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कोरोना वायरस: मोदी सरकार की तैयारियों को WHO ने बताया असाधारण, ‘क्वारंटाइन सेंटर’ में तगड़ी व्यवस्था

भारत ने कोरोना वायरस के खतरों से निपटने के लिए जिस तरह की तैयारी की है, उससे अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ भी प्रभावित हैं। एयरपोर्ट्स पर स्क्रीनिंग की व्यवस्था की गई है और काफ़ी पहले से ही विदेश से आने वाले लोगों का मेडिकल टेस्ट किए जाने की शुरुआत कर दी गई थी। भारत में ‘वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाईजेशन’ के प्रतिनिधि हेंक बेकेडम ने कहा कि कोरोना वायरस के खतरों से निपटने के लिए भारत सरकार और ख़ासकर प्रधानमंत्री कार्यालय की प्रतिबद्धता असाधारण किस्म की रही है। उन्होंने भारत के प्रयासों को प्रभावशाली करार दिया।

डब्ल्यूएचओ ने माना है कि मोदी सरकार के प्रयासों के कारण भारत आज कोरोना वायरस से निपटने के मामले में अच्छा कर रहा है। डब्ल्यूएचओ के अधिकारी बेकेडम ने कहा कि जिस तरह से पूरी प्रक्रिया अपनाई गई, उससे वो खास प्रभावित हैं। उन्होंने कहा कि उनकी संस्था के पास हेल्थ रिसर्च डिपार्टमेंट में रिसर्च के लिए अच्छी-ख़ासी व्यवस्था है। उन्होंने कहा कि अब इस रिसर्च का भारत भी हिस्सा बनेगा। इसका अर्थ है कि सरकार ठीक दिशा में काम कर रही है।

इसी तरह केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने भी दिल्ली से सटे एक आइसोलेशन सेंटर के भीतर का एक वीडियो ट्वीट किया, जिसे एक व्यक्ति ने बनाया था। वो आइसोलेशन सेंटर की व्यवस्थाओं से काफ़ी ख़ुश दिखा था कि कैसे सरकार कोरोना वायरस से निपटने के प्रति न सिर्फ गंभीर है बल्कि लोगों का ख्याल भी रख रही है। वो व्यक्ति जर्मनी से दिल्ली आया था, जहाँ ‘क्वारंटाइन सेंटर’ में सभी लोगों को अलग-अलग कमरे दिए गए हैं, भोजन अच्छा और स्वादिष्ट मिल रहा है, स्वच्छ जल की व्यवस्था है और लोगों को नए तौलिए-कपड़े दिए गए हैं।

उसने बताया कि जब वो जर्मनी से लौट कर यहाँ आया तो उसे शंका थी कि न जाने कैसी व्यवस्था होगी लेकिन यहाँ आने पर पता चला कि सारी व्यवस्थाएँ चुस्त-दुरुस्त हैं। नीचे संलग्न किए गए वीडियो में आप उक्त व्यक्ति का बात सुन सकते हैं:

दिल्ली से 70 किलोमीटर की दूरी पर एक 400 बेड का ‘क्वारंटाइन सेंटर’ बनाया है, जहाँ विदेश से आने वाले लोगों को 14 दिनों के लिए रखा जा रहा है। नोएडा सेक्टर 39 स्थित जिला अस्पताल में ये सारी व्यवस्था की गई है। यहाँ पर्याप्त मात्रा में डॉक्टरों के साथ-साथ पैरामेडिकल स्टाफ्स की भी तैनाती की गई है। इस ‘क्वारंटाइन वार्ड’ को महज 10-12 घंटों में तैयार कर लिया गया। चीन, इटली, ईरान, जर्मनी और स्पेन से लौटने वालों पर कड़ी नज़र रखी जा रही है।

‘भारत, भ्रष्ट, मरा हुआ…’ – गालीबाज ट्रोल स्वाति चतुर्वेदी ने जहरीली राणा अयूब को कहा- नीच, स्वघोषित पत्रकार

एक अजीब घटना सामने आई है। इसमें फेक न्यूज़ फैलाने को लेकर हमेशा ट्रोल होने वाली बकलोल पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी ने इस्लामी (खुद को लेकिन पत्रकार बताती है) राणा अयूब के कोरोना वायरस पर असंवेदनशील ट्वीट को लेकर उनके ऊपर हमला किया। दरअसल राणा अयूब ने 16 मार्च को कोरोना वायरस को लेकर एक ट्वीट किया।

इसमें राणा ने जोर देकर लिखा कि नैतिक रूप से भ्रष्ट होने के कारण भारत में हर कोई अंदर से इतना ‘मरा’ है, कि एक वायरस इन्हें (भारतीयों को) क्या मार सकता है? भारत में अब तक विदेशी नागरिक समेत 126 लोग कोरोना वायरस से संक्रमित पाए गए। इससे अब तक तीन मौतें हो चुकी हैं। राज्यों ने बीमारी के प्रसार को रोकने के लिए एहतियाती कदम उठाए हैं। 

राणा अयूब के इस ट्वीट पर लोगों ने उन्हें काफी लताड़ा, लेकिन आश्चर्य की बात ये है कि इस ट्वीट के लिए उन्हें उन लोगों ने भी लताड़ा, जो कि पहले खुद अपमानजनक और घृणित व्यवहार कर चुके हैं।

स्वाति चतुर्वेदी ने राणा अयूब को कहा ‘घृणित इंसान’

खुद को ‘पत्रकार’ बताने वाली गालीबाज ट्रोल स्वाति चतुर्वेदी ने राणा अयूब के ट्वीट को मौकापरस्त बताते हुए उन्हें ‘घृणित इंसान’ बताया।

उन्होंने एक और ट्वीट किया, जिसमें अयूब को नीच इंसान कहा। अयूब पर आगे हमला करते हुए चतुर्वेदी ने कहा कि उन्हें उन लोगों के लिए खेद है, जो खुद को ‘पत्रकार’ मानते हैं।

काफी ताज्जुब की बात है कि कुछ साल पहले तक राणा अयूब के तारीफों की पुल बाँधने वाली स्वघोषित ‘पत्रकार’ स्वाति चतुर्वेदी आज उसके खिलाफ जहर उगल रही हैं।

अब ऐसा लगता है कि चतुर्वेदी ने इस तरफ इशारा किया कि राणा अयूब कहीं कहीं तथ्यात्मक रूप से गलत थी, जिसके बाद अयूब ने उन्हें ब्लॉक कर दिया।

अब जब दो मित्र शत्रु हो गए हैं, तो हम अपने पाठकों पर यह छोड़ते हैं कि वो बताएँ कि ये लड़ाई किसने जीती? स्वाति चतुर्वेदी या फिर राणा अयूब? पोल का बटन दबाएँ और अपना विजेता चुनें 🙂

नवजात की हत्यारन भीड़, अब कोरोना पर नहीं सुन रही निर्देश: मानवता के लिए ख़तरा बना शाहीन बाग़ प्रदर्शन

शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारी अब मानवता के लिए ख़तरा बन कर उभर रहे हैं। जहाँ एक तरफ सरकार लोगों से अपील कर रही है कि भीड़ न जुटाएँ और किसी भी सामाजिक फंक्शन इत्यादि का हिस्सा न बनें, शाहीन बाग़ में सीएए के विरोध के नाम पर बैठी महिलाएँ वहाँ से हटने का नाम ही नहीं ले रही है। दक्षिण कोरिया में एक चर्च की जिद के कारण 5000 से भी अधिक लोग कोरोना वायरस की चपेट में आ गए। ठीक उसी तरह, दिल्ली का शाहीन बाग़ एक खतरनाक स्पॉट बन कर भर रहा है, जहाँ डॉक्टरों व विशेषज्ञों की हर सलाह को धता बताया जा रहा है।

शाहीन बाग़ का धरना 95 दिनों से लगातार जारी है। अब महिलाएँ वहाँ भूमि पर बैठने की बजाए लकड़ी की चौकियों पर बैठी हुई हैं। जहाँ भारत सरकार कोरोना वायरस से बढ़ते ख़तरे को देखते हुए तमाम तरह के बचाव व सावधानी के उपायों से जनता को अवगत कर उन्हें जागरूक बना रही है, शाहीन बाग़ वाले उपद्रवी अब भी जिद पर अड़े हुए हैं। प्रदर्शनकारियों ने कहा है कि वो मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के उस आदेश को मानेंगी, जिसमें 50 से ज्यादा लोगों के एक साथ एक जगह न जुटने की बात कही गई है।

इस धरने में रोज शामिल हो रहे राकिब ने ‘आजतक’ को बताया कि अगर 50 लोग जुटते हैं तो उन्हें कोरोना नहीं होगा, इसकी गारंटी कौन देगा? शाहीन बाग़ में 2 मीटर की दूरी पर 100 तख़्त लगा दिए गए हैं और हर तख़्त पर दो-दो महिलाओं को बिठाया गया है। राकिब ने मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर निशाना साधते हुए कहा कि जब दंगे हुए तब उन्होंने हमारा साथ क्यों नहीं दिया? तब उन्होंने कोई आदेश क्यों नहीं जारी किया? उसने आम आदमी पार्टी को मिनी भाजपा बताते हुए कहा कि केजरीवाल ने अमित शाह से मिलने के बाद कन्हैया कुमार के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी।

शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों ने पूछा कि 50 लोगों की भीड़ न जुटने वाले आदेश के पीछे का मेडिकल आधार क्या है? उन्होंने आरोप लगाया कि कोरोना वायरस के नाम पर शाहीन बाग़ के प्रदर्शन को ख़त्म करने की साजिश रची जा रही है। सबने आरोप लगाया कि केजरीवाल लोगों से बात करने की बजाए सब को डरा रहे हैं। रुस्तम नामक व्यक्ति ने सीएए को ‘काला क़ानून’ करार देते हुए कहा कि जब ये लागू हुआ, तब राज्य सरकार क्या कर रही थी? उसने पूछा कि अब उनके पास इतनी पावर कहाँ से आ गई और अगर पावर थी तो दिल्ली को जलने क्यों दिया?

वैसे ये पहली बार नहीं है कि शाहीन बाग़ में इस तरह की असंवेदनशीलता दिखाई जा रही है। इससे पहले एक नवजात शिशु की मौत हो गई थी। उसे उसकी अम्मी हमेशा भीषण ठण्ड में भी प्रदर्शन में लेकर जाती थी। मौत के बाद उसके वहाँ की कई महिलाओं ने कहा था कि अल्लाह की बच्ची है, अल्लाह ने बुला लिया। भाजपा नेता अमित मालवीय ने याद दिलाया कि 1918 फ़िलेडैल्फ़िया में एक परेड को रोके जाने को कहा गया लेकिन उनकी जिद के कारण स्पेनिश फ्लू फैला और स्पेन की 80% जनसंख्या संक्रमित हो गई। लाखों की मौत हो गई थी।

नग्न अवस्था में लड़की का शव बरामद, पत्थर से कुचला गया सिर: हैदराबाद में फिर से दरिंदगी

तेलंगाना में गैंगरेप (अनुमानित) के बाद हत्या जैसा एक और मामला सामने आया है। इस बार घटना हैदराबाद के छेवाला की है। सोमवार को यहाँ एक लड़की का शव बरामद हुआ। वो भी नग्न अवस्था में! लड़की के हाथ रस्सी से बँधे थे। उसका मुँह पत्थर से कुचला जा चुका था। सोने के गहने- जैसे अंगूठी और चेन उसके शरीर पर ही थे। और चूड़ियाँ शव के आसपास पड़ी थीं।

मीडिया खबरों के अनुसार आरोपितों का मालूम अभी नहीं चल पाया है। मगर, पुलिस का कहना है कि हत्या करने वालों ने लड़की की पहचान छिपाने के लिए हाथ बाँधकर उसका मुँह कुचला। शमसाबाद के डीसीपी एन प्रकाश रेड्डी के मुताबिक मृतिका की उम्र 25 से 30 साल थी।

पुलिस ने बताया कि सोमवार को करीब 7 बजे तंगेदुपल्ली (Tangedupally) गाँव के ग्रामीण जब शौच के लिए गए, तब उन्होंने शव को देखा और उन्हें सूचित किया। इसके बाद पुलिस मौक़े पर पहुँची और शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेजा। अब पुलिस सीसीटीवी फुटेज इकट्ठा करके मामले की जाँच कर रही है।

जाँच में जुटे इंस्पेक्टर का इस मामले पर कहना है,“हमें आशंका है कि हमलावरों ने पीड़िता की गला घोंटकर हत्या कर दी और शव को यहाँ फेंक दिया। शरीर को फेंकने के बाद उसके चेहरे को कुचला गया। हम अधिक सुराग खोजने के लिए आसपास के क्षेत्रों में पड़ताल कर रहे हैं। हमें यह देखने के लिए पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का इंतजार करना होगा कि क्या पीड़िता का यौन उत्पीड़न किया गया था।”

फिलहाल, बता दें कि पुलिस ने मृतिका से संबंधित सभी जानकारी शहर के सभी जिलों के पुलिस थाने में भेज दी है। अब पुलिस अधिकारी इस पर जाँच शुरू करके फॉरेंसिंक प्रमाण जुटा रहे हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले तेलंगाना में ही पशु चिकित्सक रेड्डी की गैंगरेप के बाद नृशंस हत्या का मामला सामने आया था। इस वाकये में चारों आरोपितों ने डॉ रेड्डी का मदद के बहाने दुष्कर्म किया था और बाद में उन पर पेट्रोल डालकर उन्हें जला दिया था। हालाँकि बाद में चारों आरोपित पकड़े गए थे और पुलिस की हिरासत से भागने की कोशिश करने के दौरान एनकाउंटर में मारे भी गए थे।

प्रीति से पहले 9 और महिलाओं को रेप के बाद जलाकर मारा था: हैदराबाद में ढेर किए गए दरिंदे पुराने हवसी

1 मिनट का VIDEO, जिससे सुलझी हैदराबाद रेप ऐंड मर्डर केस की गुत्थी

टेलीग्राफ है? बकवास ही करेगा: हिन्दू-घृणा से बजबजाते अखबार ने दलितों को वायरस कहा

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए नामित किया गया है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राज्यसभा के लिए नामित किया है। चीफ जस्टिस के रूप में अपने करीब साढ़े 13 महीने के कार्यकाल में रंजन गोगोई ने कई एतिहासिक फैसले सुनाए। इसमें अयोध्या राम जन्मभूमि का भी फैसला भी शामिल था। उन्होंने असम एनआरसी, राफेल, सीजेआई ऑफिस को आरटीआई के दायरे में शामिल करने जैसे ऐतिहासिक फैसले भी सुनाए। गोगोई पिछले साल 17 नवंबर 2019 को सीजेआई के पद से रिटायर हुए थे। 

उनके राज्यसभा के लिए नामित होने पर लिबरल गैंग और कॉन्ग्रेस द्वारा विवादों में घसीटना तो तय ही था, क्योंकि अयोध्या पर उनके फैसलों ने लिबरल गैंग के कलेजे में आग लगाने का काम किया था। हिंदू विरोधी मानसिकता वाले लिबरल इनके खिलाफ मुँह फाड़ने का मौका ढूँढ रहे थे और अब उन्हें यह मौका मिल गया है। अब जब हिंदू विरोधी मानसिकता का प्रदर्शन करना है तो भला टेलीग्राफ कैसे पीछे रहता, जो हमेशा ही अपनी हिन्दुओं से धार्मिक घृणा वाली छवि को प्रदर्शित करता रहता है। ये चर्चा में ही तभी आते हैं, जब इनकी कोई घटिया हेडलाइन ट्विटर पर शेयर करता है। अब तो ऐसा है कि यही इनका यूएसपी बन चुका है कि टेलीग्राफ है, बकवास ही करेगा।

द टेलीग्राफ की हेडलाइन

रंजन गोगोई मामले में भी द टेलीग्राफ ने एक बार फिर से ऐसा ही बकवास करने का काम किया है। हालाँकि, इस बार तो इस अखबार ने सारी मर्यादा और गरिमा को ताक पर रख दिया है। इनकी दलितों के प्रति नफरत की पराकाष्ठा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन्होंने देश के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को ही वायरस कह दिया। अब आप समझ सकते हैं जो तथाकथित मीडिया संस्थान राष्ट्रपति की तुलना वायरस से कर सकता है, उनके मन में दलितों के लिए कितनी नफरत भरी होगी। राष्ट्रपति जैसी कुर्सी, जो राजनीति से हमेशा दूर रखी जाती है, उस पर इस तरह की घृणित और जातिवादी टिप्पणी बहुत ही निचले दर्जे की सोच और पत्रकारिता का परिचायक है।

वैसे ये इनका एक दिन का काम नहीं है। ये वर्षों से हिंदू-घृणा से बजबजाते रहे हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि यह अखबार बंगाल से छपता है, मगर बंगाल से छपने वाला अखबार होने के बावजूद ममता के शासन में यह पेपर भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या, हर जिले में हो रहे मजहबी दंगों और तमाम अपराधों से जलते बंगाल पर चुप्पी साध लेता है। ऐसे तमाम मौकों पर इनकी बुद्धि घास चरने चली जाती है और बेहूदे हेडलाइन सुझाने वाले एडिटरों की रीढ़ की हड्डी गायब हो जाती है। पश्चिम बंगाल सरकार के तलवे चाटने वाले इस अखबार की विशेषता ही ‘शब्दों से खेलने’ भर की रही है। इनका सारा ज्ञान हेडलाइन में अपनी जातिवादी घृणा, हिन्दुओं से धार्मिक घृणा आदि में ही बहता रहता है। 

मुँह फाड़ने वाले इन लिबरलों और तथाकथित मीडिया संस्थानों को यहाँ पर यह बताना जरूरी है कि रंजन गोगोई को भाजपा या फिर किसी अन्य पार्टी ने राज्यसभा के लिए नामित नहीं किया बल्कि राष्ट्रपति की तरफ से नामित किया गया है। राज्यसभा में 12 सदस्य राष्ट्रपति की ओर से मनोनीत किए जाते हैं। ये सदस्य अलग-अलग क्षेत्रों की जानी मानी हस्तियाँ होती हैं और कई अभूतपूर्व फैसला देने वाले रंजन गोगोई पूर्वोत्तर से सर्वोच्च न्यायिक पद पर पहुँचने वाले इकलौते शख्स हैं।

द टेलीग्राफ की रिपोर्ट में लिखा गया

वैसे सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस रंजन गोगोई को राज्य सभा के लिए चुने जाने से जिन-जिन तथाकथित निष्पक्ष कॉन्ग्रेसी लोगों की जली है, वो अगर एक बार इतिहास में दर्ज कॉन्ग्रेस के अजीब और अद्वितीय कारनामों को देख लें तो शायद उन्हें भी पता चल जाएगा कि रंजन गोगोई से पहले भी भारत के एक और मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य न्यायाधीश राज्य सभा की शोभा बढा चुके हैं। अंतर सिर्फ इतना है कि गोगोई जहाँ नामित सदस्य के तौर पर राज्यसभा के सदस्य बने हैं, वहीं पहले वाले दोनों जज कॉन्ग्रेस पार्टी के टिकट पर राज्यसभा पहुँचे थे।

हम यहाँ बात कर रहे हैं हाई कोर्ट के पूर्व मुख्‍य जज और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश बहरुल इस्लाम एवं पूर्व सीजेआई रंगनाथ मिश्रा की। रंजन गोगोई को मनोनीत किए जाने पर विपक्ष ने हाय-तौबा मचाया और हिंदू विरोधी द टेलीग्राफ ने भी अपनी रिपोर्ट में लिखा कि भारतीय इतिहास में इससे पहले कभी भी रिटायर होने के कुछ महीने बाद पूर्व CJI को उच्च सदन में नामांकित नहीं किया गया था। अगर इन्होंने इतिहास को पलटने की जहमत उठाई होती तो इन्हें पाता होता कि ये पहली बार नहीं है। साल 1988 में कॉन्ग्रेस शासनकाल में एक अन्य पूर्व सीजेआई रंगनाथ मिश्रा को राज्यसभा सांसद बनाया जा चुका है।

मगर द टेलीग्राफ इसके बारे में नहीं बताएगा, क्योंकि ये कॉन्ग्रेस के शासनकाल में हुआ था न और अभी बीजेपी शासनकाल में हो रहा है और वो भी अयोध्या मामले पर फैसला सुनाने वाले पूर्व सीजेआई के साथ, तो मुँह तो फाड़ेंगे ही न। इंदिरा गाँधी ने बहरुल इस्लाम को हाई कोर्ट के मुख्य जज के रूप में रिटायर होने के 9 महीने बाद फिर से उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया। बहरुल इस्लाम को कॉन्ग्रेस ने तीन बार राज्यसभा भेजा। उन्हें कॉन्ग्रेसियों के खिलाफ मुकदमों में कानून और न्याय की ऐसी की तैसी करके बचाने में महारत हासिल थी। सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में उन्होंने बिहार के उस समय के कॉन्ग्रेस सीएम जगन्नाथ मिश्रा के खि‍लाफ जालसाजी और आपराधिक कदाचार के मामले में क्लीन चिट देते हुए उनके खिलाफ मुकदमा चलाने से मना कर दिया था।

वैसे देखा जाए तो कॉन्ग्रेस की सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को उनके हितों की रक्षा करने पर पुरष्कृत करने की परंपरा रही है और इसका अनुपालन राजीव गाँधी ने भी किया। पूर्व चीफ जस्टिस रंगनाथ मिश्रा को 1984 में हुए सिखों के नरसंहार की जाँच का काम सौंपा गया था, जिसमें उन्होंने दंगों के लिए किसी को भी जिम्मेदार नहीं ठहराया था। उन्हें अपनी जाँच में सिवाय पुलिस की लापरवाही के किसी भी कॉन्ग्रेसी का हाथ नहीं दिखा था। इसका परिणाम यह हुआ कि उन्हें बाद में पुरस्कृत कर 1988 में राज्यसभा का सदस्य बनाया। आज जो कॉन्ग्रेस आक्रोशित और हताश होकर हाय-तौबा मचा रही है, वो इसलिए कि आज के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश कॉन्ग्रेस के 10 जनपथ से सोनिया गाँधी के इशारों को समझना बंद कर दिया है। साथ ही इनके अंदर यह डर भी बैठ गया है कि उनके पुराने पापों पर सुप्रीम कोर्ट के आगामी निर्णय कहीं उनको भारत की राजनीति से विलुप्त न कर दें।  

द टेलीग्राफ के घटिया हेडलाइन ट्विटर पर शेयर होने के साथ ही लोगों ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देना शुरू कर दिया। लोगों ने लिखा कि लिबरलों को दलित से इतनी घृणा है कि राष्ट्रपति की तुलना वायरस से कर सकते हैं तो फिर दलितों के लिए इनकी सोच क्या होगी। एक ने लिखा कि सिर्फ लिबरल ही राष्ट्रपति की तुलना घातक वायरस से कर सकते हैं। प्रभात यादव नाम के एक अन्य यूजर ने लिखा, “वैसे नाम की मारने में हमलोग भी सिद्धहस्त हैं, लेकिन वामी छुछुन्दरों को छुछुन्दर ही रहने देना प्रकृति के साथ न्याय होगा।”

BJP और RSS ने ही दिल्ली में मुस्लिमों को मारा: ताहिर को बचाने के लिए पगलाए ‘स्क्रॉल’ ने याद किया बाबरी और गुजरात

प्रोपेगंडा परस्त पोर्टल ‘स्क्रॉल’ ने एक बार फिर से मस्जिदों और कथित अल्पसंख्यकों का राग अलापते हुए भाजपा पर निशाना साधा है। उसने लेख की शुरुआत ही एक ऐसे तथ्य के साथ की है, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं है। ‘स्क्रॉल’ लिखता है कि दिल्ली में हुए दंगों में भाजपा के कार्यकर्ताओं और स्थानीय मुस्लिमों के बीच लड़ाई हुई। एक हिन्दू-विरोधी दंगे को इस तरह से एक पार्टी और समुदाय विशेष के बीच का संघर्ष इतनी आसानी से बता देने का काम ‘स्क्रॉल’ जैसे प्रोपगैंडिस्ट वेबसाइट ही कर सकते हैं। ‘स्क्रॉल’ लिखता है कि इन दंगों में समुदाय विशेष को निशाना बनाया गया, उन्हें मारा गया और उनके व्यापारिक प्रतिष्ठानों को जला डाला गया।

जबकि अगर आप ऑपइंडिया पर दंगों की कवरेज देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि सच्चाई कुछ और है। इन हिन्दू-विरोधी दंगों में हिन्दुओं की दुकानों को चुन-चुन कर जलाया गया। 19 साल के विवेक के सिर में ड्रिल कर दिया गया। जब ये क्रूरता हुई, तब वो अपनी दुकान में ही बैठे हुए थे। जिन दिलबर नेगी के हाथ-पाँव काट कर उन्हें जिन्दा जला दिया गया, वो भी किसी की दुकान में ही काम करते थे। ऐसी कई घटनाएँ हैं, जो बताती हैं कि हिन्दुओं की दुकानों को चुन-चुन कर निशाना बनाया गया।

फिर ‘स्क्रॉल’ घूम-फिर कर मस्जिदों पर आ जाता है। उसने लिखा है कि मस्जिदों को निशाना बनाया गया और ऐसा हिन्दुओं ने किया। जबकि उसने शिव विहार के प्राचीन हनुमान मंदिर का कोई जिक्र नहीं किया है, जिस पर हमला किया गया और उसे बचाने के लिए हिन्दुओं ने बम और पत्थर सहे। या फिर चाँदबाग़ का वो शिव मंदिर, जिसकी छत पर ईंट-पत्थरों का जमावड़ा लगा हुआ था। ये सभी तो मंदिर थे, फिर उनका जिक्र इस लेख में क्यों नहीं किया गया? ‘न्यूज़लॉन्ड्री’ जैसे अन्य प्रोपेगंडा पोर्टलों ने भी ये साबित करने का प्रयास किया कि मंदिर पर हमले नहीं किए गए। मजहबी दंगाइयों को बचाने के लिए उन्होंने ऐसा किया।

इसके बाद इस लेख में भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर बेवजह निशाना साधते हुए कहा गया है कि ये संगठन शुरू से मस्जिदों और समुदाय विशेष को निशाना बनाते रहे हैं। बाबरी मस्जिद विध्वंस वाली घटना का भी जिक्र किया गया है। जबकि ये सभी को पता है कि बाबरी मस्जिद वाली घटना एकदम अलग थी और सुप्रीम कोर्ट का राम मंदिर मामले में फ़ैसला आने के बाद भी इस मुद्दे को पकड़ कर रखे रहना ये दिखाता है कि ये प्रोपेगंडा पोर्टल्स साम्प्रदायिकता के बिना एक दिन भी जिन्दा नहीं रह सकते।

इसके अलावा 2002 दंगों की भी बात की गई है, जो नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में हुए। वो तब का समय था, जब देश के विभिन्न राज्यों में दंगे होने आम बात थे और गुजरात कुछ ज्यादा ही अशांत था। उस मामले में भी नरेंद्र मोदी को कोर्ट की क्लीन चिट मिल चुकी है। लेकिन, 2002 के बाद से अब तक गुजरात में कोई बड़ा दंगा नहीं हुआ- इस बात का जिक्र ‘स्क्रॉल’ ने नहीं किया है। उस दौरान कॉन्ग्रेस शाषित राज्यों में अधिकतर दंगे हुए और गुजरात में कॉन्ग्रेस के कार्यकाल में रोज दंगे होते थे- इन सबके बावजूद ‘स्क्रॉल’ ने 2002 का जिक्र किया। लेकिन हाँ, कारसेवकों को जिन्दा जलाने वाली घटना पर प्रोपेगंडा पोर्टल ने चुप्पी साध ली है।

दंगाइयों को बचाने के लिए फिर से सक्रिय हुआ ‘स्क्रॉल’

इसके अलावा दावा किया गया है कि हिन्दुओं ने भड़काऊ नारे लगाए और मस्जिदों के बाहर आपत्तिजनक हरकतें की। अगर ऐसा है तो हमेशा जुमे के दिन ही पुलिस फ़ोर्स को पूरी ताकत लगाने की ज़रूरत क्यों पड़ी? आज भी पड़ती है। ऐसा इसीलिए, क्योंकि मस्जिद में जमा हुई भीड़ ने कई बार निकल कर बवाल किया। दिल्ली ही नहीं, बंगाल सहित अन्य राज्यों में हुए दंगों में भी ये ट्रेंड देखा गया। ‘फक हिंदुत्व’ के पोस्टर लगाने और काली माता को हिजाब पहनाने वाले हरकतें सार्वजनिक रूप से कौन कर रहा था? ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ के नारे को भड़काऊ रूप देकर कौन चिल्ला रहा था?

इस लेख में सुप्रीम कोर्ट तक को नहीं बख़्शा गया है। संविधान की रट लगाने वाले राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय और संसद द्वारा बनाए गए क़ानूनों की अवहेलना करने से भी बाज नहीं आते। सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद विध्वंस की और राम मंदिर के निर्माण का मार्ग क्यों प्रशस्त किया, इस पर आपत्ति जताई गई है। यानी कोर्ट भी अब इन वामपंथियों से पूछ कर फ़ैसला लेगा? अगर कोई अन्य सुप्रीम कोर्ट तो छोड़िए, सेशन कोर्ट के फ़ैसले के बारे में भी कुछ टिप्पणी करे तो यही वामपंथी उस पर संविधान का सम्मान न करने का आरोप मढ़ते हैं।

यह भी दावा किया गया है कि देश भर के मुस्लिमों ने सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या जजमेंट को सिर-आँखों पर रखा और आगे बढ़ गए। ऐसा नहीं है। तीन तलाक, अनुच्छेद 370 और राम मंदिर- इन चारों का गुस्सा सीएए के बहाने हिन्दुओं पर निकाला गया। चूँकि राम मंदिर पर फ़ैसले के समय और अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के समय सुरक्षा व्यवस्था कड़ी थी, इसीलिए दंगाई कुछ नहीं कर पाए। ख़ासकर उत्तर प्रदेश में, जहाँ योगी आदित्यनाथ की सरकार है। इसीलिए उन दंगाइयों ने दिल्ली को चुना, जहाँ चुनाव होने वाले थे। अमानतुल्लाह और ताहिर हुसैन जैसे नेताओं पर लग रहे आरोपों से इसकी पुष्टि भी हो जाती है।

इस लेख में लिबरलों व सेक्युलर वामपंथियों की तरह ही कपिल मिश्रा का रोना रोया गया है। जबकि ये साबित हो चुका है कि कपिल मिश्रा के बयान से पहले ही दंगे शुरू हो गए थे। ताहिर हुसैन के घरों से ट्रक्स में भर कर पत्थर निकले। क्या उन सभी को कपिल मिश्रा के बयान के तुरंत बाद घर में जमा कर लिया गया था? मस्जिदों और मजहबी दंगाइयों के घरों में जैसी तैयारी थी, वो एक दिन में की ही नहीं जा सकती।

कुल मिला कर बात ये है कि इस पूरे लेख में एक बार फिर से दिल्ली के हिन्दू-विरोधी दंगों में कट्टरपंथियों को पीड़ित और हिन्दुओं को हत्यारा साबित करने के प्रयास को पुनर्जीवित किया गया है। ताहिर हुसैन जैसों को बचाने और अंकित शर्मा की हत्या से हिन्दुओं का ध्यान भटकाने के लिए ये प्रोपेगंडा पोर्टल ‘पोस्ट रायट टास्क’ पर काम कर रहे हैं, जिसमें लोगों के दिमाग में ये भरना है कि ये दंगे भाजपा ने कराए थे और संघ ने समुदाय विशेष के लोगों को मारा। पुलिस क्या कहती है, कौन-कौन गिरफ़्तार हुए, जाँच में क्या निकला, जनता क्या कह रही है और वीडियो में क्या दिख रहा है- इन सबसे ऐसे पोर्टलों को कोई मतलब नहीं।

जिसका भाई था Pak की बड़ी हस्ती, उसे न सिर्फ CJI बनाया बल्कि उपराष्ट्रपति भी: इंदिरा गाँधी के शासन की कहानी

भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा के लिए नामित किए जाने पर बुद्धिजीवियों में हलचल है। सोशल मीडिया के हर कोने पर पूर्व सीजेआई द्वारा लिए फैसलों को उनके राज्यसभा के टिकेट से जोड़कर देखा जा रहा है। लेकिन इस बीच ध्यान रहे कि रंजन गोगोई पहले पूर्व सीजेआई नहीं हैं जिनका नाम राज्यसभा के लिए भेजा गया हो। इससे पहले भी कुछ मुख्य न्यायाधीशों का नाम इस सूची में रह चुका है, जिन्हें राज्यसभा तक पहुँचाने का काम कॉन्ग्रेस ने किया। मगर, एक नाम इस लिस्ट में भारत के 11वें सीजेआई मोहम्मद हिदायतुल्लाह का भी है, जो कॉन्ग्रेस के कारण सीधे उपराष्ट्रपति बना दिए गए।

हिदायतुल्लाह 25 फरवरी 1968 से 16 दिसंबर 1970 के बीच देश के 11 वें मुख्य न्यायाधीश रहे। उनकी नियुक्ति राष्ट्रपति जाकिर हुसैन ने की थी। मगर, 4 मई 1969 को राष्ट्रपति पद पर रहते हुए ही डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन का निधन हो गया। इसके तुरंत बाद तत्कालीन उपराष्ट्रपति श्री वराहगिरि वेंकट गिरि को कार्यवाहक राष्ट्रपति बना दिया गया जैसा कि संविधान में पहले से उल्लेखित था। मगर, इसके बाद श्री गिरि ने राष्ट्रपति बनने की इच्छा जाहिर की और इस पद के लिए चुनाव भी लड़ने की बात कही। लेकिन वो कार्यवाहक राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का पद त्याग कर ही ऐसा कर सकते थे।

बस फिर क्या… यहीं से राजनैतिक परेशानियाँ शुरू हुईं। चूँकि संविधान में उस समय तक ऐसा कोई प्रावधान नहीं था कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति की गैर मौज़ूदगी में देश का संवैधानिक प्रधान कौन होगा। इसके लिए काफ़ी विचार विमर्श किया गया और संविधान विशेषज्ञों की राय ली गई। तब 28 मई 1969 को संविधान का एक विशेष सत्र बुलाया गया, जिसमें संविधान के अधिनियम 16 में ये प्रावधान बनाया गया कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का पद रिक्त होने पर सर्वोच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश देश का सर्वोच्च कार्यवाहक संवैधानिक प्रमुख होगा। लेकिन अगर राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश का पद भी रिक्त हो जाए तो सर्वोच्च न्यायालय के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को सर्वसम्मति से कार्यवाहक संवैधानिक प्रमुख बनाया जाएगा।

इसके बाद 20 जुलाई 1969 को वेंकट गिरि ने 12 बजे दोपहर से पहले ही कार्यवाहक राष्ट्रपति पद से इस्तीफ़ दे दिया क्योंकि उनका कार्यकाल उस दिन प्रातः 10 बजे पूर्ण हो रहा था। इसके बाद मोहम्मद हिदायतुल्लाह को कार्यवाहक राष्ट्रपति बनाया गया। इसके लिए पद और गोपनीयता की शपथ सर्वोच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश “श्री जेसी सह” ने दिलाई।

हिदायतुल्लाह 24 अगस्त 1969 तक यानी कुल 35 दिनों तक इस पद पर रहे, जब तक अगले राष्ट्रपति निर्वाचित नहीं हो गए। और इस तरह एक सीजेआई को भारत के पहले कार्यवाहक राष्ट्रपति बनने का गौरव प्राप्त हुआ।

लेकिन इसके बाद भी हिदायतुल्लाह के जीवन में उपाधियाँ दर्ज करने का दौर थमा नहीं। कार्यवाहक राष्ट्रपति का पद त्यागने के लगभग 10 सालों बाद उन्हें 31 अगस्त 1979 को सर्वसम्मति से उपराष्ट्रपति पद के लिए चुन लिया गया और उन्होंने उपराष्ट्रपति रहते हुए अपने 6 साल का कार्यकाल पूर्ण किया और उन्होंने राज्यसभा के सभापति की ज़िम्मेदारी भी निभाई।

बताया जाता है कि मोहम्मद हिदायतउल्लाह इंदिरा गाँधी के प्रिय थे। जिस समय उन्हें बतौर उपराष्ट्रपति चुना गया, उस समय भी इंदिरा गाँधी ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

वैसे तो हिदायतुल्लाह सभी प्रमुख दलों के एकमात्र सर्वसम्मत उम्मीदवार थे, और उनके नाम का समर्थन प्रधानमंत्री चरण सिंह, विपक्ष के नेता जगजीवन राम और अन्य नेताओं ने किया था, जिनमें वाईबी चव्हाण, एचएन बहुगुणा और कमलापति त्रिपाठी भी शामिल थे। लेकिन मुख्य रूप से वे इंदिरा गाँधी के नामांकित व्यक्ति थे और कॉन्ग्रेस (आई) के नेताओं ने यह स्पष्ट कर दिया था कि अगर वे हिदायतुल्ला के नामांकन का विरोध करते, तो वे जनता (एस) का समर्थन नहीं करेंगे। अब जाहिर है इसके बाद उनके उपराष्ट्रपति बनने का किसी ने विरोध नहीं किया और वे सीधे भारत के उपराष्ट्रपति चुने गए।

इस दौरान वे जामिया मिलिया, दिल्ली और पंजाब विश्वविद्यालय के कुलपति भी बने। 31 अगस्त 1984 को उन्होंने उपराष्ट्रपति का कार्यकाल पूरा किया। इसके बाद वो बम्बई रवाना हुए। उनकी रवानगी में स्टेशन पर विदाई देने के लिए स्वयं प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी समेत पीवी नरसिम्हा राव और आर वेंकटरमण मौजूद थे।

यहाँ बता दें कि हिदायतुल्लाह के पिता हाफ़िज विलायतुल्लाह 1928 में भाण्डरा से डिप्टी कमिश्नर एवं डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। सरकारी सेवा में रहते हुए ब्रिटिश सरकार ने श्री हिदायतुल्लाह के पिता को ख़ान बहादुर की उपाधि, केसरी हिन्द पदक, भारतीय सेवा सम्मान और सेंट जोंस एम्बुलेंस का बैज प्रदान किया था।

एक कहानी और भी! हिदायतुल्लाह के भाई थे मोहम्मद इकरामुल्लाह। बँटवारे के समय वो पाकिस्तान चले गए। वह एक प्रमुख पाकिस्तानी राजनयिक थे। इकरामुल्लाह की पत्नी थी शाइस्ता सुहरावर्दी। शाइस्ता हुसैन शहीद सुहरावर्दी की भतीजी थीं। और हुसैन शहीद सुहरावर्दी कौन थे? वो अविभाजित पाकिस्तान के कुछ समय के प्रधानमंत्री थे। वैसे शाइस्ता खुद पहली पाकिस्तानी संविधान सभा की सदस्य भी थीं।

गौरतलब है कि ये कहानी मोहम्मद हिदायतुल्लाह की थी। जिनके न्यायाधीश बनने के बाद कभी परिस्थितियों ने देश के उच्च पद पर आसित करवाया, तो कभी इंदिरा गाँधी के समर्थन ने। मगर, इससे पहले और भी सीजेआई रहे जिन्हें कॉन्ग्रेस के समर्थन से राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया। वर्ष 1998 से 2004 तक कॉन्ग्रेस ने रंगनाथ मिश्रा को राज्यसभा के लिए नामित कराया था। वे देश के 21वें मुख्य न्यायाधीश थे। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज बहरूल इस्लाम भी 1962 और 1968 में कॉन्ग्रेस के टिकट पर राज्यसभा सांसद चुने गए थे। लेकिन आज जब पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई राज्यसभा के लिए मनोनीत किए गए तो कॉन्ग्रेस उन पर तंज कस रही है, कटाक्ष कर रही है और ये दावा कर रही है कि राज्यसभा के लिए पूर्व सीजेआई गोगोई को मनोनीत किए जाने पर न्यायपालिका से जनता का विश्वास कम होता जा रहा है।

वकील➨राज्यसभा➨HC जज➨रिटायर➨SC जज➨राज्यसभा: बहरुल इस्लाम और कॉन्ग्रेसी काल की कहानी

कोरोना वायरस चैलेंज के नाम पर ‘Tik-Tok स्टार’ ने चाटी टॉयलेट सीट: ऐसे स्टंट से बढ़ रहा है संक्रमण का डर, देखें वीडियो

कोरोना वायरस इस समय पूरे विश्व के लिए चुनौती है। हर देश की सरकार इससे लड़ने का प्रयास कर रही है। हर जगह लोगों को इस भयानक संक्रमण से बचाने के लिए जागरूक किया जा रहा है। संक्रमित लोगों से भी निवेदन किया जा रहा है कि वे अस्पताल में रहकर अपना इलाज करवाएँ और सार्वजनिक स्थलों पर जानें से बचे। लेकिन बावजूद इतने प्रयासों के कुछ गैर जिम्मेदार लोगों की संख्या हमें लगातार बढ़ती दिख रही है।

अभी कल की बात है जब मुंबई महानगर के अस्पताल से 11 कोरोना से संदिग्ध संक्रमित लोग सुरक्षाकर्मियों को चकमा देकर फरार हो गए थे। ऐसा सिर्फ़ इसलिए क्योंकि उन्हें जाँच पूरी होने तक आइसोलेशन वार्ड में रख दिया गया था। बाद में इनमें से 1 की रिपोर्ट पॉजिटिव आई थी। इसी तरह, इससे पहले नागपुर में भी 5 लोग अस्पताल से फरार हो गए थे और कर्नाटक में तो कुछ मुस्लिम लोगों ने संदिग्ध होने के बावजूद इस्लाम का हवाला देकर चेक अप करवाने से मना कर दिया था।

अब, इस समय ये सभी लोग कहाँ गए कितने लोगों के संपर्क में आए कुछ नहीं पता। बस लगातार खबरें आ रही हैं कि भारत में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की तादाद बढ़ रही है और आज इससे तीसरी मौत हो गई। अब हालाँकि, हो सकता है अन्य देशों के मुकाबले भारत में इसके कम केस होने के कारण कई लोगों में इसके फैलने का डर कम हो। लेकिन, इसके प्रति बेफिक्र हो जाने से पहले साउथ कोरिया की स्थिति जानने की जरूरत है।

साउथ कोरिया- एक ऐसा देश जहाँ केवल एक गैर-जिम्मेदार शख्स के कारण पूरे देश में कोरोना वायरस फैल गया और कोई कुछ नहीं कर पाया। संक्रमित शख्स के कारण पूरे 1160 लोग संक्रमित हुए और देखते ही देखते ये तादाद बढ़ गई। नतीजतन आज ये देश इस संक्रमण के कारण बदहाल हो चुका है और संक्रमित लोगों की संख्या 6000 के पार तक पहुँच गई है।

ऐसी स्थिति में जब हर माध्यम और हर संसाधम का प्रयोग करके इसकी रोकथाम और इससे बचाव के लिए उपयुक्त कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। वहाँ टिकटॉक पर एक वीडियो वायरल हो गई है। विडियो कोरोना चैलेंज के नाम पर बनाई गई है। इसे बनाने वाली का नाम एवा लुईस है। लुईस अमेरिका के फ्लोरिडा की निवासी है और टिकटॉक पर बहुत सक्रिय है।

एवा ने 15 मार्च को एक वीडियो बनाकर टिकटॉक पर अपलोड की और कैपशेन में लिखा, प्लीज इसे रीट्विट करें, ताकि लोग जान सकें कि विमान में सफाई कैसे की जा सकती है। यहाँ हालाँकि कैप्शन में ऐसा कुछ नहीं है, लेकिन वीडियो यदि देखें तो एवा इसमें कोरोना वायरस के नाम पर टॉयलेट की सीट को जीभ से चाटते देखी जा सकती हैं और ऐसी घटिया हरकत करने के बाद वो अपने हाथ विक्टरी का साइन भी बनाती दिखती हैं। 

सोचिए, एक ओर जहाँ विश्व भर में टिकटॉक का खुमार युवाओं में व्यापक स्तर पर बढ़ चुका है कि वो टिकटॉक पर आने वाले हर चैलेंज को अपनी कलाकारी से पूरा करने की कोशिश करते हैं, वहाँ पर ऐसी विडियो चैलेंज बनाकर डालना कहाँ की समझदारी है? हम मानें या न मानें लेकिन टिकटॉक ने जहाँ लोगों की प्रतिभा को लोगों तक पहुँचने का मंच दिया है, वहीं धूर्त लोगों को भी सामने लाकर रख दिया है। जिनका काम मनोरंजन के नाम पर सिर्फ़ अश्लीलता और अराजकता फैलाना रह गया है।

एवा की वीडियो को देखने के बाद अभी तक किसी यूजर ने उसपर पॉजिटिव रिएक्ट नहीं किया है, जो कि एक संतोषजनक बात है। लेकिन उन लोगों का क्या भरोसा जो हर डिजिटल चुनौती को पूरा करने के लिए आमादा हो जाते हैं और इसी जुगत में लग जाते हैं कि किसी तरह वह भी ऐसे स्टंट करके टिकटॉक स्टॉर बनें और उनकी विडियो भी वायरल हो जाए।

ऐसे संवेदनशील समय में ध्यान रखने की आवश्यकता है कि एवा जैसे लोग उन लोगों से कम नहीं है जो संक्रमित होने के बावजूद अस्पतालों में ईलाज कराने की जगह वहाँ से फरार हो रहे हैं और हजारों की संख्या में लोगों के संपर्क में आकर उन्हें भी बीमार कर रहे हैं। फर्क दोनों में बस ये है कि वे अपने डर के कारण अन्य लोगों को जाने-अंजाने में संक्रमित कर रहे हैं, मगर एवा जैसे लोग जान बूझकर लोगों को संक्रमित होने के लिए प्रोतसाहित कर रहे हैं।


रेप की कोशिश में कॉन्ग्रेसी MLA का साला गिरफ्तार, पंचायत में सिर्फ 2 थप्पड़ मारकर निपटा दिया गया था मामला

छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले में कॉन्ग्रेस विधायक विनय भगत के साले नीतेश भगत को गिरफ्तार कर लिया गया है। विधायक के साले पर आरोप है कि उसने छात्रा को लिफ्ट देने के बहाने सुनसान जगह पर ले जाकर दुष्कर्म का प्रयास किया था। इससे पहले मामले में पंचायत बिठाकर आरोपित को दो थप्पड़ लगाकर माफी मँगवाकर मामले को दबाने का प्रयास किया गया था। 

परीक्षा देकर घर लौट रही नाबालिग छात्रा से छेड़छाड़ का मामला पंचायत ने दो थप्पड़ की सजा सुनाकर रफा-दफा कर दिया। ऐसा इसलिए क्योंकि आरोपित कॉन्ग्रेस विधायक विनय भगत का साला है। महत्वपूर्ण बात ये है कि इसमें थप्पड़ मारने की रस्म आरोपित की बहन यानी विधायक की बहन ने निभाई। इसके साथ ही पीड़िता ने आरोप लगाया कि मामले को पंचायत में ही दबा देने के लिए सरपंच को आरोपित की तरफ से 50 हजार रुपए दिए गए थे। पीड़िता ने बताया कि 50 हजार में से पीड़िता के घर वालों को 10 हजार रुपए दिए गए और बाकी का पैसा पंचायत में रख लिया गया।

जानकारी के मुताबिक 12 मार्च को जशपुर में परीक्षा देकर घर लौट रही छात्रा को नीतेश भगत ने लिफ्ट देने के बहाने उसे अपनी गाड़ी में बैठाया और सुनसान रास्ते का फायदा उठाकर उसके साथ रेप की कोशिश करने लगा। तभी छात्रा ने साहस का परिचय देते हुए युवक का मोबाइल छीनकर वहाँ से भाग खड़ी हुई। घर पहुँचते ही छात्रा ने परिजनों को घटना की जानकारी दी।

जिसके बाद परिजन पीड़िता को लेकर गाँव के सरपंच के घर पहुँचे और पूरे मामले की जानकारी दी। तब सरपंच और उसके पति ने इस मामले में पंचायत में बैठक करने की बात कही। दूसरे दिन पंचायत की बैठक रखी गई। जिसमें सैकड़ों लोग मौजूद थे। बैठक में आरोपित की बहन और विधायक विनय भगत की पत्नी भी पहुँची। बैठक में आरोपित को दो थप्पड़ लगाकर माफी मँगवाकर मामले को रफा-दफा करने का फैसला किया गया। 

पीड़िता पंचायत के फैसले से नाराज होकर 14 मार्च को अपने आधा दर्जन दोस्तों के साथ पुलिस स्टेशन पहुँची और आरोपित नीतेश भगत के खिलाफ कार्रवाई की माँग को लेकर शिकायत दर्ज कराई, जिसके बाद नीतेश भगत के खिलाफ छेड़छाड़ का मामला दर्ज किया गया और फिर कार्रवाई करते हुए आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया। पीड़िता के मुताबिक चूँकि मामला हाईप्रोफाइल नेता के रिश्तेदार से जुड़ा था, इसलिए उस पर लगातार मामले में शिकायत ना करने का दबाव बनाया जा रहा था। जब पीड़िता अपने दोस्तों के साथ शिकायत करने पुलिस स्टेशन पहुँची तो पीड़िता के परिजन और ग्रामीण वहाँ पहुँचकर भी पीड़िता को मामला वापिस लेने का दबाव बनाया गया था।

CM योगी को वकील अब्दुल ने कहा आतंकवादी, पुलिस ने दबोचा: अब खुद पड़ेगी वकील की जरूरत

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ ट्विटर पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में पुलिस ने एक वकील के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया है। रविवार (मार्च 15, 2020) की दोपहर पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहाँ से उसे जेल भेज दिया गया। आरोपित वकील अब्दुल हन्नान के खिलाफ आईटीएक्ट और देशद्रोह की धारा में FIR दर्ज की गई है।

अब्दुल हन्नान के ट्विटर अकाउंट से सीएम के बारे में अभद्र ट्वीट किए गए थे। साथ ही सरकार की नीतियों के बारे में भी गलत बातें लिखीं गई थीं। कुछ ऐसी भड़काऊ बातें भी लिखी थीं, जिससे सामाजिक सौहार्द्र बिगड़ने की आशंका थी। इस बारे में अधिकारियों ने डीआईजी अनंत देव को ट्विटर के माध्यम से जानकारी दी। इसके बाद कल्याणपुर पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज की। 

जाँच के लिए साइबर सेल प्रभारी इंस्पेक्टर लान सिंह की टीम को लगाया गया। पुलिस ने देशद्रोह की धारा 124 (ए) और आइटी एक्ट की धारा 67 के तहत मुकदमा दर्ज कर आरोपित को गिरफ्तार कर लिया। कल्याणपुर थाना प्रभारी अजय सेठ ने बताया कि ट्विटर से आपत्तिजनक पोस्ट को डिलीट करवा दिया गया है। इसके साथ ही आरोपित के फॉलोवर्स और उससे जुड़े अन्य संदिग्धों की भी जाँच की जा रही है। कुछ आपत्तिजनक मिला तो सभी के खिलाफ कार्रवाई होगी।

दरअसल उत्तर प्रदेश रिकवरी ऑफ डैमेज टू पब्लिक एंड प्राइवेट प्रॉपर्टी अध्यादेश के ड्राफ्ट को मंजूरी मिलने के बाद सोशल मीडिया पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। 13 मार्च को भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता शलभमणि त्रिपाठी की ओर से ट्विटर पर मुख्यमंत्री के भाषण का एक वीडियो डालने के बाद कल्याणपुर केशवपुरम निवासी अधिवक्ता अब्दुल हन्नान ने इसे रीट्वीट कर मुख्यमंत्री पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी। 

शलभमणि त्रिपाठी ने वीडियो के कैप्शन में लिखा, “तुम कागज नहीं दिखाओगे, और दंगा भी फैलाओगे, तो हम लाठी भी चलवाएँगे, घरबार भी बिकवाएँगे….और हाँ पोस्टर भी लगवाएँगे।” इसी ट्वीट को रिट्वीट करते हुए अब्दुल हन्नान ने रविवार को सीएम योगी आदित्यनाथ को ‘आतंकवादी’ बता दिया था।

एक अन्य ट्वीट में हन्नान ने ये भी ऐलान किया कि वह प्रदर्शनकारियों को मुफ्त में कानूनी मदद मुहैया कराएगा और साथ ही सभी ‘संविधान के चाहने वालों’ से अपील भी की कि वह इस ट्वीट को शेयर करें।