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मेवात: बंगाल के राजू को बजरंग दल ने हसनखान के चंगुल से छुड़ाया, बंधक बनाकर 5 साल से हो रहा था अत्याचार

हरियाणा के मेवात में संप्रदाय विशेष के एक परिवार ने एक नाबालिग लड़के को पिछले कई साल से बंधक बनाकर रखा था। उसके साथ परिवार के लोग मारपीट करते थे और उससे मजदूरी करवाते थे। बच्चे को न तो सही से इस दौरान ढंग के कपड़े पहनने को दिए जाते थे और न ही उसे खाना दिया जाता था। नौकरी के लालच में बंदी बनाए गए इस बच्चे पर धर्मपरिवर्तन का भी दबाव बनाया जाता था।

मानेसर के बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के अथक प्रयासों के बाद अब इस बच्चे को बचा लिया गया है। उक्त सभी बातें भी उस बच्चे ने स्वयं बताई हैं। आज वह नाबालिग 18-19 वर्ष का हो चुका है और अपना नाम राजू बताता है।

राजू कहना है कि वह साल 2015 में मधुमक्खी पालन करने वाले अपने कुछ साथियों के साथ मेवात घूमने आया था। एक व्यक्ति इस दौरान इन्हें ये बोलकर लाया था कि काम दिलवाएगा। लेकिन यहाँ पर तावडू थाने के अंतर्गत आने वाले गोयला गाँव का निवासी हसनखान उसे नौकरी का लालच देकर अपने साथ ले गया।

नौकरी के नाम पर हसनखान के परिवार के लोगों ने उसे बंधक बना लिया और उससे बुरा व्यवहार किया जाने लगा। घर के लोग उसे चार दिवारी में रख कर उससे सारा काम करवाते और उससे मारपीट भी करते।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, राजू के पास उसका आधार कार्ड एक पहचान के तौर पर था, लेकिन हसनखान के परिवार के लोगों ने उसे भी फाड़ दिया और प्रताड़ित करते रहे। ये सारा सिलसिला 2015 से लेकर अबतक चला।

साभार: मोनू मानेसर का फेसबुक

इसके बाद एक दिन राजू किसी के चक्की से आटा पीसवाने गया। वहाँ उसने अपने बारे में बताया। इसके बाद जब राजू के बारे में बजरंग दल के संयोजक मोनू मानेसर को सूचना मिली। तो उन्होंने राजू को बचाया और अपने साथ ले आए।

मोनू बताते हैं कि उन्हें किसी से राजू के बारे में जानकारी मिली थी। इसी सूचना के आधार पर वह गोयला गाँव पहुँचे और बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के सहयोग से उस बच्चे को बड़ी मुश्किल से वहाँ से निकाला। लेकिन आरोपितों को जैसे ही ये सूचना मिली, उन्होंने उसका पीछा किया और हमले का भी प्रयास हुआ।

https://www.facebook.com/story.php?story_fbid=167255421585548&id=114009890243435

पर, अतत: बजरंग दल के कार्यकर्ता राजू को बचाने में सफल हुए। मानेसर लौटते ही राजू को खाना खिलाया गया और परिवार के बारे में पूछताछ करके उसे उसके परिवार से वीडियो कॉल करवाई गई।

मोनू कहते हैं कि राजू को देखते ही उसके परिवार वालों की आँखों में आँसू आ गए। उन्हें यही यकीन नहीं हो पाया कि उनका बेटा जीवित है।

पिछले 5 साल से लापता बेटे को लेकर परिवार मान चुका था कि किसी हादसे में उसकी मौत हो गई। इसलिए वह उसे भूल गए थे।

5 साल बाद जब यह खबर पता चली तो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। इसके लिए परिवार ने सदस्यों का आभार व्यक्त किया और कहा कि वह जल्द ही राजू को लेने आएँगे।

गौरतलब है कि पिछले कुछ समय से मेवात में हिंदुओं पर अत्याचार की कहानियाँ काफी चर्चा में हैं। वहाँ जबरन धर्म परिवर्तन, गो तस्करी और लूटपाट के मामले दिन पर दिन बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में राजू का मामला उजागर होने के बाद ये सवाल उठता है कि क्या यहाँ और भी ऐसे बच्चे हैं जिन्हें नौकरी का झाँसा देकर यहाँ बुलाया गया और फिर उन्हें बंधक बनाकर उन अत्याचार होने लगे?

12000 वैष्णव भक्तों के सिर कलम, 48 साल तक भटकते रहे थे भगवान: श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर पर हुए इस्लामी हमलों की दास्ताँ

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए हुए भूमिपूजन के साथ ही इसके लिए दशकों से चल रहा आंदोलन समाप्त हो गया है। राम मंदिर भूमिपूजन की खासियत ये रही कि यहाँ देश भर के कई पवित्र हिन्दू तीर्थों से मिट्टी और जल लाया गया – कन्याकुमारी से तीनों समुद्रों के संगम का जल, रामेश्वरम की मिट्टी, POK में स्थित शरद पीठ की मिट्टी और कई अन्य स्थलों से भी ये चीजें आईं। श्रीरंगम (श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर) से कावेरी नदी का पवित्र जल भी ले जाया गया। क्या आपको पता है यहाँ इस्लामी आक्रांताओं ने कभी तबाही मचाई थी?

श्रीरंगम की मिट्टी का वहाँ जाना बहुत बड़ी बात है क्योंकि ये वैष्णवजनों के सबसे पवित्र स्थलों में से एक है। वैष्णव, यानी भगवान विष्णु की उपासना करने वाले हिन्दू। भगवान राम विष्णु के 7वें अवतार हैं। इस पृथ्वी पर 106 वैष्णव दिव्य देशम हैं और श्रीरंगम का श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर उनमें से सबसे पुराना माना जाता है। 12 अलवरों की कृति ‘नलाईरा दिव्य प्रबंधम’ में इन सबका जिक्र मिलता है। ये फिलहाल दुनिया का सबसे बड़ा हिन्दू मंदिर है, जो अभी सक्रिय है।

इस मंदिर के सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास को ‘कोविल ओलुगू’ में दर्ज किया गया है। कोविल ओलुगू में इस मंदिर के इतिहास का पूरा विवरण है। काफी बड़ी अवधि में इसका विस्तार किया गया है – चोला साम्राज्य के दौरान इसके इतिहास से लेकर 18वीं शताब्दी में ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा इस पर कब्जा किए जाने तक। ये तमिल के मणिप्रवला लिपि में लिखित है। इसे श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर के इतिहास का सबसे पुष्ट स्रोत माना जाता है।

जिस मंदिर का इतना बड़ा इतिहास डॉक्यूमेंट कर के रखा गया हो, आश्चर्य की बात है कि आजकल के किसी भी इतिहासकार ने दिल्ली सल्तनत के दौरान मंदिर पर हुए हमलों को लेकर कुछ नहीं लिखा है और न ही इसका ठीक तरह से अध्ययन किया गया। चोला और पाण्ड्या साम्राज्य के समय श्रीरंगम का श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर पूरी दुनिया के वैष्णव भक्तों का सबसे बड़ा स्थल था। उस समय युद्ध और अनिश्चितता का दौर आता-जाता रहता था लेकिन जो भी सत्ता में रहा, उसने मंदिर के प्रबंधन का अच्छी तरह ध्यान रखा।

श्रीरंगम के श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर में पहला इस्लामी हमला

उस समय युद्ध और तनावों के बावजूद किसी ने भी श्रीरंगम को नुकसान नहीं पहुँचाया और न ही इसकी प्रतिष्ठा में कोई कमी आने दी। लेकिन, सन 1310 में मलवेरमान कुलशेखरम पाण्ड्या की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनके बेटों के बीच सत्ता के लिए संघर्ष शुरू हो गया। लेकिन, उन्हें ये पता होना चाहिए था कि उसी समय दिल्ली सल्तनत की फौजें दक्षिण भारत पर चढ़ाई करने बढ़ रही थी।

मलिक कफूर, जो अलाउद्दीन खिलजी का सबसे प्रमुख दास फौज कमांडर था, 1311 में उसने काकतिया, यादव और होयसाला साम्राज्यों को अपने आधीन कर के उन्हें दिल्ली सल्तनत के अंदर आने के लिए मजबूर कर दिया। इसके बाद उसकी नजर पाण्ड्या साम्राज्य की ओर पड़ी, जिसे आमिर खुसरो ने बार-बार मालाबार कह कर संबोधित किया है। यहाँ के धन-वैभव से दिल्ली सल्तनत की जीभ लपलपाने लगी।

आखिरकार मार्च 1311 में मलिक कफूर की फौज ने पाण्ड्या साम्राज्य में घुसने में कामयाबी पाई और कुलशेखरा पाण्ड्या के बेटे वीर पाण्ड्या को अपने कब्जे में लेने का प्रयास किया। वो लोग थोप्पूर से होकर वहाँ घुसे थे। हालाँकि, वो ऐसा करने में असफल रहे और उन्होंने गुस्से में चिदंबरम मंदिर को निशाना बनाया और फिर श्रीरंगम की ओर बढ़ गए। वो श्रीरंगम में उत्तरी छोर से घुसे थे। श्रीरंगम उस समय अपने धन-वैभव के लिए भी प्रसिद्ध था।

वहाँ घुसते ही मलिक कफूर की फौज ने वैष्णव संतों के साथ अत्याचार शुरू किया और उन्हें आसानी से हरा दिया। इसके बाद मंदिर में तोड़-फोड़ शुरू हुई और खजाना लूट लिया गया। मंदिर से कई बहुमूल्य चीजें चोरी कर ली गईं। इसके बाद मई 1311 में वो वापस दिल्ली की तरफ कूच करने लगा। हालाँकि, पाण्ड्या के सत्ताधीशों ने अगले एक दशक में श्रीरंगम और श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर का पुराना धन-वैभव वापस लाने में कामयाबी पाई।

जब मारे गए 12000 हिन्दू और 48 साल तक भटकते रहे भगवान: दूसरा हमला

1320 में पंजाब के गवर्नर गाजी मलिक की मदद से राज्य के वफ़ादारों ने ही खिलजियों को सत्ता से उखाड़ फेंका। भारतीय-तुर्की दासों के वंशज मलिक ने इसके बाद गियाशुद्दीन तुगलक के नाम से गद्दी पर बैठ कर तुगलक वंश की स्थापना की। खिजलियों के अंतर्गत डेक्कन में कुछ राज्य थे लेकिन तुगलक ने उन पर सम्पूर्ण रूप से कब्ज़ा करने का मन बनाया। वो वहाँ पूर्ण फौजी नियंत्रण चाहता था।

उसने 1321 में एक बहुत ही विशाल फ़ौज भेजी, ताकि पूरी दक्षिण भारत पर कब्ज़ा कर सके। इस फ़ौज का नेतृत्व उसका सबसे बड़ा बेटा उलुग खान कर रहा था, जो बाद में मोहम्मद बिन तुगलक के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा। हालाँकि, 1321 में उसका ये सपना ध्वस्त हो गया क्योंकि तुगलकों की फ़ौज को वारंगल में बुरी हार मिली। इसके बाद भी 2 साल बाद उसने वारंगल फतह कर के मालाबार की और कूच किया।

तमिलनाडु को ही तब मालाबार के नाम से जाना जाता था। पहले तो उसने तोडाइमंडलम पर कब्ज़ा किया और उसके बाद वो श्रीरंगम की ओर बढ़ा। यह एक ऐसा आक्रमण था, जिसकी चर्चा वैष्णव जगत के कई साहित्यों में होती है। श्रीरंगम के श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर में उलुग खान द्वारा मचाई गई तबाही का जिक्र गुरूपरम्पराई, प्रपन्नमित्रं और कोविल ओलुगू में विस्तृत रूप से मिलती है। ये सभी आक्रमण की अवधि 1323 ही बताते हैं।

जब उलुग खान की फौज श्रीरंगम पहुँची, तब वहाँ मंदिरों में एक मेला और त्योहार चल रहा था। श्रीरंगनाथस्वामी की प्रतिमा (उरचवार आझागिया मानवला पेरूमाल) को मुख्य मंदिर से कावेरी नदी के तट पर स्थित एक मंदिर में ले जाया जा रहा था। 12000 वैष्णव भक्त इस यात्रा में शामिल थे। जैसे ही वहाँ इस्लामी फौज के आने की खबर फैली, श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर के मुख्य पुजारी श्रीरंगराजनाथम वदुलदेशिका ने यात्रा को समाप्त कर दिया।

उन्होंने प्रतिमा को मंदिर के धन के साथ दक्षिण की तरफ भेज दिया। इसके बाद जैसे ही उलुग खान वहाँ पहुँचा, वो मूर्ति को न पाकर पागल हो गया और उसने 12,000 वैष्णव भक्तों का सिर कलम करने का आदेश जारी कर दिया। इसे कोविल उलुगू में एक ऐसे आक्रमण के रूप में बताया गया है, जिसने 12,000 सिर का बलिदान ले लिया। इस्लामी आक्रान्ताओं से बचने के लिए श्रीरंगनाथस्वामी की प्रतिमा मंदिर-मंदिर घूमती रही।

अंत में वो प्रतिमा तिरुमल पहुँची, जहाँ उसे कोई खतरा नहीं था और वहाँ वो सुरक्षित थी। इस्लामी आक्रान्ताओं से बचने के लिए प्रतिमा को 48 वर्ष अपने मंदिर से बाहर बिताने पड़े। इसके बाद 1371 में विजयनगर साम्राज्य ने इस्लामी आक्रान्ताओं के मंसूबों को ध्वस्त कर श्रीरंगम के श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर में प्रतिमा को पुनः स्थापित किया। दूसरा वाला आक्रमण भयंकर इसलिए थे क्योंकि तुगलकों ने दिल्ली से मलाबार पर नियंत्रण कर लिया था।

एक दशक तक वो ऐसे ही राज करते रहे। इसे वैष्णव इतिहास का सबसे अँधकार भरा युग माना जाता है। इस्लामी आक्रांता उलुग खान का एक प्रतिनिधि तो श्रीरंगम में ही रहता था और उसने पवित्र श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर के सामने ही अपना घर बना लिया था। उसने श्रीरंगम के आसपास के गाँवों पर कुछ वर्ष तक राज किया। कहते हैं कि मंदिर में रहते-रहते उसे तरह-तरह की बीमारियाँ हो गई थीं। बाद में वो कन्नूर गया, जहाँ उसने पॉयसलेसवार मंदिर को नुकसान पहुँचाया।

इधर बुक्का राय ने श्रीरंगम के श्रीरंगनाथस्वामी मंदिर को इस्लामी आक्रान्ताओं से बचा कर इसका पुराना वैभव को वापस लाने में सफलता पाई और उसके बाद विजयनगर के संगम वंश ने भी इसे जारी रखा। लेकिन, वामपंथी इतिहासकारों ने इन घटनाओं को हमारी किताबों में जगह नहीं दी क्योंकि वो चाहते थे कि हमें गलत इतिहास पढ़ाया जाए। इस्लामी आक्रान्ताओं के कृत्यों को छिपाने की कोशिश हुई।

प्रशांत कनौजिया गिरफ्तार, राम मंदिर पर फर्जी फोटो से OBC/SC/ST करके फैला रहा था जहर

सोशल मीडिया पर लगातार विवादास्पद टिप्पणी करने वाले प्रशांत कनौजिया (Prashant Kanojia) को उत्तर प्रदेश पुलिस ने दिल्ली से गिरफ़्तार कर लिया है। प्रशांत कनौजिया के खिलाफ सोमवार (अगस्त 17, 2020) को लखनऊ के हजरतगंज कोतवाली में FIR दर्ज की गई थी। कथित एक्टिविस्ट और फ्रीलांस पत्रकार प्रशांत पर श्रीराम मंदिर को लेकर फर्जी खबर के जरिए दलितों को भड़काने का आरोप है।

आरोपित प्रशांत कनौजिया ने इस बार (मतलब वो बार-बार ऐसी हरकत करता है) अयोध्या श्रीराम मंदिर को लेकर विवादित टिप्पणी करते हुए फोटोशॉप के माध्यम से दलितों को भड़काने का प्रयास किया था। इससे पहले भी प्रशांत कनौजिया के खिलाफ भाजपा नेता शशांक शेखर सिंह ने FIR दर्ज कराई थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई थी।

FIR के अनुसार, प्रशांत कनौजिया ने सोशल मीडिया पर जाति, धर्म व वर्ग को बाँटने से संबंधित टिप्पणी की थी। इससे समाज में भय का माहौल हो गया था। शांति व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका पर पुलिस ने आरोपित के खिलाफ आइटी एक्ट, सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने व जालसाजी समेत विभिन्न धाराओं में रिपोर्ट दर्ज की है।

FIR की कॉपी
FIR की कॉपी

प्रशांत कनौजिया के ट्विटर अकाउंट से भी उसकी गिरफ्तारी की ख़बरें रीट्वीट की गई हैं। हालाँकि, यह स्पष्ट नहीं है कि यह ट्वीट उसने कस्टडी में रहते हुए किए या फिर उससे पहले।

दरअसल, प्रशांत कनौजिया ने हाल में कॉन्ग्रेस नेता उदितराज द्वारा संचालित संगठन ‘ऑल इंडिया परिसंघ’ का एक पोस्ट शेयर किया था। इसमें दावा किया गया था कि हिन्दू आर्मी नामक संगठन चलाने वाले सुशील तिवारी ने कहा है कि राम मंदिर में शूद्रों, एससी, एसटी व ओबीसी का प्रवेश निषेध रहेगा, सभी लोग एक साथ आएँ।

सुनील तिवारी के इसी फर्जी दावे को दलित एक्टिविस्ट व फ्रीलांस पत्रकार प्रशांत कनौजिया ने भी शेयर किया और इस पर संदेश लिखा – “तिवारी जी का आदेश है।”

जबकि वास्तविकता यह थी कि प्रशांत कनौजिया द्वारा शेयर की गई यह तस्वीर एडिट की हुई थी, जबकि हिन्दू आर्मी के सुशील तिवारी नामक फेसबुक पेज ने ठीक उसी बैकग्राउंड वाली पोस्ट शेयर की थी, जिसमें लिखा था – “UPSC से इस्लामिक स्टडी को तुरन्त हटाकर वैदिक स्टडी जोड़ा जाए, सब लोग एक साथ आएँ।”

सुप्रीम कोर्ट ने पीएम केयर फंड का पैसा NDRF में ट्रांसफर करने की माँग ठुकराई, कहा- दोनों फंड अलग

पीएम केयर्स फंड को NDRF में ट्रांसफर करने और राष्ट्रीय आपदा के दौरान राहत के लिए एक समान योजना बनाने की माँग पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पीएम केयर्स फंड को एनडीआरएफ में ट्रांसफर करने की माँग खारिज कर दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ये दोनों फंड अलग हैं। सरकार जरूरत के हिसाब से फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है।

कोरोना के मद्देनजर राष्ट्रीय आपदा के दौरान राहत के लिए नई योजना बनाने की माँग पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नवंबर 2019 में बनी योजना ही पर्याप्त है। किसी नए एक्शन प्लान और न्यूनतम मानकों को अलग करने की आवश्यकता नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है कि पीएम केयर्स फंड भी चैरिटी फंड ही है। लिहाज़ा रकम ट्रांसफर करने की जरूरत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि कोई भी व्यक्ति या संस्था NDRF में रकम दान कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पीएम केयर्स फंड में जमा पैसों को एनडीआरएफ में ट्रांसफर करने की माँग सही नहीं है। आम लोग भी एनडीआरएफ में योगदान दे सकते हैं। पीएम केयर्स फंड में लोग स्वैच्छिक योगदान देते हैं।

बता दें कि याचिकाकर्ता एनजीओ, सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन (CPIL) ने दावा किया था कि आपदा प्रबंधन अधिनियम के तहत कानूनी जनादेश का उल्लंघन करते हुए पीएम केयर्स फंड बनाया गया था। याचिका में कहा गया था कि आपदा प्रबंधन अधिनियम के मुताबिक आपदा प्रबंधन के लिए किसी भी व्यक्ति या संस्था द्वारा दिया गया कोई भी अनुदान अनिवार्य रूप से एनडीआरएफ को ट्रांसफर किया जाना चाहिए।

सीनियर एडवोकेट दुष्यंत दवे ने याचिकाकर्ता एनजीओ की ओर से दलील पेश करते हुए कहा था कि हम किसी पर सवाल नहीं उठा रहे है लेकिन पीएम केयर फंड का गठन नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के प्रा‌वधान के विपरीत है। दवे ने कहा था कि एनडीआरएफ का ऑडिट नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) द्वारा होता है लेकिन पीएम केयर फंड का ऑडिट प्राइवेट ऑडिटर द्वारा कराया जा रहा है।

एक अन्य पक्षकार की ओर से वरिष्ठ अधिवकता कपिल सिब्बल ने भी दलीलें रखी। उन्‍होंने कहा कि सीएसआर योगदान के सारे लाभ पीएम केयर्स फंड को दिए जा रहे हैं जो बहुत ही गंभीर मामला है जिस पर विस्तार से गौर करने की जरूरत है। 

वहीं केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत के समक्ष पेश सॉलिसीटर तुषार मेहता ने अपने हलफनामे में इस तर्क को खारिज कर दिया था। उन्होंने कहा कि साल 2019 में एक राष्ट्रीय योजना तैयार की गई थी जिसमें जैविक आपदा जैसी स्थिति से निबटने के तरीकों को शामिल किया गया था। उस दौरान किसी को भी कोरोना महामारी के बारे में जानकारी नहीं थी। यह जैविक और जन स्वास्थ्य योजना है जो राष्ट्रीय योजना का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि पीएम केयर्स फंड राहत कार्य करने के लिए स्थापित एक कोष है और अतीत में इस तर्ज पर कई ऐसे कोष बनाए जा चुके हैं। अत: कोई योजना नहीं होने की दलील गलत है। 

गौरतलब कि केंद्र सरकार ने 28 मार्च को प्राइम मिनिस्टर्स सिटिजन असिस्टेंस ऐंड रिलीफ इन इमर्जेंसी सिचुएशंस (PM CARES) फंड का निर्माण किया था, ताकि कोविड-19 महामारी जैसे आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने में मदद मिल सके। जिसमें देश के बड़े-बड़े उद्योगपतियों से लेकर आम लोगों तक ने मदद दी है।

इस फंड का इस्तेमाल कोरोना वायरस से जुड़े खर्च में किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान पर देश के आम से लेकर खास लोगों ने पीएम केयर्स फंड में पैसे जमा किए थे। फंड की शुरुआत होने के कुछ ही दिनों के भीतर इसमें 6500 करोड़ रुपए से अधिक धन जमा हो गए थे।

बता दें कि पीएम केयर्स फंड को लेकर विपक्ष ने लगातार केंद्र सरकार पर आरोप लगाए थे। वहीं सरकार ने उसमें जमा पैसों से देश के अस्पतालों को वेंटिलेटर्स, पीपीई किट, एन-95 मास्क बाँटे। साथ ही लॉकडाउन में घर लौटे प्रवासी मजदूरों के खाने के लिए भी पैसे दिए गए।

कॉन्ग्रेस ने पीएम नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर माँग की थी कि PM-CARES फंड के तहत जमा हुए सभी पैसे को प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF) में स्थानांतरित कर दिया जाए। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के अनुसार, यह ‘बेहतर पारदर्शिता, जवाबदेही और दक्षता’ के लिए किया जाना था। हालाँकि, मोदी सरकार ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष द्वारा की गई माँग को नजरअंदाज कर दिया था।

भगवान श्रीराम से लेकर गोधरा तक का मजाक उड़ाने वाले मुनव्वर फारूकी ने बताया हिंदुओं को ‘भेड़ों की नस्ल’: शिकायत दर्ज

स्टैंड-अप कॉमेडी के नाम हिंदू देवी देवताओं पर अभद्र टिप्पणियाँ करने वाले मुनव्वर फारूकी के ख़िलाफ़ एक बार फिर एफआईआर करवाने की तैयारी है। हालाँकि, अभी ये एफआईआर दर्ज नहीं हुई है। लेकिन उसके ख़िलाफ़ शिकायत दायर करवा दी गई है।

दिल्ली के किशनगढ़ थाने में पेन ऑफ धर्म के एडमिन शिवम रावत नाम के युवक ने फारूकी के खिलाफ़ ये शिकायत दर्ज करवाई है। अपनी शिकायत में उन्होंने मुनव्वर फारूकी समेत मुंबई स्थित ‘द हैबीटेट- कॉमेडी एंड म्यूजिक कैफे’ पर भी एफआईआर दर्ज करने की अपील की है।

उनका कहना है कि कुछ समय पहले जब फारूकी की वीडियोज वायरल होना शुरू हुईं थी, तब कई एक्टिविस्टों ने इस मामले को उठाया था। चारों ओर से आलोचना और निंदा को देखते हुए उस वीडियो से विवादित पार्ट को हटा दिया गया और यूट्यूब पर वीडियो मौजूद रही।

शिकायत की कॉपी
शिकायत की कॉपी

कई शिकायतों के बाद भी जब फारूकी पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो उसकी हिम्मत और बढ़ गई। नतीजतन ये दोबारा यूट्यूब पर आया और इस बार एक नए अंदाज में उन लोगों का मजाक बनाया जो उसके ख़िलाफ़ थे। उसने इस वीडियो में उन लोगों (मुख्यत: हिंदुओं) को ‘भेड़ों की नस्ल’ बताया। साथ ही कहा कि उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। आगे वो आगे नेटफ्लिक्स पर भी आएगा। लोगों ने उसके ख़िलाफ़ शिकायत करके बस उसे फेमस किया है।

शिवम मानते हैं कि फारूकी को अब ये लगने लगा है कि वो कुछ भी बोलेगा लेकिन उसके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं होगी।

शिवम बेंगलुरु में हुई हिंसा की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, “हम ऐसी हरकतों का विरोध उस तरह नहीं करेंगे जैसे पिछले दिनों हमने देखा, जहाँ पुलिस थानों को जलाया गया, शहर पर हमला किया गया, सार्वजनिक संपत्तियों को आग लगाकर शहर को दाव पर लगा दिया गया। लेकिन, हम ये जानते हैं कि इन लोगों को कैसे सबक सिखाया जाएगा। हमारे पास न्यायव्यवस्था है, कानून है और हम उसका इस्तेमाल कर रहे हैं। इसीलिए मैंने मुनव्वर फारूकी और उस हैबीटेट क्लब के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज करवा दी है।”

शिवम का कहना है कि ये शिकायत दर्ज करवाने में उन्हें कई थानों से लेकर साइबर सेल के चक्कर लगाने पड़े। कोई भी इस संबंध में एफआईआर दर्ज करने को तैयार नहीं था। लेकिन लगातार प्रयासों, दबाव, और 5-7 घंटे के इंतजार के बाद शिकायत को दर्ज कर लिया गया।

कंप्लेन नंबर मिलने के बाद अब वह लगातार कोशिश कर रहे हैं कि मुनव्वर फारूकी को उसके कृत्य के लिए जेल में डाला जाए। वे कहते हैं कि फारूकी ने भगवान के बारे में असंवेदनशील टिप्पणियाँ कीं जो किसी भी रूप में बर्दाश्त योग्य नहीं है। इसके अलावा उन्होंने गोधरा कांड में भी फारूकी की टिप्पणी का जिक्र किया। जहाँ उसने कारसेवकों के मरने का मजाक बनाया था।

वह अकरम हुसैन के केस का जिक्र करते हुए कहते हैं कि ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई हो सकती है, अगर हम कदम उठाएँ। अगर हम शिकायत करेंगे तो एक आशा रहती है कि इनके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई होगी और इन्हें जेल में डाला जाएगा।

यूट्यूब चैनल पेन ऑफ धर्म पर पूरे मामले के बारे बताते हुए शिवम कहते हैं कि अगर हम लोग शिकायत नहीं दर्ज करवाएँगे, तो सोशल मीडिया एक्टिविजम केवल एकतरफा होता है, वो भी एक निश्चित समय के लिए। हमें लगता है कि जंग जीत ली गई। लेकिन सच ये होता है कि सोशल मीडिया पर शुरू हुई ऐसी जंग एक शुरूआत होती है, अंत नहीं। वहाँ सक्रियता दिखाना जरूरी है। मगर, हकीकत में हमें उससे आगे निकलना होगा। ताकि ऐसे लोगों को पता चल सके कि अगर वह कुछ गलत करेंगे तो उन्हें परेशानी झेलनी पड़ेगी। इसलिए उन्होंने इस फारूखी के अलावा उस जगह पर भी शिकायत करवाई है जहाँ उसने कॉमेडी की।

पेन ऑफ धर्म (Pen of dharma) नाम के इस प्लेटफॉर्म के जरिए प्रयास किया जा रहा है कि हिंदुओं में अपनी संस्कृति, सभ्यता के प्रति जागरूकता फैले और मुनव्वर फारूकी जैसे लोगों की पोल खुले। पेन ऑफ धर्म के एडमिन शिवम रावत बताते हैं कि वह आगे भी ऐसे कार्यों को जुझारू रूप से करते रहेंगे। उनका प्रयास यही है कि इस तरह के कृत्य करने वालों सजा दिलवाई जाए।

समाज के अन्य लोगों को भी आगे आकर इस तरह के गंदे मानसिकता वाले लोगों पर, जो कॉमेडी के नाम पर धार्मिक वैमनस्यता फैलाने तथा हिन्दू धर्म और आस्था पर अपमानजनक टिप्पणी करने की हिमाकत करते हैं, ऐसे टुटपुँजिया जोकरों के खिलाफ, जागरूक लोगों को कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए। तभी ऐसों का मनोबल टूटेगा और ये ऐसा कुछ भी करने से पहले सौ बार सोचेंगे।

जब ट्रेन की सीट के नीचे छिप गए थे सिद्धू और सभी सिख खिलाड़ी… चेतन चौहान ने दंगाई भीड़ से बचाई थी जान

उत्तर प्रदेश के मंत्री और पूर्व क्रिकेटर चेतन चौहान का कोरोना वायरस के कारण रविवार (अगस्त 16, 2020) को निधन हो गया। वो अमरोहा से 2 बार सांसद रहे थे और 2017 में विधायक बनने के बाद उन्हें योगी सरकार में मंत्री बनाया गया था। वो NIFT के अध्यक्ष भी रहे थे। आज हम उन्हें लेकर ऐसी कहानी सुनाने जा रहे हैं, जब उन्होंने सिख दंगों के दौरान नवजोत सिंह सिद्धू समेत सिख खिलाड़ियों को दंगाइयों से बचाया था।

चेतन चौहान टूटे हुए जबड़ों के साथ रणजी ट्रॉफी में शतक लगाने के लिए जाने जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया में तो उन्होंने डेनिस लिली और जेफ़ थॉमसन को उनके घर में ही टूटे अंगूठे के साथ खेला था। ये जाँबाज खिलाड़ी न सिर्फ क्रिकेट पिच पर बल्कि बाहर भी बहादुर था। 73 साल की उम्र में कोरोना के कारण हुई बीमारियों से उनका निधन हो गया। वो 4 दशक से भी अधिक समय से राजनीति में सक्रिय थे।

अक्टूबर 31, 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या हुई और उसके बाद पूरे देश में कॉन्ग्रेस नेताओं ने सिख दंगों को भड़काया, जिसमें कई बड़े नेताओं पर भी आरोप लगे। जहाँ जगदीश टाइटलर और सज्जन सिंह जैसों ने इसके लिए जेल की हवा खाई, वहीं कमलनाथ जैसे लोगों पर अभी भी आरोप लगते हैं कि वो जेल में क्यों नहीं हैं। ये कहानी उसी सिख दंगों के दौरान की है, जब नवजोत सिंह सिद्धू, राजिंदर सिंह और योगराज सिंह जैसे क्रिकेटर ट्रेन से जा रहे थे।

ये तीनों ही सिख हैं। जहाँ योगराज सिंह लोकप्रिय ऑलराउंडर युवराज सिंह के पिता हैं, वहीं नवजोत सिंह सिद्धू वही हैं, जिन्होंने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के पाँव छुए थे और पंजाब में पार्टी की सरकार बनने पर मंत्री बने।

कहानी तब की है, मतलब 1984 की। उस समय दिलीप ट्रॉफी का सेमीफइनल पुणे में हुआ था। इसके बाद सेंट्रल और नॉर्थ जोन के खिलाड़ी झेलम एक्सप्रेस से लौट रहे थे। मैच 30 अक्टूबर को ख़त्म हुआ और अगले दिन जब वो लोग ट्रेन के लिए तैयार हो रहे थे तो उन्हें सुबह इंदिरा गाँधी की हत्या समाचार प्राप्त हुआ।

हरियाणा के पूर्व ऑफ स्पिनर सरकार तलवार ने इस घटना के सम्बन्ध में ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के प्रत्यूष राज से बातचीत की, जिसमें उन्होंने बताया कि टीम मैनेजर प्रेम भाटिया ने उन सबके लिए झेलम एक्सप्रेस के फर्स्ट क्लास की टिकट कराई थी। उन्होंने कहा कि वो डरावनी यात्रा थी, जिसमें उन्हें दिल्ली पहुँचने में 4 दिन लग गए थे। एक स्टेशन पर जैसे ही ट्रेन रुकी, 40-50 लोग सिखों को ढूँढ़ते हुए ट्रेन में घुस गए।

नवजोत सिंह सिद्धू, राजिंदर घई और योगराज सिंह- उस समय ये तीन सिख क्रिकेटर उन लोगों के साथ ही थे। सरकार तलवार ने TOI को बताया कि चेतन चौहान ने आगे बढ़ कर दंगाई भीड़ के साथ बहस की और उन्हें समझाया। जब उन्हें पता चला कि ये भारतीय क्रिकेटरों की टीम है तो दंगाई वहाँ से चले गए। इस दौरान यशपाल राणा भी उनके साथ थे, जो आगे आए। सभी खिलाड़ी काफी डरे हुए थे।

नवजोत सिंह सिद्धू और राजिंदर घई तो ट्रेन कम्पार्टमेंट की सबसे निचली सीट के नीचे बैग के पीछे छिपे हुए थे। योगराज सिंह ने सिद्धू से कहा कि वो अपने बाल कटवा लें, जिससे दंगाई भीड़ उन्हें सिख न समझे। योगराज सिंह बताते हैं कि सिद्धू ने तब ये कह कर बाल कटवाने से इनकार कर दिया था कि वो एक सरदार पैदा हुए हैं और सरदार ही मरेंगे। योगराज ने उस घटना की तुलना ‘बर्निंग ट्रेन’ से करते हुए बताया कि चेतन चौहान और यशपाल ने दंगाइयों से बहस की थी।

एक दंगाई ने चेतन चौहान पर चिल्लाते हुए कहा कि वो लोग यहाँ सिर्फ सरदारों को खोजने के लिए आए हैं और उन्हें कुछ भी नहीं किया जाएगा। इस पर चेतन चौहान ने पलट कर जवाब देते हुए कहा था कि ये सभी उनके भाई हैं और कोई भी दंगाई उन्हें छू भी नहीं सकता। योगराज सिंह ने कहा कि चेतन चौहान जिस तरह से दंगाइयों से निपटे थे, वो काबिले तारीफ था। दूसरे कम्पार्टमेंट में रहे गुरशरण सिंह को भी ये घटना याद है।

उनका तो यहाँ तक कहना है कि अगर उस दिन चेतन चौहान नहीं होते तो उनमें से एक भी सरदार शायद ज़िंदा नहीं बचता। उन्होंने बताया कि वो और उत्तर प्रदेश के लेग स्पिनर राजिंदर हंस दूसरी बोगी में थे और उन्हें जब इस घटना के बारे में पता चला तो सभी काफी डर गए थे। इसके बाद चेतन चौहान उनकी बोगी में आए और उन्होंने खिलाड़ियों को आश्वासन दिया कि वो सब सुरक्षित हैं और उन लोगों को दंगाई भीड़ कुछ नहीं करेगी।

पूर्व AAP नेता ताहिर हुसैन से ED ने की पूछताछ: फर्जी कम्पनियों के जरिए जुटाया था दिल्ली दंगों के लिए फंड

पूर्व AAP नेता ताहिर हुसैन, जो इस साल की शुरुआत में राष्ट्रीय राजधानी में हुए भीषण हिंदू-विरोधी दंगों के प्रमुख अभियुक्त हैं, से प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पूछताछ की है। टाइम्स नाउ द्वारा प्रकाशित एक विशेष रिपोर्ट के अनुसार, ताहिर हुसैन से दिल्ली हिंसा की फंडिंग को लेकर पूछताछ की जा रही है। इसके साथ ही, निजामुद्दीन मरकज और दिल्ली दंगों के बीच सम्बन्ध की भी अब जाँच की जा रही हैं।

दिल्ली दंगों में प्रमुख अभियुक्त निकल आने पर ताहिर हुसैन को आम आदमी पार्टी से निलंबित कर दिया गया था और वर्तमान में वह दिल्ली पुलिस की न्यायिक हिरासत में हैं। इससे पहले, प्रवर्तन निदेशालय यह जाँच कर रहा था कि ताहिर और उसके सहयोगियों द्वारा नियंत्रित की जाने वाली कंपनियाँ किस तरह से सीएए प्रदर्शनकारियों और दंगाइयों को फंड प्रदान करती थीं। ईडी ने जनवरी में लेनदेन को ट्रैक करने के लिए हुसैन के बैंक खातों की भी जाँच की है।

प्रवर्तन निदेशालय ने ताहिर हुसैन के खिलाफ दिल्ली दंगों में शामिल होने के लिए मनी लॉन्ड्रिंग अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है। टाइम्स नाउ की रिपोर्ट में ईडी के सूत्रों का हवाला दिया गया है कि हुसैन ने दिसंबर, 2019 से फरवरी, 2020 तक दंगा करने वालों और दंगाइयों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने वालों को 1.02 करोड़ रुपए ट्रांसफर करने के लिए कई शेल कंपनियाँ बनाई थीं।

इससे पहले, प्रवर्तन निदेशालय ने AAP के पूर्व पार्षद हुसैन के खिलाफ प्रोडक्शन वारंट जारी करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाने से पहले ताहिर हुसैन के ठिकानों और अड्डों पर भी छापा मारा था। हुसैन के अलावा, दिल्ली दंगों का एक अन्य आरोपित फैजल फारूक भी प्रवर्तन निदेशालय की जाँच के दायरे में हैं। एजेंसी को संदेह है कि वह फरवरी, 2020 में दिल्ली में कई लोगों के लिए सक्रिय रूप से दंगों के लिए फंडिंग का मोर्चा संभाले हुए था।

दिल्ली दंगों में ताहिर हुसैन की भूमिका

इस साल की शुरुआत में 24 फरवरी से 25 फरवरी तक, राजधानी दिल्ली शायद अब तक के सबसे वीभत्स हिंदू विरोधी दंगों में से एक की शिकार बनी। इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा मास्टरमाइंडस के योजनाबद्ध तरीके के साथ संगठित और सटीक रूपरेखा से किए गए दंगों में 53 लोग मारे गए थे और सैकड़ों घायल हुए।

इस भयावह कहानी के मुख्य आरोपितों में से एक AAP नेता ताहिर हुसैन है, जिसने कि दिल्ली दंगों को अंजाम दिया था। इन दंगों में आईबी के कर्मचारी अंकित शर्मा की संप्रदाय विशेष की भीड़ द्वारा निर्मम हत्या कर दी गई थी और कई हिन्दुओं की संपत्तियों को जलाकर राख कर दिया गया था। ताहिर हुसैन और दिल्ली दंगों में उनकी भूमिका के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई है।

इससे पहले, ताहिर हुसैन ने पूछताछ के दौरान स्वीकार किया था कि वह फरवरी 2020 के हिंदू-विरोधी दिल्ली दंगों का मास्टरमाइंड है। दिल्ली पुलिस को दिए अपने बयान में उसने कहा कि जब वह 2017 में आम आदमी पार्टी का पार्षद बना, तो वह चाहता था कि अपनी राजनीतिक पहुँच और धन का उपयोग हिंदुओं को सबक सिखाने के लिए करेगा।

पुलिस का दावा है कि सरकारी क़बूलनामे में ताहिर हुसैन ने यह बात मानी है कि उनके एक सहयोगी ख़ालिद सैफ़ी और पीएफ़आई ने भी इस हिंसा को अंजाम देने में उनकी मदद की थी। ‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ अख़बार के अनुसार, ताहिर हुसैन ने पुलिस को बताया कि वो 08 जनवरी को जेएनयू के पूर्व छात्र उमर ख़ालिद से शाहीनबाग़ स्थित पॉपुलर फ़्रंट ऑफ़ इंडिया (पीएफ़आई) के दफ़्तर में मिला था।

दिल्ली पुलिस के अनुसार, दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों के लिए काँच की बोतलें, पेट्रोल, तेज़ाब, पत्थर समेत कुछ अन्य सामग्री जमा करने के काम ताहिर हुसैन को सौंपा गया था, जो उसने अपने घर की छत पर जमा किए थे।

पूर्व AAP नेता ताहिर हुसैन ने कहा, “04 फ़रवरी को यह तय हुआ कि सीएए विरोधी प्रदर्शन में आने के लिए लोगों को भड़काना होगा। ख़ालिद सैफ़ी का काम लोगों को भड़का कर सड़कों पर उतारने का था। ख़ालिद सैफ़ी ने कहा था कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दौरे (फ़रवरी 17, 2020) के समय कुछ तो बड़ा करना होगा, ताकि मौजूदा सरकार को झुकने के लिए मजबूर किया जा सके।”

‘डॉक्टर से ज्यादा जानते हैं कंपाउंडर’ – संजय राउत का बयान, IMA ने की इस्तीफे की माँग, लिखा CM ठाकरे को पत्र

शिवसेना नेता संजय राउत ने कुछ दिन पहले एक मराठी न्यूज चैनल को इंटरव्यू देते हुए कहा था कि डॉक्टरों से बेहतर कंपाउंडर होते हैं। इसलिए वह कंपाउंडर से ही दवा लेते हैं। अपने इस बयान को उन्होंने WHO की आलोचना करते हुए दिया था।

अब उनके इसी बयान पर बवाल मचा है। जिससे उनके इस्तीफे की माँग उठने लगी है। IMA ने तो इस संबंध में महाराष्ट्र मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर अपनी नाराजगी भी जाहिर की है। साथ ही शिवसेना नेता से माफी माँगने को भी कहा है।

ठाणे के एसोसिएसन अध्यक्ष की ओर से लिखे गए पत्र में राउत की निंदा करते हुए कहा गया है कि स्वास्थ्यकर्मी अपने बीवी, बच्चे, बूढ़े माता-पिता को छोड़कर, अपनी जान को खतरे में डालकर काम कर रहे हैं। ऐसे समय में संजय राउत जैसे वरिष्ठ राजनेताओं के मुख से ये सुनना कि कंपाउंडर को डॉक्टर से ज्यादा मालूम है- ये बेहद हैरान करने वाला है।

पत्र में लिखा गया है कि वह इस तरह के बर्ताव की निंदा करते हैं और संजय राउत की इस्तीफे की माँग करते हैं। उनका यह भी कहना है कि डॉक्टर इस तरह के अपमानजनक व नकारात्मक कमेंट्स के साथ अच्छे से काम नहीं कर पाएँगे। इससे डॉक्टरों का मनोबल गिरा है और इसलिए वह इस मामले पर कड़ी कार्रवाई चाहते हैं।

आईएमए, ठाणे के अध्यक्ष डॉ. संतोष कदम ने कहा, “इस समय जब पूरी दुनिया कोरोना वायरस जैसी महामारी से लड़ रही है, खासतौर पर उस समय हम मेडिकल टीम और डॉक्टरों के प्रति सकारात्मक नजरिया अपनाए जाने को देखते हैं। इस वजह से हमने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को पत्र लिखा है।”

इसी प्रकार डॉक्टरों के दूसरे संगठन मार्ड ने भी सोमवार को मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर पूछा है कि क्या वह भी मानते हैं कि डॉक्टरों को कुछ नहीं आता और उनसे ज्यादा ज्ञान कंपाउंडर्स को होता है? 

इस बीच भाजपा ने भी शिवसेना नेता पर निशाना साधा है और उनसे माफी की माँग की है। भाजपा के मुताबिक संजय राउत ने डॉक्टर्स का अपमान किया है, जो इस महामारी में अहम रोल निभा रहे हैं।

बता दें कि स्थानीय चैनल को दिए अपने साक्षात्कार में , शिवसेना नेता ने कहा था, “WHO लोगों का एक समूह है। तो डॉक्टर भी उसका हिस्सा हैं। सच्चाई ये है कि एक कंपाउंडर भी डॉक्टर से ज्यादा जानता है। मैं हमेशा डॉक्टर की जगह कंपाउंडर से दवाई लेता हूँ।” उन्होंने आगे यह भी कहा कि लोगों को WHO पर यकीन नहीं करना चाहिए क्योंकि कोरोना उन्हीं के कारण फैला है।

50 रुपए में प्लेटफॉर्म टिकट: दिग्विजय सिंह फैला रहे थे झूठ, रेलवे ने बताया असली कारण

कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने मंगलवार (अगस्त 18, 2020) को ट्विटर पर रेलवे की प्लेटफॉर्म टिकट को लेकर खुलेआम झूठ फैलाया। अपने ट्वीट में उन्होंने दावा किया कि कॉन्ग्रेस काल में प्लेटफॉर्म टिकट की दर 3 रुपए हुआ करती थी लेकिन भाजपा काल मे ये टिकट 50 रुपए हो गई है।

कुल मिलाकर दिग्विजय सिंह ने स्पष्ट तौर पर अपने ट्वीट से यह बताने का प्रयास किया कि भाजपा काल में इन टिकट दरों में 15 गुना बढ़ोतरी हुई है।

हैरानी की बात है कॉन्ग्रेस नेता का ये ट्वीट ऐसे समय में आया, जब भारतीय रेलवे प्रवक्ता पहले ही इस पर स्थिति को साफ कर चुके हैं। अपने एक ट्वीट में भारतीय रेलवे के प्रवक्ता ने कल ही स्पष्ट किया था कि आखिर क्यों रेलवे ने प्लेटफॉर्म टिकट में बढ़ोतरी की है।

उन्होंने बताया कि कोरोना महामारी के चलते ये फैसला लिया गया ताकि स्टेशन पर भीड़ इकट्ठा न हो और सामाजिक दूरी वाले नियम का भी पालन हो सके। भारतीय रेलवे प्रवक्ता ने यह सफाई कथित पत्रकार प्रशांत कनौजिया के ट्वीट के रिप्लाई में दी थी। जिसमें प्रशांत रेलवे पर झूठी खबर फैलाने की कोशिश कर रहे थे। भारतीय रेलवे ने बताया कि टिकट दरों में बढ़ोतरी कोरोना महामारी की शुरुआत में ही कर दी गई थी।

इतना ही नहीं, रेलवे स्टेशन पर अधिक भीड़ को रोकने के लिए यह फैसला मार्च में ही ले लिया गया था। जिसके अनुसार 200 स्टेशन पर प्लेटफार्म टिकट 10 रुपए से 50 रुपए कर दी गई। ऑपइंडिया से बात करते हुए रेलवे अधिकारी ने बताया कि प्लेटफॉर्म टिकट का दाम 50 रुपए करने का उद्देश्य केवल ये था कि यात्री के अलावा कोई भी ग़ैरजरूरी इंसान वहाँ न आए ताकि सोशल डिस्टेंसिंग बनी रहे।

उन्होंने बताया, “इससे प्रवेशकों को स्टेशन तक सीमित रखने और सामाजिक दूरी बनाए रखने में सुविधा हुई। अन्य डीआरएम से भी अनुरोध किया गया है कि वे प्लेटफॉर्म टिकटों की बिक्री को 50 रुपए करने की अनुमति दें, जैसा कि लॉकडाउन से ठीक पहले किया जा रहा था। लेकिन अब तक IRSDC द्वारा प्रबंधित किए जा रहे अन्य स्टेशनों पर पीएफ टिकटों की बिक्री शुरू नहीं हुई है।”

आगे उन्होंने ये भी बताया कि टिकट दरों में यह बढ़ोतरी अस्थायी है। जैसे ही महामारी का प्रकोप कम होगा, दोबारा सब कुछ सामान्य कर दिया जाएगा।

बता दें कि अभी हाल में पुणे में कोरोना का प्रकोप बहुत तेजी से बढ़ता दिखा। महाराष्ट्र अब भी पूरे देश में सबसे ज्यादा प्रभावित राज्य बना हुआ है। केवल पुणे में कोरोना के 1, 32, 481 मामले सामने आ चुके हैं। इनमें से 39424 अब भी सक्रिय हैं।

साहिल कुमार बन कर शौकत अली ने फँसाया, शादी भी कर ली… फिर कुल्हाड़ी से हमला कर घर से भगाया

ग्वालियर की एक युवा महिला ने आरोप लगाया है कि जम्मू कश्मीर के एक व्यक्ति शौकत अली ने पहचान छिपा कर उससे शादी कर ली और फिर धोखा दिया। आरोप है कि उस व्यक्ति ने पहले तो महिला के साथ अपनी छद्म हिन्दू पहचान के साथ शादी की और बाद में उसे अपने घर से निकाल बाहर किया। ये मामला रविवार (अगस्त 16, 2020) को सामने आया, जब ग्वालियर की उस महिला का वीडियो वायरल हुआ।

उस वीडियो में अपने साथ हुए अत्याचार को बयान करते हुए महिला ने मदद की अपील की। ग्वालियर की पुलिस ने बताया है कि महिला का वीडियो जब वायरल हुआ, उससे 2 दिन पहले ही वो वहाँ स्थित अपने घर पहुँची थी। एक महिला सब-इंस्पेक्टर ने पीड़िता से संपर्क किया है। महिला ने फेसबुक पर पोस्ट किए गए वीडियो में बताया है कि वो जम्मू कश्मीर के पूँछ स्थित सुरनकोट में थी, जहाँ उसके पति और पति के परिवार वालों ने उसे घर से निकाल दिया।

पीड़िता ने कहा कि स्थानीय पुलिस से उसे कोई मदद नहीं मिली। साथ ही अपने पति और उसके परिवार पर उसकी हत्या का इरादा रखने का भी आरोप लगाया। उसने बताया कि वापस घर पहुँचने में पुलिस ने उसकी कोई मदद नहीं की। महिला ने बताया कि उसके पति का असली नाम शौकत अली है, जो पिछले 6 महीने से आर्थिक और शारीरिक रूप से उसका शोषण कर रहा था। साथ ही वो उसकी जम कर पिटाई भी करता था।

महिला ने बताया कि शौकत अली ने छद्म हिन्दू नाम के साथ उसे अपने प्रेम जाल में फँसाया और फिर उससे शादी कर ली। जब वो उसके घर पहुँची और अपने ससुराल वालों से मिली, तब उसे उसके मजहब का भान हुआ। इसके कुछ दिनों बाद शौकत अली और उसके परिवार वालों ने कुल्हाड़ी से उस पर हमला किया और पीट-पीट कर घर से बाहर निकाल दिया। वीडियो में महिला ने अपने शरीर पर घाव के निशान भी दिखाए।

ऊपर वाला ट्वीट तब का है, जब लोगों को लग रहा था कि महिला जम्मू कश्मीर में ही फँसी हुई है। जैसे ही ये वीडियो वायरल हुआ, हिन्दू संगठनों ने जम्मू कश्मीर के अधिकारियों से संपर्क कर महिला की व्यथा के बारे में बताया और ग्वालियर वापसी के बारे में बातें की। ग्वालियर पुलिस ने बताया कि इस मामले में शौकत अली और 4 अन्य आरोपितों को गिरफ्तार किया जा चुका है। ग्वालियर के एसपी अमित संघी ने कहा कि अगर महिला अपनी शिकायत के साथ पुलिस के पास आती है तो आगे की कार्रवाई की जाएगी।

पीड़िता एक इवेंट मैनेजमेंट कम्पनी में काम करती है। वो इस साल की शुरुआत में जयपुर गई थी, जहाँ उसकी मुलाकात शौकत अली से हुई। शौकत ने उस समय खुद को हिन्दू बताया। उसने साहिल कुमार के छद्म नाम से महिला के साथ दोस्ती बढ़ाई और उसे अपने जाल में फँसाया। महिला ने आरोपित के दावों को सही समझ कर उसके साथ शादी कर ली। हिन्दू संगठनों ने महिला को पुलिस से संपर्क कराने से लेकर ग्वालियर उसके घर आकर भी उसकी मदद की।