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जनता कर्फ़्यू में ईदगाह मैदान में CAA विरोध-प्रदर्शन: 12 आयोजकों, 150 अज्ञात पर FIR – जान से खिलवाड़ का आरोप

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील के बाद रविवार (मार्च 22, 2020) को जहाँ पूरा देश जनता कर्फ्यू का पालन कर रहा था, वहीं मुरादाबाद के ईदगाह मैदान में हजारों लोग सीएए और एनआरसी के खिलाफ धरना प्रदर्शन कर रहे थे। आरोप है कि आयोजकों ने एक साजिश के तहत 21 मार्च की रात से ही मैसेज वायरल कर हजारों लोगों को इकट्ठा किया। इसके बाद रविवार सुबह जहाँ पूरा शहर कोरोनावायरस से लड़ने के लिए घरों में कैद था, वहीं ईदगाह मैदान में प्रदर्शनकारी धरने पर थे। इन सभी लोगों पर दूसरों की जान से खिलवाड़ करने के आरोप में FIR दर्ज किया गया है।

मुरादाबाद में 29 जनवरी से चल रहा धरना रविवार को भी बदस्तूर जारी रहा। जबकि एसीएम प्रथम ने इसे स्थगित करने के लिए नोटिस भी दिया था। प्रधानमंत्री के जनता कर्फ्यू के आह्वान के बाद प्रशासन ने इस संबंध में आदेश जारी किया था। इस आदेश के बाद एसीएम प्रथम की ओर से ईदगाह में धरना प्रदर्शन कर रहे लोगों को नोटिस दिया गया था। उन्हें 21 मार्च को शाम 5 बजे तक धरना खत्म करने के लिए अल्टीमेटम दिया गया था। अपर नगर मजिस्ट्रेट प्रथम ने शनिवार (मार्च 21, 2020) को ईदगाह मैदान में धरने का संचालन करने रहे 12 लोगों को नोटिस जारी किया था। जिसमें उन्हें चेतावनी दी गई थी कि 21 मार्च की शाम पाँच बजे तक धरना प्रदर्शन खत्म किया जाए। यदि जनहित में धरना स्थगित नहीं किया गया तो कार्रवाई की जाएगी।

इस नोटिस के बावजूद रविवार को ईदगाह मैदान में लोगों ने सीएए और एनआरसी के खिलाफ प्रदर्शन किया। इसमें अन्य दिनों की अपेक्षा रविवार को अधिक लोग नजर आए। इस दौरान मंच से भाषण भी दिए गए। इस संबंध में एसएसपी अमित पाठक ने कहा कि प्रदर्शनकारियों को सचेत किया गया था। इसके बावजूद उन्होंने जनता के लिए खतरा उत्पन्न किया है। मामले में 12 आयोजकों और 150 अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज किया गया है।

सभी के खिलाफ गलशहीद थाने में आईपीसी की धारा 269, 270 और 188 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। पुलिस ने कोरोनावायरस को महामारी घोषित किए जाने के बाद विनियमावली 2020 की धारा 12 में वर्णित प्रावधानों के उल्लंघन में ईदगाह मैदान में चल रहे विरोध प्रदर्शन के आयोजकों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। गलशहीद थाना प्रभारी अजीत रोरिया ने बताया कि सीएए एवं एनआरसी बिल के विरोध में विरोध प्रदर्शन की कमिटी के सदस्य चाँद खान उर्फ़ अतहर, शाकिर हुसैन, जाकी राईनी, वाकी रशीद, आसिफ चौधरी, साहिल शम्सी, गुड्डू उर्फ़ अजीम, बब्बन अब्बासी, अनवर नवेद, असलम खान, एहतेशाम मंसूरी और हाफिज इरफ़ान अंसारी व 150 अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज किया गया है।

भाभी के साथ ट्रेन पर थाली-ताली बजाओ… बहुत पैसे मिलेंगे’ – कैफ ने मानी PM मोदी की बात, कट्टरपंथी दे रहे गाली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील के बाद देश ने 22 मार्च को शाम 5 बजे एक अलग ही हिंदुस्तान देखा। इस हिंदुस्तान ने अपने प्रधानमंत्री की बात का मान रखते हुए कल बॉलकनी में आकर, दरवाजे से निकलकर, खिड़की पर खड़े होकर ताली-थाली बजाने के साथ शंखनाद किया। इस कड़ी में पूर्व भारतीय क्रिकेटर मोहम्मद कैफ ने भी पीएम मोदी की इस अपील का समर्थन किया। उन्होंने देश की सेवा में जुटे स्वास्थ्यकर्मियों, सुरक्षाकर्मियों का आभार प्रकट करने के लिए अपने बच्चों के साथ बॉलकनी में खड़े होकर ताली-थाली बजाई, जिसका विडियो सोशल मीडिया पर देख कई लोग भाव-विभोर हुए, मगर कुछ इस्लामिक कट्टरुपंथी इसे देख आहत हो गए।

रविवार को मोहम्मद कैफ ने जहाँ अपने ट्वीट पर अपने बीवी-बच्चों के साथ बॉलकनी की विडियो शेयर करते हुए लिखा, “बॉलकनी में आएँ और भारत को कोरोना मुक्त बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ने वालों को धन्यवाद दें।”

वहीं, इसे देखने के बाद कई लोगों ने उनकी तारीफ की। लेकिन कुछ मजहब के ठेकेदारों ने यहाँ भी जहर उगलना शुरू कर दिया। मोहम्मद फासिउद्दीन नामक यूजर ने मोहम्मद कैफ का ट्वीट और उनके द्वारा शेयर किए गए विडियो को देखकर कहा, “अस्तकफिरउल्लाह!! कुछ दौलत क्या कमा लिए अपने उसलम की तालीमत को भूल गए। क्या तुम्हारे घर की ख्वातिनें बीबी फातिमा जहरा को नहीं जानतीं?”

एक मोहम्मद इकबाल शाह नाम के यूजर ने कैफ को इस मुहिम को हिस्सा बना देख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए अपनी कुँठा निकाली। इकबाल ने कैफ के ट्वीट पर लिखा, “यहाँ तालियाँ तब नहीं बजाई जाती जब कोई गरीब दिन भर मेहनत करने के बाद अपनी मजदूरी पाता है। यहाँ तालियाँ तब नहीं बजाई जाती जब कोई किसान साल भर मेहनत करने के बाद अपनी फसल उगाता है। यहाँ तालियाँ तब बजाई जाती है जब कोई राजनेता तमाशा करता है और हम बेबकूफ की तरह बजाते हैं अपनी।”

इसके बाद नजीब उल हसनैन नामक यूजर ने विडियो देख कैफ से सवाल किया कि आखिर क्या है ये सब? वहीं इमरान खान ने सलाह दी कि कोरोना वायरस ताली बजाने से ठीक नहीं होगा, इसके लिए अल्लाह से दुआ करने की जरूरत है।

एसके मोजफ्फर नाम के यूजर ने कैफ के पोस्ट पर लिखा, “कैफ भाई थाली, ताली बजाना, बर्तन बजाना भिखारी का काम है। अपना नहीं।”

इसके बाद इसी युवक ने लिखा, “कैफ भाई, भाभी और आप थाली और बर्तन लेकर रेलवे पर जाओ और नौकरी करो। हिजड़ा की तरह पैसा मिलेंगे बहुत आपको। थाली और ताली बजाते रहो।”

सद्दाम हुसैन ने तो कैफ को और उनके परिवार को समुदाय के नाम पर कलंक तक बता दिया। जबकि सय्यद अजहर ने उनके इस समर्थन को बेफकूफी कही और कहा कि इससे अच्छा आजान पढ़ लिए होते बॉलकनी में खड़े होकर।

मोहम्मद गुरफान नाम का कट्टरपंथी कैफ के लिए लिखता है, “वाह कैफ जी वाह, बहुत खूब आप में और गैर इमान वालों में क्या फर्क है बता सकते हैं? अरे आपको चाहिए अपने परिवार को बोलते अल्लाह के सामने सजदा करो, दुआ माँगो, रो-रोकर दुआ माँगो और सुन्नत पे चलो। अल्लाह की बात छोड़ बजाय फेकू साहब की मान रहे हो, वाह।”

गौरतलब है कि सोशल मीडिया एक ऐसी जगह है, जहाँ अक्सर इस्लामिक क़ट्टरपंथियों की मन की बात किसी न किसी जरिए सामने आती रहती है। समुदाय विशेष के कई सेलेब्रेटी जब हिंदू त्योहारों को उत्साह के साथ मनाते दिखते हैं या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील मानकर उसका अनुसरण करते दिखते हैं, तब अक्सर ऐसे कमेंट और मजहबी बातें उनके ट्विट्स का हिस्सा होती हैं। पिछले दिनों अपने बंगाली एक्ट्रेस और टीएमसी सांसद द्वारा पूजा पाठ किए जाने पर इन कट्टरपंथियों का चेहरा देखा गया था। फिर, सारा अली खान द्वारा गणपति पूजन पर भी उन्हें नमन करने पर भी उन्हें मजहब का डर दिखाया गया था।

अमेरिका में 24 घंटे में 100 से अधिक मौतें, सेनेटर (सांसद) रैंड पॉल भी कोरोना वायरस से संक्रमित

कोरोना वायरस का प्रकोप लगातार बढ़ता ही जा रहा है। दुनिया के 192 से ज्यादा देश कोरोना वायरस की चपेट में हैं। महामारी के कारण अब तक 14,616 लोगों की मौत हो चुकी है। चीन के बाद इटली सबसे ज्यादा प्रभावित है। अमेरिका में भी कोरोना वायरस पैर पसार रहा है। बात अगर सिर्फ पिछले 24 घंटे की करें तो यहाँ इस वायरस ने 100 से अधिक लोगों की जान ले ली है। इसी के साथ अमेरिका में कोरोना वायरस से मरने वालों की संख्‍या 389 हो गई है।

इस बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चीन के प्रति नाराजगी जाहिर करते हुए कहा है कि वे राष्ट्रपति शी जिनपिंग की वजह से चिंतित हैं, क्योंकि चीन वक्त रहते अमेरिका को वायरस को लेकर आगाह कर सकता था। ट्रम्प ने कहा, “मैं चीन से निराश हूँ। जितना मैं राष्ट्रपति शी जिनपिंग को जानता हूँ और उस देश का सम्मान करता हूँ, जो उन्होंने काफी कम समय में किया, मैं उसकी सराहना करता हूँ। अमेरिका ने चीन में विशेषज्ञों को भेजने की पेशकश की थी। मैंने पूछा कि क्या हम मदद के लिए कुछ लोगों को भेजें, तो उन्होंने गुरूर में जवाब नहीं दिया। चीन की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं आई।”

अमेरिका में होने वाली मौत का ये आँकड़ा जॉन हॉपकिन्‍स विश्‍वविद्यालय की तरफ से जारी किया गया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक अब तक सबसे अधिक न्यूयॉर्क (114 मौतें), वॉशिंगटन (94 मौतें) और कैलिफोर्निया (28 मौतें) प्रांत में हुए हैं। रिपो‌र्ट्स के अनुसार, अमेरिका में कम से कम 30 हजार लोग इस जानलेवा वायरस से संक्रमित हुए हैं। 

इसके साथ ही अमेरिका में केंटकी के सांसद रैंड पॉल ने कहा है कि जाँच में वह कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए हैं। रिपब्लिकन सांसद पॉल कोरोना वायरस से संक्रमित होने वाले अमेरिकी सीनेट के पहले सदस्य हैं। उन्होंने रविवार (मार्च 22, 2020) को ट्वीट किया कि वह ठीक हैं और सबसे अलग हो चुके हैं। पेशे से चिकित्सक पॉल ने कहा कि उनमें कोरोना के लक्षण नजर नहीं आए थे, लेकिन काफी यात्राएँ करने एवं कार्यक्रमों में शामिल होने को लेकर सावधानीवश उनका परीक्षण किया गया। उन्होंने कहा कि उन्हें ध्यान नहीं है कि वह किसी संक्रमित व्यक्ति के प्रत्यक्ष संपर्क में आए थे या नहीं।

बता दें कि इससे पहले भी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चीन पर हमला करते हुए कोरोना पर जानकारी साझा करने के बजाए उसे रहस्य की तरफ छुपाकर रखने के लिए आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि अगर चीन ने इस आसन्न खतरे के बारे में पहले ही चेतावनी दे दी होती तो अमेरिका और पूरा विश्व इसके लिए ज्यादा बेहतर तरीके से तैयार होता। ट्रम्प ने कोराना वायरस को चीनी वायरस बताते हुए कहा था, “चीन ने कोरोना वायरस को लेकर प्रारंभिक सूचना छ‍िपाई जिसकी सजा आज दुनिया भुगत रही है।”

‘मुस्लिमों में भारतीयता का बहुत अभाव, वो इसका महत्व नहीं समझते’ – शहीद दिवस पर भगत सिंह का ‘कम चर्चा’ वाला वो लेख

स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह और वीर सावरकर ने कई अवसरों पर एक-दूसरे के कार्यों का उल्लेख किया है और उपनिवेशवादी ताकतों के अत्याचार के खिलाफ एक-दूसरे को बाहर निकालने तथा एक-दूसरे की लड़ाई का समर्थन करने के बारे में भी लिखा है। उनके अपने कार्य इस बात के प्रमाण हैं।

“विश्व-प्रेमी वह नायक है, जिसे हम एक उग्र विद्रोही, कट्टर अराजकतावादी- वीर सावरकर कहने में जरा भी संकोच नहीं करते। विश्व-प्रेम की लहर में आकर, वह यह सोचकर घास पर चलना बंद कर देता है कि नरम घास पैरों के नीचे मसल दिया जाता है।”

सावरकर के बारे में उपरोक्त उद्धरण शहीद सरदार भगत सिंह का है। भगत सिंह का ‘विश्व प्रेम’ शीर्षक लेख 15 और 22 नवंबर, 1926 को “मतवाला” के अंक में दो बार प्रकाशित हो चुका है। यह उद्धरण उसी लेख का एक अंश है। “हमारा अंतिम लक्ष्य सार्वभौमिक भाईचारा है। राष्ट्रवाद केवल वहाँ पहुँचने के लिए एक कदम है।” सावरकर ने कई बार कहा है। इस लेख में कहा गया है कि यह न केवल भगत को पता था, बल्कि स्वीकार्य भी था। सावरकर के आंतरिक रूप से कठोर लेकिन बेहद कोमल हृदय का ऐसा वर्णन शायद ही कहीं और देखा हो।

खास बात यह है कि सावरकर उन दिनों राजनीति में भाग नहीं लेने की शर्त पर रत्नागिरी में नजरबंंद थे। भगत सिंह ने इस शर्त को स्वीकार करने के सावरकर के फैसले पर आलोचना का एक शब्द भी नहीं लिखा है। हम कह सकते हैं कि इन दोनों क्रांतिकारियों ने एक-दूसरे के दिल और दिमाग को अच्छी तरह से समझा।

फिर मार्च 1926 में कीर्ति में मदनलाल ढींगरा और सावरकर के बारे में लिखते हुए भगत सिंह कहते हैं, “स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव इंग्लैंड तक भी पहुँच गया और सावरकर ने ‘इंडियन हाउस’ नाम से एक घर खोला। मदनलाल भी इसके सदस्य बन गए। एक दिन सावरकर और मदनलाल ढींगरा लंबे समय से बात कर रहे थे। अपने प्राण त्यागने की हिम्मत की परीक्षा में, सावरकर ने मदनलाल को ज़मीन पर हाथ रखने के लिए कहकर एक बड़ी सुई से हाथ को छेद दिया, लेकिन पंजाबी वीर ने आह भी नहीं भरा। दोनों की आँखों में आँसू भर आए। दोनों ने एक-दूसरे को गले लगाया। आउच, वह कितना सुंदर समय था। कितना अमूल्य और अमिट अश्रु था। इतना शानदार। हमें उस भावना के बारे में पता होना चाहिए कि कायर लोग जो मृत्यु के विचार से ही डर जाते हैं। लेकिन दूसरे वे लोग कितने ऊँचे, कितने पवित्र और कितने पूज्य हैं, जो राष्ट्र की खातिर मरते हैं।”

अगले दिन से, ढींगरा भारतीय सदन भवन में नहीं गए और सर कर्जन विली द्वारा आयोजित भारतीय छात्रों की बैठक में भाग लिया। यह देखकर भारतीय लड़के बहुत उत्तेजित हो गए और उन्हें देशद्रोही, यहाँ तक कि गद्दार कहना शुरू कर दिया, लेकिन सावरकर ने उनका गुस्सा यह कहते हुए शांत कर दिया कि आखिरकार उन्होंने हमारे घर को चलाने के लिए अपना सिर भी तोड़ने की कोशिश की थी और उसकी मेहनत के कारण हमारा आंदोलन चल रहा है। इसलिए हमें उसका धन्यवाद करना चाहिए। खैर, कुछ दिन चुपचाप बीत गए।

1 जुलाई, 1909 को इंपीरियल इंस्टीट्यूट के जहाँगीर हॉल में एक बैठक हुई। सर कर्जन विली भी वहाँ गया। वह दो अन्य लोगों से बात कर रहा था कि ढींगरा ने अचानक पिस्तौल निकाली। उसे हमेशा के लिए सुलाने के लिए तान दिया। फिर कुछ संघर्ष के बाद ढींगरा को पकड़ा गया। उसके बाद क्या कहना, दुनिया भर में रोष था। सभी ने ढींगरा को पूरे दिल से गाली देना शुरू कर दिया।

उनके पिता ने पंजाब से एक तार भेजा और कहा कि मैं अपने बेटे को इस तरह के विद्रोही और हत्यारे आदमी के पूर में स्वीकार करने से इनकार करता हूँ। भारतीयों ने बड़ी बैठकें कीं। बड़े भाषण थे। बड़े प्रस्ताव आए। सब निंदा में। लेकिन उस समय भी सावरकर ही ऐसे नायक थे, जिन्होंने उनका खुलकर समर्थन किया। सबसे पहले, उन्होंने उनके खिलाफ प्रस्ताव पास न होने देने के लिए एक बहाना पेश किया कि वह अभी भी मुकदमे में हैं और हम उन्हें दोषी नहीं कह सकते। अंत में जब इस प्रस्ताव पर वोट डाला गया तो सदन के अध्यक्ष बिपिन चंद्र पॉल कह रहे थे कि अगर इसे सर्वसम्मति से सभी द्वारा पारित माना जाता है, तो सावरकर ने खड़े होकर व्याख्यान देना शुरू कर दिया। तभी एक अंग्रेज ने उनके मुँह पर घूँसा मारते हुए कहा, “देखो अंग्रेजी घूँसा कितना सीधा लगता है।” पीछे से एक हिंदुस्तानी युवक ने अंग्रेज के सिर पर डंडा मार दिया और कहा, “देखो भारतीय डंडा कितना सीधा चलता है।” वहाँ शोरगुल था। बैठक बीच में ही छोड़ दिया गया था। प्रस्ताव पास नहीं हुआ।

1926 में भगत सिंह ने पंजाबी हिंदी साहित्य सम्मेलन के लिए एक लेख लिखा। वह कहते हैं, “मुस्लिमों में भारतीयता का बहुत अभाव है। इसलिए वे सभी भारतीयता के महत्व को नहीं समझते हैं और अरबी एवं फारसी लिपि को पसंद करते हैं। पूरे भारत की एक भाषा होनी चाहिए और वह भी हिंदी। जिसे वे कभी नहीं समझते हैं, इसलिए वे अपनी उर्दू की प्रशंसा करते रहते हैं और एक तरफ बैठते हैं।” आगे उसी लेख में भगत सिंह कहते हैं, “हम चाहते हैं कि मुस्लिम भाई भी अपनी आस्था का पालन करें, लेकिन भारतीय भी उसी तरह से बनें जैसे कमाल तुर्क। हाँ, यही केवल भारत को बचाएगा। हमें भाषा आदि के प्रश्नों को एक बहुत बड़े दृष्टिकोण के साथ देखना चाहिए, न कि इसे मार्मिक (धार्मिक) समस्याएँ बनाकर।”

भगत सिंह द्वारा प्रस्तुत ये विचार न केवल सावरकर के विचारों के अनुरुप हैं, बल्कि गुरुजी के ‘विचारों का गुच्छा’ के अनुसार भी है। यह साबित हुआ कि भगत सिंह ने सावरकर की पुस्तक “1857- स्वतंत्रता का युद्ध” का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया और इसे क्रांतिकारियों के बीच प्रचारित किया गया। कुछ लेखकों ने दावा किया है कि सावरकर और भगत सिंह की मुलाकात रत्नागिरी में हुई थी, लेकिन इसकी कोई निर्विवाद पुष्टि नहीं हुई।

गाँधीजी के अनुयायी वाईडी फड़के के अनुसार, भगत सिंह ने सावरकर की ‘1857’ से प्रेरणा ली, लेकिन सावरकर की ‘हिंदुपदपादशाही’ को अनदेखा कर दिया। लेकिन अब यह भी पता चला है कि भगत सिंह ने भी हिंदुपदपादशाही से प्रेरणा ली थी। वह अपनी जेल डायरी में कई लेखकों के उद्धरणों को नोट करते हैं। इसमें केवल सात भारतीय लेखक शामिल हैं, लेकिन उनमें से केवल एक सावरकर हैं, जिनकी भगत सिंह ने अपनी डायरी में एक से अधिक उद्धरण शामिल किए हैं और सभी 6 के 6 उद्धरण एक ही किताब हिंदुपदपादशाही से है। जो कि इस प्रकार हैं-

  1. बलिदान केवल आराध्य था, जब यह सीधे या दूर से था, लेकिन यथोचित रुप से सफलता के लिए अपरिहार्य लगा। बलिदान जो अंतत: सफलता की ओर नहीं ले जाता है, वह आत्मघाती है और इशलिए मराठा युद्ध की रणनीति में कोई स्थान नहीं था। (हिंदुपदपादशाही पृष्ठ 256)
  2. मराठों से लड़ना हवा से लड़ने जैसा है, पानी पर वार करना है। (हिंदुपदपादशाही पृष्ठ 258)
  3. जो हमारी उम्र की निराशा बनी हुई है, जिसे इतिहास को बिना लिखे, वीरता पूर्ण कार्य करने की क्षमता और अवसरों के बिना उन्हें जीवन में वास्तविक रुप देने के लिए गाना है। (हिंदुपदपादशाही पृष्ठ 245)
  4. राजनीतिक दासता को किसी समय आसानी से उखाड़ फेंका जा सकता है लेकिन सांस्कृतिक वर्चस्व की बेड़ियों को तोड़ना मुश्किल है। (हिंदुपदपादशाही पृष्ठ 242-43)
  5. कोई स्वतंत्रता नहीं! जिनकी मुस्कान से हम सभी इस्तीफा नहीं देंगे। जाओ हमारे आक्रमणकारियों, Danes को बताएँ, यह आपके मंदिर में एक उम्र के रक्त के लिए मीठा है। सोने से पहले लेकिन जंजीरों में एक मिनट। (हिंदुपदपादशाही पृष्ठ 219)
  6. बदले की आग में मर जाओ, यह उस समय हिंदुओं के बीच प्रचलित कॉल था। लेकिन रामदास उठकर खड़ा हो गया। नहींं, इस प्रकार नहीं। रुपांतरित होने के बजाय मारा जाना काफी अच्छा है, लेकिन उससे बेहतर है कि न तो मारे जाएँ और न ही हिंसक रुपांतरित हों। बल्कि हिंसक ताकतों को मारें और धार्मिकता के कारण पर विजय प्राप्त करने के लिए मारते हुए मारे जाएँ। (हिंदुपदपादशाही पृष्ठ 1141-62)

भगत सिंह द्वारा प्रस्तुत समाजवादी हिंदुस्तान के विज्ञान आधारित राष्ट्र का चित्रण सावरकर के विज्ञान आधारित हिंदुस्तान के करीब है। नेहरू के प्रतिपादन का उनका समर्थन कि वे कुरान और वेद अलग-अलग रखकर विज्ञान को स्वीकार करते हैं, हमें सावरकर द्वारा इसी तरह के प्रतिपादन की याद दिलाते हैं। अपने 750 पन्नों के लेख में भगत सिंह ने सावरकर, उनके हिंदुत्व या ब्रिटिश परिस्थितियों को स्वीकार करने की आलोचना नहीं की है। बहरहाल, उन्होंने हिंदुओं के पक्ष में मुस्लिमों की हत्या का समर्थन करने वाले दंगाइयों की आलोचना की है। लेकिन वे सावरकर के लिए अभिप्रेत नहीं हैं और सावरकर पर भी लागू नहीं होते हैं। भगत सिंह के सहयोगी यशपाल ने कहा है कि सावरकर बंधु क्रांतिकारी आंदोलन में हमारे नेता थे।

सावरकर और भगत सिंह दोनों ने काकोरी कांड पर लेख लिखे हैं। दोनों के पहले लेखों में अशफाक का उल्लेख नहीं है। सावरकर ने बाद में अशफाक पर एक और लेख लिखा है। भगत सिंह ने अपने दूसरे लेख में अशफाक का उल्लेख किया है। मदनलाल, अंबाप्रसाद, बालमुकुंद, सचिंद्रनाथ, कूका जैसे क्रांतिकारी सावरकर और भगत सिंह दोनों के लेखन के विषय हैं। सावरकर ने लाला लाजपतराय पर 20 दिसंबर 1928 को हुए हमले की निंदा करते हुए एक लेख लिखा था। हमले में लगी चोटों से लाला लाजपतराय की मौत हो गई। इस से बदला लेने के लिए सांडर्स को भगत सिंह और उनके साथियों ने मार डाला। महात्मा गाँधी ने इसे कायरतापूर्ण कृत्य बताया। सावरकर ने 19 जनवरी 1929 को गाँधी जी के कथन की आलोचना करते हुए एक लेख लिखा। साथ ही, उन्होंने लाला लाजपतराय के साहित्य पर भी एक प्रसिद्ध लेख लिखा।

सावरकर ने अपने साहित्य में भगत सिंह और उनके साथियों का कई बार उल्लेख किया है। सावरकर के श्रद्धानंद में ‘आतंक का असली मतलब’ शीर्षक से एक लेख मई 1928 में भगत सिंह और उनके सहयोगियों द्वारा कीर्ति में प्रकाशित किया गया था। भगत सिंह और साथियों के समर्थन में वीर सावरकर द्वारा लिखित एक लेख का शीर्षक ‘सशस्त्र लेकिन अत्याचारी’ बम के दर्शन के नाम पर इसी तरह का एक लेख भगत सिंह और वोरा द्वारा 26 जनवरी, 1930 को प्रकाशित किया गया था। फड़के का कहना है कि इस तरह के लेखों के साथ सावरकर युवाओं के दिलों में चिंगारी भड़का रहे थे। 8 अक्टूबर, 1930 को सावरकर के सहयोगी पृथ्वी सिंह आजाद और भगत सिंह के सहयोगी दुर्गाभि ने मुंबई के एक हवलदार के यहाँ शूटिंग की। इससे सावरकर के निरोध के कार्यकाल में वृद्धि हुई। 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दे दी गई। उस समय भी सावरकर ने एक कविता लिखी थी।

रत्नागिरी में सावरकर के घर पर हमेशा भगवा झंडा फहराया जाता था। उनके घर का पता केवल इशी से पहचाना जा सकता था। हालाँकि, 24 मार्च को सावरकर को घर पर एक काले झंडे को प्रदर्शित किया गया था। इसे समझना सरकार के लिए मुश्किल नहीं था। सावरकर द्वारा लिखे गए कविता को गाते हुए रत्नागिरी के बच्चों ने 24 मार्च को एक जुलूस निकाला, जब सावरकर वरवडे नामक एक गाँव में आए। उन्होंने 25 मार्च को वापसी की और काला झंडा फहराया। सावरकर ने चार महीने के भगत सिंह को याद करते हुए एक लेख प्रकाशित किया। मौका था नेपाली आंदोलन का। भगत सिंह, शिव वर्मा, वोरा आदि के अन्य साथियों ने भी क्रांतिकारियों पर सावरकर के प्रभाव के बारे में लिखा गया है।

नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की आवश्यकता

नए बने नागरिकता संशोधन कानून को लेकर असमवासी बांग्लादेशी हिंदुओं और त्रिपुरावासी चकमा बौद्धों को मिलने वाली नागरिकता से और भारत का समुदाय विशेष पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के ‘घुसपैठिए’ मजहबियों को नागरिकता न मिलने से सर्वाधिक आशंकित और आतंकित हैं। जबकि राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर बनने और उसके प्रभावी हो जाने पर बाहर जाने वाले “घुसपैठियों” की संख्या के अनुपात में नागरिकता संशोधन कानून के उपरोक्त “लाभार्थी” बहुत ही कम हैं। साथ ही, धार्मिक आधार पर प्रताड़ित अपने पूर्वनागरिकों को शरण और नागरिकता देना भारत का संवैधानिक और मानवीय दायित्व भी है।

विपक्ष पूर्वोत्तर भारत में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के आधारस्वरूप वहाँ की भूमि, साधनों-संसाधनों, रोजगार-व्यापार में इस कानून के तहत नागरिकता हासिल करने वाले हिंदुओं, सिखों, जैनों,बौद्धों, ईसाइयों और पारसियों की भागीदारी का डर दिखाकर मूलवासियों को भड़का रहा है। इसके अलावा उनकी भाषा, संस्कृति, खान-पान, रीति-रिवाज, मत-मान्यताओं आदि की विशिष्टता की समाप्ति का डर भी दिखाया जा रहा है। वहीं दूसरी ओर, शेष भारत में मजहब विशेष को इस कानून के दायरे में शामिल न करने को मुद्दा बनाकर सांप्रदायिक दंगों की साजिश रची जा रही है। जबकि सच्चाई यह है कि पूर्वोत्तर भारत की उपरोक्त जो भी चिंताएँ हैं, उनका सबसे बड़ा कारण घुसपैठिया समुदाय ही रहा है। वह चाहे बांग्लादेशी घुसपैठिए हों, या फिर रोहिंग्या।

पूर्वोत्तर की भूमि और संसाधनों पर छल-बलपूर्वक कब्ज़ा करने वालों में यही लोग “बहुसंख्यक” हैं। इन्होंने जो घुसपैठ की है, वह भी किसी धार्मिक प्रताड़ना या भेदभाव या विवशता के कारण नहीं, बल्कि भारत देश (सीमावर्ती पूर्वोत्तर) में मौजूद अवसरों और संभावनाओं को हड़पने के लिए स्वेच्छा से की है। इसप्रकार विपक्ष के ये विरोधाभासी तर्क हैं जो वह एकसाथ दे रहा है और स्थान विशेष और समुदाय विशेष के अनुरूप रणनीतिक रूप से भ्रम फैलाकर राजनीतिक लाभ लेना चाह रहा है।

पूर्वोत्तर के संदर्भ में एक बात स्पष्ट कर देना और जरूरी है कि नागरिकता संशोधन कानून छठी अनुसूची के दायरे में आने वाले क्षेत्रों/राज्यों में लागू नहीं होगा। छठी अनुसूची असम के कई आदिवासी बहुल जिलों सहित पूर्वोत्तर के बड़े हिस्से को स्वायत्तता देती है। यह स्वायत्तता उन्हीं क्षेत्रों को प्रदान की गई है जिनकी भाषा, संस्कृति, रीति-रिवाज, खान-पान,पोशाक आदि विशिष्ट हैं और जिन्हें संरक्षित किया जाना आवश्यक है। इस प्रकार ये विशिष्ट क्षेत्र इस कानून के दायरे से बाहर रहने के कारण अप्रभावित रहेंगे। नागरिकता संशोधन कानून का यह प्रावधान पूर्वोत्तर भारत की भाषा, संस्कृति और विशिष्टता पर तथाकथित हमले/खतरे संबंधी विपक्ष के दुष्प्रचार का भी पर्दाफाश करता है। वस्तुतः, विपक्ष नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के संदर्भ में भ्रम और भय फैला रहा है जोकि चिंताजनक और निंदनीय है। उसके लिए निहित राजनीतिक स्वार्थ राष्ट्रीय हित से ऊपर हो गए हैं।

इस पृष्ठभूमि के साथ राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर और नागरिकता संशोधन कानून की ऐतिहासिक जरूरत और महत्त्व को समझना आवश्यक है। वस्तुतः यह रजिस्टर देश के नागरिकों की पहचान और रिकॉर्ड के लिए ही बनाया जा रहा है ताकि देश के साधनों-संसाधनों पर उन्हीं का अधिकार और हिस्सेदारी सुनिश्चित की जा सके। यह घुसपैठियों से त्रस्त पूर्वोत्तर भारत (खासकर असम) के लोगों की बहुत पुरानी और न्यायसंगत माँग रही है।

राष्ट्रव्यापी “राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर” बनाने और उसे लागू करने से पहले नागरिकता संशोधन कानून बनाया जाना अत्यंत संवेदनशील और सकारात्मक निर्णय है। यह कानून बन जाने से तीन पड़ोसी इस्लामिक देशों के धार्मिक आधार पर प्रताड़ित छह अल्पसंख्यक समुदायों के अभागे लोगों को आश्रय मिल सकेगा और इन धार्मिक भेदभाव और उत्पीड़न के शिकार पूर्व-नागरिकों को उनका वह अधिकार, सम्मान और सुरक्षा मिल सकेगी, जिससे वे भारत की स्वाधीनता से आजतक वंचित रहे हैं। जिन नवगठित इस्लामिक पड़ोसी देशों के वे निवासी थे, वहाँ के बहुसंख्यकों और सरकारों ने उन्हें उनके नागरिक और मानव अधिकारों से वंचित कर दिया। नागरिकता संशोधन कानून इसी ऐतिहासिक अन्याय और अपराध का परिशोधन है। अब उनका भी नाम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में शामिल हो सकेगा। उल्लेखनीय है कि इस कानून के सर्वाधिक लाभार्थी दलित-वंचित हैं।

देश के सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशन और निगरानी में की गई ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ की निर्माण-प्रक्रिया के तहत असम में 30 जुलाई, 2018 को ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एन.आर.सी.)’ का अंतिम ड्राफ्ट जारी कर दिया गया है। इस रजिस्टर में सूचीबद्ध होने के लिए असम में 3.29 करोड़ लोगों ने आवेदन किया था, जिसमें से 40.07 लाख आवेदकों को जगह नहीं मिली है। ये लोग ऐसा कोई भी प्रमाण सरकार के समक्ष प्रस्तुत नहीं कर पाए हैं जिससे यह सिद्ध हो सके कि वे लोग भारत के मूल नागरिक हैं। इसका अर्थ है कि वे लोग भारत में गैरकानूनी तरीके से घुसपैठ कर यहाँ के मूल नागरिकों की भूमि, उनके संसाधनों आदि पर कब्ज़ा जमाए हुए हैं।

ज्ञात हो कि भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान राष्ट्रवादी सरकार भी अपने देश, विशेषकर असम सहित पूर्वोत्तर के मूल नागरिकों के इन अधिकारों की रक्षा करने तथा गैरकानूनी तरीके से भारत में मौजूद घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने के लिए इस ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ को अद्यतन (अपडेट) करना चाहती है। इसके बाद से ही समूचे देश में संसद से लेकर सड़क तक हंगामा मचा हुआ है। एकसाथ सभी विपक्षी दल और राष्ट्र-विरोधी तत्व सरकार के खिलाफ़ हमलावर हो गए हैं। इन प्रायोजित विरोधों को ध्यान में रखते हुए सरकार की ओर से लगातार यह स्पष्ट किया जा रहा है कि असम के लिए तैयार ‘राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण’ का मसौदा पूरी तरह निष्पक्ष है। जिन भारतीय नागरिकों का नाम इसमें सूचीबद्ध नहीं है, उन्हें घबराने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उन्हें भारतीय नागरिकता साबित करने का अवसर पुनः दिया जाएगा।

उल्लेखनीय है कि मतदाता पहचान पत्र और आधार कार्ड बनाने के दौरान भी लोगों को काफी असुविधा हुई थी और उन्हें व्यापक परेशानी का सामना करना पड़ा था। किन्तु काफी जद्दोजहद और मशक्कत के बाद जब ये बनकर तैयार हो गए हैं, तो इनसे बहुत अधिक लाभ हो रहा है। यह एक सर्वविदित तथ्य है। मतदाता पहचान पत्र की निष्पक्ष चुनाव में बड़ी भूमिका है। इसी प्रकार आधार कार्ड ने तमाम सरकारी योजनाओं के फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ किया है। इसमें सरकारी नौकरियों में छद्म कर्मचारियों की उपस्थिति से लेकर छात्रवृत्ति, मनरेगा आदि के घोटाले और दुरुपयोग का पर्दाफाश शामिल है।

आखिर यह ‘राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (एनआरसी)’ क्या है? ‘राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (एनआरसी)’ एक ऐसा रजिस्टर है, जिससे यह ज्ञात होता है कि कौन लोग भारतीय नागरिक हैं और कौन नहीं हैं। जिन लोगों का नाम इस रजिस्टर में सूचीबद्ध नहीं होगा, उन्हें अवैध नागरिक माना जाएगा। ‘राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण (एनआरसी)’ का पहला रजिस्टर सन 1951 में जारी हुआ था। असम पहला राज्य है जहाँ भारतीय नागरिकों के नाम सूचीबद्ध करने के लिए 1951 के बाद एनआरसी को अपडेट किया जा रहा है। इसके हिसाब से 25 मार्च, 1971 से पहले असम में रह रहे लोगों को भारतीय नागरिक माना गया है।

असम में बांग्लादेश से आए घुसपैठियों पर मचे बवाल के बाद सुप्रीम कोर्ट ने एनआरसी अपडेट करने को कहा था। ये रजिस्टर असम का मूल निवासी होने का सर्टिफिकेट है। इस मुद्दे पर असम में कई बड़े और हिंसक आंदोलन हुए हैं। 1947 में बँटवारे के बाद असम के लोगों का पूर्वी पाकिस्तान में आना-जाना जारी रहा। 1979 में असम में घुसपैठियों के खिलाफ ‘ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन’ ने आंदोलन किया। इसके बाद 1985 को तब की केंद्र की राजीव गाँधी सरकार ने ‘असम गण परिषद’ से समझौता किया जिसे “असम समझौता (accord) के नाम से जाना जाता है। इसके तहत 25 मार्च,1971 से पहले जो भी बांग्लादेशी असम में आए हैं, उन्हें ही भारत की नागरिकता दी जाएगी। हालाँकि, तब इस पर काम शुरू नहीं हो सका। सन 2005 में कॉन्ग्रेस पार्टी की सरकार ने इस पर काम शुरू किया था। 2015 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर इसमें तेजी आई। इसके बाद असम में नागरिकों के सत्यापन का काम आरंभ किया गया है।

राज्यभर में एनआरसी केंद्र खोले गए हैं। असम का नागरिक होने के लिए वहाँ के लोगों को दस्तावेज सौंपने थे। विपक्षी पार्टियाँ अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए लगातार यह भ्रम फैला रही हैं कि राज्य सरकार इसमें मनमानी कर रही है। साथ ही यह डर भी फैला रही हैं कि जिनके नाम इस रजिस्टर में सूचीबद्ध नहीं हैं, उनको बिना सुनवाई के तत्काल “देशनिकाला” दे दिया जाएगा और उन्हें देश से विस्थापित कर दिया जाएगा। इन वर्गों को भ्रमित किया जा रहा है कि उन्हें राज्य प्रदत्त सुविधाओं और संवैधानिक अधिकारों से वंचित कर दिया जाएगा – विपक्षी पार्टियों द्वारा कही जाने वाली ये बातें राजनीति से प्रेरित हैं और असत्य और अफवाह हैं।

यह भारतवासियों में डर, असुरक्षा और अनिश्चितता फैलाने की साजिश है। भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान सरकार देश में पहले से नागरिकता प्राप्त दूसरे मजहब वालों को भी भारत से बाहर निकाल फेंकेगी। गरीबों, दलितों और अल्पसंख्यकों को सर्वाधिक डराया जा रहा है कि उनके पास दस्तावेजों का अभाव उन्हें “घुसपैठिया” साबित कर देगा।

वास्तव में, देश से वही लोग बाहर निकाले जाएँगे जो गैरकानूनी तरीके से भारत में घुसपैठ करके रह रहे हैं। अर्थात यह रजिस्टर घुसपैठियों को चिह्नित करने के लिए अद्यतन किया जा रहा है। घुसपैठियों को बाहर निकालने की माँग असम की जनता वर्षों से करती आ रही है। क्योंकि असम की भूमि और संसाधनों पर इन घुसपैठियों को बसाने के कुकृत्य की जिम्मेदार विपक्षी सरकारें रही हैं। ऐसा उन्होंने तुष्टिकरण की नीति और वोट बैंक की राजनीति के तहत लगातार किया है। अभी भड़काई जा रही हिंसा और अशांति का वास्तविक कारण भी यही है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश और असम की जनता की अपेक्षाओं-आकांक्षाओं और माँग को पूरा करने के लिए इस राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को अद्यतन किया जा रहा है।

असम के बाद इसे पूरे देश में लागू करने के लिए भी भारत सरकार कृतसंकल्प है ताकि घुसपैठियों की समस्या से राष्ट्रीय स्तर पर भी निपटा जा सके। भारत सरकार इस बात को भी बार-बार स्पष्ट करती आ रही है कि जिन लोगों का नाम इस रजिस्टर में सूचीबद्ध नहीं हो पाया है, या हो पाएगा उन्हें पुनः अवसर दिया जाएगा और उनकी निष्पक्ष सुनवाई की जाएगी। सरकार ने नीति बनायी है कि लोगों को अपना दावा प्रस्तुत करने और आपत्तियों के निवारण के लिए न्यायालय और विदेशी न्यायाधिकरण के पास जाने का भी समुचित अवसर दिया जाएगा। उनके दावों और आपत्तियों के निस्तारण के बाद ही अंतिम रूप से एनआरसी जारी किया जाएगा। किसी भी भारतीय नागरिक को नागरिकता से वंचित न होने देना भारत सरकार का संवैधानिक कर्तव्य है।

इसमें किसी जाति, धर्म, क्षेत्र के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा। साथ ही, अवैध घुसपैठियों की पहचान करना और उनको राष्ट्रीय साधनों-संसाधनों पर बोझ न बनने देना भी सरकार का उतना ही बड़ा कर्तव्य और जिम्मेदारी है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि अभी तक की सरकारें अपने इस राष्ट्रीय कर्तव्य के निर्वाह में विफल रही हैं। आज बड़ी भारी संख्या में देश में घुसपैठिए मौजूद हैं और वे न सिर्फ राष्ट्रीय संसाधनों का उपभोग कर रहे हैं बल्कि अनेक प्रकार की आपराधिक और गैरकानूनी गतिविधियों में भी संलग्न हैं।

पिछले दिनों असम के ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी)’ के दूसरे और अंतिम मसौदे को भी जारी कर दिया गया है। एनआरसी में सूचीबद्ध होने के लिए आवेदन किए गए 3.29 करोड़ लोगों में से 2.89 करोड़ लोगों के नाम सूचीबद्ध हैं। इस प्रक्रिया के दौरान लगभग 40 लाख ऐसे लोग चिह्नित किए गए हैं जो अपने भारतीय नागरिक होने का कोई भी प्रमाणिक दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर पाए हैं। इनमें नागरिकता संशोधन कानून के “लाभार्थियों” की संख्या मात्र 10 प्रतिशत के आसपास है।

इसके बावजूद देश में मौजूद “सभी घुसपैठियों” को नागरिकता की वकालत करने वाला विपक्ष असम में इन नगण्य लाभार्थियों को नागरिकता देने पर हंगामा कर रहा है। जबकि ये सभी धार्मिक उत्पीड़न और भेदभाव के शिकार हैं और विवशता में अपना घर-बार, खेत-जमीन, व्यापार-कारोबार छोड़कर अपनी मातृभूमि भारत वापस आए हैं।

यह जानना जरूरी है कि आखिर एनआरसी सबसे पहले असम में ही क्यों लागू किया जा रहा है और इसे लेकर इतना विवाद क्यों हो रहा है? इसे समझने के लिए असम राज्य के गठन के इतिहास का संक्षिप्त अवलोकन करना अनिवार्य है। वास्तव में, असम देश का इकलौता राज्य है, जहाँ सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर एनआरसी बनाया गया है। असम में आजादी के बाद 1951 में पहली बार ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन’ बना था। यहाँ यह समझना अनिवार्य है कि 1905 में जब अंग्रेजों ने बंगाल का विभाजन किया, तब पूर्वी बंगाल और असम के रूप में एक नया प्रांत बनाया गया था। उस समय असम को पूर्वी बंगाल से जोड़ा गया था।

जब देश का विभाजन हुआ तो यह भय भी पैदा हो गया था कि कहीं इसे पूर्वी पाकिस्तान के साथ जोड़कर भारत से अलग न कर दिया जाए। उस समय गोपीनाथ बारदोलोई की अगुवाई में ‘असम विद्रोह’ आरंभ हुआ। असम अपनी रक्षा करने में सफल रहा। लेकिन उस समय सिलहट पूर्वी पाकिस्तान में चला गया। 1950 में असम देश का राज्य बना। हमें ज्ञात है कि ये रजिस्टर 1951 की जनगणना के बाद तैयार किया गया और इसमें तब के असम के रहने वाले लोगों को सूचीबद्ध किया गया था।

वास्तव में, अंग्रेजों के जमाने में चाय बागानों में काम करने और खाली पड़ी जमीन पर खेती करने के लिए बिहार और बंगाल के लोग असम जाते रहते थे, इसलिए वहाँ के स्थानीय लोगों का विरोध इन बाहरी लोगों से बना रहता था। 50 के दशक में ही बाहरी लोगों का असम आना राजनीतिक मुद्दा बनने लगा। किन्तु स्वतंत्रता के पश्चात् भी तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान और बाद के बांग्लादेश से असम में लोगों के अवैध तरीके से आने का क्रम जारी रहा। इसे लेकर थोड़ी बहुत आवाज उठती रही, किन्तु इस मुद्दे ने खास तूल नहीं पकड़ा। स्थिति तब अधिक संकटग्रस्त हुई जब उस समय के पूर्वी पाकिस्तान यानी बांग्लादेश में भाषा विवाद को लेकर आंतरिक संघर्ष शुरू हो गया। उस समय पूर्वी पाकिस्तान में परिस्थितियाँ इतनी हिंसक हो गईं कि वहाँ रहने वाले दोनों ही समुदायों की बड़ी संख्या ने भारत में प्रवेश किया।

वास्तव में, 1971 में जब पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना ने दमनकारी कार्रवाई शुरू की, तो करीब 10 लाख लोगों ने बांग्लादेशी सीमा पार करके अवैध तरीके से असम में प्रवेश किया। आगे चलकर जब 16 दिसंबर, 1971 को बांग्लादेश को एक स्वतंत्र देश घोषित कर दिया गया, उसके कुछ दिन बाद वहाँ हिंसा में कुछ कमी आई। हिंसा कम होने पर बांग्लादेश से भारत में प्रवेश किए बहुत सारे लोग अपने वतन लौट गए, लेकिन फिर भी लाखों की संख्या में लोग असम में रुक गए। 1971 के बाद भी बड़े पैमाने पर बांग्लादेशियों का असम में घुसपैठ करना जारी रहा। जनसंख्या में होने वाले इस बदलाव ने असम के मूल निवासियों में भाषाई, सांस्कृतिक और राजनीतिक असुरक्षा की भावना पैदा कर दी। 1978 के आसपास इस राज्य में असमिया अस्मिता को लेकर एक शक्तिशाली आंदोलन खड़ा हो गया। इस आन्दोलन का नेतृत्व असम के युवाओं और छात्रों ने किया।

इस समय दो संगठन आंदोलन के नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरे। ये दोनों संगठन ‘ऑल असम स्टूडेंट यूनियन’ और ‘ऑल असम गण संग्राम परिषद’ थे। इस दौरान होने वाले असम विधानसभा के चुनाव में देखा गया कि मतदाताओं की संख्या में अचानक गुणात्मक बढ़ोतरी हो गई है। इसने स्थानीय स्तर पर गहरा आक्रोश पैदा किया। माना गया कि बाहरी लोगों, विशेष रूप से बांग्लादेशी घुसपैठियों के कारण ही इस क्षेत्र में मतदाताओं की संख्या में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। हालाँकि, स्थानीय विरोध को दरकिनार करते हुए तत्कालीन कॉन्ग्रेस पार्टी की सरकार ने इन सारे लोगों को वोटर लिस्ट में सूचीबद्ध करवा लिया।

केंद्रीय नेतृत्व के इस व्यवहार से स्थानीय लोगों में आक्रोश और बढ़ गया। इसके विरोध में ‘ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू)’ और ‘असम गण संग्राम परिषद’ के नेतृत्व में लोग सड़कों पर उतर गए। ज्ञात हो कि एक छात्र संगठन के रूप में ‘आसू’ अंग्रेजों के समय से ही अस्तित्व में था। उस समय उसका नाम ‘अहोम छात्र सम्मिलन’ था। 1940 में ‘अहोम’ दो भागों में विभक्त हो गया, लेकिन 1967 में दोनों धड़े आपस में मिल गए और संगठन का नाम रखा गया ‘ऑल असम स्टूडेंट्स एसोसिएशन’। बाद में इसका नाम बदलकर ‘ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू)’ कर दिया गया। वहीं, ‘असम गण संग्राम परिषद’ क्षेत्रीय राजनीतिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक समूहों का एक संगठन बन गया, जो असम में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान आदि इस्लामिक देशों से आए घुसपैठियों के विरोध में मुखर हो रहा था। ‘आसू’ और ‘असम गण संग्राम परिषद’ के चलाए इन आंदोलन का असमिया भाषा-भाषी हिंदुओं, समुदाय विशेष और बहुत से बंगालियों ने समर्थन किया।

इस दौरान आंदोलन के नेताओं और मूल असमवासियों ने यह दावा किया कि राज्य की जनसंख्या का 31 से 34 प्रतिशत हिस्सा बाहर से आए घुसपैठियों का है। उन्होंने केंद्र सरकार से माँग की कि वे असम की सीमाओं को सील करें, बाहरी लोगों की पहचान करें और उनके नाम मतदाता सूची से हटाए जाएँ। जब तक ऐसा नहीं होता है, असम में कोई चुनाव न करवाया जाए। इसके अतिरिक्त आंदोलन करने वालों ने यह माँग भी रखी कि 1961 के बाद राज्य में जो भी लोग आए हैं, उन्हें उनके मूल राज्य/देश में वापस भेज दिया जाए। ऐसे लोगों में बांग्लादेशियों के अलावा बिहार और बंगाल से आए लोगों की संख्या भी अच्छी-खासी थी।

जब केंद्र सरकार ने 1983 में असम में विधानसभा चुनाव करवाने का फैसला लिया, तो आंदोलन से जुड़े संगठनों ने इसका बहिष्कार किया। हालाँकि, चुनाव हुए, लेकिन जिन क्षेत्रों में असमिया भाषी लोगों का बहुमत था, वहाँ तीन प्रतिशत से भी कम वोट पड़े। राज्य में आदिवासी, भाषाई और सांप्रदायिक पहचान के नाम पर जबरदस्त हिंसा हुई, जिसमें तीन हजार से भी ज्यादा लोग मारे गए।

लंबे समय तक समझौता-वार्ता चलने के बावजूद आंदोलन के नेताओं और केंद्र सरकार के बीच कोई सहमति नहीं बन सकी, क्योंकि यह बहुत ही जटिल मुद्दा था। यह तय करना आसान नहीं था कि कौन घुसपैठिया है और ऐसे लोगों को कहाँ भेजा जाना चाहिए। इसी तरह 1984 में यहाँ के सोलह संसदीय क्षेत्रों से 14 संसदीय क्षेत्रों में चुनाव नहीं हो पाया। 1979 से 1985 के बीच राज्य में राजनीतिक अस्थिरता रही। राष्ट्रपति शासन भी लागू हुआ। लगातार आंदोलन होते रहे और कई बार इन आंदोलनों ने हिंसक रूप धारण कर लिया। राज्य में अभूतपूर्व जातीय हिंसा की स्थिति पैदा हो गई।

हालाँकि, इस दौरान आंदोलनकारियों और केंद्र सरकार के बीच बातचीत भी चलती रही, जिसके परिणामस्वरूप 15 अगस्त 1985 को केंद्र की तत्कालीन राजीव गाँधी सरकार और आंदोलनकारी नेताओं के बीच समझौता हुआ जिसे ‘असम समझौते’ के नाम से जाना जाता है। ‘असम समझौते’ के नाम से बने दस्तावेज पर भारत सरकार और असम आंदोलन के नेताओं ने हस्ताक्षर किए। इसमें ‘ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन’ की ओर से उसके अध्यक्ष प्रफुल्ल कुमार महंत, महासचिव भृगु कुमार फूकन और ‘ऑल असम गण संग्राम परिषद’ के महासचिव बिराज शर्मा शामिल हुए। साथ ही, भारत और असम के अन्य प्रतिनिधियों ने भी इसमें भागीदारी की। प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी भी इस दौरान मौजूद रहे। 15 अगस्त, 1985 को लाल किले की प्राचीर से राजीव गाँधी ने अपने भाषण में असम समझौते की घोषणा की।

इसके तहत 1951 से 1961 के बीच आए सभी लोगों को पूर्ण नागरिकता और वोट देने का अधिकार देने का निर्णय किया गया। यह निर्णय भी किया गया कि जो लोग 1971 के बाद असम में आए थे, उन्हें वापस भेज दिया जाएगा। 1961 से 1971 के बीच आने वाले लोगों को वोट का अधिकार नहीं दिया गया, किन्तु उन्हें नागरिकता के अन्य सभी अधिकार दिए गए। असम के आर्थिक विकास के लिए पैकेज की भी घोषणा की गई और वहाँ ऑयल रिफाइनरी, पेपर मिल और तकनीकी संस्थान स्थापित करने का फैसला किया गया। केंद्र सरकार ने यह भी फैसला किया कि वह असमिया-भाषी लोगों की सांस्कृतिक, सामाजिक और भाषाई पहचान की सुरक्षा के लिए विशेष कानूनी और प्रशासनिक उपाय करेगी। इसके बाद इस समझौते के आधार पर मतदाता-सूची में संशोधन किया गया।

विधानसभा को भंग करके 1985 में ही चुनाव कराए गए। इस चुनाव में आंदोलन का नेतृत्व करने वाले ‘ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू)’ और ‘असम गण संग्राम परिषद’ के नेताओं ने मिलकर एक नई पार्टी बनाई जिसका नाम था—‘असम गण परिषद’। इसका अध्यक्ष आसू के अध्यक्ष रहे प्रफुल्ल कुमार महंत को बनाया गया। ‘असम गण परिषद’ ने इस चुनाव में विधानसभा की 126 में से 67 सीटें जीतकर बहुमत हासिल किया। इसके बाद प्रफुल्ल कुमार महंत को मुख्यमंत्री बनाया गया। इस सरकार का कार्यकाल 1990 में खत्म होना था, जिसके बाद चुनाव होने थे। लेकिन सरकार का कार्यकाल खत्म होने के एक महीने पहले ही जनता दल के नेतृत्व में बनी विश्वनाथ प्रताप सिंह की केंद्र सरकार ने असम में राष्ट्रपति शासन लगा दिया।

विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर के बाद 1991 में जब केंद्र में नरसिम्हा राव की सरकार बनी तो एक बार फिर असम में चुनाव हुए और हितेश्वर सैकिया के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार बनी। 22 अप्रैल, 1996 को हितेश्वर सैकिया का निधन हो गया, जिसके बाद भूमिधर बर्मन मुख्यमंत्री बने। हालाँकि, 1996 के चुनावों में एक बार फिर ‘असम गण परिषद’ ने बाजी मार ली और प्रफुल्ल कुमार महंत को मुख्यमंत्री बनाया गया। 2001 के चुनाव में बाजी फिर कॉन्ग्रेस के हाथ लगी और तरुण गोगोई मुख्यमंत्री बने। लगातार तीन बार मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई के खिलाफ 2016 के चुनाव में भाजपा ने जीत हासिल की और उसके नेता श्री सर्बानंद सोनोवाल अभी मुख्यमंत्री हैं। श्री सर्वानंद सोनोवाल ने असम समझौते के कार्यान्वयन के लिए न्यायालय में लंबी लड़ाई लड़ी है।

जो असम समझौता हुआ था, उसके कार्यान्वयन का प्रारंभ 1999 में केंद्र की तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने किया जो कुछ समय बाद ही रुक गया। इसके बाद 5 मई, 2005 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने फैसला लिया कि एनआरसी को अपडेट किया जाना चाहिए। फिर इसकी प्रक्रिया शुरू हुई। गोगोई सरकार ने असम के बारपेटा और चायगाँव जैसे कुछ जिलों में पायलट परियोजना के रूप में एनआरसी अपडेट शुरू किया था, लेकिन राज्य के कुछ हिस्सों में हिंसा के बाद यह रोक दिया गया। इसके बाद राज्य की गोगोई सरकार ने मंत्रियों के एक समूह का गठन किया। उसका उत्तरदायित्व था कि वह असम के कई संगठनों से बातचीत करके एनआरसी को अपडेट करने में मदद करे। हालाँकि, इसका कोई फायदा नहीं हुआ और प्रक्रिया ठंडे बस्ते में चली गई।

बाद में असम पब्लिक वर्क नाम के एनजीओ सहित कई अन्य संगठनों ने 2013 में इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की। 2013 से 2017 तक के चार साल के दौरान असम के नागरिकों के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में कुल 40 सुनवाइयाँ हुईं, जिसके बाद नवंबर 2017 में असम सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि 31 दिसंबर, 2017 तक वह एनआरसी को अपडेट कर देगी। बाद में इसके लिए और समय की भी माँग की गई है, क्योंकि यह बेहद जटिल प्रक्रिया है। इसके साथ ही भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान राष्ट्रवादी सरकार इस बात के लिए कटिबद्ध है कि इस प्रक्रिया में किसी भी मूल असमवासी और भारतीय नागरिक के साथ अन्याय नहीं होने पाए। फिर वह चाहे अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक। हिन्दू हो या कथित अल्पसंख्यक। सबके साथ न्याय वर्तमान मोदी सरकार की प्राथमिकता है।

इस संकल्प के साथ 2015 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और निगरानी में ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ के अद्यतनीकरण का यह कार्य आरंभ हुआ और 2018 जुलाई में अंतिम प्रारूप पेश किया गया। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने, जिन 40 लाख लोगों के नाम लिस्ट में नहीं हैं, उन पर किसी तरह की कठोरता दिखाने के लिए तात्कालिक तौर पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। वहीं, चुनाव आयोग ने भी स्पष्ट किया है कि एनआरसी से नाम हटने का अर्थ यह नहीं है कि मतदाता सूची से भी वे नाम हटा दिए जाएँगे। उन्होंने कहा कि जनप्रतिनिधित्व कानून 1950 के तहत मतदाता के पंजीकरण के लिए तीन जरूरी अनिवार्यताओं में आवेदक का भारत का नागरिक होना, न्यूनतम आयु 18 साल होना और संबद्ध विधानसभा क्षेत्र का निवासी होना सम्मिलित है।

अभी केवल असम में एनआरसी यानी ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस’ ने अपनी पूर्ण सूची जारी की है। जिसमें 40 लाख लोगों को भारतीय नागरिकता नहीं दी गई है। जबकि 2 करोड़ 89 लाख लोगों को एनआरसी ने भारतीय नागरिक माना है। इसके बाद अब देश की भ्रष्ट विपक्षी राजनीतिक पार्टियों और राष्ट्र-विरोधी तत्वों द्वारा अपनी राजनीतिक स्वार्थसिद्धि के लिए देश के अल्पसंख्यक समुदाय में निरंतर भय और भ्रम फैलाया जा रहा है।

प्रश्न है कि आज जब भारतीय जनता पार्टी की वर्तमान राष्ट्रवादी सरकार कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी, राजीव गाँधी, मनमोहन सिंह और असम की जनता द्वारा चिह्नित किए गए इस खतरे को सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में दूर करना चाहती है, फिर वही कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके पिछलगुआ क्यों हिंसक विरोध पर उतारू हैं? क्या यह पाखण्ड और दोगलापन नहीं है? कॉन्ग्रेस पार्टी और उसकी पिछलगुआ पार्टियाँ अपने मिटते राजनीतिक अस्तित्व को बचाने के लिए प्रायोजित तरीके से भारत की आतंरिक शांति को भंग करना चाहती हैं और विश्व में निरंतर सम्मान प्राप्त कर रहे भारत की छवि को धूमिल करना चाहती हैं।

देश के साथ-साथ असम की युवा पीढ़ी को भारत और असम की भूमि, संसाधनों, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और व्यापार से वंचित करना चाहती हैं। यही कारण है कि देश की युवा पीढ़ी को इन षड्यंत्रों को समझना होगा और ‘राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर’ और ‘नागरिकता संशोधन कानून-2019’ जैसे अनिवार्य और भारत हितकारी कानूनों के प्रतिरोध में विपक्षी राजनीतिक स्वार्थियों के दुष्प्रचार और अफवाहों से दूर रहना होगा।

1192 में मोहम्मद गौरी के आक्रमण से प्रारम्भ हुई गुलामी के बाद से ही भारतभूमि का विदेशी आक्रांताओं ने शोषण किया है। ब्रिटिश शासन ने “फूट डालो, राज करो” की दुर्नीति से तो भारत-भूमि और भारतवासियों को ही खंडित कर दिया। ब्रिटिश शासन से भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति के इतिहास में देश-विभाजन के रक्तरंजित दुःखद अनुभव हैं जो मूलतः धर्म-आधारित ही थे और उन विभाजनों से पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे इस्लामिक गणतंत्रों का जन्म हुआ। मुस्लिम लीग ने अपने धर्म के लोगों के लिए अलग देश की माँग को पूरा कराने के लिए 16 अगस्त, 1946 को “Direct Action Day” की घोषणा कर कलकत्ता में भीषण दंगे कराए । जिसमें 72 घंटे के अन्दर ही 20,000 से अधिक लोग मारे गए और कई लाख हिन्दू बेघर हो गए ।

अनेक मासूम लड़कियों तथा महिलाओं के साथ उनके परिजनों के सामने ही सामूहिक बलात्कार किया गया तथा उनके परिवार वालों को मारकर अमानवीय शक्ति का प्रदर्शन किया गया। भारत विभाजन केवल धर्म आधारित था और सीमावर्ती मजहबी देशों में गैर मुस्लिमों के साथ जो अमानवीय प्रताड़ना हुई तथा होती रहती है उससे हम सब अच्छी तरह परिचित हैं। धर्म आधारित वह विभाजन इतना अधर्मजनक था कि जन-सामान्य की नागरिकता रातों-रात उनकी इच्छा के विपरीत ही परिवर्तित हो गई। इन मानवनिर्मित सीमा-रेखाओं के कारण रात में भारत में सोया व्यक्ति सुबह पाकिस्तान में जागा था ।

विभाजन के बाद के दोनों नए देशों के बीच विशाल जन-स्थानांतरण हुआ। पाकिस्तान में बहुत से हिन्दुओं और सिखों को बलात् बेघर कर दिया गया था। लेकिन भारत में गाँधी जी ने कॉन्ग्रेस पर दबाव डाला और सुनिश्चित किया कि मजहब विशेष वाले अगर चाहें तो भारत में रह सकते हैं और भारत ने उनको ऐसा सुरक्षित वातावरण दिया कि एक पंथनिरपेक्ष देश होते हुए भी उनकी धार्मिक भावनाओं को ध्यान में रखकर उन्हें पर्सनल लॉ तक की सुविधा प्रदान की। दूसरी तरफ भारत में सन् 1948 से धार्मिक प्रताड़ना के कारण लगातार विस्थापित लोगों की संख्या बढ़ रही है । सन् 1971 का नरसंहार तो इतना भयावह था कि उस समय बांग्लादेश से शरणार्थियों की मानो बाढ़-सी आ गई थी। सीनेटर कैनेडी के अनुसार सन् 1971 में कुल 10 मिलियन शरणार्थी भारत आए जिनमें से 80% हिन्दू थे ।

गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट 1988-89 के अनुसार सन् 1947 से 1971 तक 60,86,995 लोग भारत आए हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत भारतीय हिन्दुओं को तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरु ने आश्वस्त करते हुए कहा भी था– “राजनैतिक सीमाओं के कारण हमसे दूर हो चुके अपने भाइयो-बहनों… इनकी भी चिंता है, चाहे कुछ भी हो जाए वे हमारे हैं और हमारे ही रहेंगे, उनके सुख-दुःख में हम समान रूप से सहभागी होंगे और वे जब यहाँ आना चाहेंगे हम उनको स्वीकार करेंगे।” समय-समय पर सभी नेताओं ने यह माना है कि उन देशों में अल्पसंख्यकों पर धर्म के कारण अमानवीय अत्याचार हो रहें हैं और उनको वे भारत में पुनर्वास कराने को तत्पर हैं।

अल्पसंख्यकों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए 8 अप्रैल, 1950 को दोनों देशों के बीच “नेहरू-लियाकत” समझौता भी हुआ। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य धार्मिक अल्पसंख्यकों का भय कम करना, सांप्रदायिक दंगों को समाप्त करना और शांति का माहौल तैयार करना था। बावजूद इसके इन इस्लामिक देशों में हिन्दुओं, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी लोगों के साथ जो शारीरिक एवं मानसिक उत्पीड़न हुआ है वह सर्व विदित है उनको यहाँ पुनः उद्धृत करना आवश्यक नहीं है। उदहारण के रूप में पाकिस्तान के प्रथम कानून मंत्री श्री जोगेंद्रनाथ मंडल जी का त्यागपत्र को देखा जा सकता है जो उन्होंने पूर्व और पश्चिम पाकिस्तान में गैर-मुस्लिमों के खिलाफ बहुत ही भयावह हिंसा के विरोध में दिया था।

मंडल को इस बात का एहसास हुआ कि जिस पाकिस्तान को उन्होंने अपना घर समझा था, वह उनके रहने लायक नहीं है। उन्हें विश्वास था कि पाकिस्तान में दलित-हिन्दुओं के साथ अन्याय नहीं होगा। किन्तु, लगभग दो वर्ष में ही दलित-मुस्लिम एकता का उनका ख्वाब टूट गया। दुर्भाग्य से, श्री मंडल को भारत वापस आना पड़ा और शरणार्थी के रूप में उनकी मृत्यु पश्चिम बंगाल में हुई।

“नेहरू-लियाकत” समझौते में पाकिस्तान के असफल हो जाने पर उन अल्पसंख्यकों को स्वीकारना हमारा संवैधानिक दायित्व बनता है। जो लोग सालों से धार्मिक कारणों से प्रताड़ित हैं, जिनका घर-बार, संपत्ति, आश्रय सब छूट चुका है, क्या उनको सामान्य जीवन जीने के अधिकार से वंचित कर दिया जाए? और क्या एक ऐसे देश को उनकी उपेक्षा करनी चाहिए जिसके वे अभिन्न अंग थे और उनको आशवस्त भी किया गया था? जिन विश्वासों में वे पले-बढ़े हैं, जिन आस्थाओं को वे अपने जीवन से अधिक कीमती मानते हैं उनकी उद्गम-स्थली क्या वही देश है जहाँ इन्हीं आस्थाओं के कारण उनको जलील होना पड़ता है? सत्तर साल पहले वे इसी देश के निवासी थे तो स्वाभाविक है कि वे अपनी मातृभूमि भारत में ही बसेंगे।

18 दिसंबर, 2003 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी कहा था, “अल्पसंख्यकों को बांग्लादेश जैसे देशों में उत्पीड़ना का सामना करना पड़ रहा है और अगर हालात इन लोगों को मजबूर करती है तो इन अभागे लोगों को नागरिकता प्रदान करना हमारा नैतिक दायित्व है सरकार को इस विषय में सोचना चाहिए।” अशोक गहलोत ने भी 2009 में चिदंबरम को पत्र लिख कर उन देशों के अल्पसंख्यकों की सोचनीय स्थिति से अवगत कराते हुए उन्हें नागरिकता प्रदान करने का सरकार को आग्रह किया था।

एक सार्वभौम राष्ट्र के लिए इस समस्या का और अपने पूर्व-आश्वासन को पूरा करने का संवैधानिक समाधान आवश्यक था। इसलिए पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों के जो दशकों से अवैध प्रवासियों के रूप में रह रहे हैं उनके मानवाधिकारों की रक्षा-हेतु नागरिकता प्रदान करने वाला विधेयक आवश्यक था। ये देश अपने अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने में सर्वथा असमर्थ रहे अत: भारत ने अपने मानवता के आधार पर अविभाजित भारत के नागरिकों की सुरक्षा के लिए अपना कर्तव्य समझ कर यह संशोधन किया है। इस संशोधन का उद्देश्य धर्म के कारण प्रताड़ित उन अल्पसंख्यकों को सम्मान का जीवन देना है जो इन देशों में अपने धर्म का अनुसरण नहीं कर पा रहे हैं।

नागरिकता अधिनियम 1955, के अनुसार अवैध प्रवासी भारत के नागरिक नहीं हो सकते थे। वे नागरिकता अधिनियम 1955, की धारा 5 के अधीन नागरिकता के लिए आवेदन करते थे किंतु यदि वे अपने भारतीय मूल का सबूत देने में असमर्थ थे, तो उन्हें उक्त अधिनियम की धारा 6 के तहत ”प्राकृतिकरण” (Naturalization) द्वारा नागरिकता के लिए आवेदन करने को कहा जाता था। यह उनको बहुत से अवसरों एवं लाभों से वंचित करता था। नागरिकता संशोधन अधिनियम में यह प्रावधन था कि प्राकृतिक रूप से नागरिकता प्राप्त करने के लिए इन व्यक्तियों (अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान के हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनियों, पारसियों और ईसाइयों) को कम से कम 11 वर्ष भारत में रहना चाहिए लेकिन इस नवीन अधिनियम में इस अवधि को घटाकर 5 वर्ष कर दिया गया अर्थात् वे भारत में रहने के 5 सालों की बाद ही भारत के नागरिक बन जाएँगे।

धर्म के आधार पर हुए विभाजन के नाम पर इन इस्लामिक देशों का गठन हो चुका है अतः वहां के समुदाय विशेष के लिए यह संशोधन पुनः कोई प्रावधान नहीं करता है तथा मुस्लिम न तो इन देशों में अल्पसंख्यक हैं और न ही धार्मिक आधार पर उन्हें वहां अपने ही देश में उत्पीड़ना का सामना करना पड़ रहा है। इससे किसी भी भारतीय अल्पसंख्यकों की नागरिकता किसी भी प्रकार से प्रभावित नहीं हो रही है। यह संशोधन किसी की नागरिकता का हनन नहीं कर रहा बल्कि वंचितों को कानूनन अधिकार दे रहा है। यह अधिनियम किसी को बुलाकर भी नागरिकता नहीं दे रहा बल्कि जिन्होंने 31 दिसंबर 2014 की निर्णायक तारीख तक भारत में प्रवेश कर लिया है, वे भारतीय नागरिकता के लिए सरकार के पास आवेदन कर सकेंगे।

इन इस्लामिक देशों के इस्लाम मतावलंबी नागरिक भारतीय नागरिकता के लिए “आवेदन द्वारा नागरिकता” इस पर्याय के अंतर्गत आवेदन कर सकते हैं। यह पर्याय किसी भी विदेशी व्यक्ति के लिए लागू है। भारत सरकार ऐसे आवेदनों के ऊपर विचार करने के बाद नागरिकता प्रदान करती है। जैसे पाकिस्तानी गायक/कलाकार अदनान सामी को 1 जनवरी, 2016 को भारतीय नागरिकता दी गयी है। यह संशोधन केवल तीन देशों के छह अल्पसंख्यकों के प्रवासियों को निर्धारित मानदंडों को पूर्ण करने पर ही प्राथमिकता प्रदान करता है।

प्रत्येक नागरिक का अपने अधिकारों और संविधान के प्रति जागरूक होना अत्यावश्यक तो है ही परन्तु इस अधिनियम को लेकर विरोध करने से पहले उसकी वस्तुस्थिति जाननी भी उससे कहीं अधिक आवश्यक है। क्योंकि अपने राजनैतिक स्वार्थ के आहत होने से कुछ राजनेताओं की यह समस्या बन चुकी है कि वे यथार्थ जानते हुए भी समुदाय विशेष और निर्दोष छात्रों को गुमराह कर रहे हैं और संकीर्ण हितों के दुराग्रह से ग्रसित वे भी भेड़चाल में बिना सोचे समझे सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचा रहे हैं। उनका यह व्यवहार बहुत ही गैर जिम्मेदाराना है, उनको यह बोध ही नहीं कि उनकी इस प्रतिक्रिया ने विरोध को सांप्रदायिकता के रंग में रंग दिया जो वास्तव में संविधान की पंथनिरपेक्षता की अवधारणा पर कुठाराघात है।

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने विपक्ष की निराधार आशंकाओं और विभ्रम को दूर करने के लिए लगातार इस विषय को स्पष्ट किया है। हालाँकि, इस संदर्भ में यह कहावत भी सत्य और समीचीन प्रतीत होती है कि जो सो रहा है उसे तो जगाया जा सकता है, मगर जो सोने का ढोंग कर रहा है उसे कैसे जगाया जाए? विपक्षी दलों की स्थिति कुछ ऐसी ही है। यह विरोध चुनावी असफलता से उपजी हताशा का प्रतिफलन है और अपनी खोई हुई जमीन को पाने की छटपटाहट मात्र है। क्योंकि न तो नागरिकता संशोधन कानून मजहब विरोधी है, न ही राष्ट्रीय नागरिक पंजीकरण ही ऐसा होगा।

यह संविधान की मूल भावना और धर्म-निरपेक्षता के सिद्धांत के भी खिलाफ नहीं है। धार्मिक आधार पर उत्पीड़ित अपने विभाजन-पूर्व नागरिकों को पुनः नागरिकता प्रदान करना भारत के संविधान की मूलभावना साम्प्रदायिक सद्भाव के अनुरूप ही है। यह कानून न्यायपूर्ण और मानवीय है जो भारत देश के पूर्वनागरिकों के नागरिक अधिकारों की बहाली करके उनकी सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करेगा। यह संविधान में प्रदत्त समानता के अधिकार के खिलाफ भी नहीं है।

संविधान में ही तार्किक वर्गीकरण की व्यवस्था है जिसके अनुसूचित जातियों, जनजातियों, पिछड़े वर्गों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के सशक्तिकरण और सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान और उपचार किए गए हैं। इसलिए विपक्षी दलों को देश को बिगाड़ने की बजाय देश बनाने की परियोजना पर ध्यान देना चाहिए अन्यथा वे निरंतर अप्रासंगिक होते चले जाएँगे। वे लोगों को भ्रमित कर जितना भी नुकसान करेंगे अंततः उसकी कीमत स्वयं उन्हें ही चुकानी पड़ेगी। अफवाह आधारित डर के दोहन की राजनीति फलप्रद नहीं होगी।

दिल्ली से घरेलू फ्लाइट्स की उड़ानें जारी रहेंगी: केजरीवाल के फैसले के बाद DGCA ने किया कंफ्यूजन दूर

दिल्ली के हवाई अड्डे से घरेलू उड़ानों पर रोक के मुख्यमंत्री केजरीवाल की घोषणा के कुछ मिनटों बाद ही नागरिक उड्डयन के महानिदेशक (डीजीसीए) ने ट्वीट के जरिए साफ कर दिया है कि इंदिरा गाँधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट से घरेलू फ्लाइट्स की उड़ानें जारी रहेंगी और एयरपोर्ट पहले की तरह काम करता रहेगा।

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आज रविवार शाम कोरोना वायरस से फैलते संक्रमण की चुनौतियों को देखते हुए, कल सोमवार से दिल्ली के टोटल लॉक डाउन की घोषणा की थी। इस दौरान केजरीवाल ने ऑटो, ई-रिक्शा, बसों समेत सभी प्रकार की सार्वजनिक परिवहन सेवाओं पर भी रोक लगाने के साथ-साथ कल सोमवार सुबह 6 बजे से होने वाले लॉकडाउन के दौरान दिल्ली हवाई अड्डे से होने वाली सभी घरेलू उड़ानों पर भी प्रतिबंध का ऐलान कर दिया था।

हालाँकि दिल्ली हवाई अड्डे से घरेलू उड़ानों पर रोक के मुख्यमंत्री केजरीवाल की घोषणा के कुछ मिनटों बाद ही नागरिक उड्डयन के महानिदेशक (डीजीसीए) ने ट्वीट के जरिए साफ कर दिया है कि इंदिरा गाँधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट से घरेलू फ्लाइट्स की उड़ानें जारी रहेंगी और एयरपोर्ट पहले की तरह काम करता रहेगा। यहाँ यह याद रहे कि केंद्र सरकार ने 3 दिन पहले ही यह निर्णय ले लिया था कि रविवार 22 मार्च से अगले एक हफ्ते तक इंदिरा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से कोई अंतरराष्ट्रीय उड़ान नहीं होगी। लेकिन घरेलू उड़ानों पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया था, जो यथावत काम करता रहेगा।

ध्यातव्य है कि चीन के वुहान से शुरू हुआ कोरोना वायरस अब तक 170 से ज्यादा देशों में पहुँच गया है। इसके संक्रमण से मरने वाले लोगों की संख्या 13,068 हो गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे महामारी घोषित कर दिया है।

दुनिया भर की सरकारें कोरोना वायरस को लेकर लोगों को जागरूक करने पर ध्यान दे रही है। भारत में अभी कोरोना से संक्रमण के मामलों की संख्या 330 है। जिनमें से अबतक 7 की मौत हो चुकी है। कोरोना के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए राजस्थान, उड़ीसा, पंजाब, चंडीगढ़ और उत्तराखंड ने पूरी तरह से लॉकडाउन का ऐलान कर दिया है। इसके अलावा महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार, मध्य प्रदेश, नागालैंड और केरल में भी आंशिक लॉकडाउन किया गया है। वहीं पश्चिम बंगाल और दिल्ली में सोमवार (मार्च 23, 2020) शाम से लॉकडाउन की घोषणा की गई है।

सिर्फ लॉकडाउन से नहीं हारेगा कोरोना, हर रोगी को खोजने पर फोकस करना होगा: WHO इमरजेंसी एक्सपर्ट

कोरोना संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए भारत समेत पूरी दुनिया लॉकडाउन की स्थिति में जा रही है। लेकिन सिर्फ लॉकडाउन करने भर से ही मानव सभ्यता इस घातक और अति संक्रामक महामारी से पार नहीं पा सकेगी। ऐसा कुछ कहना है विश्व स्वास्थ्य संगठन के बड़े इमरजेंसी एक्सपर्ट, माइक रायन का। माइक रायन ने रविवार को एक इंटरव्यू में कहा कि कोरोना वायरस को हराने के लिए देश सीधे-सीधे अपने समुदायों को लॉकडाउन में डाल रहे हैं जबकि यह पर्याप्त नहीं है। रविवार को मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि इसमें बाद के दौर में फिर से वायरस के सिर उठाने की संभावना बनी रहेगी, जिसे रोकने के लिए पब्लिक हेल्थ सिस्टम को सुधारने की दिशा में कदम उठाने की जरूरत है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार माइक रायन ने एक शो पर दिए अपने इंटरव्यू के दौरान कहा कि हमें रोगियों को खोजने पर फोकस करने की जरूरत है। जिनमें कोरोना वायरस है, उन्हें अलग करें और उनके कॉन्टैक्ट में आए लोगों को ढूंढें और उन्हें भी अलग करें। माइक रायन ने कहा कि इस समय लॉकडाउन के साथ यह खतरा है कि अगर हम मजबूत जन स्वास्थ्य की सुरक्षा हेतु जरूरी कदमों को प्रभाव में नहीं लाते हैं तो आवागमन आदि गतिविधियों पर लगी रोक और लॉकडाउन खत्म होते ही, इस वायरस के वापस लौटने की आशंका बनी रहेगी।

खबरों के अनुसार दुनिया भर में करीब 1 अरब लोग रविवार तक लॉकडाउन की स्थिति में आ चुके थे और अपने घरों तक ही सीमित कर दिए गए थे। दुनिया भर में कोरोना वायरस से अब तक करीब 13,000 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। भारत में भी अब तक 330 के लगभग कोरोना पॉजिटिव लोगों के पाए जाने की पुष्टि हो चुकी हैं, जिनमें से 7 की अब तक मौतें हुईं हैं। इनमें से 3 मौतें आज हुई हैं।

‘बिक गई है शेहला, मोदी ने सस्ते में खरीदा’: जनता कर्फ्यू समर्थन के कारण लेफ्ट-लिबरल ट्रोल्स के निशाने पर

सोशल मीडिया पर अक्सर सरकार विरोधी गतिविधियों के लिए जानी जाने वाली कुछ चुनिन्दा ‘हस्तियों’ से ज्यादातर लोग अच्छे से वाकिफ हैं। इन चेहरों ने राजनीतिक कारणों से कम और सोशल मीडिया पर लेफ्ट-लिबरल गिरोह का मुखिया बनकर ज्यादा पहचान हासिल की है। इनमें जेएनयू की पूर्व छात्र नेता शेहला रशीद, स्वरा भास्कर, राणा अयूब, खुद को कॉमेडियन कहने वाले कुनाल कामरा, आदि प्रमुख हैं।

लेकिन कोरना वायरस के समय जब देशवासियों के एकजुट होने की बात आई तो देश के कई बड़ी राजनीतिक हस्तियों से लेकर सोशल मीडिया के लेफ्ट-लिबरल गिरोह के चेहरों ने इस बात को स्वीकार किया कि विचारधारा के मतभेद के लिए देशहित के साथ इस बार समझौता नहीं किया जा सकता है।

कोरोना वायरस पर केंद्र सरकार द्वारा अपनाए गए कुछ सख्त फैसलों का शेहला रशीद ने स्वागत किया है, जिसने कई लोगों को हैरानी में डाल दिया है। लेकिन इसके कारण वो कुछ इस्लामिक कट्टरपंथी और लेफ्ट-लिबरल ट्रोल्स के निशाने पर भी आ गई हैं। कुछ दिन पहले ही शेहला ने ट्वीट के जारी नरेन्द्र मोदी के समर्थन में चंद शब्द लिखे थे, लेकिन अब ऐसे ट्वीट्स की मात्रा बढ़ती जा रही है, जिसने लिबरल्स की परेशानियाँ बढ़ा दी हैं।

शेहला रशीद ने पीएम मोदी के जनता कर्फ्यू के आह्वान के फैसले का स्वागत किया था और आज शाम पाँच बजे देशवासियों की सक्रीय भागीदारी पर भी शेहला ने ट्वीट के माध्यम से स्वीकार करते हुए कहा कि वास्तव में नरेन्द्र मोदी देश में कानून बन चुके हैं और लोग उनकी बात मानने से इनकार नहीं करते हैं। उन्होंने यह भी लिखा कि नरेन्द्र मोदी को अपनी इस शक्ति का उपयोग कोरोना के प्रति दी जा रहे स्वास्थ्य दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करने के लिए भी संदेश देने में करना चाहिए।

लेकिन एक ओर जहाँ शेहला के इस बदले हुए अंदाज ने सोशल मीडिया पर सक्रिय दक्षिणपंथी लोगों के बीच कुछ हद तक लोकप्रिय बना दिया है, वहीं उन्हें इसके लिए लेफ्ट-लिबरल गिरोह की गालियों का सामना भी करना पड़ रहा है।

शेहला के ट्वीट के जवाब में @kinginthewest77 ट्विटर यूजर ने लिखा- “हर किसी की एक कीमत होती है, मोदी ने इसे सस्ते में खरीद लिया।”

शेहला के बदले हुए सुरों पर काफी लोग आश्चर्यचकित हैं। एक ट्विटर यूजर ने लिखा- “मुझे आश्चर्य है कि आखिर शेहला को क्या हो गया है? कुछ तो हैरान करने वाला है।”

इसके जवाब में शेहला रशीद ने लिखा – “मुझे कुछ नहीं हुआ है। मैं हमेशा की ही तरह हूँ- तार्किक, पूर्वग्रहों से मुक्त और लेफ्ट-राईट की आलोचना से परे अपनी बातों को कहने के लिए साहसी। हम लोग एक बड़े संकट से गुजर रहे हैं, जो कि दंगों से ज्यादा जानें ले सकता है। हमें एकजुट होकर सामंजस्य स्थापित करना होगा।”

शेहला के इस ट्वीट पर एक ट्विटर यूजर ने लिखा- “इसका मतलब यह नहीं है कि कोई भूल जाए कि शासन और अधिकारी तबाही के दौरान चुप थे और यह उनकी मिलीभगत थी। [:)] इसके अलावा, एकरूपता में शामिल होने का यह मतलब भी नहीं है कि कोई व्यक्ति उस तंत्र के साथ अंधे होकर खड़ा हो जाए और ऐसे सवाल करना बंद कर दे जो ताली बजाने से ज्यादा जरुरी हैं।” [:)]

शेहला ने इसके जवाब में लिखा है- “हाँ। आँख मूंदकर समर्थन करना अंध-विरोध जितना ही बुरा है। मोदी ने कोरोना वायरस का आविष्कार नहीं किया। कोई भी देश इसके लिए तैयार नहीं था। हाँ, हमें सही सवाल पूछना चाहिए, जैसे कि हम हैं। सरकार को इस लड़ाई में अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल कर सब कुछ करना चाहिए और साथ ही नागरिकों को भी।”

स्तनधारी जीवों को खाने की चायनीज फूड हैबिट टाइम बम के समान: 12 साल पहले रिसर्च पेपर ने किया था आगाह

वुहान कोरोना वायरस दुनिया भर के लिए आज एक भयानक खतरे और महामारी के रूप में उपस्थित है। दुनिया भर के देश आज इस वायरस से बचने को भागे-भागे घूम रहे, इसके खिलाफ लड़ाई के लिए सारे संसाधन झोंकने को तैयार दिख रहे। कोरोना वायरस के कारण दुनिया के कई हिस्सों में लॉकडाउन के हालात हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था औंधे मुँह गिरी पड़ी है।

COVID-19 या SARS-CoV-2, के नाम से जाना जा रहा यह वायरस अत्यंत संक्रामक है और एक बड़ी आबादी को बेहद कम समय में अपनी गिरफ्त में ले सकता है, उस स्थान के स्वास्थ्य ढाँचे को तबाह कर सकता है। इस नोबल वायरस से किस हद तक भयावह स्थिति पैदा हो सकती है, इसका ठीक-ठीक अनुमान हमें इटली जैसे देश के मौजूदा हालातों से लग सकता है, जहाँ इस घातक वायरस के कारण त्राहिमाम की स्थिति है।

वैज्ञानिक इस वायरस से भी ज्यादा खतरनाक वायरस से पैदा संक्रमण पर बहुत पहले ही चेतावनी दे चुके हैं। ये zoonotic वायरस हैं, यानी जो गैर मानवों से मानवों में फैलता है। SARS-CoV-2 वायरस चमगादड़ कोरोना वायरस से निकटता रखता है। ऐसा संदेह जताया जा रहा है कि यह मानवों में किसी मध्यस्थ पशु जैसे पैंगोलिन के जरिए ट्रांसमिट हुआ है। जिसका कारण इंसानों की फूड हैबिट यानी खाने की आदतें हैं।

वैज्ञानिकों ने एक साइंस पेपर के जरिए इस तरह के वायरसों के उद्भव के संबंध में कई साल पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी। चेंग वीसी, लाऊ एसके, वू पीसी और युएन केवाई ने 2007 में एक रिसर्च पेपर पब्लिश किया था। उसमें इस बात का अंदेशा व्यक्त किया गया था कि दक्षिण चीन में लोगों की खाने की आदतें, जो विदेशज किस्म के स्तनपायी जीवों को खाने के लिए विख्यात हैं, असल में एक टाइम बम हैं। याद रहे कि कोरोना भी वुहान शहर के एनिमल मार्केट से ही फैलना शुरू हुआ।

उपरोक्त रिसर्च पेपर में यह चेतावनी भी दी गई थी कि इस तरह के वायरस जेनेटिक बदलावों के जरिए और संश्लेषण से नए वायरस संक्रमणों में बदल सकते हैं। इस रिपोर्ट में इस बात पर भी ध्यान दिलाया गया था कि SARS-CoV जैसे वायरसों के लिए हॉर्स शू चमगादड़ (चमगादड़ की ही एक प्रजाति) नैसर्गिक रूप से निवास स्थान का काम करते हैं। जिस कारण एनिमल मार्केट इस तरह के वायरस संक्रमण के फैलाव का केंद्र हो सकती है। इसे रोकने के लिए वहाँ बायो सेफ्टी का उचित ध्यान रखने की जरूरत है।

पेपर में आगे कहा गया है कि दक्षिण चीन में हुए रैपिड विकास के कारण वहाँ एनिमल प्रोटीन की माँग बहुत बढ़ चुकी है, जिसमें रात्रिचर स्तनपाई civet (छोटे-पतले आकार के स्तनपाई) जैसे विदेशज जानवर भी शामिल हैं। इन्हें पिंजड़ों में ठूँस-ठूँस कर भर दिया जाता है और बायो सेफ्टी के बावत कतई उदासीनता बरती जाती है। इस कारण ये एनिमल मार्केट पशुओं से मानवों तक वायरसों के आसान ट्रांसमिशन का जरिया हो जाते हैं। इस रिपोर्ट में इस बात की भी संभावना जताई गई है कि यदि सार्स के लिए अनुकूल स्थितियाँ पैदा हो गईं तो वह एक घातक संक्रामक महामारी के रूप में वापस लौट सकता है।

इस तरह यह लगभग निश्चित हो चुका है कि पशुओं को खाने की आदत का SARS-CoV-2 नामक इस महामारी के फैलने में बड़ा रोल है। फूड हैबिट की वजह से यह पशुओं से मानवों में ट्रांसमिट हुई। जाहिर है कि इस महामारी से मिले अनुभव भविष्य में दुनिया पर कई तरह के दीर्घकालिक और अल्पकालिक प्रभाव डालने वाले होंगे। यह शायद हमारी खाने-पीने की आदतों में भी आमूलचूल परिवर्तन लाने वाले साबित हो सकते हैं, जिससे हम आगे इन वायरसों के संक्रमण से मानव सभ्यता को बचा सकें।

6 पॉइंट में समझें क्या होता है लॉकडाउन? आखिर क्यों इससे घबराने की जरूरत नहीं

देश को कोरोना वायरस के खिलाफ युद्धस्तर पर तैयार करने के तरफ अहम कदम उठाते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने 22 मार्च को जनता कर्फ्यू की अपील की। इसके बाद कई राज्यों ने पूरी तरह खुद को लॉकडाउन कर लेने की घोषणा की। आज देश के 75 कोरोना प्रभावित जिलों को भी लॉकडाउन कर देने का निर्णय ले लिया गया है। इन में उत्तर प्रदेश के 7 जिले – लखनऊ, मुरादाबाद, वाराणसी, नोएडा, आगरा, लखीमपुर खीरी और गाजियाबाद भी शामिल हैं।

संशय, भ्रम और अफवाहों के बीच लॉकडाउन क्या है, इसे समझना बेहद जरूरी हो जाता है। जरूरी इसलिए ताकि बेवजह खौफ और डर का माहौल न पैदा हो। 6 मुख्य बिंदुओं से समझें लॉकडाउन क्या है और क्यों इससे घबराने की जरूरत नहीं है।

* लॉकडाउन एक आपाकलीन व्यवस्था है, जो किसी महामारी या किसी आपदा के समय सरकार द्वारा लागू की जाती है।

* इस दौरान जीवन के लिए आवश्यक चीजों के लिए ही बाहर निकलने की अनुमति होती है। अस्पताल आदि जरूरी सेवाएँ खुली रहती हैं।

* अगर किसी को दवा या अनाज की जरूरत है तो बाहर जा सकता है।


* छोटे बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल के काम से भी बाहर निकलने की अनुमति मिल सकती है।

* दफ्तर चाहे वो प्राइवेट हों या सरकारी – वो सब बंद रहते हैं। सिनेमा हॉल, स्कूल, दुकानें, फैक्ट्रियाँ और सार्वजनिक परिवहन के साधन जैसे ट्रेन, मेट्रो, बस आदि पूरी तरह बंद रहते हैं। निजी वाहनों को अनुमति हो सकती है।

* रोजमर्रा की जरूरत के सामान जैसे दूध, सब्जी, किराना और मेडिकल स्टोर खुले रहते हैं।

इस तरह देखें तो लॉकडाउन की वैसे तो कोई ठीक-ठीक परिभाषा मौजूद नहीं है, लेकिन आमतौर पर संक्रमण को रोकने के लिए सरकारें इस तरह के कदम उठाती हैं। लॉकडाउन में सरकार का लक्ष्य यह होता है कि लोग यहाँ-वहाँ कम आएँ-जाएँ। जनता का आवागमन बाधित हो, जिससे संक्रमण को फैलने से रोका जा सके। इसमें विशेष तौर पर सरकारों द्वारा दिए गए सुझावों, बनाए गए नियमों और निर्देशों का कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित किया जाता है।

याद रहे कि कोरोना संक्रमण के बढ़ते हुए खतरे को देखते हुए आज पंजाब और राजस्थान समेत कई राज्यों ने खुद को पूरी तरह से लॉकडाउन कर लिया है। मीडिया के अनुसार महाराष्ट्र में सबसे अधिक कोरोना संक्रमित लोग पाए गए हैं। उसके बाद केरल, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और राजस्थान का नंबर आता है। पूरे देश में अब तक कोरोना से संक्रमित लोगों की संख्या बढ़कर 341 पहुँच गई है। वहीं इस वायरस के कारण मरने वाले लोगों की संख्या देश में जहाँ 7 पहुँच चुकी हैं, जिनमें से 3 की मौत आज ही हुई है।