्रदेश के गृह मंत्रालय ने इस अध्यादेश के संबंध में राज्य के ही क़ानून विभाग को एक प्रस्ताव भेजा था।