Home Blog Page 4571

नसीरुद्दीन शाह के ‘हाफ एजुकेटेड’ बयान पर कंगना ने कहा- इतने ‘महान’ कलाकार की गालियाँ भी भगवान का प्रसाद

सुशांत सिंह राजपूत के मामले में बॉलीवुड नेक्सस और नेपोटिज्म की बहस को मुख्यधारा में लेकर आने वाली कंगना रनौत के ख़िलाफ़ नसीरुद्दीन ने टिप्पणी करते हुए उन्हें आधा पढ़ा लिखा बताया। उन्होंने कहा कि जिन लोगों के मन में इंडस्ट्री के ख़िलाफ़ गंद भरा हुआ है वो अब मीडिया के सामने जाकर उलटी कर रहे हैं। उन्होंने इंडिया टुडे से बातचीत में यह भी दावा किया कि मीडिया में मूवी माफिया जैसा कुछ नहीं है। ये केवल कुछ गिने-चुने लोगों के दिमाग की काल्पनिक कहानी है।

नसीरुद्दीन शाह की मानें तो, “सुशांत सिंह राजपूत केस में कुछ मीडिया हाउस के द्वारा की जा रही असंवेदनशील मीडिया कवरेज शामिल है और वो लोग शामिल हैं जिन्हें लगता है कि वो सुशांत को न्याय दिलाने की जंग लड़ रहे हैं। ये पागलपन है। ये पूरी तरह पागलपन है। मैंने इस फॉलो नहीं किया है।”

उन्होंने कंगना रनौत पर निशाना साधते हुए कहा, “किसी को भी हाफ एजुकेटेड सितारों के बयानों में दिलचस्पी नहीं है जो ये हर चीज खुद पर ले लेती हैं कि सुशांत को न्याय दिलाना है। अगर हमें लगता है कि न्याय मिलना चाहिए तो हमें न्याय की प्रक्रिया में भरोसा रखने की जरूरत है। और यदि हमारा इससे कोई लेना देना नहीं है तो मुझे लगता है कि हमें अपना काम करना चाहिए।”

इसी बयान के सामने आने के बाद कंगना रनौत ने नसीरुद्दीन शाह पर तंज कसा। उन्होंने ट्वीट कर कहा कि इतने महान कलाकार की गालियाँ भी प्रसाद की तरह है। वे लिखती हैं- “नसीर जी एक महान कलाकार हैं, इतने महान कलाकार की तो गालियाँ भी भगवान के प्रसाद की तरह हैं, इससे अच्छा तो मैं आपके साथ सिनेमा और क्राफ्ट पर हुई शानदार कन्वर्सेशन को देखूँगी जब आपने मुझे कहा था कि आप मेरी कितनी सराहना करते हैं।”

अपने एक अन्य में ट्वीट में उन्होंने नसीरुद्दीन से पूछा, “धन्यवाद नसीर जी, आपने मेरे सारे अवॉर्ड और उपलब्ध‍ियों को तोल दिया, जो कि नेपोटिज्म के स्केल पर मेरे किसी भी समकालीन प्रतिद्वंदियों के पास नहीं है। मैं इसकी आद‍ि हो चुकी हूँ पर अगर मैं प्रकाश पादुकोण या अन‍िल कपूर की बेटी होती तो भी क्या आप मुझे यही कहते?”

गौरतलब है कि हालिया इंटरव्यू में नसीरुद्दीन शाह से जब पूछा गया था कि क्या उन्हें लगता है कि नेपोटिज्म की बहस से कुछ बदलाव आएँगे? तो उन्होंने कहा, इसकी सिर्फ उम्मीद की जा सकती है, लेकिन इस बहस का स्तर बहुत बचकाना हो रहा है। हम अपने गंदे लंगोट सबके सामने क्यों धो रहे हैं। उन्होंने कंगना रनौत को लेकर भी अपनी बात रखी और कहा कि वह कुछ फिल्ममेकर्स और स्टारकिड्स को निशाना बना रही हैं, यहाँ तक की तापसी पन्नू और स्वरा भास्कर जैसे एक्टर्स को वह बी ग्रेड बता रही हैं।

महिलाएँ टाइट कपड़े न पहनें, गैर-इस्लामी को जकात न दें, जन्म लेने वाला हर बच्चा इस्लाम धर्म का: जाकिर नाइक का भी ‘बाप’ है उसका बेटा

मलेशिया में छिपे इस्लामी उपदेशक जाकिर नाइक के बारे में तो आपको पता है ही और साथ में उसके अजीबो-गरीब बयान भी सामने आते रहते हैं, जिन्हें जायज ठहराने के लिए वो इस्लामी किताबों का हवाला देता है। अब हम आपको उसके बेटे फरीक जाकिर नाइक के बारे में बताने जा रहे हैं, जो अपने अब्बा के यूट्यूब पेज पर ही ज्ञान बाँचता है। कट्टरवाद के मामले में वो अपने अब्बा से भी दो कदम आगे है।

फरीक जाकिर नाइक का एक वीडियो है, जिसमें उससे पूछा जाता है कि महिलाओं को घर से बाहर निकल कर जॉब करने का अधिकार है या नहीं, जिसके जवाब में वो कहता है कि इस्लाम में पुरुष को ही घर में रोटी कमाने वाला माना गया है। उसने कहा कि निकाह के पहले पिता व भाई और निकाह के बाद शौहर व बच्चों का काम है कि महिलाओं का ध्यान रखे। उसने यहाँ तक दावा कर दिया कि महिलाओं को काम करने की जरूरत ही नहीं है।

उसने कहा कि महिलाओं को इस्लाम का कोई भी नियम तोड़े बिना ही जॉब करना चाहिए और हिजाब हमेशा पहनना चाहिए। उसने कहा कि महिलाओं की पूरी बॉडी कवर में होनी चाहिए और हाथों व आँखों के अलावा कुछ नहीं दिखना चाहिए, साथ ही टाइट कपड़े नहीं होने चाहिए और ऐसे भी नहीं होने चाहिए जिससे पुरुषों में आकर्षण की फीलिंग आए। साथ ही उसने कहा कि महिलाओं को पुरुषों के साथ काम नहीं करना चाहिए।

साथ ही उसने कहा कि महिलाओं को ‘हराम’ जॉब्स नहीं करने चाहिए, जैसे शराब सर्व करना, या फिर डांसिंग, सिंगिंग या अभिनय करना, क्योंकि इन जॉब्स में वो हिजाब नहीं पहन पाएँगी। उसने कहा कि महिलाओं का मेन फोकस ये रहना चाहिए कि एक अच्छी पत्नी के रूप में वो क्या कर सकती हैं, या बच्चों को लेकर। उसने महिलाओं के लिए शिक्षक, काउंसलिंग व इस्लामी शिक्षा देने को अच्छा जॉब बताया।

एक अन्य वीडियो में वो बताता है कि भाषा के मामले में काफिर का अर्थ होता है छिपने वाला, जबकि इस्लाम में काफिर वो है जो इस्लाम को स्वीकार नहीं करता। उसने कहा कि इस तरह से सारे गैर-इस्लामी काफिर हुए। फरीक के मुताबिक, गैर-इस्लामी को काफिर कहने की पूरी अनुमति है क्योंकि काफिर का इस्लाम के हिसाब से अँग्रेजी अनुवाद ही होगा गैर-इस्लामी। उसने कहा कि अगर किसी काफिर को गैर-इस्लामी कहा जाना पसंद नहीं है तो वो इस्लाम स्वीकार कर ले।

फरीक जाकिर नाइक एक अन्य वीडियो में जकात के बारे में भी समझाता है। एक वीडियो में उसने कहा कि गैर-इस्लामी को जकात नहीं दिया जा सकता, चाहे वो कितना भी जरूरतमंद क्यों न हो। उसने इस्लामी किताबों के हवाले से कहा कि जकात (चैरिटी) केवल इस्लाम मानने वाले को दी जा सकती है या फिर उन्हें, जिनका दिल इस्लाम की तरफ झुका हुआ हो। इसका मतलब समझाते हुए उसने कहा कि जिनसे उम्मीद है कि वो इस्लाम अपना लेंगे, उन्हें जकात दिया जा सकता है।

इसके अलावा एक अन्य वीडियो में फरीक जाकिर नाइक इस सवाल का जवाब देता है कि इस्लाम में ऑनलाइन बिजनेस करने का अधिकार है या नहीं। उसने बताया कि ये किया जा सकता है लेकिन इस्लाम और शरिया के नियमों के अंदर रह कर ही। उसने कहा कि किसी भी हराम प्रोडक्टस को नहीं बेचना चाहिए। साथ ही उसने गैम्ब्लिंग या लक से जुड़े गेम्स को भी हराम बताया। उसने एडवर्टाइजमेंट में बिना हिजाब की महिला को डालना या उसमें म्यूजिक डालना भी हराम बताया।

एक सवाल के जवाब में उसने कहा कि अल्लाह गैर-इस्लामी पर भी दया करते हैं क्योंकि उन्होंने उन लोगों को भोजन और घर दिया है। उसने कहा कि पानी या हवा, ये सब गैर-इस्लामी को भी दिया गया है क्योंकि इसके बिना वो मर जाएँगे – ये दिखाता है कि अल्लाह उस पर भी दया करते हैं। उसने कहा कि अल्लाह लोगों तक खुद ये संदेश पहुँचाते हैं कि हर एक बच्चा इस्लाम मानने वाला ही जन्म लेता है, उसे बाद में हिन्दू या ईसाई बना दिया जाता है।

उसने दावा किया कि अगर कोई इस्लाम अपना रहा है तो इसका मतलब ये नहीं कि वो कन्वर्ट हो रहा है बल्कि इसका अर्थ हुआ कि वो अपने मजहब में लौट रहा है क्योंकि वो जन्मा तो इस्लाम धर्म में ही था। उसने दावा किया कि अल्लाह लोगों को समझाने के लिए किसी न किसी रूप में संदेश भेजते रहते हैं कि वो इस्लाम अपना लें क्योंकि काफिर अगर इस्लाम अपना ले तो उसे अल्लाह क्षमा कर देते हैं।

किसी ने उससे पूछ दिया था कि अल्लाह बार-बार क़ुरान में खुद को ‘We’ कह कर क्यों सम्बोधित करते हैं, जिसके जवाब में उसने कहा कि Plural दो प्रकार के होते हैं। उसने समझाया कि संख्याओं का प्लुरल अलग होता है और अल्लाह वाला जो प्लुरल है, वो ‘रॉयल प्लुरल’ या ‘प्लुरल ऑफ रेस्पेक्ट’ है, जो इंग्लैंड की महारानी भी प्रयोग करती हैं। उसने कहा कि भारत के पीएम भी ‘हम’ कहते हैं, जो प्लुरल है लेकिन रेस्पेक्ट और रॉयल वाला।

इसी तरह फरीक के अब्बा जाकिर नाइक ने कहा था कि रवीश कुमार हों या ‘संप्रदाय विशेष का पक्ष लेने वाले’ अन्य गैर-इस्लामी, उन सभी के लिए समान सज़ा की ही व्यवस्था है। ज़ाकिर नाइक ने अपने अनुयायियों को समझाया था कि जन्नाह अलग-अलग तरह के होते हैं, जैसे फिरदौस और फिरदौस आला। ज़ाकिर नाइक ने स्पष्ट कहा कि गैर-इस्लामी का नरक में जाना तय है। बकौल नाइक, अगर कोई मरते समय इस्लाम धर्म में नहीं है तो उसके लिए नरक की ही व्यवस्था है।

ISIS का आतंकी निकला बेंगलुरु का नेत्र चिकित्सक अब्दुर रहमान, NIA ने दबोचा: आतंकियों के लिए बना रहा था मेडिकल एप्लीकेशन

बेंगलुरु में NIA को बड़ी कामयाबी मिली है, जहाँ खूँखार आतंकी संगठन ISIS के लिए काम करने वाले एक Ophthalmologist (नेत्र चिकित्सक) को गिरफ्तार किया गया है। उसे इस्लामिक स्टेट खोरासन प्रोविंस से जुड़ाव के लिए गिरफ्तार किया गया गया। गिरफ्तार किए गए डॉक्टर का नाम अब्दुर रहमान (Abdur Rahman है, जो सफेद कॉलर में आतंकी बन कर बैठा हुआ था। वो बेंगलुरु के बसवनगुण्डी का रहने वाला है।

वो एमएस रमैया मेडिकल कॉलेज में बतौर नेत्र चिकित्सक कार्यरत है। NIA ने आतंकी अब्दुर रहमान की गिरफ़्तारी की पुष्टि की है। ये मार्च 2020 में रजिस्टर किए गए केस का ही मामला है, जिसे दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल द्वारा कश्मीरी जोड़े जहाँजेब सामी वानी और उसकी पत्नी हीना बशीर बेग की गिरफ़्तारी के बाद दर्ज किया गया था। ये मामला दिल्ली के जामिया नगर का है। इस कपल का सम्बन्ध ISIS से जुड़े ISKP से था।

अब्दुर रहमान ने NIA की पूछताछ के दौरान कबूल किया है कि वो सीरिया के ISIS के लिए भारत में नेटवर्क बनाने के लिए एक ऑनलाइन प्लेटफार्म के जरिए जहाँजेब से संपर्क में था। वो एक ऐसे मेडिकल एप्लीकेशन पर काम कर रहा था, जिसकी मदद से ISIS के बीमार आतंकियों का इलाज किया जाता। युद्धस्थलों में आतंकी उसका बनाया एप्लिकेशन इस्तेमाल करते। साथ ही वो आतंकी संगठन को कई अन्य मेडिकल फायदे देने पर भी काम कर रहा था।

इन दोनों को देशविरोधी गतिविधियों में संलिप्त होने के कारण गिरफ्तार किया गया था। इसके बाद पुणे के रहने वाले सादिया अनवर शेख और नबील सिद्दीकी खत्री को गिरफ्तार किया गया था, जो ISIS से जुड़े थे और भारत में सीएए विरोधी हिंसा को माध्यम बना कर आतंकी हमले करने वाले थे। ये सभी अब्दुल्ला बसीत से संपर्क में थे, जो एक अन्य मामले में पहले ही तिहाड़ जेल की हवा खा रहा है।

‘अपनो को भड़काया, बसें-घर जलाए… इस्लामी देश बनाना चाहता था भारत को’ – जामिया के छात्र आसिफ का कबूलनामा

UAPA के तहत गिरफ्तार जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के छात्र आसिफ इकबाल तन्हा ने पुलिस पूछताछ के दौरान कुछ बड़े खुलासे करते हुए बताया है कि किस तरह से नागरिकता कानून (CAA) और NRC के विरोध के नाम पर उन्होंने लोगों को भड़काने के साथ बसों और घरों को जलाया था। आसिफ इकबाल तन्हा ने कहा कि वो देश को इस्लामिक राष्ट्र बनाना चाहता था और इसीलिए हिंदुओं को तंग कर धार्मिक भावनाएँ आहत करने की साज़िश रची।

जी न्यूज़ की एक रिपोर्ट के अनुसार, स्टूडेंट्स इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन (SIO) के सदस्य और जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्र आरोपित आसिफ इकबाल तन्हा ने पुलिस को दिए बयान में बताया की जब CAA/NRC बिल आया, तो उसे ये बिल संप्रदाय विशेष के लोगों के खिलाफ लगा, जिसके बाद आसिफ इस बिल का विरोध करने के लिए जामिया यूनिवर्सिटी के छात्रों के साथ जुड़ गया। आरोपित आसिफ जामिया यूनिवर्सिटी का छात्र है और 2014 से स्टूडेंट इस्लामिस्क ऑर्गेनाइजेशन (SIO) का सदस्य भी है।

दिल्ली पुलिस के हवाले से जी न्यूज़ की इस रिपोर्ट में बताया गया है- “आरोपित आसिफ इकबाल ने पुलिस को दिए बयान में बताया कि ’12 दिसंबर को हम 2500-3000 लोग जामिया यूनिवर्सिटी के गेट नम्बर 7 पर मार्च कर रहे थे, उसके बाद 13 दिसंबर को शरजील इमाम भड़काऊ भाषण देते हुए चक्का जाम करने की बात कहता है। मैंने खुद लोगों को उकसाया। जामिया मेट्रो से पार्लियामेंट तक मार्च की कॉल दी, जिसमें कई संगठन हमें समर्थन देते हैं। जब हम मार्च कर रहे थे, तो पुलिस ने हमें बैरिकेड लगाकर रोक लिया। तभी मैंने कहा कि तुम आगे बढ़ो, पुलिस की इतनी हिम्मत नहीं, जो हमें रोक ले। फिर इसी दौरान जब हम जबरदस्ती आगे बढ़े, तो पुलिस ने हमें रोक लिया और लाठीचार्ज हुआ, जिसमें पुलिस और छात्रों को चोट भी आई।”

जी न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, आरोपित आसिफ इकबाल तन्हा ने कबूलनामे में बताया, “हमने प्लानिंग के तहत 15 दिसंबर को पार्लियामेंट तक मार्च का ऐलान किया, जिसका नाम हमने गाँधी पीस मार्च दिया, ताकि दिखने में ठीक लगे। फिर उसके बाद हम मार्च को जामिया से लेकर जाकिर नगर, बटला हाउस से होते हुए जामिया ले आए। फिर सूर्या होटल के पास पुलिस बैरिकेड लगे थे। हम जबरन बैरिकेड तोड़कर आगे बढ़ गए, पुलिस हमें रोकने की कोशिश की। भीड़ बेकाबू हो गई और पथराव शुरू हो गया। बसों में आग लगा दी जाती है, बहुत दंगा फसाद हो जाता है। इस दौरान JMI के कई छात्र समेत पुलिस वाले घायल हो जाते हैं।”

आरोपित आसिफ इकबाल ने कहा कि जामिया में हुई हिंसा के बाद जामिया कॉर्डिनेशन कमिटी (JCC) का गठन किया गया था, जिसमें AISA, JSF, SIO, MSF, CYSS, CFI, NSUI जैसे संगठन से जुड़े लड़के शामिल थे। आसिफ ने कहा कि SIO (स्टूडेंट इस्लामिक आर्गेनाईजेशन) के कहने पर उसने दिल्ली से बाहर के अन्य कई राज्यों में भारत सरकार के खिलाफ संप्रदाय विशेष के लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए उकसाया था और जरूरत पड़ने पर हिंसक प्रदर्शन के लिए भी कहा था।

आसिफ इकबाल ने दंगों को लेकर होने वाली फंडिंग पर खुलासा किया कि एलुमिनाई एसोसिएशन ऑफ जामिया मिल्लिया इस्लामिया (AAJMI) भी इस मूवमेंट में जामिया कॉर्डिनेशन कमिटी के साथ थी और AAJMI और PFI से ही इस योजना की फंडिंग होती थी।

योगी सरकार में 6200 एनकाउंटर: मारे गए 124 अपराधी, ढेर होने वालों में 47 अल्पसंख्यक, 11 ब्राह्मण, 8 यादव

सीएम योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश में शपथ लेने के एक महीने बाद कानून व्यवस्था दुरुस्त करने को लेकर कहा था कि अगर अपराध करेंगे तो ठोक दिए जाएँगे। तीन साल गुजर जाने के बाद भी सीएम योगी का मन नहीं बदला है, वह अपने फैसले पर अडिग हैं। बताया जा रहा है कि अब तक अपराधि‍यों और पुलिस के बीच 6,200 से अधि‍क मुठभेड़ हो चुकी है जिनमें 14 हजार से अधि‍क अपराधी गिरफ्तार हुए हैं।

प्रदेश में योगी सरकार बनने के बाद से अपराधियों का सफाया लगातार जारी है। बीते साढ़े तीन साल में पुलिस मुठभेड़ में 124 अपराधी मारे गए। इनमें 47 अल्पसंख्यक, 11 ब्राह्मण और 8 यादव थे। अल्पसंख्यक समुदाय के ज्यादातर अपराधी पश्चिमी यूपी के थे। वहीं, शेष 58 अपराधियों में ठाकुर, वैश्य, पिछड़े, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के बदमाश शामिल थे।

एनकाउंटर को लेकर विपक्ष के हंगामे के आसार के बीच सरकार ने सवाल के जवाब भी तैयार कर लिए हैं। दरअसल, ब्राह्मणों की हत्या और एनकाउंटर पर हमलावर विपक्ष को जवाब देने के लिए सरकार ने अपने साढ़े तीन साल के कार्यकाल में हुए कुल एनकाउंटर और उसमें मारे गए अपराधियों की जातिवार लिस्ट तैयार की है, ताकि विपक्ष के हमलों का जवाब दिया जा सके। इस लिस्ट के मुताबिक 9 अगस्त 2020 तक प्रदेश में हुए एनकाउंटर में 124 अपराधी ढेर हुए। इनमें सर्वाधिक 45 अपराधी अल्पसंख्यक हैं, जबकि 11 ब्राह्मण हैं।

31 मार्च 2017 से 9 अगस्त 2020 तक यूपी में 124 अपराधी मारे गए। पिछले 8 महीनों में 8 ब्राह्मण अपराधी ढेर हुए। इनमें से 6 अपराधी कानपुर के बिकरू कांड में शामिल विकास दुबे और उसके गुर्गे थे। सबसे ज्यादा एनकाउंटर मेरठ में हुए। मेरठ में 14 अपराधी मारे गए, मुजफ्फरनगर में 11 ,सहारनपुर में 9, आजमगढ़ में 7 और शामली में 5 अपराधी मारे गए।

डीजीपी हितेश चंद्र अवस्थी ने पुलिस पर विशेष वर्ग के लोगों के एनकाउंटर किए जाने के आरोप पर कहा कि इस तरह के आरोप बेबुनियाद हैं। अपराधियों की कोई जाति और धर्म नहीं होता है। पुलिस एनकाउंटर में मारे गए सभी का आपराधिक इतिहास रहा है। कई तो पुलिस कर्मियों की हत्या में शामिल थे। 

पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “योगी आदित्यनाथ सरकार ने कभी भी जाति या सांप्रदायिक आधार पर अपराधियों के साथ भेदभाव नहीं किया है और भविष्य में भी ऐसा होता रहेगा।”

गौरतलब है कि विकास दुबे और राकेश पांडे के एनकाउंटर के बाद एक जाति के अपराधियों के एनकाउंटर पर विपक्ष ने सवाल उठाया था। अब सरकार इन आँकड़ों के जरिए यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि अपराधी किसी भी जाति और मजहब का हो सरकार उसके खिलाफ कार्रवाई कर रही है। माना जा रहा है कि ब्राह्मण वोट बैंक को लेकर हमलावर विपक्ष की गणित की काट के तौर पर यह लिस्ट बनाई गई है।

बता दें कि एक इंटरव्यू में बेहद बेबाकी के साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा था, “मैं एनकाउंटर मैन नहीं, सामान्य योगी हूँ, पर जो कानून से खिलवाड़ करेगा उसके लिए संकट आएगा। उत्तर प्रदेश में सुरक्षा हर शख्स को मिलेगी, लेकिन कानून से खिलवाड़ करने की इजाजत किसी को नहीं देंगे, कानून व्यवस्था से खिलवाड़ करने का दुस्साहस करेगा उसे इसकी कीमत भी चुकानी पड़ेगी।”

सीएम योगी के इस बयान के बाद समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने योगी सरकार में हो रहे एनकाउंटर्स को फर्जी बताते हुए कहा कि ठोको नीति की वजह से उन्हीं का एनकाउंटर हो रहा है, जिनका भाजपा सरकार कराना चाहती है।

बहन का, बेटी का, दामाद का… सबका ख्याल रखा नेहरू ने: कॉन्ग्रेस ने विजय लक्ष्मी पंडित पर किया ट्वीट, लोग टूट पड़े

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित की मंगलवार (अगस्त 18, 2020) को जयंती है। कॉन्ग्रेस ने उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि देते हुए सोशल मीडिया पर लिखा कि प्री-इंडिपेंडेंट भारत में कैबिनेट पोस्ट रखने वाली एकमात्र भारतीय महिला थीं, जो बाद में संविधान सभा की सदस्य बनीं। सोशल मीडिया में लोगों ने इसे नेपोटिज्म के पुराने उदाहरणों में से एक बताया।

ज्ञात हो कि सुशांत सिंह राजपूत की कथित आत्महत्या के बाद नेपोटिज्म के खिलाफ अभियान जोरों पर है और इसका खामियाजा महेश भट्ट की ‘सड़क-2’ के ट्रेलर को भी भुगतना पड़ा, जिसने डिस्लाइक का रिकॉर्ड बनाया। इसी क्रम में लोग हर इंडस्ट्री में नेपोटिज्म के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। अब जब कॉन्ग्रेस ने विजय लक्ष्मी पंडित को याद किया तो ये डिबेट फिर से शुरू हो गया क्योंकि पार्टी वंशवादी राजनीति के लिए ही जानी जाती है।

एक ट्विटर यूजर ने लिखा कि विजय लक्ष्मी पंडित प्री-इंडिपेंडेंट इंडिया में कैबिनेट पोस्ट रखने वाली एकमात्र भारतीय महिला थीं और वो जवाहरलाल नेहरू की बहन थीं। उसने लिखा कि कॉन्ग्रेस का नेपोटिज्म तो आधुनिक भारतीय गणराज्य से भी ज्यादा पुराना है। बता दें कि जवाहरलाल नेहरू और उनके पिता मोतीलाल नेहरू कॉन्ग्रेस अध्यक्ष रह चुके थे। दोनों ही बड़े वकील भी थे और अमीर खानदान से आते थे।

एक ट्विटर यूजर ने पूछा कि विजय लक्ष्मी पंडित कौन हैं? जिसके बाद उसने जवाब देते हुए लिखा कि वो नेहरू की बहन थी। आक्रोशित ट्विटर यूजर ने लिखा कि नेहरू को अपनी बहन की बेटी को और उनके ससुराल वालों को भी अपनी सरकार में रखना चाहिए था, ताकि बाद में वो कह पाते कि कैसे उन्होंने अपने परिवार के सभी सदस्यों को सरकार में रखा हुआ था। उसने लिखा कि वंशवादी दीमक की तरह होते हैं, जो देश को अंदर से खोखला करते जाते हैं।

एक ट्विटर यूजर ने तो इसे नेपोटिज्म 1.0 नाम दे दिया। वहीं एक ट्विटर यूजर दिव्या ने लिखा कि ये भारत में नेपोटिज्म का सबसे बेशर्म उदाहरण था। लोगों ने विजय लक्ष्मी पंडित को नेपोटिज्म का प्रोडक्ट बताया। एक ने ध्यान दिलाया कि मोतीलाल से लेकर जवाहरलाल, विजय, इंदिरा, राजीव, संजय, सोनिया और राहुल तक – कॉन्ग्रेस के ‘प्रथम परिवार’ से ज्यादा नेपोटिज्म का बेशर्म उदाहरण और कहीं नहीं मिलेगा।

राहुल नाम के एक ट्विटर यूजर ने नेहरू-गाँधी परिवार के सभी लोगों की तस्वीरों के साथ उनके सम्बन्ध और उनके पद के बारे में समझाया। कुछ लोगों ने इसीलिए भी कॉन्ग्रेस पर निशाना साधा क्योंकि उसने अपनी ट्वीट में ये छिपाया कि वो नेहरू की बहन थीं। बता दें कि वो यूएन जनरल असेंबली की पहली महिला अध्यक्ष भी थीं। लोगों ने आरोप लगाया कि वो अंग्रेजों और ब्रिटिश को लेकर नरम रुख रखती थीं।

वाल स्ट्रीट जर्नल पैसे लगा कर साबित कर रहा है फेसबुक को BJP समर्थक, लोगों ने पूछा फायदा किसको होगा?

वाल स्ट्रीट जर्नल द्वारा फेसबुक पर आरोप लगाया गया है कि वह भाजपा का समर्थन करता है और हेट स्पीच के मामले में उचित कार्रवाई करने से बचता है। अमेरिकी अखबार ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ की इस रिपोर्ट के बाद यह बहस बड़े स्तर पर विवाद का विषय बन चुकी है।

‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ की इस रिपोर्ट के फ़ौरन बाद कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने भी बीजेपी तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर फेसबुक तथा मोबाइल मैसेंजर ऐप वॉट्सऐप का इस्तेमाल करते हुए मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए फर्जी खबरें फैलाने का आरोप लगाया।

इस पूरे विवाद के बीच ‘वाल स्ट्रीट जर्नल’ अपनी इस रिपोर्ट का पेड प्रोमोशन करते हुए देखा जा रहा है, जिससे यह सवाल पैदा हो रहे हैं कि वाल स्ट्रीट जर्नल के इस कारनामे से अंततः किसे फायदा पहुँचने वाला है।

ज्ञात हो कि रुपए देकर किसी ट्वीट या पोस्ट के प्रोमोशन करने से उस पोस्ट को बड़ी ऑडियंस तक पहुँचाया जाता है। अक्सर ब्रांड्स अपनी मार्केटिंग के लिए सोशल मीडिया पर इस प्रकार के प्रोमोशन का इस्तेमाल करते हैं।

सोशल मीडिया पर भी वाल स्ट्रीट जर्नल का यह विवादित आर्टिकल बहस का विषय बन चुका है क्योंकि कई भाजपा समर्थक पेजों ने कहा है कि वाल स्ट्रीट जर्नल का यह आरोप वास्तविकता से एकदम उलट है।

भाजपा समर्थक फेसबुक पेजों का कहना है कि फेसबुक अपनी गाइडलाइन्स को लेकर हमेशा से ही अस्पष्ट और दक्षिणपंथी विचारधारा के प्रति पूर्वग्रह से ग्रसित रहा है। 2019 के आम चुनावों से ठीक पहले भी फेसबुक द्वारा कई ऐसे पेजों को निष्क्रिय कर दिया गया था, जो कथित रूप से कॉन्ग्रेस का समर्थन करते थे।

हालाँकि, इसके बाद ऐसे पेजों को भी बंद कर दिया गया जो भाजपा समर्थक थे। लेकिन, इन पेज एडमिन्स का कहना है कि भाजपा समर्थक पेजों का दायरा और ऑडियंस कॉन्ग्रेस समर्थक पेजों की तुलना में बहुत बड़े और फेमस थे।

ऐसे में वाल स्ट्रीट जर्नल द्वारा रुपए देकर इस रिपोर्ट को प्रोमोट करना लोगों के मन में और संदेह पैदा कर रहा है कि वास्तव में इस तरह का नैरेटिव विकसित कर के वाल स्ट्रीट जर्नल किस राजनीतिक पार्टी को लाभ पहुँचाने का प्रयास कर रहा है।

SC ने NEET और JEE की प्रवेश परीक्षा टालने से किया मना: याचिका खारिज, कहा- अब और देरी छात्रों के समय की बर्बादी होगी

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (अगस्त 17, 2020) को IIT-JEE और NEET की परीक्षा को टालने वाली याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अब और देरी छात्रों के कीमती समय की बर्बादी होगी। इस फैसले के बाद सितंबर में परीक्षाओं का होना भी लगभग तय हो गया।

याचिका खारिज करते हुए जस्टिस अरुण कुमार मिश्रा, जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस कृष्ण मुरारी की खंडपीठ ने कहा कि कोरोना के कारण देश में सब कुछ रोका नहीं जा सकता।

जस्टिस मिश्रा ने कहा, “क्या देश में सब कुछ रोक दिया जाए? (बच्चों का) एक कीमती साल को यूँ ही बर्बाद हो जाने दिया जाए?” पीठ ने अदालत की कार्रवाई का हवाला देते हुए कहा कि इस महामारी में कोर्ट लगातार चल रहा है। ऐसे में उचित सुरक्षा उपकरणों के साथ परीक्षा भी हो सकती हैं।

पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलों को रिकॉर्ड में लिया है जिसमें उन्होंने आश्वासन दिया था कि एग्जाम के दौरान नेशनल टेस्टिंग एजेंसी द्वारा हर सावधानी बरती जाएगी।

बता दें अब जेईई परीक्षा 1 सितंबर से 6 सितंबर तक आयोजित की जाएगी, वहीं नीट परीक्षा 13 सितंबर को आयोजित की जाएगी। ये भी कहा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद आज या एक दो दिन में कभी भी जेईई मेन के एडमिट कार्ड जारी हो सकते हैं।

गौरतलब है कि 11 राज्यों के 11 छात्रों ने देश में तेजी से बढ़ रहे कोविड-19 महामारी के मामलों की संख्या के मद्देनजर जेईई मेन और नीट यूजी परीक्षाएँ स्थगित करने के अनुरोध के साथ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।

याचिका में कोरोना वायरस महामारी का जिक्र करते हुए राष्ट्रीय परीक्षा एजेन्सी (एनटीए) की 3 जुलाई की नोटिस रद्द करने का अनुरोध किया गया था। साथ ही प्रशासन से परीक्षा केंद्र की संख्या बढ़ाने की भी माँग थी।

याचिकाकर्ता ने कहा था कि प्रशासन बिहार, असम, नॉर्थ ईस्ट राज्यों के तमाम छात्रों को नहीं नकार सकते जो बाढ़ से प्रभावित हैं और जिनके लिए ऐसी स्थिति में ऑफलाइन या ऑनलाइन किसी भी रूप में परीक्षा देना आसान नहीं है।

Pak की 60 टैंकों को उड़ाया, 35 KM सीमा में घुसे: परमवीर तारापोर ने कहा था – ‘मेरा अंतिम संस्कार युद्धस्थल में हो’

हमारा पुराना इतिहास हो या फिर आज़ादी के बाद का समय, भारत में देश के लिए प्राण न्योछावर करने वाले वीरों की कमी नहीं रही है। जब भारतीय सेना की बात होती है तो इसके शुरुआती नायक नाथू सिंह, फील्ड मार्शल मानेकशॉ और जनरल करियप्पा याद किए जाते हैं। जिन महावीरों ने भारत के लिए बलिदान दिया, उनमें से एक नाम लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशीर बुरज़ोरजी तारापोर का भी है, जिनके बारे में हम आज चर्चा करेंगे।

अर्देशीर बुरज़ोरजी तारापोर का शुरुआती जीवन

अर्देशीर बुरज़ोरजी तारापोर का जन्म अगस्त 18, 1923 को बम्बई में हुआ था। वो बचपन से ही साहस और सूझबूझ के लिए जाने जाते थे। एबी तारापोर तीन भाइयों में दूसरे नंबर पर थे। अर्देशीर जब 7 साल के थे, तभी उन्हें पुणे के सरदार दस्तूर विद्यालय में भर्ती कराया गया था। प्रोफेसर किट्टू रेड्डी अपनी पुस्तक ‘वीरों के वीर: भारतीय सेना का बहादुर जवान‘ में बताते हैं कि तारापोर पढ़ाई में उतने अच्छे नहीं थे लेकिन एथलेटिक्स, बॉक्सिंग, तैराकी, टेनिस और क्रिकेट में ये हमेशा आगे रहते थे।

उन्होंने सन 1940 में मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। विद्यालय से निकलने के बाद उनका चयन हैदराबाद सेना में कमीशन के लिए किया गया। अफसर प्रशिक्षण स्कूल, गोलकुंडा में उनकी ट्रेनिंग हुई। इसके बाद इनकी ट्रेनिंग बंगलौर में हुई। जनवरी 1, 1942 को उन्हें सातवीं हैदराबाद इन्फेंट्री में कमीशन प्रदान किया गया। लेकिन, अर्देशीर बुरज़ोरजी तारापोर चाहते थे कि उनकी नियुक्ति हैदराबाद स्टेट फोर्सेज की आर्म्ड रेजिमेंट में हो।

काफी अनुरोध के बाद उन्हें उन्हें हैदराबाद इम्पीरियल सर्विस लांसर्स में स्थानांतरित किया गया। पश्चिम एशिया में द्वितीय विश्व के दौरान भी उन्होंने सेवाएँ दी। आखिरकार 1951 में उन्हें भारतीय सेना में कमीशन मिली और 17 हॉर्स में उनका स्थानांतरण हुआ। फिर उन्हें A स्क्वाड्रन में भेजा गया। इनके साथी प्यार से इन्हें आदि कहते थे। वो नेपोलियन से प्रेरित थे और उसके बारे में अध्ययन करते थे। अपनी मेज पर उसकी मूर्ति भी रखते थे।

हालाँकि, उनके आर्म्ड रेजिमेंट में स्थानांतरण की कहानी भी मजेदार है। टैंक से युद्ध करने का सपने रखने वाले तारापोर जिस बटालियन में थे, वहाँ एक बड़े अधिकरी आए जो सैनिकों को ग्रेनेड फेंकना सीखा रहे थे। इसी दौरान एक सैनिक ने ग्रेनेड को गलती से किसी ऐसी जगह फेंक दिया, जहाँ नुकसान होने का खतरा ज्यादा था। तारापोर ने कूद कर वहाँ से ग्रेनेड को कहीं और फेंक दिया। खुद घायल हुए पर नुकसान से बचा लिया। इलाज के बाद उनसे प्रभावित हुए कमांडर-इन-चीफ ने उनका अनुरोध स्वीकार किया।

अर्देशीर बुरज़ोरजी तारापोर के बारे में कहा जाता है कि ये एक आदर्श अधिकारी थे, जिनकी मिसालें लोग दिया करते थे। वो एक प्रभावशाली खानदान से आते थे क्योंकि उनके पुरखों का सम्बन्ध छत्रपति शिवाजी की सेना से था, जिसके फलस्वरूप उन्हें 100 गाँव दिए गए थे। ‘तारापोर’ गाँव के नाम पर ही इनका सरनेम भी आया। उनके नेतृत्व में भारतीय सैन्य बल की एक टुकड़ी ने कैसे 60 पाकिस्तानी टैंक नष्ट कर दिए थे, इसकी कहानी आज भी सुनी-सुनाई जाती है।

1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में किए कारनामे

अब उस कहानी पर आते हैं, जिसके लिए अर्देशीर बरज़ोरजी तारापोर को जाना जाता है। 1965 के जिस युद्ध में पाकिस्तान ने भारत से मुँह की खाई थी, उसमें तारापोर ने अद्भुत साहस का परिचय दिया था। इस युद्ध में वो कमांडिंग अधिकारी के पद पर थे और उन्हें पूना हॉर्स रेजिमेंट का नेतृत्व सौंपा गया था। कहानी शुरू होती है सितम्बर 11, 1965 से, जब वो सियालकोट में अपनी टुकड़ी का नेतृत्व कर रहे थे।

वो चाविंड को जीतना चाहते थे। तभी उन्हें सियालकोट के फिल्लौर पर हमला करने का आदेश मिला। लेकिन, दुश्मन सतर्क था। वजीराली क्षेत्र में उनकी टुकड़ी पर हमला कर दिया गया। ये तो सभी को ज्ञात है कि पाकिस्तान ने उस युद्ध में अमेरिका से मिले पैटन टैंकों का जम कर इस्तेमाल किया था। वजीराली में घायल होने के बावजूद उन्होंने दुश्मनों का परास्त किया। लेकिन उनका लक्ष्य चाविंड को जीतना था।

इसके बाद उन्होंने सितम्बर 14, 1965 को 17 हॉर्स और 8 गढ़वाल राइफल्स की टुकड़ियों को जसोरण क्षेत्र में जमा होने को कहा, ताकि चाविंड को पीछे के रास्ते से घेरा जा सके लेकिन 8 गढ़वाल सैनिक बलिदान हो गए। एक ओर पाकिस्तानी टैंक शक्तिशाली भी थे और उनकी संख्या भी ज्यादा थी, वहीं भारतीय सैनिकों की संख्या कम थी। लेकिन भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी टैंकों को नष्ट करना जारी रखा।

हालाँकि, भारतीय सेना की तरफ से 43 टैंकों की टुकड़ियाँ ज़रूर आईं लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी। इधर घायल तारापोर अपने बचे-खुचे जवानों के साथ लड़ते रहे। अपनी पुस्तक ‘लेफ्टिनेंट कर्नल ए. बी. तारापोर‘ में मेजर राजपाल सिंह ने लिखा है कि उन्होंने 9 टैंकों के साथ पाकिस्तानियों की 60 पैटन टैंकों को धूल में मिला दिया। उन्हें पीछे हटने के आदेश मिले लेकिन वो लड़ते रहे।

दरअसल, अगर आदेश को मान कर अर्देशीर बुरज़ोरजी तारापोर पीछे लौट चलते तो उनकी जान बच जाती लेकिन गोली लगने के बावजूद वो युद्ध करते रहे। आखिरकार युद्ध करते-करते दुश्मनों को नाकों चने चबवा कर वो बलिदान हुए लेकिन तब तक भारतीय सेना पाकिस्तान में 35 किलोमीटर अंदर तक घुस चुकी थी। उन्होंने सेंचुरियन टैंकों के साथ पैटन का मुकाबला किया। जब उन्हें पीछे हटने का आदेश मिला, तब वो पाकिस्तान की जमीन पर थे और उन्होंने अपने लोगों से कहा कि पीछे हटने से हार होगी, इसीलिए युद्धस्थल नहीं छोड़ेंगे।

5 दिनों तक सियालकोट सेक्टर में युद्ध जारी रहा। वो अपने टैंक से दुश्मनों पर गोले बरसाते आगे बढ़ते जा रहे था। इस क्रम में उनके टैंक को भी दुश्मनों ने कई बार निशाना बनाया था। लेकिन, वो आगे बढ़ते गए। शाम के समय ही उनके टैंक पर एक गोला आकर गिरा, जिससे वो वीरगति को प्राप्त हुए। सबसे बड़ी बात कि उनके बलिदान होने के बाद भी उनकी यूनिट दुश्मनों से मुकाबला करती रही क्योंकि वो उनके लिए प्रेरणा बन गए थे।

उन्होंने पहले ही इच्छा जता दी थी कि अगर वो ज़िंदा नहीं बचते हैं तो उनका अंतिम संस्कार इसी युद्ध के मैदान में किया जाए, जिसे पूरा किया गया। सियालकोट सेक्टर में फिल्लोड़ा और चाविंड की इस लड़ाई को टैंकों से लड़े गए सबसे भीषण युद्ध के रूप में जाना गया। वो एक अच्छे लीडर थे, तभी मृत्योपरांत भी उनके लोग देशसेवा का वही जज्बा लिए युद्ध करते रहे। दुश्मन की जमीन पर दुश्मन को सबक सिखाया।

परमवीर चक्र से किए गए सम्मानित

लेफ्टिनेंट कर्नल एबी तारापोर को 1965 में परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया, जो भारतीय सेना का सबसे बड़ा सम्मान है। उन्हें उनकी वीरता, साहस और अप्रतिम शौर्य के लिए इस सम्मान से नवाजा गया। ‘नेशनल वॉर मेमोरियल’ और ‘गेलेंट्री अवॉर्ड्स’ की सरकारी वेबसाइट्स पर जाकर आप उनके बारे में पढ़ सकते हैं। उनके बारे में ‘नेशनल मेमोरियल’ में कुछ यूँ वर्णन किया गया है:

“लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशीर बुरज़ोरजी तारापोर 1965 में भारत-पाक युद्ध के दौरान स्यालकोट सेक्टर में पूना हॉर्स रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर थे। 11 सितंबर 1965 को 17 पूना हॉर्स पर शत्रु के बख्तरबंद टैंको द्वारा भारी जवाबी हमला किया गया। रेजिमेंट ने शत्रु के हमले को नाकाम कर दिया और अपनी जगह डटे रहकर वीरतापूर्वक फिल्लौरा पर आक्रमण कर दिया। घायल होने के बावजूद लेफ्टिनेंट कर्नल तारापोर ने सुरक्षित स्थान पर ले जाए जाने से मना कर दिया और वजीरवाली, जसोरन तथा बुतुर-डोगरांडी पर कब्जा करने में अपनी रेजिमेंट का नेतृत्व किया।”

“उनके नेतृत्व से प्रेरित होकर पूना हॉर्स ने 60 पाकिस्तानी टैंकों को ध्वस्त कर दिया। इस लड़ाई के दौरान, लेफ्टिनेंट कर्नल तारापोर के टैंक पर एक गोला आकर टकराया जिससे टैंक में आग लग गई और वे शूरवीर की तरह वीरगति को प्राप्त हुए। उनके द्वारा छः दिनों तक प्रदर्शित वीरता भारतीय सेना की उच्चतम परंपराओं के अनुकूल थी जिसके लिए लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशीर बुरज़ोरजी तारापोर को मरणोपरांत परम वीर चक्र से सम्मानित किया गया।”

उनकी बेटी जरीन एम बॉइस तब 16 साल की ही थीं, जब उनके पिता वीरगति को प्राप्त हुए। वो कहती हैं कि उन्हें वो रात अब भी याद है, जब उनके पिता को पीछे हटने का आदेश मिला था। पूना हॉर्स ने एक टूर्नामेंट जीता था और उसकी पार्टी में वो भी थीं। रात के 10 बजे अचानक से नाच-गान बंद हो गया और 2-3 बजे उन्होंने टैंकों की आवाज सुनी। उन्होंने कैप्टेन जसबीर सिंह के साथ अपने पिता को चर्चा करते देखा था। दुर्भाग्य से तारपोर पर हुए हमले में वो भी बलिदान हो गए थे।

दरअसल, उनके पिता 2 महीने बाद ही रिटायर होने वाले थे और उन्हें अमेरिका में एक अच्छी पोस्टिंग का ऑफर भी था लेकिन उन्होंने देश को चुना। ‘रेडिफ’ को दिए एक इंटरव्यू में जरीन अपने पिता को याद कर भावुक हो गई थीं। उन्होंने बताया कि जब उनके टैंक पर हमला हुआ था तो उस अवस्था में भी उन्होंने अपने साथियों को कूद कर बचाया था। वो बताती हैं कि ऊपर से आदेश के बावजूद उन्होंने कह दिया था कि अपने सैनिकों को छोड़ कर नहीं जा सकते।

लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशीर बुरज़ोरजी तारापोर: एक निडर सैन्य अधिकारी

मेजर जनरल इयान कार्ड्ज़ू अपनी पुस्तक ‘परम वीर चक्र‘ में उनके बारे में और अधिक जानकारी देते हुए लिखते हैं कि तारापोर के दादा हैदराबाद में बस गए थे और वहाँ की रियासत के कस्टम शुल्क विभाग में कार्यरत थे। उनके पिता भी इसी विभाग में थे, जो उर्दू और फ़ारसी के विद्वान भी थे। विश्वयुद्ध के दौरान तारापोर जब मध्य-पूर्व में तैनात थे, तब अंग्रेज कमांडिंग अधिकारी भारतीयों के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करते थे, जिसे लेकर उन्होंने आपत्ति जताई थी। बाद में वरिष्ठों ने इस मामले को सुलझाया था।

उनका मानना था कि नियम-कानून और अनुशासन अच्छी चीजें हैं लेकिन जब समय आए तो इन्हें तोड़ा भी जा सकता है। उनके कठिन प्रशिक्षण और उत्साह के कारण ही उन्हें इंग्लैंड भेजा गया था, जहाँ उन्होंने सेंचुरियन टैंकों को लेकर गहन अध्ययन किया। वो अपनी रेजीमेंट के साथ काफी मित्रवत व्यवहार करते थे और सभी के साथ स्नेह से पेश आते थे। कहते हैं, उनके युद्ध ने ही भारत-पाक युद्ध 1965 का रुख बदल दिया था।

इसी तरह के युद्ध में परमवीर चक्र विजेता अब्दुल हमीद ने भी अपनी वीरता का प्रदर्शन किया था। वो चौथी ग्रेनेडियर्स के कम्पनी क्वार्टर मास्टर हवलदार थे, जिन्होंने लाहौर के कुसूर क्षेत्र से भी आगे तक पाकिस्तानी सेना को घर में घुस कर खदेड़ा था। हवलदार अब्दुल हमीद अपनी जीप पर आरसीएल गन लेकर तैनात थे और उन्होंने उसी से टैंकों वाली सेना के छक्के छुड़ा दिए। उन्होंने उन टैंकों के साए में जाकर उससे मात्र 150 गज की दूरी पर स्थित होकर युद्ध किया था।

आदित्य ठाकरे को भी नहीं जानती रिया चक्रवर्ती: सुशांत की बहन पर लगाया नशे में उन्हें गलत तरीके से छूने का आरोप

बॉलीवुड एक्‍टर सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में उनकी गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती पर कई संगीन आरोप लगाए गए हैं। इस पर रिया ने वकील के माध्‍यम से अपनी बात रखी है। हालाँकि, अपने बयान में उन्होंने तमाम ऐसी बातें कही हैं जिनसे वह सुशांत के परिवार और उनकी मंशाओं पर सवालिया निशान लगाती नजर आ रही हैं। रिया ने तमाम ऐसी बातों का खुलासा किया है जो सुशांत की मौत से पहले उसके घर में हुई थीं। उन्होंने सुशांत की बहन प्रियंका के बारे में  चौंकाने वाली बात अपने स्टेटमेंट में कही है।

इसके साथ ही रिया ने बताया है कि उनका आदित्य ठाकरे के साथ उठना बैठना नहीं था। वो उनको नहीं जानती। रिया के वकील सतीश मान शिंदे ने मीडिया से कहा है कि रिया के ऊपर लगे सभी आरोप बेबुनियाद हैं। उन्होंने कहा कि रिया ने कभी भी महाराष्ट्र के पर्यावरण मंत्री आदित्य ठाकरे से ना तो मुलाकात की है और ना ही फोन पर बात की हैं। हाँ, रिया ने शिवसेना नेता के बारे में सुन जरूर रखा है। हालाँकि, वो ठाकरे के अच्छे दोस्त डिनो मोरिया को जानती हैं, क्योंकि वो इंडस्ट्री में काफी सीनियर हैं।

रिया के हवाले से उनके वकील ने कहा, ”अप्रैल 2019 में रिया और सुशांत ने एक पार्टी में शामिल हुए थे और इसके कुछ वक्त बाद ही दोनों ने एक दूसरे डेट करना शुरू कर दिया था। उन्होंने एक-दूसरे के घर में एक साथ काफी वक्त बिताया। दिसंबर 2019 में आधिकारिक रूप से दोनों बांद्रा के माउंट ब्लैंक में लिव इन रिलेशनशिप में साथ रहने लगे और ये सब 8 जून 2020 तक चलता रहा। उसके बाद रिया ने घर छोड़ दिया।”

वकील की तरफ से कहा गया है कि दोनों के रिश्ते की शुरुआत में, जब रिया सुशांत के घर गई तो उनकी बहन प्रियंका और उनके पति सिद्धार्थ उसके साथ रह रहे थे। अप्रैल 2019 की एक रात रिया और प्रियंका एक पार्टी के लिए बाहर गए थे। इस दौरान प्रिंयका ने बहुत ज्यादा शराब पी ली थी और वहाँ मौजूद लोगों के साथ अजीब बर्ताव कर रही थीं।

बयान के मुताबिक रिया ने इस बात पर जोर दिया कि उन्हें सुशांत के घर वापस चलना चाहिए। वापसी की बात कहने पर भी वह शराब पीती रहीं जबकि रिया वापस आ गईं क्योंकि उन्हें अगले दिन शूट पर जाना था। रिया, सुशांत के कमरे में सोई हुई थीं, वह अचानक जाग गईं क्योंकि उन्होंने पाया कि प्रियंका उनके बिस्तर में सो रही हैं और उन्हें गलत ढंग से छू रही थी

रिया बहुत ज्यादा शॉक्ड थीं और उन्होंने तुरंत उन्हें कमरे से चले जाने को कहा। फिर रिया ही घर से चली गईं। बाद में जब रिया ने सुशांत को ऐसा करने की बात बताई तो उनका अपनी बहन से इसी बात पर झगड़ा हो गया। इसके बाद रिया और सुशांत के परिवार के रिश्ते तल्ख हो गए थे। जब उन 20 लोगों की लिस्ट बनाई गई जो सुशांत के अंतिम संस्कार का हिस्सा बन सकते थे तो उनमें रिया का नाम नहीं था। वो अंतिम संस्कार में नहीं जा सकी।

पूरे मामले में रिया के वकील ने कहा कि रिया चक्रवती पर झूठे इल्‍जाम लगाए जा रहे हैं तथा मामले में राजनीति हो रही है। नेता लोग बिहार चुनाव में इसका फायदा उठाना चाहते हैं। रिया चक्रवर्ती का बयान जारी करते हुए उनके वकील ने कहा है कि उनके खिलाफ पुलिस और प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जाँच में कुछ भी नहीं मिला है। इस संबंध में सुशांत के परिवार के आरोप बकवास हैं। वे लोग बेबुनियाद व मनगढ़ंत आरोप लगा रहे हैं।

बयान के मुताबिक 27 जुलाई 2020 तक उनके परिवार से किसी ने कोई आरोप नहीं लगाए थे। उनका बयान मुंबई पुलिस ने दर्ज किया था। वो पढ़े लिखे हैं और उनके परिवार में ओपी सिंह नाम का एक आईपीएस अफसर है। उन्होंने कहा कि ये सभी आरोप एक पुनर्विचार के तौर पर सामने आए हैं और इनके पीछे उनकी कोई मंशा है। रिया ने सुसाइड के लिए उकसाने, गलत बर्ताव और पैसे की धाँधली जैसे इन सभी आरोपों का खंडन किया है।

रिया की तरफ से कहा गया कि मुंबई पुलिस और ईडी ने सभी तरह के इलेक्ट्रॉनिक, फॉरेंसिक और मेडिकल रिपोर्ट ले ली हैं। बैंक स्टेटमेंट, इनकम टैक्स, सीसीटीवी, सीडीआर और इलेक्ट्रोॉनिक डाटा दोनों एजेंसियों के पास हैं। अब तक रिया के खिलाफ कोई आपराधिक तथ्य नहीं मिले हैं।

आगे कहा गया कि मीडिया कोई अटकलें न लगाए। रिया की खामोशी कमजोरी नहीं है। सच कभी नहीं बदलता। मौत के 40 दिन बाद बिहार पुलिस के सामने आरोप लगाना बकवास है। सुशांत का परिवार बेबुनियाद बातें कर रहा है। परिवार के सभी आरोप आधारहीन हैं।

वकील के अनुसार, “रिया ने कहा कि बिहार पुलिस के पास जाँच के लिए ज्युरिडिक्शन नहीं है और रिया अनैतिक जाँच में सहयोग नहीं करेंगी। कई कारण हैं जिनके चलते बिहार पुलिस की जाँच को लेकर वह डरी हुई हैं। बिहार पुलिस ने उसी दिन FIR दर्ज की है जिस दिन शिकायत दी गई थी, बावजूद इसके कि मामला 40 दिन बाद सामने आया था। मेरी क्लाइंट को जाँच में सहयोग करने का एक भी समन भेजे बिना वो सीधे मुंबई आ गए।”

रिया ने कहा कि उन्होंने हमेशा ये बात कही है कि एक फेयर और इंपार्शियल इनक्वायरी के जरिए सच सामने आना चाहिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सामने ये बात मानी है कि उन्होंने केंद्रीय ग्रह मंत्री अमित शाह को मैसेज करके सीबीआई जाँच की माँग की थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सामने ये भी माना कि उन्हें सीबीआई इनक्वायरी से कोई दिक्कत नहीं है। रिया ने कहा है कि वो किसी तीसरी एजेंसी से भी जाँच को तैयार हैं। इसके साथ ही रिया ने इस बात पर भी जोर दिया कि उन्होंने कभी भी सुशांत से पैसे नहीं लिए।