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मैंने रिलीजन कार्ड नहीं खेला, मेरी बात आती है तो PCB का रवैया क्यों बदल जाता है: दानिश कनेरिया

दानिश कनेरिया ने पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (PCB) को पक्षपाती रवैए के लिए फिर से आड़े हाथों लिया है। पाकिस्तान के पूर्व दिग्गज स्पिनर ने कहा है कि पीसीबी का व्यवहार अन्य खिलाड़ियों के साथ सही रहता है। लेकिन जब मेरी बात आती है तो उनका रवैया बदल जाता है।

दानिश कनेरिया ने कहा, “पाकिस्तान क्रिकेट टीम के लिए खेलना मेरे लिए काफी सम्मान की बात रही। एक हिंदू क्रिकेटर होने के बावजूद पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व करना और टीम को मैच जिताना मेरे लिए एक अचीवमेंट की तरह है और साथ ही काफी गर्व की भी बात है।”

कनेरिया ने कहा कि लोग उनके ऊपर “रिलीजन कार्ड” खेलने का आरोप लगाते हैं। उन्होंने कहा, “मैंने कभी रिलीजन कार्ड नहीं खेला है। मेरी शिकायत केवल पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड और उनके दोहरे रवैये से है। पीसीबी का रवैया बाकी खिलाड़ियों के साथ बहुत अच्छा है, लेकिन जब मेरी बात आती है तो उनका व्यवहार बदल जाता है। मुझे इस बात का काफी दुख है।”

कनेरिया ने उमर अकमल के निलंबन को कम करने के पीसीबी के फैसले पर भी नाराजगी जाहिर की। उमर अकमल को भ्रष्टाचार की रिपोर्ट नहीं करने के लिए फरवरी, 2020 में निलंबित कर दिया गया था। उन्होंने बोर्ड पर निशाना साधते हुए कहा कि भ्रष्ट्राचार में जीरो टोलरेंस की नीति की बात कर उमर अकमल का बैन आधा कर दिया गया। वे दोषी भी साबित हो गए थे। आमिर, सलमान और आसिफ को भी वापसी का मौका मिला। मेरे मामले में ऐसा क्यों नहीं किया गया। मेरे बारे में कहते हैं कि मैं मजहब की बात करता हूँ। पक्षपात सबके सामने दिखता है तो मैं क्यों न बोलूँ।

बता दें अनिल दलपत के बाद, दानिश कनेरिया पाकिस्तान के लिए खेलने वाले दूसरे हिंदू क्रिकेटर हैं। उन्होंने टीम के लिए 18 ODI और 61 टेस्ट मैच खेले हैं। उन्होंने 2018 में स्पॉट फिक्सिंग के मामले को स्वीकारा था। इसके बाद कनेरिया ने बैन हटाने को लेकर पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड से कई बार मदद की गुहार लगाई लेकिन उन्हें कुछ भी हासिल नहीं हुआ। यही वजह है कि कनेरिया दोहरे रवैये को लेकर पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड पर लगातार सवाल उठाते रहते हैं।

गौरतलब है कि एक चैट शो में कनेरिया ने खुलासा किया था कि हिंदू होने के कारण पाकिस्तान की टीम के कुछ खिलाड़ी उनके साथ भेदभाव करते थे। उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान, पूर्व क्रिकेटरों समेत अन्य देशों से भी मदद की गुहार भी लगाई थी। उन्होंने कहा था, “मेरी हालत बहुत ख़राब है और मैंने पाकिस्तान और दुनियाभर में कई लोगों से मदद की गुहार लगाई है लेकिन अभी तक मुझे कोई मदद नहीं मिली है। हालाँकि, पाकिस्तान में कई क्रिकेटरों की समस्याओं को सुलझाया गया है। मैंने एक क्रिकेटर के नाते पाकिस्तान के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया और मुझे इसका गर्व है। मुझे लगता है कि इस वक्त पाकिस्तान के लोग मेरी मदद करेंगे।”

सुशांत की मौत का कवरेज: ‘शरद पवार ने कॉल कर अर्नब गोस्वामी की शिकायत की, कहा- सरकार क्या कर रही है’

बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की रहस्यमय मौत की चल रही जाँच के बीच शिवसेना ने रविवार (अगस्त 9, 2020) को अपने मुखपत्र सामना के माध्यम से रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी पर हमला किया।

सुशांत मामले में रिपब्लिक ने अपनी रिपोर्टिंग के जरिए कई गंभीर खुलासे किए। इनसे मुंबई पुलिस की जॉंच पर सवाल खड़े हुए। शिवसेना ने रिपब्लिक टीवी के कवरेज के पीछे बीजेपी का हाथ बताते हुए इसे स्टंट बताया था।

अब सामना में आरोप लगाया है कि उद्धव ठाकरे सरकार को भाजपा शर्मसार करने की कोशिश कर रही है। शिवसेना सांसद और सामना के संपादक संजय राउत ने दावा किया है कि राकांपा सुप्रीमो शरद पवार ने रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के हेड अर्नब गोस्वामी द्वारा सवाल उठाए जाने के बाद उन्हें फोन किया था।

राउत ने दावा किया कि शरद पवार ने अर्नब गोस्वामी की शिकायत करते हुए कहा कि राज्य के सीएम के खिलाफ ‘अपमानजनक भाषा’ का इस्तेमाल करने से अच्छा संदेश नहीं जाएगा। उन्होंने पूछा कि ‘सरकार क्या कर रही है।’ साथ ही राउत ने आरोप लगाया कि सुशांत के मामले के टीवी कवरेज के पीछे का मकसद उद्धव ठाकरे सरकार को बदनाम करना है।

सामना में लिखा गया है, “अर्नब गोस्वामी राजनीतिक नेताओं को, मुख्यमंत्रियों को सीधे अशिष्ट भाषा में संबोधित करते हैं, बदनाम करनेवाले शब्दों का प्रयोग करते हैं, धमकियाँ देते हैं। सोनिया गाँधी के मामले में उन्होंने यही किया और अब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को अशिष्ट भाषा में संबोधित करके चुनौती देने वाली बातें करते हुए भी उन्हें लोगों ने देखा। ये सब देखने के बाद शरद पवार ने मुझे फोन किया कि एक समाचार चैनल पर उद्धव ठाकरे का उल्लेख अशिष्ट भाषा में किया जाता है, ये सही नहीं है। वे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री हैं। मुख्यमंत्री सिर्फ कोई एक व्यक्ति नहीं होता है, बल्कि एक संस्था होती है।”

मामले में शिवसेना ने बिहार के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे के रिपब्लिक टीवी को दिए इंटरव्यू भी पर सवाल खड़े किए हैं। शिवसेना ने कहा है कि बिहार के डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे का इंटरव्यू पुलिस बल के अनुशासन का उल्लंघन है और मुंबई पुलिस की प्रतिष्ठा को खराब करने के लिए किया गया है।

आगे उन्होंने कहा कि सुशांत की मौत के मामले में बिहार पुलिस का ‘हस्तक्षेप’ अनावश्यक था। शिवसेना के लेख में यह भी कहा गया है कि सुशांत की मौत का ‘राजनीतिकरण’ हुआ है और उन्होंने इसे ‘स्पष्ट आत्महत्या का मामला’ कहा है।

राउत के अनुसार संवेदनशीलता और भावनाओं को ध्यान दिए बिना मामले को उजागर किया जा रहा है। उन्होंने दावा किया कि सुशांत केस में संबंधित तीन महिलाओं – दिशा सलियन, अंकिता लोखंडे, रिया चक्रवर्ती की उपस्थिति के कारण मीडिया इसे कवर कर रही है।

सामना के लेख में राउत ने यह भी दावा किया था कि सुशांत के अपने परिवार के साथ अच्छे संबंध नहीं थे। वह अपने पिता की दूसरी शादी से खुश नहीं थे। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा राज्य में शिवसेना की सरकार को गिरा नहीं पा रही है, इसीलिए पार्टी ने समाचार चैनलों के साथ मिल कर ‘गॉसिपिंग’ कर इसे बड़ा मुद्दा बना दिया है ताकि सरकार को बदनाम किया जा सके। उन्होंने लिखा कि सुशांत सिंह राजपूत का बिहार से कोई संबंध नहीं था और वो पूरी तरह मुंबईकर बन गए थे। उन्होंने आरोप लगाया कि संघर्ष के दिनों में बिहार उनके साथ नहीं था, उन्हें सारा वैभव मुंबई ने दिया।

अतीत को गुरु मान कर सीखने की जरूरत: मातृभाषा अपनाएँ, प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन पर हो जोर

अधिक आयु वाले व्यक्ति की दशा कुछ ऐसी होती जाती है- ‘गच्छति पुर: शरीरं धावति पश्चादसंस्तुतं चेत:। चीनांशुकमिव केतो: प्रतिवातं नीयमानस्य।।’ – (कालिदास) अर्थात् शरीर किसी ध्वज दंड की तरह आगे-आगे जा रहा है और बेचैन मन रेशमी पताका की तरह हवा की विपरीत दिशा में पीछे की ओर भाग रहा है। उम्र आगे बढ़ती जाती है और मन बीते बचपन और यौवन को याद करता है। फिर मूल्यांकन भी हो ही जाता है कि अब तक क्या हासिल किया। भारत में आज हमें अपनी मातृभाषा पर ध्यान देने और संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन की ज़रूरत है।

यह प्रक्रिया जैसे व्यक्ति के सन्दर्भ में सच है, वैसे ही किसी राष्ट्र के विषय में भी सच है। मूल्यांकन हर जगह स्वाभाविक है और आवश्यक भी। इसमें हम अब तक की उपलब्धियों का आकलन करते हैं, जो अतीत की सैर के बिना संभव नहीं।

अगर हम भारत देश का मूल्यांकन करें तो हम पाते हैं कि हमारा अतीत बहुत समृद्ध था। एक तो ओल्ड को वैसे ही गोल्ड माना जाता है किंतु इस अतिव्याप्ति की सहूलियत का उपभोग किए बिना भी अगर हम अपने अतीत को किसी निष्पक्ष कसौटी के हवाले कर दें, एक ऐसी कसौटी जो सिफारिशें न मानती हो तब भी आप पाएँगे कि भारत ओल्ड होने पर गोल्ड नहीं हुआ। जब सब कुछ नया था, जब कुछ भी ओल्ड नहीं था तब भी भारत गोल्ड था।

हम कभी-कभी इस स्वर्णिम अतीत पर गर्व करने का समय भी निकाल लेते हैं, लेकिन जब स्वर्ण को तिजोरी से बाहर निकाल कर प्रयोग करने का प्रसंग आता है तो हम चौबीस कैरेट का वैराग्य धारण कर लेते हैं। वैराग्य अच्छी चीज़ है, इसे अपनाना चाहिए। लेकिन उसे उचित समय और स्थान पर प्रयोग करना है। क्योंकि वस्तु कितनी भी सुंदर, बहुमूल्य और उपयोगी क्यों न हो, औचित्य भंग हो जाने पर न शोभा देती है, न फायदा।

हमारे पास उच्च आध्यात्मिक आदर्शों से लेकर ऐहिक सफलताओं के अनेक सूत्र हैं लेकिन किसको कहाँ लगाना है, सारी समस्या वहाँ है। मतलब घोड़ा भी है और गाड़ी भी, बस हम घोड़े को गाड़ी के आगे नहीं लगा पा रहे हैं, वो अभी भी गाड़ी के पीछे ही खड़ा है तो गाड़ी नहीं चलेगी। इसलिए सही यही होगा कि हम अपने स्वर्णिम अतीत को वर्तमान में भी कुछ भूमिका दें। वर्तमान का भारत शिष्य बनकर अतीत के उस विश्वगुरु भारत के पास समित्पाणि होकर जा सकता है। उससे कुछ सीख सकता है।

कुछ लोग अतीत का महिमा मंडन करते हुए अक्सर हर बात की पैरवी करने लगते हैं। यानी जो कुछ पुराना है, वो सब सही है। लेकिन हमारा गुरु बड़ा सजग और उदात्त है। वो स्वयं हमें उपनिषद् में संदेश देता है- ‘यान्यस्माकं सुचारितानि तानि सेवितव्यानि नो इतराणि।’ अर्थात् तुम मेरे सुचरित का ही अनुकरण करना, यदि मुझमें कोई दोष हो तो उसको मत अपनाना। ऐसी बहुत सी बातें हैं, जो हम अपने अतीत से सीख सकते हैं और सीखनी चाहिए।

किसी भी राष्ट्र के निर्माण में उसका इतिहास, उसे लेकर गर्व की अनुभूति और उसे बनाए रखने का संकल्प मुख्य तत्व होते हैं। और राष्ट्र से अधिक ये हमारे काम आते हैं। व्यक्ति का अपना अर्जन उसे थामने के लिए पर्याप्त नहीं है। उसे हमेशा कुछ बड़ा चाहिए। हम निजता की बातें तो करते हैं लेकिन हमें समूह की हमेशा दरकार रहती है।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, वो चाह कर भी निजी नहीं हो सकता। अलग रहने के लिए परम वैराग्य की ज़रtरत पड़ती है, जो आम बात नहीं है। इसलिए अपने स्वैच्छिक व संवैधानिक समूह अपने देश भारत को सशक्त बनाने के लिए हर संभव प्रयास करें। अतीत से सीखना इस प्रयास का सबसे भरोसेमंद हिस्सा है, क्योंकि उसे परखा जा चुका है।

लेकिन दुनिया में तो अंग्रेजियत की तूती बोल रही है, इसलिए हम हर कीमत पर बस उन्हीं का अनुकरण करने में अपने आप को धन्य समझते हैं। हमें अपना गौरवशाली इतिहास याद नहीं आता। बल्कि हम तो अपनी भाषा भी भूल गए जो किसी सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान होती है।

हमारे यहाँ बच्चा जिस भाषा को स्वाभाविक रूप से बोलता-समझता है, उसकी पढ़ाई सीधी उसी भाषा में शुरू नहीं होती। पहले उसको अपना समय और ऊर्जा एक दूसरी भाषा को सीखने में लगाना पड़ता है। उस भाषा से जूझ कर जो थोड़ा समय बचता है, वही पढाई में लगता है। उसके स्कूल की भाषा कुछ और है, घर की कुछ और। इसलिए आधे से अधिक समय भाषा उसकी समस्या है। इसका नुकसान भी हमें उठाना पड़ रहा है। इससे हम अगुआ नहीं बन रहे हैं। हम सिर्फ मातहत बनकर विदेशी कंपनियों के लिए अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। हमारी प्रतिभाओं को सृजन का अवसर कम मिल पाता है।

छोटे बच्चे को पैदा होने के बाद इस दुनिया से सामंजस्य बैठाने के लिए कितना परिश्रम करना पड़ता है। उसे कितना कुछ सीखना पड़ता है। हमारे लिए जैसे ये आफत कम न हो, हम दोहरा परिश्रम कर रहे हैं। हम एक बार अपनी मातृभाषा में पैदा होते हैं, उसके बाद हमें फिर से एक बार अंग्रेजी में पैदा होना पड़ता है। इतनी देर में उधर सृजन बड़ा हो जाता है, उसकी उम्र निकल जाती है। फिर बड़ी उम्र में पढ़ाई करने बैठे छात्र का जो हाल होता है, वही हमारा भी होता है, चाहे हम कितने ही प्रतिभाशाली क्यों न हों।

इस तरह हमारे देश में बच्चे समय पर ज्ञान प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि पढ़ाई की पूरी प्रणाली ही ऐसी है कि आपको देर से ही शिक्षा मिलेगी। पहले दूसरी भाषा सीखनी है, फिर पढ़ाई शुरू की जाएगी। उसमें भी आप मजबूर हैं, अपने सामर्थ्य को किसी और के स्थापित पैमानों पर कसने के लिए। समय, ऊर्जा, संसाधन, नैसर्गिक प्रतिभा सबको यथेष्ट व्यय करने के बाद जो बचता है, आप उसके साथ आगे बढ़ने के लिए स्वतंत्र हैं।

हमें असली घाटे का अंदाज़ा इसलिए नहीं हो पाता क्योंकि अधिकांश तौर पर हमने अंग्रेजी बोलने को पढ़े-लिखे होने की पहचान मान रखा है। जिस दिन हमें अंग्रेजी और शिक्षा में फर्क करना आ जाएगा, उस दिन हम इस नुकसान को पहचान पाएँगे। नई शिक्षा नीति में प्राथमिक अध्ययन के लिए मातृभाषा की अनिवार्यता कुछ आशा जगा रही है।

हमारी मातृभूमि के पास हमें देने के लिए भाषा के साथ-साथ और भी बहुत कुछ है, जिसकी अभी तक उपेक्षा जारी है। शिक्षा का वो मातृ संस्कार कहीं गायब हो गया है, जिसके दम पर हम विश्वगुरु थे। इस ओर ध्यान देना कितना जरूरी है, ये हमारी समझदारी पर टिका है।

वैसे भी जहाँ छोटी-छोटी चीजों में हम संस्करण ढूँढ़ते हैं, कहीं क्षेत्र-विशेष के हिसाब से तो कहीं लोगों के आम झुकाव व अभिरुचि के हिसाब से, वहीं शिक्षा का भी हर देश का अपना संस्करण होना ही चाहिए। बहुत से देश ऐसा करते भी हैं, हमें भी इसकी जरूरत है। पूरी दुनिया में शिक्षा को सिर्फ एक ही लकीर पर नहीं चलाया जा सकता।

एक सामान्य सिद्धांत है कि व्यक्ति की स्वाभाविक विशेषताओं का प्रयोग करते हुए उससे काम लिया जाए तो उसकी ताकत कई गुना बढ़ जाती है। जैसे खिलाड़ी बहुत तरह के होते हैं। अलग-अलग खेलों को खेलते हैं। बल्कि एक ही खेल में भिन्न भूमिकाओं में भिन्न खिलाड़ी होते हैं। जैसे एक ही खेल क्रिकेट में कुछ बल्लेबाज फिरकी गेंदबाजों को अच्छा खेलते हैं तो कुछ तेज गेंदबाजों को। कुछ नंबर दो पर या तीन पर अच्छा खेलते हैं तो कुछ चार-पाँच पर। हैं सभी बल्लेबाज ही, किंतु खिलाड़ी का स्वाभाविक खेल और तरीका मायने रखता है।

शारीरिक बनावट और स्वाभाविक योग्यता खिलाड़ी की सफलता में बड़ा महत्व रखते हैं। जब एक खिलाड़ी की सफलता इतने सारे व्यक्तिगत बिंदुओं पर टिकी है तो क्या पूरब से लेकर पश्चिम तक के सब विद्यार्थियों को एक ही पैमाने पर कसा जा सकता है? उनके लिए अलग योजना होनी ही चाहिए।

मातृभाषा के अतिरिक्त किसी भाषा का थोपा जाना व्यक्तित्व में एक अपरिहार्य कृत्रिमता को भर देता है। बचपन से ही ये संस्कार मजबूत हो जाता है कि शिक्षित होने का मतलब अंग्रेजी में बोलना-समझना है, क्योंकि बच्चा अंग्रेजी में ही पढ़ रहा है। अपनी भाषा को तो वो घर पर बोल रहा है, वो भी पढ़ाई से अलग समय में। ऐसे में अंग्रेजी बोलना पढ़े-लिखे होने का पर्यायवाची बन जाए तो इसमें आश्चर्य क्या है? पढ़ा-लिखा कौन नहीं दिखना चाहता तो मजबूरन सबको अंग्रेजी भाषा और अंग्रेजियत झाड़नी पड़ती है।

आज के दिन हमारे देश में हालत ये है कि एक पीएचडी धारी व्यक्ति अगर अंग्रेजी न बोल रहा हो और व्यवहार में वही घिसे-पिटे कृत्रिम तौर-तरीके प्रदर्शित न कर रहा हो तो सीधे तौर पर अनपढ़ समझा जाएगा। ऊपर से अगर उसने धोती-कुर्ता पहन रखा हो तो गई डिग्री ब्लैक होल में। ये सब कितनी खोखली बाते हैं। शिक्षा के लिए एक बड़ी हानि है। इसलिए नई शिक्षा नीति में प्रारंभिक अध्ययन में मातृभाषाओं को वरीयता देना एक विवेकपूर्ण और अपरिहार्य कदम है। उसका स्वागत होना चाहिए।

न केवल भाषा किंतु अध्ययन सामग्री और अध्ययन प्रणाली की दृष्टि से भी हमारा बीता कल बहुत कुछ अपने भीतर समेटे हुए है। भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा में जो भी चीजें हैं, उन सबकी विशेषता यही है कि वो सरल, सूत्रात्मक, उपयोगी और आडम्बरशून्य हैं। आयुर्वेद, विज्ञान, वाणिज्य, गणित, अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र, भाषाशास्त्र, सभी शाखाओं में प्रपंच रहित शोध-अनुसंधान किए गए हैं। गहन तत्वों पर भी इतनी सरल विधि से चर्चा हुई है कि जितनी मेहनत करके आज की शिक्षा पद्धति विद्यार्थी को किसी एक शाखा का विशेषज्ञ बनाती है, उतनी मेहनत से वो कई विषयों में विशेषज्ञता प्राप्त कर सकता है। बुद्धिमत्ता युक्तियों के सरलीकरण में है, उन्हें जटिल बनाने में नहीं।

सूर्यसिद्धांत व आर्यभटीयम् में खगोल, भूगोल, अंकगणित, बीजगणित, त्रिकोणमिति जैसे विषयों पर गहन अध्ययन हुआ है। ग्रहों की गति एवं उनके परिक्रमा पथ का आकलन, सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण आदि की जानकारी, ग्रहों-उपग्रहों की गति के अनुसार कालनिर्णय जैसे अनेक विशिष्ट विषय वहाँ उपस्थित हैं। लीलावती गणित के क्षेत्र की सुप्रसिद्ध रचना है। इसके अलावा कर व्यवस्था, राज व्यवस्था, न्याय व्यवस्था आदि से सम्बंधित अनेक ग्रन्थ हैं, जिनका परिचय छात्रों के लिए उपयोगी होगा। इन ग्रंथों में शैली की सरलता और विषयों की उदात्तता बहुत ही ग्राह्य है। 

भारत का दार्शनिक विवेचन पराकाष्ठा पर पहुँचा है। जीवन दर्शन लाजवाब है। तत्त्व चिंतन की इतनी समृद्ध परंपरा अपने घर में ही उपेक्षा का शिकार हो जाए तो इससे बड़ी जड़ता और क्या होगी? हमें इस लापरवाही से जितनी जल्दी हो सके बाहर निकलना चाहिए। भारतीय दर्शन भारतीय मनीषा का सर्वोत्कृष्ट बिंदु है। साथ ही काव्यशास्त्रीय मीमांसा भी उच्च कोटि की है। दुनिया की किसी भी दर्शन-शास्त्र परंपरा के साथ भारत की इस परंपरा का तुलनात्मक अध्ययन करके देखें, आपको उससे ज्ञान तो मिलेगा ही साथ ही नि:संदेह गर्व की अनुभूति होगी। हमारे नीति निर्माताओं को इस पर ज़रूर ध्यान देना चाहिए और इन्हें पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना चाहिए।    

वास्तुकला में भारत की उपलब्धियाँ देखें तो यद्यपि विदेशी आक्रांताओं और हमारी उपेक्षाओं ने बहुत कुछ ध्वस्त कर दिया है, फिर भी भारत की स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने अभी भी हमें आश्चर्य चकित करते हैं। अगर आज हमें उन्हें वैसा ही बनाने की चुनौती मिले तो हम नहीं बना सकते। लेकिन इन कलाओं को भी विद्यार्थी किताबों में नहीं पढ़ते। आप केवल उन स्थलों पर जाकर उन्हें देख सकते हैं। ये सभी चीजें उपेक्षा की शिकार हुई हैं।

योग के चमत्कार को तो पूरी दुनिया मान ही चुकी है। वैसी ही सर्वसुगमता और सार्वभौमिकता भारत की प्राचीन विद्या की हर शाखा की विशेषता है। आयुर्वेद के ऐसे कितने ही योग और सामान्य नियम हैं, जिनका बचपन से ही बच्चों को ज्ञान कराया जाए तो डॉक्टर के पास जाने की सत्तर-अस्सी प्रतिशत जरूरत ख़त्म हो जाएगी। रोगों से बचने के उपाय और अनेक रोगों की चिकित्सा के सरल तरीके पाठ्यक्रम के माध्यम से दिनचर्या का हिस्सा बन सकते हैं।

स्वास्थ्य संबंधी अधिकांश समस्याएँ विरुद्ध आहार की उपज हैं। पथ्य-अपथ्य की अनभिज्ञता व्यक्ति को आ बैल मुझे मार की दशा में पहुँचा देती है। छोटी-छोटी बातों की अनभिज्ञता के कारण हम अपने स्वास्थ्य की हानि स्वयं करते रहते हैं। स्वस्थ जीवनचर्या बाद में सीख कर समझने की चीज़ नहीं है। जिस नियम का हमें दिन रात पालन करना है, उसे बचपन से सीखना होगा।

अध्ययन की सभी शाखाओं में प्राचीन विधाओं का ज्ञान उपयोगी है। यह कोरे आदर्शवाद की बात नहीं है। अपने देश भारत के संदर्भ में ही देखें तो शिक्षा में प्राचीन का समावेश बहुत ही उपयोगी है। ऐसा न करके हम अपने सदियों के अनुभव, निष्कर्षों, अनुसंधानों और आविष्कारों को शून्य कर देते हैं। हर अच्छी चीज़ की चरितार्थता उसकी उपयोगिता में होती है। इसलिए हमें अपनी सदियों की साधना को जाया नहीं होने देना चाहिए।

चीन इस विषय में अनुकरणीय है। चीन अपने पारंपरिक ज्ञान का कितना सम्मान करता है, उसे आप इस एक बात से ही समझ सकते हैं कि वहाँ आधुनिक चिकित्सा के छात्रों के लिए परम्परागत चीनी चिकित्सा पद्धति का अध्ययन अनिवार्य है। हमारे यहाँ एमबीबीएस के साथ आयुर्वेद के अध्ययन के बारे में सोचना भी बेवकूफी या अति उत्साह की श्रेणी में गिना जाएगा। 

चीन का माल चाहे न लें पर चीन से सीख जरूर लें। उन्हीं की तरह आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ प्रत्येक विषय से संबंधित कुछ प्राचीन अंश को भी पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाएँ तो बच्चे बचपन से अपने पुरखों के ज्ञान से परिचय पा लेंगे। प्राचीन और नवीन के संगम से वो परिणाम निकलेंगे, जो अभी तक देखे-सुने नहीं गए।  

अतीत हमारे बीच में गाथाओं, किंवदंतियों, मुहावरों, प्रणालियों, शैलियों, रिवाजों, परम्पराओं, मान्यताओं या लिखित साहित्य किसी भी रूप में हो सकता है। यदि हम इनके लिखित स्रोतों पर निर्भर करते हैं तो कोई न कोई भाषा ही इनके सम्प्रेषण का माध्यम है। इस दृष्टि से भारत ने अपना अधिकांश समय संस्कृत या संस्कृत जन्य भाषाओं में ही बिताया है। इसलिए स्वाभाविक रूप से हमारे अतीत के ताले में संस्कृत की चाभी सही बैठेगी।

ज्ञान का अगाध भंडार इस भाषा में लिखे साहित्य में छुपा हुआ है लेकिन हम उसका कोई उपयोग नहीं ले पाते हैं, क्योंकि ऐसा होने में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि जो बच्चे संस्कृत पढ़ते हैं, वे विज्ञान-गणित नहीं पढ़ते, जो विज्ञान पढ़ते हैं वे संस्कृत नहीं पढ़ते। संस्कृत छात्रों के पाठ्यक्रम में भी अधिकतर साहित्य और व्याकरण का अंश ही निर्धारित है, क्योंकि संस्कृत को एक भाषा के रूप में ही पढ़ा जा रहा है। इसलिए संस्कृत छात्र भी एक सीमा में बंधे हुए हैं। ऐसे में वर्त्तमान शिक्षा अलग दिशा में चलती है और प्राचीन को लेकर हमारा गर्व अलग दिशा में चलता रहता है। दोनों में कोई तालमेल नहीं है। इन दोनों को मिला दिया जाए तो अद्भुत परिणाम सामने आएँगे।

अनेक बार ख़बरें आती हैं कि नासा में संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों पर शोध चल रहा है। जर्मनी में शोधकर्ता शोध में लगे हुए हैं। क्या हमें ये करना मना है? जब अमेरिका हमारे ग्रंथों से कोई बड़ी खोज कर लेगा, तब हम ये हास्यास्पद दावा करेंगे कि अरे! ये तो हमारे यहाँ पहले से ही था। हमारे घर के सोने से कोई और आभूषण बनाकर पहन ले और हम ईर्ष्याग्रस्त हो उठें, इससे अच्छा है पहले ही जाग जाएँ। आधुनिक पाठ्यक्रम के साथ उस-उस विषय से संबंधित प्राचीन ग्रंथों को शामिल करना शुरू करें या और कोई उपाय करें। और हाँ, इसे शिक्षा का भारतीयकरण कहते हैं, भगवाकरण नहीं।

एक शिक्षा का भारतीय संस्कार भी है, जिस पक्ष पर ध्यान देकर हम मानव समाज के रूप में अपने जीवन को समरस और आसान बना सकते हैं। भारत में विज्ञान और अध्यात्म की समान प्रगति किंतु अध्यात्म की अधिक अनुशंसा और संस्तुति हमारे उपभोक्तावाद के पैरों को संसाधनों की चादर के हिसाब से फैलने में मदद करती है। वर्ना बेतहाशा उपभोग सामग्री को जुटाने की होड़ में हमने उस धरती को ही खोखला करना शुरू कर दिया, जो हमारे टिकने का आधार है। मेज को शाही लुक देने के लिए कुर्सी को तोड़कर अतिरिक्त लकड़ी जुटानी पड़े तो बैठेंगे कहाँ?

जीवन जीने की पहली शर्त है कि आप अपनी नाक से ठीक तरह से प्राणवायु लेते रहें। ताकि आप जिंदा रहने पर कुछ कर पाएँ। लेकिन आज की शिक्षा न तो धैर्य सिखा रही है न संतोष। थोड़ी सी विपरीत स्थिति में ही बहुमूल्य जीवन इस दुनिया से विदा लेने के लिए अपने हाथों से अपना दम घोंट लेते हैं। भारतीय समाज में अभी भी कुछ मूल्य स्कूली शिक्षा के बिना जिंदा हैं। जिस दिन दादा-दादी और नाना-नानी भी आज की वो पीढ़ी बन जाएगी, जो पाश्चात्य सभ्यता के अन्धानुकरण में अपनी शेखी मानती है, उस दिन से हमारे देश में तनाव और निराशा का ग्राफ पश्चिमी देशों से होड़ करने लगेगा।

प्राचीन भारत में विद्या दान का एक नियम यह भी था कि अपात्र को विद्या नहीं दी जा सकती। मानवीय संवेदनाओं, मूल्यों से रहित व्यक्ति शिक्षा का अधिकारी नहीं था, क्योंकि उसके माध्यम से विद्या का दुरूपयोग होने की पूरी सम्भावना होती है। सीटीबीटी, एनपीटी, क्योटो प्रोटोकॉल, पेरिस समझौता आदि संधियाँ इन्हीं चिंताओं का अद्यतन रूप हैं।

हम देख सकते हैं कि पदार्थ विज्ञान को सर्व सुलभ बनाकर दुनिया दो सौ साल बाद ही खतरे में पड़ गई। कहीं परमाणु हमलों का खतरा तो कहीं वायरसों की मार है। इस दुनिया के लिए एक किम जोंग ही काफी है। खतरनाक हथियारों तक एक आतंकी सोच की पहुँच इसे चुटकियों में तबाह कर सकती है।

मानवीय प्रवृत्तियों की गहरी समझ रखने वाली भारतीय सभ्यता ने बड़ी ज़िम्मेदारी से प्रतिभा के शैतानीकरण को रोक कर दुनिया को विध्वंस से बचा कर रखा। उससे सीख लेकर हम विद्यार्थी काल से ही बच्चों में सर्वहित और मानवता की भावना जगाने वाली शिक्षा पर बल दे सकते हैं। अन्यथा मानव को बनाने वाली शिक्षा ही मानवता का सर्वनाश करने पर तुल जाएगी। विद्या दान के साथ मानवीय मूल्यों का प्रबल प्रशिक्षण बहुत जरूरी है।   

हम भारत का मूल्यांकन तुलनात्मक रूप से करें तो ‘हम कौन थे क्या हो गए हैं और क्या होंगे अभी..’ की स्थिति में पहुँच जाएँगे। कम से कम अब भी आँख खोलकर हम देखें कि एक देश, जिसने हमें तथ्यों के विपरीत गडरियों का देश कहा, वो स्वयं कभी मछुआरों का देश हुआ करता था। ये बात उनके नाम में लिखी है। England शब्द angul और lond से बना है। पहले Anglalond और फिर England. जहाँ angul का मतलब है hook यानी मछली पकड़ने का काँटा और angles मतलब hook-men यानी मछुआरे।

जबकि भारत का प्राचीन नाम आर्यावर्त था। जिसका मतलब ही है श्रेष्ठ-कर्मशील लोगों का देश। किंतु अपनी कर्महीनता से हमने उस स्थिति को खो दिया, जबकि कर्मशीलता के बल पर अंग्रेजों ने दुनिया पर राज किया।

दुनिया को हड़प्पा जैसी विकसित सभ्यता देने वाले देश पर हड़पने की सभ्यता को थोंपा और फिर भी सभ्य कहलाया। ये सब परिश्रम और राष्ट्रीय एकता के बल पर संभव हुआ और हम अकर्मण्यता से सब कुछ हार बैठे। अभी भी हमें मानसिक रूप से उस प्रभाव से बाहर आकर खुद को पहचानने की आवश्यकता है।

व्यापक रूप में अपने प्राकृतिक सामर्थ्यों और देशी संभावनाओं को पहचानना है। इसे सिर्फ शिक्षा के माध्यम से ही सही तरह से प्राप्त किया जा सकता है। नई शिक्षा नीति के साथ नए पाठ्यक्रम की भी तैयारी है। काश हम उसमें शिक्षा के भारतीयकरण पर भी ध्यान दें। ताकि भारत भारत बन जाए।  

लोकल के लिए वोकल होने और आत्मनिर्भर होने का संबंध सिर्फ आर्थिक क्षेत्र तक ही सीमित न हो बल्कि उसे अपनी परम्पराओं को बचाने-बढ़ाने में भी प्रयोग किया जाए। प्राचीन ग्रंथों के अध्ययन को भी पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। जिससे हमारा प्राचीन ज्ञान फिर से प्रासंगिक बने, वही ज्ञान जिसके दम पर भारत कभी विश्वगुरु कहलाया।

राम मंदिर निर्माण का विरोध करने वाले बाबर की मानस संतान

अयोध्या से मेरा संबंध बहुत पुराना है। बचपन से ही माता-पिता साल में कम से कम दो बार अयोध्या जाते रहे हैं। उनके गुरु स्वामी राम हर्षण दास जी का आश्रम वहीं है। पिछले लगभग 50- 55 साल से उनका ये क्रम अनवरत चलता रहा है।

उस समय विश्व हिंदू परिषद के राम जन्मभूमि आंदोलन की शुरुआत भी नहीं हुई थी। मेरे माता-पिता दोनों को ही हमेशा ये उत्कृष्ट इच्छा रही कि अयोध्या में जन्मस्थान पर राम मंदिर बन जाए। मेरे माता-पिता दरससल उन करोड़ों राम भक्तों का प्रतिनिधित्व करते थे, जो बिना किसी राजनीतिक उद्देश्य के अयोध्या में जन्मभूमि पर रामलला का भव्य मंदिर बनते देखना चाहते हैं।

कई विदेशी अखबारों में पिछले दिनों कई लेख छपे हैं जिनमें अयोध्या की घटना को भाजपा के नेतृत्व में ‘हिन्दू राष्ट्रवादियों द्वारा मंदिर निर्माण’ को एक राजनीतिक कदम बताया गया है। ऐसा लिखने वाले बड़ी भारी गलती कर रहे हैं।

इसे महज राजनीतिक आंदोलन कहना इसका बड़ा सतही विश्लेषण हैं। राम जन्मभूमि के लिए चला संघर्ष कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं है। किसी भी राजनीतिक आंदोलन में इतनी शक्ति नहीं होती कि वह अनवरत कई सौ साल तक चल सके। हिन्दुओं के मन में राम मंदिर निर्माण की आकांक्षा और उसके लिए संघर्ष तकरीबन 500 साल से तो चल ही रहा है। मंदिर निर्माण के शुरू होने के कार्यक्रम को एक संकुचित राजनीतिक परिपेक्ष्य में देखने वाले ये लोग एक वैचारिक भ्रम के शिकार हैं।

मेरे पिताजी राजनीतिक नहीं थे। वे रेलवे में काम करते थे। उनका राजनीतिक विचारधारा या किसी दल से कोई संबंध नहीं था। पर अनन्य राम भक्त होने के कारण रामजन्मभूमि में उनकी अटूट आस्था थी। उनकी तरह ही करोड़ों रामभक्तों ने शताब्दियों से इस मनोरथ में जीवन गुजारा है कि अयोध्या में राम जन्मभूमि स्थान पर गरिमापूर्ण मंदिर बने।

उस समय तक भाजपा के पूर्व अवतार भारतीय जनसंघ और आरएसएस की उत्तर प्रदेश में कोई खास पकड़ नहीं थी। दरअसल 60 -70 के दशक में तो उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेस के अलावा समाजवादी आंदोलन की पकड़ कहीं अधिक मजबूत थी।

मुझे ध्यान है कि जब मैं छोटा था तो मेरे बड़े भाई साहब ने आगरा कॉलेज में छात्र संघ का चुनाव समाजवादी युवजन सभा के बैनर पर लड़ा था। पर उनके राम भक्त होने और समाजवादी होने के बीच कोई द्वंद नहीं था। इस बारीकी को राजनीतिक चिंतकों और राजनीतिक लेखकों को समझना आवश्यक है।

जब आप राममंदिर आंदोलन को सिर्फ एक राजनीतिक दल या विचारधारा के नजरिए से देखते हैं तो आप उसके आकलन में गलती करते हैं। जनमानस में क्या चल रहा है इसे समझने में ऐसी गलती खासकर 80-90 के दशक और उसके बाद कॉन्ग्रेस के नेताओं और वामपंथी बुद्धिजीवियों ने की।

वे खासकर उत्तर प्रदेश और भारत के बड़े हिस्से में जमीन पर क्या हो रहा है, इसको समझ ही नहीं पाए। जनभावनाओं के सतही आकलन और अपने ‘सेकुलर’ पूर्वाग्रह के कारण उन्होंने हर रामभक्त को ‘संघी’ घोषित कर दिया। जब चिंतन पर राजनीतिक स्वार्थ हावी हो जाता है तो आप नीर-क्षीर विवेक खो देते हैं।

जमीन से कटे हुए इन कथित चिंतकों, विचारकों, मीडियाकर्मियों और बुद्धिजीवियों को ये पता ही नहीं पड़ा कि उनका ये मतिभ्रम कब हिन्दू विरोध की आदत में बदल गया। आज भी जब मोदी के समर्थकों को ‘भक्त’ कहकर गाली दी जाती है तो अपनी ‘श्रेष्ठ बौद्धिकता’ के मद में जीने वाले ये लोग वही गलती दोहरा रहे होते हैं। 

इसका नतीजा क्या हुआ? मेरे पिताजी जो कि राजनीतिक नहीं थे, ने 90 के दशक तक आते-आते पूरे तरीके से भाजपा और संघ के समर्थक बन गए। उन्हें लगा कि उनके आराध्य भगवान राम के न्यायोचित मंदिर का निर्माण सिर्फ और सिर्फ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उनसे अनुप्राणित संगठनों के लोग ही करवा सकते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ कार्यकर्ताओं के समर्पण, निष्ठा, त्याग के मेरे पिताजी जैसे लोग कायल हो गए। बाकी तो सब इतिहास की बात है।

राम जन्मभूमि के उद्धार के लिए संघर्ष बहुत लंबा चला है। जब से बाबर के सेनापति मीर बाकी ने वहाँ मंदिर का विध्वंस कर मस्जिद का निर्माण किया, राम भक्तों ने चैन की कभी साँस नहीं ली है। कहते हैं कि मंदिर को 1526 में तोड़ा गया। उसके बाद से ही अयोध्या में अनगिनत संघर्षों की गाथा है। संघर्ष कभी रुके नहीं।

अपने आराध्य के मंदिर के तलवार की नोंक पर हुए इस क्रूरतापूर्ण विध्वंस को सामान्य समाज ने कभी स्वीकार नहीं किया। कोई समाज अपने न्यायोचित अधिकारों के लिए 500 साल तक संघर्ष करता रहे, यह एक अद्भुत घटना है। इस दौरान पहले इस्लाम को मानने वाले विदेशी आक्रांताओं का राज रहा।

उन्होंने अक्सर पाश्विक क्रूरता और असहिष्णुता के साथ हिन्दुओं के समस्त अधिकारों का निर्दयतापूर्वक अतिक्रमण किया। बाद में ईसाइयत को मानने वाले अंग्रेजों का राज रहा। अत्यधिक दमन, भय, जोर-जबरदस्ती और प्रलोभन के इस अंधकारपूर्ण माहौल में में भी पाँच सदी तक हमारे समाज ने विधर्मी आक्रांताओं का प्रतिकार किया। दुनिया के इतिहास में कोई अन्य ऐसी घटना नहीं मिलती। 

कहते हैं कि 50 साल के क्रम में कोई चार पीढ़ियाँ गुजर जाती है। तो इन 500 सालों में कोई 40 पीढ़ियाँ तो गुजर ही गई होंगी। इन 40 पीढ़ियों में से हर एक पीढ़ी ने दूसरी पीढ़ी को इस संघर्ष की चेतना उत्तराधिकार के रूप में सौपीं। एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को यह बताते गई कि राम की भूमि अयोध्या ही है। इसलिए बलपूर्वक जिन विधर्मी आक्रमणकारियों ने राम की जन्मभूमि को उनके भक्तों से छीना है उसके लिए संघर्ष करना उनका धार्मिक, नैतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्व है।

इस मायने में राम जन्मभूमि मंदिर के निर्माण का कार्य शुरू होना अपने आप में सिर्फ एक धार्मिक घटना मात्र नहीं है। यह घटना सामूहिक राष्ट्रीय चेतना के निरंतर संग्रहण और सिंचन का प्रतीक है। यह उस अनवरत चलने वाले संघर्ष की ज्योति का प्रतीक है जो करोड़ों दिलों में अनवरत जलती रही है।

5 अगस्त की घटना को सीमित, संकुचित राजनीतिक और धार्मिक नजरिए से देखने वाले फिर एक मूलभूत गलती कर रहे हैं। वे इस समाज और उसमें व्याप्त चेतना को समझ ही नहीं पा रहे। अयोध्या का समारोह भारतीय समाज की जिजीविषा, समृद्ध विरासत के प्रति उसका समर्पण, उसके शाश्वत संकल्प, साधन हीन होने पर भी संघर्ष करने के मनोबल और घोर विपरीत परिस्थितियों में ना चुकने वाले उसके धैर्य का प्रतीक है।

इस राष्ट्रीय सामाजिक चेतना की लौ को निरंतर जलाए रखने में एक महानायक ने बड़ी भूमिका अदा की। वे थे गोस्वामी तुलसीदास। तुलसीदास जी रामचरितमानस लिखकर ही रुके नहीं, बल्कि उन्होंने रामलीला का मंचन भी आरंभ किया। गरीब, अमीर, हर जाति और वर्ग, विद्वान, अनपढ़, स्त्री और पुरुष सब तक तुलसी ने अनुपम रामकथा द्वारा इस चेतना को पहुँचाया।

रामलीला और रामचरितमानस इस संघर्ष की अंतः चेतना की रीढ़ की हड्डी है। इस नाते गोस्वामी तुलसीदास राम जन्मभूमि पुनर्निर्माण के वैचारिक प्रणेता ही नहीं, बल्कि पहले एक्टिविस्ट भी हैं। आज देश के कण-कण में जो राम बसे हुए हैं, वह गोस्वामी तुलसीदास की देन है। 

इस संघर्ष के अनेक ज्ञात और अज्ञात नायक रहे हैं। जिन्होंने 500 साल निरंतर अपने रक्त और विचारों से इसे सींचा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ, स्वर्गीय अशोक सिंघल, लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता निस्संदेह इसके तात्कालिक नायक हैं। क्योंकि आज उनके समय में इस यज्ञ की पूर्णाहुति हो रही है। पर क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और अनेकानेक संतों की भूमिका और अनगिनत अनाम रामभक्तों की भूमिका को भुलाया जा सकता है?

जब इस्लामी जिहाद और क्रूसेड का अंधड़ शुरू हुआ तब मध्य पूर्व से लेकर सुदूर पूर्व तक एक के बाद एक देश, संकृतियाँ और पुरानी सभ्यताएँ परास्त होने के बाद समूल परिवर्तित/नष्ट होती गई।  मेसोपोटामिया, मिस्र, ईरान, इंडोनेशिया, मलेशिया आदि इसके अन्यतम उदाहरण हैं।

एक के बाद एक पुरानी सभ्यताओं का तकरीबन नामोनिशान मिटा दिया गया। पर विदेशी आक्रांता अपनी भरपूर कोशिशों के बावजूद भारत में ऐसा नहीं कर पाए। भारतीय समाज की अंतर चेतना में जो सांस्कृतिक और विरासत के मूल्य स्थापित हुए थे वह इतनी सघन, शुद्ध और गहरे थे कि तलवार का भय, प्रलोभन और अन्य कोई लालच उसे बदल नहीं सका।

ये सही है कि इन प्रचंड आँधियों ने कुछ पेड़ों को झुकाया, कुछ डालियों को तोड़ दिया, कुछ फूल मसल दिए गए और अनगिनत कलियों को कुम्हला दिया, पर भारतीय सभ्यता का समूचा उपवन उजड़ा नहीं। अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर में निर्माण कार्य का शुरू होना हमें यही बताता है।

रामचरितमानस में एक वर्णन है। जब राम और रावण युद्ध के लिए आमने-सामने खड़े हुए तो विभीषण ने देखा कि राम पैदल और नंगे पैर हैं, जबकि महा बलशाली रावण रथ पर सवार था। तुलसीदास जी लिखते हैं, “रावनु रथी बिरथ रघुवीरा, देखि बिभीषन भयउँ अधीरा।”

विभीषण ने राम से पूछा कि आप नंगे पैर, बिना रथ कैसे दस सिरों और बीस भुजाओं वाले रावण को जीतेंगे? वहाँ जो राम नीति का वर्णन करते हैं वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है। भगवान राम कहते हैं कि युद्ध सिर्फ शस्त्रों से नहीं जीते जाते। जिसके पास धर्म, नीति, सत्य पर आस्था और विवेकपूर्ण आचरण का रथ होता है वही युद्ध भी जीतता है।

श्रीराम कहते हैं, “महा अजय संसार रिपु, जीति सकइ सो बीर। जाके अस रथ होइ दृढ, सुनहुँ सखा मतिधीर।”

भगवान राम की यह उक्ति राम जन्मभूमि के लिए हिंदुओं द्वारा किए गए संघर्ष पर भी लागू होती है। न तो उन्होंने धर्म छोड़ा, न आशा छोड़ी और ना ही संघर्ष छोड़ा। इसी कारण 500 साल बाद राम जन्मभूमि पर मंदिर बनने की शुरुआत उस राष्ट्रीय स्वप्न की पूर्ति है जो करोड़ों भारतीयों ने कई सदियों तक पीढ़ी दर पीढ़ी लगातार धैर्यपूर्वक सँजोकर रखा था। सामाजिक और राष्ट्रीय जागरण का ये आंदोलन समाज की सामूहिक चेतना, उसकी अस्मिता, उसके मान सम्मान, आत्म भान का संकल्प है।  

यह राष्ट्रीय अनुष्ठान अभी पूरा नहीं हुआ है। जिस अनुदारवादी और असहिष्णु सोच ने मध्यकाल में मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाई थी उसकी अनुकृतियाँ आज भी जिंदा है। वैसे अच्छा तो यह होता कि 1947 के बाद इस्लाम के अनुयायी कहते कि राम आपके इष्ट हैं। मीर बाकी और बाबर विदेशी आक्रांता थे तथा इस्लाम में पूज्य भी नहीं हैं। इसलिए आप अपने इष्ट देव का मंदिर बनाएँ।

आजादी के बाद ही यदि तुरंत ये जमीन राम मंदिर बनाने को सौंप दी जाती तो कितना अच्छा होता? पर राजनीतिक स्वार्थों, छद्म सेकुलरवादियों की हरकतों और इतिहासकारों के रूप में प्रचारित वामपंथी बुद्धिजीवी एक्टिविस्टों ने ऐसा नहीं होने दिया।

एक लंबी कानूनी लड़ाई के बाद भारत के सुप्रीम कोर्ट ने सर्वानुमति से मंदिर के पक्ष में नवम्बर 2019 को फैसला दिया। इसी के तहत मंदिर निर्माण का काम शुरू हुआ है। अब भी जो इसका विरोध कर रहे हैं वे न भारत के संविधान में, न भारत की न्यायिक व्यवस्था में और न ही किसी नैतिकता में आस्था रखते हैं। वे उन ताकतों की मानस संतान हैं जिन्होंने मंदिर ही नहीं, बल्कि मध्यकाल में भारत की आत्मा को तोड़ने का भी असफल प्रयास किया था।

105 गाँव, 1.5 लाख लोग: 500 साल बाद पहनेंगे पगड़ी, जूता और लेंगे छाता – पूरी हुई राम मंदिर की प्रतिज्ञा

5 अगस्त को अयोध्या में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भव्य राम मंदिर की नींव रखी। देश और दुनिया के तमाम आस्तिकों ने इसके लिए प्रार्थना की थी। कुछ ने प्रार्थना तो कुछ ने प्रतिज्ञा भी की थी, ऐसी अटूट प्रतिज्ञाएँ, जो सालों पुरानी थीं और 5 अगस्त को उनका तर्पण हुआ।

अयोध्या के नज़दीक पूरा बाज़ार और उसके आस-पास लगभग 105 गाँव मौजूद हैं। यहाँ के सूर्यवंशी क्षत्रिय परिवारों ने प्रतिज्ञा की थी कि वे लोग मंदिर निर्माण के बाद ही पगड़ी पहनेंगे। गाँव के क्षत्रियों ने संकल्प लिया था कि वह राम मंदिर निर्माण पूरा होने तक न तो पगड़ी धारण करेंगे और न ही चमड़े का जूता पहनेंगे।

जानकारी के मुताबिक़ राम मंदिर पर हमले के वक्त सूर्यवंशी समाज के क्षत्रियों ने शपथ ली थी। इसके अनुसार जब तक मंदिर निर्माण नहीं होता, तब तक वह पगड़ी नहीं पहनेंगे, छाते से सिर नहीं ढकेंगे। इसके अलावा चमड़े का जूता भी नहीं पहनेंगे।

सूर्यवंशी क्षत्रिय अयोध्या के अलावा बस्ती जिले के कई गाँवों में भी रहते हैं। यह सारे परिवार खुद को मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का वंशज मानते हैं। इन सभी गाँवों में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने के बाद से पगड़ी बाँटी जा रही है।    

क्षत्रिय समाज के लिए यह जितना धर्म का मसला था, उतना ही जज्बातों का भी था। इस मुद्दे पर अयोध्या के रहने वाले महेंद्र प्रताप ने स्वराज्य से कई बातें बताई। उन्होंने कहा “हमारे पूर्वजों ने बहुत पहले ही पगड़ी पहनने से मना कर दिया था। उन्होंने शपथ ली थी कि जब तक रामलला का भव्य मंदिर नहीं बन जाता, तब तक वह बिना पगड़ी और बिना जूतों के ही रहने वाले हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि वो अपने सम्मान से समझौता नहीं करते हैं और न ही हार स्वीकार करते हैं। और पगड़ी उनके लिए सम्मान का विषय है, इसलिए उन्होंने पगड़ी का त्याग कर दिया। इसके बाद प्रताप ने बताया कि उनकी पीढ़ी के लोगों ने तो गमछे का इस्तेमाल करना भी बंद कर दिया था।    

साक्षात्कार के दौरान बात करते हुए प्रताप कई बार भावुक तक हुए। उन्होंने कहा, “हमने रामलला को सालों तक टेंट में देखा और इस कष्ट की व्याख्या नहीं की जा सकती है। अपने आराध्य श्रीराम को इस तरह टेंट में देखना बहुत पीड़ा देने वाला दौर था। हम हिंदुओं के साथ यही दिक्कत है, हम एक नहीं हो पाते हैं। हम खुद घरों में रह रहे थे लेकिन इस बात पर अफ़सोस नहीं जताते थे कि हमारे आराध्य टेंट में रह रहे थे।”

अंत में उन्होंने बताया कि भले 5 अगस्त बीत गई है लेकिन अभी तक माहौल वैसा ही बना हुआ है। रामायण और सुंदर-कांड का पाठ अभी भी चल रहा है। लोग अभी भी श्रीराम का भजन गा रहे हैं और खुशी मना रहे हैं।    

इसके बाद शीतला सिंह ने खुशी से कहा, “पहनेंगे पगड़ी और साफ़ा पहनेंगे। भूमि पूजन हो चुका है और अब मंदिर निर्माण शुरू होगा। हमारे समुदाय के लोग पगड़ी पहनेंगे, हमसे ज़्यादा खुशी और किसे होगी।” इनके अलावा रमेश सिंह अयोध्या में हुए प्रसाद वितरण में मदद कर रहे थे। उन्होंने कहा कि यह सुनिश्चित करना होगा कि अतीत में न जाएँ। बल्कि वर्तमान को ही सत्य माना जाए।        

अयोध्या के नज़दीक ही सरायरासी नाम की जगह है। बासदेव सिंह यहीं के रहने वाले हैं और पेशे से वकील हैं। भास्कर में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक़ उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय का आदेश होने के बाद सरायरासी में अब तक 400 पगड़ी बाँटी जा चुकी है। अयोध्या और इसके आस-पास स्थित गाँवों में इस समाज के लगभग 1.5 लाख लोग रहते हैं। इनमें से कोई शादी, सामाजिक समारोह और पंचायत तक में पगड़ी नहीं बाँधता था।    

अयोध्या के भारती कथा मंदिर की महंत ओमश्री भारती ने भी इस बारे में अपना नज़रिया रखा। उन्होंने कहा “क्षत्रिय समाज अभी तक अपनी प्रतिज्ञा का पालन करते हुए सिर पर मौरी रखता था। जिसमें सिर खुला रहता था। वह अभी तक खड़ाऊ पहनते थे क्योंकि उस ज़माने में जूते-चप्पल चमड़े के बने होते थे। जब बिना चमड़े के जूते चप्पल आए तो उन्हें भी पहनना शुरू किया लेकिन चमड़े का कुछ भी धारण नहीं किया। क्षत्रियों में इस बात को लेकर बहुत ज़्यादा खुशी है, अब तो उन्हें बस मंदिर निर्माण की प्रतीक्षा है।”          

इन सभी के अलावा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश डीपी सिंह ने भी इस बारे में जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि 16वीं शताब्दी में ठाकुर गज सिंह ने मंदिर की रक्षा के लिए मुग़लों से लड़ाई लड़ी थी। लेकिन वे मंदिर की रक्षा नहीं कर पाए, क्षत्रिय समाज हार गया। फिर गज सिंह ने जूते और पगड़ी न धारण करने की प्रतिज्ञा ली। इस पर कवि जयराज ने भी लिखा है, “जन्मभूमि उद्धार होय ता दिन बड़ी भाग। छाता पग पनही नहीं और न बांधहिं पाग।”

दिल्ली में कोरोना के बढ़ते मामलों के लिए बाहरी लोग जिम्मेदार: केजरीवाल के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन

कोरोना वायरस महामारी ने शनिवार (9 अगस्त, 2020) को 1,404 नए मामलों और 16 मरीजों की मौत के साथ देश की राजधानी दिल्ली में कहर बरपाया है। इस तरह दिल्ली में कुल संक्रमितों की संख्या 1,44,127 हो गई है। दिल्ली में इस वक्त कोरोनावायरस के 10,688 ऐक्टिव केस हैं। वहीं अब तक कोरोना से मरने वालों की संख्‍या 4,098 हो गई है।

केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह द्वारा कोरोना वायरस को नियंत्रित करने प्रयास शुरू किए जाने से पहले चीन के वुहान शहर से फैले इस वायरस ने दिल्ली को काफी प्रभावित किया था। राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने 10 जून को दावा किया था कि सक्रिय मामलों की संख्या 12 से 15 दिनों में 30,000 तक बढ़ जाएगी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी सूचित किया था कि महीने के अंत तक 15000 बिस्तरों की अतिरिक्त आवश्यकता होगी।

इस गंभीर स्थिति को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कोरोना महामारी के प्रसार को रोकने के लिए दिल्ली में मोर्चा सँभाला। दिल्ली में जुलाई की शुरूआत से ही कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों में काफी गिरावट देखी गई थी। कथित तौर पर, 18 जून से RT-PCR और रैपिड एंटीजेन टेट्स में उछाल आया है। 24 जून से 2 जुलाई के बीच, सक्रिय मामलों में 23.8% से 11.39% की कमी आई है। 27 जून से 3 जुलाई के बीच नए मामलों की संख्या 3000 के आँकड़े को पार नहीं कर पाई।

हालाँकि इस वक़्त दिल्ली में कोरोना वायरस के मामलों की संख्या फिर से बढ़ रही है तो वहीं स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन ने इसकी जिम्मेदारी लेने के बजाय बाहरी लोगों पर इसका दोष मढ़ना शुरू कर दिया। न्यूज़ एजेंसी एएनआई से बात करते हुए उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि सक्रिय मामलों की संख्या में वृद्धि का कारण दिल्ली के बाहर के लोग हैं। जो कोरोना वायरस का टेस्ट दिल्ली में करा रहे हैं।

सत्‍येंद्र जैन ने दो-टूक कहा, “कुछ रिपोर्ट्स हैं कि दिल्‍ली में कोविड-19 के मामले बढ़ रहे हैं। इसकी वजह ये है कि दिल्‍ली से बाहर के बहुत सारे लोग यहाँ आकर टेस्‍ट करा रहे हैं। इसके चलते यहाँ पर पॉजिटिव केस की संख्‍या बढ़ रही है। नहीं तो, दिल्‍ली में कोविड-19 मामलों का ट्रेंड घट रहा है।”

इससे पहले भी दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री ने दावा किया था कि दिल्ली के मूल निवासियों को अस्पतालों में और अधिक बेडों की आवश्यकता है। उनके इस निर्णय के पीछे दूसरे राज्यों से आए दिल्ली में रहने वालों को दिल्ली सरकार द्वारा संचालित अस्पताओं और दिल्ली के प्राइवेट अस्पतालों में स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित करना भी था।

अपने इस अजीबोगरीब निर्णय के पीछे उनका तर्क था, “जैसा कि हमने पता लगाया पड़ोसी राज्यों में कोरोना के बहुत कम मामले हैं, इसलिए उन राज्यों को इस निर्णय से समस्या नहीं होनी चाहिए।” कहीं न कहीं ऐसा करके दिल्ली की कोरोना से चरमराई हालत का जिम्मा केंद्र सरकार पर मढ़ना था और इसके लिए सत्येन्द्र जैन ने केंद्र पर यह आरोप भी लगाया कि दिल्ली में इस स्थिति की जिम्मेदार केंद्र द्वारा अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को समय पर न बंद किया जाना भी है।

खुद के बचाव में रिया ने सार्वजनिक किए व्हाट्सऐप चैट, सुशांत की बहन को विलेन बताने की कोशिश

अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत से संदेह के घेरे में आई रिया चक्रवर्ती अब लगातार अलग-अलग तरीके से खुद का बचाव करने की कोशिश कर रही हैं। शनिवार (अगस्त 8, 2020) को उनकी लीगल टीम ने उनके और सुशांत के बीच हुई व्हाट्सऐप चैट सार्वजनिक की। इसमें सुशांत अपनी बहन प्रियंका को लेकर बातें कर रहे हैं। इस चैट में सुशांत कथित तौर अपनी बहन से काफी नाराज दिख रहे हैं।

इस व्हाट्सऐप चैट में पहले तो दोनों बेहद ही आराम से बात करते हैं। इसके बाद सुशांत एक के बाद एक अपनी बहन को लेकर कई बातें रिया को बताते हैं। सुशांत पहले रिया को मैसेज करते हैं और उसमें लिखते हैं, “तुम्हारा परिवार बहुत शानदार है। सर (रिया के पिता) बहुत सही हैं। शौविक सहानुभूति से भरा हुआ है और तुम भी जो कि मेरी हो, इन जरूरी बदलावों के पीछे तुम एक पर्याप्त कारण हो। तुम सभी के आसपास रहना मेरे लिए खुशी की बात होगी। चीयर्स मेरी दोस्त, मेरी रॉकस्टार बनने के लिए।”

रिया-सुशांत की वॉट्सऐप चैट में सामने आई ये बातें, बहन से थी नाराजगी!

अगले मैसेज में सुशांत लिखते हैं, “तुम प्लीज मुस्कुराती रहो, तुम इसमें बहुत अच्छी लगती हो। मैं अब सोने की कोशिश करता हूँ। काश मुझे जमीला जैसा कोई सपना आए। कितना अच्छा होगा ना? टाटा…” ये चैट दोनों के बीच शाम 6 बजकर 8 मिनट से 6 बजकर 14 मिनट के बीच हुई थी।

रिया-सुशांत की वॉट्सऐप चैट में सामने आई ये बातें, बहन से थी नाराजगी!

इसके बाद रिया एक बार फिर से रात को 8 बजे के आसपास मैसेज कर उनका हालचाल लेती हैं। इसके जवाब में सुशांत की तरफ से मैसेज आता है, “अच्छा नहीं है…मेरी बहन अब सिड भाई को विक्टिम कार्ड खेलकर मैनिपुलेट कर रही है ताकि इस पूरी बात से ध्यान भटक कर (वही बात जिसे मैं और तुम पीछे छोड़ रहे हैं) मुझ पर आ जाए कि मैंने फिजिकली पनिशमेंट उन्हें दी। ये बहुत निराशाजनक बात है।”

बताया जा रहा है कि ‘सिड भाई’ के रूप में संभवतः वह सिद्धार्थ पिठानी की बात कर रहे हैं। इसके बाद रिया उनसे कहती हैं कि मीटिंग के बाद फोन करना। इसके बाद सुशांत का मैसेज है। यह मैसेज उन्होंने अपनी बहन को किया था।

सुशांत ने लिखा, “(प्रियंका के लिए) इस गिरी हुई हरकत के लिए, शराब के नशे में छेड़छाड़ में तुम विक्ट‍िम कार्ड का गेम खेलकर उसे कवरअप करने की कोश‍िश कर रही हो। तो मेरी प्यारी बहन, वहाँ हमारी माँ है और भगवान हैं, जिन्होंने मुझे सिखाया, और तुमने उस सीख के मुताबिक एक अपराध किया है।”

रिया-सुशांत की वॉट्सऐप चैट में सामने आई ये बातें, बहन से थी नाराजगी!

उन्होंने आगे लिखा, “अगर तुम्हें अपने अहंकार की वजह से कुछ नजर नहीं आ रहा है तो फिर भगवान ही तुम्हारा भला करे क्योंकि मैं नहीं डरता और मैं आगे भी उस काम को जारी रखूँगा जो अब तक किया है। मैं दुनिया में जरूर बदलाव लाता रहूँगा। भगवान और प्रकृति को ही यह फैसला करने दें कि किसका काम सही है।”

सुशांत ने अगला मैसेज जो रिया को भेजा वो ‘सिड’ के लिए था, जिसमें लिखा था, “उन्होंने तुम्हें मेरी आँखों के सामने मारा और वो मेरी बहन ने किया जिसे लोग समझते हैं कि शराब के नशे में किया होगा और तुम उसकी विक्ट‍िम कार्ड वाली बातों को मान भी रहे हो।”

इसमें आगे लिखा गया, “प्लीज मुझे यह भी बताओ कि तुमने और मैंने ऋष‍िकेश बस में क्या किया था। तब तो हम दोनों बार-बार शर्म‍िंदा होंगे, अगर हम बहन के नजर‍िए से देखें तो। मैं मह‍िलाओं की इज्जत करता हूँ पर उन्होंने यह भी सिखाया है कि हमेशा सही का साथ दें और जो बराबर में है उससे डरे नहीं।”

सुशांत आगे लिखते हैं, “क्या तुम्हें लगता है कि बहस करने वाली मेरी कोई भी बात एक परेशानी है और उनका काम सही है। भाई मैं सभी रिश्ते छोड़ दूँगा और दुनिया में पॉजिट‍िव बदलाव लाने के लिए जो कर रहा हूँ उसमें ही लग जाऊँगा। तुम वही करो जो तुम्हें सही लगता हो। मैं समझ लूँगा।”

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एक और चैट में सुशांत लिखते हैं कि उन्हें अपनी बहन की चिंता हो रही है। वह बहुत दुष्ट है। फिर रिया कहती हैं चलो ये मामला निपटाते हैं, मैं उन्हें (बहन को) फोन करूँगी।

ये चैट्स रिया चक्रवर्ती के वकील सतीश मानेशिंदे ने साझा की हैं। ये चैट्स कितनी सही हैं और कितनी गलत ये हम नहीं कह सकते। इन चैट्स के मुताबिक सुशांत की बहन प्रियंका ने सिद्धार्थ पिठानी पर हाथ उठाया था और सुशांत इस बात का विरोध कर रहे थे। साथ ही रिया चक्रवर्ती इसमें सुशांत का साथ दे रही थीं।

हालाँकि, सुशांत के फैंस का कहना है कि रिया खुद के प्रति सहानुभूति बटोरने और एक्टर की बहन को गलत साबित करने की कोशिश कर रही हैं। 

गौरतलब है कि सुशांत के पिता केके सिंह ने 25 जुलाई को पटना में रिया चक्रवर्ती के खिलाफ सुशांत के साथ धोखाधड़ी करने और उन्हें खुदकुशी के लिए उकसाने का केस दर्ज करवाया था। इस केस में उन्होंने रिया, उनके पिता इंद्रजीत चक्रवर्ती, माँ संध्या चक्रवर्ती, भाई शौविक चक्रवर्ती को आरोपित बनाया था।

केके सिंह ने मीडिया से भी बातचीत में रिया पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। इसमें सुशांत के अकाउंट से पैसे निकालने का आरोप भी है। फिलहाल, इस मामल में ईडी ने भी मनी लॉन्ड्रिंग का केस दर्ज कर रिया से पूछताछ कर रही है।

भारत विरोध का गढ़ बन चुके तुर्की पहुँचे आमिर खान, वहाँ की मिनिस्ट्री के समर्थन से करेंगे फ़िल्म शूटिंग

बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान अपनी अगली फिल्म ‘लाल सिंह चड्ढा’ की शूटिंग के लिए तुर्की पहुँच गए हैं। तुर्की के ‘कल्चर एंड टूरिज्म मिनिस्ट्री’ ने इसकी सूचना दी है। आमिर की अगली फिल्म टॉम हैंक अभिनीत अंग्रेजी की 1994 की फिल्म ‘फारेस्ट गंप’ की रीमेक है। इसकी आधी शूटिंग हो चुकी है, बाकी बची आधी फिल्म को तुर्की में ही फिल्माया जाएगा। बता दें कि फ़िलहाल भारत विरोधी रुख को लेकर तुर्की चर्चा में है।

बताया गया है कि कोरोना वायरस संक्रमण आपदा की वजह से भारत में शूटिंग करना संभव नहीं हो पा रहा है, इसीलिए आमिर खान तुर्की गए हैं। तुर्की की मीडिया का कहना है कि आमिर खान वहाँ की तकनीकी इंफ्रास्ट्रक्चर, सिनेमा के लिए एडवांस फ़ैसिलिटी और वर्कफोर्स कैपेसिटी से खुश हैं। इससे पहले उन्होंने वहाँ के दौरों मे इन चीजों को देखा था। तुर्की का पर्यटन मंत्रालय उनकी सहायता कर रहा है।

सोशल मीडिया पर आमिर खान की तुर्की की तस्वीरें वायरल हैं, जिसमें वो मास्क लगाए दिख रहे हैं। उजले बालों में दिख रहे आमिर खान के साथ कुछ अन्य लोग भी दिख रहे हैं। इससे पहले कोलकाता और चंडीगढ़ में इस फिल्म की शूटिंग हुई थी। ‘लाल सिंह चड्ढा’ का निर्देशन अद्वैत चंदन ने किया है। इस फिल्म में करीना कपूर बतौर मुख्य अभिनेत्री काम कर रही हैं। ये आमिर खान की महत्वाकांक्षी फिल्म है।

बता दें कि अनुच्छेद 370 के मुद्दे पर तुर्की ने पाकिस्तान की बातों का समर्थन किया था। इसके बाद वह भारत विरोधी गतिविधियों का गढ़ बन चुका है। तुर्की में पनप रहे इस नए तरह के आतंकवाद को कोई और नहीं बल्कि वहाँ की एर्दोगन सरकार खुद बढ़ावा दे रही है। तुर्की की तरफ से भारत के लोगों को कट्टर बनाने की भरपूर कोशिश जारी है। इतना ही नहीं तुर्की भारत के कट्टरपंथियों को और कट्टर बना कर उन्हें भारत विरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल करना चाहता है।

अक्टूबर 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना तुर्की दौरा रद्द कर दिया था। तुर्की द्वारा जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान को समर्थन दिए जाने के बाद भारत ने अपनी विदेश नीति में बड़ा बदलाव करते हुए तुर्की की आलोचना की थी। तुर्की लगातार कुर्दिश और सीरिया के लोगों की हत्या कर रहा है, जिसकी भारत ने आलोचना की थी। भारत ने कुर्द की स्वतंत्रता का समर्थन किया था। साथ ही पीएम नरेंद्र मोदी ने साइप्रस के राष्ट्रपति से मुलाक़ात कर उसकी सम्प्रभुता को समर्थन दिया था।

बता दें कि जब इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भारत आए थे तब तीनों खान ने उनका बहिष्कार किया था। कई बॉलीवुड हस्तियों को उनसे मिलने के लिए आमंत्रण दिया गया था, लेकिन आमिर खान सहित तीनों खान नहीं पहुँचे। कई लोगों ने तब ‘असली हीरो’ कह कर उनकी तारीफ की थी।

बाबर के नाम पर कुछ भी कबूल नहीं, मोहम्मद साहब के नाम पर हो मस्जिद: मोहसिन रजा

उत्तर प्रदेश सरकार के अल्पसंख्यक मंत्री मोहसिन रज़ा ने सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में बनने वाली मस्जिद का नाम मोहम्मद साहब के नाम पर रखने का सुझाव दिया है। मोहसिन रज़ा का कहना है कि जिस तरह अयोध्या में राम के नाम का मंदिर बन रहा है, वैसे ही मस्जिद मोहम्मद साहब के नाम पर होनी चाहिए। 

उन्होंने कहा कि बाबर ने कोई अच्छा काम नहीं किया है। उसके नाम पर कुछ भी रखना सही नहीं होगा। अगर बाबर के नाम पर कुछ भी बनाया जाता है तो उसे कबूल नहीं किया जाना चाहिए।

रज़ा ने कहा कि कि अयोध्या में बनाई जाने वाले मस्जिद का नाम ‘मस्जिद-ए-मोहम्मदी’ रखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि बाबर के नाम पर मजहब के 73 फ़िरके भी सहमत नहीं होंगे।

इससे पहले अयोध्या में बनने वाली मस्जिद को लेकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दो टूक जवाब दिया था।  उन्होंने साफ़ शब्दों में कहा था कि वह बतौर योगी और बतौर हिंदू मस्जिद के शिलान्यास का हिस्सा नहीं बनेंगे। न तो वह ऐसे किसी कार्यक्रम में शामिल होंगे और न ही उन्हें ऐसी किसी कार्यक्रम से बुलावा आएगा।

उन्होंने कहा था, “अगर आप मुझसे एक मुख्यमंत्री के रूप में पूछेंगे तो मुझे किसी मज़हब, संप्रदाय से परहेज नहीं है। अगर एक योगी के रूप में पूछेंगे तो कतई नहीं जाऊँगा। मैं इसलिए नहीं जाऊँगा क्योंकि क्योंकि मैं एक योगी हूँ। हिंदू धर्म का होने के नाते मेरे पास अपने तौर तरीकों से पूजा करने का अधिकार है। इसलिए न तो मुझे कोई मस्जिद के शिलान्यास में बुलाएगा। न ही मैं इस तरह के किसी आयोजन का हिस्सा बनने वाला हूँ।”

राहुल जी से टाइम माँगते हैं तो वह कहते हैं मैं अध्यक्ष नहीं हूँ: कॉन्ग्रेस को बचाने की सिंघवी ने लगाई गुहार, कहा- जल्द चुने नया अध्यक्ष

राहुल गॉंधी के तौर-तरीकों की शिकायत करते हुए पूर्व में भी कई लोग कॉन्ग्रेस छोड़ चुके हैं। अब पार्टी के वरिष्ठ नेता और सांसद अभिषेक मनु सिंघवी ने इस तरफ इशारा किया है। उन्होंने पार्टी को बचाने के लिए जल्द अध्यक्ष चुने जाने की गुहार लगाई है।

सिंघवी ने सत्य हिंदी को दिए साक्षात्कार में कहा कि अगर राहुल गॉंधी कॉन्ग्रेस की कमान नहीं सॅंभालना चाहते हैं तो उनकी जगह किसी और को पार्टी अध्यक्ष चुना जाना चाहिए। राहुल ने 2019 के आम चुनावों में पार्टी की करारी शिकस्त के बाद अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। काफी मान-मनौव्वल के बाद भी जब वे दोबारा जिम्मेदारी सॅंभालने को तैयार नहीं हुए तो सोनिया गॉंधी को अंतरिम अध्यक्ष चुन लिया गया। सोमवार को बतौर अंतरिम अध्यक्ष साल भर हो जाएँगे।

सिंघवी का यह साक्षात्कार ऐसे वक्त में सामने आया है जब कॉन्ग्रेस के अस्तित्व पर संकट मॅंडरा रहा है। स्थायी अध्यक्ष न होने के कारण उसके सामने निलंबन और पार्टी का चुनाव चिह्न जब्त होने का खतरा है। इस साल की शुरुआत में मध्य प्रदेश में सरकार गॅंवाने वाली पार्टी के सामने यही खतरा राजस्थान में है। झारखंड की गठबंधन सरकार में भी सब कुछ ठीकठाक नहीं चल रहा। यहॉं तक कि पंजाब में भी कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व पर सांसद प्रताप सिंह बाजवा लगातार सवाल उठा रहे हैं।

सिंघवी से जब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के चुनाव को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने कहा, “अभी हमारी हालत ख़राब है, लेकिन हार के बाद भी यह कहना गलत होगा कि वे (राहुल गॉंधी) दोबारा नहीं हो सकते। हम कह रहे हैं कि राहुल गाँधी आएँ और अगर वो नहीं आना चाहते, उनकी ज़िद है तो फिर इस पर फ़ैसला करके नए अध्यक्ष को चुना जाए, यह अनिश्चितता नहीं रहनी चाहिए। इससे नुक़सान हो सकता है। कुछ हफ्तों में हल निकलेगा। कोई तो आएगा ही और चुनाव के रास्ते आएगा।”

यह पूछे जाने पर कि क्या गॉंधी परिवार के बिना कॉन्ग्रेस का काम चल सकता है सिंघवी ने कहा, “राहुल गाँधी पिछले एक साल से अध्यक्ष नहीं हैं कॉन्ग्रेस का काम चल रहा है। सोनिया जी अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर काम कर रही हैं, बल्कि कई बार राहुल जी के पास टाइम माँगते हैं तो वह कहते हैं कि मैं अध्यक्ष नहीं हूँ। लेकिन प्रकृति हो या पार्टी, कहीं भी वैक्यूम नहीं रह सकता, लेकिन यह लॉन्ग टाइम विकल्प नहीं है।”