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मसूद की फौज दर्रे में घुसती और दो टुकड़े कर डालते मराठा: शिवा नाई, बाजी और शिवाजी के विशालगढ़ पहुँचने की गाथा

सदियों के अंधकार के बाद दक्षिण में एक सूर्य निकला जिसने पददलित हिंदू जनमानस को एक बार फिर से सीना चौड़ा कर चलने का अवसर प्रदान किया। उस सूर्य का नाम था शिवाजी।

पूरा भारत मुख्यतः तीन सल्तनतों के अधीन था। मुग़लशाही, कुतुबशाही और आदिलशाही। मुगलों ने पूरे उत्तर भारत को और बाकी दोनों शाहियों ने दक्षिण भारत को अपना गुलाम बना रखा था। उस समय शिवाजी के पिता बीजापुर की आदिलशाही सल्तनत के एक सरदार थे। उन्होंने बालक शिवा पर कभी खुश होकर उन्हें एक छोटी सी रियासत दे दी। हालाँकि उन्होंने कभी कहा नहीं, पर शिवाजी ने उनकी अनकही आज्ञा का मान रखते हुए अपनी छोटी सी जमीदारी को इतना बढ़ाया कि आदिलशाही ही नहीं, बल्कि मुग़लशाही भी त्रस्त हो गई।

बीजापुर के सुल्तान ने बड़ी हसरत से अफजल खान को शिवाजी का सफाया करने भेजा था, लेकिन अफजल खान अपनी आधी से अधिक सेना के साथ समाप्त हो गया। शिवाजी के सेनापतियों का हौसला बुलंद था। उन्होंने पूरे प्रदेश में खण्डनी वसूलनी शुरू कर दी। बीजापुर में यह अफवाह फैल गई कि शिवाजी बीजापुर पर हमला करने वाला है और अली आदिलशाह को गद्दी से उतारकर किसी दूसरे को सुल्तान बनाना चाहता है। सुल्तान ने दरबार बुलाया और कर्नूल के बहादुर सरदार सिद्दी जौहर से सहायता माँगी।

सिद्दी जौहर बहुत पराक्रमी, युद्ध कुशल और जोशीला व्यक्ति था। वह 20 हजार घुड़सवार और 40 हजार पैदल सेना के साथ शिवाजी को सबक सिखाने पन्हालगढ़ चल दिया। उसके साथ पिछली जंग से शिवाजी से हारे हुए सरदार, फजल खान और रुस्तमजहाँ भी थे।

शिवाजी की तमाम सेनाएँ अलग-अलग क्षेत्रों में, अलग-अलग मुहिमों में व्यस्त थी। समय शिवाजी के पक्ष में नहीं था और सिद्दी जौहर चला आ रहा था। तभी खबर मिली कि मुगलों का सरदार शाइस्ता खान भी 75 हजार की सेना के साथ निकल पड़ा है। शिवाजी ने अपने सभी किलों को अनाज, घी, बारूद से भर देने और पानी की समुचित व्यवस्था कर लेने का आदेश दे दिया था।

कुछ ही दिनों में सिद्दी की फौज पन्हालगढ़ के किले तक आ गई और उसने समय न गँवाते हुए तुरन्त ही किले को हर तरह और हर तरफ से घेर लिया। उधर शाइस्ता खान ने पुणे पर कब्जा कर लिया और चैन से बैठ गया। 2 महीने बीत चले। शिवाजी भी अपनी तोपों के भरोसे आराम से बैठे थे। सिद्दी जौहर का घेरा बहुत मजबूत था, फिर भी वह जब भी आगे बढ़ता, किले की तोपों की मार से उसे वापस लौटना पड़ता।

शिवाजी को उम्मीद थी कि जैसे ही वर्षा ऋतु शुरू होगी, सह्याद्रि से आती पानी की मार से घेरा अस्त-व्यस्त हो जाएगा और वे अपने चुनिंदा साथियों के साथ निकल जाएँगे। पर सिद्दी भी कम जिद्दी नहीं था। वह वर्षा ऋतु में भी डटकर खड़ा रहा। घेरा ढीला होने की जगह और कस दिया गया। उसने एक चाल और चली। राजापुर के अंग्रेजों को खूब पैसे खिलाकर उनकी लम्बी दूरी तक मार करने वाली तोपें और तोपची मँगवा लिए।

यह वही अंग्रेज थे जिन्हें कुछ ही महीने पहले शिवाजी ने अभयदान दिया था और संधि की थी। अंग्रेजों की आधुनिक हल्की तोपों ने सिद्दी जौहर का पलड़ा भारी कर दिया। अब तो कुछ भी करके किले से बाहर निकलना ही था अन्यथा पिंजरे में फँसे शेर की तरह कुछ ही दिनों में हिन्दूशाही का उत्साह फेन की भाँति बैठ जाता।

एक रात पन्हालगढ़ के किले की दीवार से रस्सियों के सहारे एक संन्यासी को ऊपर लाया गया और वह शिवाजी के सामने पेश हुआ। उसे देख शिवाजी बहुत खुश हुए। उसके गले लगते हुए बोले, “अरे महादेव, तू इधर कैसे?”

संन्यासी के भेष में आया यह महादेव शिवाजी का खास जासूस और मित्र था। पिछले महीने भर से सैनिक बनकर सिद्दी की सेना में था और आज मौका देखकर किला चढ़ गया था। वह उत्साहित स्वर में बोला, “राजे, ऐसा घेरा मैंने कभी नहीं देखा था। सिद्दी के सारे सरदार दिन में कई-कई बार चक्कर लगाकर देखते हैं कि कहीं कोई कमजोर कड़ी तो नहीं है। खुद सिद्दी भी दिन में दो चक्कर लगाता है। पर राजे, उत्तर की ओर जो पहाड़ी ढलान है, वहाँ दो चौकियों के बीच की दूरी बाकियों से अधिक है। वहीं से दाँव लगाया जा सकता है।”

शिवाजी ने पूरी बातें सुनी और महादेव को आराम करने के लिए कहकर अपने कमरे में चले गए। अगले दिन सभा बैठी। बाजीप्रभु, त्र्यम्बकराव, गंगाधरपन्त, येसाजी जैसे सरदार जुटे। वहाँ महादेव को बुलाया गया और महादेव ने सारी बातें बताई। यह सब सुनकर त्र्यम्बकराव बोले, “यह तो शुभ समाचार है। अब रुकने का कोई फायदा नहीं। जितनी जल्दी हो, आप यहाँ से निकल जाइए राजे।”

बाजीप्रभु अपना रोष छुपा न सके, “हमारे होते हुए राजे यूँ छुप-छुपाकर भागें, यह हम मराठों के लिए डूब मरने के बात है।”

इस पर शिवाजी बोले, “इतिहास से शिक्षा लो बाजी। क्या कृष्ण मथुरा से निकल नहीं गए थे। क्या यह यादवों के लिए डूब मरने की बात थी? और कृष्ण जो गए तो कभी वापस नहीं आए। पर हम जाएँगे तो दुगनी शक्ति से वापस भी आएँगे। युद्ध में अंतिम जीत-हार से पहले कई बार छोटी-छोटी लड़ाइयाँ हारनी भी पड़ती हैं। अतः यह न सोचो कि हम अंतिम रूप से हार गए हैं।” कुछ क्षण रुककर वे पुनः बोले, “यद्यपि यहाँ से निकलना ही अत्यंत कठिन है, पर उससे अधिक कठिन होगा, निकलने के बाद पंद्रह कोस की दूरी तय कर विशालगढ़ तक पहुँचना। क्या हम इतनी दूर शत्रुओं की नजर में आए बिना, या पीछा करती फौज से बचकर पहुँच सकते हैं?”

अबकी बाजीप्रभु पूरे जोश से बोले, “राजे! आप बस इस किले से निकलिए। आपको विशालगढ़ तक पहुँचाने का जिम्मा मेरा।”

अगली रात महादेव के साथ दस सैनिक किले की खिड़की (छोटे दरवाजे) से निकले और उन चौकियों के बीच से निकलकर कुछ आगे जाकर सकुशल वापस आ गए। अगली कुछ रातों तक ऐसा ही किया गया। हर बार सैनिक बढ़ जाते। दो-तीन बार पालकी भी ऐसे ही आर-पार की गई। सब ठीक था, पर राजे संतुष्ट नहीं थे। योजना में कुछ तो कमी थी।

इस मौके पर पकड़ा जाना बहुत भारी पड़ता। वे डरते नहीं थे, बल्कि यह सोचकर परेशान थे कि यदि इस समय वे पकड़ लिए गए तो हिन्दूशाही का सपना आकार लेने से पहले ही समाप्त हो जाएगा। मराठों के बीच आपसी मन-मुटाव इतना अधिक था कि यदि वे न रहे तो मराठे और सारी जनता यूँ ही न जाने कितनी पीढ़ियों तक गुलाम बनी रहेंगी।

शिवाजी का नापित ‘शिवा’ उनका बहुत मुँह लगा था। बावजूद इसके, वह कई दिन से उनकी उदासी पढ़ रहा था पर कुछ बोलने की हिम्मत न होती थी। एक दिन शिवाजी अपने आंतरिक कक्ष में आए तो देखा कि उनका नाई उनके वस्त्र और आभूषण पहनकर शीशे के सामने खड़ा है और अपनी दाढ़ी को एक खास तरीके से सँवार रहा है।

शिवाजी चुपचाप कौतूहल से उसे देखते रह गए। जब शिवा नाई ने अपनी सज्जा पूरी कर ली तो शिवाजी राजे की आँखें फटी रह गईं। वह हूबहू उनका प्रतिबिंब लग रहा था। शिवा नाई ने इतने पर ही बस नहीं किया, बल्कि उसने राजे की जूतियाँ पहन ली, उनका कटार खोंस लिया और कुछ कदम चहलकदमी करने लगा। तभी उसकी नजर अपनी ओर देखते राजे पर पड़ी। वह हड़बड़ा गया और झपटकर उनके पैरों में गिर पड़ा।

इस बेअदबी पर भी शांत रहकर राजे ने प्रश्न किया, “शिवा, यह सब क्या?”

शिवा ने अत्यंत विनीत होकर कहा, “राजे, अपराध क्षमा। लेकिन मैंने यह सब खिलवाड़ में नहीं पहना। गणपति ने मुझे आपके जैसा डील-डौल दिया है। मैं देख रहा था कि यदि मैं आपकी तरह के कपड़े वगैरह पहन लूँ तो क्या राजे बन सकता हूँ। राजे! देखिए, मैं बिल्कुल आप जैसा ही लगता हूँ। मराठे भले मुझे पहचान लें पर शत्रु इतनी आसानी से नहीं पहचान सकेंगे। छोटा मुँह बड़ी बात, मैं आपको सलाह देने चला हूँ, पर मेरी विनती सुन लीजिए। क्या हो कि मैं आपके भेष में पकड़ा जाऊँ? फिर तो आपका रास्ता साफ हो जाएगा। आप आराम से निकल सकते हैं। है न राजे!”

एक मामूली नापित के मुँह से ऐसी बलिदान की बातें सुन राजे का मन भर आया। उन्होंने उसे गले से लगाया और कहा, “मेरे देश में जब तक तुझ जैसे नागरिक हैं, किसी शिवा को राष्ट्रसेवा में कभी कोई बाधा नहीं आ सकती। पर मैं स्वयं के प्राणों के लिए तेरे प्राण अर्पण नहीं कर सकता।”

शिवा पैरों में गिर पड़ा और बोला, “राजे! आपके लिए, महाराष्ट्र के लिए, भारत भूमि के लिए कितने-कितने मराठे सैनिक-भेष में युद्ध लड़ते है और मृत्यु पाते हैं। आप जब इस किले से निकलेंगे तो न जाने कितने वीर मराठे आपके लिए प्राणोत्सर्ग कर देंगे। तो क्या मैं ही इतना अधम हूँ कि अपने प्राण बचाता फिरूँ? मेरे हिस्से का स्वर्ग मुझसे न छीनो राजे। मरना तो कभी न कभी है ही, फिर आपके लिए मरना तो जीवन जीने से अधिक आनन्ददायक होगा।”

राजे कुछ बोल न सके और मन्त्रणा कक्ष की ओर चले गए।

रात गहरा गई थी। आसमान में इतने बादल थे कि पूनम की रात भी अंधकार में डूबी हुई थी। छोटे दरवाजे से दो पालकियाँ निकली। राजे, 600 बांदल मावळे सैनिक और 200 कहार। इतने कहार इसलिए कि कहारों की एक टोली के तनिक भी धीमा होते ही दूसरी टोली उनकी जगह ले ले।

बरसाती कीचड़ और पहाड़ी-पथरीले रास्ते से लगातार भागते हुए जाना था। सब नंगे पैर थे, कि तनिक भी आवाज न हो। शिवा नाई को एक पालकी में शिवाजी राजे के भेष में बिठा दिया गया और उसकी पालकी दूसरे रास्ते से चल पड़ी। शिवाजी ने भी अपने सरदारों से जल्दी से विदा ली और पालकी में बैठ गए। सब लोग चल पड़े।

दुश्मन की चौकियाँ नजदीक आ गई थी। शिवाजी की टोली बहुत आहिस्ते, बिना शोर किए चली जा रही थी, चौकियाँ पार भी हो ही गई थी कि किसी सैनिक का पैर बरसात के कीचड़ में धँस गया। पैर के धँसने और निकालने की आवाज भी उस नीरवता में बड़ी जोर से गूँजी। पहरेदार सिपाहियों का ध्यान आकृष्ट हुआ और जोर की आवाज हुई, “होशियार”। यह आवाज सुनते ही अब तक ‘धीमे चलो, आहिस्ते चलो’ कहने वाले बाजीप्रभु ने आदेश दिया ‘तेज चलो’ और पूरी टोली धनुष से छूटे तीर की तरह भाग चली।

सिद्दी जौहर अपने डेरे पर सोया हुआ था। उसे शिवाजी के भाग जाने की मनहूस खबर सुनाई गई। सिद्दी की नींद पूरी तरह उड़ गई और अब उसका गुस्सा देखने लायक था। जिसे पकड़ने के लिए वह महीनों तक डेरा डाले रहा, वह भाग गया! अपने मातहतों पर चिल्लाता, शिवाजी को पकड़ने के लिए टुकड़ियाँ भेजता, सिद्दी बेवजह यहाँ से वहाँ भाग रहा था तभी उसे खुशखबरी मिली, “शिवाजी पकड़ा गया।”

सिद्दी के चेहरे का तनाव जाता रहा। उसकी आँखें हँसने लगी। थोड़ी देर में मसूद खान के पीछे-पीछे शाही चाल से चलते हुए शिवाजी ने प्रवेश किया। उन्हें देखकर लगता ही नहीं था कि वे किसी दुश्मन के खेमे में खड़े हैं। उन्होंने इत्मीनान से सबकी ओर देखा और सिद्दी पर उनकी नजरें ठहर गईं। सिद्दी इस जलवे को देख भौचक रह गया।

व्यंग्य से पूछा, “क्यों राजे! भाग रहे थे क्या?”

राजे बोले, “हाँ, सोचा तो यही था।”

“तो बात नहीं बनी?”

“बनी होती तो यहाँ आपके सामने तो न खड़ा होता।”

“ओह, बैठिए, बैठिए। बेअदबी के लिए माफ़ी चाहता हूँ।”

शिवाजी बैठ गए तो सिद्दी उनके सामने बैठकर बोला, “तो राजे, भाग तो आप पाए नहीं! फिर भी, जाते तो कहाँ जाते?” किंचित मुस्कुराकर राजे बोले, “हमारे धर्मग्रंथ कहते हैं कि कर्म कर, फल की चिंता न कर। किले से निकलना तो था ही। अब आपके सामने हूँ, मौका लगा होता तो विशालगढ़ पहुँच जाता। वहाँ आप कुछ न कर पाते।”

राजे को यूँ निश्चिंतता से बात करता देख फजल खान का गुस्सा उफ़न पड़ा। बोला, “इस शिवा के बच्चे ने हमें कैसे-कैसे दिन दिखाए और आप इससे इतनी तहजीब से पेश आ रहे हैं? सल्तनत का दुश्मन है ये। इसकी गरदन अभी उड़ा दी जानी चाहिए।”

सिद्दी गुस्से में बोला, “खबरदार! राजे सल्तनत के दुश्मन होते हुए भी, छोटे-मोटे सरदार नहीं, बल्कि राजा हैं। इनका फैसला सुल्तान करेंगे। अभी यह हमारे मेहमान हैं। इनकी शान में गुस्ताखी बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”

सिद्दी अभी बोल ही रहा था कि एक जासूस हड़बड़ाता हुआ अंदर आया और सिद्दी के कान में कुछ बोल गया। उसकी बात सुनते ही सिद्दी हड़बड़ाकर उठा और शिवाजी से बोला, “कौन हो तुम?”

“मैं, शिवाजी।”

“खबरदार गुस्ताख़। शिवा तो अभी भी विशालगढ़ के रास्ते पर भाग रहा है। तू कौन है कमबख्त?”

शिवा खूब हँसा और बोला, “मैं शिवाजी हूँ। शिवाजी राजे का नाई, शिवा नाई। और तुम लोगों ने क्या समझा, शिवाजी कोई बालक हैं जो पकड़ लोगे। अब तक तो वे तुमसे एक पहर की दूरी तय कर चुके।”

शिवा नाई की यह हँसी सिद्दी को बर्दाश्त नहीं हुई। उसने अपनी तलवार उसके पेट में भोंक दी। शिवाजी का वह सिपाही मातृभूमि की जय बोलता वीर सैनिक की भाँति पीठ के बल गिर पड़ा।

मसूद अपनी फौज जमाकर विशालगढ़ की ओर दौड़ पड़ा। उधर विशालगढ़ के रास्ते पर पालकी उठाए कहार दौड़े चले जा रहे थे। उन्हें घेरे बाजीप्रभु और 600 सैनिक भी बराबर दौड़ रहे थे। आधी रात से भागते-भागते सुबह हो आई थी, लेकिन मजाल है कि किसी के कदम एक पल को भी रुके हों।

भागते-भागते दोपहर हो गई, लेकिन विशालगढ़ न आया। उधर मसूद घोड़े पर बैठा उड़ा चला आ रहा था। विशालगढ़ से 3 कोस दूर गजापुर की घाटी तक शिवाजी की टोली आ गई थी, उनके पीछे से 1,500 की फौज के साथ आता मसूद दिखने लगा था। कोढ़ में खाज यह हुआ कि आगे गए जासूस खबर लाए कि मराठा सरदार सुर्वे और राजा जसवंत सिंह विशालगढ़ पर घेरा डाले बैठे हैं। देश का कैसा भाग्य कि जसवंत सिंह जैसा राजपूत राजा और सुर्वे जैसा मराठा सरदार मुगलों के पक्ष में थे। बाजीप्रभु ने पालकी रुकवाई। उन्होंने राजे से कहा, “राजे, हम फँस गए हैं। हुक्म हो।”

राजे की बुद्धि भी काम नहीं कर रही थी। वह अभी कुछ तय ही कर रहे थे कि बाजीप्रभु बोल उठे, “राजे! अधिक समय नहीं है। पीछे मसूद है और आगे सुर्वे। आप आधी फौज लेकर सुर्वे का घेरा तोड़ते हुए विशालगढ़ पहुँच जाइए। तब तक मैं मसूद को रोकता हूँ।”

“लेकिन केवल 300 के साथ तुम 1500 से कैसे लड़ोगे?”

“मुझे लड़कर जीतना नहीं है राजे, बस कुछ देर तक उन्हें रोकना है। यह दर्रा मेरे बड़े काम आएगा। बस आप सकुशल पहुँच जाइए।”

शिवाजी समझ रहे थे कि बाजी क्या कह रहा है। वह राजे की जान बचाने के लिए अपनी जान दाँव पर लगा रहा है। पर कोई दूसरा उपाय भी तो नहीं। भारी मन से शिवाजी ने बाजीप्रभु को गले लगाया और जाने के लिए मुड़े। बाजीप्रभु ने उतावली में कहा, “बस किले में पहुँचकर एक तोप दगवा दीजिएगा, जिससे हमें मालूम पड़ जाए कि आप सही सलामत पहुँच गए हैं।”

शिवाजी आधे सिपाहियों के साथ चले गए। उनके जाते ही बाजीप्रभु सिंह की तरह दहाड़ते हुए बोले, “मेरे बहादुरों। हमारे राजा जब तक गढ़ न पहुँच जाए, तब तक एक भी शत्रु इस दर्रे से होकर नहीं गुजरना चाहिए। मराठी आन की लाज हमारे हाथों में है। हर हर महादेव!”

300 वीरों के घोष से वह घाटी जीवंत हो उठी। उधर शिवाजी अपने वीरों से साथ दौड़े चले जा रहे थे। जब विशालगढ़ कुछ ही दूर रहा तब सुर्वे को खबर हुई। वह दौड़ता हुआ आया पर वीर शिवाजी के वीरों के आगे उसकी एक न चली।

शत्रुओं को गाजर की तरह काटते हुए शिवाजी और उनके मावळे विशालगढ़ पहुँच गए। नगाड़े बज उठे। शिवाजी ने तुरन्त एक तोप दागने का हुक्म दिया। राजे ने सभी घायल सैनिकों की तुरन्त मरहम पट्टी का आदेश दिया और खुद किले के सबसे ऊँचे बुर्ज पर खड़े होकर गजापुर की ओर देखने लगे।

गजापुर शांत दिखाई देता था। रात हो गई। बड़ी मायूसी से राजे बैठकखाने में आए। तभी किलेदार भागता हुआ आया। उसके पीछे-पीछे एक घायल सैनिक को लाया जा रहा था। उसे एक ऊँचे स्थान पर लिटा दिया गया। उस सैनिक ने जब राजे को देखा तो उठने का प्रयास किया, इतने भर से ही जाने कहाँ-कहाँ से रक्त की धाराएँ बह चली। राजे ने व्याकुलता से उससे कहा, “लेटे रहो और बताओ क्या हुआ?”

सैनिक बड़ी मुश्किल से, अटकते-अटकते बोला, “राजे, बाजीप्रभु खूब लड़े। दर्रे से एक भी सैनिक पार न हो सका। जो भी आता बाजी उसके दो टुकड़े कर देते। हम मौका देखकर पीछे हटते और शत्रुओं के घुसते ही उन्हें काट देते। एक समय तो ऐसा आया राजे कि जो शत्रु सैनिक बढ़-बढ़कर आ रहे थे, अब आगे बढ़ने में सकुचाने लगे। बाजी उन्हें भाला फेंक-फेंककर मार रहे थे। मसूद की एक न चली। आखिर में उसने बन्दूक मँगाई और ताककर बाजीप्रभु को छलनी कर दिया। उनके सीने में गोली लगी। बाजी गिर गए, पर उनकी जगह लेने के लिए तमाम मराठे थे ही। हमें लगा कि बाजी मारे गए, पर दो पल में ही उन्होंने आँखें खोल ली और पूछा ‘क्या तोप की आवाज सुनाई दी’, जब उन्हें बताया कि नहीं, तो वे तुरन्त उसी अवस्था में उठ गए और बोलने लगे, ‘राजे गढ़ तक नहीं पहुँचे, तो बाजी भला उससे पहले मर कैसे सकता है?’ वे फिर से भाला लेकर शत्रु के सामने तन कर खड़े हो गए। उन्होंने दसियों शत्रु-सैनिक काट गिराए।” थोड़ी साँस लेकर सैनिक पुनः बोला, “राजे, तभी तोप की आवाज सुनाई दी और बाजीप्रभु ‘राजे, आखिरी सिजदा’ बोलकर गिर पड़े।” इतना बोलकर उस सैनिक ने भी अपनी आँखें मूँद ली। शिवाजी उस सैनिक के सीने पर गिर पड़े।

टोटल 7 हैं भाई, पर भौकाल ऐसा जैसे यही IIMC हों: क्यों हो रहा दीपक चौरसिया का विरोध?

भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC) का 2020-2021 शैक्षणिक सत्र आरंभ हुए अभी महीना भर भी नहीं हुआ है और पत्रकारिता सीखने आए कुछ छात्र-छात्राओं ने संस्थान को ही पत्रकारिता के ‘सही मूल्यों’ का पाठ पढ़ाना शुरू कर दिया है। हफ़्ते भर चले इंट्रोडक्टरी सेशन्स, जिसमें विद्यार्थियों को आईआईएमसी के प्रत्येक कैंपस से जुड़े अध्यापक-अध्यापिकाओं को जानने का मौका मिला, के बाद अब ओरिएंटेशन सेशन्स की बारी है। ओरिएंटेशन सेशन्स में देश-विदेश से कई प्रख्यात वक्ता आमंत्रित किए गए हैं। यह सत्र गत सोमवार को शुरू हुआ था, जिसका अंतिम दिन आज (शुक्रवार, 27 नवंबर 2020) को है।

मामला विवादों में तब आया या कहें लाया गया, जब सत्रारंभ की जानकारी देते हुए इंगलिश जर्नलिज्म की कोर्स डायरेक्टर प्रोफेसर सुरभि दहिया ने ट्वीट किया और उस पर कुछ विद्यार्थियों ने प्रतिक्रिया देनी शुरू की। कुछ छात्र-छात्राओं ने 27 नवंबर के सत्र में पत्रकार दीपक चौरसिया को बुलाए जाने को लेकर पर प्रोफेसर दहिया के ट्वीट पर कमेंट करते हुए आपत्ति दर्ज कराई। समर्थन में आह जी-वाह जी करने को कुछ इक्के-दुक्के पूर्व छात्र भी पहुँचे। बावजूद विरोध करने वालों की कुल संख्या 7 रही।

आईआईएमसी के वर्तमान सत्र की छात्रा पल्लवी गुप्ता लिखती हैं, “आदरणीय मैडम, हम सभी सत्र के उद्घाटन को लेकर बहुत उत्साहित हैं। हम जानते हैं कि इस समय कोई बदलाव करना संभव नहीं है। यहाँ मैं दीपक चौरसिया को उद्बोधन समारोह में बुलाने से चिंतित हूँ। मैं पत्रकारिता की छात्रा के रूप में उनके जैसे घृणा फैलाने वाले को नहीं सुनना चाहती।”

पल्लवी गुप्ता से सहमति जताते हुए अनामिका यादव लिखती हैं, “मैं इसपर बिल्कुल सहमत हूँ। हम आपके कोशिशों की तारीफ करते हैं, लेकिन दीपक चौरसिया को सुनना ठीक नहीं लगता है। वह उनमें से एक हैं जिन्हें पत्रकारिता में सिर्फ बुरे बदलाव के लिए जाना जाता है।”

पूर्व छात्र ऋषिकेश शर्मा ने लिखा है, “आप के प्रतिरोध से पता चलता है कि आईआईएमसी अब भी ज़िंदा है। हमेशा गलत मूल्यों और उन्हें मंच देने वालों के खिलाफ खड़े रहें। मुझे आप के सीनियर होने पर गर्व महसूस हो रहा है।” अन्य ट्वीट में ऋषिकेश शर्मा कहते हैं, “मंत्री, ऑर्गेनाइजर के संपादक और दीपक चौरसिया जैसे लोग आपको पत्रकारिता सिखाने आ रहे हैं, यह संस्थान और पत्रकारिता के मूल्यों के लिए शर्म की बात है। जब-जब संस्थान इस तरह की चीजों को लागू करने की कोशिश करे, आप सभी इनके खिलाफ खड़े हों। यह उन सभी मूल्यों के बारे में है जिन पर आप विश्वास करते हैं।”

एक अन्य छात्र साजिद कहते हैं, “ज़रा दीपक चौरसिया का ट्विटर अकाउंट खोलकर देखो, हर दिन की शुरुआत ज़हर से होती है। मैं एक आईआईएमसी के ज़िम्मेदार छात्र होने के नाते अपना विरोध दर्ज करता हूँ। एक ऐसे व्यक्ति को जो दिन-रात समाज में नफ़रत फैलाने का काम करता हो उसको आमंत्रित करना एक गैर जिम्मेदाराना कार्य है।”

साजिद के ट्वीट पर एक पूर्व छात्रा अवंतिका तिवारी लिखती हैं, “अभी से ही इस नए बैच पर इतना गर्व है। हम आपके साथ हैं। बस सत्ता में बैठे लोगों से सवाल करते रहें।”

विष्णु प्रताप ने लिखते हैं, “मैं दीपक चौरसिया जैसे नफरती लोगों को समारोह में आमंत्रित करने के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कर रहा हूँ। हम अपने संस्थान से अधिक उम्मीद करते हैं। साथ ही, जिस प्रोफेसर ने गाँधी को पाकिस्तान का पिता कहा था, वह हमारी संस्था और हमारे देश के लिए शर्मनाक है।”

मुहम्मद सैफ अली खान लिखते हैं, “यह साफ हो जाए कि कोई भी चौरसिया जैसा नहीं बनना चाहता और उन जैसे किसी को किसी भी शैक्षणिक संस्थान में नहीं बुलाया जाना चाहिए… इनके जैसे पत्रकार भारतीय पत्रकारिता के लिए कलंक हैं।”

कुल 7 लोगों द्वारा चलाए जा रहे इस ‘भारी विरोध’ को देखकर मन में प्रश्न अब यह उठता है कि पत्रकारिता के सही मूल्यों की दुहाई देने वाले यह कैसे भूल गए कि पत्रकारों को पहला पाठ ही यह पढ़ाया जाता है कि हर पक्ष को सुनना और जनता के सामने रखना ज़रूरी है, फिर कौन सही है और कौन ग़लत ये जनता खुद तय करेगी। पर यहाँ तो उल्टी धार बहाते हुए भावी पत्रकारों ने पक्षों को सुनने से पहले ही बॉयकॉट कर दिया। बिना सुने ही असहमति दर्ज करा दी। ख़ैर, स्थिति गलत भले हो पर अजीब तो नहीं है। कक्षा आरंभ होने तक रुकते, तब न पहला पाठ समझते…

मानो एक्टिविज़्म और जर्नलिज़्म के बीच कन्फ्यूज़्ड युवा, किसी एनजीओ की जगह आईआईएमसी पहुँच गए हों। दिक्कत तब आती है जब गिने-चुने कुछ अति उत्साही लोगों के कारण पूरा संस्थान और इससे जुड़े सभी विद्यार्थी लपेट लिए जाते हैं। संदर्भ के लिए बता दें, 26 नवंबर को न्यूजलॉन्ड्री पर पब्लिश एक रिपोर्ट का शीर्षक है, “आईआईएमसी के छात्र क्यों कर रहे हैं दीपक चौरसिया का विरोध?” इसे पढ़ कर ऐसा लगता है जैसे संस्थान के सभी छात्र विरोध में उतर आए हों।

दीपक चौरसिया को पूर्वाग्रह से ग्रसित बताकर विरोध करने वालों ने क्या खुद पूर्वाग्रह नहीं पाल रखे हैं? क्या विरोध का कारण यह नहीं है कि दीपक चौरसिया उनके विचारों के अनुरूप नहीं बोलते? क्या बिना सुने ही किसी को सिरे से नकार देना सही है? जो हमारी विचारधारा से सहमत नहीं, उन्हें बोलने का ही अधिकार नहीं है? ये कुछ प्रश्न प्रत्येक भावी पत्रकार को खुद से पूछना चाहिए।

दीपक चौरसिया या उनके जैसे किसी भी पत्रकार से व्यक्तिगत असहमति बिल्कुल जायज़ है। आप टीवी पर उनको न देखें, न सुनें, यह आपकी इच्छा है। पर अपनी व्यक्तिगत असहमति दर्ज कराते हुए जब आप “मैं एक आईआईएमसी के ज़िम्मेदार छात्र होने के नाते” लिखते हैं, तब आप एक पूरे संस्थान का प्रतिनिधित्व करने लगते हैं और समस्या तब खड़ी होती है।

ये कौन से किसान हैं जो कह रहे ‘इंदिरा को ठोका, मोदी को भी ठोक देंगे’, मिले खालिस्तानी समर्थन के प्रमाण

पंजाब और हरियाणा के किसान केंद्र सरकार के कृषि सुधार क़ानून के विरोध में ‘दिल्ली चलो मार्च’ निकाल रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ प्रदर्शनकारी किसान करनाल से देश की राजधानी दिल्ली की तरफ बढ़ रहे थे। इस बीच पुलिस प्रशासन ने भी स्थिति पर नियंत्रण करने के लिए वाटर कैनन का इस्तेमाल किया था। लेकिन विरोध प्रदर्शन के दौरान कई पहलू सामने आ रहे हैं जिसमें सबसे ज़्यादा उल्लेखनीय है किसान आंदोलन का हिंसक पहलू। कथित तौर पर ऐसी तमाम तस्वीरें और वीडियो सामने आए जिसमें प्रदर्शन के दौरान खालिस्तान के समर्थन की बात सामने आ रही है। 

इसी तरह का एक वीडियो सामने आया है जिसमें एक तथाकथित किसान द्वारा स्पष्ट तौर पर यह कहते हुए सुना जा सकता है कि जैसे इंदिरा गाँधी को ठोका वैसे ही नरेंद्र मोदी को भी ठोक देंगे।

ट्विटर पर साझा किए गए एक समाचार चैनल के वीडियो में व्यक्ति कहता है, “अभी हमारी सरकार के साथ एक मीटिंग है अगर उसमें कुछ हल निकलता है तो ठीक है। मीटिंग 3 दिसंबर को तय की गई है और हम तब तक यहीं पर रहने वाले हैं। अगर उस मीटिंग में कुछ हल नहीं निकला तो बैरिकेड तो क्या हम तो इनको (शासन प्रशासन) ऐसे ही मिटा देंगे। हमारे शहीद उधम सिंह कनाडा की धरती पर जाकर उन्हें (अंग्रेज़ों को) ठोक सकते हैं तो दिल्ली कुछ भी नहीं है हमारे लिए। जब इंदिरा ठोक दी तो मोदी की छाती भी ठोक देंगे।” 

इसी वीडियो के अगले हिस्से में लोगों को यह कहते हुए भी सुना जा सकता है कि सरकार के साथ 3 दिसंबर को होने वाली बैठक में कोई नतीजा नहीं निकलता है। तब वहाँ मौजूद लोगों के पास बैरीकेडिंग तोड़ने और हिंसक होने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचेगा। ज़मीन पर हो रहे प्रदर्शन के अलावा सोशल मीडिया पर भी किसान आंदोलन को लेकर काफी प्रतिक्रिया सामने रही हैं। एक पंजाबी मीडिया समूह द्वारा साझा किए गए वीडियो में तमाम यूज़र्स ने टिप्पणी की है और टिप्पणी में वह इस आंदोलन को हिंसक बनाने की बात कह रहे हैं।

वह प्रदर्शन कर रहे किसानों को उग्र और हिंसक होकर अपनी बातें रखने का आह्वान कर रहे हैं। एक टिप्पणी में यूज़र किसानों के हाथों में एके-47 देने की बात कह रहा है। एक और यूज़र टिप्पणी करते हुए कहता है कि यह सार्वजनिक संपत्ति ही तो है, किसी के बाप की जागीर नहीं है। इसके अलावा तमाम टिप्पणियों में प्रधानमंत्री और सरकार के लिए अपशब्द भी कहे गए हैं।        

किसानों के प्रदर्शन के नाम पर इस तरह की हिंसक विचारधारा और खालिस्तानी आतंकवाद को बढ़ावा देने पर कई तरह के सवाल खड़े होते हैं। ट्विटर पर ऐसी तमाम तस्वीरें साझा की गई जिसमें खालिस्तान समर्थक पोस्टर लेकर प्रदर्शन करते हुए देखे जा सकते हैं।

पोस्टर और तस्वीरों में ‘राज करेगा खालिस्तान’ जैसे नारे भी लिखे हुए हैं,

कुछ पोस्टर में तो भिंडारवाले की तस्वीर भी लगी हुई है।

असल मायनों में इस प्रदर्शन का मकसद किसान हित है तो इसमें हिंसा का समर्थन और ‘इंदिरा को ठोका और मोदी को भी ठोक देंगे’ इस तरह के जहरीले बयानों का क्या अर्थ बनता है। आंदोलन की आड़ में हिंसात्मक गतिविधियों को बढ़ावा देने और खालिस्तान का समर्थन करने से किसानों का भला होने से रहा। बशर्ते आम नागरिकों के हिस्से की असुविधा और माहौल बिगड़ना ज़रूर सुनिश्चित हो जाएगा। ऐसे में सबसे पहले यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि प्रदर्शन के दौरान ऐसी अराजक ताकत प्रासंगिक न होने पाएँ।

गौरतलब है कि पंजाब और हरियाणा के किसानों का ‘दिल्ली चलो’ प्रदर्शन अंबाला-पटियाला सीमा पर उग्र हो गया था। यहाँ प्रदर्शन कर रहे किसानों ने बैरीकेडिंग तोड़ कर आगे बढ़ने का प्रयास किया था और पथराव की ख़बरें भी सामने आ रही थीं। इसके अलावा पुलिस ने इन पर आँसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल भी किया था और इस बीच किसान कई दिनों का राशन लेकर दिल्ली की तरफ कूच कर रहे थे। इस मुद्दे पर कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने बयान दिया था, उन्होंने किसानों से प्रदर्शन नहीं करने की अपील की थी और 3 दिसंबर को बातचीत के लिए आमंत्रित किया है।

BMC ने बदले की भावना से तोड़ा कंगना रनौत का ऑफिस, नुकसान की करे भरपाई: बॉम्बे HC ने लगाई फटकार

मुंबई महानगर पालिका (BMC) के खिलाफ लड़ाई में अभिनेत्री कंगना रनौत को बॉम्बे हाई कोर्ट में बड़ी जीत मिली है। हाई कोर्ट ने कंगना के बंगले पर बीएमसी की कार्रवाई को अवैध और दुर्भावना से परिपूर्ण माना है और बीएमसी का नोटिस रद्द कर दिया है।

हाई कोर्ट ने बीएमसी को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि यह बदले की भावना के तहत की गई कार्रवाई थी। बॉम्बे हाईकोर्ट के जज ने टिप्पणी करते हुए कहा, “कंगना रनौत के मुंबई को पीओके बनाने वाले बयान के अगले दिन एक नेता का बयान आता है और फिर कंगना को नोटिस देकर महज 24 घंटे का समय दिया जाता है। कार्रवाई होने के बाद अखबार में लिखा जाता है कि बदला ले लिया।”

गौरतलब है कि बॉलीवुड एक्ट्रेस कंगना रनौत के मुंबई स्थित ऑफिस में 9 सितंबर को बीएमसी (BMC) द्वारा 24 घंटे के आनन-फानन में दी गई नोटिस और फिर बदले की भावना से की गई तोड़फोड़ को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने बहुत सख्त लहजे में यह साफ कहा है कि बीएमसी का एक्शन दुर्भावनापूर्ण रवैये से किया गया है।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि बीएमसी को कंगना रनौत के ऑफिस में की गई तोड़फोड़ के लिए हर्जाना देना होगा। हाईकोर्ट ने कंगना के ऑफिस के नुकसान का आकलन करने के आदेश भी दिए हैं। इस संबंध में सम्बंधित अधिकारी मार्च 2021 तक अपनी रिपोर्ट हाईकोर्ट को सौपेंगे। नुकसान की भरपाई के लिए एजेंसी की रिपोर्ट पर फैसला हाईकोर्ट बाद में सुनाएगा।

बॉम्बे हाईकोर्ट के जज जस्टिस एसजे कैथावाला और आरआई छागला की बेंच ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा, “जिस तरह से यह तोड़फोड़ की गई वह अनाधिकृत था। ऐसा गलत इरादे से किया गया था। ये याचिकाकर्ता को कानूनी मदद लेने से रोकने का एक प्रयास था।” अदालत ने अवैध निर्माण के बीएमसी के नोटिस को भी रद्द कर दिया है।

बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक समिति बनाने को कहा है जो कंगना रनौत को हुए नुकसान का आकलन करेगी और फिर BMC से इसकी वसूली की कार्रवाई शुरू की जाएगी। तब तक अदालत ने कंगना को रहने लायक निर्माण कार्य करने की अनुमति दी है। साथ ही बीएमसी को कहा है कि आगे से किसी भी नागरिक पर ऐसी कार्रवाई करने से पहले 7 दिन का नोटिस दिया जाए।

हाई कोर्ट का फैसला आने के बाद कंगना ने भी ट्वीट कर अपनी ख़ुशी जाहिर की। उन्होंने लिखा, “जब कोई व्यक्ति सरकार के खिलाफ खड़ा होता है और जीतता है, तो यह व्यक्ति की जीत नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र की जीत है। आप सभी को धन्यवाद जिन्होंने मुझे हिम्मत दी और उन लोगों को भी धन्यवाद जिन्होंने मेरे टूटे सपनों पर हँसा। इसका एकमात्र कारण है कि जब आप एक खलनायक की भूमिका निभाते हैं, तो मैं एक हीरो हो सकती हूँ।”

ममता से असंतुष्ट मंत्री सुवेंदु अधिकारी ने छोड़ा HRBC चेयरमैन का पद, विधान सभा चुनाव से पहले TMC छोड़ने की अटकलें तेज

पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले तृणमूल कॉन्ग्रेस के भीतर अंदरूनी कलह बढ़ने लगी है, रह-रह के घमासान की खबरें भी सतह पर आने लगी हैं। TMC के कई नेताओं के पार्टी छोड़ने की ख़बरों के बीच बृहस्पतिवार (नवंबर 26, 2020) को सत्तारूढ़ पार्टी के मंत्री सुवेंदु अधिकारी ने हुगली रिवर ब्रिज कमिश्नर (HRBC) के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। इतना ही नहीं, अधिकारी के इस्तीफा देते ही पार्टी के सांसद कल्याण बनर्जी को तत्काल प्रभाव से चेयरमैन भी बना दिया गया। इस बीच सुवेंदु अधिकारी के टीएमसी छोड़ने की भी अटकलें भी तेज हो गई हैं।

पश्चिम बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) में कई महीने से विद्रोही रुख दिखा रहे परिवहन मंत्री सुवेंदु अधिकारी ने खुद को मनाने के लिए की जा रही तमाम कोशिशों के बीच अचानक जिस तरह से हुगली रिवर ब्रिज कमिश्नरेट (एचआरबीसी) के चेयरमैन पद से इस्तीफा दिया उससे उनके पार्टी छोड़ने के कयासों को फिर बल मिल रहा है। हालाँकि अभी तक उन्होंने ऐसी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है। क्योंकि ममता सरकार में सुवेंदु अधिकारी के पास अब भी मंत्री पद के अलावा सिंचाई विभाग का भी चार्ज मौजूद है।

गौरतलब है कि ममता बनर्जी सरकार में परिवहन, सिंचाई और जल संसाधन मंत्री सुवेंदु अधिकारी काफी लंबे समय से पार्टी से दूरी बनाकर चल रहे हैं। वह अपने कार्यक्रमों में पार्टी का झंडा इस्तेमाल नहीं करते। साथ ही उनके समर्थकों द्वारा राज्य में लगाए गए पोस्टर्स पर आमरा दादार अनुगामी लिखा होता है। ये पोस्टर्स प्रदेश के कई इलाकों में अधिकारी के समर्थकों द्वारा लगाए गए हैं। इस बीच राज्य में ऐसी मजबूत अटकलें हैं कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले वह टीएमसी छोड़ बीजेपी का दामन थाम सकते हैं।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हालाँकि, सुवेंदु अधिकारी ने इस पर अभी साफ़ तौर पर कुछ नहीं कहा है लेकिन उनके एक करीबी टीएमसी नेता ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि HRBC से इस्तीफे को उनके (अधिकारी के) टीएमसी से बाहर जाने की शुरुआत के रूप में देखा जा सकता है। वहीं, अधिकारी के पिता और टीएमसी सांसद शिशिर अधिकारी ने अपने बयान में कहा कि उन्हें अपने बेटे के इस्तीफे की खबर टीवी से मिली।

वहीं पश्चिम बंगाल के राजनीतिक हलकों के हवाले से मीडिया रिपोर्ट में यह दावे भी किये जा रहे हैं कि अधिकारी परिवार हमेशा पारिवारिक तौर पर ही सामूहिक निर्णय लेता है। इसलिए अगर सुवेंदु अधिकारी ने पार्टी छोड़ने का फैसला किया है तो यह साफ है कि उनके पिता और दो भाई भी टीएमसी छोड़ेंगे। अब देखना यह होगा कि आगे क्या होता है?

रिपोर्ट के अनुसार, यह कहा जा रहा है कि सुवेंदु अधिकारी अपने गृह जिले पूर्वी मिदनापुर के अलावा पश्चिमी मिदनापुर, बांकुरा, पुरुलिया, झारग्राम और बीरभूम जिले के कुछ भागों में करीब 35 से 40 विधानसभा सीटों पर अपना प्रभाव रखते हैं। ऐसे में अगले साल अप्रैल-मई में संभावित विधानसभा चुनावों को देखते हुए टीएमसी पिछले रास्ते से उन्हें मनाने की कोशिश भी कर रही है।

गौरतलब है कि टीएमसी के नेताओं के रवैये को देखते हुए पिछले दिनों हुगली से बीजेपी सांसद लॉकेट चटर्जी ने ममता सरकार पर तंज कसा है। चटर्जी ने कहा था, “तृणमूल कॉन्ग्रेस अब गुटबाजी से लड़ रही है। हुगली में टीएमसी नेता यह जानते हुए बाहर जाने की कोशिश कर रहे हैं कि पार्टी यहाँ अपने वादों को पूरा नहीं कर पाई। सिंगूर ने ममता को सत्ता दिलाई थी और यही जगह उनसे सत्ता छीनेगी भी।”

मैं नपुंसक नहीं.. हिंदुत्व का मतलब पूजा-पाठ या मंदिर का घंटा बजाना नहीं, फ़ोर्स किया तो हाथ धोकर पीछे पड़ जाऊँगा: उद्धव ठाकरे

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने शिवसेना के पूर्व मुखपत्र ‘सामना’ से साक्षात्कार में शिवसेना की पूर्व सहयोगी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर निशाना साधा है। उद्धव ठाकरे ने कहा कि उनके चुप होने का मतलब ये नहीं है कि वो नपुंसक हैं। साक्षत्कार में उद्धव ठाकरे ने कहा कि उन्हें विरोधियों के पीछे पड़ने को मजबूर ना किया जाए। इसके साथ ही ठाकरे ने कहा कि हिंदुत्व का मतलब मंदिर का घंटा बजाना नहीं है।

महागठबंधन सरकार के एक साल पूरे होने के मौके पर शिवसेना के राज्यसभा सांसद और सामना के संपादक संजय राउत को दिए एक साक्षात्कार में, उद्धव ठाकरे ने दिवंगत बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत मामले से उनके परिवार से लिए गए एक नंबर पर बात की।

महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे ने भाजपा और राज्य के अन्य विपक्षी दलों पर हमलावर होते हुए कहा, “मैं शांत हूँ लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं नपुंसक हूँ। परिवार पर हमला करना हमारी संस्कृति नहीं है। यही हिंदुत्व संस्कृति भी है। यदि आप हमारे परिवारों और बच्चों को निशाना बना रहे हैं, तो उन्हें यह भी याद रखना चाहिए कि उनके भी परिवार और बच्चे हैं।”

सीएम उद्धव ठाकरे ने विरोधी दलों की ओर इशारा करते हुए कहा कि वे कोई धुले हुए चावल नहीं हैं, अगर हमने तय कर लिया तो हम उनकी ‘खिचड़ी’ भी बनाना जानते हैं और अगर ज्यादा हावी होंगे तो हाथ धोकर पीछे पड़ जाऊँगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदर्भ में उद्धव ठाकरे ने कहा, “यदि आप पावर का दुरुपयोग कर रहे हैं, तो याद रखें कि पावर हमेशा के लिए नहीं रहती है। उन्हें अतीत में भी मामलों का सामना करना पड़ा है और शिवसेना सुप्रीमो (बाल ठाकरे) ने उन्हें बचाया था।”

सामाना के संपादक संजय राउत ने महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे से आर्किटेक्ट अन्वय नाइक की मौत के बारे में भी सवाल किए, जिसमें समाचार चैनल रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी पर भी आरोप आगे गए हैं।

इस मामले में ठाकरे ने कहा, “एक मराठी बिजनेसमैन को बाहरी लोगों ने धोखा दिया। उसने आत्महत्या कर ली और एक नोट लिखा। आप मामले को छुपा देते हैं और जो लोग फिर से जाँच की माँग करते हैं, आप ईडी को उनके पीछे दौड़ाते हैं। आप चाहते हैं कि हम आँखें मूँदें?”

भाजपा शासित राज्यों द्वारा ‘लव जिहाद’ कानून पर विचार किए जाने के बारे में पूछे जाने पर, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने बीजेपी पर हमला बोलते हुए कहा कि राजनीति में ही लव जिहाद का कॉन्सेप्ट लागू क्यों नहीं होना चाहिए? वे हिंदू लड़की से मुस्लिम लड़के की शादी का विरोध करते हैं, तो आपने महबूबा मुफ्ती के साथ गठबंधन क्यों किया? नीतीश कुमार?, चंद्रबाबू नायडू? विभिन्न राजनीतिक विचारधारा वाली पार्टियों के साथ आपने गठबंधन किया है क्या यह लव जिहाद नहीं है?

ठाकरे ने कहा कि वो हिंदुत्व की राजनीति नहीं करते हैं। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व मतलब सिर्फ पूजा-अर्चना करना और घंटा बजाना है क्या? इससे कोरोना नहीं जाता, यह सिद्ध हो गया है। ठाकरे ने कहा कि बेवजह किसी भी धर्म की आड़ में आप राजनीति मत करो। इस इंटरव्यू में ठाकरे ने बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत के विषय पर बात करने से बचते रहे।

देखिए 48 घंटों में द वायर ‘मोदी की रैली में कोई नहीं आता’ से ‘बिहार में मोदी को सब चाहते हैं’ कैसे पहुँच गया

लिबरल मीडिया गिरोह की सबसे अहम सदस्य और वामपंथी प्रोपेगेंडा वेबसाइट द वायर (The Wire) अक्सर अपनी ख़बरों को लेकर नहीं बल्कि ख़बरों से उपजे विवाद की वजह से ज्यादा चर्चा में रहती है। इस बार का मुद्दा भी ऐसा ही है जिसमें द वायर के डिप्टी एडिटर अजय आशीर्वाद ने हाल ही में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसभाओं पर दो विपरीत दावे किए। दावे के मुताबिक़ प्रधानमंत्री मोदी की जनसभाओं में 5 हज़ार लोग भी इकट्ठा नहीं हो पाए थे लेकिन चुनाव परिणाम आने पर अपने ही दावे का मज़ाक बनाते हुए ठीक उलटी बात कहने लगे। 

9 नवंबर 2020 यानी बिहार विधानसभा चुनाव का नतीजा आने के ठीक एक दिन पहले। स्वघोषित बुद्धजीवियों के तथाकथित अड्डा द वायर के डिप्टी एडिटर ने आत्मविश्वास से लबरेज़ होकर मुस्कराते हुए कहा-

“यह बिलकुल ही नरेंद्र मोदी की हार है। इसलिए है क्योंकि वह कोविड के दौरान 4 दिन आए और कुल 16 रैलियाँ की। इसमें मैं अगर गया का उदाहरण देता हूँ तो चुनाव आयोग ने कोरोना के दौरान हर नेता को अधिक से अधिक 10 हज़ार लोगों की जनसभा करने की परमीशन दी थी। प्रधानमंत्री मोदी को 20 हज़ार लोगों की परमीशन मिली हुई थी लेकिन उनकी जनसभा में 2.5 से 3 हज़ार की भीड़ ही आई थी और पटना में ठीक ऐसा ही हुआ जहाँ वह (मोदी) 5 हज़ार की भीड़ भी इकट्ठी नहीं कर पाए। तो भाजपा के नैरेटिव से देखें जिसके मुताबिक़ मोदी उन्हें चुनाव जिता देते हैं चाहे जितनी एंटी इंकम्बेंसी हो तो इस हार के लिए पूरी तरह मोदी जिम्मेदार होंगे। अगर वह (मोदी) चुनाव हारते हैं तो।” 

चुनाव परिणाम के पहले

उपरोक्त किए गए दावे का सारांश ‘मोदी की जनसभा में 2 -3 हज़ार लोगों की भीड़ भी नहीं आई और हार के लिए नरेंद्र मोदी ही जिम्मेदार होंगे।’ 

इसके बाद बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम सामने आए और द वायर एवं उनके विश्लेषक डिप्टी एडिटर अजय आशीर्वाद के दावे का पतन हो गया। लेकिन पतन के साथ-साथ महज़ एक दिन के भीतर वह भी पूरी रफ़्तार से पलटे और अपने ही दावों से उलट नरेंद्र मोदी के राजनीतिक प्रबंधन की व्याख्या करने लगे। 

बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम के बाद आए इस वीडियो में अजय आशीर्वाद कहते हैं, “जहाँ-जहाँ मैंने पूछा कि आप मोदी/भाजपा सरकार को किस तरह देखते हैं? लोगों ने बहुत सकारात्मक प्रतिक्रिया दिखाई। दक्षिण बिहार ले लीजिये, केंद्रीय या उत्तरी बिहार ले लीजिये यहाँ सभी मोदी और भाजपा सरकार को ठीक नज़रों से देख रहे थे। लोगों का कहना था कि केंद्र विकास के लिए फंड्स भेज रहा है मगर वह पैसा राज्य सरकार से जनता तक आते आते गायब हो जाता है।” इसके बाद अजय आशीर्वाद ने कहा कि एंटी इंकम्बेंसी मोदी सरकार के विरुद्ध थी ही नहीं बल्कि यह नीतीश सरकार के लिए थी (जबकि पिछले वीडियो में इनके मुताबिक़ मोदी की जनसभा में 2 से 3 हज़ार लोग इकट्ठा नहीं हो पा रहे थे)।                   

चुनाव परिणाम के बाद

द वायर सरीखे वामी मीडिया समूहों के लिए इस श्रेणी का गिरगिटनुमा विश्लेषण या दावा कोई नई बात नहीं है। प्रोपेगेंडा ही इनका एकमात्र उद्देश्य है भले उसके लिए स्क्रीन पर कुछ अनर्गल ही क्यों न परोसना पड़े। देश की सबसे बड़ी एजेंडापरस्त वेबसाइट अक्सर इस तरह के अवसरवादी दावों से लदी होती है। जिनमें न तो तथ्य होते हैं और न ही तर्क, जो होता है वह बस यही है जो ऊपर लिखा गया है, वैसे भी अपने दावों का मज़ाक बनाने का वैचारिक दुस्साहस सभी में नहीं होता।   

दिल्ली दंगा-2020: सार्वजनिक स्थानों पर दिल्ली पुलिस लगाएगी 20 दंगाइयों की तस्वीरें, जानकारी देने वालों को ईनाम

देश की राजधानी दिल्ली के उत्तर पूर्वी क्षेत्र में हुए ‘हिन्दू विरोधी दंगों’ को लेकर दिल्ली पुलिस ने एक बड़ा कदम उठाया है। इस साल 2020 में फरवरी महीने के दौरान हुए इन दंगों को दिल्ली पुलिस ने ‘आतंकवादी गतिविधि’ बताया है। इसके अलावा दिल्ली पुलिस ने उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के कुल 20 आरोपितों की तस्वीर जारी की है। दिल्ली दंगों के इन आरोपितों की तस्वीरें राजधानी के तमाम क्षेत्रों में लगाई जाएगी।

समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक़ दिल्ली दंगों के आरोपितों की तस्वीर सार्वजनिक स्थानों पर लगाए जाने के अलावा दिल्ली पुलिस ने एक और अहम बात कही है। दंगों के आरोपितों से संबंधित किसी भी तरह की जानकारी साझा करने वाले व्यक्ति को दिल्ली पुलिस की तरफ से ईनाम भी दिया जाएगा। बहुत जल्द दिल्ली पुलिस द्वारा राजधानी के अनेक इलाकों में इन 20 आरोपितों की तस्वीर सार्वजनिक स्थानों पर लगा दी जाएगी। 

साल 2020 फरवरी महीने के दौरान दिल्ली के अलग-अलग क्षेत्रों में हिन्दू विरोधी हिंसा भड़की थी। जिसमें सीलमपुर, जाफराबाद, मौजपुर, शिव विहार, बदरपुर और चाँद बाग़ मुख्य थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ हिंसा और दंगों की इन सिलसिलेवार घटनाओं में लगभग 50 से अधिक लोगों ने अपनी जान गँवाई थी और लगभग 700 लोग घायल भी हुए थे। 

24 से लेकर 26 फरवरी के बीच नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 के विरोध की आड़ में दंगाइयों ने पूरी राजधानी में हिंसा भड़काई थी। इन हिन्दू विरोधी दंगों की प्राथमिक जाँच के बाद दिल्ली पुलिस ने इस संबंध में चार्जशीट भी दायर की थी जिसमें उन्होंने दिल्ली दंगों को ‘आतंकवादी गतिविधि’ करार दिया था। फ़िलहाल दिल्ली पुलिस की तरफ से दंगों के इस मामले पर कार्रवाई जारी है। 

दिल्ली पुलिस ने अपनी चार्जशीट में और भी कई अहम बातों का ज़िक्र किया है। चार्जशीट के मुताबिक़, “हिंसक दंगों के दौरान तमाम हथियार बरामद किए गए थे, जिनका इस्तेमाल अपनी ड्यूटी कर रहे पुलिसकर्मियों पर किया गया था। नतीजतन दंगों की इन घटनाओं में लगभग 208 पुलिसकर्मी बुरी तरह घायल हुए थे सिर्फ एक क़ानून का विरोध करने के लिए। इसे किसी भी सूरत में आतंकवादी गतिविधि से हट कर कुछ और नहीं कहा जा सकता है।” 

हाल ही में उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए हिन्दू विरोधी दंगों और हिंसा को लेकर गृह मंत्रालय और दिल्ली सरकार ने बड़ा ऐलान किया था। ऐलान के मुताबिक़ जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद और शरजील इमाम पर गैर कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत मुकदमा चलाने को हरी झंडी दिखा दी गई है। यानी उमर खालिद और शरजील इमाम दोनों पर यूएपीए के तहत मुकदमा दर्ज करके आगे की कार्रवाई शुरू की जाएगी। 

इसके अलावा दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों में दिल्ली पुलिस द्वारा दायर की गई चार्जशीट में उमर खालिद को लेकर कहा गया था कि उसने केवल नास्तिक होने का ढोंग किया, वस्तुत: वह कट्टर मुस्लिम है जो भारत को तोड़ना चाहता था। उमर ऐसा मानता था कि हिंसक राजनीतिक इस्लाम (violent political Islam) को फ्रंटल पॉलिटिकल पार्टियों के साथ मिलना चाहिए ताकि भारत को अपने हिस्से में लिया जा सके।  

पाकिस्तान: निकाह में सास ने दामाद को तोहफे में थमाई AK-47, शान से फोटो खिंचवाते Video वायरल

सोशल मीडिया में एक शादी समारोह का वीडियो वायरल हो रहा है। इस वीडियो में एक महिला दूल्हे को तोहफे में AK-47 देते नजर आ रही है और समारोह में शामिल लोग यह देखकर खुशी से हल्ला मचा रहे हैं। बताया जा रहा है कि वीडियो पाकिस्तान में हुए एक निकाह का है। सास ने दामाद को शगुन में सबसे अलग तोहफा देने के चक्कर में AK-47 थमा दी। वीडियो की तारीख और जगह की पुष्टि नहीं हो पाई है।

वीडियो में हम देख सकते हैं कि सास पहले युवक को गले लगाती है, फिर कोई उसके हाथ में एके-47 देता है और वह उसे अपने दामाद को शान से सौंपती है। बंदूक को देख न केवल दूल्हा हँसता है, बल्कि दुल्हन भी मुस्कुराती है। वीडियो में नजर आ रहे सभी लोगों के हाव-भाव देखकर समझा जा सकता है कि इन सबके लिए शादियों में ऐसे हथियार का लेन-देन आम बात है।

वीडियो में सुनाई पड़ रही मेहमानों की आवाज से भी ये पता चल रहा है कि उन सबके लिए यह गौरव की बात है, इसीलिए वह रेहान नाम के दूल्हे को बार-बार बंदूक कैमरे में दिखाने को कह रहे हैं। सभी महिला के इस तोहफे को देखकर खुश हैं।

आपको जान कर हैरानी होगी कि कथित तौर पर पाकिस्तान की इस वीडियो में जहाँ दूल्हे को सामान्य तोहफों की तरह एके-47 दी जा रही है, उसी पाक से आए आतंकियों के पास ये बंदूक अक्सर पाई जाती है।

हैरानी इस बात की नहीं है कि शादी में किसी के हाथ में बंदूक देखी गई है। अमूमन भारत में कई बार शादी समारोह के दौरान हर्ष फायरिंग की बात सामने आती रही है, लेकिन दूल्हे को तोहफे में शान से एके-47 देने का वीडियो मुमकिन है आपने आज पहली बार देखी हो।

PM इमरान खान भी सऊदी के प्रिंस को दे चुके हैं बंदूक का तोहफा

पाकिस्तान का रिश्ता बंदूक से बहुत करीब का है। पिछले साल जनवरी में इमरान खान ने अरब के प्रिंस फहाद बिन सुल्तान बिन अब्दुल अजीज ( Fahd bin Sultan bin Abdul Aziz ) को गोल्ड प्लेटेड क्लानिशकोव राइफल और बुलेट तोहफे में दी थी, जिसे लेकर ये स्पष्ट नहीं हुआ था कि उसे केवल एक प्रदर्शनी की तौर पर बनाया गया था या वह काम भी करती थी।

लालू यादव पर दोहरी मार: वायरल ऑडियो मामले में बीजेपी विधायक ने कराई FIR, बंगले से वार्ड में किए गए शिफ्ट

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव की कथित तौर पर वायरल हुई ऑडियो क्लिप के बाद गुरुवार (नवंबर 26, 2020) को भाजपा विधायक ललन कुमार ने उनके खिलाफ पटना में केस दर्ज करवाया

इस एफआईआर में दावा किया गया है कि लालू प्रसाद यादव ने NDA के विधायक ललन पासवान को बिहार विधानसभा अध्यक्ष चुनाव में वोट नहीं करने के लिए कहा था। इस ऑडियो क्लिप को कल सुशील मोदी ने ट्विटर पर शेयर किया था।

बता दें कि वायरल ऑडियो के बाद एक ओर जहाँ लालू प्रसाद यादव के खिलाफ पटना में मुकदमा दर्ज हुआ है, वहीं दूसरी ओर उनको एक बार फिर रिम्स के पेइंग वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया है। इससे पहले वह रिम्स निदेशक के बंगले में रह रहे थे।

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जानकारी के मुताबिक राजद प्रमुख 29 अगस्त 2018 को रिम्स के कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट में भर्ती हुए थे, जहाँ से 5 सितंबर 2018 को उन्हें पेइंग वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया। लेकिन बीते 5 अगस्त को वह कोरोना के चलते रिम्स निदेशक बंगले में शिफ्ट हुए और आज (26 नवंबर) उन्हें फिर से वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया।

क्या था लालू प्रसाद यादव की वायरल ऑडियो में?

उल्लेखनीय है कि बिहार विधानसभा के स्पीकर चुनाव के लिए एनडीए की तरफ से विजय कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया गया था। वहीं महागठबंधन ने अवध बिहारी को उम्मीदवार बनाया था। ऐसे में सुशील मोदी ने कल एक ऑडियो क्लिप शेयर कर दावा किया कि जेल में सजा काट रहे लालू यादव विधायकों को प्रलोभन दे रहे हैं।

उनके द्वारा शेयर किए गए ऑडियो क्लिप में एक व्यक्ति फोन करता है और पूछता है कि क्या उधर से विधायक जी बोल रहे हैं? फोन उठाने वाला व्यक्ति खुद को विधायक का PA बताता है। इसके बाद फोन करने वाला व्यक्ति विधायक को फ़ोन देने को कहता है और बताता है कि लालू प्रसाद यादव उनसे बात करेंगे। साथ ही ये भी बताता है कि उसने राँची से कॉल किया है। विधायक के कॉल उठाते ही लालू यादव उन्हें चुनावी जीत की बधाई देते हैं और विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव से गैरहाजिर होने को कहते हैं।

इसके बाद लालू यादव कहते हैं, “फिर तो स्पीकर हमारा हो जाएगा तो हम लोग देख लेंगे न।” सुशील कुमार मोदी ने कहा है कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने ऐसा कर के अपनी असलियत दिखा दी है।

सुशील मोदी द्वारा शेयर किए गए ऑडियो क्लिप में लालू यादव विधायक से कहते हैं, “अच्छा सुनो। हम लोग तुमको आगे भी आगे बढ़ाएँगे। कल जो स्पीकर का चुनाव है, उसमें हम लोगों का साथ दो। हम लोग तुम्हें मंत्री बनाएँगे। कल तो इसको हम गिरा देंगे।” जब विधायक कहते हैं कि वो पार्टी में हैं तो लालू यादव कहते हैं कि पार्टी में हो तो अनुपस्थित हो जाओ, कह दो कि कोरोना हो गया है।

लालू यादव के कारण रिम्स के निदेशक ठहरे थे गेस्ट हाउस में

लालू प्रसाद यादव को चारा घोटाला मामले से जुड़े कई केसों में जेल की सजा सुनाई गई है। लेकिन वह सजा भुगतने की बजाया रिम्स निदेशक के बंगले का आनंद उठा रहे थे। उन्हें कोरोना से बचाने के लिए इस साल अगस्त में बंगले में शिफ्ट किया गया, तो ब्रिटिशकाल में बने इस केली बंगले में उनके लिए दो अटेंडेट लगाए गए। इस घर में 4 बेडरूम, दो डाइनिंग रूम, एक स्टडी रूम और दो बड़े बरामदे व एक किचन है। इसके अलावा इस घर के भीतर कई फल वाले पेड़ों का बगीचा भी है।

लालू यादव के केली बंगले में रहने के कारण रिम्स निदेशक डॉ. कामेश्वर मोरादाबादी गेस्ट हाउस में रुके हैं। ऐसा कहा जा रहा है कि निदेशक के बंगले से ही लालू ने बिहार चुनावों को मैनेज किया। यह बंगला पॉश इलाके में बना है। इससे पूर्व लालू 1000 रुपए प्रति दिन के हिसाब से रिम्स के वार्ड का खर्चा दे रहे थे।

जानकारी के लिए बता दें कि साल 2017 में चारा घोटाला में लालू प्रसाद यादव को बिरसा मुंडा जेल में रखा गया था। इसके कुछ दिन बाद उन्हें स्वास्थ्य कारणों से रिम्स में शिफ्ट किया गया और तबसे वे वहीं है। उन्हें दिल और किडनी संबंधी समेत कई स्वास्थ्य समस्याएँ हैं। वह डायबिटीज और हाइपरटेंशन के भी मरीज हैं।