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इस्लामी आतंक पर हमें खुल कर बोलना चाहिए, फ्रांस की तरह | Ajeet Bharti on Islamic terror needs French treatment

फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने पिछले दिनों खुल कर कहा कि इस्लाम एक ऐसा मजहब है, जिसके कारण विश्व भर में कई संकट उत्पन्न हो रहे हैं। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता पर भाषण देते हुए इस्लाम पर जो यह टिप्पणी की, उसकी सच्चाई जाहिर तौर पर आज दिखती सभी को है लेकिन लोग इसे कट्टरपंथ कहकर छिपा देते हैं।

ये बात और है कि वैश्विक आतंक से लेकर खून से सनी लगभग हर घटना इस्लाम के नारों, प्रतीकों, विचारों का परिणाम होती है। मगर, तब भी ‘सच्चे इस्लाम’ का हवाला दे देकर ये कहने की कोशिश की जाती है कि आतंक का कोई मजहब नहीं होता और जो सेकुलर होता है, उसे ही इस ‘असली इस्लाम’ का ज्ञान होता है।

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फ्रांस के राष्ट्रपति ने इस्लाम के बारे में जो कहा, वही बात हर राष्ट्राध्यक्ष को खुल कर बोलनी चाहिए

2 अक्टूबर को फ़्रांसीसी राष्ट्रपति इमेनुअल मैक्राँ ने अपने देश में धर्मनिरपेक्षता के विषय पर संभाषण करते हुए कई ऐसी बातें कही जो अपवादस्वरूप ही किसी भी छुटभैया नेता के मुँह से भी निकलता है, राष्ट्राध्यक्षों को तो रहने ही दीजिए। इस्लामवादियों द्वारा पूरे विश्व में उत्पन्न संकट को चिह्नित करते हुए मैक्राँ ने खुल कर बोला कि इस्लाम एक ऐसा मजहब है जो पूरे विश्व में संकट में है।

यहाँ संकट का मतलब इस्लाम के संकट में होने से नहीं, विश्व भर में इस्लाम के कारण उत्पन्न होने वाले संकटों से है। यह संकट दिखता सबको है, लेकिन कभी ‘रेडिकल इस्लाम’ तो कभी ‘आतंक का कोई मजहब नहीं होता’ के नाम पर छुपा दिया जाता है। वैश्विक आतंक की बात करें, या फिर मजहबी उन्माद से प्रेरित रक्तरंजित घटनाओं की, लगभग हर बार ये घटनाएँ इस्लाम के नारों, प्रतीकों, नामों या विचारों का परिणाम होती हैं। स्वयं पर बम लगा कर फटने से ले कर, लंदन के पुल पर चाकुओं से गोदने की घटना हो, या फिर ऑस्ट्रेलिया के कैफे में लोन वूल्फ अटैक से ले कर पेरिस में किसी की गर्दन रेतने की घटना, ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे और ‘हम आहत थे’ जैसी बातें हर जगह आपको मिल जाएँगी।

आगे बढ़ने से पहले स्पेनिश भाषा एक रोचक कहानी बताता हूँ। हुआ यूँ कि हर घंटे नए कपड़े बदलने वाले एक राजा को किसी व्यक्ति ने कहा कि वो उसे ऐसे कपड़े पहने जिसका रंग, डिजाइन, सोने के धागों का काम, स्पर्श आदि विलक्षण और अलौकिक होंगे। साथ ही, वह कपड़ा सिर्फ बुद्धिमान व्यक्तियों को दिखेगा, मूर्खों को नहीं। राजा प्रसन्न हुआ, और बोला कि इस व्यक्ति को हर तरह के कपड़े, सोना, धन आदि दिए जाएँ ताकि वो कपड़ा बुनना शुरु करे।

कई दिन बीतने पर वो व्यक्ति एक बड़ा ही सुंदर डब्बा ले कर राजा के दरबार में आया। डब्बा खोल कर उसने राजा को कपड़े दिखाए। राजा को कुछ दिखे ही नहीं, तो वो अचम्भित सा उसे प्रश्नवाचक मुद्रा में देखने लगा। इस व्यक्ति ने अब राजा को कपड़े की विशिष्टता याद दिलाई कि मूर्खों को दिखता ही नहीं। अचानक से राजा कपड़ा दिखने लगा। कपड़े वाले ने राजा से कहा, “महाराज, ऐसे विलक्षण वस्त्र को तो दरबार में ही धारण करना चाहिए।”

राजा भी सोचने लगा कि आज ही दरबार में पहचान हो जाएगी कि कौन मूर्ख है, कौन बुद्धिमान। व्यक्ति ने कहा कि राजा एक-एक कपड़े उतारे और नए वाले पहने। वो उसे ‘यह अंगवस्त्र है महाराज, धारण कीजिए’ कह कर कपड़े देने लगा। कुछ समय में राजा ने नए कपड़े पहन लिए। दरबारियों ने कहा, “अहा! महाराज, ऐसे अलौकिक वस्त्र तो देखे ही नहीं। यह तो स्वर्ग से देवताओं के बुने हुए प्रतीत होते हैं।”

फिर यह तय हुआ कि राजा हाथी पर बैठेगा और कपड़े पूरी प्रजा को दिखाएगा। राजा हाथी पर बैठा और मुनादी करवा दी गई कि जो मूर्ख हैं उन्हें वो कपड़े नहीं दिखेंगे। अब अचानक से पूरी प्रजा ने कपड़ों पर किया हुआ सोने के धागों का काम, रेशम पर बने नयनाभिराम पैटर्न आदि देखने के बारे में एक दूसरे को बताया। बगल वाला भी कहे कि ‘हाँ, तुम्हें पीठ पर बना बाघ दिख रहा है, क्या काम किया है बुनकर ने!’ हर व्यक्ति को नई चीज दिख रही थी कपड़ों पर, राजा भी खुश कि कपड़ा पहन लिया है कि इक्कीसवीं सदी का होलोग्राम जो हर कोण से भिन्न दिखता है!

इसी भीड़ में एक व्यक्ति अपने छोटे बच्चे को ले कर आया था। बच्चे को कुछ दिख ही नहीं रहा था। पिता ने उसे कंधे पर बिठाया ताकि वो भी ऐसे दिव्य वस्त्रों को देख सके। बच्चा कंधे पर बैठते ही बोला, “राजा तो नंगा है।” बाप ने सोचा कि मूर्खों को नहीं दिखता, लगता है उसका बेटा ‘सक्सेस’ नहीं निकला। बेटे ने फिर चिल्ला कर बोला, “अरे देखो! राजा तो नंगा है।” बाकी लोगों ने भी सुना। बच्चा और जोर से बोला और हँसने लगा कि राजा नंगा हो कर हाथी पर घूम रहा है।

तब सबको याद आया कि वस्तुतः राजा तो नंगा ही है। अचानक से राजा सबको मूल रूप में दिखने लगा। एक बच्चे पर सामाजिक दवाब या कंडिशनिंग का प्रभाव नहीं था तो उसने सत्य को देखा, बाकी लोग यह सोच कर नंगे राजा की पीठ पर बाघ देख रहे थे कि शायद उन्हें ही कपड़े नहीं दिख रहे, और भीड़ में स्वयं को मूर्ख मानना किसी को स्वीकार्य न था।

उसी तरह इस्लामी आतंक और उन्माद से होने वाले हर कृत्य के बाद भी किसी चालाक व्यक्ति ने दिव्य कपड़े पहनाने की योजना बनाई, और कहा कि सच्चा इस्लाम तो उसी को दिखेगा जो सेकुलर है। अब, आज के दौर में कौन सेकुलर कहलाना नहीं चाहेगा। सबको सेकुलर बनना है, सबके देश में इस्लामी आतंक ने अपनी छाप छोड़ी है, मजहब अपने कट्टर स्वरूप में गर्दनें कटवा रहा है, और हम कह रहे हैं, “अरे, तुम्हें पीठ पर बना बाघ दिख रहा है, क्या काम किया है बुनकर ने!”

लेकिन तथ्य और अकाट्य सत्य यह है कि राजा तो नंगा है, और उसे नंगा कहने की क्षमता उसी में है जो इन सामाजिक, राजनैतिक जुमलेबाजी और पॉलिटिकली करेक्ट होने के भार से अनभिज्ञ हो। जिसे स्वयं को, भले ही गलतबयानी में, बिगट, कम्यूनल, इस्लामोफोब कहे जाने पर कोई चिंता न होती हो। इमैनुअल मैक्राँ ने वह कहा जो सत्य है। वह सत्य उसे सबसे ज्यादा चुभेगा जिसने सुंदर से डब्बे में हवा रख कर दुनिया को कहा कि ये दिव्य वस्त्र हैं।

राजा वाली कहानी में वह व्यक्ति धूर्त और ठग है। यहाँ भी, ऐसे लोग जो ऐसी इस्लामी आतंक या मजहबी उन्माद से प्रेरित घटनाओं को ‘यह सच्चा इस्लाम नहीं है’ या ‘एक घटना के लिए आप पूरे समुदाय को जिम्मेदार नहीं कह सकते’ की ठगी के नीचे छुपाना चाहता है। यह बात भी सत्य है कि उस खास मजहब का हर आदमी आतंकवादी नहीं है, लेकिन दूसरा सत्य यह है कि मजहबी कारणों से, अनजान लोगों (जिसे आप पहले से नहीं जानते हों, जिन्होंने आपका निजी अहित नहीं किया है), समाजों और राष्ट्रों पर हमला करने वाले लोग हमेशा एक ही मजहब के होते हैं।

ऐसा मजहबी उन्माद और किसी धर्म-रिलीजन में नहीं दिखता

सामाजिक अपराध हर जगह होते हैं। आप किसी से लड़ाई कर लेते हैं, रास्ते में मार-पीट हो गई, किसी ने आपके मंदिर तोड़ दिए, कोई गाय काट देता है, ऐसी हर घटना पर आप उन्हीं व्यक्तियों को जवाब देते हैं न कि आप उसके मजहब के मानने वाली भीड़ में जा कर एक बम फोड़ आते हैं। ट्विन टावर उड़ाने का काम हो, मैनचेस्टर के स्टेडियम में बम फोड़ने का काम हो या फिर बार्सिलोना के धमाके, सीरिया को ख़िलाफ़त के नीचे लाना हो या पूरे अफ़ग़ानिस्तान को तबाह करना, किसी वैयक्तिक घटना की प्रतिक्रिया, दूसरे धर्म के लोगों या राष्ट्र को ही निशाना बनाने के उद्देश्य से की गई।

ऐसा उन्माद आपको किसी भी और मजहब के मानने वालों में नहीं दिखता। इसमें फिर वही बात आती है कि ‘लेकिन उस मजहब का हर आदमी आतंकी नहीं है’। ये बात सही है लेकिन कितने लोग, जो सैफ्रन टेरर और साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित के गीत गाते हैं, वो इन आतंकी धमाकों पर ‘इस्लामी टेरर’ लिखते हैं, उसकी विवेचना करते हैं कि ये मदरसों में कट्टरपंथी शिक्षा देने का परिणाम है, ये उस प्रचलन का परिणाम है जहाँ तीन साल के बच्चे के हाथ में छुरा दे कर बकरे को हलाल करना सिखाया जाता है।

नहीं, उस वक्त ये लोग मक्का की तस्वीर लगा कर ‘माशाअल्लाह’ और ‘सुभानअल्लाह’ करते हैं, या फिर विश्व शांति पर उपदेश देने लगते हैं कि ‘एक-दो घटनाओं को कारण पूरे इस्लाम को आप निशाना न बनाएँ’, या सीधे कहते हैं कि ‘कुरान में कहा गया है कि एक व्यक्ति की हत्या पूरी मानवता की हत्या है’, या वो फैज की शायरी और गुलाम अली की गजलों के लिंक शेयर करने लगते हैं। यही चार से पाँच तरह की प्रतिक्रिया आपको उन्हीं कट्टरपंथियों से मिलेगी जो आज भी ‘हिन्दू आतंक’ की बात और गोधरा की याद दिलाते हैं। ये बात और है कि साबरमती एक्सप्रेस के आग लगा कर 59 हिन्दुओं को जिंदा जलाने की बात वो भूल जाते हैं।

माशाअल्ला और सुभानअल्ला सब ठीक है, लेकिन ये तो बताओ कि कार्टून दिखाया बच्ची को, तो तुम क्यों आहत हो गए? कार्टून बना कर शार्ली एब्दो वालों ने क्या तुम्हारे मेल बॉक्स में डिलीवर किया था, या ये कहा था कि ‘भैया, ये पढ़ो, ये कार्टून सही बनाया है कि नहीं’। बनाया भी तो असहमति दर्ज करो कि नहीं बनाना चाहिए। या फिर तुम उन्हें गोली मार दोगे? तब कुरान की वो आयत याद नहीं आती कि एक व्यक्ति की हत्या पूरी मानवता की हत्या है?

ये प्रवृत्ति सिर्फ इस्लाम में ही है कि तथाकथित निंदा/अपमान आदि पर कोई भी आहत हो कर, किसी का भी सर काट सकता है। इस्लामी मुल्कों में तो यह प्रावधान है कि कानून ही ऐसा करने पर आपको फाँसी दे देगा। इसमें पाकिस्तान सबसे आगे है जहाँ आपको बस कहना है कि इस व्यक्ति ने पैगम्बर के बारे में गलत बात बोली है। केस चलेगा और आपको फाँसी होगी।

लेकिन हर मुल्क तो इस्लामी है नहीं। आपको उन्हीं नियमों से चलना है तो आप वैसे ही देशों में बसने की कोशिश कीजिए क्योंकि सहने की सीमा होती है। आपकी सीमा आधे सेकेंड की है कि कहीं पेरिस में सैमुअल पैटी ने कार्टून दिखाया, आप आहत हुए, प्लान बनाया और राह चलते गर्दन रेत दिया। अब जाओ न, फ्रांस पर हमला बोल दो क्योंकि वही कार्टून वहाँ की सरकारी बिल्डिंग पर प्रोजेक्ट किया गया।

लो जा कर सरकार से बदला। चीन से बदला लो जा कर क्योंकि कुरान का अपमान तो पैगम्बर के बाद दूसरे नंबर पर आता है। वो तो कुरान पढ़ने भी नहीं दे रहे, नया कुरान लिखवा रहे हैं सो अलग। क्यों किसी कट्टरपंथी का जमीर नहीं जग रहा चीन को ले कर? वहाँ कोई बम धमाका, लोन वूल्फ अटैक, पुलिया पर चाकूबाजी, गला रेतने आदि की घटना नहीं कर पाते? क्या हो गया उम्माह वालों को? क्या चीन से ज्यादा किसी भी राष्ट्र ने इस्लाम का अपमान किया है? वहाँ तो तुम्हारी रियासत-ए-मदीना के सदर घुटनों पर बैठे हुए हैं, और शी जिनपिंग अपनी आँख मूँद कर उसे धीरे और तेज होने का आदेश दे रहा है।

क्या तुर्की के एर्दोआँ की सारी हिम्मत हाया सोफिया चर्च को ही मस्जिद बनाने में निकल गई? चीन पर चढ़ाई क्यों नहीं कर रहे? कहाँ गई वो फौजें? पाकिस्तान से लोगों को इकट्ठा करो, जिहाद के नाम पर हथियार दो और कहो कि शिनजियांग पहुँचे अपने उइगर हममजहब लोगों की सहायता के लिए। जिहाद के लिए उतरोगे, तभी तो अल्लाह भी दुश्मनों पर अपना अजाब नाजिल करेगा! या फिर सारा जिहाद उन्हीं मुल्कों के लिए है जहाँ वो तुम्हें रहने की जगह देते हैं, और तुम वहाँ लव जिहाद, रेप जिहाद, लैंड जिहाद कर के अपनी बहादुरी दिखा रहे हो? चीन क्यों नहीं जा रहे जिहाद के लिए? पेपर नहीं पढ़ते क्या?

कट्टरपंथी इस्लाम और सिर्फ इस्लाम के क्या अंतर है?

इसी साल फरवरी में डोनल्ड ट्रम्प ने भारत दौरे पर ‘रेडिकल इस्लामिक टेररिज्म’ की बात अहमदाबाद में कही। यह बात भले ही ‘राजा तो नंगा है’ के स्तर की नहीं थी, लेकिन अमेरिका के ओबामा टाइम के पॉलिटिकली करेक्ट शब्दावली से कहीं आगे, इसे ‘राजा कमर के ऊपर नंगा है’ कहने जैसा तो था ही। वस्तुतः ‘रेडिकल इस्लामिक टेररिज्म’ या कट्टरपंथी इस्लामी आतंक जैसी बातें बस मन बहलाने वाली बातें हैं क्योंकि आज के समय में अंधे को अंधा कहना अपमानजनक और भेदभावपूर्ण माना जाता है।

इस्लाम से प्रेरित आतंक इस्लामी आतंक होता है क्योंकि ‘अल्लाहु अकबर’ का नारा इस्लाम का है, रेडिकल इस्लाम का नहीं। आप इन सारे आतंकियों की जीवनचर्या देखिए कि ये इस्लाम को जितनी शिद्दत से निभाते हैं, उतनी शिद्दत से कोई नहीं निभाता। कमलेश तिवारी के कातिलों ने नमाज पढ़ी थी तब गला रेता था। बम लगा कर चीथड़े उड़ाने वाला आतंकी मरने से पहले किस खुदा को याद करता है? उसका नारा कौन सा है? फिर इसमें रेडिकल क्या है, ये तो नॉर्मल है।

इस्लामी आतंक के पहले रेडिकल या कट्टरपंथी जैसे शब्द तभी शोभा देते जब इन घटनाओं में आतंकियों को मजहब का प्रतिशत दस या बीस होता। जब पंथ अपने मूल स्वरूप में ही काफिरों को घात लगा कर मारने के निर्देश देता हो, तो उसमें कट्टरपंथ लगाना तो वैसी ही मूर्खता है जैसे ‘लाल’ शब्द के पहले ‘सुर्ख’ लगा कर ‘सुर्ख लाल’ कहना। सुर्ख का मतलब ही लाल होता है।

मैं जानना चाहूँगा कि पवित्र पुस्तक की उन आयतों को आप किस शब्द से नवाजेंगे जहाँ काफिरों को सबसे हेय बताया गया है, उन्हें मारने पर किसी भी तरह के अपराधबोध न पालने की बातें कही गई हैं और स्वर्ग में कमरों के रिजर्व होने के संदर्भ हैं। क्या ये बातें उस किताब के बाहर की हैं जो मदरसों में पढ़ाई जाती हैं! अगर मदरसों के मौलवी काफिरों की बच्चियों के बलात्कार, काफिरों की हत्या, काफिरों से घृणा करना किसी और किताब से, या अपने ही सिलेबस से पढ़ाते हों तब तो मैं मानने को तैयार हूँ कि हाँ, ये कट्टरता है।

लेकिन, जब ये बातें उसी किताब का हिस्सा हैं तो फिर कट्टरपंथी इस्लाम और नॉर्मल इस्लाम में क्या अंतर है? क्या किसी का कार्टून बनाने पर हत्या कर देने की बात सोचने वाला, करने वाला, उसे समर्थन देने वाला, उस पर चुप रहने वाला, स्वतः कट्टरपंथी नहीं है? क्या आपको इन चार तरह के लोगों से अलग तरह का कोई मिला है मजहबी भीड़ में? वो आलोचना भी करेगा तो यह कह कर कि ये सच्चा मजहबी है।

लेकिन, जब आप इन किताबों को पढ़ेंगे, इनके लाउडस्पीकरों से आती मजहबी बातें सुनेंगे तो लगेगा कि जिसने गर्दन उतार दी वही इस्लाम का सच्चा विद्यार्थी और अनुपालक है। उसी ने असली इस्लाम को पढ़ा, सोचा, समझा और जिया है। उसे कोई भी सच्चा मजहबी यह कह ही नहीं सकता कि ये सच्चा मजहबी नहीं है। इसलिए ऐसी वारदातों की आलोचना में भी ‘इफ’ और ‘बट’ के साथ ‘शर्तें लागू’ वाली बातें दिखेंगी।

शेक्सपीयर ने एक अलग संदर्भ में कहा है न कि ‘नाम में क्या रखा है, वो जिसे तुम गुलाब कहते है, उसे किसी और नाम से भी पुकारो, उसका सुगंध वैसा ही रहेगा’। उसी तरह तुम ‘शांतिप्रिय’ कहते रहो लेकिन मूल स्वरूप में जो ‘शांति’ प्रदर्शित होती है, वो पूरी दुनिया को दिखती है। यही बात इमैनुअल मैक्राँ ने स्पष्ट शब्दों में कही कि इस्लाम जहाँ भी है, संकट में है।

फ्रांस के राष्ट्रपति ने कहा कि राजा नंगा है

मैक्राँ की बात पर कई ‘एक्सपर्ट’ और ‘सेकुलर जीव’ दुखी हो गए कि यह तो माइनॉरिटी को सीधे तौर पर अलग-थलग करने की विभाजनकारी बातें हैं। जबकि, मैक्राँ ने वही कहा जो हर जगह दिख रहा है। इस्लाम ने विश्व में हर जगह संकट उत्पन्न किए हैं, सिवाय चीन के। पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दुओं की हालत देखिए, अफगानिस्तान में सिखों की, तुर्की में ईसाइयों की, पूरी दुनिया में यहूदियों की… भारत में अल्पसंख्यक वाला विक्टिम कार्ड स्वाइप करने के बाद कैराना, मेरठ, मेवात और दिल्ली तक में लोगों को ‘यह मकान बिकाऊ है’ लिखने पर मजबूर करने वाला मजहब कौन सा है?

यूरोप, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया से ले कर न्यूजीलैंड, भारत, बांग्लादेश तक किसके आतंक की छाप है? बेल्जियम से लेकर फ़्रांस तक, मैड्रिड, बार्सीलोना, मैन्चेस्टर, लंदन, ग्लासगो, मिलान, स्टॉकहोम, फ़्रैंकफ़र्ट एयरपोर्ट, दिजों, कोपेनहेगन, बर्लिन, मरसाई, हनोवर, सेंट पीटर्सबर्ग, हैमबर्ग, तुर्कु, कारकासोन, लीज, एम्सटर्डम, अतातुर्क एयरपोर्ट, ब्रुसेल्स, नीस, पेरिस में या तो बम धमाके हुए या लोन वूल्फ अटैक्स के ज़रिए ट्रकों और कारों से लोगों को रौंद दिया गया। हर बार आईसिस या कोई इस्लामी संगठन इसकी ज़िम्मेदारी लेता रहा और यूरोप का हर राष्ट्र अपनी निंदा में ‘इस्लामोफोबिक’ कहलाने से बचने को लिए इसे सिर्फ आतंकी वारदात कहता रहा।

भारत में 1970 के बाद से 2015 तक कुल 9,982 आतंकी घटनाओं में 18,842 मौतें हुईं, 28,814 लोग घायल हुए। अगर 1984 से 2016 तक के आँकड़ें लें तो क़रीब 80 आतंकी हमलों में 1985 मौतें हुईं, और लगभग 6000 से ज़्यादा घायल हुए। अगर और क़रीब के दिनों को लें, तो 2005 से अब तक हुए आतंकी हमलों में 707 मौतें हुईं, और 3200 के क़रीब घायल हुए हैं।

यूरोप में, तुर्की और रूस को छोड़कर, आतंकी हमलों में 2004 से अब तक 615 मौतें हुईं और 4000 के लगभग लोग घायल हुए। अमेरिका में 2000 से अबतक क़रीब 3188 मौतें हुईं जिसमें से 2996 लोग सिर्फ 9/11 वाले हमले में मारे गए। यानि, बाक़ी के हमलों में 192 लोग मरे।

क्या ये वैश्विक आतंक पर इस्लाम की छाप नहीं है? कश्मीर में हिन्दुओं का प्रतिशत सौ से एक पर कैसे पहुँचा? तो फिर मैक्राँ ने क्या गलत कह दिया? मैक्राँ ने इस पर अपनी बात रखते हुए बहुत ही आधारभूत समस्याओं पर ध्यान दिलाया कि इस्लाम को मानने वाले इस्लाम के कानून को राष्ट्र के कानून से भी ऊपर मानते हैं, जो कि निजी स्तर पर सही हो सकता है, लेकिन उन्हें राष्ट्र के कानूनों का पालन करना ही होगा।

उन्होंने इसी पर आगे बात रखते हुए कहा कि इस्लामी अलगाववाद किसी भी समाज में एक समानांतर तंत्र विकसित करने की कोशिश करता रहता है। शुरुआत में यह अलग मूल्यों और व्यवस्था वाला समाज बनता हुआ दिखता है, लेकिन इसका अंतिम लक्ष्य हर व्यवस्था को अपने नियंत्रण में लेना होता है। उन्होंने कहा कि इस्लाम को मानने वाले लगातार राष्ट्र के मूल्यों से विलग हो कर एक काउंटर सोसायटी (विरोधी समाज) बनाना चाहते हैं। इसी सोची-समझी राजनैतिक-मजहबी अलगाववाद की परिणति बच्चों को सामान्य स्कूलों से निकाल कर उनमें मजहबी कट्टरता भरने के रूप में होती है जो कि स्त्री-पुरुष के समान अधिकारों और मानव मात्र की गरिमा के विरोध में दिखती है।

इस बात पर जो लोग विरोध जता रहे हैं वो वास्तव में ऐसा सोचते हैं कि स्त्री और पुरुष बराबर नहीं होते, मजहबी और गैरमजहबी मनुष्य बराबर नहीं होते। क्योंकि मैक्राँ के भाषण में उस सच्चाई को स्वीकारा गया है जो विश्व के हर कोने में बम, चाकू, गाड़ी या गोली के रूप में ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे के साथ काफिरों की वैयक्तिक या सामूहिक हत्याओं में परिणत होती है। क्या यह सोच घरों में या गैरसरकारी संस्थानों में दी जा रही शिक्षा का सीधा परिणाम नहीं?

मदरसों में पढ़ाया जाने वाला इस्लाम

मदरसों में किस तरह की शिक्षा दी जा रही है, उसका ऑडिट होना चाहिए। वहाँ के बच्चे-बच्चियों से पूछा जाना चाहिए कि काफिरों के बारे में उनकी क्या राय है, मौलवी उन्हें हिन्दू लड़कियों के साथ क्या करने की बातें सिखाता है, क्या वह उनके साथ अश्लीलता भी करता है आदि। ये बातें जानना आवश्यक है क्योंकि अगर, फ्रांस की तर्ज पर, हर राष्ट्र ने हर बच्चे को सरकारी स्कूल (या ग़ैरसरकारी जहाँ मजहबी कट्टरता सिलेबस का हिस्सा न हो) में ही शिक्षित करना शुरु नहीं किया, तो 2060 तक विश्व की सबसे बड़ी मजहबी आबादी बन चुका इस्लाम किस रूप में अपना प्रभाव दिखाएगा वो कल्पनातीत है।

हाल ही में, असम सरकार ने कहा कि मदरसों में सरकारी पैसे नहीं दिए जाएँगे। उनका सीधा कहना था कि सरकार का काम मजहबी शिक्षा देने को बढ़ावा देना नहीं है। उसके उलट, राजस्थान में मदरसों के निर्माण, पुनरुत्थान आदि को ले कर करोड़ों रुपए जारी करने की बात की गई है। एक सेकुलर देश में सत्ता को किसी भी तरह के मजहबी कार्य का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। सांस्कृतिक कार्य अलग है, क्योंकि संस्कृति राष्ट्र की धरोहर होती है, मजहबी कार्य अलग है।

मदरसों की फंडिंग बंद होनी चाहिए क्योंकि शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को बेहतर नागरिक बनाना होता है जो संविधान का सम्मान करे न कि वो यह सोचे कि शिया काफिर है, अहमदिया काफिर है, हिन्दू काफिर है, ईसाई काफिर है, यहूदी काफिर है, जैन काफिर है, सिक्ख काफिर है, बौद्ध काफिर है और काफिर तो किताब के अनुसार हत्या के योग्य है। जब आप बचपन से हर चलती-फिरती वस्तु को नुक़सान पहुँचा सकने वाला मानते हो, हर बिना टोपी-पैजामा वाला आपको काटने योग्य दिखता है, तब तो मौका मिलते ही तुम उसे मार ही डालोगे।

ऐसे लोग विलक्षण प्रतिभा वाले होते हैं, जो जीवन और मृत्यु की कल्पना से परे, देश के कानून से ऊपर उठे हुए, किसी की भी हत्या करने के बाद डरते नहीं कि उनका क्या होगा, उनके परिवार का क्या होगा, समाज में उनके परिवार को लोग क्या कहेंगे…

क्या यह इस्लामोफोबिया है?

जब आप इस तरह की सीधी और स्पष्ट बातें करेंगे तो लोग तुरंत आपको इस्लामोफोब कह देंगे। जबकि, इस्लाम को उसके मूल रूप में जानना और समझना, उससे घृणा करना कैसे हो गया! इस्लामोफोब वाली बात नंगे राजा के कपड़ों वाली बात है कि इस्लामी आतंक को जो ‘कट्टरपंथी हमला’ नहीं कहेगा वो तो इस्लामोफोब है। अब, ऐसे में कौन आदमी स्वयं को खुल्लमखुल्ला इस्लाम से घृणा करने वाला कहेगा? उसने न तो किताब पढ़ी है, न ही आतंकियों की दिनचर्या को जानता है कि वो किस मजहब को, कैसे निभा रहा है, फिर उसे भी लगेगा कि ‘सही बात है, वो तो कट्टरपंथी हैं’।

जबकि वही एकदम सही पंथ पकड़ कर आगे बढ़ रहा है, अगर वह पंथ कट्टरपंथ होता तो एक स्वर में सारे कट्टरपंथी इकट्ठा होते और हर घटना के बाद सामूहिक प्रतिक्रिया देते। लाउडस्पीकरों से मौलवी समझाता कि किसी की हत्या, किसी के बारे में दुर्भावना रखना, किसी दूसरे धर्म के लोगों को प्रति घृणा से जनित अपराध जहन्नुम ले जाता है। समाज को सुधारने की बात होती कि कट्टरपंथी मत बनो। आपने कितने मौलवियों को ऐसा बोलते सुना है? कितने ट्विटर हैंडल इसकी मुखर हो कर, बिना ‘इस्लाम का मतलब शांति है’ का प्रयोग किए बगैर सीधे शब्दों में कहते हैं कि गर्दन काटने वाला उस मजहब का था और मजहब के लोगों को ऐसा नहीं करना चाहिए।

ऐसे लोगों की संख्या शून्य है। आप इस पर बात करते हैं, तो इस्लामोफोब का टैग आप पर वही लगाते हैं जो सच्चे मजहबी नहीं हैं, जिन्हें अपनी पाक पुस्तक का बिलकुल भी ज्ञान नहीं है। अगर आप कहते हैं कि फलाँ ने गर्दन काटी और वो सच्चा मजहबी था, तब तो इस्लाम के मूल मर्म को समझ गए हैं, जो इन्हें नकारते हैं, उन्हें स्वयं ही इस्लाम का कुछ भी ज्ञान नहीं।

ऐसे आतंकी निजी जीवन में गहन रूप से मजहब का अध्ययन करने वाले, हर निर्देश और आदेश को सीधे अल्लाह का आदेश मानने वाले, स्वयं को मानवों में सबसे उत्तम समझने वाले, एक अलग स्तर के सुप्रीमेसिस्ट होते हैं। ये आपको हमेशा स्वयं से हीन सिर्फ इसलिए मानते हैं क्योंकि बचपन से उन्हें यही सिखाया गया है। इन्हें गजनवी, गौरी, नादिरशाह, बिन कासिम, ओसामा, बाबर, औरंगजेब सब हीरो दिखते हैं क्योंकि इन्होंने काफिरों पर हमला किया, उनकी स्त्रियों का बलात्कार किया, उनके मंदिर तोड़े, उनका सामूहिक नरसंहार किया, संस्कृति के हर चिह्न को आग लगा दी।

समुदाय के कितने लोग आपको मिले हैं जो इतिहास की इन घटनाओं को लिए माफी माँगते हैं हिन्दुओं से? इन्हें उस बाबरी मस्जिद पर हिन्दुओं और भारतीय राष्ट्र से माफी चाहिए जो हिन्दुओं के मंदिर को तोड़ कर बनाई गई थी। इन्होंने हर नरसंहार को इस्लामी गौरव का परचम माना है। अगर ऐसा नहीं है तो ये छाती ठोक कर क्यों कहते फिरते हैं कि हमने तुम पर पाँच सौ साल राज किया? जबकि क्रूर सच्चाई यही है कि राज तुमने नहीं किया था बल्कि तुम्हारे पूर्वज भी उसी हिन्दू जनसंख्या का हिस्सा थे जिस पर बाहरी आक्रांताओं ने राज किया।

भारतीय परिदृश्य में कमाल की बात यह है कि अरब में जिन लोगों को जलील किया जाता है, वो अपने आपको बादशाहों की संतान मानते हैं। अरब वाले जिन्हें अपने मजहब का मानने से इनकार करते हैं और इनके कन्वर्ट होने की अशुद्धि पर दुत्कारते हैं, वो भी स्वयं को जहाँपनाहों के पोतों से नीचे देखते ही नहीं। ये वैसी सच्चाई है जिस पर कोई बात करना नहीं चाहता, आप करेंगे तो तुरंत ‘तुम इस्लामोफोबिक हो’, ‘तुम घृणा फैला रहे हो’।

मतलब, तुमसे आतंकी हमलों के बाद एक शब्द नहीं निकलता अपने मजहबी भाइयों को लिए, और हम अगर आतंकवादी को इस्लामी आतंकवादी कहें तो हम इस्लाम से घृणा करने वाले! मतलब, तुम काफिर कह कर हर हिन्दू को घृणा की निगाह से देखो, धर्म जान कर प्रेम की आड़ में बलात्कार करो और अपने बाप, भाई, चाचा, फूफा, मौसा आदि से बलात्कार करवाओ, उनकी हत्या करो, उन्हें अपने घरों को छोड़ने को मजबूर करो, और हम उन बातों पर बोलें तब इस्लामोफोबिक बन गए हम?

जो जन्म से ले कर मृत्यु तक, इस विचार (या विकार) के साथ जीते हैं कि हर काफिर कत्ल के योग्य है, जिन्हें यह बात सामान्य लगती है कि दूसरे धर्म वाले या तो मार दिए जाएँ या उनका मजहब स्वीकार लें, उस घृणित सोच पर सवाल करना इस्लामोफोबिया कैसे है?

मैक्राँ द्वारा उठाई गई हर बात चाहे वो किसी भी समाज में रह कर एक काउंटर सोसायटी बनाने की हो, या फिर मजहबी शिक्षा और अलग संस्कृति के नाम पर सरकारी स्कूल से बाहर ले जा कर बच्चों को शुरु से ही कट्टरपंथी बनाने की हो, या फिर इस्लामी अलगाववाद द्वारा राष्ट्रीय कानूनों को न मान कर अपने कानून को ही मानने की जिद से उपजा अंतिम लक्ष्य हो कि हर चीज उनके नियंत्रण में आ जाए, आज के संदर्भ में हर राष्ट्राध्यक्ष को बोलना चाहिए।

जब तक आप एक सामाजिक विकृति को स्वीकारते नहीं, उसका उपचार असंभव है। चाहे हंगरी हो, पोलैंड हो, रुस हो या चीन, हर राष्ट्र ने अपने स्तर से इस वैश्विक कैंसर के मूल पर रोक लगाने की व्यवस्थाएँ की हैं। फ्रांस इन आतंकियों के निशाने पर पूरे दशक रहा है। खास समुदाय वाले शरणार्थी बन कर आए, या वहाँ रह रहे कट्टरपंथियों ने पेरिस में कई बार, नीस, लेस लिस, ला डिफेंस, जो ले टूर्स, सेंट क्वेंटिन फलावियर, थेलीज, वैलेंस, मैगनविल, लेवालेइ पैरे, मर्साई, करकासोन, स्ट्रैसबर्ग, ल्योन आदि शहरों को अपने आतंक का निशाना बनाया है।

यही हाल दुनिया के हर उस देश का है जहाँ इस्लाम अल्पसंख्यक है, या वहाँ ऐसे लोग शरणार्थी बन कर गए हैं, या वहाँ ये राजनीतिक रूप से कमजोर हैं, लेकिन ख्वाब पूरे देश को इस्लाम के नीचे लाने के हैं। इसलिए, पहले तो इस विकृति के कारणों को पहचानना होगा, जोर-जोर से बोलना होगा, लोगों के बीच चर्चा का विषय बनाना होगा, वृहद समाज में इसकी स्वीकृति पैदा करनी होगी कि इस मुद्दे पर बात करना इस्लामोफोबिया नहीं है, बल्कि राजा नंगा है। तुम्हें उसका नंगापन दिख रहा है, और तुम चिल्ला रहे हो कि वह नंगा है, तो भीड़ भले ही उसके पीठ पर बने बाघ की अदृश्य कलाकारी पर आहें भर रहा हो, तुम अकेले होने पर भी सही हो।

इस्लामी कट्टरपंथ कुछ भी नहीं है, यह पाँच वक्त के नमाजी, टखने तक पाजामा पहनने वाले, इस्लाम के हर निर्देश का पालन करने वाले सच्चे मजहबी भाइयों को बुरा बताने की एक चाल है। स्कोडा-लहसुन तहजीब के सर्वोत्तम दौर में अपने इन मजहबी भाइयों को कट्टरपंथी कहने वालों की चाल को पहचानिए और उन्हें सच्चा मजहबी कह कर यथोचित सम्मान दीजिए।

वो इंडस्ट्री का डॉन है.. कितनों की जिंदगी बर्बाद की, भाँजा ड्रग्स-लड़कियाँ सप्लाई करता है: महेश भट्ट की रिश्तेदार का आरोप

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद चर्चा में आए भट्ट परिवार पर एक बार फिर इल्जाम लग रहे हैं। ताजा मामला महेश भट्ट (Mahesh bhatt) के भतीजे से जुड़ा है। सोशल मीडिया पर महेश भट्ट की रिश्तेदार लवीना लोध (Luviena Lodh) नाम की महिला ने वीडियो जारी करके अपनी सुरक्षा की गुहार लगाई है। लवीना लोध ने कहा है कि उनकी शादी महेश भट्ट के भाँजे सुमित संभरवाल से हुई थी, जो ड्रग्स और लड़कियाँ सप्लाई करता है।

लवीना लोध का दावा है कि उनकी शादी महेश भट्ट के भाँजे से हुई थी। लेकिन उन्हें समय रहते पता चल गया था कि उनका पति ड्रग तस्कर है। उन्होंने इस सच्चाई को जानने के बाद तलाक का केस फाइल कर दिया। लवीना ने अपनी वीडियो में अमायरा दस्तूर नाम की एक्ट्रेस का नाम भी लिया है।

लवीना ने कहा, “उनके (महेश भट्ट के भाँजे) फोन में अलग-अलग तरह की लड़कियों की तस्वीरें है जिसे वह निर्देशकों को दिखाते हैं और उन लोगों को लड़कियाँ भी सप्लाई करते हैं। इन सबकी जानकारी महेश भट्ट को है।”

वह महेश भट्ट को लेकर कहती है, “महेश भट्ट सबसे बड़ा डॉन है इंडस्ट्री का। सारा सिस्टम वही ऑपरेट करता है। अगर आप उनके नियमों के हिसाब से नहीं चलते तो वो आपका जीना हराम कर देते हैं। महेश भट्ट ने कितने लोगों की जिंदगी बर्बाद कर दी है। कितने एक्टर्स, कंपरोजर्स, डॉयरेक्टर्स को काम से निकाल दिया है। वो एक फोन करते हैं पीछे से और लोगों का काम चला जाता है, लोगों को इस बारे में पता भी नहीं चलता। ऐसे ही उन्होंने बहुत लोगों की जिंदगी बर्बाद की है।”

महिला के अनुसार, “जब से मैंने इन लोगों के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज की है, वो हाथ धोकर मेरे पीछे पड़ गए हैं। वो अलग अलग तरह से मेरे घर में घुसने की कोशिश कर रहे हैं। पूरी कोशिश की है उन्होंने मुझे इस घर से निकालने की और जब मैं पुलिस के पास एनसी लिखवाने जाती हूँ तो कोई वहाँ एनसी भी नहीं लिखता। बहुत मुश्किल के बाद अगर मैं एनसी लिखवा भी देती हूँ तो कोई एक्शन नहीं लिया जाता।”

वह कहती हैं, “अगर कल कोई हादसा मेरे साथ या मेरे परिवार के साथ होता है तो उसके पीछे केवल महेश भट्ट, मुकेश भट्ट, सुमित सबरवाल, साहिल सहगल, कुमकुम सहगल जिम्मेदार होंगे। कम से कम लोगों को पता तो चले कि बंद दरवाजे के पीछे इन्होंने कितने लोगों की जिंदगी बर्बाद की है और ये क्या क्या कर सकते हैं। क्योंकि महेश भट्ट बहुत ताकतवर और रसूख वाला इंसान है।”

बता दें कि लवीना ने अपनी वीडियो ट्विटर, इंस्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया पर शेयर करके मदद की गुहार लगाई है।

मुंबई पुलिस ने दर्ज की Republic TV के 1000 मीडियाकर्मियों के खिलाफ FIR

मुंबई पुलिस को कथित रूप से बदनाम करने के आरोप में शुक्रवार (अक्टूबर 23, 2020) को समाचार चैनल Republic TV के 4 पत्रकारों समेत चैनल के लगभग सभी मीडियाकर्मियों के खिलाफ गैर जमानती धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है। Republic TV मीडिया नेटवर्क ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि इतिहास में पहली बार किसी न्यूज़ चैनल के खिलाफ ऐसी कार्रवाई हुई है।

वहीं, रिपब्लिक चैनल का कहना है कि चैनल की पूरी एडिटोरियल टीम के खिलाफ FIR दर्ज की गई है, जिसका मतलब है कि करीब 1000 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ है। रिपब्लिक टीवी ने इसे ‘मीडिया अधिकारों पर हमला’ करार दिया और कहा कि चैनल बदले की भावना से की जा रही कार्रवाई के खिलाफ हर ‘मजबूत रणनीति’ से लड़ेगा, मुंबई पुलिस आयुक्त संविधान और कानून से ऊपर नहीं है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, एक अधिकारी ने कहा कि शहर के एनएम जोशी मार्ग पुलिस स्टेशन में दर्ज एफआईआर में शहर पुलिस आयुक्त के खिलाफ ‘विद्रोह’ के बारे में चैनल द्वारा चलाई गई एक रिपोर्ट से संबंधित है।

अधिकारी ने कहा कि FIR पुलिस की धारा 3 (1) के तहत दायर की गई है। इसमें एंकर और डिप्टी न्यूज एडिटर शिवानी गुप्ता, एंकर और सीनियर एसोसिएट एडिटर सागरिका मित्रा, डिप्टी एडिटर शवन सेन और कार्यकारी संपादक निरंजन नारायणस्वामी का नाम है।

रिपब्लिक टीवी पर मुंबई पुलिस की इस कार्रवाई के बाद चैनल के एडिटर इन चीफ अर्नब गोस्वामी ने कहा कि आपातकाल के समय भी कभी किसी मीडिया के खिलाफ ऐसा नहीं हुआ था। उन्होंने कहा कि हम नहीं डरने वाले, इस बार सिर्फ मैं नहीं, चैनल के सभी स्टाफ पुलिस थाने में जाएँगे।

चैनल ने कहा कि रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क को नोटिस जारी करने के बाद से हर लेनदेन का विवरण प्रस्तुत करने और हर एक पत्रकार और कर्मचारी को नोटिस जारी किया गया है। हम हर मजबूत रणनीति की लड़ाई लड़ेंगे।

डाकुओं ने हमारा झंडा ले लिया.. J&K के अलावा नहीं उठाऊँगी कोई दूसरा झंडा- महबूबा मुफ्ती

जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री व पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती एक बार फिर अपने विवादित बयान के कारण चर्चा में आ गई हैं। महबूबा मुफ्ती ने शुक्रवार (अक्टूबर 23, 2020) को श्रीनगर में अपने आवास पर हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि जब तक उनका झंडा (जम्मू कश्मीर का पुराना झंडा) वापस नहीं मिल जाता, तब तक वह दूसरा झंडा (तिरंगा) नहीं उठाएँगी। मुफ्ती ने कहा कि उनका झंडा डाकुओं ने ले लिया है।

14 महीने तक हिरासत में रहने के बाद हाल ही में रिहा हुई महबूबा मुफ्ती ने कॉन्फ्रेंस में पत्रकारों से बात करते हुए कहा, “जब तक केंद्र सरकार हमारे हक (अनुच्छेद 370) को वापस नहीं करते हैं, तब तक मुझे कोई भी चुनाव लड़ने में दिलचस्पी नहीं है।” उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को बहाल करने तक उनका संघर्ष खत्म नहीं होगा। वह कश्मीर को पुराना दर्जा दिलवाने के लिए जमीन आसमान एक कर देंगी।

अनुच्छेद 370 निरस्त किए जाने पर अपनी टिप्पणी करते हुए मुफ्ती ने कहा कि जिस तरह पिछले साल जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाया गया है वह लोगों के साथ हुई डकैती से कम नहीं है। उन्होंने सरकार के इस ऐतिहासिक फैसले को गैरकानूनी और असंवैधानिक भी बताया।

आगे पूरे भारत पर निशाना साधते हुए महबूबा मुफ्ती ने कहा कि भारत सिर्फ़ जम्मू कश्मीर की जमीन चाहता है उसके लोगों को नहीं। इसलिए वह अनुच्छेद 370 के दोबारा बहाल होने तक कोई झंडा नहीं उठाएँगी। उन्होंने पत्रकारों के सामने कहा कि देश के झंडे से उनका संबंध इस झंडे (जम्मू कश्मीर के पुराने) की वजह से है। अब जब पुराना झंडा हाथ में आएगा तभी वह उस झंडे को भी उठाएँगे।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट बताती है कि प्रेस वार्ता में भी मुफ्ती ने अपनी टेबल पर पुराने झंडे के साथ पार्टी का झंडा रखा हुआ था। ऐसे में उन्होंने इसकी ओर इशारा करते हुए कहा, “जब तक हमारा झंडा हमारे पास वापस नहीं आ जाता है। कोई भी दूसरा झंडा (तिरंगा) नहीं उठाएगा, मेरा झंडा उठने के बाद ही दूसरा झंडा उठाएँगे। मेरा झंडा मेरे सामने है।”

गौरतलब है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में महबूबा ने जम्मू-कश्मीर का पुराना राज्य ध्वज लगाया हुआ था। ये झंडा धारा 370 हटाए जाने से पहले राज्य इस्तेमाल कर रहा था।

बिहार चुनावों में हो रही पीएम मोदी  की रैली पर मुफ्ती ने कहा कि वोट माँगने के लिए इनके (भाजपा) पास दिखाने को कुछ नहीं है। वे लोगों से कहते हैं कि आप जम्मू कश्मीर में जमीन खरीद सकते हैं,हमने आर्टिकल 370 को रद्द कर दिया है। महबूबा मुफ्ती ने कहा कि अब वे मुफ्त में वैक्सीन देंगे, पीएम मोदी ने वोट के लिए आर्टिकल 370 की बात की है। यह सरकार देश के मुद्दों को हल करने में विफल रही है।

महबूबा मुफ्ती ने चीना सीमा विवाद का मुद्दा उठाते हुए कहा, “यह एक तथ्य है कि चीन ने हमारी जमीन के 1000 वर्ग किमी हिस्से पर कब्जा कर लिया है। मुझे लगता है कि हम किसी तरह से 40 किमी वापस जाने में कामयाब रहे।”

जम्मू कश्मीर को लेकर महबूबा मुफ्ती ने कहा, “वे कहते हैं कि यह विवादित था तो उनसे पूछना चाहती हूँ कि फिर जम्मू कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश क्यों बनाया गया?” उन्होंने कहा कि 370 हटने से पहले जम्मू कश्मीर इस तरह कभी भी अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण में नहीं आया।

परमबीर ने Republic TV से माँगा कॉपी-पेन से लेकर टॉयलेट पेपर तक का हिसाब

अर्नब गोस्वामी के रिपब्लिक टीवी और मुंबई पुलिस आयुक्त परमबीर सिंह के नेतृत्व में मुंबई पुलिस के बीच खींचतान कम होने का नाम नहीं ले रही है। टीआरपी स्कैम में फर्जी तरह से Republic TV का नाम लेने के बाद मुंबई पुलिस ने अब सभी सीमाओं को पार कर दिया है। हाल ही में, मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच की ओर से Republic TV को जारी हुए नोटिस में उनसे पेन, कॉपी से लेकर टॉयलेट पेपर तक का हिसाब माँगा है। यह जानकारी रिपब्लिक टीवी ने एक बयान जारी करके दी है।

रिपब्लिक टीवी ने बताया कि परमबीर सिंह ने उनसे टॉयलेट पेपर, टिश्यू पेपर, कार्पेट, कुर्सी, चाय-कॉफी वेंडिंग मशीन के खर्चे से लेकर हाउस कीपिंग स्टाफ तक की सैलरी की जानकारी माँगी है।

मीडिया संस्थान के चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर सुंदरम एस से पुलिस थाने में पिछले 4 साल में हुई सारी ट्रांजेक्शन डिटेल्स जमा करने को कहा गया है। सबसे हैरान करने वाली बात यह कि ये बात जानते हुए कि ऐसी जानकारी जुटाने में महीने भर का समय लग सकता है, मुंबई पुलिस ने रिपब्लिक टीवी को मात्र 12 घंटे का समय दिया है।

रिपब्लिक टीवी के अनुसार, वित्तीय लेन-देन से संबंधित जानकारी की माँग करना, मुंबई पुलिस की संस्थान के ख़िलाफ़ एक साजिश है जिसे वह महाराष्ट्र सरकार के इशारों पर रच रहे हैं। चैनल ने दावा किया है कि पुलिस ने टॉयलेट पेपर, कॉफ़ी वेंडिंग मशीन, मेकअप किट, स्टेशनरी, फ़र्नीचर इत्यादि की लागत सहित छोटे और मामूली लेनदेन से संबंधित जानकारी भी उनसे माँगी है।

रिपब्लिक टीवी द्वारा जारी किए गए बयान में मुंबई पुलिस के नोटिस को स्पष्ट रूप से मीडिया की स्वतंत्रता पर हमला कहा गया है। साथ ही बताया गया है कि रिपब्लिक टीवी को मुंबई पुलिस ने धारा 91 के तहत नोटिस जारी करके पिछले 4 सालों की हर छोटी-मोटी ट्रांजेक्शन का विवरण प्रस्तुत करने के लिए बोला है।

इस बयान में रिपब्लिक टीवी और मुंबई पुलिस के बीच चल रही खींचतान में संस्थान ने इसे अपने विरुद्ध अभियान बताते हुए कहा कि उनसे वित्तीय, संविदात्मक और लेने देन के विवरण की लिखित में जानकारी माँगी गई है।

चैनल ने आगे लिखा, रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के सीएफओ को 22 अक्टूबर 2020 को सीआरपीसी की धारा 91 में तहत नोटिस जारी हुआ। इसमें मूल्यांकन रिपोर्ट, कर्मचारी लाभ खर्च, प्रमोशन खर्च, प्रसारण खर्च से जुड़ी जानकारी माँगी गई है। इसके अलावा संस्थान में काम कर रहे कर्मचारियों की जानकारी भी माँगी गई है। 

चैनल का इस पर कहना है कि यह समाचार संगठन को प्रताड़ित करने, संचालन पर अवरोध उत्पत्न करने और कामकाज को दोबारा से आपात काल के दौर में लाने का प्रयास है। ये स्प्ष्ट रूप से रिपब्लिक टीवी को निशाना बनाने के लिए मुंबई पुलिस की कोशिश है।

अपने बयान में रिपब्लिक टीवी ने कहा है कि वह दबाव की रणनीति के बीच डटकर खड़े होंगे। रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क खबर को पहले, सच्चाई को पहले और राष्ट्र को पहले रखने का काम जारी रखेगा। उनका कहना है कि हम जनता की राय और कानूनी अदालतों में हर मजबूत पक्ष के साथ लड़ने की कोशिश करेंगे।

मुंबई पुलिस ने रिपब्लिक टीवी के कार्यकारी संपादक को दी जेल की धमकी

गौरतलब है कि इससे पहले रिपब्लिक टीवी के एग्जिक्यूटिव एडिटर निरंजन नारायणस्वामी से मुंबई पुलिस ने 21 अक्टूबर को 9 घंटे पूछताछ की थी। संस्थान का कहना था कि हंसा रिपोर्ट के स्रोत का खुलासा नहीं करने के उनके फैसले के लिए उन्हें बार-बार कारावास की धमकी दी गई थी।

निरंजन ने खुलासा किया था कि उन्हें पूछताछ के दौरान चेतावनी दी गई थी कि अगर वह हंसा रिसर्च द्वारा रिपोर्ट के स्रोत का खुलासा नहीं करते, तो उनके ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 174 और 179 के तहत मामला दर्ज किया जाएगा। हालाँकि, इन धमकियों के बावजूद. निरंजन ने स्रोत का खुलासा करने से इनकार कर दिया।

e-रिक्शा चलाता था दिलदार, राहुल बन कर 8वीं की लड़की को ले भागा: पहले से थी 2 शादी, एक को बताता था बहन

देश में लगातार लव जिहाद के मामले सामने आ रहे हैं। ताज़ा मामला देश की राजधानी दिल्ली का है। इस मामले में दिलदार कुरैशी नाम के युवक ने 13 साल की लड़की को प्यार के झाँसे में फँसाया और इसके बाद 18 अक्टूबर को उसे लेकर फ़रार हो गया।

पीड़ित नाबालिग लड़की दिल्ली के छतरपुर की रहने वाली है और आठवीं कक्षा में पढ़ती है। घटना की जानकारी के बाद लड़की के परिजनों ने युवक के विरुद्ध मामला दर्ज कराया। फ़िलहाल पुलिस दिलदार कुरैशी की तलाश में जुटी हुई है।

दैनिक जागरण में प्रकाशित ख़बर के अनुसार 18 अक्टूबर की सुबह लड़की अपनी सहेली से मुलाक़ात की बात कह कर घर से बाहर गई थी। रात होने के बावजूद लड़की की वापसी नहीं आई, तब उसके परिवार वालों ने उसे खोजना शुरू किया। इस दौरान लड़की के परिजन उसकी सहेली के घर गए, जहाँ उसने बताया कि वह आई थी पर शाम को घर के लिए निकल गई थी। इसके बाद सीसीटीवी फुटेज सामने आई, जिसमें साफ़ तौर पर नज़र आ रहा था कि वह आरोपित दिलदार के साथ क़ुतुब मेट्रो स्टेशन की तरफ जा रही थी। 

लड़की के परिजनों द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक़ आरोपित दिलदार कुरैशी उनके मोहल्ले में ही रहता था। वह ई रिक्शा चलाता था और उसने सभी को अपना नाम राहुल बताया था। इसके अलावा उसने कई अलग-अलग नाम से अपनी फेसबुक प्रोफाइल बना रखी थी, और वह मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले स्थित शेगूपुर गाँव का रहने वाला है।

दिलदार ने अपने मोहल्ले में यह बताया था कि वह अपनी दिव्यांग बहन सोनी के साथ रहता था, जिसके दोनों पैर काम नहीं करते थे। 13 साल की लड़की के साथ फरार होने के बाद पता चला कि जिसे वह अपनी बहन बताता था, वह असल में उसकी पत्नी थी।

इस घटनाक्रम पर जानकारी देते हुए सोनी की बहन ने कई हैरान कर देने वाली बातें बताई। सोनी की बहन ने कहा कि 12 सितंबर को सोनी की तबियत बिगड़ गई, जिसके बाद दिलदार ने उसे दिल्ली स्थित सफ़दरगंज अस्पताल में भर्ती कराया। इसके बाद सोनी की हालत में सुधार हुआ, जिसके बाद 24 तारीख़ को दिलदार ने उसे डिस्चार्ज कराया और इसके बाद घर से भाग गया।

इसके कुछ ही दिन बाद 1 अक्टूबर को सोनी की तबियत दोबारा गम्भीर हुई, सोनी गर्भवती भी थी। उसने कई बार दिलदार को फोन किया लेकिन दिलदार उसे देखने तक नहीं आया। 6 अक्टूबर को सोनी और उसके गर्भ में पल रहे 8 महीने के शिशु की मृत्यु हो गई। 

दिलदार अपनी दिव्यांग पत्नी के अंतिम संस्कार में भी शामिल नहीं हुआ था। सोनी का कहना था कि दिलदार ने लगभग 11 महीने पहले सोनी को भी प्रेम का झाँसा देकर उसके साथ विवाह किया था। सोनी के घर वालों ने सुरक्षित भविष्य को देखते हुए उसकी शादी कर दी थी।

इस शादी के कुछ समय बाद ही सोनी को पता चला कि दिलदार ने अपनी पहली पत्नी और दो बच्चों को छोड़ रखा था। यह सब जानने के बाद सोनी की स्थिति बदतर होती गई और एक पड़ाव ऐसा आया, जब सोनी के गर्भवती होने के बावजूद दिलदार उसका खयाल नहीं रख कर दूसरी लड़कियों से बात करता था।

दिलदार कुरैशी का भाई भी संगम विहार कॉलोनी में ही रहता है, उसने भी इस बारे में कई जानकारी दी। उसका कहना था कि कुछ साल पहले दिलदार ने एक लड़की के साथ भाग कर शादी की थी। इसके बाद वह गाँव वापस नहीं आया, उसके दो बच्चे भी हुए थे एक बेटा और एक बेटी। फ़िलहाल वह महिला अपने बच्चों के साथ मायके में रहती है, उसका परिवार फ़िलहाल गाँव में ही रहता है।            

‘हिन्दुओं में हर महिला को वेश्या मानते हैं’ – कॉन्ग्रेसी समर्थक सांसद ने पेरियार TV पर कही बात, वीडियो वायरल

तमिलनाडु में कथित दलितों के राजनीतिक दल कहे जाने वाले विदुथलाई चिरुथाइगल काची (VCK) के प्रमुख थोल थिरुमावलवन ने एक पेरियारवादी समूह द्वारा आयोजित एक ऑनलाइन सेमिनार में हिंदू धर्म ग्रंथ मनुस्मृति का हवाला देते हुए कहा कि हिन्दू धर्म में, खासकर ब्राह्मणों में महिलाओं को सेक्स वर्कर्स (Sex workers) यानी वेश्या माना जाता है। साथ ही, VCK प्रमुख ने कहा कि हिन्दू धर्म में महिलाओं का स्थान पुरुषों से नीचे रखा गया है।

गत 26 सितम्बर को ‘पेरियार टीवी’ (Periyar TV) नाम के इस यूट्यूब चैनल से बात करते हुए, थिरुमावलवन ने सनातन धर्म और हिंदू मान्यताओं पर कटाक्ष करते हुए कहा कि हिंदू धर्म में महिलाओं को सेक्स वर्कर माना जाता है। गौरतलब है कि थोल थिरुमावलवन, तमिलनाडु की राजनीतिक पार्टी विदुथलाई चिरुथाइगल काची (वीसीके) के अध्यक्ष हैं और राज्य की चिदंबरम लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के सांसद भी।

‘पेरियार टीवी’ नामक यूट्यूब चैनल द्वारा आयोजित एक ऑनलाइन सेमिनार में गेस्ट के रूप में, VCK चीफ थिरुमावलवन ने पेरियार के बारे में बोलते हुए कहा कि किस प्रकार उसने हिंदू धर्मग्रंथों द्वारा सिखाई गई ब्राह्मणवादी विचारधाराओं को तोड़ने में मदद की। उसने अपने सम्बोधन में कहा कि सनातन धर्म और मनुस्मृति में कहा गया है कि सदियों पुरानी हिंदू प्रथाओं ने महिलाओं को वेश्या माना गया है।

थोल थिरुमावलवन ने वीडियो में कहा, “अगर कोई यह देखेगा कि महिलाओं को सनातन धर्म में क्या माना गया है.. उनके साथ कैसा व्यवहार किया जाता है, कैसे उन्हें प्राचीन समय से ही दबाया जा रहा है, कैसे उनका शोषण किया जा रहा है… सनातन धर्म महिलाओं के बारे में क्या कहता है?”

पेरियार टीवी पर थिरुमावलवन ने कहा, “भगवान ने उन्हें ऐसा बनाया है। उन्हें तुलना में पुरुषों से कमतर बताया जाता है। यह ब्राह्मण महिलाओं के साथ-साथ अन्य जातियों की महिलाओं पर भी लागू होता है। यह सनातन धर्म कहता है।”

यह वीडियो बृहस्पतिवार (अक्टूबर 22, 2020) को सोशल मीडिया पर वायरल होते देखा गया। लोगों का कहना है कि उसने न ही शास्त्रों को समझा, और उसने महिलाओं को अपमानित भी किया है। यह वीडियो लोगों द्वारा कई बार शेयर और रीट्वीट किया जा चुका है और #थिरुमावलवनचोर भी ट्विटर पर ट्रेंड कर रहा है। लोगों का कहना है कि इसने अतीत में भी हिन्दू मंदिरों को भद्दा बताते हुए राम मंदिर निर्माण का भी विरोध किया था।

तमिलनाडु बीजेपी के आईटी हेड सीटी निर्मल कुमार ने ट्विटर पर वायरल हुए वीडियो को साझा करते हुए कहा कि ये ऐसे उदाहरण हैं जहाँ वीसीके प्रमुख ने हिंदुओं अपमानित कर उनकी भावनाओं को आहत किया है। उन्होंने कहा है कि तमिलनाडु के किसी भी चैनल ने इसे नहीं दिखाया।

हालाँकि, विवाद बढ़ता देख थिरुमावलवन और उसके समर्थकों ने कहा कि वीडियो को पूरी तरह से देखा जाना चाहिए और इसका मतलब वह नहीं था जिसके लिए कि कई हिंदूवादी संगठनों द्वारा थिरुमावलवन का बहिष्कार किया जा रहा है।

2019 के आम चुनाव में ‘मोदी लहर’ भगाने के लिए VCK, DMK और कॉन्ग्रेस हुए थे एकजुट

उल्लेखनीय है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) व विदुथलाई चिरुथाइगल काँची (VCK) के साथ लोकसभा चुनाव के लिए समझौता हुआ था जिसके अनुसार, भाकपा व वीसीके को दो-दो सीटें मिलनी तय हुईं थीं।

भाकपा तमिलनाडु के राज्य सचिव आर मुथरासन ने कहा था कि माकपा, DMK को उपचुनावों में समर्थन देगी, जो कि तमिलनाडु की खाली 21 विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में कराए जाएँगे। तब DMK ने कॉन्ग्रेस, भाकपा, VCK, आईयूएमएल व केडीएमके जैसे वाम दलों के साथ चुनावी गठबंधन के समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। तब इसी VCK प्रमुख थोल थिरुमावलवन ने इस गठबंधन को मोदी लहर के खिलाफ ‘पवित्र समझौता’ बताया था।

‘पैगंबर मोहम्मद पर कमेंट करने वाले गैर मुस्लिम (हिंदुओं) की सूची बनाओ, सबको जेल में डालो’ – जाकिर नाइक

अक्सर अपने बयानों के चलते विवादों और उन विवादों से पैदा होने वाली सुर्ख़ियों में बने रहने वाले जाकिर नाइक ने एक बार फिर कुछ ऐसा ही कहा है। इस बार जाकिर नाइक ने खाड़ी के देशों में रहने वाले गैर मुस्लिम (विशेष रूप से हिन्दू) लोगों पर बयान दिया है। बयान में उसका कहना है कि अगर खाड़ी के देशों में रहने वाले गैर मुस्लिम पैगंबर मोहम्मद पर टिप्पणी करते हैं तो उन्हें जेल में बंद कर दिया जाए। इसके अलावा उसने वीडियो में यहाँ तक कहा है कि ऐसे लोगों का समुचित दस्तावेज़ (डाटा बेस) तैयार किया जाए, जो सोशल मीडिया पर इस तरह की टिप्पणी करते हैं। 

दरअसल फ्रांस में पैगंबर मोहम्मद का कार्टून दिखाने पर एक शिक्षक का गला काट कर हत्या के बाद जाकिर नाइक का यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होना शुरू हुआ। वीडियो इस साल के मई महीने में जारी किया गया था, जिसमें जाकिर नाइक ने भारत के हिंदुओं और पूर्वी देशों में रहने वाले हिंदुओं के लिए अनेक नफ़रत भरी बातें कही थीं। जाकिर नाइक ने वीडियो में कहा कि खाड़ी के देशों में रहने वाले एक वकील ने जेनेवा में एक शिकायत दर्ज कराई थी। इस याचिका में वकील ने पूछा कि अगर पैगंबर मोहम्मद पर कोई गैर मुस्लिम टिप्पणी करता है तो उसके लिए क्या करना चाहिए?

इसके बाद जाकिर नाइक ने कहा, “उस वकील के लिए मेरा सुझाव है कि अगली बार अगर वह (हिन्दू) किसी भी खाड़ी के देश में वापसी करते हैं, चाहे वह कुवैत हो, सऊदी अरब हो या इंडोनेशिया हो। इस बात की विशेष रूप से निगरानी की जानी चाहिए कि क्या उन्होंने इस्लाम या पैगंबर मोहम्मद के लिए अपशब्द कहे हैं या उन पर अनैतिक या अपमानजनक टिप्पणी की है। सबसे पहले ऐसे लोगों के विरुद्ध शिकायत दर्ज की जानी चाहिए और इसके बाद उन्हें जेल में बंद कर देना चाहिए। इन लोगों के लिए इससे बेहतर कोई और सज़ा नहीं हो सकती है।” 

वीडियो के अगले हिस्से में जाकिर नाइक ने और भी अप्रत्याशित बातें कही। जाकिर ने कहा

“इस बात की जानकारी सार्वजनिक रूप से देनी चाहिए कि हमारे पास ऐसे लोगों के नाम का दस्तावेज़ है लेकिन उनका नाम गुप्त रखा जाए। जैसे ही वह खाड़ी के देशों में वापस आएँ वैसे ही उनकी गिरफ्तारी हो और उन्हें अदालत के सामने पेश किया जाए। फिर कार्रवाई पूरी करके उचित दंड दिया जाए। मेरा भरोसा करिए, ज़्यादातर लोग भारतीय जनता पार्टी के समर्थक हैं और इस्लाम के विरुद्ध घृणा का माहौल बना रहे हैं, वह डर कर रहेंगे। इससे हम इस्लाम और पैगंबर मोहम्मद पर होने वाली टिप्पणियों पर रोक लगाने में सक्षम होंगे। जैसे ही 5-10 लोगों पर इस तरह की कार्रवाई होगी, वैसे ही टिप्पणियाँ बंद हो जाएँगी क्योंकि ज़्यादातर गैर मुस्लिम खाड़ी के देशों में यात्रा करते हैं।”         

पंजाब: बलात्कार के बाद 6 साल की बच्ची को जलाया, अधजला शव बरामद

पंजाब के होशियारपुर जिले के जलालपुर गाँव में 6 साल की बच्ची के साथ दो लोगों ने बलात्कार किया और उसे जिंदा जला दिया। पुलिस को बच्ची की अधजली लाश टांडा के जलालपुर गाँव स्थित एक घर में मिली।

आरोपित और उसके दादा को 6 साल की मासूम के साथ बलात्कार करने और उसकी हत्या करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। 15 वर्षीय आरोपित गुरप्रीत सिंह और उसके दादा सुरजीत सिंह को हत्या, बलात्कार और आईपीसी की अन्य संबंधित धाराओं और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम के आरोपों में गिरफ्तार किया गया है।

मृतक पीड़िता एक प्रवासी मजदूर की बच्ची थी। ये परिवार इसी गाँव में रह रहा था। मृतक बच्ची के पिता ने आरोप लगाए हैं कि गुरप्रीत कथित तौर पर उनकी लड़की को अपने घर ले गया जहाँ उसने उसका बलात्कार किया।

बताया जा रहा है कि आरोपित गुरप्रीत और उसके दादा सुरजीत, दोनों ने मिलकर बच्ची की हत्या कर दी और फिर उसकी लाश को जला दिया। पुलिस की तरफ से जानकारी दी गई है कि बच्ची की अधजली लाश आरोपितों के घर से बरामद हुई है।

मृतका के पिता के अनुसार, बच्ची का बलात्कार करने के बाद, गुरप्रीत और सुरजीत दोनों ने कथित तौर पर उसकी हत्या कर दी और उसके शरीर को आग लगा दी।

पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने ट्विटर पर इस घटना पर दुख और दुख व्यक्त किया है। अमरिंदर सिंह ने कहा कि दोषियों को गिरफ्तार कर लिया गया है और उन्होंने डीजीपी को निर्देश दिया कि वे सुनिश्चित करें कि उचित जाँच के साथ कार्रवाई की जाए। साथ ही, उन्होंने अदालतों से निवेदन किया कि वे तत्परता से मामले की सुनवाई करें और दोषी को कठोर सजा दें।

अनुसूचित जाति आयोग ने लिया स्वत संज्ञान

रिपोर्ट्स के अनुसार, पंजाब राज्य अनुसूचित जाति आयोग की अध्यक्ष तेजिंदर कौर ने इस घटना का स्वत: संज्ञान लिया और होशियारपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) से 26 अक्टूबर तक एक विस्तृत रिपोर्ट माँगी है।