Home Blog Page 4590

पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर और लद्दाख से बने हैं डॉक्टर तो नहीं कर सकेंगे प्रैक्टिस, MCI ने लिया फैसला

मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) ने पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर और लद्दाख (PoJKL) की मेडिकल शिक्षा को लेकर एक बड़ा फैसला लिया है। भारत में मेडिकल एजुकेशन संबंधी मानकों को देखने वाली संस्था मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की ओर से जारी सर्कुलर के मुताबिक, पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर और लद्दाख स्थित मेडिकल कॉलेजों से शिक्षा प्राप्त करने वाला कोई भी व्यक्ति भारत में आधुनिक चिकित्सा की प्रैक्टिस करने के योग्य नहीं होगा।

बोर्ड ऑफ गवर्नर्स (BoG) ने अगस्त 10, 2020 को एक सार्वजनिक सूचना में कहा कि समूचा जम्मू कश्मीर और लद्दाख क्षेत्र भारत का अभिन्न अंग है। पाकिस्तान ने इन क्षेत्रों के हिस्सों पर अवैध और जबरन कब्जा कर रखा है।

बीओजी के महासचिव डॉक्टर आरके वत्स ने जारी नोटिस में कहा है कि पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू कश्मीर और लद्दाख क्षेत्र स्थित किसी भी चिकित्सा संस्थान को भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम 1956 के तहत अनुमति और मान्यता की जरूरत है। पीओजेकेएल स्थित ऐसे किसी भी चिकित्सा संस्थान को इस तरह की अनुमति नहीं दी गई है।

जारी सूचना में कहा गया है कि पीओजेकेएल के इन इलाकों में स्थित चिकित्सा कॉलेजों से शिक्षा प्राप्त करने वाला व्यक्ति भारत में आधुनिक चिकित्सा की प्रैक्टिस करने के लिए भारतीय चिकित्सा परिषद अधिनियम 1956 के तहत पंजीकरण हासिल करने के योग्य नहीं होगा।

उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान बीते कई सालों से कश्मीरी युवाओं तक अपनी पहुँच बनाने के लिए कश्मीरी स्टूडेंट्स को कम कीमत में शिक्षा का लालच देता रहा है। जिसके बाद कई ऐसे मामले सामने आ चुके हैं, जब कश्मीरी युवा पढ़ाई के लिए लीगल चैनल से पाकिस्तान या पीओजेके गए, लेकिन उसके बाद आतंकी कैंपों में ट्रेनिंग लेकर लाइन ऑफ कंट्रोल के रास्ते से लौटे।

जम्मू-कश्मीर के बहुत सारे युवक पाकिस्तान में मेडिसिन की पढ़ाई करने जाते थे, जिनमें से कई सारे अलगाववादी नेताओं की सिफारिश पर जाया करते थे और पाकिस्तान सरकार ने उन मेडिकल इंस्टीट्यूट्स में जम्मू-कश्मीर के छात्रों के लिए आरक्षण भी तय कर दिया था। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के इस नीतिगत फैसले से पाकिस्तान को गहरी चोट लगी है।

बेंगलुरु दंगे: 5 लोगों ने किया 200-300 की भीड़ का नेतृत्व, लगे-‘पुलिस को मारो और खत्म करो’ के नारे, 9 FIR दर्ज

बेंगलुरु में मंगलवार (अगस्त 11, 2020) को हिंसा भड़कने के मामले में 5 लोगों का नाम FIR में शामिल किया गया है। इन पाँचों पर आरोप है कि इन्होंने ही 200-300 लोगों की इस्लामिक भीड़ को एकत्रित करके बेंगलुरु में दंगे करवाए।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस एफआईआर पर रिपोर्ट की है। रिपोर्ट के मुताबिक FIR में बताया गया है कि भीड़ के पास पहले से माचिसें, पत्थर, रॉड जैसे हथियार थे। ये भीड़ कथित तौर पर नारे लगा रही थी, “पुलिस को मारो और खत्म करो।”

इन लोगों ने केजी हल्ली और डीजे हल्ली थाने में 11 अगस्त को आ गजनी करके हड़कंप मचाया था। इन्होंने पेट्रोल से भरी प्लास्टिक की बोतलें थाने में पुलिस के ऊपर फेंकीं थी।

रिपोर्ट यह भी बताती है कि यह दंगे संप्रदाय विशेष के कुछ स्थानीय नेताओं की एक बैठक के बाद शुरू हुए। इस बैठक का एजेंडा ही नवीन के पोस्ट पर विचार करना था। सदस्यों ने इस बैठक के बाद निर्णय लिया कि वह इस मामले को पुलिस में लेकर जाएँगे। वहीं, कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन SDPI के सदस्य समेत कई इस्लामिक नेताओं ने विधायक के भतीजे के ख़िलाफ़ एक्शन लेने की ठानी।

पुलिस बताती है कि यह जानकारी फर्जी है कि पुलिस वाले नवीन के ख़िलाफ़ कंप्लेन नहीं स्वीकार कर रहे थे, जिसके कारण दंगे हुए और 3 लोग मारे गए व 60 पुलिस वाले घायल हुए।

इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, इस मामले में अब तक 9 FIR दर्ज हुई हैं और कहा जा रहा है कि साइबर पुलिस इस केस में और शिकायत दर्ज कर सकती है।

गौरतलब है कि हमने पहले इस बात की जानकारी दी थी कि कैसे संप्रदाय विशेष की भीड़ ने डीजे हल्ली थाने के बेसमेंट इलाके में घुसकर हिंसा की और 200-250 वाहनों को आग के हवाले झोंक दिया।

ऐसी वीडियोज भी सामने आई जहाँ इस्लामिक भीड़ के सामने लाचार पुलिस अधिकारी अपने वरिष्ठों से रो रोकर गोली चलाने की अनुमति माँग रहे हैं। लेकिन, तब भी घटना के अगले ही दिन SDPI पूरी घटना के लिए संप्रदाय विशेष की भीड़ की जगह बेंगलुरु पुलिस पर इल्जाम मढ़ देती है।

सुवर्ण न्यूज के अनुसार, संगठन के राज्य अध्यक्ष इलियास मुहम्मद थाम्बे ने बुधवार को दावा किया कि बेंगलुरु पुलिस ने आरोपित की गिरफ्तारी में देरी की, जिससे संप्रदाय विशेष की भीड़ नाराज हो गई और बेंगलुरु की सड़कों पर हिंसा करने के लिए विवश हो गई।

बता दें इस पूरी घटना में 60 से ज्यादा पुलिसकर्मी पत्थरबाजी और दंगों के दौरान घायल हुए हैं। कम से कम 10 वाहन जिसमें दो डीसीपी की इनोवा गाड़ी थी, थाने के सामने तोड़ी गई। इसके बाद भीड़ ने डीजे हल्ली थाने के सामने ही वाहनों में आग भी लगाई।

पूर्व नियोजित दंगे में संप्रदाय विशेष की भीड़ ने थाने पर पेट्रोल बम और हथियारों से हमला किया। इस दौरान भीड़ अल्लाह हू अकबर और नारा ए तकबीर के नारे लगाती रही। मामला शांत पड़ने पर कर्नाटक गृहमंत्री ने आदेश दिए कि वह इन दंगों की जाँच करवाएँगें और जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई भी दंगाइयों से की जाएगी। इस पूरे केस में अभी तक 146 लोग गिरफ्तार हुए हैं। 

आनंद रंगनाथन को वापस लाओ: कुरान की आयतें लिखने पर ‘घृणा वाला’ कह कर ट्विटर ने किया अकाउंट ब्लॉक

बेंगलुरु में इस्लामिक हिंसा भड़कने के बाद जेएनयू प्रोफेसर आनंद रंगनाथन ने एक ट्वीट किया। इस ट्वीट में उन्होंने समुदाय विशेष से अपील की कि जो भी लोग कुरान की एक ऐसी आयत का विरोध करते हैं, जिसमें अल्लाह या अल्लाह के बंदों को दुत्कारने पर सजा मिलने की बात है, उन्हें अब मुखर होकर बोलना चाहिए।

आनंद रंगनाथन का यह ट्वीट उन लोगों पर एक निशाने की तरह था, जो आम दिनों में मजहब और दीन की बातें करते हैं लेकिन जब बेंगलुरु जैसी कोई मजहबी हिंसा घट जाती है तो मानवता की बात करके उनके अपराधों से ध्यान भटकाने में लग जाते हैं।

जेएनयू के प्रोफेसर ने इसी रवैये पर कुरान की इस आयत को कोट किया था- “जो भी अल्लाह और उसके बंदे को दुत्कारेगा, अल्लाह उन्हें इस जहां में लानत देता है और उनके लिए अपमानजनक दंड भी तैयार रखता है।”

डॉ रंगनाथन ने कुरान की इन पंक्तियों को लिखते हुए कहा था कि जो कुरान की इन बातों में विश्वास नहीं रखते, उन्हें यह बात मुखर हो कर कहना चाहिए। मगर, ट्विटर ने उनके इस ट्वीट को नियमों का उल्लंघन बताकर उनका अकाउंट लॉक कर दिया।

कारण में ट्विटर ने आनंद रंगनाथन के ट्वीट को ‘घृणा वाला’ बताया। जिस पर जेएनयू प्रोफेसर ने अपील करते हुए ट्विटर को लिखा कि उन्होंने जो भी ट्वीट किया है, वह कुरान की एक आयत है। तो क्या इसका मतलब ये है कि कुरान में लिखी आयात घृणा वाली है। किस मामले में ये निर्धारित होगा कि किसी आयत का हवाला देना आपके नियमों का उल्लंघन है।

आपको बता दें कि डॉ आनंद रंगनाथन ने अपने ट्वीट में जिस कुरान की आयत का उल्लेख किया है, उसे https://quran.com/33/57 पर यहाँ पढ़ा जा सकता है। फिर सवाल उठता है कि ट्विटर के नियमों का उल्लंघन किससे हुआ। क्या बस आनंद रंगनाथन के ट्वीट से? या फिर आयात में मौजूद आदेश से?

इस घटना के बाद आनंद रंगनाथन के ट्विटर पर वापस लाने की माँग तेज हो गई है। लोग अपने-अपने ट्विटर हैंडल से #BringBackAnandRanganathan ट्वीट करके उनकी वापसी की माँग करने लगे। लोगों ने उन्हें सबसे समझदार आवाज बताते हुए ट्विटर से अपील की कि उन्होंने कोई भी नियम उल्लंघन नहीं किया। उन्हें वापस लाया जाए।

एक ने आनंद रंगनाथन के अकॉउंट ब्लॉक सुनकर कहा कि मतलब कुरान की आयत ट्विटर पर न डाली जाए, क्योंकि ट्विटर उसे हेटस्पीच मानता है। एक यूजर ने ट्विटर को वामपंथियों का उपकरण बताया। एक अन्य नेटिजन ने पूछा कि क्या कुरान की आयत कोट करना ईशनिंदा हो गई?

वहीं, डॉ रंगनाथन ने खुद भी टाइम्स नाऊ में एक डिबेट में अपने साथ हुई घटना पर बात करते हुए कुछ उन पुराने मुद्दों का जिक्र किया, जब पैगंबर का नाम आने के कारण इस्लामिक भीड़ भड़क गई। वह रंगीला रसूल की किताब का जिक्र करते हैं और बताते हैं कि कैसे इल्मुद्दीन नामक कट्टरपंथी ने उन्हें मारा और बाद में जिन्ना ने उसी हत्यारे का केस लड़ा।

वह कहते हैं कि यह पहली बार नहीं हुआ है। कमलेश तिवारी की हत्या की माँग भी कॉन्ग्रेस विधायक समेत संप्रदाय विशेष के सैंकड़ों द्वारा की जा रही थी। वह पूछते हैं कि क्या एक पोस्ट मात्र से भड़क जाना असहिष्णुता नहीं है? साजिद बुखारी नामक पत्रकार की बात का जिक्र करते हुए आनंद रंगनाथन बताते हैं कि उसने भी कहा था, “जब बात पैगंबर की आती है जो मुझे गर्व है असहिष्णु होने पर।”

आनंद रंगनाथन शार्ली ऐब्दो मैग्जीन पर हुए हमले की ओर ध्यान आकर्षित करवाते हैं और कमलेश तिवारी मामले में ओवैसी की उस बात को कोट करते हैं, जिसमें ओवैसी ने कमलेश तिवारी को गाली देते हुए कहा था कि अब उनकी गुस्ताखी ने बर्बादी को दावत दी है।

राम जन्मभूमि ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास कोरोना पॉजिटिव, भूमिपूजन के दौरान पीएम मोदी के साथ साझा किया था मंच

श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। 5 अगस्त यानी आज से 8 दिन पहले महंत नृत्य गोपाल दास प्रधानमंत्री मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के साथ अयोध्या में राम मंदिर के भूमिपूजन में शामिल हुए थे। इसके साथ उन्होंने उनके साथ मंच भी साझा किया था।

नृत्य गोपाल दास बुधवार को जन्माष्टमी मनाने मथुरा पहुँचे थे। जहाँ उन्हें कृष्ण जन्माष्टमी समारोह के दौरान साँस लेने में तकलीफ हुई। गोपाल दास को आगे के इलाज के लिए मेदांता अस्पताल, गुरुग्राम शिफ्ट किया जा रहा है। 5 अगस्त 2020 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और आनंदीबेन पटेल भी उनके साथ मंच पर थे।

इस समय देश में कुल कोरोना मरीजों का आँकड़ा 24 लाख के करीब पहुँच गया है। पिछले 24 घंटे में करीब 67 हजार नए मामले सामने आए हैं और 942 लोगों की मौत हो गई है। गुरुवार को स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से जारी अपडेट के मुताबिक, कुल मरीजों की संख्या 23 लाख 96 हजार 637 है।

कोरोना से अब तक 47 हजार 33 लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं अब तक 16 लाख 95 हजार 982 लोग ठीक हो चुके हैं, जबकि एक्टिव केस की संख्या 6 लाख 53 हजार 622 है। आँकड़ो के मुताबिक देश में कोरोना से औसत रिकवरी दर 70 फीसदी से ज्यादा हो गई है। इसके साथ ही देशभर में एक दिन में सबसे ज्यादा 7 लाख 33 हजार 449 टेस्ट किए गए।

इराक में मारा गया सद्दाम… और कट्टरपंथियों ने बेंगलुरु में मचाई थी तबाही: कॉन्ग्रेस नेता सीके शरीफ़ ने की थी हिंसा की अगुवाई

फरवरी के दौरान दिल्ली में हुआ, अगस्त में ठीक वही बेंगलुरु में हुआ। 11 अगस्त की रात जब बेंगलुरु जल रहा था तब भारत की धर्म निरपेक्ष आबादी उर्दू शायर को याद कर रही थी। निशाने पर था कॉन्ग्रेस विधायक। इस पार्टी ने सालों मेहनत करके धर्म निरपेक्ष आबादी से जो रिश्ता बनाया था। वह पल भर में समाप्त हो गया। वह भी एक किसी ऐसी चीज़ के लिए जो उन्होंने (कॉन्ग्रेस विधायक) ने की भी नहीं। लेकिन भीड़ के लिए उससे मिलता-जुलता ही बहुत है।  

सच्चाई यही है कि भीड़ के लिए एक नास्तिक किसी दूसरे की तुलना में कहीं बेहतर है। आखिर यह कहाँ तक जा सकता है? लेकिन दूसरों के अपराध की सज़ा एक नास्तिक को देने के लिए किस दर्जे तक टकराव की ज़रूरत है। बेंगलुरु यह बहुत अच्छे से जानता है लेकिन शायद बेंगलुरु को यह याद नहीं है। बात साल 2007 की है जब सद्दाम हुसैन को फाँसी दी जाने वाली थी। सद्दाम हुसैन एक निर्दयी तानाशाह, जिसे मानवता पर किए गए अपराधों की सज़ा मिलने वाली थी।  

लेकिन उस इलाके में और भी कई निर्दयी तानाशाह हैं (कभी सोचा है क्यों?)

खैर आप ईराक युद्ध और सद्दाम हुसैन की फाँसी के बारे में कुछ भी सोचते हों। लेकिन मेरा ऐसा मानना है कि हम एक बात से ज़रूर सहमत हो सकते हैं। भारत वहाँ पर हुए विवादों के बाद बने हालातों के लिए किसी भी सूरत में ज़िम्मेदार नहीं था। कम से कम बेंगलुरु के आम लोगों को छोड़ कर। लेकिन फिर भी बेंगलुरु की सड़कों पर कुछ लोग उतरे और उन्होंने सद्दाम हुसैन की फाँसी का विरोध किया। विरोध में निकाली गई इस रैली के मुखिया थे कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व मंत्री सीके शरीफ़। बहुत जल्द रैली में शामिल भीड़ हिंसक हुई, उनका पुलिस से टकराव हुआ। दुकानें और गाड़ियाँ जलाई जाने लगीं।  

अब कुछ सुना-सुना सा लग रहा होगा? 

अब कुछ रोचक सा सामने आया है। यह लेख लिखने से पहले मैंने उस घटना के बारे में पुख्ता होने के लिए गूगल पर खोजबीन की। यह बहुत मुश्किल नहीं होना चाहिए ना? एक मेट्रोपोलिटन शहर में हुए दंगों के बारे में जानकारी मिलना कैसे मुश्किल हो सकता है। सही तो है? जी नहीं! बिलकुल गलत है। मेरी हैरानी की कल्पना करिए जब मैंने उस घटना के बारे में गूगल पर खोजने की कोशिश की।  

सद्दाम हुसैन को हुई फाँसी की ख़बर का शीर्षक

यह रिपोर्ट The Reuters द्वारा 21 जनवरी 2007 को प्रकाशित की गई थी। जिसमें घटना के बारे में कुछ इस तरह जानकारी दी गई है। “हिंसा की घटना तब हुई जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता प्रदर्शन करने के लिए आगे आए।” इसके बाद संप्रदाय विशेष की दुकानों को एक-एक करके निशाना बनाया गया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि हिंसा की घटनाएँ इसलिए भी बढ़ी क्योंकि राज्य में भारतीय जनता पार्टी और एक स्थानीय राजनीतिक दल का प्रभाव है।  

इस कवरेज की शैली और व्याख्या का एक दशक से ज़्यादा का समय गुज़र जाने के बाद भी नहीं बदली। The Reuters की रिपोर्ट के भीतर यह भी बताया गया था कि 21 जनवरी की हिंसा के पहले क्या हुआ था। रिपोर्ट में यह लिखा था, “शुक्रवार को सद्दाम हुसैन की फाँसी के विरोध में संप्रदाय विशेष के हज़ारों प्रदर्शनकारी इकट्ठा हुए। उनका पुलिस से टकराव हुआ और उसके बाद शहर की दुकानें और वाहन जला दिए गए।”

लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद 19 जनवरी को प्रकाशित उस रिपोर्ट में “संप्रदाय विशेष के कार्यकर्ताओं” को आरोपित बताने वाला शीर्षक नहीं नज़र आया। यहाँ तक कि 19 जनवरी के दिन हुई उस घटना की कोई स्पष्ट रिपोर्ट तक नहीं नज़र आई। इसके अलावा किसी दिग्गज मीडिया समूह ने भी 19 जनवरी की घटना पर कोई रिपोर्ट तैयार नहीं की थी। जबकि इस घटना में कॉन्ग्रेस नेता सीके शरीफ़ का नाम सामने आया था। मुझे अपनी याद्दाश्त और ज़हन पर शक था फिर भी मैंने गूगल पर खोजबीन करना जारी रखा। अंततः Daijiworld नाम की वेबसाइट पर 19 जनवरी साल 2007 की घटना की जानकारी मिली।  

जनवरी 2007 की घटना पर Daijiworld की रिपोर्ट

देश के इतने बड़े शहर में हुई घटना के बारे में केवल इतनी ही जानकारी मिली। जिसके अंत में लिखा था ‘अभी और जानकारी मिलना बाकी है’। बेंगलुरु में हुई हिंसा के बारे में इंटरनेट पर इससे ज़्यादा कुछ और मौजूद नहीं है। अगर आपको इस बारे में गूगल पर कुछ मिले तो ज़रूर बताइए। शैली लगभग एक जैसी ही थी। जिन मीडिया समूहों ने जनवरी 2007 के दौरान हुई हिंसा की घटना पर रिपोर्ट प्रकाशित की है। उन्होंने भी इसके लिए हिंदू कार्यकर्ताओं को ज़िम्मेदार ठहराया है।  

The Reuters की रिपोर्ट में अक्सर शुरुआत करने वाले को छिपा दिया जाता है। फ्रंटलाइन में प्रकाशित इस रिपोर्ट में साफ़ देखा जा सकता है कि भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद के कार्यकर्ताओं की तस्वीर लगाई गई है। इसके अलावा उन्हें ही हिंसा के लिए ज़िम्मेदार ठहराया गया है। इस लेख के भीतर कहीं छिपा कर लिखा गया है “19 जनवरी को हिंसा की पहली घटना हुई। जब पूर्व कॉन्ग्रेस नेता सीके शरीफ़ ने सद्दाम हुसैन की फाँसी का विरोध करने के लिए भीड़ एकत्रित की।  

सद्दाम हुसैन को हुई फाँसी के विरोध के दौरान हिंसा के लिए विश्व हिंदू परिषद को ज़िम्मेदार ठहराया गया

ठीक इससे मिलती जुलती रिपोर्ट द टेलीग्राफ ने भी प्रकाशित की।    

टेलीग्राफ की रिपोर्ट

अब सवाल यह उठता है कि 19 जनवरी को हुई हिंसा की सीधी कवरेज कहाँ है? अगर यह आपको मिलती है तो मैं उसे ज़रूर पढ़ना पसंद करूँगा। क्या भारतीय मीडिया ऐसी घटनाओं पर रिपोर्ट करने के पहले “हिंदू एंगल” खोजती है। असल मायनों में यही है धर्म निरपेक्षता कि हिंदुओं को चिल्ला-चिल्ला कर दोषी ठहराओ। अगर संप्रदाय विशेष के किसी व्यक्ति ने कुछ गलत किया है तब दोनों समुदायों को दोषी कहो। ऐसा करके लोग अपनी रिपोर्टिंग चमकाते रहते हैं। उसके बाद धीरे-धीरे लोग ऐसी घटनाओं का एक पहलू भूल ही जाएँगे।

ऐसा सिर्फ भारत की छोटी बड़ी घटनाओं के मामले में नहीं होता है। न्यूयॉर्क टाइम्स की एलेन बैरी का ट्वीट देखा जा सकता है।  

एलन बैरी का ट्वीट

ठीक ऐसे ही एनसीईआरटी ने गोधरा में जलाए गए 59 हिंदुओं की घटना का उल्लेख ही ख़त्म कर दिया है। इसके बाद वह सीधे साल 2002 में हुए गुजरात दंगों का ज़िक्र करते हैं जिसे वह “संप्रदाय विशेष विरोधी दंगा” बताते हैं। यह प्रचार इतना प्रभावी था कि न्यूयॉर्क टाइम की पत्रकार ने मोदी सरकार पर इस घटना को छिपाने का आरोप लगा दिया। वहीं एनसीईआरटी ने इसका ज़िक्र “गुजरात दंगों” के नाम से किया है।  

क्या आपको ऐसा लगता है कि इस तरह की करतूत सोशल मीडिया के दौर में नहीं की जा सकती है? फिर से सोचिए, दिल्ली दंगों के बारे में याद करिए। जहाँ एक तरफ दक्षिणपंथी विचारधारा के लोग सोशल मीडिया पर बहस में उलझे हुए थे। वहीं दूसरी तरह वामपंथी मानसिकता के लोग विकिपीडिया पर इस बारे में एक लेख साझा करने की तैयारी में होंगे। जिसमें दंगे और हिंसा के लिए हिंदुओं को दोषी ठहरा रहे होंगे।  

आज से ठीक 10 साल बाद सोशल मीडिया पर उठा यह गुस्सा लगभग सभी भूल जाएँगे। लोगों को 11 अगस्त 2020 को क्या हुआ था इस बारे में सही जानकारी इकट्ठा करने के लिए अच्छी भली मेहनत करनी पड़ेगी। उसके बावजूद सही नतीजे मिले या न मिलें इसका कुछ भरोसा नहीं। ठीक वैसे ही जैसे मुझे साल 2007 की बेंगलुरु में हुई घटना के बारे में जानने के लिए संघर्ष करना पड़ा।         

यह अभी से ही शुरू भी हो गया है। बेंगलुरु हिंसा से संबंधित रिपोर्ट्स को धुँधला करना शुरू कर दिया गया है। यह तभी से ही शुरू हो गया था जब तमाम मीडिया समूहों ने मानव शृंखला बना कर मंदिर को बचाने वाली घटना का महिमामंडन करना शुरू कर दिया। यह एक रिपोर्ट में जिसमें पत्रकारों पर दंगाइयों और पुलिस कर्मियों द्वारा हमले की बात कही गई है। इसके अलावा एक और रिपोर्ट है जिसमें कॉन्ग्रेस नेता के प्रति लोगों का गुस्सा दिखाया गया है। घटना को दो दिन भी नहीं हुए हैं और झूठी नैरेटिव फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। सोच कर देखिये आज से 10 साल बाद बेंगलुरु में हुए दंगों को हमारे सामने किस तरह पेश किया जाएगा।       

‘गोबर मूत्र पीने वाला… जिन्दा जलाओ हराम के औलाद को… रसूलल्लाह की शान में गुस्ताखी’ – बेंगलुरु दंगे के बाद खतरे में नवीन

पैगंबर मोहम्मद को लेकर सोशल मीडिया पर किए गए एक पोस्ट से बेंगलुरु में संप्रदाय विशेष की भीड़ द्वारा किए गए दंगों से ऐसी हिंसा भड़की कि इस तोड़-फोड़ और आगजनी में तीन लोगों की मौत हो गई और करीब 60 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हो गए।

गत मंगलवार, यानी 11 अगस्त की रात को बेंगलुरु के पुलाकेशी नगर में पैगंबर मोहम्मद को लेकर एक पोस्ट से नाराज संप्रदाय विशेष के लोगों ने कॉन्ग्रेस विधायक अंखंड श्रीनिवास मूर्ति के आवास के बाहर जमकर उत्पात, तोड़-फोड़ और आगजनी की।

संप्रदाय विशेष के आक्रोशित लोगों की भीड़ ने पुलाकेशी नगर के विधायक अखंड श्रीनिवास मूर्ति के आवास और डीजे हल्ली थाने को निशाना बनाया, क्योंकि कॉन्ग्रेस विधायक के भतीजे नवीन द्वारा पैगम्बर मोहम्मद को लेकर एक कथित आपत्तिजनक टिपण्णी की गई थी।

सोशल मीडिया पर अभी तक भी नवीन को लेकर संप्रदाय विशेष के युवकों में गुस्सा देखा जा रहा है और उसे जान से मारने की बातें कही जा रहीं हैं। इन्हीं में से एक ‘ज्वाइन AIMIM’ नाम के फेसबुक ग्रुप में नवीन की तस्वीर शेयर की गई हैं, जिसके कमेंट्स में नवीन को लेकर बेहद भयावह टिप्पणियाँ की जा रही हैं।

आरिफ खान नाम के युवक द्वारा नवीन की एक तस्वीर शेयर की गई है, जिसमें संदेश लिखा है – “यही वो कॉन्ग्रेस MLA का नेफ्यू है, जिसने रसूलल्लाह की शान में गुस्ताखी की है..।”

इस पोस्ट के कमेंट्स में सलमान अंसारी और सरताज ने नवीन को ‘लानत’ दी हैं। अन्सीर बाशा ने लिखा है – “इस को फॉरवर्ड मत करो, सब्र करो और इसका हश्र देखो आगे।”

मुराद आलम ने लिखा है – “इसको मारो।”

शादाब अंसारी ने पैगम्बर के कथित अपमान करने के पर नवीन के लिए लिखा है – “इसको तो चौक पर खड़ा कर के जिन्दा जला दिया जाए, वो भी सजा कम है इस हराम के औलाद को।”

वहीं, मोहम्मद सलीम मंसूरी ने नवीन के लिए उसी भाषा का इस्तेमाल किया है, जो कि पुलवामा आतंकी हमले के मुख्य अभियुक्त अहमद डार ने इस्तेमाल की । सलीम मंसूरी ने लिखा है – “शैतान की औलाद गुफाओं में पैदा हुआ है, ये हरामखोर हरामी गन्दगी पनौती गोबर मूत्र पैशाब पीने वाला हराम की औलाद सूअर शक्ल से लग रहा है गंदगी 1001 %%%%%%%%%% से ज्यादा सत्य है, सच है, इसकी मौत तय है 1001%।”

जावेद खान ने लिखा है – “गोली मारो कुत्ते को।”

इस पूरे पोस्ट में कई लोगों ने नवीन को गोली मारने और जान से मार देने की बात की हैं। जैसा कि इस स्क्रीनशॉट में आप देख सकते हैं –

उल्लेखनीय है कि बेंगलुरु में संप्रदाय विशेष की भीड़ द्वारा किए गए दंगों के दौरान संप्रदाय विशेष की उग्र भीड़ डीजे हल्ली पुलिस स्टेशन के बेसमेंट में घुस गई और कथित तौर पर 200-250 वाहनों में आग लगा दी। खबरों के मुताबिक, कॉन्ग्रेस विधायक के आवास पर तोड़फोड़ करने वाली संप्रदाय विशेष की भीड़ ने मंगलवार (अगस्त 11, 2020) को पुलिस थाने में यह मानकर तोड़फोड़ और वाहनों को क्षतिग्रस्त किया कि पुलिस ने आरोपितों को हिरासत में रखा है।

जिन पुलिसकर्मियों ने दंगाइयों को रोकने की कोशिश की, उन पर भी संप्रदाय विशेष की भीड़ ने हमला किया, जिसके परिणामस्वरूप 60 से अधिक पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए। मंगलवार रात पूर्वी बेंगलुरु में भड़की इस हिंसा में 3 लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए।

सड़क 2 ने ‘अंग्रेजों’ को भी पिछड़ा: 58 लाख से ज्यादा डिसलाइक, यूट्यूब पर ‘Top-10’ वीडियो में शामिल

12 अगस्त को रिलीज होने के साथ ही ‘सड़क 2’ का ट्रेलर यूट्यूब पर ट्रेंड कर रहा है। महेश भट्ट द्वारा निर्देशित इस फ़िल्म के ट्रेलर को 24 घंटे के भीतर ही 19 मिलियन से ज्यादा बार देखा जा चुका है। लेकिन ‘सड़क 2’ के ट्रेलर को अब तक 5.8 मिलियन (58 लाख) से ज्यादा बार डिस्लाइक किया चुका है, जो कि अपने आप में बेहद ही खराब रिकॉर्ड है। जबकि इस ट्रेलर को देखकर इसे पसंद या लाइक करने वालों की संख्या महज तीन लाख के आसपास है।

बता दें कि महेश भट्ट की यह मूवी जल्द ही दुनिया की सबसे ज्यादा डिसलाइक वीडियो में शामिल हो चुकी है। सड़क 2 के ट्रेलर ने ज़ूमिंग पास्ट के सबसे खराब प्रदर्शित वीडियो स्वीडिश गमेर पिउडाईपाई के रिकॉर्ड को भी पछाड़ दिया है। वर्तमान में सड़क 2 भारत की सबसे ज्यादा डिसलाइक वीडियो बन गई है। इसके ट्रेलर ने यूट्यूब पर कॉल ऑफ ड्यूटी: इनफिनिट वारफेयर डेविल के ट्रेलर को काफी मार्जिन के साथ पीछे छोड़ दिया है।

वहीं अब सड़क 2 सोशल मीडिया प्लेटफार्म में टॉप 10 मोस्ट डिसलाइक वीडियो में शामिल हो चुका है। यूट्यूब के सबसे डिसलाइक किरदार जेक पॉल, जिसे अब तक 4.9 मिलियन डिसलाइक मिल चुके है, सड़क 2 के इस ट्रेलर ने उसके भी रिकॉर्ड को तोड़ दिया है।

दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत के सुसाइड के बाद से ही लोग फिल्म निर्देशक महेश भट्ट और उनकी बेटी आलिया भट्ट को सोशल मीडिया पर लगातार ट्रोल करते नजर आ रहे हैं। सुशांत के चाहने वाले इन पर नेपोटिज्म का आरोप लगा रहे हैं। सड़क 2 के लॉन्च के साथ ही लोगों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया है। सोशल मीडिया यूज़र्स ट्विटर पर #Sadak2dislike के साथ इस पर अपना गुस्सा निकाल रहे हैं।

गौरतलब है कि YouTube पर अपने प्रीमियर के कुछ ही घंटों के भीतर सड़क 2 के ट्रेलर को 1.3 मिलियन डिसलाइक मिल चुके थे। जिस वजह से वीडियो स्ट्रीमिंग साइट पर यह अब तक का सबसे अधिक नापसंद करने वाला ट्रेलर बन गया था। ज्ञात हो कि सड़क-2 फ़िल्म, 28 अगस्त को डिज्नी प्लस हॉटस्टार पर रिलीज करने की घोषणा हुई है।

सोशल मीडिया पर इस दौरान ‘अनइंस्टॉल हॉटस्टार’ ट्रेंड होता रहा क्योंकि लोगों का कहना है कि इस फिल्म में केवल नेपोटिज्म के प्रोडक्ट्स भरे पड़े हैं, जिन्हें महेश भट्ट आगे बढ़ा रहे हैं। चूँकि इसे ‘डिजनी हॉटस्टार’ पर रिलीज किया जाना है, इसीलिए इसका विरोध हो रहा है। सोशल मीडिया में कई लोगों ने हॉटस्टार को अनइंस्टॉल कर के स्क्रीनशॉट्स भी शेयर किए। अब एक और कारण से फिल्म का विरोध हो रहा।

ये कारण है- इस फिल्म की कहानी। हम जानते हैं कि बॉलीवुड में अक्सर पंडितों और साधु-संतों को धोखेबाज और बलात्कारी दिखाया जाता रहा है जबकि संप्रदाय विशेष के किरदारों को ईमानदार और देश के लिए मर-मिटने वाला प्रदर्शित किया जाता रहा है। इसी तरह ‘सड़क-2’ में भी महेश भट्ट एक ऐसी कहानी लेकर आ रहे हैं, जिसमें एक साधु को बुरा दिखाया जाएगा और उसके काले कृत्यों का खुलासा किया जाएगा।

इस फिल्म में आलिया भट्ट का किरदार एक ऐसी महिला का होगा, जो एक ‘फेक बाबा’ से पंगा लेती है। दिखाया जाएगा कि दुनिया के सामने अच्छा बना रहे वाला गुरु कितना बड़ा अपराधी है और उसका असली चेहरा कुछ और है। ये आलिया बनाम एक आश्रम चलाने वाले बाबा की कहानी है। संजय दत्त का किरदार बाबा को ‘एक्सपोज’ करने में आलिया की मदद करेगा।

संबित पात्रा पर टूट पड़े लिबरल्स: कॉन्ग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी की टीवी चैनल पर बहस के बाद हुई मौत को बनाया हथियार

कॉन्ग्रेस प्रवक्ता राजीव त्यागी को टीवी में जारी एक परिचर्चा के दौरान कार्डियक अरेस्ट आया। उसके कुछ ही समय बाद उनकी मृत्यु हो गई लेकिन लिबरल गैंग और कॉन्ग्रेस समर्थकों का काम यहीं से शुरू हो गया। उन्होंने इसके लिए भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता संबित पात्रा को ज़िम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया। क्योंकि टीवी की उस परिचर्चा में संबित पात्रा भी शामिल हुए थे। कॉन्ग्रेस समर्थकों ने राजीव त्यागी की मृत्यु को हथियार बना कर संबित पात्रा के खिलाफ़ ज़हर उगलना शुरू कर दिया।  

कॉन्ग्रेस समर्थक साकेत गोखले ने नफ़रत फैलाने के इस अभियान की अगुवाई की। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा कि संबित पात्रा को गिरफ्तार किया जाना चाहिए। क्योंकि राजीव त्यागी ने साँस संबित पात्रा की मौजूदगी में ली।  

इसके बाद मोहम्मद आसिफ़ खान नाम के व्यक्ति ने भी संबित पात्रा को राजीव त्यागी की मृत्यु के लिए दोषी ठहराया।  

इसके बाद हंसराज मीणा नाम के ट्विटर एकाउंट ने भी राजीव त्यागी को इंसाफ़ दिलाने की बात लिखी। इसके लिए संबित पात्रा को गिरफ्तार करने की माँग उठाई।  

कॉन्ग्रेस समर्थक सिर्फ इतने पर ही नहीं रुके। इसके बाद उन्होंने संबित पात्रा को हत्यारा तक घोषित कर दिया।  

कॉन्ग्रेस समर्थकों के बाद आम आदमी पार्टी के समर्थक भी इस अभियान में उतर गए।  

स्वघोषित फैक्ट चेकर ने भी इस घटना पर अपना फैसला सुनाने में देरी नहीं की।  

राजीव त्यागी 52 साल के थे और पिछले कई सालों से टीवी परिचर्चाओं में कॉन्ग्रेस का पक्ष रखते थे। ख़बरों के मुताबिक़ परिचर्चा के बाद उन्होंने चाय माँगी और इसके बाद तकलीफ़ होने पर आराम करने के लिए लेट गए। जैसे उन्हें चाय दी गई तब उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। इसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहाँ उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।  

अफ़सोस की बात है कि यह ऐसा पहला मौक़ा नहीं है जब किसी की मौत पर इस तरह की गंदी राजनीति की जा रही है। 2 साल पहले आतंकवादियों ने शुजात बुख़ारी की गोली मार कर हत्या कर दी थी। इसके बाद लिबरल्स ने वैज्ञानिक और स्तंभकार आनंद रंगनाथन को घेरना शुरू कर दिया। लिबरल्स का कहना था कि घटना के एक दिन पहले रंगनाथन बुख़ारी के साथ परिचर्चा में शामिल हुए थे। आनंद रंगनाथन ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि बुख़ारी के धार्मिक विचार कुछ भी कहे जा सकते हैं लेकिन उदारवादी नहीं। इसके बाद लिबरल्स ने बुख़ारी की हत्या का आरोप आनंद रंगनाथन पर लगा दिया था।  

संबित पात्रा और राजीव त्यागी 11 अगस्त 2020 को बेंगलुरु में हुए दंगों पर चर्चा कर रहे थे। जो सोशल मीडिया पर प्रोफेट मोहम्मद के संबंध में टिप्पणी करने के बाद शुरू हुआ था। दंगों के दौरान बेंगलुरु के कई इलाकों में आग लगाई गई, तोड़-फोड़ हुई, 3 लोगों की जान गई और कई लोग घायल हुए। राजीव त्यागी इस्लामी आक्रांताओं पर बहस के दौरान गुस्सा हुए।  

उन्होंने कहा इतने हमलों के बाद भी देश संरक्षित है फिर “हिंदू असुरक्षित है” जैसा प्रचार किया जाता है। इसके अलावा राजीव त्यागी ने यह भी कहा जिस व्यक्ति ने मोहम्मद पर टिप्पणी की है उसे सलाख़ों के पीछे ही होना चाहिए। दंगे इसलिए हुए क्योंकि पुलिस ने शिकायत दर्ज करने में देरी की। लेकिन सबसे ज़्यादा हैरानी की बात यह थी कि आखिर कैसे राजीव त्यागी की मृत्यु को आधार बना कर संबित पात्रा को निशाना बना गया।  

टैक्स रिफॉर्म्स के लिए ‘विवाद से विश्वास’: खुलासा करने पर 70% तक की छूट, आय कर में पारदर्शिता

केंद्र सरकार के प्रति करदाताओं का भरोसा बढ़े, इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईमानदार करदाताओं के लिए आज नई घोषणा की है। इसके साथ ही केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने आयकर विभाग के कामकाज को बेहतर बनाने एवं पारदर्शिता लाने के लिए हाल में कई तरह के कदम उठाए हैं।

आयकर को लेकर अधिक पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए विभाग की ओर से डॉक्युमेंट आइडेंटिफिकेशन नंबर की शुरुआत की गई है। इसी तरह आधिकारिक संवाद की सही पहचान सुनिश्चित करने के लिहाज से भी कई कदम उठाए गए हैं।

प्रत्यक्ष कर रिफॉर्म्स (Direct Tax Reforms)

टैक्‍स रिफॉर्म्‍स के तहत दरों में कमी करने और प्रत्यक्ष टैक्स कानूनों को आसान बनाने पर सरकार का जोर रहा है। आयकर विभाग के काम में दक्षता और पारदर्शिता लाने के लिए भी केंद्रीय प्रत्‍यक्ष कर बोर्ड (CBDT) की ओर से कई पहल की गई हैं।

कॉर्पोरेट टैक्स

यह सरकार की घोषित नीति रही है कि एक ही समय में करों की दरों को कम करते हुए छूट और इंसेंटिव को हटाकर आयकर अधिनियम, 1961 को सरल बनाया जाए। वित्त अधिनियम, 2016 से शुरू करते हुए, कॉर्पोरेट्स को मिलने वाली छूट और इन्सेंटिव्स को चरणबद्ध करते हुए धीरे-धीरे कॉर्पोरेट टैक्स रेट्स को कम कर दिया गया है।

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) ने हाल के वर्षों में प्रत्यक्ष करों में कई बड़े टैक्‍स सुधार लागू किए हैं। पिछले वर्ष कॉरपोरेट टैक्स की दर को 30% से घटाकर 22% कर दिया गया था। साथ ही, नई विनिर्माण इकाइयों के लिए इस दर को और भी अधिक घटाकर 15% कर दिया गया।

पर्सनल इनकम टैक्स

इनकम टैक्‍स के कामकाज में दक्षता और पारदर्शिता लाने के लिए भी सीबीडीटी ने कई पहल की हैं। लंबित कर विवादों का समाधान प्रदान करने के उद्देश्य से विभाग ने प्रत्यक्ष कर ‘विवाद से विश्वास अधिनियम, 2020’ पेश किया है। इसके तहत वर्तमान में विवादों को निपटाने के लिए डेक्‍लेरेशन दाखिल किए जा रहे हैं।

डिविडेंड डिस्‍ट्रीब्‍यूशन टैक्‍स

‘डिविडेंड डिस्‍ट्रीब्‍यूशन टैक्‍स’ को भी हटा दिया गया है। फरवरी 01, 2020 को पेश किए बजट में केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स (Dividend Distribution Tax) हटा दिया गया है। मौजूदा वित्त वर्ष में टैक्स का नियम पूरी तरह से बदल गया है। अब कंपनियों को डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन टैक्स नहीं देना होगा, लेकिन अब ये टैक्स करदाताओं से वसूला जाएगा। इसका अर्थ यह होगा कि यह अब करदाताओं की कुल आमदनी में जुड़ जाएगा और उस पर स्लैब के हिसाब से टैक्स चुकाना होगा।

करदाताओं के लिए आसानी

फेसलेस एसेसमेंट और टैक्सपेयर्स चार्टर आज से लागू हो गए हैं। पीएम मोदी ने आज के सम्बोधन में कहा कि फेसलेस असेसमेंट स्कीम के जरिए टैक्स सिस्टम भले ही फेसलेस हो रहा है, लेकिन टैक्सपेयर को ये निष्पक्षता और निडरता का विश्वास देने वाला है। इस प्लेटफॉर्म में फेसलेस एसेसमेंट, फेसलेस अपील और टैक्सपेयर्स चार्टर जैसे बड़े रिफॉर्म हैं।

आयकर रिटर्न की पूर्व-भुगतान

टैक्स अनुपालन को अधिक सुविधाजनक बनाने के लिए, व्यक्तिगत करदाताओं को पूर्व भुगतान (आईटीआर) प्रदान किया गया है। ITR फॉर्म में अब कुछ आय, जैसे कि वेतन आय के पूर्व-भुगतान विवरण शामिल हैं।

यानी, करदाताओं की सुविधा को देखते हुए आयकर विभाग ने आयकर रिटर्न की प्रि-फिलिंग की शुरुआत की है। इससे टैक्सपेयर्स को इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करने में आसानी होती है। स्टार्टअप कंपनियों के लिए अनुपालन के नियमों को सरल बनाया गया है।

कोरोना वायरस की महामारी के बीच करदाताओं को कुछ राहत देने के लिए, केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने हाल ही में वित्तीय वर्ष 2019 के लिए आयकर रिटर्न दाखिल करने की समय सीमा बढ़ा दी है। यानी, जिन लोगों ने वित्तीय वर्ष 2018-19 के लिए अपना आईटीआर दाखिल नहीं किया है, वे अब ऐसा सितंबर 2020 तक ऑनलाइन कर सकते हैं।

इससे पहले, सरकार ने पहले ही कई मौकों पर वित्तीय वर्ष 2018-19 के लिए एक आयकर रिटर्न (ITR) दाखिल करने की समय सीमा बढ़ा दी थी। पहली समय सीमा मार्च 31, 2020 से 30 जून और फिर जुलाई 31, 2020 तक करदाता इनकम टैक्स ई-फाइलिंग वेबसाइट के माध्यम से अपना रिटर्न ऑनलाइन दर्ज कर सकते हैं। अब करदाताओं को राहत देते हुए CBDT ने वित्त वर्ष 2019-20 के लिए इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) भरने की आखिरी तारीख नवंबर 30, 2020 निर्धारित की है।

‘विवाद से विश्वास’ स्कीम

केंद्र सरकार द्वारा आयकर से जुड़े सभी मामलों को जल्द निपटाने के लिए खास स्कीम ‘विवाद से विश्वास’ स्कीम (Vivad se Vishwas Scheme) शुरू की हुई है। इसके अंतर्गत, अगर टैक्सपेयर इसका खुलासा करता है कि उस पर एक्साइज और सर्विस टैक्स का बकाया है और वो उसे चुकाना चाहता है, तो सरकार उसको टैक्स में 70% (Rebate in tax) तक की छूट देगी। साथ ही, सरकार उसके बाद करदाता से ना कोई ब्याज वसूलती है, ना ही कोई जूर्माना वसूलती है।

सबका विश्वास स्कीम का मुख्य उद्देश्य पुराने मामले खत्म करना है। ऐसे में आम टैक्सपेयर्स पर कोई छापा नहीं पड़ेगा। इसका लाभ यह होगा कि अब टैक्सपेयर को विवाद से निपटने का मौका दिया जाएगा। यह स्कीम पुराने बकाया डिस्क्लोजर का मौका देता है। इस स्कीम को अलग-अलग 2 थ्रेसहोल्ड में बाँटा गया है- 50 लाख तक के स्लैब में 70% तक टैक्स छूट है जबकि 50 लाख तक स्लैब में सिर्फ 30% टैक्स लगेगा।

इसके अलावा, नई मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों के लिए इस दर को और भी अधिक घटाकर 15% किया गया और लाभांश वितरण टैक्स को भी हटाया गया। डिजिटल लेनदेन और भुगतान के इलेक्ट्रॉनिक मोड या तरीकों को बढ़ावा देने के लिए भी कई उपाय किए गए हैं। वहीं, विदेशों में जमा काले धन के प्रवाह को रोकने के लिए, काले धन (अघोषित विदेशी आय और संपत्ति) और कर अधिनियम, 2015 (काला धन अधिनियम) को लागू किया गया है।

‘ट्रांसपेरेंट टैक्सेशन: ऑनरिंग द ऑनेस्ट’

पीएम मोदी द्वार आज ‘ट्रांसपेरेंट टैक्सेशन: ऑनरिंग द ऑनेस्ट’ नामक प्लेटफॉर्म का उदघाटन किया गया है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह प्लेटफॉर्म 21वीं सदी के टैक्स सिस्टम की शुरुआत है, जिसमें फेसलैस एसेसमेंट,अपील और टैक्सपेयर्स चार्टर जैसे बड़े सुधार शामिल हैं।

पीएम मोदी ने कहा, “देश का ईमानदार टैक्सपेयर राष्ट्रनिर्माण में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। जब देश के ईमानदार टैक्सपेयर का जीवन आसान बनता है, वह आगे बढ़ता है, तो देश का भी विकास होता है, देश भी आगे बढ़ता है।”

मणिपुर का शेर बीर टिकेंद्रजीत सिंह: अंग्रेजों ने जिन्हें कहा था ‘खतरनाक बाघ’, दी थी खुली जगह पर फाँसी

मणिपुर राज्य की सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएँ और प्राकृतिक सौन्दर्य भारतवासियों के लिए गौरव के विषय हैं, तो उसका शौर्य, साहस एवं त्याग-बलिदान से परिपूर्ण इतिहास भारतवासियों के लिए प्रेरणास्रोत है। सन् 1891 के एंग्लो-मणिपुर युद्ध में मणिपुर के बहादुर लोगों ने औपनिवेशिक शक्तियों का प्रतिरोध जिस वीरता और साहस के साथ किया; वह इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। भारत माता की स्वतंत्रता और सम्मान के लिए सन् 1891 के युद्ध में शहीद होने वाले वीरों के हम सदा ऋणी रहेंगे।

आज हम उन असंख्य वीरों को श्रद्धांजलि दे रहे हैं, जिन्होंने सन् 1891 में ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध लड़ते हुए अपना जीवन दाँव पर लगा दिया था। सन् 1891 में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ हुए एंग्लो-मणिपुर युद्ध में शहीद होने वाले राज्य के वीर नायकों को श्रद्धांजलि देने के लिए मणिपुर राज्य प्रत्येक वर्ष 13 अगस्त के दिन “देशभक्त दिवस” मनाता है। बीर टिकेंद्रजीत सिंह भारत माँ के लिए प्राण उत्सर्ग करने वाले ऐसे ही एक जाँबाज सपूत थे।

मणिपुर के तत्कालीन साम्राज्य के राजकुमार टिकेंद्रजीत महान देशभक्त और ब्रिटिश साम्राज्यवादी योजना के घोर विरोधी तथा देश की एकता-अखंडता के कट्टर समर्थक थे। उन्होंने स्वातंत्र्य-वेदी में सहर्ष अपनी सभी राजसी सुख-सुविधाओं और अंततः जीवन की आहुति दी। उनका जीवन वीरता की साक्षात प्रतिमूर्ति था और उनका विश्वास था कि –“वीरभोग्या वसुन्धरा” अर्थात् वीर ही इस भूमि को भोगने के सच्चे अधिकारी हैं।

उन्होंने साहसपूर्वक ब्रिटिश साम्राज्यवादी शक्ति के कूटनीतिक और विस्तारवादी कृत्यों से जनमानस को अवगत कराया तथा अदम्य साहस और निर्भीकता के साथ अंग्रेजी साम्राज्यवाद और उपनिवेशवाद के विरुद्ध युद्ध किया। इसी कारण उन्हें ‘मणिपुर का शेर’ कहा जाता है। यहाँ तक कि ब्रिटिश भारत की तत्कालीन सरकार ने उनकी वीरता, निडरता तथा पराक्रम की तुलना एक ‘खतरनाक बाघ’ से की थी।

कहा जा सकता है कि वे दैवीय शक्तियों का संयोग थे। क्योंकि –“उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः। षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्” अर्थात् जहाँ उद्योग, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम ये छः (गुण) होते हैं, वहाँ दैव भी सहायक होते हैं। इस परम पराक्रमी और बुद्धिमान सपूत को आमने-सामने के युद्ध में अंग्रेजों द्वारा नहीं हराया जा सका तो छल-बल का सहारा लेकर एक औपनिवेशिक कानून की आड़ में विशेष अदालत द्वारा उन्हें दोषी ठहराया गया। और सन् 1891 में 13 अगस्त के दिन बीर टिकेंद्रजीत को सार्वजनिक रूप से मौत के घाट उतार दिया गया।

टिकेंद्रजीत सिंह महाराजा चंद्रप्रकाश सिंह और चोंगथम चानु कूमेश्वरी देवी की चतुर्थ संतान थे। उनका जन्म 29 दिसंबर, 1856 को हुआ था। उन्हें “कोइरेंग” भी कहते थे क्योंकि वे बचपन से ही लोकप्रिय तथा स्वतंत्रता प्रेमी थे। धैर्यवान होने के साथ-साथ वे कुशाग्र बुद्धि वाले थे। बाद में वे मणिपुरी सेना के कमाण्डर नियुक्त हुए थे। भारत के स्वतंत्रता-संग्राम में उनका अद्वितीय स्थान है। 

प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण मणिपुर का अपना प्राचीनतम एवं गौरवपूर्ण इतिहास रहा है। मणिपुर के राजाओं ने सन् 1891 में अंग्रेजों से पराजित होने तक अपनी स्वतंत्रता और संप्रभुता के लिए लगातार संघर्ष किया था। एक लंबे और अनवरत संघर्ष के बाद ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने मणिपुर पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। मणिपुर के आंतरिक संकट और उसके बर्मा के साथ चले 18 वर्ष लंबे संघर्ष का लाभ उठाकर वे ऐसा करने में सफल हुए।

प्रिंस गंभीर सिंह के नेतृत्व में प्रथम एंग्लो-बर्मी युद्ध (1824-1826) में मणिपुर ने बर्मा पर विजय प्राप्त की। नतीजतन, मणिपुर तबाही से उबर गया और गंभीर सिंह को मणिपुर का राजा बनाया गया। परन्तु उस समय राज्य की सभी महत्वपूर्ण शक्तियाँ अंग्रेजों के हाथ में थीं। राजा ब्रिटिश हस्तक्षेप का विरोध नहीं कर सकता था।

राजा चंद्रकांत सिंह के उत्तराधिकारी महाराजा सुरचंद्र सिंह के शासनकाल में अंग्रेजों का हस्तक्षेप बहुत अधिक बढ़ गया था। जिसके परिणामस्वरूप 24 अप्रैल, 1891 को खोंगजोम युद्ध (अंग्रेज-मणिपुरी युद्ध ) हुआ। जिसमें वीर सेनानी टिकेंद्रजीत और पाओना ब्रजवासी जैसे अनेक योद्धाओं के जबर्दस्त संघर्ष और जनसामान्य के मजबूत प्रतिरोध के बावजूद मणिपुर अंग्रेजों के पूर्णतया अधीन हो गया।

राजपरिवार का सदस्य होने के नाते टिकेंद्रजीत अंग्रेजों के कूट स्वभाव से परिचित थे। अत: वे मणिपुरवासियों को उनके वास्तविक दृष्टिकोण और अंतरतम दुर्भावनाओं के बारे में सचेत करते रहते थे। महाराज गंभीर सिंह की मृत्यु के उपरान्त उनके बड़े बेटे, सुरचंद्र ने मणिपुर के सिंहासन का दायित्व संभाला। अन्य राजकुमारों को राज्याधिकारी, सेना के जनरल और पुलिस प्रमुख के रूप में नियुक्त किया गया।

बाद में, झलकारी की मृत्यु के बाद टिकेंद्रजीत को सेना का जनरल नियुक्त किया गया था। लेकिन राजकुमारों के बीच आपसी गलतफहमी और मनमुटाव पैदा हो गया। इसने अंततः राज-परिवार को दो गुटों में विभाजित कर दिया। एक गुट टिकेंद्रजीत के साथ था तो दूसरा पाकसाना के नेतृत्व में कार्यरत था।

राजा इस स्थिति से अनजान रहे और अराजकता बहुत ज्यादा बढ़ती चली गई। टिकेंद्रजीत को लगता था कि राजा पाकसाना के पक्षधर हैं। अंग्रेज सूदखोरी से अपने साम्राज्य का विस्तार करते थे। वे मोटी ब्याज पर राजा और राजपरिवार को कर्ज देकर धीरे-धीरे उनके राज्य के हिस्सों को हड़पते चले जाते थे।

यही नीति उन्होंने मणिपुर के राजपरिवार के प्रति भी अपनाई। इसे राजकुमार टिकेंद्रजीत ने स्वीकार नहीं किया। वे इस तथ्य से भी भलीभाँति अवगत थे कि ब्रिटिश लोग मणिपुर को अपनी एक “कॉलोनी” बनाने के लिए अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इसलिए उन्होंने अपने राज्य की संप्रभुता तथा स्वतंत्रता की रक्षा हेतु एक योजना बनाई।

22 सितंबर, 1890 को टिकेंद्रजीत ने दो अन्य राजकुमारों एंगुसन और जिलंगंबा के साथ सुरचंद्र सिंह के खिलाफ विद्रोह किया और राजा सुरचंद्र को सिंहासन से हटा दिया। सुरचंद्र सिंह ने ब्रिटिश निवास में शरण ले ली। तब कुलाचंद्र ने राज्यभार संभाला और टिकेंद्रजीत उसके उत्तराधिकारी बने। इस घटना को मणिपुर के इतिहास में ‘पैलेस विद्रोह’ के रूप में जाना जाता है।

बाद में, पूर्व शासक सुरचंद्र सिंह कलकत्ता के लिए रवाना हुए। लेकिन उन्होंने टिकेंद्रजीत को सूचित किया कि वे धार्मिक-यात्रा पर वृंदावन जा रहे हैं। कलकत्ता पहुँचने के बाद उन्होंने मणिपुर राज्य का अपना सिंहासन पुन: पाने के लिए ब्रिटिश सरकार को एक याचिका भेजी। उनकी इस याचिका के परिणामस्वरूप अंग्रेज मणिपुर की आतंरिक फूट और संकट से बखूबी अवगत हो गए। वास्तव में, इस याचिका ने ब्रिटिशों को मणिपुर के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने का मौका प्रदान किया।

भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड लैंड्सडाउन ने कुलाचंद्र को राजा बनाए रखने का निर्णय लिया। लेकिन मणिपुर सिंहासन के उत्तराधिकारी पद से टिकेंद्रजीत को हटाने का आदेश दिया गया। क्योंकि अंग्रेज जानते थे कि टिकेंद्रजीत जैसा राष्ट्रवादी उनकी औपनिवेशिक योजनाओं में बहुत बड़ी अड़चन है। उसकी अनुपस्थिति में ही मणिपुर को ब्रिटिश उपनिवेश में रूपांतरित किया जा सकता है।

अत: 22 मार्च, 1891 को मुख्य आयुक्त जेडब्ल्यू क्विंटन सैनिकों की टुकड़ी के साथ मणिपुर पहुँचा। टिकेंद्रजीत को गिरफ्तार करने के लिए अंग्रेजों द्वारा एक गोपनीय योजना बनाई गई थी। लेकिन उनकी यह गुप्त योजना उजागर हो जाने के कारण विफल हो गई। राजनीतिक एजेंट ग्रिमवुड ने तब राजा कुलाचन्द्र को टिकेंद्रजीत को अंग्रेजों को सौंपने के लिए कहा। राजा कुलाचंद्र ने इसके लिए साफ इनकार कर दिया। परिणामस्वरूप अंग्रेजों ने टिकेंद्रजीत को गिरफ्तार करने के लिए बल प्रयोग किया।

24 मार्च, 1891 की शाम को ब्रिटिश सैनिकों ने पैलेस कंपाउंड, विशेष रूप से टिकेंद्रजीत के निवास पर हमला किया। इस हमले में सांस्कृतिक कार्यक्रम देख रहे महिलाओं और बच्चों सहित अनेक निर्दोष नागरिक मारे गए। हालाँकि, मणिपुरी सेना अपने आक्रामक प्रतिरोध में सफल रही और अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा।

पाँच अंग्रेज अधिकारियों- क्विंटन, ग्रिमवुड, लेफ्टिनेंट कर्नल सिम्पसन, कोसिन और बुलेर को भागकर तहखाने में शरण लेनी पड़ी। जिन मणिपुरवासियों के निर्दोष बच्चे, पत्नियों और रिश्तेदारों को अंग्रेजों द्वारा मार दिया गया था, उनके मन में बदले की भावना इतनी प्रबल हो गई कि उन्होंने इन पाँचों अंग्रेजों को मार डाला।

इसके परिणामस्वरूप 1891 में एंग्लो-मणिपुरी युद्ध हुआ। इस भयानक युद्ध में अंग्रेजों ने मणिपुर को तहस-नहस कर दिया। 27 अप्रैल, 1891 को कंगला पैलेस को अंग्रेजों ने अपने कब्जे में ले लिया और मेजर मैक्सवेल मुख्य राजनीतिक एजेंट बन गया। ब्रिटिश भारत सरकार ने जाँच-पड़ताल और सजा-निर्धारण के लिए लेफ्टिनेंट कर्नल जॉन मिशेल के अधीन एक विशेष आयोग का गठन किया। इस जाँच में टिकेंद्रजीत को दोषी ठहराया गया और अंग्रेजी अदालत द्वारा उन्हें मौत की सजा सुनाई गई।

जानकारी मिलने पर स्वयं रानी विक्टोरिया ने बीर टिकेंद्रजीत को बचाने के प्रयास किए लेकिन वे असफल रहीं। टिकेंद्रजीत अपने विलक्षण युद्ध-कौशल, अद्भुत पराक्रम तथा सक्षम प्रशासन के कारण अत्यंत लोकप्रिय थे।

कहा भी गया है कि – “प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम् । नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्” अर्थात् प्रजा के सुख में राजा का सुख निहित है; अर्थात् जब प्रजा सुखी अनुभव करे तभी राजा को संतोष करना चाहिए। प्रजा का हित ही राजा का वास्तविक हित है। 

अत: मणिपुरवासियों ने अपने प्रिय राजकुमार की प्राण-रक्षा के लिए उनकी फाँसी का पुरजोर विरोध किया। परन्तु लोगों की प्रबल भावना और उनके सक्रिय विरोध के बावजूद अंग्रेजों ने बीर टिकेंद्रजीत को 13 अगस्त, 1891 को आम जनता के सामने एक खुली जगह पर फाँसी लगाई ताकि लोगों में डर पैदा किया जा सके।

मणिपुर राज्य की महिलाओं ने भी उनके बचाव में एक आंदोलन शुरू किया था, परन्तु उनका यह आन्दोलन मणिपुर के भविष्य बीर टिकेंद्नजीत को नहीं बचा सका। उनका बलिदान मणिपुर की स्वतंत्रता, सम्मान और जनकल्याण की भावना के लिए था। उन्होंने विदेशी शक्ति का विरोध करते हुए स्वदेश रक्षा हेतु अपने प्राण गँवाए।

बीर टिकेंद्रजीत सिंह की यह उदात्त भावना आज की युवा पीढ़ी को भी राष्ट्र की स्वतंत्रता, सम्मान और जनकल्याण हेतु जीवन-बलिदान करने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करती है। बीर टिकेंद्रजीत सिंह जैसे बलिदानी योद्धाओं से प्रेरित हुए लाखों-करोड़ों युवाओं ने भारतमाता को 200 वर्ष लंबी अंग्रेजी दासता से मुक्त कराया।

इसलिए भारतमाता के ऐसे सपूतों को स्मरण किए बिना स्वतंत्रता-दिवस समारोह अर्थहीन और अधूरा है। इस महानायक को सम्मानित करते हुए मणिपुर विधानसभा ने अगस्त, 2019 में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर तुलीहल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम बदलकर ‘बीर टिकेंद्रजीत अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा’ कर दिया है।