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आरोपितों की गिरफ्तारी, हिंसा की अंतरराष्ट्रीय साजिश और पॉलिटिकल प्रोपेगेंडा: हाथरस केस में दर्ज FIR की डिटेल

उत्तर प्रदेश पुलिस ने हाथरस की घटना के संबंध में कई एफआईआर दर्ज की है। यहाँ पिछले सप्ताह मंगलवार को एक 19 वर्षीय पीड़िता की मौत हो गई थी। इस संदर्भ में पुलिस ने एक प्रेस स्टेटमेंट जारी किया है। इस स्टेटमेंट में मामले में कई व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज की गई विभिन्न एफआईआर की जानकारी दी गई है।

उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि पीड़िता के भाई की गवाही के आधार पर आरोपितों को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद 3 सदस्यीय एसआईटी जाँच का आदेश दिया गया और फिर मामले में सीबीआई जाँच की सिफारिश की गई है। इसके बावजूद कुछ संगठन और निहित स्वार्थ वाले व्यक्ति सरकार की छवि को धूमिल करने के लिए जातीय और सांप्रदायिक हिंसा फैलाने पर आमादा हैं।

इसके लिए वे विभिन्न सोशल मीडिया वेबसाइटों पर बिना सोचे-समझे और फर्जी दावे पोस्ट कर रहे थे और सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन में भाग लेने के लिए COVID-19 के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करते हुए गैरकानूनी तरीके से गाँव के बाहर लोगों को इकट्ठा कर रहे थे।

इस संबंध में पुलिस द्वारा कई FIR दर्ज की गई हैं। यूपी पुलिस द्वारा उनकी प्रेस रिलीज में शेयर की गई जानकारी इस प्रकार हैं-

जातीय हिंसा को बढ़ावा देने के लिए अंतरराष्ट्रीय साजिश रचने पर FIR

यह सामने आने के बाद कि हाथरस की घटना पर विरोध-प्रदर्शन करने के बहाने उत्तर प्रदेश में दंगे भड़काने के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय साजिश रची जा रही है, यूपी पुलिस ने हाथरस में जाति आधारित दंगों की साजिश रचने के लिए एक प्राथमिकी दर्ज की।

हाथरस पुलिस स्टेशन में विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया गया है, जिसमें राज्य में जातीय और सांप्रदायिक दंगों की साजिश रचने, अराजकता फैलाने, दंगा करने के बहाने योगी सरकार को बदनाम करना, अफवाहें फैलाना, पीड़ित परिवार को योगी सरकार के खिलाफ भड़काना, फर्जी फोटो, फर्जी सूचना, फोटोशॉप्ड तस्वीरों के जरिए नफरत फैलाना शामिल है। 

पुलिस ने इस संबंध में आईपीसी की धारा 109, 120 (बी), 124-ए, 153-ए, 153-ए (1), 153-ए (1) (ए), 153-ए (1) b), 153-A (1) (c), 153-B, 195, 195-A, 465, 468, 469, 501, 505 (1), 505 (1) (b), 505 (1) (c) ), 505 (2), और 67 के तहत FIR दर्ज की है।

पीड़ित और उसके परिवार के बारे में प्रोपेगेंडा वीडियो प्रसारित करने के लिए एक राजनीतिक प्रतिनिधिमंडल के खिलाफ FIR दर्ज

यूपी पुलिस ने एक राजनीतिक दल के प्रतिनिधिमंडल के खिलाफ हाथरस के चंदपा पुलिस स्टेशन में एक प्राथमिकी दर्ज की है, जिन्होंने मृतका के घर का दौरा किया था। पुलिस ने उन पर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मृतका के परिजनों का प्रोपेगेंडा आधारित वीडियो/ऑडियो प्रसारित करने का आरोप लगाया। उन पर भादवि की धारा- 147, 148, 323, 504, 332, 353, 427, 188 और सीएलए अधिनियम 7 के तहत आरोप लगाए गए हैं।

एक राजनीतिक दल के सदस्यों के खिलाफ हंगामा करने और पुलिस अधिकारियों पर पथराव करने के लिए FIR दर्ज की गई

मामले में तीसरी FIR एक पार्टी के राजनीतिक सदस्यों के अनधिकृत दौरे से संबंधित है। पुलिस के अनुसार, राजनीतिक दल के प्रतिनिधिमंडल की बैठक के बाद पार्टी के कई सदस्यों और समर्थकों ने बिना अनुमति के गाँव में प्रवेश किया और धारा 144 का उल्लंघन किया। उन पर कानून प्रवर्तन अधिकारियों को गाली देने और उनके साथ हाथापाई करने का भी आरोप है। राजनीतिक पार्टी समर्थकों द्वारा उन पर पथराव करने के बाद कई पुलिस अधिकारी घायल हो गए। उन पर भादवि की धारा -148, 148, 323, 504, 332, 353, 427, 188 और सीएलए अधिनियम 7 के तहत आरोप लगाए गए हैं।

भड़काऊ भाषण वाले वीडियो प्रसारित करने के लिए FIR

उत्तर प्रदेश पुलिस ने एक राजनीतिक पार्टी के एक सदस्य के खिलाफ सार्वजनिक रूप से एक वीडियो प्रसारित करने के लिए एक एफआईआर दर्ज की, जिसमें भड़काऊ बयान दिए गए। इस भाषण में पुलिसकर्मियों का हाथ काटने, पुलिस अधिकारियों को निलंबित करना और जाति/समुदायों के बीच सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ना आदि शामिल था। आरोपित के खिलाफ भादवि की धारा-153 ए, 505, 506, 489 और आईटी एक्ट की धारा 84 सी के तहत मामला दर्ज किया गया है।

धारा 144 का उल्लंघन करने और यातायात अवरुद्ध करने के लिए भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद और 400-500 अन्य के खिलाफ FIR दर्ज

हाथरस में मार्च करते हुए पीड़िता के परिजनों से मिलने के लिए जाने के दौरान भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद और 400-500 अन्य के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 144 का उल्लंघन करने के लिए FIR दर्ज की गई। आजाद और उनके समर्थकों ने पुलिस के लिए कानून और व्यवस्था की स्थिति पैदा कर दी थी, क्योंकि उन्होंने जबरन गाँव में घुसने और पीड़ित के रिश्तेदारों से मिलने की कोशिश की थी। जब उन्हों रोका गया, तो वे सड़क पर यातायात बाधित कर प्रदर्शन पर बैठ गए, जिसके बाद उनके खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज की गई।

कोविड-19 के दिशा-निर्देशों और सीआरपीसी की धारा 144 के उल्लंघन के लिए लगभग 200 लोगों के खिलाफ FIR

उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा बसंत बाग कॉलोनी में कोविड-19 के दिशा-निर्देशों और सीआरपीसी की धारा 144 का उल्लंघन कर बड़ी संख्या में इकट्ठा होने के लिए लगभग 200 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया।

इसके अलावा, बिजनौर, सहारनपुर, बुलंदशहर, प्रयागराज, हाथरस और अयोध्या जैसे जिलों में विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफार्मों पर आपत्तिजनक पोस्ट करने की शिकायतें दर्ज की गईं। कम से कम 5 लोगों को गिरफ्तार किया गया है और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू की गई है।

पुलिस ने कमिश्नरेट लखनऊ में विवादित पोस्टर लगाने के लिए एक व्यक्ति के खिलाफ मामला भी दर्ज किया था। इस संबंध में एक व्यक्ति को पुलिस ने गिरफ्तार किया था।

फेसबुक पर आपत्तिजनक पोस्ट अपलोड करने के आरोप में लखनऊ ग्रामीण में गिरफ्तारी की गई है। वहीं मथुरा में कैम्पस फ्रंट ऑफ इंडिया के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के कोषाध्यक्ष को 3-4 अन्य पदाधिकारियों के साथ सीआरपीसी की धारा 151 के तहत प्रतिबंधित किया गया है।

बंगाल: बीजेपी नेता की हत्या की सीआईडी करेगी जाँच, पुलिस स्टेशन के पास मनीष शुक्ला को मारी गई थी गोली

भाजपा नेता मनीष शुक्ला की कथित तौर पर तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों द्वारा की गई हत्या के एक दिन बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने मामले की जाँच सीआईडी को सौंप दी है। इसके पहले मामले की जाँच बैरकपुर का पुलिस विभाग कर रहा था। भाजपा पार्षद व वकील मनीष शुक्ला की रविवार (अक्टूबर, 4 2020) को उत्तर परगना जिले में गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। 

यह घटना बैरकपुर क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले टीटागढ़ पुलिस स्टेशन के सामने हुई थी। घटना उस वक्त हुई जब वह एक कार्यक्रम में शामिल होने के बाद पार्टी कार्यालय गए थे। जैसे ही वह कार्यालय में दाखिल हुए वैसे ही बाइक सवार अपराधी आए और उन पर गोलीबारी कर दी। चश्मदीदों के मुताबिक़ उन्हें बहुत नज़दीक से गोली मारी गई थी।

इस बात की जानकारी सामने आने के बाद पश्चिम बंगाल की भाजपा इकाई ने रोष जताया। संगठन का कहना था कि उन्हें तृणमूल सरकार के अंतर्गत काम करने वाली पुलिस पर भरोसा नहीं है। भाजपा की तरफ से इस मुद्दे पर असहमति का एक सबसे बड़ा कारण है, पिछले कुछ समय में वहाँ पार्टी के कई कार्यकर्ताओं की अप्राकृतिक मृत्यु हुई है जिसे राज्य की पुलिस ने आत्महत्या घोषित कर दिया या उस पर कोई नतीजा नहीं निकला। इन बातों को मद्देनज़र रखते हुए भाजपा ने इस मामले में सीबीआई जाँच की माँग की है। 

भाजपा नेता की हत्या के बाद पैदा हुए जनता के आक्रोश और राजनीतिक उथल-पुथल के बाद पश्चिम बंगाल की पुलिस ने ट्विटर पर सफाई पेश की। मामले में निजी दुश्मनी के पहलू पर जाँच करने का दावा करते हुए पश्चिम बंगाल पुलिस ने लिखा, “एक व्यक्ति को बैरकपुर स्थित टीटागढ़ क्षेत्र में शाम के वक्त गोली मार दी गई थी। पुलिस इस मामले में हर पहलू की जाँच कर रही है। जिसमें निजी दुश्मनी भी शामिल है, क्योंकि मृतक तमाम हत्या और हत्या के प्रयासों के मामले में आरोपित था।”

इसके अलावा पुलिस ने नेटीजन्स के लिए अप्रत्यक्ष चेतावनी भी जारी कि वह किसी भी तरह की गैर ज़िम्मेदार टिप्पणी न करें। ट्वीट में कहा है, “जाँच पूरी होने से पहले किसी भी नतीजे पर मत आइए। सोशल मीडिया में इस मामले पर किसी भी तरह की टिप्पणी करना जाँच में दखलंदाज़ी करने जैसा माना जाएगा। कृपया इससे बचने का प्रयास करें।”

पश्चिम बंगाल पुलिस विभाग द्वारा किया गया ट्वीट

सोमवार (5 अक्टूबर 2020) को भाजपा कार्यकर्ता नील रतन सरकार अस्पताल के सामने इकट्ठा हुए, जहाँ मृतक का शरीर रखा गया था। कार्यकर्ताओं का कहना था कि शरीर उनके हवाले किया जाए। पार्टी ने इस बात की जानकारी दी कि वह अपने कार्यकर्ता का शव कोलकाता से ले जाना चाहते थे।

पार्टी के वरिष्ठ नेता ने एबीपी न्यूज़ से बात करते हुए कहा, “पुलिस अधिकारी इस मामले में हमारा सहयोग नहीं कर रहे हैं। जब तक हमारी बात नहीं सुनी जाती हम यहाँ से हिलने वाले नहीं हैं। यह लोग (टीएमसी) मामले को दबाना चाहते हैं पर हमने अपना नेता खोया है। इसके पहले इन लोगों ने अर्जुन सिंह को निशाना बनाया था। जो भी टीएमसी का साथ छोड़ता है वह तुरंत इनके निशाने पर आ जाता है। यह लोग या तो उस नेता की हत्या करवा देते हैं या फिर उसके विरुद्ध झूठे मामले दर्ज करवाते हैं। पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र नहीं रह गया है।”

पुलिस ने भाजपा कार्यकर्ताओं की माँगों को भी सिरे से खारिज कर दिया था। पुलिस ने अस्पताल के लगभग हर गेट पर बैरीकेडिंग लगा दी थी, सिर्फ एम्बुलेंस और मरीजों को भीतर दाखिल होने की अनुमति दी थी। रविवार की शाम भाजपा कार्यकर्ताओं ने 24 परगना को कोलकाता से जोड़ने वाली जीटी रोड को भी जाम कर दिया था। 

पश्चिम बंगाल में भाजपा नेताओं की हत्या, रहस्यमयी परिस्थितियों में मृत्यु अपने चरम पर है। राज्य में राजनीतिक हिंसा का इतिहास दशकों पुराना है। हाल ही में रॉबिन पॉल नाम के भाजपा कार्यकर्ता की कलन स्थित पथर घाटा गाँव में लिंचिंग कर दी गई थी। 

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पहले उसे टीएमसी समर्थकों ने बुरी तरह मारा और इसके बाद वह रॉबिन को दूसरे गाँव में लेकर गए, जहाँ टीएमसी के डिप्टी चीफ ने उसकी बुरी तरह पिटाई की। उसके परिवार वालों का आरोप था कि घटना के दौरान जब रॉबिन को उसकी बेटी ने पानी देने का प्रयास किया, तब टीएमसी के कार्यकर्ताओं ने उसे ऐसा करने से रोका। वह इतने पर ही रुके नहीं उन्होंने उसकी बेटी को धमकी भी दी।

13 जुलाई को पुलिस ने हेमताबाद से विधायक देबेन्द्र नाथ रॉय का शव बरामद किया था। पुलिस ने भाजपा विधायक का शव राजीगंज की बिंदोल पंचायत स्थित बलिया गाँव से बरामद किया था। उनका शव दुकान की छत से लटका हुआ पाया गया था और वह पिछली रात से लापता थे। पुलिस ने इस मामले में लापरवाही भरे रवैये से काम किया था, जबकि भाजपा कार्यकर्ताओं का कहना था कि विधायक देबेन्द्र नाथ रॉय की हत्या हुई है। 

इस मामले पर भाजपा अध्यक्ष (उत्तरी दिनाजपुर) का कहना था कि सुसाइड नोट कथित हत्यारे नेताओं को बचाने के लिए पुलिस द्वारा रचा गया षड्यंत्र है। उनका कहना था, “हम इस मामले में सीआईडी द्वारा की गई जाँच से संतुष्ट नहीं हैं और सीबीआई जाँच की ही माँग करते हैं।”     

13 साल की दलित से आलम ने की रेप की कोशिश, आग के हवाले कर भाग गया

तेलंगाना के खम्मम जिले में एक 13 वर्षीय दलित को आग के हवाले कर दिया गया। नाबालिग दलित लड़की एक घर में घरेलू सहायिका का काम करती थी। एक दिन घर के मालिक के बेटे ने उसके साथ रेप करने की कोशिश की, इनकार करने पर उसने उसे आग में झोंक दिया। लड़की 70 प्रतिशत जल चुकी है और एक अस्पताल में जीवन के लिए जूझ रही है।

शुरुआती जानकारी के अनुसार, घटना 18 सितंबर को हुई थी जिसके बाद लड़की के मालिक ने उसे एक निजी अस्पताल में भर्ती करवाया और उसके माता-पिता से घटना की सच्चाई छुपाई।

सोमवार (अक्टूबर 5, 2020) को लड़की ने अपने पिता को बताया कि घटना वाले दिन वास्तव में क्या हुआ था। पीड़िता द्वारा बताए जाने के बाद उन्होंने खम्मम के वन टाउन पुलिस में शिकायत दर्ज की, जिसके बाद मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दी गई है।

जानकारी के मुताबिक लड़की खम्मम जिले के पललीगुडेम गाँव की है। उसने इसी साल मई में आलम सुब्बाराव के घर में काम करना शुरू किया था। वो आलम सुब्बाराव के घर में ही रहती थी।

कुछ दिनों पहले आलम सुब्बाराव ने लड़की के पिता को फोन किया और बताया कि उनकी बेटी काम के दौरान आग लगने से घायल हो गई। जब पीड़िता के पिता अस्पताल पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि पीड़िता गंभीर रूप से जल गई थी और वह अचेत अवस्था में था।

सोमवार को लड़की को होश आया और उसने अपने माता-पिता को बताया कि कैसे आलम सुब्बाराव का बेटा आलम मरैया ने उसके साथ बलात्कार करने की कोशिश की। पीड़िता ने कहा, “जब मैं कमरे में थी, तो वह अंदर आया और मुझे अपने साथ सोने के लिए कहा। जब मैंने मना कर दिया, तो वो जबरन मेरे ऊपर आ गया। मैंने बहुत संघर्ष किया। उसने मेरे कपड़े फाड़ दिए और बाद में मुझे आग के हवाले कर दिया और वहाँ से भाग गया।”

विजय माल्या को लाने के लिए चल रही ‘गोपनीय’ कार्यवाही: सुप्रीम कोर्ट को केंद्र ने बताया

सुप्रीम कोर्ट में सोमवार (अक्टूबर 5, 2020) को भगोड़े शराब कारोबारी विजय माल्या के मामले पर सुनवाई हुई। भारतीय विदेश मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि माल्या के प्रत्यर्पण का आदेश ब्रिटेन की सर्वोच्च अदालत ने दिया था, लेकिन उसका कोई असर नहीं हुआ। इस मामले पर केंद्र सरकार का कहना है कि उसे ब्रिटेन में चल रही ‘गुप्त’ कार्यवाही और कारणों की जानकारी नहीं है जो माल्या के प्रत्यर्पण में देरी कर रही है।  

न्यायमूर्ति उदय यू ललित और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने माल्या के वकील से पूछा कि उसके प्रत्यर्पण के लिए यह किस तरह की गोपनीय कार्यवाही चल रही है। इस पर माल्या के वकील अंकुर सैगल ने अदालत से कहा कि उन्हें यह जानकारी नहीं है कि किस तरह की कार्यवाही चल रही है।

माल्या के वकील ने कहा, “मुझे इतनी ही जानकारी है कि प्रत्यर्पण कार्यवाही के खिलाफ मेरा अनुरोध अस्वीकार कर दिया गया है।” पीठ ने माल्या के वकील को दो नवंबर तक यह जानकारी देने का निर्देश दिया कि भगोड़ा कारोबारी अदालत में कब पेश हो सकेगा और यह गोपनीय कार्यवाही कब खत्म होने वाली है।

केंद्र सरकार की ओर से अधिवक्ता रजत नायर ने पीठ से कहा कि अदालत के निर्देशानुसार ही प्रत्यर्पण का अनुरोध किया गया है। उन्होंने कहा कि कोई गोपनीय प्रत्यर्पण कार्यवाही चल रही है, जिसके बारे में उन्हें जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन की सर्वोच्च अदालत ने माल्या के प्रत्यर्पण की कार्यवाही को बरकरार रखा है, लेकिन अभी ऐसा नहीं हो रहा है।

शीर्ष अदालत ने इससे पहले माल्या की 2017 की पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए उसे 5 अक्टूबर को अदालत में पेश होने का निर्देश दिया था। अदालत ने विजय माल्या को कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन करके अपने बच्चों के खातों में चार करोड़ अमेरिकी डॉलर हस्तांतरित करने के मामले में 2017 में अवमानना का दोषी ठहराया था। माल्या पर अब बंद हो चुकी किंग्सफिशर एयरलाइंस से संबंधित 9,000 करोड़ रुपए से अधिक का बैंक कर्ज अदा नहीं करने का आरोप है। माल्या इस समय ब्रिटेन में है।

शीर्ष अदालत ने 2017 में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के नेतृत्व वाले बैंकों के समूह की याचिका पर वह आदेश दिया था। याचिका में कहा गया था कि माल्या ने कथित रूप से विभिन्न न्यायिक आदेशों का ”खुलेआम उल्लंघन” कर ब्रिटिश कंपनी डियाजियो से प्राप्त 40 मिलियन यूएस डॉलर अपने बच्चों के खातों में ट्रांसफर किए थे।

भारतीय एजेंसियाँ उसके प्रत्यर्पण की कोशिश में जुटी हैं। लंदन हाईकोर्ट ने इस साल 14 मई को उस अर्जी को भी खारिज कर दिया, जिसमें माल्या ने प्रत्यर्पण के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने की इजाजत माँगी थी। इसके बाद माल्या के पास कोई कानूनी विकल्प नहीं बचा है।

रातोंरात वेबसाइट, फेक आईडी, विदेशों से फंडिंग: हाथरस केस के बहाने रची गई जातीय दंगों की साजिश की पूरी डिटेल

जाँच एजेंसियों ने हैरान कर देने वाला खुलासा किया है। खुलासे के मुताबिक़ देश के अलग अलग क्षेत्रों में दंगा कराने का षड्यंत्र रचा जा रहा था। इसमें उत्तर प्रदेश मुख्य रूप से निशाने पर था जहाँ हाल ही में हाथरस घटना हुई है। षड्यंत्र का एक ही उद्देश्य था प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की छवि को नुकसान पहुँचाना।

जाँच एजेंसियों की पड़ताल में यह बात भी सामने आई कि विरोध-प्रदर्शन की आड़ में रातों रात ‘जस्टिस फॉर हाथरस (Justice for hathras)’ नाम की वेबसाइट बनाई गई। इस वेबसाइट का इकलौता उद्देश्य था, उत्तर प्रदेश को दंगों की आग में झोंक देना। 

रातों रात बन गई ‘जस्टिस फॉर हाथरस’ वेबसाइट

पीड़िता की मृत्यु के ठीक एक दिन बाद यह वेबसाइट तैयार हुई और हज़ारों लोग इस वेबसाइट से जुड़ गए। हैरानी की बात यह थी कि जुड़ने वाले लगभग सभी लोग फेक आईडी से जुड़े थे। जाँच में सामने आए नतीजों के मुताबिक़ इस वेबसाइट को इस्लामी देशों द्वारा समर्थित कट्टरपंथी संगठन, एमनेस्टी इंटरनेशनल से फंडिंग मिलती थी। यह वेबसाइट बहुसंख्यक समुदाय में असंतोष पैदा करने, योगी और मोदी सरकार को कमज़ोर करने का प्रयास कर रही थी। इस वेबसाइट पर इस तरह की सामग्री पाई गई, जिसमें सांप्रदायिक दंगा भड़काने की बात हो रही थी। 

वेबसाइट सरकार की जानकारी में उस वक्त आई जब इसके जरिए भ्रामक, भड़काऊ और आपत्तिजनक विषय-वस्तु का प्रचार किया जा रहा था। रविवार (4 अक्टूबर 2020) की रात छापेमारी के दौरान वेबसाइट पर कार्रवाई हुई थी। जाँच एजेंसियों को पड़ताल के दौरान यह भी पता चला कि इस वेबसाइट को बनाने में एसडीपीआई और पीएफआई जैसे संगठनों ने भी सहयोग किया था। इस वेबसाइट पर एडिट किए गए वीडियो और फोटोशॉप की गई तस्वीरें साझा की गई थीं, जिससे देश और प्रदेश में अस्थिरता और जातीय दंगों जैसे हालात बनें।

वेबसाइट पर बहुसंख्यक समुदाय को भड़काने वाली कंटेंट

वेबसाइट पर जिस तरह की विषय-वस्तु साझा की गई थी उसमें विस्तार से उल्लेख था कि दंगों के दौरान प्रदर्शन करने वालों को क्या करना है (Do’s) और क्या नहीं करना है (Don’ts)। इसके बाद वेबसाइट में इस प्रक्रिया का भी उल्लेख था कि कैसे दंगा भड़काना है और उसके आरोपों से बच कर निकलना है। इतना ही नहीं वेबसाइट में खुद की सुरक्षा के लिहाज़ से ऐसे दिशा-निर्देशों की जानकारी दी हुई थी कि प्रदर्शन करने वालों को क्या पहनना है, क्या लेकर आना है, किस तरह आँसू गैस से बचना है। साथ ही पुलिस द्वारा होने वाली कार्रवाई से किस तरह खुद का बचाव करना है।  

जस्टिस फॉर हाथरस वेबसाइट पर Do’s (क्या करना) और Don’ts (क्या नहीं करना) की सूची

वेबसाइट में दंगा भड़काने के साथ साथ पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को निशाना बनाने की बात का भी ज़िक्र था। मास्क के इस्तेमाल का निर्देश भी दिया गया था और ऐसा कोरोना वायरस से बचाव के लिए नहीं, बल्कि पहचान में आने से बचने के लिए करना था। इसके अलावा वेबसाइट में प्रदर्शन के दौरान भड़काऊ भाषण को बढ़ावा देने की बात कही गई थी, जिससे दंगा ज़्यादा से ज़्यादा भड़के। 

जस्टिस फॉर हाथरस वेबसाइट पर Do’s (क्या करना) और Don’ts (क्या नहीं करना) की सूची

प्रदर्शन में शामिल होने वाले लोगों को एन 95 मास्क पहनने का निर्देश दिया गया था, जिससे आँसू गैस का असर कम से कम हो। इसके बाद आँसू गैस के प्रभाव से बचने के तरीकों के बारे में भी जानकारी दी गई थी। 

जस्टिस फॉर हाथरस वेबसाइट पर Do’s (क्या करना) और Don’ts (क्या नहीं करना) की सूची

दंगाइयों को ख़ास तौर पर वैसलीन, मिनरल आयल या सनस्क्रीन नहीं लगाने का निर्देश दिया गया था, जिससे किसी तरह के रासायनिक पदार्थ नज़र नहीं आएँ। महँगे और ब्रांडेड कपड़े नहीं पहनने की बात भी कही गई थी, क्योंकि इन कपड़ों में उनकी पहचान करने में आसानी होती। इसके स्थान पर ढीले और काले कपड़े पहनने की बात कही गई थी, जिससे पुलिस के लिए उनकी पहचान करना मुश्किल हो। 

जस्टिस फॉर हाथरस वेबसाइट पर Do’s (क्या करना) और Don’ts (क्या नहीं करना) की सूची

अमेरिका में हुए दंगों की तर्ज पर अव्यवस्था फैलाने का प्रयास

खुफ़िया एजेंसी की जाँच रिपोर्ट के मुताबिक़ सीएए और एनआरसी का विरोध करने वाले दंगाइयों ने ही यह वेबसाइट बनाई थी। इसका एक ही उद्देश्य था, जिस तरह अमेरिका में जॉर्ज फ्लॉयड की मृत्यु के बाद दंगे भड़काए गए थे, उसकी तर्ज पर उत्तर प्रदेश में दंगों को अंजाम दिया जाए। जो दंगाई सीएए और एनआरसी के विरोध-प्रदर्शन में शामिल थे, उन्होंने इस वेबसाइट में बनाने में मदद कि क्योंकि वह योगी आदित्यनाथ की कार्रवाई का बदला लेना चाहते थे।   

दंगाई लॉबी मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए देश के अलग-अलग क्षेत्रों  में बड़े पैमाने पर दंगा भड़काना चाहती थी। नफरत फैलाने के लिए दंगे का षड्यंत्र रचने वालों ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल करके भड़काऊ भाषणों का जम कर प्रचार-प्रसार किया। जिससे लोगों आक्रोशित होकर प्रतिक्रिया दें और हालात बदतर हों। 

दंगा भड़काने के आरोप में मामला दर्ज 

जैसे ही यह ख़बर प्रकाश में आई कि हाथरस विरोध-प्रदर्शन की आड़ में दंगा भड़काने की वैश्विक स्तर पर साजिश रही जा रही है, वैसे ही उत्तर प्रदेश पुलिस ने इस संबंध में मामला दर्ज किया। हाथरस पुलिस ने इस मामले में कई आरोपों के तहत मामला दर्ज कर लिया है। इसमें जातीय और सांप्रदायिक आधार पर दंगा भड़काना, अराजकता फैलाना, दंगों का आरोप लगा कर सरकार की छवि को नुकसान पहुँचाना, अफवाहों को बढ़ावा देना, पीड़िता के परिवार को सरकार के विरुद्ध भड़काना, फर्जी अफवाहें, तस्वीरें और जानकारी मुख्य हैं। 

दंगा भड़काने वाली वेबसाइट के विरुद्ध हाथरस पुलिस की प्राथमिकी

पूरे घटनाक्रम में पुलिस ने कई प्रकार की धाराएँ लगाई हैं, जिसमें शामिल हैं- 109, 120(B), 124-A, 153-A, 153-A(1), 153-A(1)(a), 153-A(1)(b), 153-A(1)(c), 153-B, 195, 195-A, 465, 468, 469, 501, 505(1), 505(1)(b), 505(1)(c), 505(2) और 67 

‘जस्टिस फॉर हाथरस’ विक्टिम कार्ड 

जाँच शुरू होने के कुछ घंटों बाद ही वेबसाइट बंद हो गई। यह कार्ड (Carrd) वेबसाइट थी। यह प्लेटफॉर्म इस साल की शुरुआत में अमेरिका में हुए ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ विरोध-प्रदर्शन के दौरान चर्चा में आई थी। अधिकृत डोमेन नहीं होने के कारण इसे ट्रैक करना मुश्किल होता है।

‘UPSC जिहाद’: केंद्र ने सुदर्शन न्यूज को भेजा नोटिस, सुनवाई 26 अक्टूबर तक स्थगित

सुदर्शन टीवी के कार्यक्रम UPSC जिहाद के मामले में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इंटर मैजिस्ट्रियल कमेटी ने ‘UPSC जिहाद’ कार्यक्रम के आगे के एपिसोड के प्रसारण पर सलाह देते हुए अपनी सिफारिशें दी हैं। सुदर्शन न्यूज टीवी को कमेटी की सिफारिशों को संबोधित करने का अवसर दिया जाना चाहिए। 

मामले में सुदर्शन न्यूज टीवी को एक और नोटिस जारी करने की तैयारी की जा रही है। इसके साथ ही केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से सुनवाई को टालने का अनुरोध किया, इसके बाद कोर्ट ने सुनवाई टाल दी। मामले में अब 26 अक्‍टूबर को सुनवाई होगी।

कल (अक्टूबर 4, 2020) केंद्र सरकार द्वारा स्थगन की माँग वाला एक पत्र प्रसारित किया गया था। पत्र में कहा गया है कि, जैसा कि बेंच को सूचित किया गया था, भारत संघ ने केबल टेलीविजन नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम, 1995 की धारा 20 (3) के तहत केंद्र सरकार द्वारा प्रदत्त अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए, सुदर्शन न्यूज को 23.09.2020 को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था और 28.09.2020 को वापस किया गया।

नोटिस का पालन करते हुए सुदर्शन समाचार ने इसका जवाब दिया और फिर उस पर विचार करने एवं सिफारिशों के लिए इंटर मैजिस्ट्रियल कमेटी को भेज दिया गया। इसके बाद इंटर मैजिस्ट्रियल कमेटी ने अपनी कार्यवाही की, जिसमें सुदर्शन न्यूज को लिखित दलीलें दाखिल करने के साथ-साथ मौखिक दलीलें देकर मामले का प्रतिनिधित्व करने का पूरा मौका दिया गया।

कार्यवाही के बाद, आईएमसी ने कुछ कार्यक्रमों के संबंध में 04.10.2020 को केंद्र सरकार को कुछ अतिरिक्त सिफारिशें दीं जिनका सुदर्शन टीवी समाचार चैनल द्वारा प्रसारण किया जाना बाकी है।

पत्र में कहा गया है, “केंद्र सरकार का सक्षम प्राधिकारी सुदर्शन टीवी समाचार चैनल को एक और अवसर देने के लिए बाध्य है, जो इंटर मैजिस्ट्रियल कमेटी द्वारा दी गई सिफारिश और भविष्य के कार्यक्रम के संबंध में इंटर मैजिस्ट्रियल कमेटी द्वारा की गई अतिरिक्त सिफारिश पर अपना प्रतिनिधित्व सामान्य रूप से और विशेष रूप से सम्मान के साथ प्रस्तुत करे।”

Letter circulated by the central government
Letter circulated by the central government

पत्र में आगे कहा गया है, “सुदर्शन टीवी न्यूज़ चैनल को सुनवाई का अंतिम अवसर देने के बाद ही केंद्र सरकार केबल टेलीविजन नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम, 1995 की धारा 20 की उप-धारा 3 के तहत आदेश पारित करने की स्थिति में होगी।”

सुनवाई के दौरान, डी वाई चंद्रचूड़, इंदु मल्होत्रा और इंदिरा बनर्जी की बेंच ने इस स्थगन को स्वीकार कर लिया। केंद्र सरकार के सामने सुदर्शन न्यूज की सुनवाई कल यानी 6 अक्टूबर 2020 को होनी है।

एक याचिकाकर्ता ने सुनवाई के दौरान कहा कि अदालत को केंद्र सरकार द्वारा लिए गए फैसले के बावजूद बड़े मामले पर फैसला करने की जरूरत है। इसके बाद, सॉलिसिटर जनरल, जो केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, ने कहा, “क्या मैं एक अनुरोध कर सकता हूँ? मेरे हिसाब ये यह मामला कोर्ट, याचिकाकर्ता और प्रतिवादी के बीच में ही रहने दें। हर कोई हस्तक्षेप कर रहा है और इस दायरे को बढ़ा रहा है।” हालाँकि, बाद में अधिवक्ता शाहरुख आलम ने हस्तक्षेप किया और अदालत से अनुरोध किया कि वह 23 सितंबर को दिए गए आदेश पर अड़े रहे। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने उन्हें आश्वासन दिया कि अदालत पूरी सुनवाई करेगी।

सुनवाई के दौरान, एक वकील ने संजीव नेवार की ओर से पेश होने और इस मामले में हस्तक्षेप करने की माँग की, क्योंकि वह यूपीएससी-जिहाद के एक शो में एक पैनलिस्ट थे और पिछली सुनवाई के दौरान उनकी टिप्पणियों का उल्लेख किया गया था।

हालाँकि, जस्टिस चंद्रचूड़ ने इस अनुरोध को स्वीकार नहीं किया और कहा कि चूँकि वह टेलीविजन शो में दिखाई देते हैं, इसलिए वह शिकायत नहीं कर सकते। इसके अलावा, न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने यह भी कहा कि भविष्य में संभवत: हस्तक्षेपकर्ता उसी चैनल पर वापस जाएगा। जस्टिस चंद्रचूड़ ने सुनवाई की अगली तारीख 26 अक्टूबर तय की।

गौरतलब है 15 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने प्रथम दृष्टया अवलोकन करने के बाद सुदर्शन न्यूज के ‘बिंदास बोल’ शो के प्रसारण पर रोक लगा दी थी। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, इंदु मल्होत्रा ​​और केएम जोसेफ की एक पीठ याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि सुदर्शन न्यूज के प्रधान संपादक सुरेश चव्हाणके द्वारा होस्ट किया गया शो ‘बिंदास बोल’ सेवाओं में समुदाय विशेष के युवाओं के प्रवेश को सांप्रदायिक रूप दे रहा था।

नशे में धुत पुलिस ने फिंकवाई माँ दुर्गा की मूर्ति, दान के पैसे और जेवर भी ले गए: ग्रामीणों का दावा, पुलिस ने नकारा

बिहार के सीतामढ़ी जिले के मेघपुर गाँव में पुलिस और ग्रामीणों के बीच आपसी झड़प का मामला सामने आया है। घटना शनिवार (अक्टूबर 3, 2020) की है।  पुलिस का कहना है कि पूरा मामला अफवाह के कारण शुरू हुआ। वहीं ग्रामीणों का आरोप है कि पुलिस ने उन पर ज्यादती की। उन पर गोली चलाई और माँ दुर्गा की प्रतिमा को पानी में फिंकवा दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सीतामढ़ी जिले के मेघपुर में कुछ लोग दुर्गा पूजा का आयोजन करवा रहे थे। साथ ही दुर्गा माँ की मूर्ति का निर्माण भी वहाँ कराया जा रहा था। जब पुलिस प्रशासन को इसकी जानकारी मिली तो सशस्त्र बल के साथ थाना प्रभारी दुर्गा पूजा के आयोजन को रोकने और प्रतिमा हटाने के लिए पहुँच गए। इस पर मेघपुर के ग्रामीण कथित तौर पर भड़क गए और पुलिस पर पथराव करने लगे। 

ग्रामीणों का आरोप

ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि पहले तो पुलिस विभिन्न मूर्तियों को उठाकर जबरन विसर्जन करवाना चाहती थी। लेकिन बाद में उन्होंने माँ दुर्गा की प्रतिमा के साथ बने गणपति, सरस्वती, कार्तिक, लक्ष्मी आदि की छोटी-छोटी मूर्तियों को उठवा कर पूजा स्थल से करीब 1 किलोमीटर दूर पानी में फिंकवा दिया।

इसी के बाद बात बढ़ी और गुस्साए ग्रामीणों ने पत्थर फेंकने शुरू किए। ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि पुलिस ने यह काम शराब के नशे में किया। इधर, पुलिस का कहना है कि जब उनकी टीम पर ग्रामीण भारी पड़ने लगे, तो उन्होंने हवाई फायरिंग की।

दोनों पक्ष के लोग हुए घायल

बता दें कि इस आपसी झड़प में पलक चौधरी का बेटा राघवेंद्र चौधरी गोली लगने से जख्मी हो गया, जिसे इलाज के लिए सीतामढ़ी के निजी क्लीनिक में भर्ती कराया गया है। पुलिस का कहना है कि राघवेंद्र को गोली ग्रामीणों की फायरिंग में लगी है।

उसके अलावा पत्थरबाजी बाजी व लाठीचार्ज में ग्रामीण सुशील चौधरी, उमेश चौधरी, सुनील झा, सर्किल इंस्पेक्टर अरुण कुमार, जोनल ऑफिसर संजय कुमार, अवर निरीक्षक ललन सिंह समेत 12 से अधिक लोग घायल हो गए।

भाजपा मंडल अध्यक्ष अध्यक्ष ने उठाई जाँच की माँग

गौरतलब है कि इस मामले में भाजपा मंडल अध्यक्ष सुरेश कुमार मिश्रा ने जाँच के बाद कार्रवाई की माँग की है। दूसरी ओर पूजा समिति के अध्यक्ष ब्रजेश चौधरी, उपाध्यक्ष राकेश चौधरी, सचिव बृजेश मंडल व कोषाध्यक्ष साकिर हुसैन आदि ने आरोप लगाया है कि साजिश के तहत व बिना जानकारी दिए पुलिसकर्मियों द्वारा फायरिंग की गई। 

ग्रामीणों का आरोप है कि पुलिसकर्मी मूर्तियाँ फिंकवाने के साथ-साथ दान की गई 55 हजार की नकद राशि व 1 लाख रुपए के जेवर भी ले गए। इसी सब से नाराज हो कर ग्रामीणों व दुर्गा पूजा से जुड़े पूजा समिति के दर्जनों सदस्यों ने सुरसंड मेघपुर पथ को घंटों तक जाम कर विरोध-प्रदर्शन किया। ये लोग आरोपित पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई की माँग कर रहे थे।

पुलिस का पक्ष

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, सुरसंड थानाध्यक्ष भोला प्रसाद सिंह ने बताया कि शनिवार की रात पुलिस इलाके में गश्त लगा रही थी। इसमें जोनल अधिकारी, सर्किल इंस्पेक्टर के साथ कई अधिकारी शामिल थे। इसी बीच 2-3 संदिग्ध लोगों से पूछताछ की जा रही थी। तभी, किसी ने मेघपुर स्थित एक मंदिर में लगे माइक से अफवाह फैलाते हुए घोषणा कर दी कि पुलिसवाले मारपीट कर रहे हैं।

बता दें कि एसपी प्रमोद कुमार यादव ने आरोपों को खारिज किया है। उनका कहना है कि 2-3 बदमाशों ने अफवाह फैलाकर लोगों को उकसाने का काम किया है। सबकी पहचान कर ली गई है। इन लोगों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज कर गिरफ्तारी के लिए कार्रवाई की जा रही है। पुलिस पर लगाए जा रहे आरोप गलत है और इलाके में शांति है।

बिहार चुनाव: जूते-चप्पल, अंडे, मोबिल और पत्थर… सब खाने वाले कन्हैया कुमार को टिकट नहीं

राजद और कॉन्ग्रेस के साथ मिलकर वाम दल बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ रहे हैं। गठबंधन में शामिल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPM) ने अपने उम्मीदवारों का ऐलान भी कर दिया है। लेकिन, इस सूची में भाकपा नेता कन्हैया कुमार का नाम नहीं है। बेगूसराय से लोकसभा चुनाव हार चुके कन्हैया के बछवाड़ा से विधानसभा चुनाव लड़ने की अटकलें थी। 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को 6, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को 4 और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी-लेनिनवादी (सीपीआई-एमएल) को 19 सीटें गठबंधन में मिली है। इनमें सीपीआई ने सभी 6 सीटों पर उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है, सीपीएम ने भी अपने चार उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। माना जा रहा कि जल्द ही सीपीआई एमएल भी अपने कैंडिडेट्स के नाम का ऐलान कर देगा।

सीपीआई ने इन्हें दिया टिकट

सूर्यकांत पासवान को बेगूसराय की बखरी विधानसभा सीट से टिकट दिया गया है। बेगूसराय की तेघड़ा से राम रतन सिंह, बछवाड़ा से अवधेश कुमार राय, मधुबनी की हरलाखी विधानसभा सीट से राम नरेश पांडेय, मधुबनी की झंझारपुर सीट से रामनारायण यादव, पूर्णिया की रूपौली सीट से विकास चंद्र मंडल उम्मीदवार बनाए गए हैं।

सीपीएम उम्मीदवारों की लिस्ट

सीपीएम ने जिन चार सीटों पर उम्मीदवारों के नाम का ऐलान किया है उनमें समस्तीपुर की विभूतिपुर विधानसभा सीट से अजय कुमार उम्मीदवार होंगे। सारण की मांझी सीट पर सत्येंद्र यादव, पूर्वी चंपारण की पीपरा सीट से राजमंगल प्रसाद और बेगूसराय की मटिहानी सीट से राजेंद्र प्रसाद सिंह कैंडिडेट होंगे।

कन्हैया कुमार नहीं लड़ेंगे चुनाव

सीपीआई ने सभी 6 सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर दिए, इसमें कन्हैया कुमार का नाम नहीं है। ऐसे में उन अटकलों पर विराम लग गया कि कन्हैया कुमार विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बन सकते हैं। कन्हैया कुमार 2019 लोकसभा चुनाव में सीपीआई के टिकट पर बेगूसराय सीट से उम्मीदवारी की थी, हालाँकि उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद उनके विधानसभा चुनाव लड़ने की चर्चा थी।

2020 के शुरू से ही कन्हैया कुमार बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर खासे एक्टिव रहे और अक्सर बताते रहे कि चुनावी मुद्दा क्या होने वाला है। कन्हैया कुमार CAA, NPR और NRC के विरोध में बिहार दौरे पर निकले थे और कई जगह उनको लोगों का विरोध भी झेलना पड़ा था। एक-दो जगह तो काफिले पर लोगों के हमले के बाद पुलिस को उन्हें सुरक्षित निकालने के लिए मशक्कत करनी पड़ी थी। कुछ जगहों पर तो जूते-चप्पल, अंडे, मोबिल और पत्थर वगैरह भी चले थे। कुछ जगहों पर ‘कॉमरेड कन्हैया मुर्दाबाद’ के नारे भी लगाए गए।

कन्हैया कुमार जिन दिनों बिहार चुनाव को लेकर खासे तत्पर दिखाई दे रहे थे, फोर्ब्स मैगजीन ने दुनिया के टॉप-20 निर्णायक लोगों की एक सूची जारी की थी। सूची में जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार को अगले दशक का निर्णायक चेहरा बताया गया था। सूची में कन्हैया कुमार को 12वाँ स्थान दिया गया था।

‘क्या तुम नंगी सोती हो’: नाबालिग छात्राओं को गंदे मैसेज भेजने वाले बाइबिल ‘उपदेशक’ को ईसाई संस्था ने पद से हटाया

ईसाई मिशनरी स्कूलों में बाइबिल की शिक्षा देने वाली संस्था ‘स्क्रिप्चर यूनियन (SU)’ के तमिलनाडु के निदेशक सैम जयसुंदर को उसके पद से हटा दिया गया है। उस पर छात्राओं को आपत्तिजनक मैसेज भेजते के आरोप हैं। यौन शोषण के उद्देश्य से उसनेकई नाबालिग छात्राओं को आपत्तिजनक मैसेज भेजे थे। ट्विटर यूजर जोएल गिफ्टसन ने एक थ्रेड के जरिए कई स्क्रीनशॉट्स के माध्यम से सैम जयसुंदर की करतूतों का खुलासा किया था।

सैम जयसुंदर छात्राओं को फँसाने के लिए उनके पहनावे के बारे में पूछता था और ‘मिनी स्कर्ट में’ तस्वीरें भेजने को कहता था। वेल्लोर की ईसाई मिशनरी स्कूलों की कई छात्राओं ने उसके खिलाफ आवाज़ उठाई थी। इस मामले के सार्वजनिक होने के बाद SU के बोर्ड मेंबर्स ने रविवार (अक्टूबर 4, 2020) को एक इमरजेंसी बैठक बुलाई।

इस बैठक में उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की माँग की गई। इसके ठीक एक दिन बाद सोमवार को उसे सस्पेंड करने की घोषणा की गई। SU के नेशनल डायरेक्टर जोशुआ किरुबारज ने ‘द न्यू इंडियन एक्सप्रेस’ से कहा कि उन्होंने इस मामले में एक जाँच समिति का गठन किया है, जो पूरी रिपोर्ट तैयार करके देगी। इस रिपोर्ट के बाद इस मामले में आगे की कार्रवाई करने का आश्वासन संस्था की तरफ से दिया गया है।

सैम जयसुंदर पिछले 17 सालों से SU से जुड़ा हुआ है और हर साल संस्था के लिए कई कार्यक्रमों को आयोजित करता आ रहा है। उसके अलावा संस्था के दो अन्य अधिकारियों रुबेन क्लेमेंट और अल्बर्ट पर भी इसी तरह के मैसेज भेजने के आरोप लगे हैं। वेल्लोर स्कूल मैनेजमेंट ने कहा है कि मई में SU का एक कार्यक्रम उसके यहाँ होना था, लेकिन कोरोना वायरस लॉकडाउन के कारण उसे स्थगित कर दिया गया था।

वेल्लोर के उस स्कूल प्रबंधन कमिटी के एक सदस्य ने कहा कि उन्हें फ़िलहाल इस मामले में कोई शिकायत नहीं मिली है। उन्होंने ये भी कहा कि स्कूल का मई 2020 के बाद से SU से किसी प्रकार का संपर्क नहीं है। उन्होंने कहा कि जैसे ही प्रबंधन को इसका पता चला, इस मामले को तुरंत SU के साथ उच्च स्तर पर उठाया गया और आरोपित के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की माँग की गई।

स्क्रीनशॉट्स के अनुसार, एक लड़की से उसने पूछा कि क्या तुम कभी नंगी (फिर समझाते हुए उसने फिर पूछा- ‘बिना कपड़ों के?’) सोती हो? साथ ही वो लड़कियों को ‘स्वीटी’ कहते हुए उनसे फ्री होकर बात करने को कहता भी दिख रहा है। एक 14 वर्षीय लड़की से उसने पूछा कि क्या वो और उसके साथी लड़का-लड़की एक-दूसरे को गले लगाते हैं? सैम ने नाबालिग से पूछा कि क्या किसी ने उसे आलिंगन में लिया है या किस किया है?

4 वीडियो, कुछ तस्वीरें, मीडिया और हाथरस: टीआरपी और एजेंडा का घिनौना तमाशा

हाथरस में घटी दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद यह मीडिया पर्यटक स्थल बन गया है। विभिन्न मेनस्ट्रीम न्यूज नेटवर्क के पत्रकार नई-नई तकनीकें अपनाकर टीआरपी की होड़ में आगे बढ़ने की जुगाड़ में लगे हुए हैं। इन दिनों सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऐसे वीडियो से भरे हुए हैं, जिसमें तथाकथित पत्रकार न्याय के लिए लड़ाई की आड़ में अपनी नीच आचरण का परिचय दे रहे हैं।

हिंदी न्यूज चैनल भारत समाचार के पत्रकार द्वारा इसी तरह का वीडियो शेयर किया गया है। इसमें पत्रकार खेत के पास बैठ जाती है और पीड़ितों से मिलने की जिद करती है। इतनी ही नहीं, वो पुलिस अधिकारियों को यह कहकर उकसाती है कि क्या वे भी उसे उसी तरह जला देंगे, जैसा उन्होंने हाथरस पीड़िता के शव का दाह संस्कार किया था।

महिला पुलिस अधिकारी उस पत्रकार के सामने हाथ जोड़ती है और वहाँ से उठने का निवेदन करती है। महिला पुलिस अधिकारी पत्रकार से कहती है कि वो वहाँ से उठ जाए, किसी तरह का तमाशा न करें। वहीं दूसरी तरफ पत्रकार प्रज्ञा मिश्रा का पुलिस अधिकारियों को उकसाकर ये पूछना कि क्या वो उन्हें भी जलाएँगे, ये उनकी नैतिक स्तर का परिचय देती है।

इस तरह का व्यवहार करने के पीछे दो कारण हैं- पहला तो ये कि वह चाहते हैं कि दर्शकों को इस बात पर विश्वास को पत्रकार ग्राउंड लेवल पर जाकर भ्रष्ट सिस्टम के खिलाफ पीड़िता के लिए न्याय की लड़ रही है और दूसरा कारण है- टीआरपी, जो कि उल्लेखनीय गति के साथ घट रही है।

इसी तरह का एक वीडियो ABP न्यूज की तरफ से 2 अक्टूबर को शेयर किया गया। जिसमें मीडिया नेटवर्क की पत्रकार प्रतिमा मिश्रा हंगामा करते हुए जबरन गाँव के अंदर घुसने का प्रयास करती है। इस दौरान वो बार-बार ये कहती हैं कि वो अपना काम कर रही है। हालाँकि बाद में उन्हें और कैमरामैन को गाड़ी में बैठाकर गाँव के बाहर कर दिया जाता है। प्रतिमा मिश्रा आरोप लगाती है कि उन्हें बिना महिला पुलिसकर्मी वाली गाड़ी में बैठाकर जबरन गाँव के बाहर किया जाता है।

एबीपी न्यूज़ ने उसी दिन एक और वीडियो पोस्ट किया। इस पोस्ट का कैप्शन था, “हाथरस की बेटी के लिए एबीपी न्यूज के सत्याग्रह को पुलिस ने की रोकने की कोशिश। आखिर गाँधी जयंती पर बापू के विचारों को कुचलने वाला ‘गोडसे’ कौन?”

एक अन्य वीडियो में, एबीपी न्यूज ने दावा किया कि पीड़ित परिवार से मिलने की कोशिश कर रहे उनके पत्रकार और कैमरामैन के साथ उत्तर प्रदेश पुलिस ने छेड़छाड़ और दुर्व्यवहार किया।

‘पत्रकार’ बरखा दत्त ने भी 2 अक्टूबर को तस्वीरें पोस्ट करते हुए बताया था कि कैसे कई किलोमीटर तक पैदल चलने के बाद वो गाँव पहुँचने में कामयाब हुई, लेकिन उत्तर प्रदेश पुलिस ने उन्हें और उनकी मोजो टीम को पकड़कर पुलिस वैन में बैठाया और उन्हें फिर से हाइवे पर पहुँचा दिया।

जब इन वीडियो और तस्वीरों को शूट किया गया था तब धारा 144 लगाई गई थी

उल्लेखनीय है कि जिस समय पर ये तस्वीरें और वीडियो शूट किया गया है, उस समय वहाँ पर SIT जाँच को देखते हुए धारा 144 लगाई गई थी। उत्तर प्रदेश पुलिस ने मुख्य सड़क पर गाँव से लगभग 2 किमी की दूरी पर बैरिकेड्स लगा दिए थे, जिससे गाँव के सभी प्रवेश मार्ग बंद हो गए।

हालाँकि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गाँव में प्रवेश अनुमति नहीं देने के कदम पर सवाल उठाना मीडिया के अधिकार में है। लेकिन मीडिया द्वारा प्रदर्शित इन ड्रामेबाजी से लगता नहीं कि उनका मकसद पीड़ित परिवार से मिलना है।

इससे भी बुरी बात यह है कि एसआईटी जाँच पूरी होने के बाद यूपी सरकार द्वारा मीडिया को गाँव में जाने की अनुमति दिए जाने के बाद सभी चैनलों का दावा था कि ऐसा उनके दवाब की वजह से हुआ। जबकि सच्चाई यह थी कि मीडिया को अनुमति इसलिए दी गई क्योंकि एसआईटी जाँच पूरी हो चुकी थी। इस सबसे यह स्पष्ट होता है कि कोई पत्रकार या चैनल सच्चाई को सामने लाने के लिए नहीं, बल्कि अपनी गिरती टीआरपी को उठाने के लिए ये सब कर रहे थे। 

इंडिया टुडे की पत्रकार का ऑडियो लीक

गौरतलब है कि ऑपइंडिया ने इंडिया टुडे के पत्रकार और हाथरस पीड़िता के भाई के बीच की लीक बातचीत की रिपोर्ट की थी। इसमें सुना जा सकता था कि इंडिया टुडे की पत्रकार तनुश्री मृतका के भाई संदीप को ऐसा स्टेटमेंट देने के लिए बोल रही हैं, जिसमें लड़की के पिता आरोप लगाए कि उनके ऊपर प्रशासन की ओर से बहुत दबाव था। बातचीत को सुनकर यह साफ पता चलता था कि तनुश्री पीड़िता के भाई से एक निश्चित बयान दिलवाने का प्रयास कर रही थी और संदीप की दबी आवाज सुनकर लग रहा था, जैसे वह ऐसा नहीं करना चाहते।