Home Blog Page 4442

सोनू सूद को UN से मिला बड़ा वाला अवार्ड? UNDP ने खुद ट्वीट कर बताई पूरी बात, आपने पढ़ी क्या?

लॉकडाउन के दौरान गरीब प्रवासी मजदूरों की मदद करने वाले सोनू सूद को लेकर सोशल मीडिया पर हर जगह चर्चा है। ऐसे में यदि कोई इस बात को कहे कि उन्हें उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मान दिया जा रहा है, तो कोई भी बड़ी आसानी से विश्वास कर लेगा। कुछ ऐसा ही कल हुआ। कई न्यूज चैनल ने यह दावा किया कि सोनू सूद को उनकी इंसानियत के नाते किए गए कामों के लिए UNDP ने SDG स्पेशल ह्यूमेनिटेरियन एक्शन अवार्ड से सम्मानित किया है।

अब चूँकि पिछले दिनों हमने कुछ ऐसे मामले देखे, जहाँ व्यक्ति विशेष को सम्मान दी जाने की बातें झूठी निकलीं, मगर सोशल मीडिया पर उन्हें तेजी से शेयर किया गया और मीडिया में बिना प्रमाणिकता जाँचे उन्हें खबर की तरह चलाया गया। इसीलिए ऑपइंडिया ने सोनू सूद को सम्मान दिए जाने की पुष्टि UNDP वेबसाइट और एसडीजी एक्शन कैंपेन अवार्ड वेबसाइट पर जाकर की।

हमने पाया कि उन वेबसाइट्स पर अभी तक इस संबंध में कोई सूचना नहीं है। इसके अलावा सोशल मीडिया पर भी किसी के पास इस अवार्ड संबंधी कोई जानकारी नहीं थी। हमें अपनी पड़ताल में पता चला कि SDG एक्शन कैंपेन अवार्ड वेबसाइट के लिए तो अभी तक बस आवेदन दिए जा रहे हैं। इनके बंद होने की अंतिम तिथि 9 अक्टूबर 2020 है। वहीं वेबसाइट पर पिछले साल के विजेताओं की सूची है। इस साल के संबंध में वहाँ कोई लिस्ट नहीं है।

सोशल मीडिया पर मचे इस बवाल के बाद UNDP इंडिया ने खुद इस पर अपनी सफाई दी। 12:18 पर उन्होंने एक बयान ट्विटर पर डाला। इस बयान में उन्होंने नेटिजन्स के मन में उठने वाले सभी सवालों का जवाब दिया। उन्होंने अपने बयान में बताया कि यह पुरस्कार सोनू सूद को पंजाब सरकार के योजना विभाग द्वारा सतत विकास लक्ष्यों समन्वय केंद्र के साथ प्रदान किया गया था। इस पर फैसला एक स्वतंत्र जूरी ने लिया था। सिलेक्शन प्रक्रिया में यूएनडीपी शामिल नहीं थी।

यहाँ बता दें कि इस बात में कोई संदेह नहीं है कि सोनू सूद ने मुश्किल समय आने पर कई लोगों की मदद की और उन्हें उनके गृह राज्य पहुँचाया। आज उन्हें उनके उन कार्य के लिए सहारा जाना चाहिए। मगर, यह भी सच है कि सोनू सूद को उनके अच्छे कामों के लिए UNDP से अवार्ड नहीं मिला है।

हाथरस मामले की जाँच के लिए SIT गठित, 7 दिन में रिपोर्ट: PM मोदी और CM योगी की बातचीत, फास्ट ट्रैक कोर्ट में मुकदमा

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाथरस मामले को गंभीरता से लेते हुए इसकी जाँच के लिए ‘स्पेशल टास्क फोर्स (SIT)’ का गठन किया है। प्रदेश के गृह सचिव भगवन स्वरूप की अध्यक्षता में SIT गठित की है। डीआईजी चंद्र प्रकाश और आईपीएस पूनम इस SIT के सदस्य होंगे। ये अपनी जाँच कर के रिपोर्ट सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय को सौंपेगी। साथ ही इसके लिए समय-सीमा भी तय की गई है। 7 दिनों में SIT अपनी रिपोर्ट सौंप देगी।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से PM मोदी ने भी इस मामले पर चर्चा की। PM मोदी ने इस मामले के दोषियों के विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई सुनिश्चित करने को कहा है। CM योगी ने त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए इस केस का मुकदमा फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाने का निर्देश दिया है।

हाथरस मामले में यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ ने निर्देश दिया है कि SIT समयबद्ध तरीके से 7 दिनों में घटना के तह तक जाए और पूरी विस्तृत रिपोर्ट तैयार करे। इस घटना में संलिप्त चारों आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया गया है और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट के माध्यम से दोषियों को सज़ा सुनाने के निर्देश दिए हैं। हाथरस डीएम ने भी ये बात दोहराई है। दोषियों को जल्द से जल्द सज़ा दिलाने की बात कही गई है।

सीएम योगी डरा गठित की गई SIT में दलित और महिला सदस्य भी होंगे। दलित और महिला अधिकारियों की टीम वाली ये SIT हाथरस मामले की जड़ तक पहुँच कर रिपोर्ट तैयार करेगी। पीएसी आगरा पूनम और डीआईजी चंद्र प्रकाश इस SIT में शामिल हैं। साथ ही पुलिस-प्रशासन को अपनी कार्रवाई जारी रखने के निर्देश दिए गए हैं। इस घटना से पूरे देश में आक्रोश का माहौल है और मीडिया में ये मुद्दा छाया हुआ है।

इधर हाथरस मामले में मीडिया के कई रिपोर्ट्स में कहा जा रहा था कि पुलिस-प्रशासन ने जल्दी-जल्दी में ही पीड़िता का अंतिम-संस्कार करा दिया। वहीं हाथरस पुलिस ने ‘बिना परिजनों की अनुमति के पुलिस द्वारा बलपूर्वक पीड़िता का अंतिम संस्कार कराने’ की मीडिया में चल रही ख़बरों का खंडन करते हुए कहा है कि ये ‘असत्य और भ्रामक’ है। पुलिस के अनुसार, ‘सच्चाई ये है’ कि पुलिस-प्रशासन की देखरेख में परिजनों द्वारा अपने रीति-रिवाज के साथ मृतिका के शव का अंतिम संस्कार किया। 

ईशनिंदा में अखिलेश पांडे को 15 साल की सजा, कुरान की ‘झूठी कसम’ खाकर 2 भारतीय मजदूरों ने फँसाया

यूनाइटेड अरब अमीरात में गोरखपुर के एक इंजीनियर अखिलेश पांडे को ईशनिंदा के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है। वहाँ की अदालत ने उन्हें 15 साल की सजा सुनाई है। साथ ही भारतीय मुद्रा के मुताबिक उन पर 1 करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया है। अदालत ने जुर्माना लगाते हुए निर्देश दिए हैं कि यदि यह राशि नहीं अदा की जाती तो अखिलेश को आजीवन कारावास की सजा काटनी होगी। 

इस मामले में सबसे हैरान करने वाली बात यह सामने आई है कि आरोपित के ख़िलाफ़ कोई पुख्ता सबूत वहाँ के प्रशासन के हाथ नहीं लगे, मगर फिर भी उसे दोषी करार देकर सजा दे दी गई। अब उनकी पत्नी की अपील पर भारत सरकार ने यूएई सरकार से दया दिखाकर इंजीनियर को भारत भेजने की अपील की है। 

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अखिलेश पांडे शाहपुर के बशारतपुर के रहने वाले हैं। वह पिछले 10 सालों से दुबई की यूनियन सीमेंट कम्पनी रास अल खेमा (यूएई) में सीनियर सेफ्टी इंजीनियर के पद पर कार्यरत थे। उनके नीचे काम करने वाले एक सूडानी और एक पाकिस्तानी के साथ ही दो भारतीय मजदूरों ने उन पर कुछ दिन पहले ईशनिंदा का आरोप लगाया था और पुलिस में उनकी शिकायत दर्ज कराई थी।

पूरा मामला पिछले साल शुरू हुआ था। अक्टूबर 2019 में उन्हें वहाँ की पुलिस ने गिरफ्तार किया। पुलिस की पड़ताल में वीडियो, ऑडियो रिकार्डिंग, क्लिप सहित कोई भी सबूत नहीं मिला। पर यूएई के कानून के हिसाब से अगर तीन या तीन से अधिक लोग कुरान की कसम खाकर गवाही देते हैं तो आरोप सिद्ध माना जा सकता है। इसी आधार पर अबूधाबी की कोर्ट ने अखिलेश को 22 फरवरी 2020 को सजा सुनाई।

इसके बाद अखिलेश पांडे की पत्नी को उनके ससुराल वालों ने वापस घर बुला लिया। उससे पहले वह अपने पति अखिलेश और अपनी बेटी के साथ यूएई में ही रहती थीं। अंकिता पांडे का कहना है कि उनके पति बिलकुल बेगुनाह हैं।

उन्होंने भारत लौट कर यूपी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, विदेश मंत्री एस जयशंकर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भेजने के साथ ही गोरखपुर सदर सांसद रवि किशन, बांसगाँव सांसद कमलेश पासवान और देवरिया सांसद रमापति राम त्रिपाठी तथा राज्यसभा सांसद शिव प्रताप शुक्ल के जरिए भी विदेश मंत्रालय को पत्र लिखवाया है।

अंकिता ने अपने पत्र में अखिलेश की सजा से माफी दिलाने की अपील की है। इसी पत्र पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार की ओर से अखिलेश को वापस देश भेजने की माँग की गई है। इस बात की पुष्टि स्वंय संयुक्त सचिव डॉ टीवी नागेन्द्र प्रसाद ने की है।

अखिलेश की गिरफ्तारी के समय उनकी पत्नी यूएई में ही थीं। वह कहती हैं कि सूडानी नागरिक अब्दुल मनीम एल-जैक, पाकिस्तानी नागरिक राणा मजीद व एक अन्य कर्मचारी ने मेडिकल लीव के लिए झूठे प्रमाणपत्र प्रस्तुत किए थे। लेकिन वेरिफिकेशन के बाद अखिलेश ने उन्हें गलत पाया और भविष्य में दोबारा ऐसा न करने की चेतावनी दी। 

इसके बाद अखिलेश ने मामले की गंभीरता को समझते हुए कम्पनी के उच्चाधिकारियों को भी अवगत करवाया। इसके बाद सूडानी नागरिक अब्दुल मनीम सहित अन्य ने इस मामले को बेइज्जती के तौर पर लिया और उन्हें अंजाम भुगतने की धमकी दी।

इस घटना के अगले दिन अब्दुल मनीम, राणा मजीद के साथ दो भारतीय मुस्लिम मोहम्मद हुसैन खान मोहा (राजस्थान )और मोहम्मदुल्लाह शेख (हैदराबाद) अखिलेश की केबिन में घुसे और उनसे झगड़ा करने लगे। फिर थोड़ी देर में चारों उन्हें पकड़कर बाहर लाए और कहने लगे कि अखिलेश ने उनके समुदाय और यूएई के सुल्तान पर आपत्तिजनक टिप्पणी की है।

उनकी ही शिकायत पर पुलिस ने अखिलेश को थाने पर बुलाया और गिरफ्तार कर लिया। बाद में गवाहों के आधार पर आरोप पत्र दायर हुआ। इसमें लिखा गया कि अखिलेश ने यूएई के मुस्लिम नागरिकों को भद्दी गालियाँ दी। साथ ही यूएई के सुल्तान को गाली देते हुए उन पर गंभीर आरोप लगाए। इसलिए यह राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का मामला बनता है।

पिता-दादाजी ने किया हाथरस मामले की पीड़िता का अंतिम संस्कार, पुलिस भी रही मौजूद

हाथरस मामले में मीडिया के कई रिपोर्ट्स में कहा जा रहा था कि पुलिस-प्रशासन ने जल्दी-जल्दी में ही पीड़िता का अंतिम-संस्कार करा दिया। ‘इंडिया टुडे’ की पत्रकार तनुश्री पांडेय ने दावा किया था कि गाँव में शव पहुँचने पर काफी हंगामा हुआ और अधिकारियों ने बलपूर्वक परिजनों को पीड़िता का अंतिम संस्कार करने के लिए दबाव बनाया। उन्होंने दावा किया कि परिजन कह रहे हैं कि उन्हें अंतिम बार उनकी बेटी का चेहरा देखने दिया जाए।

पीड़िता का अंतिम संस्कार

साथ ही उन्होंने कुछेक वीडियो शेयर कर के ये भी दावा किया कि ग्रामीणों ने एम्बुलेंस के सामने आकर पुलिस का विरोध किया और कहा कि वो पीड़िता का अंतिम-संस्कार बलपूर्वक नहीं होंगे देंगे। इस वीडियो के पोस्ट किए जाने के लगभग आधे घंटे बाद ही हाथरस पुलिस ने बयान दिया कि थाना चन्दपा क्षेत्रान्तर्गत घटित दुर्भाग्यपूर्ण घटना में मृतिका का शव गाँव पहुँच गया है तथा परिवारीजनों के अनुसार अन्तिम संस्कार किया जाएगा।

पीड़िता के अंतिम-संस्कार के दौरान परिजन

हाथरस पुलिस ने ‘बिना परिजनों की अनुमति के पुलिस द्वारा बलपूर्वक पीड़िता का अंतिम संस्कार कराने’ की मीडिया में चल रही ख़बरों का खंडन करते हुए कहा है कि ये ‘असत्य और भ्रामक’ है। पुलिस के अनुसार, ‘सच्चाई ये है’ कि पुलिस-प्रशासन की देखरेख में परिजनों द्वारा अपने रीति-रिवाज के साथ मृतिका के शव का अंतिम संस्कार किया। ऑपइंडिया को अधिकारियों ने बताया कि इस मामले के सभी 4 अभियुक्तों को जेल भेजा जा चुका है।

हाथरस के जॉइंट मजिस्ट्रेट प्रेम प्रकाश मीणा ने कहा है कि इस मामले में पीड़िता को न्याय मिले और दोषियों को सज़ा मिले, इसके लिए प्रशासन त्वरित कार्रवाई कर रहा है। उन्होंने कहा कि अंतिम-संस्कार परिवारजनों के सहयोग और अनुमति से संपन्न हुआ। वीडियो में पीड़िता के पिता एवं दादा को अंतिम-संस्कार की प्रक्रिया पूरी करते हुए देखा जा सकता है। वहीं हाथरस डीएम ने कहा है कि प्रशासन परिवार के साथ है और उनकी हरसंभव मदद के अलावा फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट में सुनवाई के जरिए दोषियों को यथाशीघ्र सज़ा दिलाई जाएगी।

पीड़िता के अंतिम-संस्कार के विषय में हाथरस पुलिस का बयान

डीएम ने जानकारी दी कि चंदपा थाना वाले प्रकरण में पीड़िता के परिजनों को पूर्व में 4,12,500 रुपए की आर्थिक सहायता दी गई थी। मंगलवार (सितम्बर 28, 2020) 5,87,500 रुपए की सहायता और दी जा रही है। उन्होंने बताया कि इस प्रकार कुल 10 लाख रुपए की आर्थिक सहायता की गई है। पुलिस ने बताया है कि पीड़िता को परिजनों की सहमति के बाद दिल्ली स्थित सफदरगंज अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ उसकी मृत्यु हो गई।

हाथरस मामला: क्या, कब और कहाँ?

14 सितंबर को पीड़िता चारा इकट्ठा करने के लिए खेत में गई थी, जब 4 युवकों ने उस पर पीछे से हमला किया था। किशोरी को उसके गले में दुपट्टे से बाँधकर घसीट कर खेत में ले जाया गया, जहाँ कथित तौर पर उसके साथ बलात्कार किया गया। शायद घसीटने की वजह से ही उसकी रीढ़ की हड्डी में चोट आई थी।

दुष्कर्म का विरोध करने पर आरोपितों ने पीड़िता की गला दबा कर हत्या करने की कोशिश की। पुलिस ने कहा कि इसी दौरान पीड़िता की जीभ दाँत के बीच में आ गई और कट गई।

इस पूरे मामले पर पुलिस आईजी ने कहा, “कुछ दिन बाद जब पीड़िता का बयान लिया गया तो उसने बताया कि उसके साथ छेड़खानी भी किया गया था। पूछने के बावजूद उसने अन्य कोई आरोप नहीं लगाया। उसने तीन और युवकों का भी नाम बताया, जिसे गिरफ्तार कर लिया गया है। मेडिकल रिपोर्ट में दुष्कर्म की बात सामने नहीं आई है। फिलहाल चारों आरोपितों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है।”

इस मामले में सोशल मीडिया पर सामूहिक बलात्कार की क्रूरता व भयावहता का वर्णन वाली कई रिपोर्टें सामने आईं। दावा किया गया कि अपराधियों ने लड़की की रीढ़ की हड्डी तोड़ दी, उसकी जीभ काट दी और आँखें भी फोड़ दी। हालाँकि, हाथरस पुलिस ने इन आरोपों से इनकार किया।

हाथरस पुलिस ने बयान जारी करते हुए कहा, “सोशल मीडिया के माध्यम से यह असत्य खबर सार्वजनिक रुप से फैलाई जा रही है कि थाना चन्दपा क्षेत्रान्तर्गत दुर्भाग्यपूर्ण घटित घटना में मृतिका की जीभ काटी गई, आँख फोड़ी गई तथा रीढ़ की हड्डी तोड़ दी गई थी। हाथरस पुलिस इस असत्य एवं भ्रामक खबर का खंडन करती है।”

दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में 19 वर्षीय पीड़िता ने मंगलवार (सितंबर 29, 2020) सुबह गंभीर चोटों के कारण दम तोड़ दिया। उसे एक दिन पहले अलीगढ़ के जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से दिल्ली रेफर किया गया था।

जब एक फैसला, फैसला न होकर तुष्टिकरण बन गया: जानिए काशी, मथुरा की लड़ाई क्यों बाकी है…

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मामले का सुप्रीम कोर्ट का फैसला नवम्बर 2019 में ही आ चुका है, जिसके बाद न सिर्फ यहाँ राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ बल्कि अगस्त 2020 में भूमिपूजन भी हुआ। लेकिन क्या आपको याद है कि इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का क्या फैसला था? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूरी जमीन को तीन हिस्सों में बाँटने का निर्देश दिया था। रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और बाबरी पक्ष को ज़मीन बाँट दी गई थी।

इस फैसले के बाद हिन्दुओं ने गजब का संयम दिखाया क्योंकि बाबरी विध्वंस के बाद पुलिस-प्रशासन को आशंका थी कि कोई सांप्रदायिक घटना हो सकती है। क़ानूनी रूप से शांतिपूर्ण तरीके से मुद्दे को सुलझाने के लिए रामलला विराजमान ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जहाँ उन्हें जीत मिली। सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर तो काफी बात हो चुकी है, लेकिन हमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को भी याद करने की ज़रूरत है।

अयोध्या राम मंदिर मामला: क्या था इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला?

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का सार ये था कि हिन्दू और दूसरा समुदाय, ये दोनों ही इस विवादित जमीन (तब) के बराबर के हकदार हैं। निर्मोही अखाड़े ने दलील दी थी कि वो अनंत काल से इस स्थल की देखभाल और प्रबंधन का काम करता आ रहा है। दूसरे पक्ष को पूरा एक तिहाई हिस्सा दिया गया था। हिन्दू पक्ष की दलील थी कि जहाँ बाबरी मस्जिद का गुम्बद स्थित था (जिसे दिसंबर 1992 में ध्वस्त किया गया), वहीं रामलला का जन्म हुआ था।

हाईकोर्ट ने कहा कि चूँकि सदियों से हिन्दू और दूसरे समुदाय के लोग इसका प्रयोग करते आ रहे हैं, इसीलिए दोनों का ही इस पर अधिकार है। राम चबूतरा, सीता रसोई, भंडार और बाहर की खुली जगह निर्मोही अखाड़े को मिली। हालाँकि, कोर्ट ने ये भी कहा था कि 1993 के अयोध्या एक्ट के तहत जिस पक्ष को नुकसान हुआ हो, उसकी भरपाई के लिए कुछ एडजस्टमेंट्स किए जा सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने अधिग्रहित की गई भूमि को भी हिन्दुओं और दूसरे मजहब वालों के लिए व्यवस्थित करते हुए प्रवेश और निकासी के लिए अलग-अलग प्रबंध करने के साथ-साथ ये भी कहा था कि दोनों से एक-दूसरे को कोई समस्या नहीं आनी चाहिए। साथ ही पूरी भूमि के आधिकारिक बँटवारे के लिए स्पेशल ड्यूटी ऑफिसर और रजिस्ट्रार के पास जाने को कहा गया था। वहाँ इसकी औपचारिकता पूरी होनी थी।

तीन जजों में से एक जस्टिस एसयू खान ने कहा था कि विवादित ढाँचा मस्जिद था और मस्जिद को बनाने के लिए किसी मंदिर को ध्वस्त नहीं किया गया। उनका कहना था कि मंदिर के अवशेषों का उपयोग मस्जिद बनाने के लिए हुआ। उनका मानना था कि स्वामित्व साबित करने में दोनों समुदाय विफल रहे। उनका कहना था कि 1949 के पहले से मस्जिद के गुम्बद को भगवान श्रीराम का सटीक जन्मस्थान माना जाने लगा।

जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने जस्टिस एसयू खान की इन बातों से सहमति जताई- मस्जिद के गुम्बद को भगवान श्रीराम का जन्मस्थान माना जाता है, विवादित ढाँचे को एक पक्ष ने हमेशा से मस्जिद ही माना है और इसका कोई सबूत नहीं कि बाबर ने 1528 में इसे बनाया। लेकिन हाँ, उन्होंने जस्टिस एसयू खान की उस बात से सहमति नहीं जताई कि मंदिर को तोड़ कर मस्जिद नहीं बना था। उनका कहना था कि मंदिर को तोड़ा गया था।

वहीं जस्टिस डीवी शर्मा ने माना कि न तो ये विवादित ढाँचा मस्जिद था और न ही इसे बाबर ने बनवाया था। उन्होंने ASI के सर्वे के हवाले से माना कि विवादित ढाँचे के निर्माण के लिए मंदिर को तोड़ा गया था। उन्होंने स्तम्भों पर बने हिन्दू देवी-देवताओं की तस्वीरों को देख कर कहा कि ये इस्लामी स्थापत्य का हिस्सा नहीं है। उन्होंने ये भी कहा कि यहाँ समुदाय के लोग 1528 से नमाज नहीं पढ़ते थे।

जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने कहा था कि 1996 में सिविल जजों के उस फैसला का भी समर्थन किया था, जिसमें कहा गया था कि ये वक़्फ़ की संपत्ति नहीं है। चूँकि अयोध्या के रामलला नाबालिग हैं, इसीलिए उन्होंने टाइटल डेक्लेरट्री के परिसीमन के लिमिटेशंस उनके लिए लागू न होने की बात कही। उन्होंने रामजन्मभूमि के खुद के अपने-आप में एक देवता होने की बात का भी समर्थन किया था। उन्होंने इस स्थान को ईश्वरीय आत्मा के प्रतीक के रूप में माना।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के जजमेंट और तीनों जजों के विचारों को देख कर ऐसा लगता है कि उन्हें सब कुछ पता था, लेकिन सभी पक्षों को खुश करने के लिए भूमि को तीनों पक्षों में बाँट दिया गया। जस्टिस शर्मा द्वारा कही गई कई बातें सुप्रीम कोर्ट में उठीं और हिन्दू पक्ष ने इसके माध्यम से दलीलें भी पेश कीं। तो इस तरह से ये फैसला न होकर तुष्टिकरण बन गया। इसके पीछे सांप्रदायिक तनाव का भय था या कुछ और, ये चर्चा का विषय है।

हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस फैसले को क़ानूनी रूप से ‘Unsustainable’ बताया था। सुप्रीम कोर्ट ने यहाँ तक कहा कि अगर ये सार्वजनिक शांति बनाए रखने के लिए था, तो भी ये साध्य नहीं था। उसका कहना था कि 1500 स्क्वायर यार्ड्स की भूमि को तीन हिस्सों में बाँटना अंततः शांति बनाए रखने के लिए भी ठीक नहीं था। इसको बाँट देने से किसी भी पक्ष का भला नहीं होगा, ऐसा सुप्रीम कोर्ट ने कहा था।

कैसे अलग था अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला

अब जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को 10 साल बीत चुके हैं, ये कहा जा सकता है कि इस मामले को उस दौरान इस तरह से ट्रीट किया गया, जैसे ये दो पड़ोसियों के मामूली जमीन विवाद का झगड़ा हो और दोनों ठीक रह सकें, इसीलिए दोनों में जमीन बाँट दी गई। जबकि, सच्चाई ये है कि राम सहस्रों वर्षों से भारत में पूजे जाते रहे हैं और 100 करोड़ हिन्दुओं के देश में उनके ही आराध्य की जमीन का अतिक्रमण कर लिया गया, और उन्हें कहा जाए कि आधा-आधा बाँट लो?

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में पुराने जमाने के घुमंतुओं द्वारा लिखी गई बातों और गुरु नानक देव की अयोध्या यात्रा सहित कई साक्ष्यों का अध्ययन किया। जहाँ अयोध्या में ही मस्जिद के लिए अलग भूमि उपलब्ध कराने का आदेश दिया गया, वहीं पूरी विवादित भूमि हिन्दुओं को दी गई। सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के बाद ट्रस्ट का गठन हुआ। राम मंदिर के लिए पत्थर तराशने का कार्य तो पहले से ही चालू था, अब इसका शिलान्यास भी हो गया।

सबसे बड़ी बात कि इस पर सुप्रीम कोर्ट को घेरने के लिए लिबरलों के पास केवल वही सब मुद्दे थे, जिनके आधार पर वो हर चीज का विरोध करते हैं। समरसता की बातें की गई। समुदाय के लोगों में से कई ने इसे शरिया के खिलाफ बताया। कइयों ने बाबरी ध्वंस का मुद्दा उठाया। कुछ ने कहा कि जहाँ मस्जिद है, वहाँ आदिकाल तक मस्जिद ही रहती है। वही पुराने राग अलापने वालों ने कोई सटीक तर्क नहीं दिया। यहाँ बहस की एक घटना का जिक्र करना ज़रूरी है:

अधिवक्ता वैद्यनाथन ने ‘स्कन्द पुराण’ का उदाहरण देते बताया कि काफी पहले से सरयू में स्नान कर भगवान श्रीराम जन्मभूमि के दर्शन की परंपरा रही है। जब जस्टिस अशोक भूषण ने पूछा कि ‘स्कन्द पुराण’ कब लिखा गया था तो वैद्यनाथन ने बताया कि ये महाभारत काल में महर्षि वेद व्यास द्वारा लिखा गया। जब फिर सवाल हुआ कि इसमें देवता के दर्शन की बात क्यों नहीं है, तो वकील ने बताया कि पूरी जन्मभूमि ही देवता है।

जस्टिस भूषण ने पूछा कि इस मंदिर को बाबर ने तोड़ा था कि औरंगजेब ने, तो वैद्यनाथन ने बताया कि इस बारे में भ्रम है लेकिन ये सर्वविदित है कि अयोध्या के राजा श्रीराम थे। फ्रेंच ट्रेवलर विलियम फिंच ने अपनी भारत यात्रा (1608-11) में अयोध्या मंदिर का जिक्र किया है। जोसफ ताईफ़ेंटालर की पुस्तक का हवाला दिया गया, जिसमें भगवान श्रीराम के मंदिर के तोड़े जाने और उनमें लोगों की अटूट आस्था होने का जिक्र है।

सार ये कि सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट को ज़मीन का बँटवारा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। ये जमीन का झगड़ा नहीं था। ये अपनी आस्था के लिए, विदेशी अतिक्रमण से हुए नुकसान को ठीक करने के लिए और इतिहास में हुई गलतियों को ठीक करने के लिए लड़ी गई लड़ाई थी। इसीलिए, सुप्रीम कोर्ट में इस पर व्यापक बहस हुई। कोर्ट को बताया गया कि मथुरा और काशी की तरह ही साकेत भी हिन्दुओं की आस्था का केंद्र था।

काशी-मथुरा की मुक्ति के बिना अधूरा है राम मंदिर

जब आप संस्कृत के प्राचीनकाल में सबसे लोकप्रिय व्याकरणविद पाणिनि को पढ़ेंगे तो पाएँगे कि उनके समय में मथुरा का वैभव ऐसा था, जैसा 16वीं शताब्दी की शुरुआत में विजयनगर और रोम का रहा होगा। मथुरा का फैलाव काफी बड़ा था, वहाँ ब्राह्मणों की बड़ी-बड़ी बस्तियाँ थीं और व्यापार का वो उस समय का सबसे बड़ा केंद्र था। ‘अष्टाध्यायी’ में मथुरा की भव्य परंपरा का विस्तृत वर्णन किया गया है।

ठीक इसी तरह काशी के वैभव का जिक्र सभी शैव ग्रंथों में है। मथुरा और काशी के बारे में एक और अच्छी बात ये है कि इसके प्रमाण लगभग कई सारे हिन्दू धर्म-ग्रंथों में हैं और अयोध्या से कहीं ज्यादा इसके साक्ष्य प्रस्तुत किए जा सकते हैं। महाभारत में मथुरा का वर्णन है। मोक्षदायिनी काशी का वर्णन कई पुराणों में है। ऐसे में अब जब इन दोनों स्थलों की मुक्ति के प्रयासों का आगाज हो चुका है, इस राह में एक बहुत बड़ी बाधा भी है।

वो बाधा है – ‘‘उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 {Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991}, जिसके तहत किसी भी धार्मिक स्थल में परिवर्तन नहीं किया जा सकता, वो वैसा ही रहेगा, जैसा वो आज़ादी के समय था। वहाँ यथास्थिति बनी रहेगी। लेकिन, ये पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 के अंतर्गत आने वाले स्थलों पर लागू नहीं होता। अयोध्या को इससे छूट दी गई थी, इसीलिए उसका केस लड़ा जा सका।

भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने दिसंबर 2019 में इसमें संशोधन करने के लिए पीएम मोदी को पत्र लिखते हुए कहा था कि ये उनके पूजा करने के मूल अधिकारों का उल्लंघन है और आपत्तिजनक है। उनका कहना था कि ‘फंडामेंटल राइट्स’ में संसद कोई बदलाव नहीं कर सकता है। उनका कहना था कि अनुच्छेद 25-26 ‘फ्रीडम ऑफ वरशिप’ प्रदान करता है, इसीलिए कोई इसे रद्द नहीं कर सकता है।

जहाँ काशी के शिवलिंग को स्वयंभू माना गया है और कहा गया है कि वो स्वयं प्रकट हुए हैं, वहाँ के ज्ञानवापी मस्जिद को देख कर ही पता चलता है कि उसका निचला हिस्सा मंदिर का है, जिसे तोड़ कर मस्जिद बनाया गया। दूसरी तरफ मथुरा के लिए अखाड़ा परिषद पक्षकार बनने के लिए विचार कर रहा है। वहाँ औरंगजेब ने मंदिर तोड़ कर शाही ईदगाह मस्जिद बनवाई थी। इसके लिए सिविल सूट भी दायर हो चुका है।

हम इसके लिए प्रार्थना कर सकते हैं कि राम मंदिर में जितने हिन्दुओं ने अपना खून बहाया, वैसा काशी-मथुरा के लिए न हो क्योंकि अब तक जिन्होंने बलिदान दिया है, उन्होंने सिर्फ अयोध्या के लिए ही नहीं दिया था। कारसेवकों पर गोली चलवाने वाले मुलायम सिंह हों या राम मंदिर के लिए अपनी सरकार कुर्बान कर देने वाले कल्याण सिंह – इतिहास में कुछ भी छिपा नहीं है। बाबरी ध्वंस के दौरान अपना खून बहाने वाले अशोक सिंघल से लेकर सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ने वाले 92 वर्षीय के पराशरण, इन वरिष्ठों का योगदान जाया न गया था और न जाएगा।

राम मंदिर के लिए संघर्ष करने वालों की गाथाओं से हम आपको समय-समय पर परिचित कराते रहे हैं, जिनमें किशोर कुणाल और केके मुहम्मद जैसे बुद्धिजीवियों से लेकर कोठरी भाइयों के बलिदान तक शामिल हैं। ये भगीरथ प्रयास, बलिदान और संघर्ष अयोध्या-काशी-मथुरा, इन तीनों के लिए था। इसीलिए, अयोध्या की लड़ाई तब तक अधूरी है, जब तक काशी और मथुरा का अतिक्रमण ख़त्म नहीं हो जाता।

फ़िलहाल मथुरा को लेकर सक्रियता दिख रही है। तभी एक तरफ इकबाल अंसारी कह रहा है कि मंदिर-मस्जिद की बात करने वाले देश की तरक्की रोक रहे, तो असदुद्दीन ओवैसी 1991 के क़ानून और मथुरा में 50 के दशक में हुए समझौते का हवाला दे रहा। कॉन्ग्रेस नेता महेश पाठक खुद को पुरोहितों का प्रतिनिधि बता कर श्रीकृष्ण जन्मभूमि याचिका की निंदा कर रहे। जो भी हो, फ़िलहाल तो – ‘काशी-मथुरा बाकी है।

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में हाथियों को गोद लेने की योजना शुरू: 1 दिन से 1 साल तक कोई भी दे सकता है योगदान

मध्य प्रदेश वन विभाग ने एक अनूठी योजना की शुरुआत की है। इस योजना के तहत हाथियों से विशेष लगाव रखने वाले लोग इन्हें गोद ले सकेंगे। वन्य प्राणी संरक्षण के लिए यह अभियान बांधवगढ़ में पहली बार शुरू हो रहा है। अब कोई भी बांधवगढ़ के हाथियों को गोद ले सकता है। इसके लिए उनके भोजन की जिम्मेदारी लेनी होगी।

यह जरूरी नहीं कि पूरे साल के लिए हाथियों को गोद लिया जाए। महीने, तीन महीने, छ: महीने का भी खर्च उठा सकते हैं। कोई भी व्यक्ति एक दिन से लेकर एक वर्ष तक हाथियों को गोद ले सकता है। उनमें से हाथियों के खान पान, दवाई, उपकरण ट्रेनिंग के खर्चे हेतु 500 रूपए प्रति दिन से लेकर 1.50 लाख तक राशि दान कर सकते है।

बांधवगढ़ के हाथियों को गोद लेने में कई लोगों ने दिलचस्पी दिखाई है। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में 13 हाथियों के साथ दो हाथियों गौतम (74 वर्षीय) और तूफान (69 वर्षीय) को गोद लेने के लिए दिया जा रहा है।

वन, वन्यजीव विभाग के मुख्य सचिव आलोक कुमार के अनुसार, वन विभाग ने पर्यटकों और वन्यजीव प्रेमियों को हाथियों के साथ फिर से जोड़ने के उद्देश्य से योजना शुरू की है जो उन्हें दर्शनीय स्थलों की यात्रा के दौरान जॉय राइड पर ले जाता है और महामारी के बीच हाथियों के रखरखाव के लिए धन का भी इंतजाम हो जाता है।

हाथी महोत्सव

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में सप्ताह भर चलने वाला हाथी महोत्सव की शुरुआत इस सप्ताह सोमवार (सितंबर 28, 2020) से हुआ। हाथी महोत्सव के दौरान, रिजर्व में हाथियों को उनके नियमित काम से छुट्टी दी जाएगी। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर विंसेंट रहीम ने कहा, “हाथियों के लिए कायाकल्प शिविर सोमवार को शुरू हुआ, जिससे उन्हें अपने नियमित काम से छुट्टी मिल गई। ये हाथी हमें पूरे साल पेट्रोलिंग, ट्रैकिंग और अन्य नियमित कार्यों में मदद करते हैं। अब, हम हाथी महोत्सव के दौरान पूरे सप्ताह उनकी सेवा करेंगे।”

विंसेंट ने कहा कि छत्तीसगढ़ के 35 हाथियों की घुसपैठ से रिजर्व प्रभावित हुआ है और पर्यटक एक साल से जंगली हाथियों की उपस्थिति से चिंतित हैं। उन्होंने कहा कि गोद लेने का कार्यक्रम 15 विशेष हाथियों के साथ संबंध बढ़ाएगा और लोगों की चिंता को कम करेगा।

जंगली हाथियों को सँभालने और उन्हें नुकसान पहुँचाए बिना शांत करने के लिए वन रक्षकों, गाइडों और ग्रामीणों को प्रशिक्षित करने के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाए जा रहे हैं।

रवीश की नई रिपोर्ट- भोजपुरिया बकैत कुमार: अजीत भारती का वीडियो | Ajeet Bharti on Bhojpuri Ravish

रवीश के लिए लॉकडाउन करो तो समस्या है, नहीं करो तो समस्या है। रवीश ने नवंबर 2019 से लेकर सितंबर के तीसरे सप्ताह तक बिहार के बारे के बारे में कुछ नहीं बोला। यानी कि जब तक चुनाव की तारीख की घोषणा नहीं हुई इन्होंने रोजगार या अन्य किसी भी मुद्दे पर कुछ नहीं बोला। आज उनके भोजपुरी लाइव बकैती पर चर्चा करेंगे।

पूरी वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

डेनमार्क की PM के नाम से The Hindu ने भारत में कोरोना की स्थिति को बताया ‘बहुत गंभीर’, राजदूत ने कहा- फेक न्यूज़

कोरोना महामारी को लेकर भारत की स्थिति का दुष्प्रचार सिर्फ विपक्षी राजनीतिक दलों ने ही नहीं बल्कि वामपंथी मीडिया गिरोह ने भी जमकर किया है। हम सब यह पिछले कुछ माह में देखते आए हैं कि भारत के इस दुष्प्रचार के लिए मीडिया गिरोहों ने कभी किसी विदेशी एजेंसी का फर्जी हवाला दिया तो कभी किसी विदेशी हस्ती का बयान तोड़-मरोड़कर पेश किया। इस बार यह कारनामा और किसी ने नहीं बल्कि मशहूर समाचार पत्र The Hindu (द हिन्दू) ने किया है।

दरअसल, सितम्बर 29, 2020 की ही सुबह ‘द हिन्दू’ ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसका शीर्षक है – “India’s COVID-19 scenario very very difficult, says Danish Prime Minister” यानी – डेनमार्क की प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत में कोरोना वायरस की स्थिति बहुत ही खराब है।”

The Hindu द्वारा प्रकाशित फेक न्यूज़

दुर्भाग्यवश, भारत में डेनमार्क के राजदूत फ्रेडी स्वेन (Svane Freddy) ने ‘द हिन्दू’ की इस खबर को फेक न्यूज़ करार देते हुए इसे ‘ट्विस्टेड’ यानी तोड़-मरोड़कर बनाई गई खबर बताया है। फ्रेडी स्वेन ने ट्विटर पर ही द हिन्दू की इस खबर को फेक बताते हुए लिखा है – “क्षमा करें – यह सच नहीं है। यह ट्विस्टेड खबर है।”

समाचार पत्र ‘द हिन्दू’ ने इस फर्जी खबर में लिखा है कि डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेट फ्रेडरिक्सन (Mette Frederiksen) ने द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए सोमवार को भारत में COVID-19 की स्थिति के बारे में गहरी चिंता व्यक्त की है।

‘द हिन्दू’ ने इस फर्जी खबर को अभी तक भी हटाया नहीं है और ना ही इस पर किसी प्रकार का स्पष्टीकरण जारी किया है। लेकिन ट्विटर पर अब द हिन्दू द्वारा चलाए जा रहे इस ‘एंटी इंडिया कैम्पेन’ की जमकर निंदा की जा रही है।

‘1991 का कानून कॉन्ग्रेस की अवैध मस्जिदों को जिंदा रखने की साजिश, 9 मस्जिदों का जिक्र कर बताया यहाँ पहले थे मंदिर’: PM को पत्र

उत्तर प्रदेश शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन वसीम रिजवी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र लिखकर प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 (पूजा स्थल अधिनियम 1991) को खत्म करने की माँग की है। उन्होंने पुराने तमाम तोड़े गए मंदिरों को हिंदुओं को वापस देने और मुगल काल के पहले की स्थिति बहाल करने की माँग की है।

पीएम को लिखे पत्र में वसीम रिजवी ने कहा कि द प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 को कॉन्ग्रेस के शासन काल मे जानबूझकर बनाया गया था, ताकि हिंदुस्तान में मन्दिर-मस्जिद का विवाद हमेशा चलता रहे। रिजवी के मुताबिक इस एक्ट को तत्काल खत्म किए जाने की जरूरत है, जिससे देश में मन्दिर-मस्जिद विवाद सदैव के लिए समाप्त हो जाए। शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन के मुताबिक कॉन्ग्रेस ने धार्मिक आँकड़ों के आधार पर इस देश मे लंबे समय तक हुकूमत किया।

वसीम रिजवी ने पत्र में लिखा है, “द प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 कॉन्ग्रेस की हुकूमत में इसलिए बनाया गया, ताकि मुगलों द्वारा भारत के प्राचीन पवित्र मंदिरों को तोड़ कर बनाई गई अवैध मस्जिदों को हिंदुस्तान की जमीन पर एक विवाद के रूप में जिंदा रखा जाए और यह अधिनियम बनाए जाने के लिए कॉन्ग्रेस की सरकार पर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और हिन्दुस्तान के कट्टरपंथी मुल्लाओं का दबाव था, क्योंकि कॉन्ग्रेस पार्टी हिन्दुस्तान की आजादी के बाद से धार्मिक आँकड़ों के आधार पर भारत में हुकूमत करती रही है और हिन्दुस्तान का कट्टरपंथी जो कि मुगलों के कुकर्मों, जुल्म और ज्यादतियों का पक्षकार है, वह वोट के रूप में कॉन्ग्रेस को भारत में हुकूमत बनाए रखने में मदद कर रहा है।”

उन्होंने पत्र में आगे लिखा, “प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 एक विवादित अधिनियम है, जो किसी एक धर्म के अधिकार व धार्मिक सम्पत्ति जो उनसे कट्टरपंथी मुगल शासकों ने ताकत के बल पर छीन कर उस पर अपना धार्मिक स्थल (मस्जिदें) बना दिए थे, वह सभी प्राचीन धार्मिक स्थल (मंदिर) जिस भारती हिन्दू धर्म के मानने वालों के थे, उन्हें वापस न मिलने पाए, इस अन्याय को सुरक्षा प्रदान करता है, जो कि एक धर्म विशेष के धार्मिक अधिकारों व धार्मिक संपत्तियों का हनन है।”

रिजवी ने अपने इस पत्र में कुल 9 ऐसी मस्जिदों का उल्लेख किया है जो उनके अनुसार मंदिर तोड़कर बनाई गई थीं। इनमें अयोध्या के राम मंदिर के अलावा, मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि का केशव देव मंदिर, जौनपुर का अटाला देव मंदिर, वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर, गुजरात के जिला बटना का रूद्रा महालया मंदिर, अहमदाबाद गुजरात का भद्रकाली मंदिर, पश्चिम बंगाल की अदीना मस्जिद पंडुवा, विजया मंदिर विदिशा, दिल्ली की कुतुब मीनार के पास स्थित मस्जिद कुव्वत उल इस्लाम शामिल है।

रिजवी ने प्रधानमंत्री से अपील की है कि उक्त अधिनियम को समाप्त कर मुगलों द्वारा जो मंदिर तोड़कर मस्जिदें बनाई गईं उनके स्थान पर वही प्राचीन मंदिर फिर से स्थापित करवाए जाएँ। इसके साथ ही उन्होंने खुशी जाहिर की है कि बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद सुप्रीम कोर्ट के जरिए हल हो चुका है और अब वहाँ भव्य मंदिर बनने जा रहा है।

हाथरस ‘गैंगरेप’ में लिबरल गिरोह ‘जाति’ क्यों ढूँढ रहा है? अजीत भारती का वीडियो | Ajeet Bharti on Hathras ‘gangrape’ case

हाथरस से बहुत दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया कि लड़की के साथ गैंगरेप हुआ, जीभ काट दी गई, आँखें निकाल दी गई, रीढ़ की हड्डी तोड़ दी गई। हालाँकि, पुलिस ने इन आरोपों का खंडन किया। इस बीच मौकापरस्त पत्रकार और नेता मामले को स्पिन देते हुए आरोपित की ‘जाति’ निकाल कर सामने ला रहे हैं कि वो उच्च जाति का होने की वजह से पुलिस ने रेप से इनकार किया। 

लड़की को छेड़ना भी जघन्य अपराध की श्रेणी में आना चाहिए। दुर्भाग्य से हम ऐसे समाज में रह रहे हैं, जहाँ ये घटनाएँ काफी आम हो चुकी है और कई बार फैसला आरोपितों के पक्ष में जाता है या फिर उसके खिलाफ साक्ष्य नहीं होते हैं। सजा बहुत कम केस में मिलती है। इन सबके कारण ऐसा होने लगा है कि जब तक पीड़िता के साथ भयावह क्रूरता न हो, हमारी संवेदना नहीं जगती।

पूरी वीडियो यहाँ क्लिक करके देखें