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‘गद्दार’ हो गया है अब सऊदी अरब: पाकिस्तानियों को ‘कश्मीर ब्लैक डे’ मनाने पर दिखाया ठेंगा, रखा आतंकी लिस्ट में

पाकिस्तान निराश है। पाकिस्तानियों में गुस्सा है। एक तो वो खबर थी कि सऊदी अरब ने FATF (Financial Action Task Force) में पाकिस्तान के विरोध में मत दिया और उस कारण से पाकिस्तान बेचारा ‘ग्रे सूची’ में ही रह गया। फिर अब खबर आई है कि अरब देशों ने पाकिस्तान को 27 अक्टूबर को ‘कश्मीर ब्लैक डे’ मनाने की अनुमति देने से साफ़ मना कर दिया है। ऐसे में पाकिस्तानी करें भी तो क्या करें!

इस मामले पर पाकिस्तानी समाचार समूह ‘नया दौर’ के एग्जीक्यूटिव एडिटर ने ट्वीट भी किया। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा कि सऊदी अरब सरकार ने रियाद में मौजूद दूतावास और जेद्दा स्थित वाणिज्य दूतावास में 27 अक्टूबर को ‘कश्मीर बैक डे’ आयोजन की बात खारिज कर दी है। 

22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान समर्थित हमलावरों ने महाराजा हरी सिंह द्वारा किए गए समझौते को तोड़ते हुए कश्मीर पर आक्रमण किया था। 22 अक्टूबर 1947 की देर रात पाकिस्तानी ‘पश्तून’ सेना ने पाकिस्तानी सरकार और पाकिस्तानी सेना की मिलीभगत से गढ़ी हबीबुल्लाह क्षेत्र से जम्मू कश्मीर में दाख़िल होकर मुज़फ्फराबाद में हमला किया था।

इस क्षेत्र पर आज तक पाकिस्तान का अवैध रूप से कब्ज़ा है। उस दौर के दस्तावेज़ों के मुताबिक़ आक्रमण के दौरान सैकड़ों महिलाओं का बलात्कार और अपहरण हुआ था, न जाने कितने घरों में डकैती हुई थी और सैकड़ों आदमियों को सड़कों पर काट दिया गया था। 

इस घटना के बाद 26 अक्टूबर 1947 को महाराजा हरी सिंह ने भारत में विलय के समझौते पर हस्ताक्षर करके सहमति जताई। इसके ठीक एक दिन बाद 27 अक्टूबर 1947 को भारतीय सेनाओं को घाटी में एयर लिफ्ट किया गया था। फिर भारतीय सेना ने आक्रामक होकर पश्तूनों के विरुद्ध कार्रवाई की और उन्हें श्रीनगर की तरफ आगे बढ़ने से रोका। पाकिस्तान इस दिन को ‘ब्लैक डे’ के रूप में मनाता है, जिस दिन भारतीय सेना ने अपनी ज़मीन को पाकिस्तानी हमले से सुरक्षित बचाया था।

सऊदी अरब (जिसे पाकिस्तान अपना नज़दीकी सहयोगी मुल्क मानता है) ने FATF पर पाकिस्तान के विरोध में मत दिया, जिसके चलते पाकिस्तान ‘ग्रे सूची’ में बना हुआ है। पहले भी तमाम मीडिया रिपोर्ट्स में इस बात के कयास लगाए गए थे कि सऊदी अरब पाकिस्तान के विरुद्ध मतदान कर सकता है। अब ‘कश्मीर ब्लैक डे’ पर पाकिस्तान को नकारने के कारण सोशल मीडिया पर मौजूद पाकिस्तानियों की खुन्नस देखने लायक है।

खुद पाकिस्तानी इस कदर भावुक हो गए कि सऊदी अरब को ‘गद्दार’ तक बताने लगे। 

जबकि पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्ट्स ने इस मुद्दे पर जानकारी दी कि पाकिस्तान को ग्रे सूची में बनाए रखने में सऊदी अरब की कोई भूमिका नहीं है। पाकिस्तानी सरकार ने इस मुद्दे पर आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए कहा कि इस संबंध में प्रकाशित होने वाले अधिकाँश मीडिया रिपोर्ट झूठी और आधारहीन हैं। 

गुरुवार (23 अक्टूबर 2020) को पाकिस्तानी सरकार ने दावा किया कि इस तरह की ख़बरें सऊदी अरब और पाकिस्तान का दुष्प्रचार करने के लिए फैलाई जा रही हैं।

पाकिस्तान को FATF ने फरवरी 2021 तक के लिए ग्रे सूची में रखा है। आतंकवाद पर निगाह रखने वाले वैश्विक वॉचडॉग ने कहा, “पाकिस्तान आतंकवादी फंडिंग के संबंध में प्रदान किए गए 27 बिंदुओं में से 6 बिंदुओं पर अपना पक्ष रखने में असफल रहा। FATF के अध्यक्ष मार्कस प्लेएर ने कहा कि पाकिस्तान को आतंकवादी फंडिंग पर निगरानी रखने और रोक लगाने के लिए बहुत कुछ करने की ज़रूरत है। 

पाकिस्तान ने बीते कई सालों से अपने सहयोगी मुल्कों जैसे चीन, तुर्की, मलेशिया, सऊदी अरब और खाड़ी के देशों के कूटनीतिक सहयोग से खुद को FATF की ग्रे सूची से बाहर रखने में सफल रहा है। क्योंकि अब पाकिस्तान के पास पर्याप्त समर्थन नहीं है, इसलिए वह खुद को ग्रे सूची से बहार नहीं रख सकता है।       

मुख़्तार अंसारी के करीबी आजम की संपत्ति पर चला UP पुलिस का बुलडोजर, गंगा किनारे ₹70Cr में बनाया था अवैध अस्पताल

उत्तर प्रदेश में सियासत का चोला ओढ़े अपराधियों और उनकी अवैध सम्पत्तियों पर यूपी पुलिस का बुलडोजर चलना जारी है। ताज़ा मामला गाजीपुर का है, जहाँ पंजाब के जेल में बंद विधायक मुख़्तार अंसारी के करीबी आजम कादरी के अस्पताल सहित अवैध सम्पत्तियों को ध्वस्त किया गया। वहाँ स्थित उसकी ‘शम्म-ए-हुसैनी हॉस्पिटल एंड ट्रामा सेंटर’ अस्पताल को बुलडोजर की मदद से धूल में मिला दिया गया, जो अवैध रूप से कब्ज़ा की गई ज़मीन पर बनी हुई थी।

एसडीएम सहित कई थानों की पुलिस सुबह से ही मौजूद थी और अंततः शनिवार (अक्टूबर 24, 2020) को दोपहर तक इसे ध्वस्त कर दिया गया। पूरा जिला प्रशासन इस दौरान इस कार्रवाई के लिए मुस्तैद रहा। मुख़्तार अंसारी के करीबी आजम ने हमीद सेतु के पास व गंगा के ठीक किनारे इस अस्पताल को बनवाया हुआ था। इस काम में एक पोकलेन और दो जेसीबी लगाए गए। 10 थानों की पुलिस की मौजूदगी में मुख़्तार अंसारी के करीबी के अस्पताल को बुलडोजर से ध्वस्त करने की कार्रवाई हुई।

प्रशासन ने कई बार इस इमारत को लेकर नोटिस जारी की थी, जिसे सभी नियम-कायदों को ताक पर रख कर बनाया गया था। बीते 8 अक्टूबर को ही इसे ध्वस्त करने का आदेश एसडीएम द्वारा जारी कर दिया गया था। लेकिन, अस्पताल के संचालक ने हाईकोर्ट और फिर अदालत के कहने पर डीएम के पास अर्जी देकर इसे रोकवाने की कोशिश की। शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान प्रशासन ने सभी अपीलों को ख़ारिज कर दिया।

इसके बाद ही मुख़्तार अंसारी के गैंग में खलबली मच गई और रातोंरात वहाँ से सारे मरीजों को हटा दिया गया। सुबह तक वो लोग अस्पताल में से सारे सामानों को शिफ्ट करने और उसे खाली करने में लगे हुए थे। पूरी तरह सामान खाली करने का मौका दिया गया और फिर ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया शुरू की गई। ‘दैनिक जागरण’ के अनुसार, एक आँकड़ा दिया गया है कि इस इमारत को बनवाने में और पूरे सेटअप में 70-80 करोड़ रुपए लगे थे।

उधर सीजेएम कोर्ट ने मऊ स्थित दक्षिणटोला थाने में जालसाजी और आर्म्स एक्ट के मामले में नामजद किए गए विधायक मुख्तार अंसारी को उनके अधिवक्ता दारोगा सिंह की अर्जी पर दो नवम्बर 2, 2020 को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने को मंजूरी दी है। सुनवाई में उपस्थित न रहने की उसकी माँग ठुकरा दी गई। मुख़्तार अंसारी 2017 में मऊ से 5वीं बार विधायक बने मुख़्तार अंसारी ने 2 बार बसपा, 2 बार निर्दलीय और 1 बार अपने भाई की पार्टी ‘कौमी एकता दल’ से जीत दर्ज की है।

इससे पहले माफिया मुख्तार अंसारी को पंजाब के रोपड़ जेल से उत्तर प्रदेश वापस लाने गई यूपी पुलिस को खाली हाथ लौटना पड़ा था। पंजाब पहुँचकर यूपी पुलिस को बताया गया था कि अंसारी को डॉक्टर ने 3 माह का बेड रेस्ट कहा है। यूपी पुलिस उसे एमपी/एमएलए कोर्ट में पेश करना चाहती थी। मगर, पंजाब पहुँचकर उनके हाथ निराशा लगी। मेडिकल रिपोर्ट में मुख्तार को डायबिटीज और डिप्रेशन का शिकार बताया गया।

काफिर = छिपाने वाला, जिहाद = संघर्ष: RJ सायमा ने शायरी पढ़ कर किया इन शब्दों का महिमामंडन, देखें वायरल वीडियो

‘रेडियो मिर्ची’ अब इस्लामी कट्टरपंथ और आतंकवाद का बचाव करता दिख रहा है। एफएम रेडियो चैनल की RJ सायमा इस मामले में खुल कर लगी हुई हैं। ‘रेडियो मिर्ची’ ने एक ट्वीट में ‘जिहाद, आतंकवाद नहीं है‘ लिख कर इस्लामी कट्टरपंथियों का बचाव किया। साथ ही RJ सायमा की ‘उर्दू की पाठशाला’ में ‘काफिर’ अंग्रेजी में ‘Non Believer’ बताया गया, अर्थात किसी चीज में अविश्वास करने वाला।

मई 10, 2020 में ‘रेडियो मिर्ची’ की RJ सायमा का एक वीडियो ‘काफिर और जिहाद है?’ टाइटल के साथ ‘द मुस्लिम गाइड’ चैनल पर अपलोड किया गया था। इस वीडियो में ‘रेडियो मिर्ची’ के शो ‘उर्दू की पाठशाला’ के जरिए ‘काफिर’ और ‘जिहाद’ जैसे शब्दों को समझाया गया है। RJ सायमा कहती हैं कि जब आप ‘काफिर’ शब्द को गूगल करेंगे तो आपको इसका वही अर्थ मिलेगा, जो आप जानते थे। इसके बाद वो कहती हैं कि गूगल तो बस ‘पॉपुलर मीनिंग’ बताता है।

RJ सायमा के अनुसार, गूगल ‘काफिर’ शब्द का वही अर्थ बताएगा, जैसा ज्यादातर लोगों ने समझा है। इसके बाद वो बताती हैं कि इसके लिए आपको डिक्शनरी उठानी पड़ेगी, जहाँ पर इस लफ्ज का अर्थ मिलेगा। वो आगे बताती हैं कि ये शब्द ‘कुफ्र’ से बना है, जिसका अर्थ है – ‘किसी चीज को छिपाना या छिपाने की कोशिश करना’। वो आगे समझाती हैं कि जो खुदा, रब, भगवान की शिक्षाओं को छिपाने की कोशिश करते हैं, वही ‘कुफ्र’ है।

बकौल RJ सायमा, जब हम जानते हैं कि हमें किसने बनाया है, हमें बनाने वाला कोई है – हम उसे छिपाने की कोशिश करते हैं। इसके आगे वो कहती हैं कि जो ‘अविश्वासी’ होता है और जिसका ईमान नहीं होता है, उसे ‘काफिर’ कहते हैं। वो समझाती हैं कि ‘काफिर’ वो है, जो ‘कुफ्र’ करता है। इसके बाद वो इस शब्द के महिमामंडन के लिए एक शायरी भी पढ़ती हैं: एक बेवफा के प्यार में हद से गुजर गए, काफिर के प्यार ने हमें काफिर बना दिया।

वो समझाती हैं कि सच को छिपाने वाले को ‘काफिर’ कहते हैं। वो एक और शायरी पढ़ती हैं, ‘एक पहुँचा हुआ मुसाफिर है, दिल भटकने में फिर भी माहिर है, कौन लाया है इश्क पर ईमान, मैं भी काफिर हूँ, तू भी काफिर है‘। इसके आगे वो निष्कर्ष ये निकालती हैं कि नॉन-मुस्लिम काफिर हैं, आगे से मत बोलिएगा। इसके बाद वो ‘जिहाद’ के शब्द को बदनाम करने के लिए आतंकियों को दोष देते हुए दावा करती हैं कि 5% लोगों को भी इस अरबी शब्द का मतलब नहीं पता होगा।

‘रेडियो मिर्ची’ की RJ सायमा ने समझाया ‘काफिर’ और ‘जिहाद’ का अर्थ

फिर वो सवाल करती हैं कि क्या किसी ने इस शब्द को बदनाम कर दिया तो इसका मतलब बदल जाएगा? उनका कहना है कि ‘जिहाद’ का मतलब ‘पवित्र युद्ध’ नहीं है बल्कि ‘संघर्ष’ है। इसके बाद वो इसके हल्के-फुल्के अंदाज़ में उदाहरण देती हैं कि अगर किसी को कोई लड़की पसंद है तो वो कह सकता है कि उसे उसका मोबाइल नंबर लेने के लिए ‘जिहाद’ करना पड़ रहा है। फिर वो कहती हैं कि हमारा पहला ‘जिहाद’ खुद से होता है।

साथ ही वो बुराइयों और झूठ को निकालने के लिए किए जाने वाले संघर्ष को ‘जिहाद’ नाम देती हैं और कहती हैं कि खुद के अंदर से इन चीजों को निकालने के बाद अपने आसपास भी इन चीजों को निकालने के लिए संघर्ष करना ही ‘जिहाद’ है। इसके बाद वो इस पर बहस की गुंजाइश को समाप्त करते हुए कहती हैं कि कोई उन्हें किसी लेख या वीडियो में टैग कर के कह सकता है कि वहाँ इन शब्दों का मतलब कुछ और है, लेकिन इससे ‘सच’ नहीं बदल जाता।

वहीं दसूरी तरफ ‘दारुल उलूम देवबंद’ के अनुसार तो कादियानी/अहमदिया तक को ‘काफिर’ बताया जाता है और एक सवाल के जवाब में संस्था ने कहा था कि अगर इलाज करने वाले डॉक्टर इस समुदाय से आते हैं तो उन्हें त्याग देना चाहिए, उनसे इलाज नहीं करवाना चाहिए। देवबंद ने अपने फतवे में तो शिया समुदाय को भी काफिर करार दिया था। साथ ही कहा था कि जो सुन्नी समुदाय भी शिया के सिद्धांतों में विश्वास रखते हैं, वो भी काफिर हैं।

एक बार एक मुस्लिम लड़की ने एक सिख व्यक्ति से शादी की तो लड़की के माता-पिता ने पूछा कि अगर वो सिख व्यक्ति इस्लाम अपना लेता है और होने वाले बच्चे भी इस्लाम का अनुसरण करते हैं, और उसे अपने माता-पिता से ये बात छिपानी पड़े, तो क्या इसकी अनुमति है? इसके जवाब में देवबंद ने कहा था कि अगर कोई दिल से इस्लाम अपना लेता है तो वो मुस्लिम ही है, भले ही उसे किसी से अपना ईमान छिपाना पड़े। साथ ही उसने अपने फतवे में नॉन-मुस्लिमों से शादी पर भी पाबन्दी लगाई थी।

हालाँकि, RJ सायमा हमेशा ऐसे कारणों से ही विवादों में रहती आई हैं। दिसंबर 2019 में रेडियो मिर्ची की रेडियो जॉकी (RJ) सायमा ने दिल्ली पुलिस मुख्यालय के बाहर विरोध-प्रदर्शन करने के लिए भीड़ जुटाने के लिए अपने ट्विटर हैंडल का इस्तेमाल किया था। उन्होंने ट्वीट कर दिल्ली के लोगों को पुलिस मुख्यालय के बाहर बड़े पैमाने पर इकट्ठा होने का आग्रह किया था, जिससे ‘दिल्ली पुलिस द्वारा’ हिंसा के ख़िलाफ़ ‘शांतिपूर्ण ढंग से विरोध किया जा सके।’

मजार के अंदर सेक्स रैकेट, मौलाना नासिर पकड़ाया भी रंगे-हाथ… लेकिन TOI ने ‘तांत्रिक’ (हिंदू) लिख कर फैलाया भ्रम

ख़बरों का सबसे अहम पहलू यही है कि वह अपनी असल सूरत में पेश की जाए। इस शैली का पालन करते हुए जनता भी भ्रम से दूर रहती है और सामाजिक वातावरण भी नहीं बिगड़ता। लेकिन कुछ समाचार समूह ऐसे हैं, जो अपने ‘सेक्युलर’ धर्म का निर्वहन करते हुए असल तथ्यों का उपहास करते हैं। खुद को समुदाय विशेष का हितैषी बताने की होड़ में कभी कोई जानकारी खुद से जोड़ लेते हैं तो कभी जानकारी ही बदल देते हैं। इसी तरह की एक घटना में टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने मौलाना को ‘तांत्रिक’ बता दिया है।  

यौन शोषण और देह व्यापार के आरोपित मौलाना को तांत्रिक बताया गया है और ऐसा करने वाला मीडिया समूह है टाइम्स ऑफ़ इंडिया (Times Of India)। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित हुसैनाबाद, जामा मज़ार के भीतर पुलिस ने गुरुवार (23 अक्टूबर 2020) को एक मौलाना (लेकिन TOI के अनुसार तांत्रिक) को गिरफ्तार किया था।

मौलाना कथित तौर पर ऐसे दंपति का उपचार कर रहा था, जिनकी संतान नहीं थी। उपचार की आड़ लेकर वह महिला का यौन शोषण करवा रहा था। इसके अलावा आरोप यह भी है कि वह मज़ार के भीतर ही देह व्यापार का धंधा भी करता था। 

पुलिस द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार बुधवार (22 अक्टूबर 2020) की रात नासिर उर्फ़ काले बाबा (मौलाना) का एक वीडियो सोशल मीडिया पर चर्चा में आया। इस वीडियो में साफ़ नज़र आ रहा था कि मौलाना के मजार के अंदर महिला के साथ एक व्यक्ति आपत्तिजनक स्थिति में मौजूद था।

यौन शोषण का वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने इस मामले में पड़ताल शुरू की, इसके बाद स्थानीय लोगों का बयान दर्ज करके अगले दिन आरोपित मौलाना को गिरफ्तार किया। पुलिस ने उस मौलाना पर यौन शोषण और बलात्कार का मामला भी दर्ज कर लिया है। इस मामले में आस-पास रहने वाले लोगों ने यह भी बताया कि वह बिना संतान की दंपतियों का उपचार करने के लिए भारी रकम भी वसूलता था। 

पूरी ख़बर में एक बात शुरू से ही स्पष्ट हो जाती है कि आरोपित मज़ार में रहता है और उसका नाम नासिर है। यानी वह किसी भी दृष्टिकोण से तांत्रिक (हिंदू धर्म से संबंधित वो व्यक्ति, जिसने तंत्र साधना की हो, तंत्र साधना में सिद्ध हो) नहीं हो सकता है। फिर भी टाइम्स ऑफ़ इंडिया के लिए वह ‘मौलाना’ नहीं बल्कि तांत्रिक है!

स्वाभाविक सी बात है, तांत्रिक वह होता है जिसे तंत्र और मंत्र का बोध हो और परम्पराओं का ज्ञान हो, सीधे तौर पर हिन्दू पद्धति और सनातन धर्म से जुड़ा हो। लेकिन इस तरह के तमाम अहम तर्कों का बहिष्कार करते हुए टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने एक यौन शोषण एवं बलात्कार के आरोपित ‘मौलाना’ को तांत्रिक लिख दिया। 

TOI के पाठक द्वारा की गई टिप्पणी (लाल घेरे में)

इस ख़बर के ठीक नीचे टाइम्स ऑफ़ इंडिया के एक पाठक ने आईना दिखाते हुए टिप्पणी की है। उस टिप्पणी में पाठक ने लिखा है, “क्योंकि व्यक्ति मजहब विशेष से है तो वह तांत्रिक नहीं हो सकता है, वह मौलाना है। कृपया वाक्य ठीक कर लीजिए! अब इंग्लिश भी हम ही सिखाएंगे।”

पूरी बात का मजमून इतना ही है कि जब एक व्यक्ति मौलाना है तो वह मौलाना ही रहने वाला है। ऐसे में एक व्यक्ति, एक समुदाय या एक मज़हब के लिए सुरक्षा कवच बन कर ‘धर्म निरपेक्ष पत्रकारिता’ करने का क्या तात्पर्य? अमूमन जब आरोपित हिन्दू धर्म से संबंधित होता है, तब इस कथित सेकुलर श्रेणी के प्रबुद्ध समाचार समूह पूरी प्रबलता के साथ लिखते हैं ‘भगवा’, ‘हिन्दू’ या ‘बाबा’। जब ठीक उसी अपराध का आरोपित समुदाय विशेष वाला है तब वह तांत्रिक क्यों और कैसे बन जाता है?             

यह पहला ऐसा मौक़ा नहीं है, जब समाचार समूहों ने आरोपित मौलाना या मजहबी व्यक्ति की पहचान बदली हो। इस कड़ी में सदा सर्वदा की तरह पहले पायदान पर मौजूद है एनडीटीवी। एनडीटीवी मजहब विशेष की ढाल बनने की दौड़ में कभी मजहबी बलात्कारी को बाबा और तांत्रिक कह देता है तो कभी बच्चे की मौत के ज़िम्मेदार को तांत्रिक घोषित कर देता है।

इसी तरह कई समाचार समूहों ने कोरोना के इलाज का दावा करने वाले मोहम्मद इस्माइल को फ़ेक बाबा बता कर हिन्दू स्पिन दिया था। इस तरह के तमाम मामले हैं, जब एक मज़हब से आने वाले व्यक्ति की पहचान छुपा कर मीडिया उनकी ढाल बन जाता है।    

AajTak बड़े-बड़े अक्षरों में लिख कर और बोल कर Live माफी माँगे: सुशांत के फेक ट्वीट पर NBSA का आदेश

सुशांत सिंह राजपूत मामले में फेक न्यूज़ चलाने के लिए ‘न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (NBSA)’ ने ‘आज तक’ न्यूज़ चैनल को निर्देश दिया है कि वो मंगलवार (अक्टूबर 27, 2020) को रात 8 बजे माफ़ी माँगे, और साथ ही 1 लाख रुपए का जुर्माना भी भरे। दरअसल, ‘आज तक’ ने सुशांत सिंह राजपूत की अंतिम ट्वीट्स बता कर फेक सामग्रियाँ दिखाई थीं। जून 20, 2020 को नीलेश नवलखा द्वारा की गई शिकायत पर कार्रवाई करते हुए NBSA ने ये निर्णय लिया।

‘आज तक’ चैनल को निर्देश दिया गया है कि वो टेक्स्ट के माध्यम से माफीनामे का प्रसारण करे। ‘आज तक’ को NBSA ने कहा है कि माफीनामे का ये टेक्स्ट बड़े फॉन्ट्स में होने चाहिए और साथ ही बैकग्राउंड में वॉयस ओवर के द्वारा धीरे-धीरे इस माफीनामे को पढ़ा जाना चाहिए। इसके अलावा उसे 1 लाख रुपए का जुर्माना भी भरना पड़ेगा। चैनल को माफ़ी माँगते हुए लाइव प्रसारण के दौरान निम्नलिखित टेक्स्ट को दिखाना और पढ़ना पड़ेगा:

“सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या से सम्बंधित घटनाओं पर रिपोर्टिंग के दौरान ‘आज तक’ चैनल ने कुछ ट्वीट्स दिखाए थे और उन ट्वीट्स को गलत तरीके से सुशांत सिंह राजपूत की अंतिम ट्वीट्स के स्क्रीनशॉट्स करार दिया था। हमने उन्हें वास्तविक ट्वीट्स बताया था। ऐसा कर के हमने एक्यूरेसी से सम्बंधित ‘स्पेसिफिक गाइडलाइन्स कवरिंग रिपोर्टेज’ के अनुच्छेद-1 का उल्लंघन किया है। इस अनुच्छेद में कहा गया है कि सूचनाओं की एक से ज्यादा सोर्सेज से पुष्टि की जानी चाहिए। अगर समाचार एजेंसियों से कोई सूचना मिल रही है तो इसका जिक्र किया जाना चाहिए और संभव हो तो उसकी पुष्टि भी की जानी चाहिए। आरोपों को एक्यूरेसी के साथ पेश किया जाना चाहिए और फैक्ट्स में हुई गलतियों को जल्द से जल्द सुधारा जाना चाहिए।”

इसके अलावा ‘इंडिया टीवी’, ‘ज़ी न्यूज़’ और ‘न्यूज़ 24’ को भी सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में रिपोर्टिंग करते समय पत्रकारिता के सिद्धांतों का उल्लंघन के लिए माफ़ी माँगने को कहा गया है। नीलेश की तरफ से अधिवक्ता द्वय राजेश इनामदार और शाश्वत आनंद ने प्रतिनिधित्व किया। जहाँ ‘ज़ी न्यूज़’ और ‘इंडिया टीवी’ अक्टूबर 27 को माफ़ी माँगेंगे, वहीं ‘न्यूज़ 24’ अक्टूबर 29 को अपना माफीनामा पेश करेगा।

‘ज़ी न्यूज़’ ने ‘सुशांत की मौत पर 7 सवाल’ और ‘पटना का सुशांत मुंबई में फेल क्यों?’ जैसे टाइटल और टैगलाइन चलाए थे, जिसके बारे में NBSA ने कहा है कि किसी भी खबर को लोगों में डर या घबराहट का माहौल पैदा करने के लिए सनसनीखेज नहीं बनाया जाना चाहिए। वहीं ‘इंडिया टीवी’ ने उस नियम का उल्लंघन किया है, जिसमें क्षत-विक्षत शव या फिर किसी अन्य शव का काफी करीब से लिए गए फोटो या वीडियो नहीं दिखाए जाने चाहिए और मृत्यु के मामलों में सम्मान के साथ रिपोर्टिंग होनी चाहिए।

वहीं ‘न्यूज़ 24’ ने ‘सुशांत, आपने अपनी ही फिल्म क्यों नहीं देखी?’ और ‘जिस चीज के लिए आपने फिल्म में आवाज़ उठाई, उसे अपनी वास्तविक ज़िंदगी में भूल गए’ जैसे टैगलाइन के साथ खबरें चलाई थीं। बता दें कि सुशांत सिंह राजपूत की फिल्म ‘छिछोरे’ में आत्महत्या की समस्या को उठाया गया था। NBSA ने उस नियम का हवाला दिया है, जिसके अनुसार, क्राइम की खबरें दिखाने के लिए उसके साथ ग्लैमर नहीं मिलाया जा सकता।

वहीं ‘एबीपी न्यूज़’ को भी इसकी कवरेज से सम्बंधित कुछ वीडियो हटाने के निर्देश दिए गए हैं। इसके अलावा ‘न्यूज़ नेशन’ व अन्य खबरिया चैनलों को भी निर्देश दिया गया है कि जिन वीडियोज में उन्होंने सुशांत सिंह राजपूत के मृत शरीर की तस्वीर दिखाई है, उन्हें हटाया जाना चाहिए। इन सभी चैनलों को माफ़ी माँगने और वीडियोज हटाने के बाद इसके सबूत NBSA को भेजने होंगे। NBSA ने BARC द्वारा 12 सप्ताह के लिए टीवी रेटिंग्स पर रोक लगाए जाने का भी स्वागत किया था।

आजतक ने दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के कथित आखिरी ‘ट्वीट्स’ पर उनकी मौत के दो दिन बाद 16 जून को ख़बर प्रकाशित की थी। ‘आज तक’ ने यह लेख अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से भी साझा किया था। आजतक ने जो लिंक साझा किया था उसके भीतर इस बात का दावा किया गया था कि सुशांत ने कथित तौर पर आत्महत्या के संकेत दिए थे। बाद में बिना किसी प्रकार का स्पष्टीकरण दिए यह ख़बर (ट्वीट) हटा ली गई थी।

5 देशों के वीटो वाले समीकरण से खोखला हो चुका है संयुक्त राष्ट्र: भारत-इजरायल के साथ विस्तार है समय की माँग

संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना विश्व इतिहास का एक नया मोड़ था। इसकी स्थापना 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र अधिकार-पत्र पर 50 देशों के हस्ताक्षर होने के साथ हुई थी। द्वितीय विश्व युद्ध को समाप्त कर शांति स्थापना के लिए इसका निर्माण मानवता के इतिहास में एक अभूतपूर्व प्रयास था। यह प्रथम संस्था थी, जिससे अंतरराष्ट्रीय जगत में विधि के शासन की स्थापना करने की आशा की जाती थी। 

यह कहा गया था कि ‘इसका उद्देश्य तांडव से आने वाली पीढ़ियों की रक्षा करना है, संसार को प्रजातंत्र के लिए सुरक्षित स्थान बनाना है और एक ऐसी शांति की स्थापना करना है जो न्याय पर आश्रित हो।’ किंतु यह मानवता का दुर्भाग्य था कि राष्ट्र संघ अपने महान आदर्शों, महत्वाकांक्षी सपनों और उद्देश्यों की प्राप्ति में सफल नहीं हो सका। संयुक्त राष्ट्र संघ की असफलता के कारण निम्नलिखित थे-

  • उग्र राष्ट्रीयता – राष्ट्र संघ की विफलता का एक कारण विभिन्न राष्ट्रों की उग्र राष्ट्रीयता थी। प्रत्येक राष्ट्र स्वयं को संप्रभु समझते हुए अपनी इच्छा अनुसार कार्य करने में विश्वास करते थे। कोई भी राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा के लिए अपनी प्रभुसत्ता पर किसी का नियंत्रण स्वीकार करने को तैयार नहीं था। राष्ट्र संघ के मौलिक सिद्धांत भले ही नए थे, किंतु उनके सदस्य राष्ट्र परंपरागत राष्ट्रीयता की संकीर्ण विचारों पर विश्वास करते थे। संयुक्त राष्ट्र अपने सदस्यों की आपसी खीचतान की वजह से कई संवेदनशील मुद्दों का समाधान खोजने में नाकाम रहा है।
    सार्वभौमिकता का अभाव – विश्व शांति के लिए आवश्यक था कि विश्व के सभी देश राष्ट्र संघ के सदस्य होते, किंतु ऐसा नहीं हो सका। प्रारंभ में सोवियत संघ और जर्मनी को संगठन से अलग रखा गया। 1926 में जर्मनी को इसका सदस्य बना दिया गया, किंतु कुछ समय पश्चात ब्राज़ील और कोस्टारिका इससे अलग हो गए। 1933 में जापान और जर्मनी ने इसकी सदस्यता त्यागने का नोटिस दे दिया। 1934 में रूस इसका सदस्य बना। 1937 में इटली ने इसकी सदस्यता त्यागने का नोटिस दे दिया। 1939 में सोवियत संघ को राष्ट्र संघ से निकाल दिया गया। इस प्रकार राष्ट्र संघ के 20 वर्ष के जीवन में ऐसा कोई अवसर नहीं आया, जब विश्व के सभी देश इसके सदस्य रहे हो।
  • अमेरिका का सदस्य न बनना – अमेरिकन राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन ने राष्ट्र संघ की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई किंतु अमेरिकी सीनेट ने सदस्यता के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। इसलिए राष्ट्र संघ को अमेरिका का सहयोग नहीं मिल सका। अमेरिका का राष्ट्र संघ का सदस्य न बनने के कारण संघ पर निम्नलिखित प्रभाव पड़े –
  • राष्ट्र संघ को अमेरिका की आर्थिक और सैनिक शक्ति से वंचित होना पड़ा, जिससे उसकी शक्ति कम हो गई।
  • अमेरिका के बाहर रहने से राष्ट्र संघ विश्व व्यापार संगठन नहीं बन सका।
  • अमेरिका के सदस्य न बनने से जो राष्ट्र अपनी आशाएँ और इच्छाएँ पूरी नहीं कर पाए, वे राष्ट्र संघ से अलग होने लगे।
  • अमेरिका के अभाव में फ्रांस को दी गई Anglo-American गारंटी व्यर्थ हो गई और अपनी सुरक्षा के लिए फ्रांस ने गुटबंदियों का सहारा लिया। जिससे राष्ट्र संघ और विश्व शांति पर बुरा प्रभाव पड़ा।
  • राष्ट्र संघ द्वारा युद्ध रोकने की ढीली व्यवस्था – राष्ट्र संघ के विधान द्वारा युद्ध रोकने की ढीली-ढाली व्यवस्था की गई थी। प्रसंविदा की धारा 15 में अंतरराष्ट्रीय विवादों को निपटाने की जो व्यवस्था थी, वह बहुत देर करने वाली थी। विचार-विमर्श में ही काफी समय बीत जाता था और तब तक आक्रमणकारी को युद्ध की तैयारी करने का मौका मिल जाता था। धारा 16 के अंतर्गत भी कोई शक्तिपूर्ण कार्रवाई तब तक नहीं की जा सकती थी, जब तक राष्ट्र संघ यह घोषणा न कर दे कि कोई राज्य ने संघ विधान का उल्लंघन करके युद्ध की घोषणा की है। युद्ध होने पर भी कोई राज्य अपना बचाव यह कहकर कर सकता था कि युद्ध मैंने शुरू नहीं किया है। इस प्रकार जानबूझकर की गई युद्ध को राष्ट्र संघ रोक नहीं सका।
  • घृणा पर आधारित – राष्ट्र संघ की स्थापना का आधार घृणा थी, क्योंकि यह संघ वर्साय संधि की ही देन थी। वर्साय संधि की प्रथम 26 धाराएँ राष्ट्र संघ का विधान थीं। इस प्रकार यह राष्ट्र संघ का अभिन्न अंग था। पराजित राष्ट्र इस संधि को घृणा की दृष्टि से देखते थे और उसे अन्याय का प्रतीक मानते थे। अतः राष्ट्र संघ के प्रति उनकी दृष्टिकोण अनुदान हो गई। इस प्रकार वर्साय संधि का अंग मानकर जर्मनी ने राष्ट्र संघ को भी अस्वीकार कर दिया।

75 सालों में भले ही हम तीसरे विश्व युद्ध  की दहलीज़ तक नहीं पहुँचे हैं। लेकिन एक ओर अमेरिका और दूसरी ओर चीन, एक दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहा रहे। एक सप्ताह तक चलने वाले संयुक्त राष्ट्र सत्र के दूसरे दिन मेज़बान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफ़िंग के वीडियो रिकॉर्डेड भाषणों की ‘गंध’ से विभाजन की जो तस्वीर उभर कर सामने आई है, उसे देख-सुन कर संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुतेरस ख़ुद इसके अस्तित्व को लेकर चिंतित हो उठे हैं। अमेरिका धन राशि के सहयोग और संयुक्त राष्ट्र की इकाइयों से हाथ खींचता जा रहा है, तो चीन उन इकाइयों को क़ब्ज़ाए जा रहा है।

द्वितीय विश्व युद्ध की राख के ढेर पर विजेता देशों ने पारस्परिक सहयोग से संयुक्त राष्ट्र की सफलता के लिए कामनाएँ की थीं, मगर अब उन्हें निराशा होने लगी है। जापान तो उभर गया और विश्व की तीसरी बड़ी आर्थिक ताक़त भी बन गया है, लेकिन वैश्विक संगठन अब दो गुटों-अमेरिका और चीन में बँटने की राह पर है। यह नज़ारा विश्व नेताओं के उद्बोधन के पहले ही दिन सामने आ गया। ट्रंप के साथ-साथ ब्राज़ील के राष्ट्रपति जेयर बोलसानारो ने जम कर सवाल उठाए तो ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी ने आर्थिक प्रतिबंधों के नाम पर अमेरिका पर तीखे प्रहार किए।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य की बात करें तो सीरिया, यमन और लीबिया में युद्ध की स्थिति बनी हुई है, वहीं इज़राइल और फ़िलिस्तीन का संकट ज्यों का त्यों है, भले ही ट्रम्प ने मध्य-पूर्व एशिया में अरब देशों-संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन को इज़राइल के समीप लाने की कोशिश की है। भारत सहित अनेक विकासशील देशों ने अंतरराष्ट्रीय आपदाओं के दौर में अपने-अपने सामर्थ्य के बल पर सैन्य बल एवं ज़रूरी चिकित्सीय तथा खाद्य ज़रूरतें मुहैया कराई हैं। 

दक्षिण चीन सागर मामले में चीन ने अन्तरराष्ट्रीय कोर्ट के आदेशों को मानने से इंकार किया है, तो संयुक्त राष्ट्र के निर्देशों के बावजूद अपने पश्चिमी प्रांत शिनच्यांग में उइगर मुस्लिम समुदाय के प्रति बर्बरतापूर्ण व्यवहार करने से बाज़ नहीं आ रहा है। रोहिंग्या का मामला हो अथवा पाकिस्तान में आतंकवाद को प्रश्रय दिए जाने और सीमापार आतंकवाद का मामला हो, चीन आँखें मूँद अपने चहेते पाकिस्तान का साथ दे रहा है।

वर्तमान विश्व के लिए आतंकवाद सबसे बड़ा खतरा बन गया है परंतु संयुक्त राष्ट्र संघ इस दिशा में कुछ भी कर पाने में असमर्थ दिखाई दे रहा है। विभिन्न राष्ट्र आतंकवाद से लड़ाई लड़ने के मामले में दोहरे मापदंड अपना रहे हैं। 11 सितंबर 2001 के दिन अमेरिका पर जघन्य आतंकवादी हमले हुए तो अमरीका सहित दुनिया के देशों की नींद खुली। भारत में आतंकवाद बहुत पहले से अपना कहर ढा रहा है, जो मुख्यत: पाकिस्तान के समर्थन का नतीजा है। लेकिन ब्रिटेन, अमरीका आदि देश भारत में फैले आतंकवाद को क्षेत्रीय समस्या मानकर भारत और पाकिस्तान दोनों की पीठ थपथपा रहे हैं जो इनकी तुष्टीकरण की नीति को बयाँ करता है।

मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करवाने की भारत की कोशिशों में अब तक चीन अड़ंगा डाल रहा था। मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने के लिए भारत पिछले 10 साल से कोशिश कर रहा था। इतने सालों में यह चौथी कोशिश थी। भारत ने यह प्रस्ताव सबसे पहले 2009 में रखा था। इसके बाद 2016 में भारत ने अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस के साथ मिलकर संयुक्त राष्ट्र की 1267 प्रतिबंध परिषद के समक्ष दूसरी बार प्रस्ताव रखा। इसके बाद तीसरी बार यह प्रस्ताव 2017 में रखा गया। इन सभी मौकों पर चीन वीटो का इस्तेमाल कर अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित होने से रोकता आ रहा था। चीन ने मार्च में भी अजहर पर प्रतिबंध लगाने के प्रस्ताव पर वीटो लगा दिया था।

संगठन पर शुरू से ही वीटो अधिकार प्राप्त पाँच देशों का वर्चस्व रहा है। ये देश ही पूरे विश्व के स्वघोषित प्रतिनिधि के रूप में अपनी राय थोपते नज़र आते हैं। संयुक्त राष्ट्र को इस नीति में सुधार लाने की आवश्यकता है। यह देखना संयुक्त राष्ट्र की जिम्मेदारी है कि चीन वीटो पावर का इस्तेमाल किसी लोक कल्याण के लिए नहीं, अपितु एक आतंकवादी को बचाने के लिए कर रहा था। इससे संयुक्त राष्ट्र पर से लोगों का भरोसा कम हो रहा है। 

जब तक इस वीटो को हटाकर एक न्यायोचित मतदान प्रणाली द्वारा बहुमत आधारित निर्णयों को मान्य नहीं किया जाता तब तक अधिकांश देश उदासीन बने रहेंगे। वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा मामलों की समिति में यूरोपीय राष्ट्रों को स्पष्ट रूप से अधिक प्रतिनिधित्व मिला हुआ है और अन्य क्षेत्र संगत रूप से प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। यह शिकायत दीर्घकाल से है जो संयुक्त राष्ट्र की वैधता को चुनौती देती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 75वें सत्र को सम्बोधित करते हुए इस अंतरराष्ट्रीय संगठन में भारत की भागीदारी बढ़ाने को लेकर जो तीखे सवाल उठाए हैं, उनसे करोड़ों देशवासियों की भावनाएँ जुड़ी हुई हैं। संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी के बाद भी भारत को अब तक सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता नहीं दी गई। देश की वर्षों पुरानी इस माँग का हवाला देकर प्रधानमंत्री ने पूछा कि आखिर भारत को कब तक संयुक्त राष्ट्र के भेदभाव का शिकार होना पड़ेगा? कब तक भारत को आम सदस्य के तौर पर अपनी वफादारी साबित करनी होगी? उन्होंने अंतरराष्ट्रीय महामारी कोरोना से निपटने में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका पर भी सवाल उठाए

विडम्बना यह है कि इससे पहले भी कई मौकों पर भारत को ऐसी साझा कोशिशों में शामिल तो किया जाता रहा, लेकिन जब सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट की माँग उठी तो संयुक्त राष्ट्र ने हाथ खड़े कर दिए। चीन को छोड़ कई देश विभिन्न मंचों से भारत को स्थाई सीट देने का समर्थन करते रहे हैं। भारत के रास्ते में चीन सबसे बड़ा रोड़ा है। उसके पास वीटो पावर है, जिसका इस्तेमाल वह भारत की माँग के खिलाफ करता रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने भारत की माँग का समर्थन किया है।

इससे पहले बराक ओबामा के दौर में भी अमेरिका ने सुरक्षा परिषद में भारतीय दावेदारी का समर्थन किया था, लेकिन हुआ कुछ नहीं। पिछले जून के चुनाव में भारत को आठवीं बार अस्थाई सदस्य ही चुना गया। यह सदस्यता 2021-22 के लिए होगी। अगर इतिहास पर गौर करें, तो भारत को अस्थाई सदस्यता देने में भी आनाकानी होती रही है। यह सदस्यता दो साल के लिए होती है। पहली बार भारत को 1950-51 के लिए अस्थाई सदस्यता दी गई थी। बीच-बीच में लम्बे समय तक उसे इस सदस्यता से भी वंचित रखा गया।

भारत को क्यों मिलनी चाहिए सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता?

  1. भारत 1.3 बिलियन की आबादी और एक ट्रिलियन डॉलर से भी अधिक की अर्थव्यवस्था वाला एक परमाणु शक्ति संपन्न देश है।
  2. यह संयुक्त राष्ट्र पीसकीपिंग अभियानों में सर्वाधिक योगदान देने वाला देश है।
  3. जनसंख्या, क्षेत्रीय आकार, जीडीपी, आर्थिक क्षमता, संपन्न विरासत और सांस्कृतिक विविधता – इन सभी पैमानों पर भारत खरा उतरता है।
  4. यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र और एशिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
  5. भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से विश्व शांति को बढ़ावा देने वाली रही है।

कई साल से यह बात दोहराई जा रही है कि संयुक्त राष्ट्र में बदलते अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य के अनुरूप सुधार की प्रक्रिया चल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया कि बदलते वक्त के हिसाब से यह संगठन कब तक बदलेगा? पीएम ने अपने संबोधन में कहा कि ये बात सही है कि कहने को तो तीसरा विश्व युद्ध नहीं हुआ, लेकिन इस बात को नकार नहीं सकते कि अनेकों युद्ध हुए, अनेकों गृहयुद्ध भी हुए। कितने ही आतंकी हमलों से खून की नदियाँ बहती रहीं। इन युद्धों में, इन हमलों में, जो मारे गए, वो हमारी-आपकी तरह इंसान ही थे। वो लाखों मासूम बच्चे जिन्हें दुनिया पर छा जाना था, वो दुनिया छोड़कर चले गए। कितने ही लोगों को अपने जीवन भर की पूँजी गँवानी पड़ी, अपने सपनों का घर छोड़ना पड़ा। 

उस समय और आज भी, संयुक्त राष्ट्र के प्रयास क्या पर्याप्त थे? पिछले 8-9 महीने से पूरा विश्व कोरोना वैश्विक महामारी से संघर्ष कर रहा है। इस वैश्विक महामारी से निपटने के प्रयासों में संयुक्त राष्ट्र कहाँ है? एक प्रभावशाली रिस्पॉन्स कहाँ है? पीएम मोदी ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र की प्रतिक्रियाओं में बदलाव, व्यवस्थाओं में बदलाव, स्वरूप में बदलाव, आज समय की माँग है। आखिर कब तक भारत को संयुक्त राष्ट्र के फैसला लेने वाले स्ट्रक्चर से अलग रखा जाएगा?

संयुक्त राष्ट्र 24 अक्टूबर को अपने 75 साल पूरे कर रहा है। पिछले कई साल से दो स्थाई सदस्यों अमेरिका और चीन के बीच चल रहे शीत युद्ध ने इस संगठन का सिरदर्द बढ़ा रखा है। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र संघ अमेरिका और रूस के मध्य का अंतर मिटाने में असफल रहा है। ऐसा माना जाता है कि इस पर अमेरिका और उसके उपग्रहों का अधिक प्रभाव है। दूसरी ओर रूस इसकी सुरक्षा परिषद् द्वारा सर्वसम्मति से लिए निर्णयों पर अपने वीटो के अधिकार का प्रयोग कर लेता है।

द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद 1945 से 1989 के बीच के दौर को शीत युद्ध कहा जाता है। इस दौरान दुनिया दो ध्रुवों में बँट गई थी। ये दो ध्रुव अमेरिका और सोवियत संघ थे। इस दौरान करीब 50 साल तक दुनिया में भय का माहौल रहा। इतिहासकार इसे पूँजीवाद और साम्यवाद के बीच की लड़ाई के तौर पर भी देखते हैं।

हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी सितंबर में संयुक्त राष्ट्रसंघ के वार्षिक अधिवेशन में राष्ट्राध्यक्षों का मेला लगा। यद्यपि इस वर्ष विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्षों अथवा उनके प्रतिनिधियों की रिकॉर्ड उपस्थिति रही, किन्तु उनकी इतनी बड़ी संख्या में उपस्थिति ही क्या संयुक्त राष्ट्र संघ को प्रभावी बनाती है? कदाचित नहीं। जिस गति से संयुक्त राष्ट्र संघ की उपयोगिता का ह्रास होता जा रहा है, वह चिंता का विषय बन गया है। विडंबना यह है कि प्रत्येक देश इस मंच को सद्भावना मंच नहीं, अपितु एक कूटनीतिक मंच अधिक समझता है। यह सही है कि इस मंच का उपयोग विश्व के सामने अपनी बात रखने और विश्व के हित में सुझाव देने के लिए होना चाहिए, किन्तु अधिकांश भाषण ‘तू तू-मैं मैं’ वाले होते हैं। 

संयुक्त राष्ट्र संघ के निष्प्रयोजन होने का प्रमुख कारण है – सुरक्षा परिषद् में मिले पाँच राष्ट्रों को वीटो का विशेषाधिकार। इस विशेषाधिकार के चलते यह संस्था शांति और सुरक्षा के अपने मुख्य उद्देश्य को कभी पूरा नहीं कर सकती। हालत ये हो चुकी है कि कई सदस्य देश अपना सालाना शुल्क भी नहीं भर रहे हैं। पाकिस्तान जैसे कुछ देशों के पास तो पैसा ही नहीं है भरने के लिए, किन्तु ये एक अलग बात है। 

विश्व के सामने आतंकवाद, पर्यावरण, शरणार्थी समस्या विकराल रूप ले रही है, किन्तु इस मंच से देश एक दूसरे को निपटाने में लगे हैं। इस सत्र की शुरुआत हमेशा की तरह अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने की। उत्तरी कोरिया को लेकर स्वयं अपनी पीठ थपथपाई। ईरान को लेकर अपना गुस्सा उगला। भारत के विदेश मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र संघ को एक परिवार की तरह काम करने की सलाह दी और उन राष्ट्रों को नसीहत दी जिन्हें ‘मैं’ के अतिरिक्त कुछ दिखाई नहीं देता। 

यूएन की पूरी संरचना में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्‍यकता है, नहीं तो हर वर्ष इसी तरह मेले लगेंगे और उठ जाएँगे। नेता विदा लेंगे, फिर मिलेंगे अगले वर्ष की तर्ज पर। अगले बरस जल्दी आने की किसी को पड़ी नहीं है। आराम से भी आओ। कुछ फर्क नहीं पड़ता। अधिकारियों का सैर-सपाटा अवश्य हो जाता है और नेताओं की झाँकी जम जाती है। विश्व-हित की चिंता किसे है?

ईसाई देश अर्मेनिया और मुस्लिम देश अजरबैजान के बीच संघर्ष में तुर्की और पाकिस्तान खुलकर उतर आए हैं। पाकिस्तान ने जहाँ अपनी सेना अजरबैजान को भेजी है, वहीं तुर्की के साथ मिलकर सीरिया और लीबिया से आतंकवादी भी वहाँ भेज रहा है। तुर्की और पाकिस्तान की इन करतूतों से विश्व युद्ध भड़कने का खतरा है।

बहरहाल आज जब दुनिया इतिहास के एक चुनौती एवं संकटपूर्ण दौर से गुजर रही है, तब दो देशों के बीच ऐसे युद्ध को लंबा खिंचने देना खतरनाक हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र की हालात ऐसी नहीं रह गई है कि उससे ज्यादा उम्मीद की जा सके। हालाँकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने औपचारिक तौर पर हिंसक युद्ध को तत्काल प्रभाव से रोकने और बिना किसी पूर्व शर्त के दोबारा वार्ता शुरू करने को कहा है। मगर इसका कोई परिणाम नजर नहीं आ रहा।

गौरतलब है कि 2015 में ईरान द्वारा इजराइल को ‘नष्ट’ करने की धमकी देने के बाद इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने संयुक्त राष्ट्र के अधिकांश सदस्य देशों पर इसके खिलाफ “कुछ भी नहीं” करने का आरोप लगाया था।

1994 में हुए रवांडा नरसंहार के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ और अमेरिका, ब्रिटेन, बेल्जियम समेत तमाम देशों को उनकी निष्क्रियता के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा। संयुक्त राष्ट्र यहाँ शांति स्थापना करने में नाकाम रहा। वहीं, पर्यवेक्षकों ने इस नरसंहार को समर्थन देने वाली फ्रांस की सरकार की भी जमकर आलोचना की।

1994 में 6 अप्रैल को किगली में हवाई जहाज पर बोर्डिंग के दौरान रवांडा के राष्ट्रपति हेबिअरिमाना और बुरुन्डियान के राष्ट्रपति सिप्रेन की हत्या कर दी गई, जिसके बाद ये संहार शुरू हुआ। करीब 100 दिनों तक चले इस नरसंहार में 5 लाख से लेकर 10 लाख लोग मारे गए। तब ये संख्या पूरे देश की आबादी के करीब 20 फीसदी के बराबर थी।

इस संघर्ष की नींव खुद नहीं पड़ी थी, बल्कि ये रवांडा की प्रभावशाली सरकार द्वारा प्रायोजित नरसंहार था। इस सरकार का मकसद विरोधी तुत्सी आबादी का देश से सफाया था। इसमें ना सिर्फ तुत्सी लोगों का कत्ल किया गया, बल्कि तुत्सी समुदाय के लोगों के साथ जरा सी भी सहानुभूति दिखाने वाले लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया।

इसके अलावा महामारी से निपटने में संयुक्त राष्ट्र की नाकामी की बातें काफी ज्यादा होने लगी है। खास तौर पर दुनिया के देशों की एकजुटता को लेकर खुलकर सवाल उठने लगे हैं। बात सिर्फ महामारी के मोर्चे पर नाकामी तक सीमित नहीं रही। बल्कि महामारी के अलावा दुनिया में असमानता, भूख और जलवायु संकट के मुद्दों पर भी विश्व निकाय की नाकामियों का जिक्र हो रहा है और इसीलिए संयुक्त राष्ट्र में सुधारों की आवाज भी ऊँची होती नजर आ रही है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुतेरिस कबूल कर चुके हैं कि महामारी वाकई अंतरराष्ट्रीय सहयोग के काम का एक इम्तिहान है और इसमें हम नाकाम रहे हैं।

एकमत होने में भारी अड़चन

संयुक्त राष्ट्र महासभा में विश्व नेताओं की ऑनलाइन बैठक में दुनिया के तमाम देश मुख्य मुद्दों पर एकमत नहीं हो पाए। विश्व युद्ध के बाद 50 देशों के एकसाथ आने से बने संयुक्त राष्ट्र ने संकल्प किया था कि युद्ध से बचा जाएगा, लेकिन इस संकल्प को पूरा करने में अड़चन आई। कहा यह गया कि दुनिया भर में असामनता, भूख और जलवायु संकट के कारण संघर्ष बढ़ते ही चले गए। क्या यह सवाल नहीं उठता कि ये जो तीन प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं, उन्हें दूर करने का काम किसका था? बेशक यह काम भी एकजुट होकर ही हो सकता था, लेकिन नहीं हो पाया।

नेताओं के बयानों से भी अंदाजा लगाएँ

संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा स्थिति का अंदाजा दो नेताओं के बयानों से भी लगता है। मसलन फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों अगर यह कह रहे हों कि छोटी-छोटी बातों पर भी सहमति बनने में अड़चन आई तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि संयुक्त राष्ट्र किस स्थिति में पहुँच गया है। मैक्रों ने तो यहाँ तक कह दिया कि संस्था के कमजोर पड़ने का जोखिम नज़र आने लगा है। इसी तरह स्विटजरलैंड के राष्ट्रपति सिमिनेटे सोमेरूगा अगर यह बात कह रहे हों कि समस्या संस्था के रूप में संयुक्त राष्ट्र के साथ नहीं बल्कि उसके सदस्य देशों के साथ है। तो क्या यह माना जाए कि संस्था में सदस्य देशों की दिलचस्पी कम हो चली है।

जबकि आज तो और भी जरूरी है संयुक्त राष्ट्र

संयुक्त राष्ट्र दूसरे विश्वयुद्ध की तबाही झेलने के बाद बना था। आज विश्व के सामने कई चुनौतियाँ आकर खड़ी हो गई हैं। महामारी तो है ही, वैश्विक मंदी और उससे उपजने वाले ढेरों संकट सामने हैं, खासतौर पर असमानता बढ़ने और भूख के संकट का अंदेशा। ऐसे में संयुक्त राष्ट्र को अपनी भूमिका बढ़ाने और उसे और ज्यादा मजबूत बनाने की दरकार है। और अगर वह कमजोर होता दिखाई दे रहा हो तो दुनिया के जागरूक समाज को चिंता की मुद्रा में आ जाना चाहिए।

राहुल गाँधी जी, अगर चीनी सेना 1200 Km भीतर आ गई है तो आप चीन में खड़े होकर भाषण दे रहे थे, ये रही वजह

शुक्रवार (23 अक्टूबर 2020) को कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने एक बार फिर भारतीय सीमा में चीन के अतिक्रमण को लेकर झूठा दावा किया। राहुल गाँधी ने अपने भाषण में यहाँ तक कह दिया कि चीन की सेना ने भारत में 1200 किलोमीटर भीतर तक अतिक्रमण कर लिया है। बिहार विधानसभा चुनाव को मद्देनज़र रखते हुए नेवादा में हुई एक जनसभा के दौरान राहुल गाँधी ने यह झूठा दावा किया। उनके मुताबिक़, मई में भारत और चीन की सेना के बीच हुए विवाद के बाद चीनी सेना ने भारत की सीमा में 1200 किलोमीटर भीतर तक घुसपैठ कर ली है। 

केंद्र की मोदी सरकार के चीन को लेकर किए जाने वाले दावों का ज़िक्र करते हुए राहुल गाँधी ने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने 1200 किलोमीटर ज़मीन चीन को दे दी। बिहार के नेवादा में हुई जनसभा को संबोधित करते हुए राहुल गाँधी ने कहा, “चीन की सेना ने हमारे 20 सैनिक मारे और हमारी 1200 किलोमीटर ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया। जब चीन के सैनिकों ने हमारी ज़मीन पर कदम रखा था तब प्रधानमंत्री मोदी जी ऐसा कह कर हमारे देश के नायकों का अपमान क्यों करते हैं कि हमारी ज़मीन पर कोई नहीं आया था। आप सर झुकाने की बात मत करिए।” 

यह पहला ऐसा मौक़ा नहीं जब राहुल गाँधी ने भारतीय सीमा में चीनी सेना इ घुसपैठ को लेकर कोई झूठा दावा किया हो। इस हफ्ते की शुरुआत में राहुल गाँधी ने बिहार की एक जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी छवि बेहतर बनाने के लिए देश की 1200 किलोमीटर ज़मीन चीन को सौंप दी

राहुल गाँधी के मुताबिक़ प्रधानमंत्री मोदी ने देश की जनता से इस मामले में झूठ बोला है। जबकि इस मुद्दे पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत की सीमा में किसी भी तरह की घुसपैठ नहीं हुई है। अगर राहुल गाँधी की बात पर भरोसा कर लिया जाए तो इस हिसाब से लगभग आधी भारतीय सीमा पर चीन का कब्ज़ा है। 

अगर हम लद्दाख के पास स्थित वास्तविक नियंत्रण रेखा की दूरी नापें जो कि हाल फ़िलहाल के टकराव का केंद्र बिंदु था। वहाँ से 1200 किलोमीटर की दूरी में बहुत से राज्य और केंद्र शासित प्रदेश आ जाएँगे जैसे- जम्मू कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़ के कई इलाके।

माननीय राहुल गाँधी के दावे के अनुसार अगर गूगल अर्थ के मानचित्र से देखा जाए तो 1200 किलोमीटर की दूरी में लगभग इतना क्षेत्र आ जाएगा। 

अगर हम 1200 किलोमीटर की दूरी लद्दाख सीमा से न देख कर भारत और चीन की सीमा से देखते हैं फिर भी बहुत सा क्षेत्र उसके अंतर्गत आ जाएगा। जिसमें पूरा उत्तर पूर्वी क्षेत्र से उड़ीसा समेत कई प्रदेश शामिल हैं। 

मोदी सरकार की आलोचना करने की तेज़ दौड़ में राहुल गाँधी ने यह दिखा दिया कि उन्हें भारत के भूगोल की कितनी समझ है। इतना ही नहीं अपने झूठे दावों की आड़ में उन्होंने आधे से अधिक भारत चीन के नाम कर दिया। बल्कि इसे उनके दावे के अनुसार ऐसे कहना चाहिए कि राहुल गाँधी ने चीन की सेना में खड़े होकर केंद्र की मोदी सरकार को घेरा।

तथ्यों और आँकड़ों के साथ राहुल गाँधी का ‘विचित्र’ रिश्ता 

राहुल गाँधी जब भी आँकड़ों का उल्लेख करते हैं तब तब वह आवश्यकता से अधिक स्वच्छंद हो जाते हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक विरोधियों पर हमला करने की दौड़ में अक्सर गलत आँकड़े पेश करके तथ्यों को मन मुताबिक पेश करने का प्रयास किया है। 

पिछले साल लोकसभा चुनाव से ठीक पहले मोदी सरकार पर हमला करने की कोशिश में राहुल गाँधी ने उद्योगपतियों को दी गई कर्ज़ में छूट को लेकर गलत आँकड़े पेश किए थे। इतना ही नहीं उन्होंने हर भाषण में उन आँकड़ों की संख्या पूरी तरह बदल दी थी। 

सबसे पहले नवंबर 2016 में राहुल गाँधी ने कहा था कि मोदी सरकार ने दिग्गज उद्योगपतियों का 1.1 लाख करोड़ रुपए का क़र्ज़ माफ़ किया था। साल 2017 के गुजरात विधानसभा चुनावों में जनसभा को संबोधित करते हुए राहुल गाँधी ने इस संख्या को 20 हज़ार करोड़ बढ़ा कर लगभग 1.3 लाख करोड़ रुपए बताया। 

कर्नाटक में राहुल गाँधी फिर चंद कदम आगे बढ़े और उन्होंने कहा कि सरकार ने 2.5 लाख करोड़ रुपए का क़र्ज़ माफ़ किया है। इस पूरे दावे के संबंध में सोशल मीडिया पर एक वीडियो खूब चर्चा में बना हुआ था, इसमें देखा जा सकता है कि कैसे राहुल गाँधी ने न जाने कितली अलग अलग लाख करोड़ की क़र्ज़ माफ़ी का दावा कर दिया। (5.50 लाख करोड़, 3.50 लाख करोड़, 3 लाख करोड़, 2.50 लाख करोड़, 1.50 लाख करोड़, 1.40 लाख करोड़, 1.30 लाख करोड़ और 1.10 लाख करोड़)।

ऋण माफ़ी इकलौता ऐसा मुद्दा नहीं जय जिसे लेकर माननीय राहुल गाँधी इस तरह के हवाई दावे करते रहते हैं। राहुल गाँधी ने न्याय योजना के तहत 72 हज़ार रुपए प्रति वर्ष, 72 हज़ार रुपए प्रति माह और 72 हज़ार करोड़ रुपए प्रति वर्ष का दावा भी किया है। इसके पहले पिछले वर्ष राहुल गाँधी ने राफेल जेट का दाम अलग अलग मौकों पर अपनी सुविधानुसार बदल बदल कर बताया था। इसके अलावा उन्होंने वह राशि भी बदल कर बताई जो मोदी सरकार ने अनिल अंबानी को इस समझौते के दौरान दी। हाल ही में वह 30 हज़ार करोड़ रुपए पर मान गए थे जो कि इस पूरे समझौते के कुल मूल्य से कहीं ज़्यादा है।

बॉम्बे HC ने India Today को दिए ₹5 लाख जुर्माना भरने के निर्देश, BARC ने पकड़ी थी व्यूअरशिप में गड़बड़ी

TRP स्कैम मामले में समाचार चैनल ‘रिपब्लिक टीवी’ ने पिछले दिनों यह खुलासा किया था कि पूरे केस में दर्ज हुई एफआईआर में उनका नहीं बल्कि समाचार चैनल ‘इंडिया टुडे’ का नाम है और वो भी 6 बार। इसके बाद ऑपइंडिया ने आपको बताया कि कैसे टीआरपी में गड़बड़ी करने के कारण टीवी टुडे पर BARC ने पहले से पाँच लाख रुपए का जुर्माना लगाया हुआ है। मगर फिर भी टीवी टुडे के पत्रकार रिपब्लिक टीवी पर निशाना साधने के लिए आतुर हैं।

अब इसी मामले में ताजा अपडेट यह है कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने ‘टीवी टुडे’ को निर्देश दिए हैं कि वह किसी भी कार्रवाई से बचने के लिए BARC द्वारा लगाए जुर्माने को भर दें। ‘टीवी टुडे’ नेटवर्क ‘लिविंग मीडिया इंडिया लिमिटेड’ की सहायक कंपनी है, जिसे ‘इंडिया टुडे’ ग्रुप के नाम से भी जाना जाता है।

‘बार और बेंच’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, ‘टीवी टुडे’ ने व्यूअरशिप गड़बड़ी मामले में BARC द्वारा लगाए गए जुर्माने को निरस्त करवाने के लिए बॉम्बे उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। इस याचिका पर न्यायाधीश नितिन जामदार और मिलिंद जाधव की बेंच ने सुनवाई की।

इस सुनवाई में ही कोर्ट ने ‘टीवी टुडे’ को न्यायालय की रजिस्ट्री में जुर्माने की राशि जमा करने का निर्देश दिया। इसके अलावा कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि जुर्माने की राशि का भुगतान कर दिया जाता है तो कोई एक्शन नहीं लिया जाएगा।

इस याचिका में टीवी टुडे ने इस आधार पर मामले को निरस्त करने की माँग की थी कि BARC ने जो उन पर व्यूअरशिप में गड़बड़ी (Viewership malpractice) के आरोप लगाए, उसको सबूतों के साथ साबित करने में वह विफल हो गए।

याचिका में यह भी कहा गया था कि BARC ने इंडिपेंडेंट ऑडिट प्रक्रिया की कोई भी रिपोर्ट अपलोड नहीं की है जिसमें सूचना और प्रसारण मंत्रालय के दिशानिर्देशों के तहत गड़बड़ी का पता चलता हो। बता दें कि कोर्ट ने इस मामले को 5 नवंबर तक के लिए स्थगित कर दिया है।

क्या है BARC और इंडिया टुडे का मामला

गौरतलब है कि व्यूअरशिप में गड़बड़ी (malpractice) नजर आने के संबंध में टीवी टुडे नेटवर्क लिमिटेड को 27 अप्रैल 2020 को कारण बताओ नोटिस भेजा गया था। इसके बाद टीवी टुडे द्वारा दिया गया जवाब BARC डिसिप्लिनरी काउंसिल को संतोषजनक नहीं लगा। बीडीसी ने इंडिया टुडे की प्रतिक्रिया पर कहा, “चुनिंदा भौगोलिक क्षेत्रों (मुंबई और बेंगलुरु) में इंडिया टुडे चैनल की व्यूअरशिप में इतने उछाल के संबंध में दिया गया जवाब संतोषजनक नहीं है।”

इसके अलावा, BARC डिसिप्लिनरी काउंसिल ने कहा था, “BARC Measurement Science Team द्वारा उपलब्ध कराए गए स्टैस्टिकल डेटा (statistical data) से पता चलता है कि व्यूअरशिप में असामान्य और सोच से परे वृद्धि हुई है।”

अपने आदेश में बीडीसी ने कहा था कि, “सब्सक्राइबर के जवाब ने असामान्य वृद्धि के ऊपर संतोषजनक जवाब नहीं दिया।” बता दें कि यहाँ सब्सक्राइबर का अर्थ इंडिया टुडे से है, जिन्हें BARC Disciplinary Council ने कारण बताओ नोटिस भेजा था।

आगे आदेश में जो कहा गया वह भी बेहद चौंकाने वाला है। उसमें लिखा था:

“उपरोक्त के मद्देनजर, काउंसिल को लगता है कि सब्सक्राइबर ने EULA की धारा 7 में निहित प्रावधनाओं का उल्लंघन किया और व्यूअरशिप में गड़बड़ी की, जिसका जिक्र कारण बताओ नोटिस में है। साथ ही BARC Vigilance team टीम द्वारा जमा की गई रिपोर्ट में भी है। CCRVM की धारा 14 (ए) के तहत, यह सब्सक्राइबर का पहला अपराध है। इसलिए काउंसिल इस बात पर सहमति दे रही है कि वर्तमान मामले में सिर्फ़ सब्सक्राइबर को चेतावनी जारी की जाएगी और उसे 5,00,000 रुपए की पेनाल्टी BARC को भरनी होगी।”

सिर्फ मेरिट है नौकरी का तरीका, नियुक्तियों में गड़बड़ी करने वालों की एकमात्र जगह जेल- CM योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शुक्रवार को भ्रष्टाचारियों को चेताया है। CM योगी आदित्यनाथ ने कहा कि प्रदेश में नौकरी हासिल करने के लिए गड़बड़ी की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर कहीं नियुक्तियों में भ्रष्टाचार हुआ तो दोषियों को जेल में ही ठिकाना मिलेगा।

सीएम योगी ने शुक्रवार (अक्टूबर 23, 2020) को माध्यमिक शिक्षा विभाग में नए 3317 सहायक अध्यापकों को नियुक्ति पत्र बाँटते हुए अपनी बातें रखी। उन्होंने कहा कि प्रदेश में अब सरकारी नौकरी पाने का एकमात्र तरीका मेरिट है। सभी विभागों में पूरी पारदर्शिता के साथ योग्य अभ्यर्थी को ही नौकरी मिलेगी।

सीएम योगी ने अपने वर्चुअल संबोधन में सबको को याद दिलाया कि साढ़े तीन साल पहले उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की शोहरत किस वजह से थी लेकिन अब यह आयोग नियुक्तियों में अपनी पारदर्शिता के लिए जाना जाता है। अभ्यार्थियों के चयन का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, “लाखों अभ्यार्थियों में से आप लोगों का चयन इस बात का प्रमाण है।”

उन्होंने बताया कि मेरिट के आधार पर ही साढ़े तीन साल में करीब 3.50 लाख युवाओं को सरकारी नौकरी दी गई है और इतनी ही नौकरी आने वाले समय में दी जाएगी।

योगी आदित्यनाथ ने चुने हुए शिक्षकों को तकनीकी रूप से अपडेट रहने की सलाह भी दी। उन्होंने शिक्षकों को कहा,

“खुद भी तकनीकी रूप से अपडेट रहें और बच्चों को भी अपडेट करें। तकनीक ही पारदर्शिता की कुंजी है। अगर तकनीक नहीं होती तो हम कोरोना वायरस महामारी की इस अभूतपूर्व संकट में जरूरतमंदों को पेंशन, भरण-पोषण भत्ता और किसान सम्मान निधि के रूप में एक क्लिक पर लाभ नहीं पहुँचा पाते।”

उन्होंने शिक्षकों को बताया कि आखिर कैसे तकनीक के कारण ही कोरोना संकट के समय में ऑनलाइन बच्चों की पढ़ाई सुचारू रूप से चल सकी। सीएम ने युवाओं को पूंजी बताते हुए कहा कि जो जिस लायक हैं उसकी मेरिट का सम्मान करते हुए उसका स्थान दिया जा रहा है।

ऑपइंडिया एक्सक्लूसिव: TRP स्कैम में ‘Republic TV’ का नाम लेने के लिए गवाहों पर दबाव बना रही मुंबई पुलिस, ऑडियो में खुलासा

TRP स्कैम का मुद्दा गर्माने के बाद से मुंबई पुलिस की भूमिका लगातार शक के घेरे में है। पहले इस बात का खुलासा हुआ कि मुंबई पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में निराधार ही Republic TV का नाम पूरे घोटाले में लिया, जबकि दर्ज शिकायत में समाचार चैनल ‘इंडिया टुडे’ का नाम था, और अब ताजा खुलासे में यह पता चला है कि कैसे मुंबई पुलिस अपनी मनमर्जी से गवाह के बयान को तोड़-मरोड़ कर ‘Republic TV’ को इस पूरे घोटाले का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रही है।

‘ऑपइंडिया’ के पास आई एक कॉल रिकॉर्डिंग इस बात की पुष्टि करती है कि रिपब्लिक टीवी को फँसाने के लिए मुंबई पुलिस गवाहों पर भी दबाव बना रही है। जिस गवाह ने यह खुलासा आपने पड़ोसी के सामने किया है, उसके घर में एक बार-ओ-मीटर लगाया गया है।

ये रिकॉर्डिंग दो लोगों के बीच की है। पहला – जिसके घर ‘बार-ओ-मीटर’ लगाए और दूसरा- उसका पड़ोसी! गौरतलब है कि भारत में ब्रॉडकास्ट ऑडिएंस रिसर्च काउंसिल (बार्क) 45 हजार से अधिक घरों में एक उपकरण लगाकर प्वाइंट की गिनती करता है। इस उपकरण को ‘बार ओ मीटर’ कहा जाता है।

ऑडियो में क्या है?

इसकी जानकारी देने से पहले बता दें कि ऑपइंडिया के पास यह रिकॉर्डिंग बेहद विश्वसनीय स्रोत्र के जरिए आई है। इससे मालूम पड़ रहा है कि व्यक्ति अपने परिवार व अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता में है क्योंकि कॉल रिकॉर्डिंग के अनुसार, मुंबई पुलिस उसके घर में रात 3:00 -3:30 बजे घुस गई। दोनों के बीच की बातचीत से स्पष्ट होता है कि मुंबई पुलिस ‘रिपब्लिक टीवी’ के खिलाफ बयान देने के लिए दबाव बना रही है, जिसके कारण गवाह अपने और अपने परिवार की सुरक्षा को लेकर काफी डरा हुआ है।  

ऑडियो में पहला व्यक्ति अपने पड़ोसी को बताता है कि मुंबई पुलिस उनके घर में मशीन (बार ओ मीटर) की जानकारी जुटाने आई थी और उनसे कहा कि उन्होंने किसी को अरेस्ट किया है जिसने पूछताछ में उन लोगों का नाम लिया है। इसके बाद उन्होंने मशीन के बारे में पूछा। साथ ही ये भी जानना चाहा कि उन्हें पैसे कैसे मिलते हैं, उन्हें कौन पैसे देता है, और कहाँ से उन्हें पैसे मिलते हैं।

कॉल पर पड़ोसी से बात करते हुए व्यक्ति बेहद घबराया हुआ प्रतीत होता है और बार-बार कहता है कि 10-12 पुलिस वाले आए थे, अगर ऐसे ही आते रहे तो उसके आस पड़ोस के लोग क्या बोलेंगे। वह कहता है कि पुलिस ने उन्हें बताया कि गिरफ्तार हुए शख्स ने उसके परिवार का नाम लेकर कहा है कि उसने यहाँ 500 रुपए दिए हैं और 200 रुपए अकॉउंट में भेजे हैं। पड़ोसी को व्यक्ति ने यह भी बताया कि जब उसके घर में पुलिस आई तब वह ड्यूटी पर था और पुलिस उसके घरवालों से उससे जुड़ी सारी जानकारी लिख कर ले गई।

यहाँ पड़ोसी ने व्यक्ति को झूठ बोलने की सलाह दी कि वह बता दे कि वह कोई चैनल नहीं देखता उसे ढाई सौ रुपए भाड़े के मिलते हैं। हालाँकि घबराए व्यक्ति ने झूठ बोलने से साफ मना कर दिया और कहा कि जब गिरफ्तार हुआ युवक कह चुका है कि उसने पैसे दिए तो झूठ बोलने का कोई मतलब नहीं है।

इसके बाद, पड़ोसी ने पूछा कि क्या पुलिस ने उनसे यह भी पूछा कि वह कौन सा चैनल देखते हैं। इस पर पहले व्यक्ति ने कहा कि उसके घरवालों ने पुलिस को बताया कि ‘न्यूज नेशन’ पर स्कीम आई थी और उन्होंने उस स्कीम से खुद को जोड़ा, बाद में उन्हें सुविधा मिलने लगी।

इस पर पुलिस ने उन्हें कहा कि इस केस का ‘न्यूज नेशन’ से लेना देना नहीं है। इसमें इंडिया टुडे और रिपब्लिक भारत हैं। जिसे सुनकर व्यक्ति के बेटे ने कहा कि वो दोनों में से कोई चैनल नहीं देखते। जब उनके पिता घर पर होते हैं तो ही वह न्यूज नेशन देखते हैं।

फोन पर घबराई आवाज में व्यक्ति साफ कहता है कि पुलिस ने ‘रिपब्लिक भारत’ का नाम लिख लिया है। इस पर दूसरा व्यक्ति कहता है कि पुलिस ये सब उन्हें (अनुमान के मुताबिक रिपब्लिक टीवी) फँसाने के लिए कर रही है। इस पर व्यक्ति और ज्यादा चिंता में पड़ जाता है और कहता है कि पुलिस उसके ख़िलाफ़ भी झूठे आरोप लगा देगी।

ऑडियो में एक जगह पड़ोसी घबराए व्यक्ति को यह भी सलाह देता है कि अगर उनके घर 20 पुलिसकर्मी भी आए होते तो उन्हें बताना चाहिए था कि रिपब्लिक भारत उन्हें पैसे नहीं देता। आगे पड़ोसी बताता है कि महाराष्ट्र सरकार रिपब्लिक भारत के ख़िलाफ़ है और उसी के लिए कुछ सबूत ढूँढने का प्रयास कर रही है। वह लोग (बार ओर मीटर वाले घर के लोग) तो बस ग्राहक हैं। उसने कहा कि अगर कोई उन्हें पैसे देगा तो उन्हें उनके चैनल को देखने में भी दिक्कत नहीं होगी। 

ध्यान देने वाली बात है कि अभी तक की बातचीत से साफ पता चल रहा है कि ‘न्यूज नेशन’ व्यक्ति के घरवालों को पैसे देता था, रिपब्लिक भारत नहीं। इसके अलावा, व्यक्ति यह भी कहता है कि जरूर पुलिस ने गिरफ्तार हुए आदमी को पीटा होगा।

व्यक्ति बताता है कि 10-12 पुलिसकर्मी उसके घर में आए थे और 5-6 बाहर खड़े थे। उन लोगों ने पहले ही अपने कागज पर ‘आर भारत’ का नाम लिखा था। वह चिंता व्यक्त करता है कि आज पुलिस का एक विभाग आया है कल को दूसरा विभाग दरवाजे पर आएगा। ऐसे तो आस पास के लोग उसे जगह खाली करने को कह देंगे।

सारी बात सुनकर पड़ोसी कहता है कि महाराष्ट्र पुलिस केवल रिपब्लिक भारत के ख़िलाफ़ केस बनाना चाह रही है। वहीं, व्यक्ति किसी भी प्रकार के ‘लफड़े’ को लेकर, कोर्ट कचहरी को लेकर अपनी चिंता व्यक्त करता है। साथ ही कहता है कि उसकी पत्नी घर में अकेले रहती है वो क्या बात कर पाएगी पुलिस वालों से?

गौरतलब है कि इस ऑडिया रिकॉर्डिंग में जिस शख्स की गिरफ्तारी की बात हो रही है और जिसके बयान के आधार पर पुलिस व्यक्ति के घर पहुँची, उसका नाम उमेश हैं। ऑपइंडिया ने यह मामला सामने आने के बाद उमेश के वकील गिरी को सम्पर्क किया। वकील ने बताया कि उमेश का संबंध कॉल वाले व्यक्ति से है। हालाँकि, जब हमने ऑडियो की प्रमाणिकता और उसमें हो रही बातचीत पर सवाल किए तो उन्होंने कहा कि ये मामला अभी उपन्यायिक है इसलिए इसकी प्रमाणिकता पर कुछ कहना उचित नहीं है।

नोट: यह खबर ‘ऑपइंडिया’ अंग्रेजी की संपादक नुपूर शर्मा के लेख में निहित जानकारी पर आधारित है। मूल लेख को आप इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ सकते हैं।