भारत सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय ने विकिपीडिया को अपनी वेबसाइट से एक लिंक हटाने का आदेश दिया है, जिसमें जम्मू कश्मीर का गलत मानचित्र दिखाया गया है। सूत्रों की मानें तो यह आदेश सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (आईटी एक्ट) सेक्शन 69ए के तहत जारी किया गया है।
यह मुद्दा एक ट्विटर यूज़र द्वारा ट्विटर पर उठाया गया था, जिसमें उसका कहना था कि भारत सरकार विकिपीडिया की इस हरकत पर संज्ञान ले, जिसमें भारत का गलत मानचित्र दिखाया गया है।
ट्विटर यूज़र छत्रसाल सिंह ने कहा कि विकिपीडिया का पेज, जिस पर भारत-भूटान रिश्तों को लेकर दिखाए गए भारत के मानचित्र में जम्मू कश्मीर की स्थिति गलत दिखाई गई थी। मानचित्र में दिखाया गया था कि गिलगिट बाल्टिस्तान, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और अक्साई चीन भारत का हिस्सा नहीं है।
विकिमीडिया कॉमन्स (Wikimedia Commons), विकिपीडिया से जुड़ी तमाम तरह की मीडिया फाइल्स रखने वाली विकिपीडिया समूह की साइट पर यह तस्वीर मौजूद है। इसमें देखा जा सकता है कि यह तस्वीर मैंगोस्टार (Mangostar) नाम के विकिपीडिया यूज़र ने बनाई और साझा की। यह तस्वीर अभी से लगभग एक दशक पहले मई 2008 के दौरान अपलोड की गई थी।
विवादित नक्शा (साभार – Wikimedia Commons)
विकिमीडिया के पेज पर देखा जा सकता है कि इस तस्वीर का इस्तेमाल विकिपीडिया के तमाम अन्य भाषा के पेजों पर अलग-अलग लेखों में किया जा रहा है। यह तस्वीर एशिया के कई देशों के टेम्पलेट का इस्तेमाल करके बनाई गई थी, जिसमें ऊपर बताए गए क्षेत्रों को भारत के मानचित्र का हिस्सा नहीं दिखाया गया है। यूज़र ने अपनी तरफ से पेश किए गए मानचित्र में भारत और भूटान के मानचित्र को बहुत कम सीमित ही रंगा था और इसे भारत-भूटान रिश्तों को दिखाने के लिए इस्तेमाल किया था।
25 नवंबर को इस ट्वीट का संज्ञान लेते हुए भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने 27 नवंबर 2020 को विकिपीडिया के लिए आदेश जारी किया। इसमें कहा गया कि यह पेज जल्द से जल्द हटाया जाए क्योंकि यह भारत की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का उल्लंघन करता है। उल्लेखनीय है कि अगर विकिपीडिया भारत सरकार के मंत्रालय द्वारा जारी किए गए आदेश पर सक्रियता नहीं दिखाती है तो वह सूचना प्राद्यौगिकी अधिनियम 2000 की धारा 69ए के तहत कार्रवाई के दायरे में आ सकता है।
अभी तक विकिपीडिया ने वह विवादित मानचित्र अपने पेज से नहीं हटाया है। बता दें कि विकिपीडिया पर मौजूद विषय-वस्तु पूरी तरह ‘यूज़र जनरेटेड’ होती है। विकिपीडिया खुद पर मौजूद विषय-वस्तु में बदलाव नहीं करती है। यह देखना दिलचस्प होगा कि विकिपीडिया इस मुद्दे पर क्या प्रतिक्रिया देता है।
ऑपइंडिया इस हफ्ते लगातार आपको बिहार में कृषि करने वाले छोटे-बड़े किसानों व खेती करने वाले जानकारों से मिलवा रहा है। इसी क्रम में आज हमारी बातचीत हुई बेगूसराय के केशाबे गाँव में प्रयोगधर्मी, वैज्ञानिक कृषि करने वाले राज नारायण से। राज नारायण का एक पूरा फार्म है, जहाँ बाहर उन्होंने एक बोर्ड लगाया है और उस पर लिखे सदविचार से पता चलता है कि उनकी खेती विनोभा भावे और महात्मा गाँधी के दर्शन से प्रेरित है।
राज नारायण बताते हैं कि विनोभा और गाँधी जी का मूल रूप से संदेश था- ‘जीवन सरल हो, सादगी पूर्ण हो और आत्मनिर्भर हो’ बस इसीलिए वह कोशिश करते हैं कि उनकी खेती और उनका जीवन भी इसी दर्शन पर चले। उनका कहना है कि वह बाजार पर निर्भर नहीं रहना चाहते, चाहे जरूरत संसाधनों को लेकर ही क्यों न हो। उन्होंने आत्मनिर्भर होने के लिए अपना मिशन तैयार किया है। इस मिशन में उन्होंने संसाधन स्वावलंबन व संसाधन संरक्षण को शामिल किया है और वह लगातार इसका उपयोग अपनी खेती में कर रहे हैं।
कोरोना महामारी से जंग के ख़िलाफ़ लड़ने में पिछले एक साल में हर देश ने अपना योगदान दिया। बुधवार (दिसंबर 2, 2020) को इस बीच जब फाइजर-बायोएनटेक कोविड-19 वैक्सीन (Pfizer-BioNTech COVID-19 vaccine) को यूके में अप्रूवल मिला तो हर जगह हैरानी के साथ खुशी की लहर दौड़ गई। ये पहली मैसेंजर आरएनए (mRNA) वैक्सीन है।
इस वैश्विक कामयाबी को दिलाने में अलग-अलग देश व क्षेत्र के दिग्गजों ने अपनी अहम भूमिका निभाई और ऐसे कार्य को संभव कर दिखाया जिसके लिए उनका नाम भविष्य में हमेशा याद किया जाएगा।
4. ग्रीस निवासी और फाइजर सीईओ अल्बर्ट ब्रुला (Albert Bourla)
हंगरी की कैटालिन कारिको
साल 1995 में हंगरी की रहने वाली कैटालीन कारिको को यूनिवर्सिटी ऑफ पेनसिलवेनिया से डिमोट किया गया था। वह उस समय mRNA पर ही रिचर्स कर रही थीं। उनकी रिचर्स लोगों को वास्तविकता से परे लगती थी और जिसके कारण उनके प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने के लिए कभी पैसे और प्रोत्साहन नहीं दिया गया।
उस समय वह चुप रहीं और अपनी काली गाड़ी 1200 डॉलर में बेचकर अपने पति बच्चों के साथ अमेरिका आ गईं। उन्होंने उस समय भी पीछे मुड़कर नहीं देखा जब उन्हें डिमोट किया गया और तब भी कुछ नहीं कहा जब उनका कंधा कैंसर की चपेट में आ गया। वह जानती थीं कि उनके काम को एक दिन तवज्जो जरूर मिलेगी। आज कोरोना काल में बनी फाइजर और मॉडर्ना की वैक्सीन ने यह साबित कर दिया कि वह बिलकुल सही थीं। ये दोनों वैक्सीन उसी mRNA तकनीक पर आधारित हैं जिस पर कारिको सालों पहले काम कर रही थी।
उर साहिन
तुर्की के रहने वाले उर साहिन और पत्नी ओजलोम टुरैसी वैज्ञानिक आंत्रप्रेन्योर हैं। सादगी का जीवन जीने वाले साहिन अपने कार्यालय से थोड़ी दूर एक छोटे कमरे में गुजर बसर करते हैं और अपने काम पर साइकिल से जाते हैं। मात्र 4 वर्ष की आयु में वह माता-पिता के साथ जर्मनी के कलोन में आ गए थे। इसके बाद वह डॉक्टर बने और उन्होंने अपनी रिसर्च ट्यूमर सेल में इम्युनोथेरेपी पर की। शुरुआत में वह कैंसर के इलाज के लिए मोनोकोलेन एंटीबॉडी पर रिसर्च कर रहे थे, लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने mRNA तकनीक पर रिसर्च करनी शुरू कर दी।
फाइजर प्रमुख अल्बर्ट कहते हैं कि साहिन एक असामान्य सीईओ हैं उन्हें केवल विज्ञान की परवाह है। बिजनेस की बात करना उनके बस की नहीं है। वहीं साहिन कहते हैं कि विश्वास और निजी रिश्ते बहुत महत्तवपूर्ण होते हैं। उनहोंने बर्लिन में एक कॉन्फ्रेंस में दो साल पहले कहा था कि ये तकनीक नई महामारी में जल्द ही वैक्सीन लाने में कारगर होगी। उनके शब्द आज के संदर्भ में सही और सटीक साबित हुए।
ओजलोम टुरैसी
साहिन की पत्नी और उनकी सहकर्मी ओजलोम टुरैसी का जन्म तुर्की के रहने वाले भौतिक वैज्ञानिक के घर में हुआ था। उनका सपना नन बनने का था लेकिन बाद में उन्होंने मेडिसीन की पढ़ाई की और इसी बीच उनकी मुलाकात साहिन से हो गई। दोनों में काम का जुनून इतना अधिक था कि वह शादी के ठीक बाद रिसर्च के लिए अपनी लैब पहुँच गए थे। टुरैसी ने साहिन के साथ मिल कर mRNA पर रिसर्च की थी। आज जब वैक्सीन बनी है तो इस दंपत्ति की चर्चा हर ओर है।
फाइजर सीईओ अलबर्ट ब्रुला
ग्रीस निवासी अलबर्ट ब्रुला फाइजर के सीईओ और साथ ही मशहूर इम्युनोजिस्ट भी हैं। उन्होंने 25 साल अपनी कंपनी को दिए और जब कोरोना का समय आया तो उन्होंने सरकार से इस वैक्सीन पर शोध के लिए पैसा लेने से भी मना कर दिया। उन्होंने अपने वैज्ञानिकों को छूट दी और बॉयनटेक के साथ मिल कोविड की वैक्सीन तैयार की।
दरअसल, उनका मकसद सिर्फ इस शोध को राजनीति से दूर रखना था इसलिए उन्होंने सरकार से पैसे नहीं लिए। उन्होंने कहा भी, “मैं अपने वैज्ञानिकों को नौकरशाही के दबाव से दूर रखना चाहता था। जब आप किसी से पैसा लेते हैं तो उसमें कई दबाव भी रहता है।”
केंद्र सरकार के नए कृषि कानून के खिलाफ दिल्ली-हरियाणा सीमा सिंधु बॉर्डर पर किसानों का आंदोलन जारी है। इस बीच, कॉन्ग्रेस सांसद रवनीत सिंह बिट्टू का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। जो सोशल मीडिया यूजर को कंफ्यूज करता नजर आ रहा है।
दरअसल, लुधियाना से कॉन्ग्रेस सांसद रवनीत सिंह बिट्टू ने गुरुवार (3 दिसंबर, 2020) को दिल्ली सीमा पर चल रहे किसान विरोध प्रदर्शन के सिलसिले में NDTV इंडिया से बात की।
एनडीटीवी इंडिया से बात करते हुए कॉन्ग्रेस सांसद ने इस बात पर जोर दिया कि मोदी सरकार द्वारा पारित तीन कानून किस प्रकार किसान विरोधी है। बिट्टू ने दर्शकों को किसान बिल के बारे में बताते हुए बेहद ही विशेषज्ञता के साथ यह दावा किया कि यह कानून किसान को लाभान्वित नहीं करेगा, बल्कि इससे गूगल और व्हाट्सएप जैसे दिग्गज तकनीक लाभान्वित होंगे।
बिट्टू के अनुसार, मोदी सरकार के खिलाफ आंदोलन सिर्फ एक किसान विरोध नहीं है, बल्कि “देश के 80 प्रतिशत से अधिक लोगों का आंदोलन” है। कॉन्ग्रेस सांसद ने दावा किया कि हाल ही में पास किए गए कृषि कानूनों से न केवल कृषि क्षेत्र को नुकसान होगा, बल्कि देश के खुदरा क्षेत्र को भी नुकसान होगा क्योंकि यह रिलायंस, गूगल, व्हाट्सएप जैसे बड़े उद्योगपतियों को बड़ी मात्रा में गेहूँ और चावल खरीदने में सक्षम बनाता है और बड़े पैमाने पर शोषण का कारण बनता है।
इतना ही नहीं कॉन्ग्रेस सांसद ने शो के दौरान यह दावा करके दर्शकों को गुमराह करने का काम भी किया कि मोदी सरकार द्वारा इन तीन कृषि बिलों के पारित होने के साथ किसानों की जमीनें छीन ली जा रही हैं।
हालाँकि, उन्होंने अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया कि गूगल जैसे तकनीकी दिग्गज नए कृषि कानूनों के साथ गेहूँ की जमाखोरी क्यों करना चाहते हैं।
गौरतलब है कि पंजाब के आंदोलनकारी किसानों की ऐसी कई वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामने आई है जिसने लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया है। दरअसल, आंदोलन में हिस्सा ले रही कई लोगों को तो यह भी नहीं पता कि वे प्रदर्शन क्यों कर रहे है और कितनों को तो कानून के बारे में भी कोई जानकारी नहीं है।
जिनमें से कुछ तो आंदोलन के पीछे की वजह चीनी कोरोना वायरस बोल रहे है, तो वहीं कुछ ऐसे लोग भी है जो महामारी के बीच सरकार द्वारा पारित सभी बिलों का विरोध कर रहे। वहीं ऐसे लोगों के सामने कृषि कानूनों के संबंध में कॉन्ग्रेस सांसद के अजीबोगरीब दावे बहुत चौकाने वाले नहीं है।
बिहार चुनाव में उल्लेखनीय प्रदर्शन के बाद देश का सत्ताधारी दल भाजपा, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों की तैयारी में जुट गया है। भाजपा इन चुनावों में कोई कसर छोड़ने की सूरत में नहीं नज़र आ रही है यही कारण है कि संगठन ने चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी है। तृणमूल कॉन्ग्रेस की ‘आउटरीच योजना’ का सामना करने के लिए भाजपा ने एक नया कार्यक्रम तैयार किया है। इस कार्यक्रम के माध्यम से भाजपा लगभग 1 करोड़ परिवारों तक पहुँचेगी। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इस बीच भाजपा प्रदेश की ममता सरकार द्वारा किए गए भ्रष्टाचार को उजागर भी करेगी।
पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोष ने इस मुद्दे पर जानकारी देते हुए कहा, “तृणमूल कॉन्ग्रेस ‘दुआरे सरकार’ कार्यक्रम चला रही है। उसकी तर्ज पर भाजपा के कार्यकर्ता 5 दिसंबर को एक करोड़ से अधिक परिवारों तक पहुँचेंगे। भाजपा के इस कार्यक्रम का नाम ‘आर नोय अन्याय’ (अब और अन्याय नहीं) तय किया गया है।” दिलीप घोष ने यह भी कहा कि ममता बनर्जी की अगुवाई वाली सरकार में भ्रष्टाचार के अनेक मामले सामने आए हैं।
इस तरह के मामलों को उजागर करने के लिए प्रदेश के भाजपा कार्यकर्ता घर घर जाएँगे और पत्रक वितरण करेंगे। इसके अलावा लोगों को इस बात की जानकारी देंगे कि कैसे उन्हें अनेक केंद्रीय योजनाओं जैसे किसान सम्मान निधि और आयुष्मान रोजगार योजना जैसी सुविधाओं से वंचित रखा गया है। किस तरह केंद्र सरकार पश्चिम बंगाल के आम नागरिकों के लिए जन हितैषी योजनाएँ बनाती है लेकिन प्रदेश सरकार की वजह से उसका लाभ यहाँ के आम लोगों तक नहीं पहुँच पाता है।
दिलीप घोष के मुताबिक़ यह संगठन के कार्यक्रम का दूसरा चरण होगा। पहले चरण में भाजपा के कार्यकर्ता जून जुलाई के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का पत्र लेकर एक करोड़ परिवारों के बीच गए थे। इस पत्र में भाजपा सरकार की उपलब्धियों और जनहित योजनाओं का उल्लेख किया गया था। तृणमूल कॉन्ग्रेस के बगावती सांसदों और विधायकों से जुड़े सवाल पर दिलीप घोष ने कहा-
“मैं सिर्फ इतना कहना चाहता हूँ कि जो नेता प्रदेश के भीतर सकारात्मक परिवर्तन लेकर आना चाहता है उसके लिए हमारे दरवाज़े पूरी तरह खुले हुए हैं। वैसे भी अगर उनके 10-12 विधायक पहले ही हमारा समर्थन कर चुके हैं तब अन्य के हमारे साथ आने में क्या समस्या है। अगर तीन सांसद हमारे साथ आ चुके हैं तो अन्य के आने में क्या समस्या हो सकती है, जो अच्छे बदलाव लाने के लिए तैयार है उसका स्वागत है।”
तृणमूल कॉन्ग्रेस द्वारा बाहरियों को पश्चिम बंगाल में चुनाव लड़वाने पर भी दिलीप घोष ने कई बातें कहीं। उन्होंने कहा, “क्या बिड़ला, गोयनका, जिंदल या मित्तल का प्रदेश के विकास में योगदान नहीं है? यहाँ पर उद्योग किसने लगाए? वह यहाँ पर पीढ़ियों से मौजूद हैं। उत्तरी बंगाल के टी गार्डेन में काम करने वाले ज़्यादातर लोग छत्तीसगढ़ और झारखंड के हैं और जूट मिल में काम करने वाले ज़्यादातर लोग उत्तर प्रदेश और बिहार के हैं।”
अंत में पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष ने कहा, “आखिर कब यहाँ के लोग महात्मा गाँधी का सम्मान करेंगे। कुछ तो उन्हें अपने गले में टाँग कर राजनीति करते हैं, गुजरात से आने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ‘बाहरी’ कैसे हो गए? वह इस देश के प्रधानमंत्री, हम सभी के प्रधानमंत्री हैं।” दरअसल 2021 विधानसभा चुनावों को मद्देनज़र रखते हुए ममता बनर्जी की सरकार ने आगामी दो महीनों में जनता से जुड़ने के लिए अपना सबसे बड़ा आउटरीच कार्यक्रम शुरू किया था।
इस मुल्क में एक बौद्धिक जमात ऐसी है, जिसके ज्ञान का कोई अंत नहीं है। ऐसे ही एजेंडापरस्त जमात के स्थायी सदस्य का नाम है ध्रुव राठी। धर्म से लेकर राजनीति और राजनीति से लेकर तकनीक तक हर सम-सामयिक मुद्दे के स्वघोषित विशेषज्ञ हैं – ध्रुव राठी।
खुद को वैचारिक स्तर पर ‘इंटेलेक्चुअल’ सिद्ध करने की होड़ में तथ्यों और तर्कों को ‘टाटा-गुड बाय’ बोलते हुए इन्होंने ‘स्टैचू ऑफ़ यूनिटी’ पर जम कर मिथ्या प्रचार किया था। तमाम दलीलों की मदद से साबित करने का भरपूर प्रयास किया था कि ‘स्टैचू ऑफ़ यूनिटी’ कितनी असफल परियोजना है।
अब एक रिपोर्ट सामने आई है। यह राठी के दावों को सिरे से ख़ारिज करती है। रिपोर्ट का शीर्षक ही यही है कि ‘स्टैचू ऑफ़ लिबर्टी’ की तुलना में ‘स्टैचू ऑफ़ यूनिटी’ को देखने के लिए ज़्यादा पर्यटक आ रहे हैं।
कोरोना वायरस के पहले तक इसे देखने के लिए लगभग 13 हज़ार पर्यटक हर महीने आ रहे थे जबकि पिछले महीने स्टैचू ऑफ़ लिबर्टी को देखने के लिए 10 हज़ार पर्यटक ही आए। इतना ही नहीं, इसकी मदद से 3000 स्थानीय दलित लड़के/लड़कियों को रोज़गार मिला है और लगभग 10000 अन्य लोगों को भी रोज़गार मिला है।।
अफ़सोस ध्रुव राठी की कपोल कल्पना सही साबित हुई भी नहीं और स्टैचू ऑफ़ यूनिटी की उपयोगिता और प्रासंगिकता दोनों सफल हुई। वामपंथी ब्रिगेड के अहम सदस्य ध्रुव राठी ने 1 नवंबर 2018 को अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो साझा किया था।
वीडियो की शुरुआत में इस स्टैचू पर तंज कसने का सतही प्रयास करते हुए उसने कहा, “दुनिया का सबसे लंबा स्टैचू हमारे देश में होगा। हमारे लिए कितने गर्व की बात होगी, दुनिया हमें सम्मान की निगाह से देखेगी।” इसके बाद कई पहलुओं का उल्लेख करते हुए कहा कि आइए देखते हैं स्टैचू ऑफ़ यूनिटी की सच्चाई क्या होगी।
ध्रुव राठी ने सबसे पहले स्टैचू ऑफ़ यूनिटी की तुलना चीन के बुद्ध स्टैचू, स्प्रिंग टेम्पल से कर दी। फिर बताया कि उसके प्रोजेक्ट में 55 मिलियन डॉलर खर्च हुए और प्रतिमा की लागत 18 मिलियन डॉलर थी, यानी यह कितनी कम कीमत में बन गया। इसके बाद ध्रुव राठी ने बताया कि सरदार पटेल की प्रतिमा पर कितने ‘ज़्यादा रुपए’ (180 मिलियन डॉलर) खर्च हुए। सबसे पहली बात, तुलना के लिए मिला क्या? चीन की प्रतिमा! और दूसरी बात, चीन स्थित बुद्ध की प्रतिमा की ऊँचाई 128 मीटर है उसकी तुलना सरदार पटेल की प्रतिमा 182 मीटर से क्यों?
इन सबसे बड़ी बात बुद्ध स्टैचू बन कर तैयार हुआ था साल 2008 में यानी स्टैचू ऑफ़ यूनिटी से लगभग एक दशक पहले। खैर लिबरल गैंग का यही तो हुनर है, आम जनता के सामने आधे-अधूरे तथ्यों की ढपली बजाना।
इसके बाद ध्रुव राठी ने ताजमहल का उल्लेख करते हुए बताया कि ताजमहल में जितने पर्यटक आते हैं, उससे हर साल लगभग 25 करोड़ रुपए का ‘रेवेन्यू’ पैदा होता है। इसके बाद ध्रुव राठी ने कहा, “स्टैचू ऑफ़ यूनिटी कोई ताजमहल तो है नहीं, जो 1 मिलियन लोग (10 लाख) हर साल इसे देखने के लिए आएँगे।” सही बात है, इसके शुरू होने के 2 हफ्ते में 128000 लोग आए, वह ‘पर्यटक’ नहीं थे बल्कि वहाँ से गुज़र रहे थे या ताजमहल देखने निकले होंगे, रास्ता भूल कर यहाँ पहुँच गए होंगे।
ध्रुव राठी ने इसके बाद कहा कि स्टैचू ऑफ़ यूनिटी बहुत प्रसिद्ध पर्यटन स्थल नहीं बन पाएगा क्योंकि यह किसी बड़े शहर के आस-पास स्थित नहीं है। साफ़ शब्द थे, “यहाँ लोग आएँगे ही नहीं।” सही बात है, देश की सारी धरोहरें, स्मारक, प्राचीन इमारतें, स्थल, मंदिर और मस्जिद बड़े शहरों में ही स्थित है और देश का सबसे बड़ा शहर आगरा है क्योंकि वहाँ ताजमहल है (ध्रुव राठी के उपरोक्त अनुमान अनुसार)। उनकी ज्ञान गंगा यहीं पर समाप्त नहीं हुई, सस्ते इंटरनेट के माध्यम से कपोल कल्पना का प्रदर्शन करते हुए उन्होंने कहा, “इसमें यूनिकनेस नहीं है” और “यह सुंदर नहीं है।”
सुंदर नहीं है! गजब का तर्क है। फिर भी इसे 2018 से 2019 के बीच 27 लाख लोग देखने आए। इसी बात के आगे वो पूछते हैं, “अब आप ही सोचिए, लोग मुग़ल आर्किटेक्चर देखना पसंद करेंगे या स्टैचू ऑफ़ यूनिटी?”
एकदम सही बात है ध्रुव राठी, ऐसे नहीं कहोगे तो पता कैसे चलेगा कि आप ‘सेक्यूलर समाज’ से हो। खुद को ‘सूडो सेक्यूलर’ दिखाने की ज़िम्मेदारी भी तो है। ऐसे ही तो तुलना की जाती है, 500 साल पहले बनाई गई चीज़ों (दूसरी चीज़ों को तोड़-फोड़ कर) की हाल ही में बनी चीज़ के समानांतर रख कर।
वीडियो के अंत में ध्रुव राठी ने इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की राजनीति का नमूना बता दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी लपेट लिया (पता नहीं क्यों)। क्योंकि ध्रुव राठी ‘प्रलाप’ नामक वायरस की बीमारी से ग्रसित हैं, इसलिए इन्होंने 21 नवंबर 2019 को इसी मुद्दे पर एक और वीडियो बनाया। क्योंकि पिछली वीडियो में ध्रुव राठी के अनुमान अनुसार स्टैचू ऑफ़ यूनिटी को देखने के लिए 10 लाख लोग आ जाते तो बड़ी बात होती, इस बार ज़्यादा कुछ कहने के लिए बचा ही नहीं था। एक साल में लगभग 27 लाख लोग इसे देखने आए थे, जिससे लगभग 80 करोड़ रुपए का रेवेन्यू पैदा हुआ।
ध्रुव राठी का अनुमान गलत सिद्ध हुआ तो ऐसे में वह इन्फ्लेशन, बैंक में इतना पैसा रख देते तो कितना ब्याज मिल जाता, रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट का गणित लगाने लगे। अंत में दोबारा ताजमहल से तुलना करते हुए कहा कि इसे देखने कोई नहीं आएगा और न ही इसकी लागत वसूल हो पाएगी।
लागत वाले प्रश्न का उत्तर तो वक्त ही देगा, ध्रुव राठी जैसे मौसमी जानकार सिर्फ अनुमान लगा सकते हैं (वह भी सलीके से नहीं)। यूट्यूब की जनता को एंगेज रखना है, खुद को वामपंथी ब्रिगेड की यूथ विंग का मुखिया साबित करना है तो यह सब करना ही पड़ेगा। सरकार को गाली दिए बिना (भले उसका कोई काम अच्छा ही क्यों न हो) पता कैसे चलेगा कि ‘ब्रो’ नवागंतुक बुद्धिजीवी हैं।
सुपरस्टार रजनीकांत ने अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत को लेकर लंबे समय से जारी सस्पेंस को खत्म कर दिया है। रजनीकांत ने कहा कि वह 31 दिसंबर को अपनी बहुप्रतीक्षित राजनीतिक पार्टी की घोषणा करेंगे और वर्षों से चल रही अटकलों को समाप्त करते हुए इसे जनवरी में लॉन्च करेंगे।
रजनीकांत ने यह घोषणा अपने मंच रजनी मक्कल मंद्रम के वरिष्ठ पदाधिकारियों से मुलाकात के एक दिन बात की। बाद में बुधवार को, उन्होंने कहा कि वह चुनावी राजनीति के लिए अपनी योजनाओं पर जल्द ही खुद के फैसले की सार्वजनिक घोषणा करेंगे। अपने एक ट्वीट में उन्होंने कहा, “चलें अब सब कुछ का बदलाव करें, अभी नहीं तो कभी नहीं।”
A political party will be launched in January; Announcement regarding it will be made on December 31st, tweets actor Rajinikanth pic.twitter.com/K2MikOk30I
सुपरस्टार ने आगे कहा, “आगामी विधानसभा चुनावों में हमारी निश्चित रूप से जीत होगी। हम लोगों को एक पारदर्शी, भ्रष्टाचार मुक्त और बिना किसी धार्मिक-जातिगत भेदभाव वाली सरकार देंगे।” रजनीकांत बहुत पहले ही तमिलनाडु में लोगों को एक वैकल्पिक राजनीति देने का बात कई बार कह चुके हैं। अब उन्होंने इस दिशा में अपना सधा हुआ कदम बढ़ा दिया है।
#NewsAlert – Superstar Rajinikanth to make his Political Debut.
Rajinikanth to launch his Political Party in January 2021.
गौरतलब है कि सोमवार को अपनी पार्टी के अधिकारियों से अहम बैठक के बाद उन्होंने कहा था कि बैठक में जिला सचिवों के साथ उन्होंने विचार-विमर्श किया। आगे बोलते हुए रजनीकांत ने कहा था कि पार्टी नेताओं ने उनका भरपूर साथ दिया है और कहा है कि वह कोई भी फैसला लेते हैं तो सभी पार्टी नेता उनका समर्थन करेंगे।
ज्ञात हो कि हाल ही में गृह मंत्री अमित शाह ने तमिलनाडु का दौरा किया था। इसके बाद बहुत तेजी से वहाँ की राजनीति में चुनाव को लेकर सभी दलों में सरगर्मी बढ़ गई। ऐसे में अब सुपरस्टार रजनीकांत का पार्टी को लेकर एक बड़ा एलान इस बात की गवाही है कि वह चुनावी जंग के मैदान में उतरने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं।
बता दें कि अगले साल तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव होंगे। ऐसे में रजनीकांत की राजनीति में एंट्री को लेकर संशय अब लगभग खत्म हो गया है।
गौरतलब है कि सुपरस्टार रजनीकांत ने हाल ही में पेरियारवादियों द्वारा भगवान कार्तिकेय (मुरुगन) के रक्षा श्लोक को अपमानित करने वाले विवादास्पद वीडियो बनाने वाले लोगों पर त्वरित कार्रवाई करने के लिए तमिलनाडु सरकार की प्रशंसा की थी। मामला डीएमके-सहयोगी पेरियारवादी यूट्यूब चैनल के द्वारा भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) की एक श्लोक को बेहद घटिया विवरण के साथ पेश करने का था, जिसे लेकर लोगों में नाराजगी थी।
भारत की धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्वीकार्यता का दायरा काफी बड़ा है। यही कारण है कि दुनिया भर के लोग इससे जुड़ी चीज़ों में अपनी अटूट आस्था दिखाते हैं। इसी कड़ी में फ्रांस के राजदूत इमैनुएल लेनिन अपनी पत्नी के साथ उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर का दर्शन करने आए।
पिछले कुछ समय से फ्रांस डट कर कट्टरपंथी ताक़तों का सामना कर रहा है। ऐसे में फ्रांस के राजदूत का महाकाल की शरण में आना भारत के लिए राजनीतिक और धार्मिक दोनों दृष्टिकोण से सकारात्मक है। दर्शन के बाद उन्होंने ऐलान किया कि फ्रांस की सरकार ‘महाकाल मंदिर विकास योजना’ में 80 करोड़ रुपए दान करेगी।
7 नवंबर 2020 को फ्रांस के राजदूत निजी दौरे पर मध्य प्रदेश आए थे। इंदौर में ठहरने के दौरान उन्होंने महाकाल दर्शन का निर्णय लिया था। जिसके बाद वह शनिवार को महाकाल के दर्शन के लिए निकले।
दर्शन के बाद मंदिर समिति ने इमैनुएल लेनिन और उनकी पत्नी को महाकाल के चित्र भी भेंट किए। इसके बाद लेनिन और उनकी पत्नी रामघाट गए और अंत में इंदौर रोड स्थित प्राचीन शनि मंदिर के दर्शन भी किए। इसके बाद वह इंदौर के लिए वापस निकल गए।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ फ्रांस के राजदूत ने पूरे विधि विधान से पूजा पाठ किया। मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश बंद होने की वजह से इमैनुएल लेनिन को नंदी हॉल से ही दर्शन करना पड़ा। मंदिर के पुजारी रमण त्रिवेदी ने फ्रांस के राजदूत से पूजा पाठ संपन्न कराया।
सावधानी और सुरक्षा के दृष्टिकोण से फ्रांसीसी राजदूत के इस दौरे की जानकारी पुलिस और प्रशासन को ही थी। यात्रा के बाद राजदूत लेनिन और उनकी पत्नी ने शिप्रा नदी के तट पर पहुँच कर कुछ देर विश्राम भी किया।
इसके बाद उज्जैन के कलेक्टर आशीष सिंह ने इस संबंध में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि मंदिर विकास योजना का दूसरा चरण बहुत जल्द शुरू होने वाला है। इस संबंध में सिंहस्थ मेला कार्यालय में अधिकारियों के साथ परियोजना की समीक्षा की गई है।
फ्रांस सरकार इस योजना में आर्थिक सहयोग के तौर पर 80 करोड़ रुपए देने जा रही है, जिसे मंदिर के विशेष निर्माण कार्य में लगाया जाएगा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ इस राशि को मंदिर परिसर के 10-12 गुना अधिक विस्तृत करने में किया जाएगा, जिससे श्रद्धालुओं के आवागमन में कोई परेशानी नहीं हो।
इन विकास कार्यों में भूमि अधिग्रहण, मंदिर क्षेत्र के आस-पास 500 मीटर में चौड़ी और पक्की सड़क, ब्रिज निर्माण, नज़दीक रहने वालों की अन्य क्षेत्र में रहने की व्यवस्था और मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं के लिए मूलभूत व्यवस्थाएँ शामिल हैं।
किसानों के हितों को विषय बनाकर एक बार फिर विपक्षी दल अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के लिए केंद्र सरकार को घेरने का प्रयास कर रहे हैं। इसी विरोधी राजनीतिक दखलंदाजी का नतीजा है कि पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश समेत देश के कई हिस्सों में कृषि सुधार विधेयक (Farm Bill 2020) को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।
पिछली गैर-भाजपा सरकारों के न केवल राजनीतिक घोषणापत्र, बल्कि कृषि और समाजिक कार्यकर्ताओं, किसानों और उद्योग के समर्थकों के कई अध्ययनों ने दशकों से कृषि क्षेत्र में सुधार और उदारीकरण की माँग की है। खरीद, भंडारण से लेकर रसद और बिक्री तक, ऐसे बहुत से पहलू हैं, जो किसान और अंतिम उपभोक्ता दोनों के लिए अधिक मूल्य के लिए बदला जाना चाहिए। और यह पहली बार नहीं है, जब किसान इस बदलाव की प्रक्रिया में सड़क पर उतरे हों। मगर कॉन्ग्रेस जैसे राजनीतिक दलों का इन्हीं विषयों पर बदलता मत दिलचस्प है।
किसान कथित तौर पर नए नियमों का विरोध कर रहे हैं और इसके साथ ही विपक्ष सरकार पर निशाना साध रही है। हालाँकि, किसानों को लेकर एनडीए सरकार से पहले भी पूर्ववर्ती सरकार ऐसे विधेयक समय-समय पर पेश करती आई हैं, जिनमें सबसे अधिक आज ‘किसान-हितैषी’ होने का दावा करने वाले कॉन्ग्रेस (यूपीए) जैसे राजनीतिक दल सबसे आगे हैं। जबकि अपने सत्ताकाल में वह खुद इस प्रकार के बिल लाने की कोशिश कर रही थी।
केंद्र सरकार के नए कानूनों का विरोध कर रहे राजनीतिक दल और अन्य संगठनों का आरोप है कि नए क़ानून से कृषि क्षेत्र पूँजीपतियों या कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चला जाएगा और इसका नुक़सान किसानों को होगा।
एक नजर किसानों से जुड़े उन तमाम विधेयकों पर, जिन्हें पूर्ववर्ती सरकारों ने तब किसानों के लिए लाभकारी बताया था –
कॉन्ग्रेस का 2019 का घोषणापत्र
2019 के लोकसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस ने अपने घोषणापत्र में कहा था कि सत्ता में आने पर किसानों को अपनी उपज सरकारी मंडियों में ही बेचने की अनिवार्यता को खत्म करेगी और किसान कहीं भी अपनी उपज बेच पाएँगे।
लोकसभा चुनाव के वक्त अपने घोषणापत्र में ही ऐलान किया था कि वह सरकार में आए तो सरकारी मंडी में फसल बेचने की अनिवार्यता को खत्म कर देंगे। ख़ास बात यह है कि तब भारतीय किसान यूनियन (BKU) ने भी कॉन्ग्रेस के इस कदम का स्वागत किया था जबकि आज यही BKU इन कृषि सुधारों का विरोध कर रही है।
कॉन्ग्रेस का 2014 का घोषणापत्र
2019 चुनावों से पहले 2014 के आम चुनाव में भी कॉन्ग्रेस ने यही घोषणा की थी। जिसके बाद कर्नाटक, असम, हिमाचल प्रदेश, मेघालय और हरियाणा की कॉन्ग्रेस की ही सरकारों ने किसानों को APMC एक्ट से अलग कर कहीं भी उपज बेचने का अधिकार दे दिया था।
2013
वर्ष 2013 में खुद राहुल गाँधी ने ही कॉन्ग्रेस शासित राज्यों से कहा था कि 12 राज्य अपने यहाँ फल और सब्जियों को APMC एक्ट से बाहर करेंगे और एक्ट में बदलाव की बात कही थी। अब यही कॉन्ग्रेस और इसके नेता राहुल गाँधी इस एक्ट में बदलाव का विरोध कर खुद को किसानों के मसीहा होने का दावा करते नजर आ रहे हैं।
2011
यूपीए सरकार के दौरान ही योजना आयोग ने भी वर्ष 2011 में अपनी एक रिपोर्ट में “Inter-State Agriculture Produce Trade and Commerce Regulation एक्ट को निष्क्रिय कर केंद्र की लिस्ट से हटाने का सुझाव दिया था।
9 साल पहले कॉन्ग्रेस ने इन विधेयकों को बताया था ‘किसान हितैषी’
योजना आयोग के सुझाव के बाद बाद उसी वर्ष 2011 में कैबिनेट सचिव ने सिफारिश की थी कि देश में अंतरराज्यीय कृषि व्यापार को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इसके अगले साल यूपीए सरकार ने ‘Agricultural Produce Inter State Trade and Commerce (Development and Regulation) Bill 2012’ तैयार किया। हालाँकि, यूपीए सरकार इस विधेयक पर आगे नहीं बढ़ पाई।
2008
तब भारतीय किसान संगठन ने ही शिकायत की थी कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूँ की कीमत 1,600 रुपए प्रति क्विंटल थी, जबकि तत्कालीन यूपीए सरकार उन्हें अपनी उपज को 100 रुपए प्रति क्विंटल के मूल्य पर बेचने को मजबूर कर रही थी।
उस समय किसान यूनियन, तत्कालीन यूपीए सरकार के फैसले का विरोध कर रही थी कि उन्हें उपज को निजी खरीद पर रोक लगाने के नियम को हटाना चाहिए। यानी, किसान यूनियन उस समय कॉर्पोरेट फार्मिंग की वकालत कर रही थी। जबकि नए कृषि सुधारों के अनुसार, किसान अपनी उपज को बिना किसी बिचौलिए के किसी भी बाजार और मंडी में बेचने के लिए स्वतंत्र हैं और अब किसान यूनियन इस फैसले का विरोध करती देखी जा सकती है।
2007
वर्ष 2007 में यूपीए सरकार के दौरान ही ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत 2007-2012 के लिए कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग, और ई-ट्रेडिंग का जिक्र किया गया था। तब हरियाणा, कर्नाटक, पंजाब, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और मध्य प्रदेश राज्यों ने अपने कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग कानून पारित भी किए थे।
ऐसे में सवाल यह है कि कॉन्ग्रेस आखिर किस मुँह से अब इन सभी कृषि सुधारों को किसान-विरोधी साबित करने का प्रयास कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे ‘आज़ादी के बाद किसानों को किसानी में एक नई आज़ादी’ देने वाला विधेयक बताया है।
उन्होंने कहा कि किसानों को एमएसपी का फ़ायदा नहीं मिलने की बात ग़लत है और विरोधी दल सिर्फ विरोध के लिए इस कानून का दुष्प्रचार कर रहे हैं। सितम्बर माह में ही पीएम मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिए बिहार की कई परियोजनाओं का शुभारंभ करते हुए कहा था कि जो लोग दशकों तक देश में शासन करते रहें हैं, सत्ता में रहे हैं, देश पर राज किया है, वो लोग किसानों को भ्रमित कर रहे हैं, किसानों से झूठ बोल रहे हैं।
पीएम मोदी ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि विधेयक में वही चीज़ें हैं, जो देश में दशकों तक राज करने वालों ने अपने घोषणापत्र में लिखी थी। इन तमाम बातों से यही स्पष्ट होता है कि कॉन्ग्रेस खुद 2007 से ही किसानों के लिए यही बिल लेकर आ रही थी, जिस पर बाद में उसकी कई प्रदेश कॉन्ग्रेस सरकारों ने भी काम किया। लेकिन अब जब मोदी सरकार किसानों के लिए उन्हीं किसान हितैषी बिलों को कानून का रूप देने की कोशिश कर रही है तो कॉन्ग्रेस ने अपना पाला बदल कर इसे ‘किसान-विरोधी’ ठहराना शुरू कर दिया है।
कुल मिलाकर यह पूरी लड़ाई इस एक विचार पर केंद्रित होती नजर आती है कि कॉन्ग्रेस का बिल प्रगतिशील और भाजपा का कानून किसी न किसी तरह से ‘किसान विरोधी’ और ‘फासीवादी’ है।
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में 3 लड़कों की आँख निकाल कर कथित तौर पर निर्दयता से हत्या का मामला सामने आया है। तीनों लड़के एक ही परिवार के सदस्य हैं और लालगंज थाना क्षेत्र के बामी गाँव निवासी हैं। तीनों भाइयों (चचेरे) का शव बुधवार (2 दिसंबर 2020) विंध्याचल के लेहड़िया बंधी के पानी से बरामद किया गया। परिजनों ने आशंका जताई है कि उनकी हत्या करके आँख निकाली गई है।
घटना की जानकारी मिलते ही एएसपी ऑपरेशन महेश अन्नी और एसडीएम लालगंज जंग बहादुर यादव घटनास्थल पर पहुँचे और वहाँ का मुआयना किया। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ परिजनों ने इस घटना पर आक्रोश जताते हुए शव लेकर एनएच 7 जाम कर दिया। उनका कहना है कि इस मामले पर प्रशासन द्वारा जल्द से जल्द कार्रवाई हो।
Three Brahmin kids are not only brutally killed but also their eyes were gouged out in Mirzapur. No media will show you the amount of hate these kids had suffered. Today, no politician would take a stand for these poor kids because they are not Dalits. #brahminlivesmatterpic.twitter.com/XyMZUdMWXy
1 दिसंबर 2020 को लालगंज थाना क्षेत्र के अंतर्गत बामी गाँव के निवासी हरिओम तिवारी (14 साल), सुधांशु तिवारी (14 साल) और शिवम तिवारी (14 साल) अपने घर के नज़दीक स्थित कुशियरा जंगल में बेर खाने के लिए गए थे। काफी समय बीत जाने के बावजूद जब वह वापस नहीं लौटे, नतीजतन उनके परिजनों ने खोजबीन शुरू की।
खोजबीन के बाद जब उनका पता नहीं चला, तब परिजनों ने इस मामले की जानकारी पुलिस को दी। पुलिस द्वारा मामले का संज्ञान लिए जाने के कुछ ही समय बाद स्थानीय लोगों ने बताया कि किशोरों का शव लेहड़िया बंधी के पास देखा गया है।
मृतक किशोरों के शव (साभार – falanadikhana)
सूचना मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँची और तीनों का शव निकलवाया। शव निकालने के बाद देखा गया कि उनके शरीर पर चोटों के कई निशान हैं और आँखें भी निकाली गई हैं। यह देख कर किशोरों के परिजन आक्रोशित हुए और पुलिस को शव लेकर नहीं जाने दिया।
उन्होंने शवों के साथ एनएच जाम करते हुए जिलाधिकारी को बुलाने की माँग उठाई। जिसके बाद डीएम के आश्वासन पर शवों को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा गया। फ़िलहाल किशोरों की कथित तौर पर हत्या का कारण सामने नहीं आया है।
थाना लालगंज क्षेत्र निवासी 03 बच्चों का शव मिलने की घटना के संबंध में पुलिस अधीक्षक मिर्जापुर की बाइट- pic.twitter.com/FGgGaTyvti
इस घटना पर पुलिस अधीक्षक अजय कुमार सिंह का कहना है कि लेहड़िया बंधी के पानी में तीन किशोरों का शव बरामद हुआ है। मामले में हत्या की आशंका जताई गई है, शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया गया है। तहरीर और पोस्टमॉर्टम के आधार पर घटना की जाँच और कार्रवाई की जाएगी।
तीनों किशोर एक ही परिवार के सदस्य हैं। इनमें सुधांशु तिवारी पुत्र राजेश तिवारी, शिवम तिवारी पुत्र राकेश तिवारी और हरिओम तिवारी पुत्र मुन्ना लाल तिवारी हैं। राकेश तिवारी और मुन्ना लाल तिवारी सगे भाई हैं और राजेश तिवारी चचेरे भाई हैं।
30 नवंबर को राजेश तिवारी की बहन की शादी थी। 1 दिसंबर को विदाई हो चुकी थी, इसलिए सब आराम से सो रहे थे। तभी तीनों किशोर परिजनों से नज़र छुपा कर जंगल में बेर खाने के लिए निकले थे। सुधांशु और शिवम विंध्यवासनी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में कक्षा आठवीं के छात्र थे और हरिओम प्रयागराज स्थित नैनी में अंग्रेज़ी माध्यम का कक्षा आठवीं का छात्र था।