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4 वीडियो, कुछ तस्वीरें, मीडिया और हाथरस: टीआरपी और एजेंडा का घिनौना तमाशा

हाथरस में घटी दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद यह मीडिया पर्यटक स्थल बन गया है। विभिन्न मेनस्ट्रीम न्यूज नेटवर्क के पत्रकार नई-नई तकनीकें अपनाकर टीआरपी की होड़ में आगे बढ़ने की जुगाड़ में लगे हुए हैं। इन दिनों सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऐसे वीडियो से भरे हुए हैं, जिसमें तथाकथित पत्रकार न्याय के लिए लड़ाई की आड़ में अपनी नीच आचरण का परिचय दे रहे हैं।

हिंदी न्यूज चैनल भारत समाचार के पत्रकार द्वारा इसी तरह का वीडियो शेयर किया गया है। इसमें पत्रकार खेत के पास बैठ जाती है और पीड़ितों से मिलने की जिद करती है। इतनी ही नहीं, वो पुलिस अधिकारियों को यह कहकर उकसाती है कि क्या वे भी उसे उसी तरह जला देंगे, जैसा उन्होंने हाथरस पीड़िता के शव का दाह संस्कार किया था।

महिला पुलिस अधिकारी उस पत्रकार के सामने हाथ जोड़ती है और वहाँ से उठने का निवेदन करती है। महिला पुलिस अधिकारी पत्रकार से कहती है कि वो वहाँ से उठ जाए, किसी तरह का तमाशा न करें। वहीं दूसरी तरफ पत्रकार प्रज्ञा मिश्रा का पुलिस अधिकारियों को उकसाकर ये पूछना कि क्या वो उन्हें भी जलाएँगे, ये उनकी नैतिक स्तर का परिचय देती है।

इस तरह का व्यवहार करने के पीछे दो कारण हैं- पहला तो ये कि वह चाहते हैं कि दर्शकों को इस बात पर विश्वास को पत्रकार ग्राउंड लेवल पर जाकर भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ पीड़िता के लिए न्याय की लड़ रही है और दूसरा कारण है- टीआरपी, जो कि उल्लेखनीय गति के साथ घट रही है।

इसी तरह का एक वीडियो ABP न्यूज की तरफ से 2 अक्टूबर को शेयर किया गया। जिसमें मीडिया नेटवर्क की पत्रकार प्रतिमा मिश्रा हंगामा करते हुए जबरन गाँव के अंदर घुसने का प्रयास करती है। इस दौरान वो बार-बार ये कहती हैं कि वो अपना काम कर रही है। हालाँकि बाद में उन्हें और कैमरामैन को गाड़ी में बैठाकर गाँव के बाहर कर दिया जाता है। प्रतिमा मिश्रा आरोप लगाती है कि उन्हें बिना महिला पुलिसकर्मी वाली गाड़ी में बैठाकर जबरन गाँव के बाहर किया जाता है।

एबीपी न्यूज़ ने उसी दिन एक और वीडियो पोस्ट किया। इस पोस्ट का कैप्शन था, “हाथरस की बेटी के लिए एबीपी न्यूज के सत्याग्रह को पुलिस ने की रोकने की कोशिश। आखिर गाँधी जयंती पर बापू के विचारों को कुचलने वाला ‘गोडसे’ कौन?”

एक अन्य वीडियो में, एबीपी न्यूज ने दावा किया कि पीड़ित परिवार से मिलने की कोशिश कर रहे उनके पत्रकार और कैमरामैन के साथ उत्तर प्रदेश पुलिस ने छेड़छाड़ और दुर्व्यवहार किया।

‘पत्रकार’ बरखा दत्त ने भी 2 अक्टूबर को तस्वीरें पोस्ट करते हुए बताया था कि कैसे कई किलोमीटर तक पैदल चलने के बाद वो गाँव पहुँचने में कामयाब हुई, लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस ने उन्हें और उनकी मोजो टीम को पकड़कर पुलिस वैन में बैठाया और उन्हें फिर से हाइवे पर पहुँचा दिया।

जब इन वीडियो और तस्वीरों को शूट किया गया था तब धारा 144 लगाई गई थी

उल्लेखनीय है कि जिस समय पर ये तस्वीरें और वीडियो शूट किया गया है, उस समय वहाँ पर SIT जाँच को देखते हुए धारा 144 लगाई गई थी। उत्तर प्रदेश पुलिस ने मुख्य सड़क पर गाँव से लगभग 2 किमी की दूरी पर बैरिकेड्स लगा दिए थे, जिससे गाँव के सभी प्रवेश मार्ग बंद हो गए।

हालाँकि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गाँव में प्रवेश अनुमति नहीं देने के कदम पर सवाल उठाना मीडिया के अधिकार में है। लेकिन मीडिया द्वारा प्रदर्शित इन ड्रामेबाजी से लगता नहीं कि उनका मकसद पीड़ित परिवार से मिलना है।

इससे भी बुरी बात यह है कि एसआईटी जाँच पूरी होने के बाद यूपी सरकार द्वारा मीडिया को गाँव में जाने की अनुमति दिए जाने के बाद सभी चैनलों का दावा था कि ऐसा उनके दवाब की वजह से हुआ। जबकि सच्चाई यह थी कि मीडिया को अनुमति इसलिए दी गई क्योंकि एसआईटी जाँच पूरी हो चुकी थी। इस सबसे यह स्पष्ट होता है कि कोई पत्रकार या चैनल सच्चाई को सामने लाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी गिरती टीआरपी को उठाने के लिए ये सब कर रहे थे। 

इंडिया टुडे की पत्रकार का ऑडियो लीक

गौरतलब है कि ऑपइंडिया ने इंडिया टुडे के पत्रकार और हाथरस पीड़िता के भाई के बीच की लीक बातचीत की रिपोर्ट की थी। इसमें सुना जा सकता था कि इंडिया टुडे की पत्रकार तनुश्री मृतका के भाई संदीप को ऐसा स्टेटमेंट देने के लिए बोल रही हैं, जिसमें लड़की के पिता आरोप लगाए कि उनके ऊपर प्रशासन की ओर से बहुत दबाव था। बातचीत को सुनकर यह साफ पता चलता था कि तनुश्री पीड़िता के भाई से एक निश्चित बयान दिलवाने का प्रयास कर रही थी और संदीप की दबी आवाज सुनकर लग रहा था, जैसे वह ऐसा नहीं करना चाहते।

‘PFI के दलालों वापस जाओ…’: हाथरस पहुँचे AAP सांसद संजय सिंह पर फेंकी स्याही, कहा- लाशों की राजनीति बंद करो

हाथरस के पीड़ित परिवार से मिलने गए आम आदमी पार्टी (AAP) के सांसद संजय सिंह के ऊपर आज (अक्टूबर 5, 2020) स्याही फेंकी गई। स्याही फेंकने वाले का नाम दीपक शर्मा बताया जा रहा है। दीपक ने संजय सिंह पर स्याही फेंकते हुए नारे लगाए- ‘PFI के दलालों वापस जाओ… वापस जाओ।’ इस घटना के बाद युवक को फौरन हिरासत में ले लिया गया

इस घटना की एक वीडियो भी सामने आई है। वीडियो में देखा जा सकता है कि पहले दीपक शर्मा उस जगह आते हैं, जहाँ संजय सिंह मीडिया से घिरे खड़े होते हैं। इसके बाद इंक की बोतल संजय सिंह पर फेंकते हुए कहते हैं- ‘PFI के दलालों वापस जाओ… वापस जाओ।’ दीपक के इतना करते ही भीड़ में खड़ा एक युवक उन्हें पकड़ कर संजय सिंह से दूर करता है और दोनों के बीच हल्की झड़प हो जाती है।

इतने पर भी दीपक शांत नहीं होते। उन्हें पकड़ने कई लोग उनके पीछे भागते हैं मगर वह तब भी नारे लगाते रहते हैं। वह आप के प्रतिनिधि मंडल को पीएफआई के गिद्ध कहते हैं। साथ ही आरोप लगाते हैं कि ऐसे लोग लाशों पर राजनीति कर रहे हैं।  जब पुलिस दीपक को पकड़ ले जा रही होती हैं, तब भी वह कहते हैं- लाशों की राजनीति बंद करो।

एनडीटीवी रिपोर्टर का दावा है कि यह घटना गाँव के ही बाहर घटी। गौरतलब है कि आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह और विधायक राखी बिड़लान 5 लोगों के डेलिगेशन के साथ पीड़ित परिवार से मिलने पहुँचे थे।

वहाँ उन्होंने मीडिया से बात करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती पर कई गंभीर आरोप लगाए। संजय सिंह ने हाथरस मामले में बसपा अध्यक्ष पर हमला बोलते हुए कहा कि मायावती और उनकी पार्टी इस मामले में भाजपा के मुखपत्र की तरह काम रही है।

संजय सिंह ने यह भी कहा कि आज प्रदेश के कोने-कोने में बेटियों के साथ दरिंदगी हो रही है, जो बताता है कि योगी आदित्यनाथ से प्रदेश नहीं सँभल रहा है, इसलिए उन्हें इस्तीफा देकर अपने मठ में वापस लौट जाना चाहिए। 

आप नेता ने कह कि जिस तरह से हाथरस मामले में वहाँ के जिलाधिकारी को बचाया जा रहा है, उससे भी साफ लग रहा है कि कहीं, मुख्यमंत्री की पोल ना खुल जाए, इसलिए जिलाधिकारी को सस्पेंड करने के बजाए बचाया जा रहा है।

DM-SP को माँ-बहन की गाली, CM योगी के लिए भी ‘गंदी बात’: दलित नेता हाथरस में ऐसे सेंक रहे राजनीतिक रोटी

उत्तर प्रदेश के हाथरस में हुई घटना का विरोध अभी तक जारी है। विरोध की आड़ में अनेक विपक्षी दल राजनीतिक रोटियाँ सेंकने का प्रयास कर रहे हैं। इस तरह की ख़बरें भी लगातार सामने आ रही हैं। ताज़ा मामले में एक दलित और पिछड़े वर्ग के नेता का वीडियो वायरल हो रहा है। वीडियो में कमल भारती नाम के नेता ने भरी सभा में बेहद अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया है।

उस नेता ने वीडियो के अंत में कई प्रशासनिक अधिकारियों समेत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी अत्यंत अभद्र टिप्पणी की। विडंबना यह है कि इतनी निम्न श्रेणी की बातें कहने के बाद नेता के आस-पास मौजूद लोग ताली बजा कर उन बातों की प्रशंसा कर रहे हैं।

कुलदीप शुक्ला नाम के इंटरनेट यूज़र ने यह वीडियो ट्विटर पर साझा किया। इसमें हाथरस और उत्तर प्रदेश के तमाम प्रशासनिक-पुलिस अधिकारियों को टैग किया गया है। वीडियो के कैप्शन में यह भी लिखा गया था, “यदि इन जैसों पर कार्यवाही नहीं हुआ तो पूरे उत्तर प्रदेश में मौहाल खराब हो सकता है, मायावती जी आप अपने नेताओं के जुबान को सुनो और निकाल भगाओ ऐसे लोगों को… थोड़ी सी भी इंसानियत हो तो दो शब्द बोलो कृपया संज्ञान लें।”

वीडियो में नेता ने अपना परिचय जिलाध्यक्ष अनुसूचित जाति प्रकोष्ट, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के रूप में दिया। वीडियो की शुरुआत में कमल भारती ने कहा:

“मेरी बहन की इज़्ज़त लूटी गई है तो मैं ठाकुरों की म#या की ऐसी की तैसी करता हूँ। मैं सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी का जिलाध्यक्ष हूँ अनुसूचित प्रकोष्ठ का, खुला चैलेंज देता हूँ कि जिस ठाकुर की माँ के गोद में अभी ताकत हो वह अपनी बहन बेटी को मेरे यहाँ ले आकर सुला दे। 1 करोड़ रुपया मैं उसको अपनी जायदाद बेच कर दूँगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो हाथरस का डीएम अपनी माँ चु# रहा था, वहाँ का एसपी अपनी बहन चु# रहा था। इस प्रदेश का मुख्यमंत्री अपनी माँ के यहाँ सो रहा था।”     

वीडियो चर्चा में आने के बाद पुलिस ने इस मामले का तत्काल प्रभाव से संज्ञान लिया। मऊ पुलिस ने कमल भारती के विरुद्ध धारा 153 ए, 504 और आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत मामला दर्ज कर लिया है। इसके अलावा पुलिस ने कमल भारती की गिरफ्तारी के 3 टीमों का गठन भी कर दिया है। पुलिस ने इस कार्रवाई की जानकारी ट्वीट के माध्यम से दी। 

इसके पहले कॉन्ग्रेस नेता निजाम मलिक ने भी हाथरस मामले पर विवादित बयान दिया था। निजाम मलिक ने कहा था कि जो हाथरस मामलों के आरोपित का सिर काट कर ले आएगा उसे उनके समुदाय की तरफ से 1 करोड़ रुपए का इनाम दिया जाएगा।

हाथरस मामले पर इस तरह के वीडियो सामने आने के बाद दंगों की साजिश के आरोप के दावे पुख्ता होते जा रहे हैं। प्रदर्शन की आड़ में सार्वजनिक रूप से इस तरह की अमर्यादित भाषा के उपयोग का उद्देश्य न्याय दिलाना कैसे हो सकता है। इसके पहले यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने इस घटनाक्रम पर बयान देते हुए कहा था कि विपक्ष राज्य में सांप्रदायिक दंगे भड़काने की कोशिश कर रहा है।

हत्या और कथित बलात्कार के मामले में विपक्ष द्वारा जारी विरोध-प्रदर्शनों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सीएम ने कहा, “जिसे विकास अच्छा नहीं लग रहा, वे लोग देश में और प्रदेश में भी जातीय दंगा, सांप्रदायिक दंगा भड़काना चाहते हैं। इस दंगे की आड़ में विकास रुकेगा। इस दंगे की आड़ में उनकी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए उनको अवसर मिलेगा, इसलिए नए-नए प्रकार के षड्यंत्र करते रहते हैं।”

बलात्कार आरोपितों की बीवियों को RJD का टिकट, तेजस्वी ने हाथरस पर कहा- 2 मिनट के लिए 1 मिनट का मौन रख लेते हैं

राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने बिहार विधानसभा चुनाव के लिए दो टिकट बलात्कार आरोपितों के परिवार में बाँटे हैं। उधर जदयू ने बाहुबलियों को टिकट न देने की बात करते हुए ददन पहलवान और गोपालगंज के अमरेंद्र पांडे का टिकट काट दिया है।

राजवल्लभ यादव नवादा से RJD के विधायक थे। फिलहाल बलात्कार के आरोप में जेल में बंद हैं। राजद ने इस बार उनकी पत्नी विभा देवी को टिकट दिया है। वर्ष 2016 में एक नाबालिग लड़की से हुए बलात्कार के मामले में राजवल्लभ यादव आरोपित हैं। उन पर 50,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया गया था। राजद उन्हें तो निलंबित कर चुकी है, लेकिन उनकी पत्नी को टिकट से नवाजा गया है।

पटना की एक अदालत ने राजवल्लभ यादव को नाबालिग से बलात्कार के मामले में सज़ा भी सुनाई थी। यादव समेत 5 आरोपतों के खिलाफ सजा मुक़र्रर की गई थी। वहीं भोजपुर जिले के सन्देश से विधायक अरुण यादव भी एक नाबालिग से बलात्कार के मामले में फरार चल रहे हैं। उनकी पत्नी किरण यादव को भी RJD ने अपना उम्मीदवार घोषित किया है

वहीं जदयू ने बक्सर जिले में अंजुम आरा को टिकट दिया है। कहा जा रहा है कि अमरेंद्र पांडे के परिवार में भी किसी को टिकट से नवाजा जा सकता है। पार्टी इससे पहले भी बाहुबलियों को टिकट देती आई है। वहीं राजद द्वारा दो बलात्कार आरोपित नेताओं के परिवार को टिकट दिए जाने के बाद से पार्टी की किरकिरी हो रही है, क्योंकि खुद तेजस्वी यादव भाजपा पर निशाना साधने के लिए हाथरस जैसे मामलों को भुना रहे हैं।

इधर राजद नेता तेजस्वी यादव ने हाथरस मामले में जिस तरह से संवेदनहीनता दिखाई है, उसे लेकर भी उनकी किरकिरी हो रही है। एक संवाददाता सम्मलेन में कॉन्ग्रेस नेता अविनाश पांडेय से तेजस्वी यादव ने कहा, “हाथरस में जो हुआ उसके लिए दो मिनट का मौन रख लेते हैं.. अच्छा सन्देश जाएगा..मनोज जी.. एक मिनट.. एक मिनट का मौन रख लेते हैं।” उनकी ये बात मीडिया कैमरों में रिकॉर्ड हो गई और सोशल मीडिया पर वायरल हो गई।

बंगाल में वहाबी कट्टपंथियों का बढ़ रहा प्रभाव, ‘जिहाद’ के लिए युवाओं की हो रही भर्ती: रिपोर्ट

पिछले महीने पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में अलकायदा के 7 आतंकी पकड़े गए थे। अब संडे गार्जियन के अनुसार इन आतंकियों के पकड़े जाने के बाद राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) के लिए पड़ताल का विषय यह है कि आखिर सीमावर्ती जिलों में ऐसे नेक्सस ने स्थानीय युवकों पर कितना प्रभाव डाला है और उन्हें किस हद तक उन्हें कट्टरपंथी बना दिया है।

जाँच एजेंसियों के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में कई छोटे-छोटे संगठन निकल कर सामने आए हैं जिनका काम नवयुवकों को अपने समूह में शामिल करना और उन्हें कट्टरपंथी बनाना होता है। ऐसे समूहों में युवकों को वहाबी के सिद्धांत पढ़ा कर जिहाद के लिए तैयार किया जाता है।

आतंकियों का खुलासा

संदिग्ध आतंकियों ने गिरफ्तार होने के बाद एनआईए की पूछताछ में खुलासा किया कि वह कई महत्वपूर्ण जगहों पर हमला करके बेगुनाहों को मारने वाले थे। रिपोर्ट बताती है कि ये आतंकी सीएए विरोधी प्रदर्शनों में भी शामिल हुए थे और इन्होंने सड़कों पर हमला बोलने के लिए भीड़ को भी जुटाया था।

एनआईए को अपनी पड़ताल में इन आतंकियों के पास से जिहादी लिट्रेचर, डिजिटल डिवाइस, धारदार हथियार आदि मिले हैं। संडे गार्जियन ने अपनी रिपोर्ट में एनआईए के सूत्रों का हवाला देते हुए कहा, “हम इस बारे में भी पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि ये लोग अपने संगठन में नए लोगों की भर्ती के लिए कैसे काम कर रहे थे। इसके अलावा, अगर बंगाल में किसी भी तरह के इनके ट्रेनिंग कैंप मौजूद हैं, तो उनका सरगना कौन है और कितने लोग उसमें शामिल हैं।”

मीडिया रिपोर्ट्स में एनआईए के सूत्रों का हवाला देकर यह भी बताया गया है कि सीएए विरोधी प्रदर्शनों के दौरान 6 आतंकियों को मुर्शिदाबाद में पिछले साल दिसंबर में तैनात किया गया था। वहाँ इन्होंने भीड़ को बड़े पैमाने पर आगजनी, दंगों और लूटपाट के लिए जुटाया था।

जनसांख्यिकीय बदलाव, बेरोजगारी और कट्टरपंथ की अवधारणा

पिछले कुछ सालों में पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में जनसांख्यिकीय (डेमोग्राफिक) बदलाव देखने को मिला है जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है। जाँच एजेंसियाँ मानती हैं कि कई कट्टरपंथियों और वहाबी मौलवियों ने भारत-बांग्लादेश बॉर्डर क्रॉस कर लिया है। वह ‘मजहबी लड़ाई’ के लिए भारत के स्थानीय मुस्लिम आबादी के साथ काम कर रहे हैं।

पिछले दिनों एनआईए ने 6 अलकायदा आतंकियों को पकड़ा था। वह कई कट्टरपंथियों के साथ बंगाल में काम कर रहे थे। जाँच एजेंसी ने जमात उल मुजाहिद्दीन बांग्लादेश के आतंकियों को भी देश के अलग-अलग कोनों से पकड़ा था। इन बातों का खुलासा होने के बाद ऐसा माना गया था कि हो सकता है शेख हसीना की सरकार बंगाल में कट्टरपंथियों को निशाना बना रही हो, जिस कारण वह भागकर बॉर्डर क्रॉस करके बंगाल आ रहे हो।

जाँच एजेंसियों का कहना है कि पश्चिम बंगाल के ग्रामीण इलाकों में बेरोजगारी की वजह से कट्टरपंथी मौलवियों के लिए युवाओं के बीच वहाबी मजहब की शिक्षा का प्रचार-प्रसार आसान हो गया है। वे प्रिंटेड सामग्री, व्हाट्सएप फॉरवर्ड, बैनरों को स्थानीय आबादी में प्रसारित कर रहे हैं। इनके जरिए युवाओं को भारत में इस्लामी शासन लाने के लिए साथ जुड़ने को ‘प्रेरित’ कर रहे हैं।

5 दिन में क्वारंटाइन से निकल हाथरस पहुँचे AAP के कोरोना+ विधायक कुलदीप कुमार, खतरे में डाली कई जिंदगियाँ

दिल्ली की कोंडली विधानसभा सीट से आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक कुलदीप कुमार की बड़ी गलती सामने आ रही है। कुलदीप कुमार ने 29 सितंबर को खुद को कोरोना पॉजिटिव बताया, लेकिन पाँच दिन के अंदर ही 4 अक्टूबर को राजनीति करने हाथरस पहुँच कर उन्होंने कई लोगों की जिंदगी दाँव पर लगा दी।

Kuldeep Kumar tested positive for coronavirus on 29th September 2020

AAP विधायक ने 29 अक्टूबर की दोपहर दो बजकर 29 मिनट पर एक ट्वीट किया। इस ट्वीट में उन्होंने लिखा है कि उनको हल्का बुखार हुआ जिसके बाद उन्होंने कोरोना टेस्ट कराया। टेस्ट की रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। उन्होंने लिखा कि वो घर पर ही आइसोलेट रहेंगे। इसके बाद उन्होंने 4 अक्टूबर को दूसरा ट्वीट करते हुए बताया कि वो हाथरस गैंगरेप पीड़िता के परिजनों से मिलने पहुँचे हैं।

उन्होंने क्वारंटाइन के सारे नियमों का उल्लंघन कर हाथरस की यात्रा की। इस दौरान वो अपनी पूरी यात्रा के बारे में ट्वीट करते रहे। हाथरस जाने के दौरान अपने पहले ट्वीट में उन्होंने लिखा, “हाथरस में हुए बर्बरतापूर्ण हत्याकांड से दुःखी होकर बहन मनीषा के परिवार से मिलने जा रहा हूँ।”

COVID-19 पॉजिटिव होने के एक हफ्ते भी नहीं हुए और उन्होंने 4 अक्टूबर को बड़ी भीड़ में लोगों को इकट्ठा किया और हाथरस जाने का फैसला किया।

फिर वह ट्वीट कर बताते हैं कि लगभग 1 घंटे के संघर्ष के बाद उन्हें पीड़ित परिवार से मिलने की अनुमति मिल गई है।

इसके बाद उन्होंने ट्वीट करते हुए बताया कि प्रशासन की अनुमति के बाद हाथरस में पीड़िता के परिवार से मिलने पहुँच गए हैं।

फिर उन्होंने एक अन्य ट्वीट करते हुए लिखा, “अभी हाथरस में पीड़ित परिवार से मिलकर लौटा हूँ। परिवार में डर और भय का माहौल पैदा किया जा रहा है। ये लोकतंत्र और संविधान की हत्या है। उत्तर प्रदेश में योगी राज में क़ानून नही जंगल राज चल रहा है!”

इस ट्वीट के साथ उन्होंने एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें वह पीड़ित परिवार के काफी नजदीक बैठे दिख रहे हैं। राजनीतिक रोटी सेंकने के चक्कर में उन्होंने इस बात को नजरअंदाज कर दिया कि वह घातक कोरोना वायरस महामारी से जूझ रहे हैं, जिस बीमारी ने देश में 1 लाख से अधिक लोगों की जानें ली हैं और 66 लाख से अधिक लोग संक्रमित हैं।

भाजपा दिल्ली यूनिट ने AAP विधायक के लापरवाह कदम की आलोचना की है और दूसरों के जीवन को जान-बूझकर जोखिम में डालने के लिए महामारी अधिनियम के तहत उनके खिलाफ कार्रवाई की माँग की है।

बीजेपी दिल्ली यूनिट ने ट्वीट करते हुए लिखा, 29 सितम्बर को केजरीवाल जी के विधायक अपने आप को कोरोना पॉजिटिव बता रहे हैं और 4 तारीख को सभी की जान जोख़िम में डालकर ये घटिया राजनीति करने हाथरस चले गए। कौन से प्रोटोकॉल के तहत ये 5 दिन में हाथरस गए? इन पर एपिडेमिक एक्ट के तहत तुरंत कार्यवाही होनी चाहिए।”

अब बड़ा सवाल ये है कि जब विधायक कोरोना से संक्रमित थे तो फिर वो परिजनों से मिलने क्यों पहुँचे। क्योंकि पॉजिटिव आने के बाद 15 दिन तक क्वारंटाइन होना होता है। उसके बाद टेस्ट कराना होता है। अगर टेस्ट रिपोर्ट निगेटिव है तभी आप बाहर निकल सकते हैं।

लेकिन AAP विधायक ने हाथरस की घटना को अपनी पार्टी के पक्ष में मोड़ने की जल्दबाजी में, क्वारंटाइन नियमों को तोड़ दिया और सकारात्मक परीक्षण के पाँच दिनों के बाद पीड़ित के परिवार से मिलने के लिए गाँव पहुँचे। 4 अक्टूबर को, विधायक ने खुद ट्विटर पर जानकारी दी कि वह पीड़ित परिवार से मिलने गाँव पहुँचे थे।

‘जिस्म की गर्मी’: बॉलीवुड के लिए रेप ऐसे जैसे कुछ हुआ ही नहीं, फिल्मों के जरिए यौन शोषण का किया जाता है महिमांडन

बॉलीवुड का लोगों के जीवन और उनके सोच-विचार पर अच्छा-खासा असर पड़ता है। चाहे फ़िल्मी कलाकारों की नक़ल करना हो, उनके डायलॉग्स बोलना हो या फिर उनका ड्रेसिंग स्टाइल कॉपी करना हो- बॉलीवुड का समाज पर खासा प्रभाव है। आज जब बलात्कार के मामलों को लेकर देश आक्रोशित है, हम ये सोचने में लगे हैं कि किस मानसिकता के तहत ऐसे अपराधों को अंजाम दिया जाता है।

बलात्कार के मामले जब-जब सुर्ख़ियों में आते हैं, तब-तब हम इस पर हो रही राजनीति की निंदा करते हैं, लेकिन हमारे समाज में बलात्कार इतना सामान्य क्यों बना दिया गया है, इस बारे में हम नहीं सोचते। अगर समाज में बलात्कार आज दुर्भाग्य से इतना सामान्य बना दिया गया है, तो इसके पीछे बॉलीवुड द्वारा दिखाई गई सामग्रियों को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। बॉलीवुड ने पूरे 70 और 90 के दशक में ‘जिस्मी की गर्मी’ की धारणा के जरिए रेप का सामान्यीकरण किया।

जब भी कोई बलात्कार या इसके प्रयास या फिर किसी महिला को बुरी नज़र से देखता है तो फिल्मों में इसी धारणा का प्रयोग किया गया। बलात्कार जैसे घृणित अपराध को ‘जिस्म की गर्मी’ का नाम देकर इसे नॉर्मल बना दिया गया। ट्विटर हैंडल ‘जेम्स ऑफ बॉलीवुड’ ने कई वीडियो के जरिए बताया है कि कैसे बॉलीवुड में बड़ी-बड़ी फिल्मों में भी बलात्कार को एक सामान्य घटना बना कर रख दिया गया।

साथ ही इन फिल्मों में महिलाओं को भी एक ऑब्जेक्ट की तरह पेश किया गया। इसी तरह की एक फिल्म है ‘आ गले लग जा (1973)’, जिसमें शशि कपूर अस्वस्थ शर्मिला टैगोर को ठीक करने की कोशिश करते हैं, लेकिन जब कुछ भी काम नहीं आता है तो कपड़े उतारकर ‘जिस्म की गर्मी देते’ हैं। इसमें दिखाया जाता है कि ‘साथ में सो कर जिस्म की गर्मी ट्रांसफर की जा सकती है, जिससे उसकी जान बच सकती है।

इसके बाद शशि कपूर एक कम्बल डालते हैं और कपड़े उतार कर शर्मिला टैगोर के साथ सोते हैं और ‘प्यार’ करते हैं। यहाँ बड़े आराम से ”जिस्म की गर्मी’ के जरिए बलात्कार को ठीक बताने की कोशिश की गई है। बाद में शर्मिला टैगोर भी कहती हैं कि एक जान बचाने की कोई कीमत नहीं है, वो भी शशि की जगह रहती तो यही करती। इस तरह से बेहोश महिला के बलात्कार को फिल्म में सही ठहराया गया।

इसी तरह की एक फिल्म ‘बदले की आग (1982)’ में सुनील दत्त इसी तरह की एक परिस्थिति में पड़ते हैं। अभिनेत्री रीना रॉय को बुखार है और वो बेहोश होती हैं। जब बात नहीं बनती है तो वो अभिनेत्री के कपड़े उतार कर फेंक देते हैं और ‘जिस्म की गर्मी’ ट्रांसफर करते हैं। बाद में अभिनेता इसे सही ठहराता है और अभिनेत्री को भी इससे कोई समस्या नहीं होती है। यहाँ भी बलात्कार का महिमामंडन किया गया है।

इसी तरह की फिल्म ‘गंगा यमुना सरस्वती (1988)’ की एक फिल्म में अमिताभ बच्चन का किरदार मीनाक्षी शेषाद्रि के किरदार का बलात्कार करते हैं और इसके लिए भी इसी बहाने के जरिए इसे ठीक ठहराने की कोशिश होती है। 1991 में आई अक्षय कुमार की ‘सौगंध’ में यही दिखाया गया है। बाद में गुस्से में अभिनेत्री को अक्षय का दोस्त कहता है कि उसने उसकी जान बचाने के लिए ऐसा किया और यहाँ भी इसे ठीक ठहराया गया है।

इसी तरह की एक फिल्म ‘बेनाम बादशाह’ में अनिल कपूर जूही चावला का रेप करते हैं। उसे 5000 रुपए दिए गए होते हैं, अभिनेत्री की शादी की रात ही बलात्कार करने के लिए। इसमें एक डायलॉग है, “दाग मिट सकता है, अगर दाग लगाने वाला सिंदूर लगा दे“, जिसके जरिए रेप को जस्टिफाई किया गया है। फिल्मों में यह सिलसिला लंबे समय से चलता आ रहा है।

सुशांत ‘चरित्रहीन’, मीडिया ‘हरामखोर’… बिल में है कंगना, गुप्तेश्वर को ‘गुप्तरोग’: शिवसेना ने सामना से दिखाया स्तर

शिवसेना के मुखपत्र सामना ने आज (अक्टूबर 5, 2020) अपने संपादकीय में सुशांत सिंह राजपूत को असफल और चरित्रहीन कलाकार बताया है। अपने संपादकीय में सामना ने कहा है कि बीते दिनों बिहार के पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे को महाराष्ट्र द्वेष का गुप्तरोग हो गया था और देश के कई अन्य ‘गुप्तेश्वरों’ को (जो महाराष्ट्र पुलिस या सरकार पर सवाल उठा रहे थे) भी यह रोग हो गया था।

एम्स की रिपोर्ट का हवाला देकर महाराष्ट्र सरकार और पुलिस कार्रवाई की निष्पक्षता पर सवाल उठाने वालों के खिलाफ इस संपादकीय में मानहानि का मामला दर्ज कराने की बात कही गई है। इसमें पूछा गया है कि जिस ‘एम्स’ पर देश के गृह मंत्री को विश्वास है, उस ‘एम्स’ ने सुशांत मामले में जो रिपोर्ट दी है, उसे अंधभक्त नकारेंगे क्या?

लेख में कहा गया कि कलाकार (सुशांत) की मृत्यु को 110 दिन बीत गए हैं और इस दौरान मुंबई पुलिस की खूब बदनामी की गई। इसलिए मुंबई पुलिस की जाँच पर जिन्होंने सवाल उठाए, उन राजनेताओं को और कुत्तों की तरह भौंकने वाले चैनलों को महाराष्ट्र से माफी माँगनी चाहिए। वहीं महाराष्ट्र सरकार उन लोगों के ख़िलाफ़ मानहानि का दावा करे, जिन्होंने उनकी छवि पर कलंक लगाने का प्रयास किया।

सामना में प्रकाशित लेख के मुताबिक सीबीआई जाँच से यह पता चला है कि सुशांत एक चंचल और चरित्रहीन कलाकार थे। इसके अलावा उसमें यह भी लिखा है कि अगर पुलिस को इसकी जाँच करने दी जाती तो शायद सुशांत और उसके परिवार की रोज बेइज्जती होती। इसलिए बिहार राज्य व सुशांत के परिवार को उन लोगों का आभार मानना चाहिए।

सामना का कहना है कि नीतीश कुमार ने इस मुद्दे को उठवाया और पुलिस महानिदेशक गुप्तेश्वर को वर्दी में नचाया। बाद में आखिरकार वह नीतीश कुमार की पार्टी में शामिल हो गए, इससे उनकी वर्दी भी चली गई।

इस लेख में मीडिया वालों के लिए भी अपशब्द का इस्तेमाल हुआ है। लेख में कहा गया, “खुद को पत्रकारिता में हरिश्चंद्र का अवतार समझने वाले हकीकत में हरामखोर और बेईमान निकले। उन बेईमानों के विरोध में मराठी जनता को एक बड़ी भूमिका लेनी चाहिए।”

इस संपादकीय में प्रत्यक्ष रूप से बिहार के पूर्व डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे पर निशाना साध कर मुंबई पुलिस का बखान किया गया। इसमें लिखा गया, “मुंबई पुलिस ने जो जाँच की, उस सच को सीबीआई और ‘एम्स’ के डॉक्टर भी नहीं बदल सके। यह मुंबई पुलिस की जीत है। कई गुप्तेश्वर आए और गए। लेकिन मुंबई पुलिस की प्रतिष्ठा का झंडा लहराता रहा।”

इसमें साफ-साफ कहा गया कि अगर मृत्यु के बाद भी मुकदमा दायर करने की कोई कानूनी व्यवस्था होती तो कलाकार पर ड्रग्स मामले में मादक पदार्थ सेवन का मुकदमा चलाया जाता।

इसके बाद कंगना रनौत के पीओके वाले बयान की चर्चा भी इस लेख में है। इसमें पूछा गया:

“सुशांत की मौत को जिन्होंने भुनाया, मुंबई को पाकिस्तान और बाबर की उपमा दी, वह अभिनेत्री अब किस बिल में छिपी है? हाथरस में एक युवती से बलात्कार करके मार डाला गया। वहाँ की पुलिस ने उस युवती के शरीर का अपमान करके अंधेरी रात में ही लाश को जला डाला। इस पर उस अभिनेत्री ने आँखों में ग्लिसरीन डालकर भी दो आँसू नहीं बहाए। जिन्होंने उस लड़की से बलात्कार किया, वे उस अभिनेत्री के भाई-बंधु हैं क्या? जिस पुलिस ने उस लड़की को जलाया, वे पुलिसकर्मी उस अभिनेत्री के घरेलू नौकर हैं क्या?”

लेख के आखिर में महाराष्ट्र व मराठी मानुस के रास्ते में आने वाले इंसान को खुलेआम धमकी दी गई और कहा गया कि जो भी महाराष्ट्र व मराठी मानुस के रास्ते में आएगा, उसका बर्बाद होना तय है। आगे फिर बेईमान और हरामखोर कहकर हाथरस मामले पर चुप रहने वालों से ये कहा गया कि महाराष्ट्र की मर्दानगी की परीक्षा न लें।

दंगे कराने, हिन्दुओं में फूट डालने की साजिश: हाथरस पर मोदी-योगी सरकार को बदनाम करने के लिए इस्लामी मुल्कों की फंडिंग

हाथरस मामले में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ-साथ देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी बदनाम करने की बड़ी साजिश रची गई थी। ख़ुफ़िया एजेंसियों को इस मामले में बड़े सुराग हाथ लगे हैं। इसके लिए एमनेस्टी इंटरनेशनल के साथ-साथ कई इस्लामी मुल्कों ने भी फंडिंग की थी। रातोंरात ‘जस्टिस फॉर हाथरस’ नाम से एक वेबसाइट भी बना ली गई थी। इस वेबसाइट पर विरोध प्रदर्शन की आड़ में देश-प्रदेश में दंगे करने और उसके बाद उससे बचने के तौर-तरीके बताए गए थे।

अफवाहों का बाजार गर्म करने के लिए मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया का भी भरपूर उपयोग किया गया था। ख़ुफ़िया एजेंसियों के अनुसार, ‘जस्टिस फॉर हाथरस’ नामक वेबसाइट को एक साजिश के तहत सुर्ख़ियों में लाया गया और हजारों लोग देखते ही देखते इससे जुड़ गए। इस वेबसाइट से जुड़े लोगों में से अधिकतर की आईडी फर्जी निकली है। इस वेबसाइट के डिटेल्स खँगालने के बाद इस मामले में और भी खुलासे हो सकते हैं।

‘न्यूज़ 18’ की खबर के अनुसार, जिस तरह से अमेरिका में अश्वेत नागरिक जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद दंगे भड़क गए थे, ठीक उसी तरह से उत्तर प्रदेश को दंगों की आग में झोंकने की तैयारी थी। मुस्लिम मुल्कों और इस्लामी कट्टरपंथी संगठनों ने हिन्दू समुदाय में फूट डालने के लिए फंडिंग की थी। ये भी सामने आया है कि हाथरस पर बनाई गई वेबसाइट के पीछे सीएए विरोधियों और देशविरोधी तत्वों का हाथ था, जो मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बदला लेना चाहते थे।

साथ ही कोरोना वायरस की आड़ में पुलिस-प्रशासन से बचने के ‘नुस्खे’ भी इस वेबसाइट पर बताए गए थे। इस पर बताया गया था कि चेहरे पर मास्क लगा कर दंगे करने के बाद पुलिस-प्रशासन से बचा जा सकता है क्योंकि आजकल मास्क लगाना अनिवार्य भी है। साथ ही हिन्दू समुदाय में फूट डालने और उत्तर प्रदेश को नफरत की आग में झोंकने की ‘तरकीबें’ समझाई गई थीं। वेबसाइट पर कई अन्य आपत्तिजनक सामग्रियाँ भी थीं।

इस वेबसाइट पर ‘वॉलंटियर्स’ की मदद से हेट स्पीच और भड़काऊ राजनीति करने के लिए कई सामग्रियाँ तैयार की गई थीं, ताकि देश विरोधी तत्व इसका फायदा उठा सकें। पूरी स्क्रिप्ट तैयार करने और इसकी फंडिंग में पीएफआई और एसडीपीआई जैसे संगठनों का नाम सामने आ रहा है। रविवार (अक्टूबर 4, 2020) की देर रात जैसे ही पुलिस का तलाशी अभियान और छापेमारी शुरू हुई, ये वेबसाइट अचानक से बंद हो गया।

इसके लिए फेक न्यूज़ की एक बड़ी खेप तैयार की गई थी। साथ ही फोटोशॉप्ड तस्वीरें भी डाली गई थीं, जिन्हें वायरल कर नफरत का माहौल बनाया जा सके। दंगे भड़काने के लिए छेड़छाड़ किए हुए विजुअल्स का इस्तेमाल भी किया गया था। इसमें ये भी समझाया गया था कि पुलिसकर्मियों को कैसे निशाना बनाया जाए। इसके लिए मीडिया संस्थानों और सोशल मीडिया के एकाउंट्स का भी इस्तेमाल किया गया।

इससे पहले खबर आई थी कि हाथरस के पीड़ित परिवार को सरकार के खिलाफ भड़काने की साजिश के मामले में सबूत के तौर पर कई ऑडियो टेप पुलिस के हाथ लगे हैं। जाँच एजेंसियों ने ऑडियो टेप का संज्ञान लेकर जाँच शुरू कर दी है। ऑडियो टेप में कुछ राजनीतिक दलों के साथ ही कुछ पत्रकारों की भी आवाज शामिल है। इन ऑडियो टेप से पीड़ित परिवारों को सरकार के खिलाफ भड़काने के लिए 50 लाख से लेकर एक करोड़ रुपए तक का लालच दिया गया।

कॉन्ग्रेस MLA के 15 ठिकानों पर CBI की रेड, ईसा मसीह की सबसे बड़ी मूर्ति के लिए जमीन दे कर आए थे चर्चा में

कर्नाटक में पिछले साल ईसा मसीह की सबसे ऊँची मूर्ति का निर्माण करने के लिए जमीन व निजी कोष से 10.80 लाख रुपए देकर विवादों में आने वाले कॉन्ग्रेस विधायक डीके शिवकुमार के घर में सोमवार (अक्टूबर 5, 2020) को सीबीआई की रेड पड़ी। उन पर भ्रष्टाचार का आरोप है। सीबीआई ने उनके 15 ठिकानों पर रेड मारी।

इन ठिकानों में उनके भाई व सासंद डीके सुरेश का घर भी शामिल है। इसके अलावा उनके पूर्व निवास डोड्डालहल्ली, कनकपुरा और सदाशिव नगर में भी सीबीआई ने रेड मारी। अधिकारियों ने कहा कि इन 15 ठिकानों पर कम से कम 60 अधिकारी छापेमारी कर रहे हैं

जानकारी के मुताबिक, सीबीआई ने छापेमारी सुबह 6 बजे कनकपुरा निर्वाचन क्षेत्र के डोड्डालहल्ली गाँव में स्थित विधायक शिवकुमार के निवास से शुरू की थी। बता दें कि सीबीआई ने कर्नाटक सरकार में मंत्री रहे डीके शिवकुमार और अन्य लोगों के खिलाफ अनुपातहीन संपत्ति के अधिग्रहण के आरोप में मामला दर्ज किया है और इसी संबंध में सीबीआई की टीम कर्नाटक, दिल्ली और मुंबई के ठिकानों पर छापेमारी कर रही है। 

सीबीआई रेड की सूचना पाते ही पार्टी नेताओं ने इसका विरोध शुरू कर दिया। कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने ट्वीट कर कहा, “मोदी और येदियुरप्पा की जोड़ी डराने-धमकाने का खेल अपनी कठपुतली सीबीआई के द्वारा डीके शिवकुमार के यहाँ छापेमारी करवा कर कर रही है, लेकिन ये हमें नहीं रोक सकता है। सीबीआई को येदियुरप्पा सरकार में भ्रष्टाचार की परतों का पता लगाना चाहिए। लेकिन, ‘रेड राज’ उनकी एकमात्र ‘कपटपूर्ण चाल’ है!”

उन्होंने कहा, “मोदी व येदियुरप्पा सरकार और भाजपा के फ्रंटल संगठन यानी सीबीआई-ईडी-इनकम टैक्स को पता है कि इस तरह के कुटिल प्रयासों से कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं और नेताओं को न तो डराया जा सकता है और न ही झुकाया जा सकता है। हम लोगों के लिए लड़ने का संकल्प लेते हैं।”

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता सिद्धारमैया ने भी इस सीबीआई छापे की निंदा की। उन्होंने ट्वीट कर कहा, “भाजपा ने हमेशा से ही प्रतिशोधी राजनीति में लिप्त होने और जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश की है। डीके शिवकुमार के घर पर सीबीआई का हालिया छापा उपचुनावों के लिए हमारी तैयारी को पटरी से उतारने का एक और प्रयास है। मैं इसकी कड़ी निंदा करता हूँ।”

गौरतलब है कि पिछले साल कर्नाटक के पूर्व मंत्री और वरिष्ठ कॉन्ग्रेस के विधायक डीके शिवकुमार ने बेंगलुरु से 50 किमी दूर अपने कनकपुरा विधानसभा क्षेत्र के लोगों को क्रिसमस के तोहफ़े के रूप में ईसा मसीह की सबसे ऊँची प्रतिमा बनाने के लिए 10 एकड़ ज़मीन दी थी। इसकी क़ीमत उन्होंने अपने निजी कोष से 10.80 लाख रुपए देकर चुकाई थी।

इस खबर के आने के बाद येदियुरप्पा सरकार ने पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी द्वारा स्वीकृत भूमि की फिर से जाँच करने का फ़ैसला किया था। राजस्व मंत्री आर अशोका ने कहा था कि आवंटित भूमि गोमला (चारागाह के तौर पर इस्तेमाल होने वाली सामुदायिक ज़मीन) है, न कि एक बंजर भूमि, जिसका दावा शिवकुमार ने किया था। उन्होंने कहा था, “मैंने रामनगर ज़िले के डिप्टी कमिश्नर को भूमि आवंटन पर एक रिपोर्ट सौंपने के लिए कहा है।”

बता दें कि साल 2017 में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने डीके शिवकुमार के कई ठिकानों पर छापेमारी की थी। दिल्ली में उनके करीबी के ठिकाने से करीब 8 करोड़ रुपए नकद भी मिले थे। इसके बाद इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने चार्जशीट दायर की थी। इस चार्जशीट के आधार पर ईडी ने शिवकुमार के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज किया था।