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‘IS आतंकी तो नमाज भी नहीं पढ़ते, मेरे साथ धोखा हुआ… मैं तो खलीफा के हिसाब से जीने के लिए ज्वाइन की थी’

इस्लामिक स्टेट से जुड़ने के लिए केरल से भागकर अफगानिस्तान जाने वाली लड़कियों में एक नाम सोनिया सेबेस्टियन उर्फ आयशा का है। आयशा ने कुछ समय पहले ISIS मॉड्यूल के कासरगोड रिंग लीडर अब्दुल राशिद से निकाह किया था और उसके बाद कई युवकों को कट्टरपंथी बनाने का काम किया था। मगर, आज अपने शौहर की मौत के बाद आयशा वापस भारत लौटना चाहती है। अब उसका कहना है कि आईएस के गढ़ में स्थितियाँ उसकी उम्मीदों के विपरीत थीं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, आयशा का पति अब्दुल राशिद अब्दुल्ला भी आईएस को लेकर काफी निराश था। इसलिए उसने वहाँ आत्महत्या कर ली। जबकि अफगानिस्तान के सुरक्षाबल द्वारा आतंकियों को पकड़ने के लिए शुरू किए गए अभियान में आयशा ने आत्मसमर्पण कर दिया। अब फिलहाल वह काबुल की एक जेल में बंद है और कहती है कि वह इस्लामिक स्टेट से नहीं जुड़े रहना चाहती।

आयशा का कहना है, “मुझे लगता है कि बहुत से लोग जो (आईएस में शामिल होने) आना चाहते हैं, उनकी भी यही उम्मीदें हैं। मैं उन्हें निर्णय लेने से पहले दो बार सोचने का सुझाव दूँगी।”

खबर के अनुसार, आयशा ने वहाँ की पोल-पट्टी खोलते हुए कहा कि हम अफगानिस्तान यह सोचकर गए थे कि ‘खलीफा’ के हिसाब से इस्लामी जीवन जी सकेंगे। लेकिन जब हम यहाँ पहुँचे, तो हमने महसूस किया कि लोग नमाज पढ़ने तक के लिए भी नहीं जा रहे थे।

यहाँ बता दें कि राशिद ने 90 से ज्यादा ऑडियो क्लिप भेजकर आईएस के विभिन्न पहलुओं को केरल के लोगों तक पहुँचाया था। लेकिन आयशा के मुताबिक उसका पति अफगानिस्तान जाकर इन चीजों को देखकर बहुत निराश हुआ और इसके बाद उसने ऑडियो मैसेज भेजना बंद कर दिया। आयशा ने कहा कि वह केरल वापस लौटना चाहती है और राशिद के माता-पिता के साथ रहना चाहती है।

आयशा के साथ एक अन्य लड़की और है। नाम है फातिमा उर्फ निमिषा। जानकारी के अनुसार, निमिषा ने भी कुछ साल पहले एक ईसाई से शादी की थी। मगर बाद में दोनों ने इस्लाम कबूल कर लिया था और दोनों अफगानिस्तान चले गए। आज आयशा की तरह निमिषा का भी कहना है कि वह भारत लौटना चाहती है बशर्ते उसे कैद में न रखा जाए और टार्चर न किया जाए। उसका कहना है, “मैं यह नहीं कह सकती कि मैं अफगानिस्तान में रहना चाहती हूँ क्योंकि यह मेरी जगह नहीं है। भारत मेरी जगह है।”

डॉक्टर बनना चाहती थी केरल की निमिषा, लव जिहादियों ने पहले फातिमा बनाया फिर फिदायीन बम

वकील➨राज्यसभा➨HC जज➨रिटायर➨SC जज➨राज्यसभा: बहरुल इस्लाम और कॉन्ग्रेसी काल की कहानी

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को नामित सदस्य के तौर पर राज्यसभा का सदस्य बनाने का ऐलान हुआ है। फैसले का ऐलान होते ही कॉन्ग्रेस पार्टी के अलावा असदुद्दीन ओवैसी जैसे नेताओं की ओर से मोदी सरकार पर न्यायपालिका की स्वतंत्रता के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाया गया। आज कॉन्ग्रेसियों द्वारा संविधान व सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को लेकर जो छटपटाहट दिख रही है, उसका सिर्फ एक कारण है और वह यह है कि पिछले 5 दशकों में यह पहली बार है, जब सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश कॉन्ग्रेस के प्रभाव से बाहर है। 

बता दें कि रंजन गोगोई से पहले भी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश राज्यसभा की शोभा बढ़ा चुके हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि गोगोई जहाँ नामित सदस्य के तौर पर राज्यसभा के सदस्य बने हैं, वहीं पहले वाले जज कॉन्ग्रेस पार्टी के टिकट पर राज्यसभा पहुँचे थे।

हम यहाँ बात कर रहे हैं सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बहरुल इस्लाम की। बहरुल इस्लाम सुप्रीम कोर्ट के जज थे, जिन्होंने राज्यसभा की शोभा बढ़ाई थी। बहरुल इस्लाम की कहानी बड़ी रोचक है। वे जब सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते थे, तब उन्हें 1962 में पहली बार असम से कॉन्ग्रेस पार्टी ने राज्यसभा भेजा। उसके बाद दूसरी बार 1968 में उन्हें राज्यसभा भेजा गया लेकिन इसके पहले कि वो 6 साल का अपना कार्यकाल पूरा कर पाते, उन्हें तब के असम और नागालैंड हाईकोर्ट (आज के गुवाहाटी हाईकोर्ट) का जज बनाया गया। जज बनते ही उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया। 1983 में सुप्रीम कोर्ट के जज से रिटायर होने के तुरंत बाद उन्हें तीसरी बार कॉन्ग्रेस पार्टी ने राज्यसभा भेज दिया।

उन्होंने 1951 में असम हाई कोर्ट के वकील के रूप में और 1958 में सुप्रीम कोर्ट के वकील के रूप में काम किया। इसी बीच उन्होंने 1956 में कॉन्ग्रेस का दामन थाम लिया। इसके बाद अप्रैल 1962 में वह राज्‍यसभा के सदस्‍य के रूप में चुने गए। इसके बाद 1967 में वो कॉन्ग्रेस के टिकट पर लड़े, मगर पराजित हो गए। फिर 1968 में दोबारा राज्‍यसभा सदस्‍य के रूप में निर्वाचित हुए। कॉन्ग्रेस के विभाजन के दौरान वह इंदिरा गाँधी के गुट से जुड़ गए। 1972 में उन्‍होंने राज्‍यसभा से इस्‍तीफा दे दिया और गुवाहाटी हाईकोर्ट के जज बने।

हाई कोर्ट के मुख्‍य जज से रिटाटर होने के बाद एक मार्च 1980 को फिर सक्रिय राजनीति में चले आए। नौ महीने के रिटायटरमेंट के बाद वह सुप्रीम कोर्ट के जज बने। वह 1 मार्च 1980 को रिटायर हो गए थे। उस समय इंदिरा गाँधी वापस सत्ता में आ गई थीं। वो प्रधानमंत्री थीं। इंदिरा गाँधी ये सहन नहीं कर सकीं कि एक कॉन्ग्रेसी नेता रिटायर हो गए, जो कि एक जज के रूप में उनके लिए काफी मददगार थे। तो इंदिरा गाँधी ने हाई कोर्ट के जज के रूप में रिटायर होने के 9 महीने बाद फिर से उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया।

उन्हें 4 दिसंबर 1980 को सुप्रीम कोर्ट में जज के तौर पर नियुक्त किया गया था। हालाँकि एक रिटायर जज का इस तरह फिर से जज बनाने का फैसला काफी अजीब और अद्वितीय भी था, क्योंकि आम तौर पर एक रिटायर जज को सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त नहीं किया गया था और आगे वे केवल पंद्रह महीनों के बाद रिटायर हो सकते थे। सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के एक महीने पहले उन्‍होंने 12 जनवरी 1983 को इस्‍तीफा दे दिया और कॉन्ग्रेस के बारपेटा लोकसभा सीट से चुनाव लड़े।

बहरुल इस्लाम पूरी तरह से कॉन्ग्रेसी थे और उन्हें कॉन्ग्रेसियों के खिलाफ मुकदमों में कानून और न्याय की ऐसी की तैसी करके बचाने में महारत हासिल थी। सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में उन्होंने बिहार के उस समय के कॉन्ग्रेस सीएम जगन्नाथ मिश्रा के खि‍लाफ जालसाजी और आपराधिक कदाचार के मामले में क्लीन चिट देते हुए उनके खिलाफ मुकदमा चलाने से मना कर दिया था। 

अपनी रिटायरमेंट के 6 हफ्ते पहले और बिहार के तत्कालीन कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा को जालसाजी मामले में क्लीन चिट देने के एक महीने बाद, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट जज के पद से इस्तीफा दे दिया और 1983 में बारपेटा लोकसभा सीट के लिए कॉन्ग्रेस उम्मीदवार के रूप में नामांकन दाखिल किया। हालाँकि असम की अशांति की वजह से वहाँ का चुनाव टल गया तो कॉन्ग्रेस ने उन्हें तीसरी बार राज्यसभा का सदस्य बनाया।

पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई जाएँगे राज्यसभा, राष्ट्रपति कोविंद ने किया नामित

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई राज्यसभा जाएँगे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने रंजन गोगोई का नाम राज्यसभा के लिए मनोनीत किया है। संसद के उच्च सदन राज्यसभा में 12 सदस्य राष्ट्रपति की ओर से मनोनीत किए जाते हैं। ये सदस्य अलग-अलग क्षेत्रों की जानी मानी हस्तियाँ होती हैं। असम से आने वाले रंजन गोगोई 17 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पद से रिटायर हुए थे। ये पूर्वोत्तर से देश के सर्वोच्च न्यायिक पद पर पहुँचने वाले पहले शख्स हैं। दीपक मिश्रा के रिटायर होने से बाद रंजन गोगोई देश के मुख्य न्यायाधीश बने थे, इनकी अध्यक्षता में बनी बेंच ने ही रामजन्मभूमि विवाद पर फैसला सुनाया था। जिसमें निर्णय रामलला के पक्ष में गया था। रंजन गोगोई के पिता भी कॉन्ग्रेस पार्टी से असम के मुख्य मंत्री रह चुके हैं।

पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने कई ऐतिहासिक फैसले दिए। जिसमें अयोध्या जन्मभूमि विवाद के अलावा असम में एनआरसी, राफेल सौदा, तथा मुख्य न्यायाधीश कार्यालय को सूचना के अधिकार के अंतर्गत लाना शामिल है। रंजन गोगोई को तब के मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा के काम करने के तरीकों के खिलाफ उन 4 जजों में शामिल होने के लिए भी याद किया जाएगा जिन्होंने इस बावत प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी।

राज्यपाल के पत्र के बाद हड़बड़ाए कमलनाथ फिर पहुँचे राजभवन, BJP विधायकों से भी की मुलाकात

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विधानसभा में कमलनाथ सरकार के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार के अल्पमत में होने का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट में फ्लोर टेस्ट जल्द से जल्द कराने को लेकर याचिका दाखिल की थी। उन्होंने अपनी याचिका में कमलनाथ सरकार के खिलाफ तत्काल यानी 48 घंटे के भीतर फ्लोर टेस्ट की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट में डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हेमंत गुप्ता की 2 जजों की बेंच इस मामले पर मंगलवार मंगलवार (मार्च 17, 2020) को सुनवाई करेगी।

इसी बीच राज्यपाल लालजी टण्डन ने मुख्यमंत्री को पत्र लिख कर कहा कि अगर उन्होंने 17 मार्च को बहुमत साबित नहीं किये तो ये समझ जाएगा कि उनकी सरकार अल्पमत में है। कमलनाथ ने भी राज्यपाल टंडन को पत्र लिखा था, जिस पर राज्यपाल ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि मुख्यमंत्री द्वारा उन्हें लिखे गए पत्र की भाषा अशोभनीय है और संसदीय मर्यादा के अनुरूप नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि कमलनाथ ने सर्वोच्च न्यायालय के जिस निर्णय का जिक्र अपने पत्र में किया है, वो वर्तमान परिस्थितियों में लागू नहीं होता। उन्होंने कहा कि इसका निर्णय अंतिम रूप से फ्लोर टेस्ट के बाद ही हो सकता है, ऐसा सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अनेक निर्णयों में कहा है।

राज्यपाल से दोबारा चिट्ठी मिलने के बाद कमलनाथ फिर से राजभवन पहुँचे हैं। कॉन्ग्रेस विधायक दल की बैठक के बाद मुख्यमंत्री सीधे राजभवन पहुँचे। राज्यपाल के मुख्यमंत्री को फ्लोर टेस्ट के लिए दोबारा पत्र लिखने के बाद कमलनाथ की यह पहली मुलाकात होगी। इस मुलाकात में कमलनाथ के राज्यपाल से और समय माँगे जाने की बात कही जा रही है। इधर दूसरी तरफ, भाजपा विधायकों का दिल्ली जाने के कार्यक्रम को रद्द कर दिया दिया गया है। कहा जा रहा है कि अब भाजपा के विधायक भोपाल के पास सीहोर पहुँच गए हैं और वहीं उनके रुकने की व्यवस्था की जाएगी. इससे पहले खबर आई थी कि बीजेपी विधायक फिर दिल्ली के पास मानेसर भेजे जाएँगे। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।

उधर एक अन्य नाटकीय घटनाक्रम में मैहर से भाजपा विधायक नारायण त्रिपाठी सोमवार को भोपाल पहुँचे। विधानसभा सत्र 26 मार्च तक स्थगित होने के बाद विधायक नारायण त्रिपाठी बाहर तो निकले, लेकिन पार्टी विधायकों के साथ राजभवन नहीं गए। वो यहाँ से निकलकर सीएम हाउस गए और वहाँ उन्होंने मुख्यमंत्री कमलनाथ से मुलाकात की। ये बैठक लगभग 20 मिनट तक चली। मुलाकात के बाद नारायण त्रिपाठी ने पत्रकारों से भी बातचीत की। उन्होंने ये बताने से इनकार कर दिया कि वो सीएम से क्यों मिले हैं। उन्होंने इसे एक औपचारिक मुलाकात करार दिया और कहा कि अब वो शिवराज सिंह चौहान से भी मिलेंगे।

चार वायुसैनिकों की हत्या के मामले में ‘आतंकी’ यासीन मलिक सहित 6 अन्य पर टाडा कोर्ट में आरोप तय, अगली सुनवाई 30 मार्च को

जम्मू की स्पेशल टाडा कोर्ट ने प्रतिबंधित संगठन जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के चीफ यासीन मलिक पर जनवरी 1990 में हुई 4 भारतीय वायुसेना के अधिकारियों की हत्या के मामले में आरोप तय कर दिए हैं। मलिक पर रणबीर पीनल कोड की धारा 302, 307 और टाडा एक्ट के सेक्शन 3 (3) और 4 के तहत आरोप तय किए गए हैं। सीबीआई के वकील राकेश सिंह ने बताया कि यासीन मलिक, शौकत बक्शी, और 5 अन्य ने खुद के बेगुनाह होने की बात कोर्ट के सामने कही है। मामले की अगली तारीख 30 मार्च है।

यासीन फिलहाल आतंकी फंडिंग के मामले में जेल में बंद है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने उसके खिलाफ सोमवार को आरोप तय करने की मॅंजूरी दी थी। वायुसेना जवानों की हत्या तब की गई जब उनके पास कोई भी हथियार नहीं था और वे एयरपोर्ट जाने के लिए बस का इन्तजार कर रहे थे। वहाँ भारतीय वायुसेना के 14 जवान थे। तभी अचानक से एक मारुति जिप्सी और एक बाइक से 5 आतंकी वहाँ पहुँचे और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, उन्होंने एके-47 से ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। जवानों के अलावा 2 कश्मीरी महिलाओं की भी हत्या कर दी गई, जो बस का इंतजार कर रही थीं। आतंकियों ने ख़ून से लथपथ जवानों के सामने डांस करते हुए जिहादी नारे भी लगाए थे।

आतंकी यासीन मलिक को ‘अलगाववादी नेता’ के रूप में प्रचारित किया जाता रहा है। वह जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का चीफ भी है। जेकेएलएफ मूलतः एक आतंकवादी संगठन है जिसकी स्थापना 1977 में की गई थी। सन 1989 में इसी संगठन के आतंकियों ने जस्टिस नीलकंठ गंजू की हत्या की थी। दिसंबर 1989 में मुफ़्ती मुहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद का अपहरण किया गया था जिसके बदले में पाँच आतंकियों को छोड़ा गया था।

दिसंबर 8, 1989 को रुबैया सईद के अपहरण के बाद पंद्रह दिनों तक ड्रामा चला था जिसके बाद वीपी सिंह सरकार द्वारा अब्दुल हमीद शेख़, शेर खान, नूर मोहम्मद कलवल, अल्ताफ अहमद और जावेद अहमद जरगर नामक आतंकियों को जेल से छोड़ा गया था। चौदह साल बाद जेकेएलएफ के जावेद मीर ने रुबैया सईद के अपहरण की बात कबूल की थी। इसके अगले साल जनवरी 25 जनवरी 1990 को जेकेएलएफ ने भारतीय वायु सेना के 4 अधिकारियों की हत्या कर दी थी। खुद यासीन मलिक ने भी बीबीसी को दिए इंटरव्यू में यह स्वीकार किया था कि उसने ड्यूटी पर जा रहे 40 वायुसैनिकों पर गोलियाँ चलाई थीं। इसके बावजूद वह आजतक कानून के शिकंजे से बाहर खुला घूम रहा है। उम्मीद है कि अब इस केस में तेज़ी आएगी और यासीन मलिक को उसके पापों की सज़ा मिलेगी।      

मायावती की BSP के सामने ‘रावण’ ने खड़ी की नई पार्टी: दलित-मुस्लिम वोट पर है नज़र, कई बसपा नेताओं ने थामा दामन

पिछले कुछ समय से जिस बात की आशंका बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती को रही होगी, वह कल 15 मार्च को नॉएडा में वास्तविकता में बदल गई। रविवार को बसपा संस्थापक कांशीराम के जन्मदिवस पर भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ ने अपनी नई पार्टी का गठन करने का ऐलान किया। ‘आजाद समाज पार्टी’ नाम के इस दल ने जिस चंद्रशेखर आजाद को सर्वसम्मति से अपना अध्यक्ष चुना है, वह पिछले कुछ समय से लगातार सुर्ख़ियों में रहा है।

सहारनपुर में हुई जातीय हिंसा के बाद पहली बार सामने आया यह शख्स पिछले कुछ समय में यूपी राजनीति का ‘हॉटकेक’ बन गया है। इसकी वजह समझने के लिए आपको ‘रॉकेट साइंस’ का स्टूडेंट होने की जरूरत बिलकुल नहीं है। वजह बेहद आसान और सीधी है- वेस्ट यूपी में मौजूद दलित वोट बैंक। और इस दलित वोट में अगर पश्चिमी यूपी का मुस्लिम वोट जोड़ दिया जाए तो यह गठजोड़ मारक प्रभाव पैदा करने वाला हो जाता है। नए नागरिकता कानून और नागरिकता रजिस्टर पर रावण के आक्रामक रुख को इसी पृष्ठभूमि में समझा जा सकता है।

चंद्रशेखर रावण ने अपनी जिस नई पार्टी ‘आजाद समाज पार्टी’ के बैनर तले 2022 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में उतरने का ऐलान किया है उसके झंडे का रंग भी नीला ही है जैसा कि बसपा का। चंद्रशेखर उसी दलित जाति ‘जाटव’ से संबंधित हैं जिससे मायावती, और उन्हीं की तरह वेस्ट यूपी ही जिसकी जन्मभूमि और कर्मभूमि रही है। चंद्रशेखर की जातीय पृष्ठभूमि और कार्य क्षेत्र को देखते हुए ही मायावती और उनकी बसपा ने भीम आर्मी चीफ को शुरू से एक प्रतिद्वंदी के तौर पर देखा। जिससे पैदा खटास इन दोनों के बीच कभी छुपी नहीं रही। जहाँ शुरू से ही मायावती और उनकी पार्टी का लक्ष्य भीम आर्मी प्रमुख को भाजपा का एजेंट करार देना बना रहा, वहीं रावण ने भी मायावती पर दलितों की उपेक्षा का आरोप लगाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी है।

मायावती और उनकी पार्टी की इन कोशिशों के बाद भी चंद्रशेखर ने अपनी पैठ दलितों के मध्य लगातार मजबूत ही की, खासकर युवाओं के बीच, जिसका साक्ष्य कल आजाद समाज पार्टी के गठन के दौरान उसमें शामिल हुए नेताओं के कद से लगाया जा सकता है। चंद्रशेखर के साथ खड़े दिख रहे इन नेताओं में कई पूर्व सांसद और दर्जनों पूर्व विधायक शामिल हैं जो किसी समय बहुजन समाज पार्टी में थे।

वेस्ट यूपी में दलित मुस्लिम वोटों की महत्ता चौधरी चरण सिंह के बनाए ‘अजगर’ फार्मूला से समझी जा सकती है जिसमें अल्पसंख्यक, जाट, गुर्जर और राजपूत को साथ ला सत्ता की चाभी बनाने की कोशिश तब से लेकर अब तक उनके बेटे अजीत सिंह ने लगातार की। इसी समीकरण में से दलितों और मुस्लिमों को साध मायावती ने 2004 के आमचुनाव में वेस्ट यूपी बेल्ट से अपने कई मुस्लिम प्रत्याशी लोकसभा के भीतर पहुँचाने में सफलता प्राप्त की थी। 2007 विधानसभा चुनावों के बाद उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार दशकों बाद बनी थी। यह कारनामा कर दिखाने वालीं मायावती की इस सफलता के पीछे भी पश्चिमी यूपी में बसपा के दलित मुस्लिम गठजोड़ की प्रमुख भूमिका थी।

लेकिन 2012 में मुस्लिम छिटक कर समाजवादी पार्टी के पाले में चले गए। नतीजतन बसपा सरकार से बाहर हुई और अखिलेश यादव सरकार बनाने में सफल रहे। उसके बाद से मायावती की सियासी जमीन वेस्ट यूपी में लगातार कमजोर साबित हो रही है।

2014 के लोकसभा चुनाव में जहाँ बसपा को उत्तर प्रदेश की 80 में से एक सीट भी मुनासिब नहीं हुई थी तो वहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में भी वेस्ट यूपी में बसपा का हाथी पस्त ही रहा। हालाँकि पिछले साल हुए 2019 के लोकसभा चुनाव में सपा से गठबंधन कर मायावती की बसपा ने यूपी की 80 में से 10 सीट जीतने में कामयाबी हासिल की थी, जिसमें पश्चिमी यूपी की कई सीट्स शामिल थीं पर उससे मायावती की राजनीतिक जमीन के बारे में कुछ ठोस अंदाजा लगाना मुश्किल है क्योंकि जब दुबारा सपा और बसपा आमने-सामंने होंगी उस सूरत में भी क्या मुस्लिम बसपा की तरफ झुकाव दिखाएँगे ये कहना आसान नहीं। राजनीतिक जानकारों के अनुसार के फिलहाल नए नागरिकता कानून, पापुलेशन रजिस्टर, आदि पर बसपा के ठंडे रवैये को देखते हुए भी मुस्लिम उससे नाराज है। ऐसे में अगर वेस्ट यूपी के मुस्लिमों का झुकाव अखिलेश यादव की सपा के साथ साथ दलितों के लिए नए विकल्प देने की कोशिश में लगे चंद्रशेखर ‘रावण’ की तरफ बढ़ जाए तो मायावती के लिए उत्तर प्रदेश में अपनी खोई हुई ताकत वापस पाना मुश्किल हो जाएगा।

दिल्ली हिन्दू विरोधी दंगा: वकीलों की फ़ौज के साथ चेहरा ढक कर कोर्ट पहुँचा ताहिर हुसैन, 4 दिन की पुलिस कस्टडी में भेजा गया

दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों में आम आदमी पार्टी के निगम पार्षद (अब निलंबित) ताहिर हुसैन की बड़ी भूमिका थी। चाँदबाग़ के खजुरी खास इलाके में उसने अपने बहुमंजिला ईमारत में सैकड़ों दंगाइयों को शरण दे रखी थी, जहाँ से हिन्दुओं पर बमबारी और पत्थरबाजी की गई। उसकी ईमारत में ही ले जाकर आईबी में कार्यरत अंकित शर्मा को मार डाला गया था। अंकित शर्मा की हत्या काफ़ी बेरहमी से की गई थी। उन्हें नंगा कर के चाकुओं से कई बार गोदा गया था, जिसके बाद उनकी लाश को नाली में फेंक दिया गया। चाँदबाग़ की नाली से और भी कई लाशें मिली थीं, जिनकी हत्या के पीछे ताहिर हुसैन के गुंडों के नाम सामने आए थे।’

अब उसे दिल्ली की एक अदालत ने सोमवार (मार्च 16, 2020) को 4 दिनों की पुलिस कस्टडी में भेज दिया है। उसे आईबी में कार्यरत अंकित शर्मा की हत्या के आरोप में कस्टडी में भेजा गया। पुलिस ने बताया कि हत्या और दंगों के पीछे की बड़ी साजिश को बेनकाब करने के लिए उसे कस्टडी में लेना आवश्यक था। हुसैन को पहली बार चीफ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट पवन सिंह राजावत के समक्ष पेश किया गया।

इससे पहले उसे जज के आवास पर ही दंगों से जुड़ी सुनवाई के मामलों में पेश किया जाता रहा है। हुसैन जब कोर्ट में पेश हुआ, तब उसके साथ उसकी लीगल टीम भी थी। उसने एक शॉल से अपना चेहरा छिपा रखा था। कोर्टरूम में ही उससे लगभग एक घंटे तक पूछताछ की गई, जिसके बाद कस्टडी वाले एप्लीकेशन को दायर किया गया। अंकित शर्मा की हत्या के केस में सलमान को पहले ही गिरफ़्तार किया जा चुका है। हुसैन इस मामले का मुख्य अभियुक्त है।

कोर्ट ने माना कि पूरी साजिश को बेनकाब करने के लिए हुसैन को रिमांड में भेजना ज़रूरी है। हालाँकि, हुसैन के वकीलों ने उसे पुलिस रिमांड में भेजे जाने का विरोध किया। उसके वकील जावेद अली ने कहा कि ताहिर को जुडिशल कस्टडी में भेजा जाना चाहिए क्योंकि पुलिस रिमांड में भेजने के लिए एक मजबूत कारण होना चाहिए। कोर्ट ने उनकी बातों को नकार दिया।

एक रहस्यमयी चर्च, एक ‘अमर’ पादरी और कोरोना के 7500 मामले: वैश्विक महामारी से यूँ तबाह हुआ दक्षिण कोरिया

दक्षिण कोरिया में कोरोना वायरस के ख़तरे के लिए एक चर्च को दोष दिया जा रहा है। एक ‘कल्ट’ चर्च, जो दक्षिण कोरियाई लोगों के गुस्से का शिकार बना है। अब तक दक्षिण कोरिया में कोरोना वायरस के लगभग 7500 मामले सामने आ चुके हैं और यहाँ के लोगों में भगदड़ मची हुई है। अधिकांश मरीजों का किसी न किसी रूप में ‘शिनचेओंजी चर्च ऑफ जीसस’ से कनेक्शन निकल कर सामने आ रहा है। दक्षिण कोरिया के दक्षिण-पूर्वी शहर दाएगू में 25 लाख लोग रहते हैं। आशंका जताई गई है कि शिनचेओंजी चर्च के पादरी समूह के एक 61 वर्षीय व्यक्ति ने प्रेयर के दौरान बाकी लोगों को भी संक्रमित कर दिया। उसे ‘पैशेंट नंबर- 31’ का नाम दिया गया है।

कोरिया के स्वास्थ्य विभाग ने इस बात की पुष्टि की है कि अब तक देश में आए कोरोना वायरस के कुल मामलों का 63.5% शिनचेओंजी से जुड़ा हुआ है। यहाँ 15 अप्रैल को संसदीय चुनाव भी होने वाले हैं और राष्ट्रपति मून जे इन ने कोरोना वायरस के खतरों को हलके में लेते हुए बयान दिया था कि ये जल्द ही गायब हो जाएगा। दक्षिण कोरिया में लोगों का गुस्स्सा स्वाभाविक है क्योंकि चीन के बाद कोरोना वायरस के सबसे ज्यादा मरीज इसी देश में हैं। शिनचेओंजी की कुछ रीतियाँ भी इन सबके लिए जिम्मेदार बताई जा रही हैं।

ये चर्च ‘सीक्रेसी’ के नियमों का पालन करता है। इसने फेस मास्क पर बैन लगा दिया था जबकि मास्क लगाने की सलाह डॉक्टरों ने दी है ताकि कोरोना वायरस के बचाव के लिए सावधानी अपनाई जा सके। इसके अलावा इस चर्च में एक जगह सबके साथ रह कर प्रेयर करने का रिवाज रहा है, जिसके लिए लोग इसकी आलोचना कर रहे हैं। कोरोना वायरस के फ़ैलाने के आलोक में दुनिया भर के विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि ‘सोशल डिस्टन्सिंग’ का पालन किया जाए और लोग किसी भी गैदरिंग का हिस्सा न बनें।

चर्च के संस्थापक ली मैन ही को लोग दक्षिण कोरिया के एक महान राजा का वंशज मानते हैं, जिसने सैकड़ों वर्ष पहले राज किया था। बाइबल के सीक्रेट कोड्स को वही समझ और समझा सकते हैं, ऐसा लोगों का मानना है। 88 वर्षीय ली पर आरोप है कि वो और चर्च के सैकड़ों लोग स्वास्थ्य विभाग की जद से भागते रहे, जिस कारण कोरोना वायरस काफ़ी तेज़ी से फैला। आरोप है कि चर्च के अधिकतर संक्रमित लोग छिप गए और उनसे कोई संपर्क नहीं हो पाया। ली पर हत्या का मुकदमा चल सकता है क्योंकि आरोप है कि सबकुछ जानबूझ कर किया गया।

चर्च ने अपने सदस्यों की सूची भी सरकार द्वारा माँगने पर नहीं सौंपी। ली ने मास्क पहन कर एक सभा को सम्बोधित किया, जिसमें उन्होंने बताया कि चर्च से इतने सारे मरीजों के जुड़े होने की ख़बर सुन कर वो दुःखी हैं। पहले उन्होंने दावा किया था कि कोरोना वायरस उस दुष्ट शक्तियों द्वारा लाया गया है, जो शिनचेओंजी के तेज़ी से होते विकास से जलन में डूबा हुआ था। अब उन्होंने माफी माँगी है लेकिन जानबूझ कर सरकार का सहयोग न करने वाले आरोपों से इनकार किया है। वो कहते रहे हैं कि उनका चर्च कोई त्रादितुईवाल चर्च नहीं है और बाकी चर्चों के दबाव के बावजूद ‘शिनचेओंजी समूह’ लगातार बढ़ता ही जा रहा है।

चर्च ने भी अब आलोचना से बचने और जवाब देने के लिए ‘COVID-19 फैक्ट चेकर‘ नाम से पेज बनाया है, जहाँ दावा किया गया है कि चर्च इस वायरस को लेकर गंभीर है और 5 मार्च को उसने इससे लड़ने के लिए 1 करोड़ डॉलर की सहायता भी की है। चर्च ने बताया कि ये रुपए जमा नहीं किए गए बल्कि चर्च के कोष की तरफ़ से दिए गए। उसने आरोप लगाया है कि चर्च के कुछ सदस्यों को उनके कंपनियों ने निकाल दिया, कुछ को उनकी पत्नियों ने गालियाँ दी।

इन्हीं कारणों से ‘पेशेंट संख्या- 31’ को कोरोना वायरस का ‘सुपरस्प्रेडर’ कहा जा रहा है। मिस्टर ली बाइबिल को अपनी भाषा में समझाते हैं और चर्च के अनुयायियों से कहा गया था कि उन्हें किसी भी बीमारी से डरने की ज़रूरत नहीं है और इसीलिए मास्क वगैरह जैसे विशेषज्ञों की अन्य सलाहों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। कुछ लोग तो ये भी मानते हैं कि कहीं चर्च ने इस वायरस को जानबूझ कर तो नहीं फैलाया, ताकि ‘क़यामत’ सम्बन्धी बातों को सच साबित किया जा सके।

2019 में इस चर्च के अनुयायियों की संख्या काफ़ी तेज़ी से बढ़ी थी। कई अन्य देशों में भी इस चर्च ने अपनी शाखाएँ खोल रखी हैं। उनका वुहान में भी एक ब्रांच है, जहाँ से ये वायरस पूरी दुनिया में फैला। कहा जा रहा है कि इस चर्च के लोग दो बार पहले भी ऐसी बीमारियाँ फैलाने का प्रयास कर चुके हैं। पिछले कुछ दिनों में इसके लोग काफ़ी यात्राएँ कर रहे थे। कुछ लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि इस चर्च का ईसाइयत से कोई लेना-देना है ही नहीं और जीसस क्राइस्ट के नाम पर ली मैन ही अपने विचारों को फैला रहे हैं और थोप रहे हैं। उनका तो यहाँ तक दावा है कि वो अमर हैं।

ली मैन ही बताते हैं कि उन्हें सीधा जीसस द्वारा भेजा गया है और बाइबिल को सही से वही समझा सकते हैं। हालाँकि, ईसाईयों का अन्य समूह उनकी इस बात को पूरी तरह नकार देता है। दक्षिण कोरिया में हॉस्पिटलों में जगह नहीं बची है और कई मरीजों को ही वापस भेज दिया गया, जिससे घर में ही उनकी मौत हो गई। ऐसे में एक चर्च की उलटी-सीधी हरकतों और अजीबोगरीब विचारों के कारण जो खतरा और बढ़ गया है, उससे लोग गुस्से में हैं। इस चर्च के लाखों सदस्य हैं और कई तो सार्वजनिक रूप से ऐसा जाहिर ही नहीं करते लेकिन प्राइवेट में चर्च के अनुयायी के रूप में काम करते हैं। इसे ही शायद इनलोगों ने ‘सेक्रेसी’ कहा है।

लोग विरोध कर रहे हैं। वो कह रहे हैं कि शिनचेओंजी चर्च को बंद किया जाए और इसके सभी सदस्यों की जाँच की जाए। चर्च के संस्थापक ने अपने सभी अनुयायियों को एक पत्र लिख कर कहा है कि उनका विश्वास नहीं डिगना चाहिए, वो सभी ठीक हो जाएँगे। फ़िलहाल इस अन्धविश्वास से खतरा दक्षिण कोरिया में कई गुना बढ़ गया है, जिसे अगर ये चर्च चाहता तो रोक सकता था लेकिन उसने सरकार का सहयोग नहीं किया।

सबसे खतरनाक बात तो ये है कि ली मैन ही एक नई दुनिया बनाने की बात करते हैं, एक नए स्वर्ग की बात करते हैं। उस ‘नई पृथ्वी’ और ‘नए स्वर्ग’ में केवल उनके अनुयायी ही जाएँगे, ऐसा उनका वादा है। ऐसे में ये सवाल भी जायज है कि क्या ये चर्च सचमुच जीसस के नाम पर जनता के बीच डर फैलाने के लिए बीमारियों का सहारा ले रहा है, ताकि ‘क़यामत’ का डर दिखा कर लोगों को अपना अनुयाई बना सके। सवाल तो ये भी है कि कहीं ‘दूसरी दुनिया’ में जाकर जान बचाने की लालच को बढ़ावा देने के लिए तो कहीं ऐसा नहीं किया जा रहा?

3 हफ्ते में सरेंडर करो: भीमा कोरेगाँव मामले में 2 ‘अर्बन नक्सलियों’ की जमानत याचिका ख़ारिज, पासपोर्ट होगा जब्त

महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने माओवादियों से संबंध रखने के आरोपी गौतम नवलखा और आनंद तेलतुंबडे की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट जज अरुण मिश्रा और जस्टिस एम. आर. शाह की बेंच ने ‘अर्बन नक्सल’ गौतम नवलखा और तेलतुंबडे को आत्मसमर्पण करने के लिए तीन हफ्तों का समय दिया है। साथ ही दो जजों की इस बेंच ने दोनों आरोपितों को जल्द से जल्द अपना पासपोर्ट जमा करने का आदेश दिया है।

ध्यातव्य है कि अदालत ने छह मार्च को दोनों कार्यकर्ताओं को दी गई गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा को आज यानी 16 मार्च तक बढ़ा दिया था। जिस पर आज सुनवाई हुई। तेलतुंबडे और नवलखा ने अग्रिम जमानत के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख पिछले साल नवंबर में तब किया था जब गिरफ्तारी से बचने के लिए पुणे की सत्र अदालत ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी।

याद रहे कि 18 दिसंबर को पुलिस ने 19 के ख़िलाफ़ आरोप तय किए थे। इनमें सुधीर धावले, रोना विल्सन, सुरेंद्र गडलिंग, महेश राउत, शोमा सेन, अरुण फेरेरा, वर्नोन गोंजाल्वेस, सुधा भारद्वाज और वारवरा राव शामिल थे। ख़बर के अनुसार, इस मामले को ‘पीएम नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िश’, ‘सरकार को उखाड़ फेंकना’, ‘भारत सरकार के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ना’ ग़ैर-क़ानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम (UPA) के तहत दर्ज किया गया था। दर्ज किए गए मामले में कहा गया था कि कुछ लोग प्रतिबंधित भाकपा-माओवादी पार्टी के सदस्य थे। अगर ‘भारत के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ने’ के तहत उन्हें दोषी पाया जाता है, तो उन्हें IPC धारा-121 के अनुसार मौत की सज़ा या आजीवन कारावास का सामना करना पड़ेगा।

अपनी चार्जशीट में, पुलिस ने यह भी खुलासा किया था कि सभी 19 आरोपित पूर्व पीएम राजीव गाँधी की हत्या के समान रोड शो के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी की हत्या की साज़िश रच रहे थे। इसके अलावा, चार्जशीट में यह भी कहा गया था कि एल्गर परिषद हिंसा आरोपितों द्वारा सरकार को उखाड़ फेंकने और भीम कोरेगाँव में झड़पों के माध्यम से लोगों को उकसाने, उपद्रव करने, भड़काने और आतंकवादी गतिविधियों के लिए कैडर की भर्ती करने समेत अवैध कार्य करना साज़िश का हिस्सा थे।

पुणे पुलिस के अनुसार, 31 दिसंबर, 2017 को शहर में आयोजित एल्गर परिषद कार्यक्रम को सीपीआई (माओवादी) द्वारा वित्त पोषित किया गया था, जो सामाजिक अशांति पैदा करने और सरकार को उखाड़ फेंकने की एक बड़ी साज़िश का हिस्सा थी। पुलिस का कहना है कि भड़काऊ बयानों के कारन 1 जनवरी, 2018 को भीमा कोरेगाँव में हिंसा भड़की थी।

कोरोना को लेकर युवक ने फैलाई फर्जी खबर, मामला तूल पकड़ने के बाद पुलिस ने दर्ज किया केस

कोरोना वायरस इस समय बेहद संवेदनशील मामला है। इसपर इस समय खुद सतर्क रहने के साथ-साथ आस-पास के लोगों में जागरुकता फैलाते रहने की जरूरत है। लेकिन कुछ असामाजिक तत्व ऐसे हैं जो इतने गंभीर विषय पर फर्जी की खबरें फैलाकर माहौल खराब करने की कोशिश कर रहे हैं। मगर, ऐसे लोगों के प्रति अब प्रशासन सख्त हो गया है। यूपी के कर्नलगंज में पुलिस ने ऐसे ही युवक के ख़िलाफ़ केस दर्ज किया है। युवक पर आरोप है कि उसने कोरोना के खतरे को लेकर आपत्तिजनक ट्वीट किया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, युवक की हरकत का मालूम पड़ते ही पुलिस एक्शन में आई और उसके ख़िलाफ एफआईआर दर्ज की गई। युवक की पहचान नितीश साहू के रूप में हुई। पुलिस का कहना है कि आरोपित की तलाश कर उसपर कार्रवाई की जाएगी।

हिंदुस्तान की खबर के मुताबिक, नितिश की आईडी से आपत्तिजनक ट्वीट करने का मामला प्रकाश में आया है। उसने ट्वीट किया था कोरोना के कारण एक धार्मिक स्थल सील कर दिया गया है। इसके अलावा कई आपत्तिजनक बातें लिखी थी। भड़काऊ टिप्पणी से माहौल खराब होने का डर बन गया। सोशल साइट्स पर एक दूसरे के खिलाफ लोगों ने टिप्पणी शुरू कर दी।

मामला संज्ञान में आने के बाद कर्नलगंज पुलिस ने नितीश साहू के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। अब साइबर सेल की मदद से पता लगाया जा रहा है कि नीतिश साहू कौन है।

हालाँकि, अभी तक यह मालूम नहीं चल पाया है कि नितीश के नाम पर असली आईडी से मैसेज किया गया है या फिर फेक आईडी से। लेकिन फिर भी पुलिस की जाँच इस मामले पर जारी है। पुलिस का कहना है कि व्यक्ति की खोज करके उसपर कार्रवाई होगी।

गौरतलब है कि अभी दो दिन पहले सिविल लाइंस पुलिस ने नेशनल पापुलेशन रजिस्ट्रर माँगने की फर्जी अफवाह फैलाने के आरोप में एफआईआर दर्ज की थी। इससे पूर्व भी भड़काऊ भाषण पर कर्नलगंज, सिविल लाइंस, धूमनगंज, करेली, फूलपुर और मुट्ठीगंज पुलिस एफआईआर दर्ज कर कार्रवाई कर चुकी है।