Home Blog Page 504

मजहबी आतंक खतरनाक… MP हाई कोर्ट ने ISIS आतंकी मोहम्मद शाहिद को जमानत देने से किया इनकार: जिहाद से भारत में शरीयत लागू करने का देख रहा था सपना, हिन्दू देवी-देवताओं का करता था अपमान

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा है कि मजहबी आतंक खतरनाक और त्रासद है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने यह टिप्पणियाँ एक ISIS आतंकी को जमानत देने से इनकार करते हुए की हैं। आतंकी अपने साथियों के साथ भारत समेत पूरी दुनिया में शरिया का राज लाना चाहता था। वह हिन्दुओं को मुसलमान बनाने के मिशन में जुट गया था। वह इस्लामी आतंकी संगठन ISIS और जाकिर नाइक से प्रभावित था। वह जबलपुर की हथियार फैक्ट्री पर हमला करके देश में इस्लामी कानून लागू करना चाहता था। उसने हिन्दू देवी-देवताओं का भी अपमान किया।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में जस्टिस अनुराधा शुक्ला की बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा, “मजहबी आतंकवाद एक त्रासद और खतरनाक सोच है जो मजहब की सच्ची शिक्षाओं को विकृत करती है और लोगों तथा समाज को भारी नुकसान पहुँचाती है। मजहबी आतंकवाद की जड़ें गहरी और जटिल हैं, लेकिन यह समझना महत्वपूर्ण है कि कोई भी धर्म असल रूप में हिंसा या आतंक का समर्थन नहीं करता।” हाई कोर्ट ने कहा कि हम उस आदमी के प्रति कोई दया नहीं दिखा सकते जिस पर आतंक के गंभीर आरोप हैं।

जमानत ना पाने वाले इस ISIS आतंकी का नाम मोहम्मद शाहिद खान है। उसे NIA ने मई, 2023 में पकड़ा था। मोहम्मद शाहिद खान ने NIA की गिरफ़्तारी से जमानत के लिए कोर्ट का रास्ता अख्तियार किया था। लेकिन यहाँ से उसकी जमानत याचिका खारिज हो गई थी। इसके बाद वह मध्य प्रदेश हाई कोर्ट पहुँचा था। यहाँ पर उसने दलील दी कि उसे इस केस में फंसाया गया है और उन लोगों ने कोई अपराध नहीं किया है। हालाँकि, NIA ने उसका सारा कच्चा चिट्ठा कोर्ट के सामने रख दिया।

NIA ने उसके साथ 2 और आतंकी आदिल खान और सैयद मामूर अली पकड़े थे। बाद में अगस्त, 2023 में उनका एक और साथी मोहम्मद काशिफ खान पकड़ा गया था। NIA ने अपनी जाँच में पाया कि यह सभी 2020 के कोविड लॉकडाउन के दौरान जाकिर नाइक को देखते थे। इसके बाद इन्होने जिहाद और ISIS के आतंक के बाद बारे में पढ़ना चालू किया। इन चारों ने यह ठान लिया कि भारत में दुनिया में शरीयत का राज और इस्लामी कानून लाना है। इन लोगों ने हिन्दुओं को इस्लाम में धर्मांतरित होने के लिए भी उकसाया।

इसके अलावा यह चारों अपनी ISIS वाली विचारधारा के प्रसार के लिए एक मस्जिद के बाहर पर्चे भी बाँटते रहे। उन्होंने ISIS और अल कायदा के झंडे वाले पर्चे भी बाँटे। इसके अलावा इन्होने एक व्हाट्सएप ग्रुप भी बनाया जिसमें हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान किया जाता था। इसमें ISIS से सम्बन्धित सामग्री शेयर होती थी। पूरी तरह से आतंकी सोच में पड़ने के बाद इन चारों ने आतंक के जरिए भारत में इस्लामी राज कायम करने का प्लान बनाया। इस काम के लिए हथियार जुटाने को उन्होंने जबलपुर हथियार फैक्ट्री पर हमले की योजना बनाई थी।

इन चारों का प्लान था कि यह जबलपुर फैक्ट्री में ब्लास्ट करेंगे और वहाँ से बड़ी मात्रा में हथियार लूटेंगे। इसके लिए उन्होंने विस्फोटक भी जुटाने चालू कर दिए थे। इस मामले में NIA ने घटना से पहले ही इन्हें गिरफ्तार कर लिया था और इनके मॉड्यूल का भंडाफोड़ कर दिया।

कठमुल्ला कहना हेट स्पीच नहीं, जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ महाभियोग पर लगे रोक: हाई कोर्ट ने खारिज कर दी PIL, कहा- यह सुनवाई के योग्य नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार (7 जनवरी 2025) को एक जनहित याचिका (PIL) खारिज कर दी, जो जस्टिस शेखर कुमार यादव के खिलाफ संसद में दायर महाभियोग प्रस्ताव को चुनौती देने के लिए दाखिल की गई थी। जस्टिस शेखर कुमार यादव के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव उनके उस भाषण को लेकर है, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ विवादास्पद टिप्पणियाँ की थीं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मामले में वकील अशोक पांडे ने जनहित याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता ने माँग की थी कि राज्यसभा के अध्यक्ष को इस महाभियोग प्रस्ताव पर कोई कार्रवाई करने से रोका जाए। याचिकाकर्ता का तर्क था कि जस्टिस यादव ने यह बयान हिंदू समुदाय के सदस्य के तौर पर दिया था और यह बयान नफरत फैलाने वाले भाषण की श्रेणी में नहीं आता।

याचिका में कहा गया कि जस्टिस यादव ने ‘कठमुल्ला’ शब्द का इस्तेमाल उन घटनाओं के संदर्भ में किया जो उनके व्यक्तिगत अनुभवों से जुड़ी थीं। इसमें यह भी कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार जजों को भी है, और उनके द्वारा अदालत के बाहर दिए गए बयान उन्हें जज के पद से हटाने का आधार नहीं हो सकते।

कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए कहा कि यह न्यायसंगत नहीं है। जस्टिस अताउर रहमान मसूदी और जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने स्पष्ट किया कि जनहित याचिका केवल तभी दाखिल हो सकती है जब यह समाज के कमजोर वर्ग के लिए हो। अदालत ने यह भी कहा कि जस्टिस यादव खुद सक्षम हैं और यदि उन्हें लगता है कि उनके खिलाफ अन्याय हो रहा है, तो वे अदालत का रुख कर सकते हैं।

बता दें कि जस्टिस शेखर कुमार यादव ने 8 दिसंबर 2024 को प्रयागराज में विश्व हिंदू परिषद (विधि प्रकोष्ठ) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में भाषण दिया था। इस भाषण में उन्होंने कहा था कि भारत में शासन बहुसंख्यक समुदाय की इच्छाओं के अनुसार चलना चाहिए। साथ ही, उन्होंने ‘कठमुल्ला’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किया, जिसे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ अपमानजनक माना जाता है। उनके इस बयान के बाद विवाद खड़ा हो गया और सांसद कपिल सिब्बल सहित 54 अन्य सांसदों ने राज्यसभा में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किया।

महाभियोग प्रस्ताव में जस्टिस यादव पर ‘अप्रमाणित दुर्व्यवहार’ और ‘अक्षमता’ का आरोप लगाया गया है। प्रस्ताव में कहा गया है कि उनका भाषण नफरत फैलाने वाला है और इससे न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँची है।

जस्टिस यादव ने अपने बयान पर सफाई देते हुए कहा था कि उन्होंने सिर्फ अपनी राय जाहिर की थी। उनके अनुसार, ‘कठमुल्लापन’ मुस्लिम महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को प्रभावित करता है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या उनके बयान ‘सिद्ध दुर्व्यवहार’ की श्रेणी में आते हैं?

इस पूरे विवाद के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने जस्टिस यादव के न्यायिक मामलों का रोस्टर बदल दिया। अब वे केवल 2010 से पहले दाखिल की गई प्रथम अपीलें सुनेंगे। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने भी जस्टिस यादव को तलब कर उनका पक्ष माँगा था।

महँगाई, भारत से लड़ाई, मंत्रियों की रुसवाई… तय थी जस्टिन ट्रूडो की विदाई: कनाडा का PM बनने की रेस में भारतवंशी अनीता आनंद भी, क्या ‘खालिस्तानी प्रेम’ पर लगेगा ब्रेक?

कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने सोमवार (6 जनवरी, 2025) को इस्तीफ़ा देने का ऐलान कर दिया है। ट्रूडो ने कहा कि वह आगामी आम चुनावों में लिबरल पार्टी का चेहरा बनने के लिए पसंदीदा उम्मीदवार नहीं हैं। लिबरल पार्टी से प्रधानमंत्री पद के लिए नए नेता का चयन होने के बाद जस्टिन ट्रूडो अपना इस्तीफ़ा दे देंगे। ट्रूडो के इस इस्तीफे की पटकथा बीते लगभग एक वर्ष से लिखी जा रही थी। इस खबर के बाद अब लिबरल पार्टी के नेताओं में पीएम पद की दौड़ शुरू हो गई है। इस दौड़ में एक भारतवंशी अनीता आनंद भी शामिल हैं।

क्यों ट्रूडो को जाना पड़ा?

जस्टिन ट्रूडो 2015 में पहली बार कनाडा के प्रधानमंत्री बने थे। इस चुनाव में उन्होंने लिबरल पार्टी को बड़ी जीत दिलाई थी। इसके बाद उन्होंने 2019 और 2021 में भी जीत हासिल की। 2021 की सरकार के लिए उन्हें जोड़-तोड़ करना पड़ा। वह 2013 से ही लिबरल पार्टी के नेता का रोल निभाते आ रहे हैं। जस्टिन ट्रूडो जब प्रधानमंत्री बने थे. तब उनकी लोकप्रियता चरम पर थी। लेकिन समय के साथ उनके फैसलों और उनकी सरकार की विफलताओं के चलते अब इस्तीफे की नौबत आई है।

ट्रूडो की लोकप्रियता का जायजा लेने वाले एक ट्रैकर के मुताबिक, 2015-16 में लगभग 65% लोग उन्हें पसंद करते थे। 2025 आते-आते 75% लोग उन्हें नापसंद करने लगे हैं। मात्र 22% लोग अभी उनका समर्थन करते हैं। ट्रूडो का विरोध 2020 की कोविड महामारी के बाद तेजी से बढ़ा है। कनाडा में 2020 के बाद घरों की किल्लत, महंगाई, बढ़ता कट्टरपंथ, सुरक्षा चिंताएँ और रोजगार ऐसे मुद्दे रहे हैं, जिन्हें वह नहीं सुलझा पाए। इसके अलावा ट्रूडो की सदारत में लिबरल पार्टी अपने गढ़ रहे चुनाव भी हार गई।

ट्रूडो की सरकार से कुछ दिनों पहले जगमीत सिंह की NDP ने भी समर्थन वापस ले लिया था। इसी के साथ कुछ सांसदों ने उनको पद से हटाने के लिए कोशिश चालू कर दी। जनवरी आते-आते उन पर दबाव बढ़ गया और अब उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा। जस्टिन ट्रूडो ने 2023 के बाद से ही भारत से भी लड़ाई मोल ले ली। उन्होने खालिस्तानियों को खुश करने के लिए भारत से लड़ाई मोल ले ली और आतंकी निज्जर की हत्या का आरोप भारतीय एजेंसियों पर ठोंक दिया। इसके चलते उनकी और थू-थू हुई।

कौन है अब रेस में?

कनाडा के नए प्रधानमंत्री की रेस में अब कई लिबरल नेता हैं। कनाडा की पूर्व वित्त मंत्री क्रिश्टिया फ्रीलैंड, बड़े नेता मार्क कारने, वित्त मंत्री डोमिनिक लीब्लांक, पूर्व विदेश मंत्री मेलीना जोली, पूर्व रक्षा मंत्री अनीता आनंद समेत जोनाथन विलकिंसन, करीना गौल्ड आदि प्रधानमंत्री पद की दौड़ में हैं। इनमें से कई नेताओं ने अपने समर्थन में लोगों को जुटाना भी चालू कर दिया है। उनका नाम सबसे आगे हैं, जिन्होंने दिसम्बर महीने में ट्रूडो की कैबिनेट से इस्तीफ़ा दिया था और ट्रूडो के भी इस्तीफे की माँग की थी।

अनीता आनंद कौन हैं?

ट्रूडो की जगह कनाडा के प्रधानमंत्री पद के लिए अनीता आनंद का भी नाम चल रहा है। अनीता आनंद 2019 में पहली बार सरकार में शामिल हुई थीं। ट्रूडो ने उन्हें 2019 में एक कम चमकधमक वाला मंत्रालय थमाया था। वह कनाडा की पहली हिन्दू कैबिनेट मंत्री थीं। उनको प्रोक्योरमेंट मंत्रालय मिला था, जो कनाडा के लिए बाकी जगह से आपूर्ति जुटाने का काम करता है। इस मंत्रालय का महत्व 2020 में तब और बढ़ गया जब पूरी दुनिया से वैक्सीन जुटानी थीं। इसके चलते अनीता आनंद को काफी प्रसिद्धि मिली।

इसी के चलते 2021 में उन्हें कनाडा का रक्षा मंत्री बना दिया गया। वह यूक्रेन-रूस संघर्ष के मौके पर रक्षा मंत्री रहीं। उन्हें कुछ दिनों के लिए कैबिनेट से हटा दिया गया था। इसके बाद उन्हें दिसम्बर, 2024 में दोबारा कैबिनेट में शामिल करके परिवहन और व्यापार मामलों का मंत्री बना दिया गया। अनीता आनंद भारतवंशी है और उनके माता-पिता नाइजीरिया से कनाडा पहुँचे थे। वह कनाडा में ही जन्मी थीं। वकालत की पढ़ाई पढ़ने वाली अनीता आनंद 2013 से ही सांसद हैं। वह ट्रूडो के करीबियों में से एक मानी जाती हैं।

भारत से रिश्तों पर क्या असर?

जस्टिन ट्रूडो के जाने की खबर भारत से रिश्तों के संबंध में बहुत मायने रखती है। भारत पर वह खुले तौर पर दखलअंदाजी और कनाडाई नागरिकों की हत्या के हवा-हवाई आरोप जड़ चुके हैं। भारत भी उन पर राजनीतिक फायदे के लिए राजनयिक रिश्तों की बलि चढ़ाने का आरोप लगाता आया है। हाल ही में दोनों ने एक-दूसरे ने शीर्ष राजनयिकों को भी वापस बुला लिया था। ट्रूडो के जाने के बाद भारत से रिश्तों में कोई बड़ा बदलाव आने की कोई ख़ास उम्मीद नहीं है, लेकिन हाँ नया प्रधानमंत्री कौन होगा, इस आधार पर थोड़े परिवर्तन हो सकते हैं।

इससे पहले जब उन्होंने भारत पर आरोप लगाए थे तब भी उनके खिलाफ कनाडा के अंदर से ही आवाजें उठी थीं। कनाडा के कई पत्रकार और नेताओं ने उन्हें लताड़ा था। ट्रूडो ने कोई सबूत भी नहीं दिखाए थे। इसको लेकर भी उन पर प्रश्न उठे थे।

डकैत-लुटेरे हैं मंदिर के पुजारी-पंडे: गोवा के लेखक ने ‘घृणा’ फैलाकर दिखाई अपनी नास्तिकता, FIR दर्ज होने पर कहा- कार्रवाई से डरता नहीं

गोवा के मशहूर लेखक और साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता दत्ता दामोदर नाइक ने विवादित बयान देकर हलचल पैदा कर दी है। खुद को कट्टर नास्तिक बताने वाले दत्ता दामोदर नाइक ने एक व्याख्यान के दौरान हिंदू मंदिरों के पुजारियों और पंडों को ‘डकैत’ और ‘लुटेरा’ कहकर संबोधित किया। उनके इस बयान को धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला बताते हुए उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, दत्ता दामोदर नाइक (Datta Damodar Naik) के खिलाफ पहली शिकायत सतीश भाट नामक व्यक्ति ने काणकोण पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि नाइक ने श्री संस्थान गोकर्ण पार्तगाली जीवोत्तम मठ और हिंदू पुजारियों को अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया। सतीश भाट ने कहा, “हमारी संस्कृति में हर किसी के विचारों का सम्मान होता है, चाहे वह नास्तिक ही क्यों न हो। लेकिन इस तरह का बयान देकर उन्होंने जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई है।”

दूसरी शिकायत पणजी पुलिस स्टेशन में गोमंतक मंदिर महासंघ और धार्मिक संस्थान फेडरेशन के सदस्य जयेश थाली ने की। शिकायत में कहा गया, “पुजारियों और मंदिरों को ‘लुटेरा’ कहना केवल निंदनीय ही नहीं, बल्कि यह एक गंभीर अपराध है, जिसने समाज में अशांति फैलाई है।”

पुलिस ने नाइक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 295 (ए) के तहत मामला दर्ज किया है। यह धारा उन कृत्यों पर लागू होती है, जो जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को आहत करने के उद्देश्य से किए जाते हैं। इस मामले की जाँच जारी है।

इस बीच, दत्ता दामोदर नाइक ने इस पूरे विवाद पर कहा कि वे अपने बयान पर कायम हैं और किसी भी कार्रवाई से डरते नहीं। उन्होंने कहा, “मैंने सिर्फ इतना कहा कि मंदिरों के पुजारी लोगों से पैसे वसूलते हैं। बाद में मैंने स्पष्ट किया कि मेरा मतलब था कि वे पैसे ‘वसूलते’ हैं, लूटते नहीं। यह सवाल उठाना गलत नहीं है कि इन पैसों का उपयोग कहाँ होता है। क्या इनसे स्कूल, अस्पताल या समाज के लिए कुछ और किया गया है?”

नाइक ने खुद को कट्टर नास्तिक बताते हुए कहा कि वे वर्षों से सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हैं और हमेशा तर्कवादी विचारधारा के समर्थक रहे हैं। उन्होंने कहा, “मुझे अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार है। अगर मेरी भावनाओं का सम्मान नहीं होता, तो दूसरों की भावनाओं का इतना महत्व क्यों दिया जा रहा है?”

बता दें कि दत्ता दामोदर नाइक को साहित्य अकादमी पुरस्कार 2006 में उनके कोकणी निबंध संग्रह ‘जय काई जुई’ के लिए दिया गया था। वे कोकणी, मराठी और अंग्रेजी में कई किताबें लिख चुके हैं। 1990 के दशक में उन्होंने ‘समता आंदोलन’ नामक तर्कवादियों के एक समूह की स्थापना की थी, जो गोवा में तर्क और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के लिए काम करता है।

EVM से छेड़छाड़, बोगस वोटिंग, रात में बढ़ा मतदान प्रतिशत, जान-बूझकर काटे वोटर के नाम… CEC ने दिल्ली चुनाव की तारीख ही नहीं बताई, प्रोपेगेंडा भी किए ध्वस्त

दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों के लिए 5 फरवरी को वोट डाले जाएँगे। वोटों की गिनती 8 फरवरी को होगी। 7 जनवरी, 2025 को चुनाव की तारीखों की घोषणा करते हुए चुनाव आयोग ने उन सभी सवालों के भी जवाब दिए जो हर चुनाव में विपक्ष की हार के बाद उठाए जाते हैं।

मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने बताया कि मतदान से करीब 7-8 दिन पहले ईवीएम तैयार हो जाती है। इसके बाद मतगणना के दिन तक यह उम्मीदवारों की आँखों के सामने से एक बार भी ओझल नहीं होती। चुनाव आयोग इससे जुड़े हर चरण के बारे में राजनीतिक दलों के एजेंट और उम्मीदवारों को सूचित करता है।

ईवीएम को वायरस प्रूफ बताते हुए उन्होंने कहा कि इससे छेड़छाड़ संभव नहीं है यह बात अदालत भी मान चुकी है। फिर भी नतीजों के बाद ईवीएम पर संदेह जताया जाता है। उन्होंने कहा कि ईवीएम की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है और इसके जरिए बोगस वोटिंग नहीं हो सकती।

आयोग ने 2020 में बिहार विधानसभा के हुए चुनावों से लेकर अब तक हुए 30 राज्यों केंद्र शासित प्रदेशों के नतीजों को सामने रखते हुए बताया कि इनमें 15 अलग-अलग दल सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे हैं। ऐसे में नतीजों के आधार पर चुनावी प्रक्रिया का आकलन नहीं किया जा सकता।

शाम 5 बजे के बाद कैसे बढ़ गया मतदान का प्रतिशत?

पिछले साल लोकसभा चुनावों और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद विपक्ष ने मतदान के प्रतिशत को लेकर भी विवाद खड़ा किया था। विपक्ष ने शाम 5 बजे के मतदान के आँकड़े और आखिरी आँकड़ों में अंतर का हवाला दे गड़बड़ी का दावा किया था। चुनाव आयोग ने बताया है कि मतदान शाम 6 बजे तक होता है।

कई इलाकों या मतदान केंद्रों पर मतदान इसके बाद भी जारी रहती है। इसके बाद ईवीएम को सील कर स्ट्रॉन्ग रूम में पहुँचाया जाता है। इन सारे कार्यों को निपटाने के बाद डाटा जारी किया जाता है। स्वभाविक तौर पर शाम 5 बजे के आँकड़े से यह ज्यादा होता है।

पिछले दिनों दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने वोटर लिस्ट से जानबूझकर लोगों का नाम काटने के आरोप लगाए थे। ऐसे आरोपों का जवाब देते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने कहा कि वोटर लिस्ट पूरी प्रक्रिया से तैयार कराई जाती है। किसी का भी नाम बिना प्रक्रिया के नहीं कटवाया जा सकता है।

दिल्ली चुनाव का गणित

मुख्य चुनाव आयुक्त ने बताया कि दिल्ली में 1 करोड़ 55 लाख 24 हजार 858 मतदाता हैं। इनमें 83 लाख 49 हजार 645 पुरुष और 71 लाख 73 हजार 952 महिला मतदाता हैं। थर्ड जेंडर मतदाताओं की संख्या 1261 है।

दिल्ली में मतदान के लिए 13033 पोलिंग बूथ बनाए जाएँगे। इनमें से 70 को महिला मतदान कर्मी संचालित करेंगी। हर बूथ पर औसतन 1191 वोटर्स होंगे। 85 वर्ष से अधिक आयु के लोग घर से वोट कर सकते हैं।

गौरतलब है कि 2020 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (AAP) को लगातार दूसरी बार शानदार जीत मिली थी। पार्टी ने 70 में से 62 सीटें जीती थी। बीजेपी को 8 सीटें ही मिली थी। कॉन्ग्रेस का खाता भी नहीं खुला था। उससे पहले 2015 के चुनावों में भी कॉन्ग्रेस जीरो पर सिमट गई थी। उस चुनाव में आप को 67 और बीजेपी को केवल 3 सीटें मिली थी।

‘ब्राह्मणवादी सोच है मदिरों में दर्शन के समय कमीज नहीं पहनना’: केरल में हिंदू आस्था पर प्रहार के लिए ‘सुधारक मठ’ और वामपंथी सरकार ने मिलाए हाथ

भारत के सबसे पढ़े-लिखे लोगों का राज्य कहा जाने वाला केरल अपनी धार्मिक आजादी को लेकर जागरुक रहा है। हालाँकि केरल की वामपंथी सरकार पर एक बार फिर हिंदू परंपराओं में हस्तक्षेप का आरोप लग रहा है। ताजा विवाद मंदिरों में ड्रेस कोड से जुड़ा है, जिसमें पुरुषों को बिना शर्ट के मंदिर में प्रवेश करना पड़ता है। शिवगिरी मठ के प्रमुख सच्चिदानंद स्वामी ने इस परंपरा को खत्म करने की माँग की है और इसे जातिवाद का हिस्सा बताया है। उनकी इस माँग को लेकर विवाद बढ़ चुका है, जिसमें कूदते हुए केरल की वामपंथी सरकार अब हिंदू परंपराओं को निशाना बनाने की कोशिश कर रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, शिवगिरी मठ के प्रमुख सच्चिदानंद स्वामी ने शिवगिरी पीठ के सालाना कार्यक्रम के दौरान केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की उपस्थिति में एक प्रस्ताव रखा। उन्होंने पुरुषों के लिए मंदिरों में बिना शर्ट के जाने की परंपरा को खत्म करने की माँग की। इस दौरान मुख्यमंत्री विजयन ने सच्चिदानंद स्वामी की बात को सकारात्मक बताते हुए समर्थन दिया, लेकिन कहा कि इसे लागू करने के लिए सभी संबंधित पक्षों के बीच सहमति बनाना जरूरी है। उन्होंने यह बयान बेहद सावधानी रखते हुए दिया, क्योंकि इससे पहले उनकी सरकार ने सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करने की कोशिश की थी, जो बड़े विवाद में बदल गया था।

दरअसल, सच्चिदानंद स्वामी का कहना है कि ड्रेस कोड ब्राह्मणवादी सोच का प्रतीक है और इसका मकसद गैर-ब्राह्मणों को मंदिरों से दूर रखना है। उन्होंने यह आरोप लगाया कि यह परंपरा पुजारियों और धर्मगुरुओं द्वारा थोपे गए नियमों का हिस्सा है। मुख्यमंत्री ने इस परंपरा को खत्म करने के लिए सहमति बनाने की बात कही है।

यहाँ ये बताना जरूरी है कि साल 1982 में भी गुरुवायूर मंदिर में ‘ब्राह्मण भोजन’ प्रथा के खिलाफ इसी तरह का विवाद हुआ था। उस समय समाज सुधारक नारायण गुरु के शिष्य आनंद तीर्थन ने इस प्रथा को चुनौती दी थी, जिसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री करुणाकरन ने इसे समाप्त कर दिया था। आज फिर वही इतिहास दोहराया जा रहा है। हिंदू संगठनों का आरोप है कि यह मुद्दा ड्रेस कोड से अधिक गहरा है। यह हिंदू समाज को उसकी परंपराओं और संस्कृति से अलग करने का एक सुनियोजित प्रयास है।

नायर सर्विस सोसाइटी (NSS) ने सच्चिदानंद स्वामी की माँग और सरकार के रुख का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने कहा कि मंदिरों की परंपराएँ किसी सरकार या बाहरी व्यक्ति के कहने पर नहीं बदली जा सकतीं। NSS महासचिव जी. सुकुमारन नायर ने सवाल उठाया कि सच्चिदानंद स्वामी को किस अधिकार से मंदिर की परंपराओं को चुनौती देने का हक है। उनका कहना है कि हर मंदिर की अपनी परंपराएँ होती हैं, और ड्रेस कोड भी उनमें से एक है।

वहीं, एसएनडीपी योगम जैसे संगठन जो खुद को सुधारवादी कहते हैं, वो वामपंथी सरकार के इस रुख के समर्थन में दिखाई दे रहे हैं। एसएनडीपी योगम के महासचिव वेल्लप्पली नटेसन ने वहीं, एसएनडीपी योगम के महासचिव वेल्लप्पली नटेसन ने नायर सर्विस सोसायटी के इस रुख की आलोचना करते हुए कहा कि ऐसे मुद्दों को हिंदू समाज को विभाजित करने का जरिया नहीं बनाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि परंपराओं में बदलाव आवश्यक हो सकता है, लेकिन यह प्रक्रिया सोच-समझकर और सभी से सलाह-मशविरा करके होनी चाहिए।

इतिहासकार एम. जी. ससिभूषण ने बताया कि यह ड्रेस कोड संभवतः इसलिए बनाया गया था ताकि लोग मंदिरों में अनुशासन बनाए रखें और उन्हें पर्यटन स्थल न समझें। हालाँकि यह प्रथा केवल केरल और कुछ चुनिंदा मंदिरों खासतौर पर कर्नाटक के श्री मूकाम्बिका मंदिर (Sri Mookambika Temple in Karnataka) तक सीमित है। अधिकांश भारतीय मंदिरों में ऐसे ड्रेस कोड नहीं हैं।

इतिहासकारों का साफ कहना है कि यह ड्रेस कोड अनुशासन बनाए रखने के लिए लाया गया था, लेकिन वामपंथी सरकार इसे ब्राह्मणवाद और जातिवाद का रंग देकर हिंदू आस्थाओं को कमजोर करने की कोशिश कर रही है। हिंदू धर्म में विविधता और परंपराओं की गहरी जड़ें हैं, लेकिन बार-बार वामपंथी सरकार इन्हें आधुनिकता के नाम पर निशाना बनाती रही है।

प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: X_Bharatiyan108)

यह पहली बार नहीं है जब केरल की वामपंथी सरकार हिंदू परंपराओं पर हस्तक्षेप कर रही है। इससे पहले सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा, गुरुवायूर मंदिर की प्रथाओं को खत्म करने की कोशिश और अब शिवगिरी मठ का प्रस्ताव – सभी घटनाएँ एक पैटर्न को दिखाती हैं। यह सरकार बार-बार हिंदू परंपराओं और आस्थाओं को तोड़ने के लिए सक्रिय नजर आती है।

वैसे, इस पूरे विवाद की जड़ को समझने के लिए आपको शिवगिरी मठ और सच्चिदानंद स्वामी के बारे में भी जानना आवश्यक है। शिवगिरी मठ की स्थापना साल 1904 में नारायण गुरु ने की। वे मंदिरों में पुजारियों के रूप में ब्राह्मणों की नियुक्ति के खिलाफ थे। हालाँकि वे खुद जिस एझावा समाज (Ezhava Community) से आते थे, वह भी ऊँची जाति है और मालाबार क्षेत्र में प्रभावी है।

खुद को सुधारवादी बताने वाले नारायण गुरु का रूख हमेशा से ब्राह्मण विरोधी रहा और बाद में यह शिवगिरि मठ की परंपरा भी बन गई। यह दूसरी बात है कि बिना कमीज मंदिर जाने की परंपरा को ‘ब्राह्मणवाद’ से जोड़ने वाले इस मठ द्वारा संचालित कई मंदिरों में भी प्रवेश के लिए शरीर के ऊपरी हिस्से को खुला रखना पड़ता है। ऐसे ही वामपंथी भी हमेशा से हिंदू परंपराओं को रूढ़िवादी और पिछड़ा बताकर उसका विरोध करते रहे हैं। लिहाजा इस बार भी सच्चिदानंद स्वामी के प्रस्ताव के समर्थन में मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन का झट से खड़ा हो जाना आश्चर्यजनक नहीं है।

चीन से आया HMPV अब दुनिया को डरा रहा, क्या फिर पैदा होंगे कोरोना जैसे हालात? जानिए क्या हैं इस वायरस के लक्षण, बचाव के क्या हैं उपाय

चीन में तेजी से लोगों को अपना शिकार बना रहे HMPV के भारत में मंगलवार (7 जनवरी, 2025) तक 7 मामले सामने आ चुके हैं। यह मामले बेंगलुरु, तमिलनाडु और गुजरात से सामने आए हैं। HMPV के अधिकांश मामले छोटे बच्चों में ही पाए जा रहे हैं। अभी तक पाए गए मामलों में सबसे कम आयु वाला रोगी 2 माह का है। HMPV को लेकर केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने कहा है कि यह कोई नया वायरस नहीं है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्यों से सतर्कता बढ़ाने को कहा है। HMPV को लेकर बड़े डॉक्टरों ने भी चिंता ना करने को कहा है।

क्या है HMPV?

HMPV (ह्युमन मेटान्यूमोवायरस) सांस और जुकाम जैसा इंफेक्शन करने वाला वायरस है। यह एक RNA वायरस है। यह वायरस न्युमोवेरिडे परिवार से जुड़ा है। यह रेस्पिरेटरी सिंसिटल वायरस (RSV) जैसा है। RSV वायरस सांस लेने में दिक्कत करता है। HMPV कोई नया वायरस नहीं है, इसका पहला मामला 2001 में पाया गया था। इसे सबसे पहले नीदरलैंड में नए वायरस के तौर पर पहचाना गया था। हालाँकि, शोध में पाया गया है कि यह वायरस बीते लगभग 60 वर्षों से मनुष्यों में मौजूद है।

HMPV के लक्षण क्या, कैसे फैलता है?

HMPV के लक्षण लगभग जुकाम जैसे ही हैं। इसका शिकार हुए रोगी को खांसी, नाक बहना, गले में खराश और बुखार जैसे लक्षण हो सकते हैं। कुछ मामलों में सांस लेने में दिक्कत और न्युमोनिया भी हो सकता है। HMPV एक संक्रामक वायरस है। इसका प्रसार जुकाम की तरह होता है। यानी HMPV ग्रसित व्यक्ति के खांसने, छींकने, हाथ मिलाने और ऐसी सतहों को छूने से होता है जहाँ यह वायरस मौजूद हो। इसका संवाह हवा में घुली छोटी-छोटी बूंदों से होता है। इसके अधिकांश मामले सर्दियों में सामने आते हैं।

HMPV से सर्वाधिक प्रभावित कौन?

HMPV का सबसे अधिक असर 5 वर्ष से कम के बच्चों और 65 वर्ष अधिक के लोगों में होता है। सर्वाधिक मामले भी इसी आयुवर्ग में सामने आते हैं। अमेरिकी स्वास्थ्य विभाग द्वारा किए गए एक शोध में 81% HMPV रोगी 2 साल से कम थे। बच्चों में इसके चलते सांस लेने की दिक्कत के मामले आते हैं। भारत में सामने आए मामलों में अधिकांश रोगी भी बच्चे ही हैं। वह भी 1 वर्ष के कम के बच्चे हैं। एक और शोध में सामने आया था कि खांसी जुकाम जैसे लक्षणों से प्रभावित लगभग 4-16% बच्चों को HMPV ही नुकसान पहुँचाता है।

क्या HMPV और COVID-19 अलग हैं?

2019 में चीन के वुहान में पाया गया COVID-19 नया वायरस था जबकि HMPV पहले भी पाया जा चुका है। यानि यह दोनों अलग है। इसके अलावा HMPV मानवों को फैलने के लिए इस्तेमाल करता है जबकि COVID-19 का वायरस एक चमगादड़ से मानवों में आया था। HMPV के अधिकांश मामले जहाँ बच्चों में सामने आए हैं जबकि COVID-19 के मामले सभी उम्र में सामने आए थे। इसको लेकर सर्जन अमित ठधानी ने बताया था कि इस वायरस से शरीर को बचाने वाली इम्युनिटी भी विकसित हो चुकी है।

HMPV का प्रसार चिंता की बात?

HMPV से ग्रसित होना चिंता की बात है लेकिन इसके प्रसार से घबराने की जरूरत नहीं है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने भी इससे आशंकित ना होने की बात कही है। उन्होंने भी स्वास्थ्य विशेषज्ञों का हवाला दिया है। उन्होंने कहा है कि स्वास्थ्य मंत्रालय, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) और बाकी संस्थान इस पर निगाह रख रहे हैं। इसको लेकर स्वास्थ्य मंत्रालय लगातार बैठकें आयोजित कर रहा है। मंगलवार को हुई बैठक में भी राज्यों को सतर्कता बरतने का निर्देश दिया गया है। अभी WHO ने इस पर कोई अपडेट नहीं दिया है।

चीन ने क्या कहा?

इस वायरस को लेकर चिंताएँ चीन में इसके तेज प्रसार के बाद ही बढ़ी हैं। चीन में HMPV के हजारों मामले सामने आए हैं। यहाँ से सामने आई वीडियो से भी लोग चिंतित हुए हैं। चिंताएँ इसलिए भी हैं क्योंकि 2019 में चीन से ही COVID-19 वायरस का प्रसार चालू हुआ था और 2 वर्षों तक इसने दुनिया को बड़ा नुकसान पहुँचाया था तथा लाखों लोगों की जान ली थी। चीन ने कहा है कि इसका प्रसार कोई चिंता की बात नहीं है। चीन की एजेंसियों ने कहा है कि हर बार सर्दियों में ऐसे मामले सामने आते हैं। चीन से आने-जाने पर भी कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया गया है।

कैसे किया जाए बचाव?

चूंकि HMPV के अधिकांश मामले में बच्चों में पाए गए हैं, ऐसे में उनके विषय में विशेष सावधानी बरती जानी चाहिए। बच्चों समेत बाकी लोगों के हाथ लगातार साबुन से धुलना, मास्क लगाना और खांसी-जुकाम का तुरंत चेकअप इस संबंध में कुछ कदम हैं जो उठाए जा सकते हैं। इसके अलावा जिन्हें खांसी आ रही है, उन्हें बाकी लोगों से एक दूरी भी बनानी चाहिए। इस वायरस से लड़ने में काफी हद तक हमारा शरीर ही सक्षम है लेकिन कोई भी विसंगति लगने पर तुरंत डॉक्टर के पास जाएँ।

‘मुस्लिम नाम क्यों… #त पीने वाले नाम रख’: सारा अली खान नए साल पर गईं भगवान शंकर के मंदिर, कट्टरपंथी-वामपंथी देने लगे गाली: पहले भी इस्लामी कट्टरपंथी बना चुके हैं निशाना

बॉलीवुड एक्ट्रेस सारा अली खान एक बार फिर से सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग का शिकार हुई हैं। नए साल के पहले सोमवार (6 जनवरी 2025) को सारा ने श्री मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर के दर्शन किए और अपनी तस्वीरें सोशल मीडिया पर पोस्ट कीं। उन्होंने कैप्शन में लिखा, “सारा के साल का पहला सोमवार। जय भोलेनाथ।”

जहाँ उनके इस पोस्ट को कई लोगों ने सराहा और उनकी आध्यात्मिकता की तारीफ की, वहीं कुछ इस्लामी कट्टरपंथियों ने उन्हें ट्रोल करना शुरू कर दिया। सारा पर अपने मजहब का पालन न करने और मंदिर जाने पर निशाना साधा गया और जमकर भला-बुरा कहा गया। इस दौरान कट्टरपंथियों की ओर से हिंदुओं के खिलाफ जमकर घृणा भी दिखाई गई।

अबरार अंसारी नाम के इस्लामी कट्टरपंथी ने लिखा, “दिन में भक्ति, रात में बिकनी चड्ढी, भगवान भी खुश.. आम लोग भी खुश।”

फोटो साभार: इंस्टाग्राम/सारा अली खान स्क्रीनशॉट

अब्दुल्ला नाम के इस्लामी कट्टरपंथी ने लिखा, “तू तो जहन्नम जाएगी।” तो समीर नाम के इस्लामी कट्टरपंथी ने सारा अली खान पर थूकने वाला कमेंट दिया।

फोटो साभार: इंस्टाग्राम/सारा अली खान स्क्रीनशॉट

एकेराजपूत नाम से अकाउंट चलाने वाले और इस्लामी प्रोपगेंडा से भरी प्रोफाइल वाले कट्टरपंथी ने लिखा, “तू मुस्लिम नाम क्यों रखी है, तू मूत पीने वाले नाम चेंज कर।” इसकी फेसबुक प्रोफाइल पर भी इस्लामी प्रोपगेंडा की भरमार है।

फोटो साभार: इंस्टाग्राम/सारा अली खान स्क्रीनशॉट

सर्वेंट ऑफ अल्लाह नाम के यूजर ने सारा अली खान के पोस्ट पर लिखा, “मुस्लिम खानदान की बेटी होकर हिंदूगिरी, अस्तजफिरुल्लाह अल्लाह हिदायत दे इसको।” वहीं, उमर नाम के इस्लामी कट्टरपंथी ने लिखा, “पूजा करो अच्छे लड़की काली माँ, दुर्गा माँ… अनाकोंडा माँ की…”

फोटो साभार: इंस्टाग्राम/सारा अली खान स्क्रीनशॉट

एक कट्टरपंथी ने सारा अली खान को लानतें भेजी और इस्लामी नाम इस्तेमाल करने को लेकर अपनी घृणा प्रदर्शित की।

फोटो साभार: इंस्टाग्राम/सारा अली खान स्क्रीनशॉट

एलेक्स रेहान सरकार नाम के कट्टरपंथी ने सारा से पूछा, “तुम हिंदू हो क्या? ये सब मत करो, नमाज पढ़ो।”

फोटो साभार: इंस्टाग्राम/सारा अली खान स्क्रीनशॉट

अमीना महमूद नाम की यूजर ने तो सारा पर हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच फसाद फैलाने का आरोप तक लगा डाला। अमीना ने लिखा, “तुम अपनी धार्मिक तस्वीरों को प्राइवेट क्यों नहीं रखती। क्यों तुम अपने इंस्टाग्राम पेज पर हिंदुओं और मुस्लिमों को लड़ा रही हो। क्या तुम थकती नहीं? उम्मीद है कि तुम्हारे बड़े तुम्हें कुछ सिखाएँगे। अगर तुम्हें हिंदुइज्म पसंद है, तो ये ठीक है, तुम खुद को हिंदू कहो, कोई दिक्कत नहीं, लेकिन 2 समुदायों को लड़ाओ नहीं।”

इस्लामी कट्टरपंथियों की घृणा का शिकार होती रही हैं सारा

सारा अली खान इससे पहले भी ऐसी ट्रोलिंग का सामना कर चुकी हैं। वह अक्सर मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर जाती हैं, जिसकी वजह से इस्लामी कट्टरपंथी उन्हें सोशल मीडिया पर हेट कमेंट्स के जरिए निशाना बनाते हैं।

सारा अली खान ने 19 सितंबर 2023 में गणेश पूजा की कुछ फोटो डाली थी, जिसके बाद इस्लामी कट्टरपंथी एके-47 तक खोजने निकल पड़े थे और सारा अली खान को जाहिल करार देते हुए अल्लाह पाक से हिदायत माँगी थी।

साल 2022 में सारा अली खान के महाकाल मंदिर जाने पर भी इस्लामी कट्टरपंथियों ने जमकर घृणा दिखाई थी। सारा को ट्रोल करते हुए फहाद मुगल नाम के यूजर ने गाली देते हुए लिखा था, “@@$# इन लोगों का समझ नहीं आता कि ये हिंदू हैं या फिर मुस्लिम। नाम सारा अली खान या हिंदू धर्म.. ये है इंडिया में। हद है शर्म से डूब मरने के लाय​क है। ये ही दीन से दूरी। रब ने ऐसे लोगों के लिए दोजक लिख दी है कुरान पाक में।” यही नहीं, एक ने तो यहाँ तक लिख दिया था कि “कुरान-ए-पाक में तुम्हारे लिए दोजख लिखा है।”

इसी तरह सारा अली खान 2021 में जब कमाख्या मंदिर गई थी, तब भी इस्लामी कट्टरपंथी उन पर भड़क गए थे और बताया था कि इस्लाम में ये सब करना हराम है। एक ने लिखा था, “इतनी भी छूट नहीं देनी चाहिए औलाद को कि वो सीधे रास्ते से भटक जाए। पता नहीं तुम्हारा बाप कैसे इजाजत दे देता है तुम्हें इन पुतलों को पूजने की।”

बता दें कि इस्लामी कट्टरपंथियों से बेइंतिहा घृणा पाने के बाद भी सारा सनातन की ओर अपने आध्यात्मिक झुकाव और धार्मिक स्थलों के प्रति श्रद्धा को लेकर मुखर रहती हैं। वो इस्लामी कट्टरपंथियों के सामने झुकने की जगह भोलेनाथ के चरणों में सिर झुकाना ज्यादा पसंद करती हैं। यही वजह है कि लोग उन्हें पसंद भी करते हैं।

आप जाँच क्यों नहीं करवाना चाहती… निकिता सिंघानिया से हाई कोर्ट का सीधा सवाल, FIR रद्द करने की अपील ठुकराई: कहा- अतुल सुभाष सुसाइड केस में सबूत हैं

निकिता सिंघानिया ने कर्नाटक हाई कोर्ट में अपने खिलाफ दर्ज केस रद्द करवाने के लिए याचिका दी है। कर्नाटक हाई कोर्ट ने निकिता की याचिका पर उन्हें आड़े हाथों लिया। हाई कोर्ट ने यह मानने से इनकार किया कि निकिता के खिलाफ दर्ज FIR में आत्महत्या के लिए उकसाने पर जानकारी नहीं है।

कर्नाटक हाई कोर्ट के SR कृष्णा कुमार ने सोमवार (6 जनवरी, 2025) को इस मामले की सुनवाई की। उन्होंने कहा, “इस शिकायत के बारे में मेरा मानना ​​है कि FIR में सारी बातें लिखी गई हैं और यह ऐसा मामला नहीं है, जिसे खारिज किया जाए।” हाई कोर्ट ने इसके बाद याचिका में किए गए दावे पर प्रश्न उठाए।

हाई कोर्ट ने कहा, “शिकायत और फिर FIR में सारी जानकारी दे दी गई है। शिकायत को देखिए जरा। मुझे बताइए कि आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले की FIR में और क्या दिया जाना चाहिए था। मेरे हिसाब से तो इसमें आत्महत्या के लिए उकसाने की सारे बातें लिखी गई हैं, सब कुछ बताया गया है। इस तरह के मामलों में आपको आखिर और क्या चाहिए?”

अतुल सुभाष की आत्महत्या मामले की जाँच कर रही पुलिस से भी हाई कोर्ट ने प्रश्न पूछे। हाई कोर्ट ने कहा, “आपने इस मामले में और क्या तथ्य जुटाए हैं? शिकायत और यहाँ रिकॉर्ड पर मौजूद तथ्यों के हिसाब से अगर कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता तो इसे रद्द किया जा सकता है।”

हाई कोर्ट ने निकिता सिंघानिया के जाँच पर रोक लगाने की माँग पर पूछा, “ऐसे मामले में जांच को निपटाने करने का सवाल ही कहाँ है, आप क्यों नहीं चाहती कि जाँच हो?”

निकिता सिंघानिया को अतुल सुभाष की आत्महत्या के बाद उसकी माँ और भाई के साथ गिरफ्तार किया गया था। उसे बेंगलुरु पुलिस ने गिरफ्तार किया था। निकिता और उसके परिवार के खिलाफ अतुल सुभाष को आत्महत्या के लिए उकसाने की FIR दर्ज हुई थी। इस मामले में निकिता को 4 जनवरी, 2025 को एक निचली अदालत ने जमानत दे दी थी।

जमानत मिलने के बाद अब निकिता का प्रयास है कि यह केस ही खत्म कर दिया जाए। हालाँकि, कर्नाटक हाई कोर्ट ने इससे इनकार करते हुए आगे सुनवाई के लिए मामला स्थगित किया है। अतुल सुभाष ने एक सुसाइड नोट और वीडियो जारी करने के बाद 9 दिसम्बर, 2025 को बेंगलुरु स्थित अपने फ़्लैट में आत्महत्या कर ली थी।

अतुल सुभाष ने अपने वीडियो और सुसाइड नोट में आरोप लगाया था कि निकिता और उसके माँ-बाप अतुल सुभाष को मानसिक तौर पर इतना प्रताड़ित कर चुके थे कि उसके पास आत्महत्या के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था। अतुल सुभाष ने बताया था कि उनकी सैलरी का बड़ा हिस्सा निकिता को गुजरा भत्ता में दिया गया था और उनके बेटे से भी उन्हें नहीं मिलने दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट से मिलेगी दारा सिंह को रिहाई, ओडिशा सरकार और CBI से माँगा जवाब: 25 साल जेल में, फिर भी परोल क्यों नहीं? राजीव गाँधी के हत्यारे की तर्ज पर सजा से छूट की माँग

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (6 जनवरी 2024) को ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टुअर्ट स्टेन्स और उनके दो बच्चों की हत्या के मामले में दोषी दारा सिंह की रिहाई को लेकर दायर याचिका पर ओडिशा सरकार और सीबीआई से जवाब माँगा। अदालत ने दोनों पक्षों को चार हफ्ते के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई जस्टिस हृषिकेश रॉय और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की बेंच ने की। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को इस मामले में पक्षकार बनाने का आदेश दिया, क्योंकि हत्याकांड की जाँच सीबीआई ने की थी।

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा सरकार को निर्देश दिया गया कि वह उन पाँच समितियों की रिपोर्ट पेश करे, जिन्होंने दारा सिंह की रिहाई पर विचार किया था। राज्य सरकार ने फरवरी 2023 में इन समितियों द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट का हवाला देते हुए जवाब दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का अतिरिक्त समय माँगा था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने राज्य को चार हफ्तों का समय देते हुए सभी रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया।

दारा सिंह ने अपनी याचिका में कहा है कि उन्होंने जेल में लगभग 25 साल बिना किसी पैरोल के गुजारे हैं और उन्हें रिहाई का हक है। याचिका में उन्होंने राजीव गाँधी हत्याकांड के दोषी ए.जी. पेरारिवलन की रिहाई को आधार बनाते हुए कहा कि सुधारात्मक न्याय (Reformative Justice) के सिद्धांत को उनके मामले में भी लागू किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान दारा सिंह के वकील विष्णु जैन ने दलील दी कि दारा सिंह अब 61 साल के हो चुके हैं और उन्हें कभी परोल भी नहीं मिला। सिंह ने यह भी बताया कि जब उनकी माँ का निधन हुआ, तब भी उन्हें अंतिम संस्कार में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई।

याचिका में दारा सिंह ने दावा किया कि उनके रिहाई के लिए राज्य सरकार को कई बार आवेदन दिए गए, लेकिन उन्हें अनदेखा कर दिया गया। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते हुए इसे उनके मूल अधिकार का हनन बताया।

गौरतलब है कि साल 1999 में ओडिशा के क्योंझर जिले में ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बच्चों को जिंदा जलाने का मामला सामने आया था। इस हत्याकांड के मुख्य दोषी बजरंग दल कार्यकर्ता दारा सिंह को 2003 में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। वो हत्याकांड के बाद से ही जेल में हैं और अब सुप्रीम कोर्ट के जरिए रिहाई की माँग कर रहे हैं।

(दारा सिंह के जेल में रहते हुए परिवार की वर्तमान स्थिति को लेकर ऑपइंडिया ने सीरीज प्रकाशित की थी, उसे आप यहाँ (दारा सिंह की रिहाई ही न्याय: ग्राउंड रिपोर्ट) पढ़ सकते हैं।)