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इंग्लैंड में बनेगी दरगाह: वक्फ बोर्ड ने भेजा सबसे महँगी जमीन का दस्तावेज, ग्रूमिंग गैंग वालों के सपोर्ट में जमा होगी भीड़

इंग्लैंड में रहने वाले पाकिस्तानी, जो चोरी-चकारी और रेप करते समय दक्षिण एशियाई बन जाते हैं, अब इंग्लैंड में एक दरगाह बनाएँगे। ये दरगाह किसी सूफी संत की होगी और इसे बर्मिंघम में बनाया जाएगा। वक्फ बोर्ड ने इसके लिए वहाँ जमीन का दावा भी कर दिया है। यह जमीन वहाँ की सबसे महँगी और पॉश इलाके में है।

दरगाह बनाने की जरूरत इसलिए आन पड़ी क्यों है क्योंकि बीते कुछ दिनों में पाकिस्तानियों के ग्रूमिंग गैंग की खबरें भी तेजी से चलने लगी हैं। इंग्लैंड में छोटी बच्चियों से गैंगरेप करने वाले पाकिस्तानियों के ग्रूमिंग गैंग के बारे में अब दुनिया जान रही है, खासकर एक्स (पहले ट्विटर) पर इसको लेकर बवाल मचा पड़ा है।

ब्रिटिश म्यूजियम के आइटमों का फैक्ट चेक कर ग्रेटर लंदन में अपनी रोजी-रोटी कमाने वाले और हेडमास्टर के बेटे मोहम्मद जुबैर ने इस ग्रूमिंग गैंग वाले मुद्दे पर कहा, “पिछले 10 साल से मजे से हम ब्रिटिश लड़कियों को निशाना बना रहे थे लेकिन इस गलीच एलन मस्क ने सब गड़बड़ कर दी है और हमारे बारे में सबको बता रहा है।” जुबैर असल में पाकिस्तान के कराची का रहने वाला है।

जुबैर ने इसके बाद खीझते हुए कहा,”हम मजे से कई सालों से ब्रिटिश लड़कियों को निशाना बनाते रहे थे और वामपंथी मीडिया लगातार हमें अमन का सौदागर बता रही थी। मीडिया सबको बताती रही कि कैसे ग्रूमिंग गैंग फेक न्यूज है लेकिन अब फिर से यह मामला उठ गया है। हमारी सारी मेहनत मिट्टी में मिल गई है।”

जुबैर ने इसके बाद दुखियारा सा मुंह बनाकर कहा कि उसने एक्स पर ग्रूमिंग गैंग की भयावहता दिखाने वाली पोस्ट पर कम्युनिटी नोट लगाने की भी कोशिश की लेकिन ट्विटर में अब डाइवर्सिटी ना होने के कारण वह फेल हो गया। उल्टे उसका अकाउंट भी ब्लॉक हो गया। जुबैर ने इसके बाद ग्रूमिंग गैंग से मुस्लिमों के बारे में दिखाई जा रही नकारात्मक खबरों से कैसा लड़ा जाए, यह तय करने के लिए बुर्जुर्गों की एक मीटिंग बुलाई थी। इस मीटिंग में 2-4 लोग ऐसे भी थे, जो तालिबान की प्रेस कॉन्फ्रेंस का हिस्सा रह चुके थे।

हिन्दुओं पर किए गए अत्याचार को छुपाने में माहिर और ब्रिटेन में एक दिन शरिया राज का सपना देखने वाले असद खान ने तुरंत आइडिया दिया कि हमें एक दरगाह बना लेनी चाहिए। असद खान इंग्लैंड में तीसरी पीढ़ी का नागरिक है और 1947 से पहले ही उसके दादा अविभाजित भारत से इंग्लैंड चले गए थे। हालाँकि, 1947 में जब से पाकिस्तान बन गया, असद खुद को पाकिस्तानी बताने लगा। वह बात अलग है कि उसके जो भाई-बंधु पाकिस्तान में रहते हैं, उन्हें मुहाजिर कहा जाता है।

असद खान ने कहा कि दरगाह बाकी अपराधों पर ‘चादर डालने’ (इसे व्यंग्य के तौर पर ही लें) का एक बढ़िया तरीका है। असद ने इसके बाद कहा कि दरगाहों की पीआर बड़ी जबरदस्त है और अगर कहीं यह कोई सूफी संत की हो तो शॉल ओढ़ने वाले बुद्धिजीवी इस पर लहालोट ही जाते हैं। असद ने कहा कि इस दरगाह को लेकर गाना बनवाने का ठेका वह एक बॉलीवुड एजेंसी को दे देगा जो इसमें माहिर हैं। यह एजेंसी केवल खुदा-मौला-अली वाले गाने बनाती है।

असद की बात पर दो तीन लोगों ने मुंह बनाया तो उसने बताना चालू किया, “ज़रा अजमेर की तरफ निगाह डालो मियाँ! ग्रूमिंग जैसा ही कुछ मसला वहाँ भी हुआ था। दरगाह से जुड़े कुछ लोग भी इसमें शामिल थे लेकिन फिर भी अभी हिन्दू वहाँ लोटते हुए जाते हैं। बड़े-बड़े फिल्म स्टार वहाँ चादर चढ़ाते हैं।” असल में असद खान 1990 के अजमेर सेक्स स्कैंडल के बारे में बता रहा था। इस तर्क के बाद बाकी सब लाजवाब हो गए। अब आप सोचेंगे कि ऑपइंडिया को ये सब कैसे पता, तो हमें ये बात एक सूत्र ने बताई, वो भी मीटिंग में मौजूद था।

असद खान के इस प्रस्ताव को लेकर कुछ लोग नाचने लगे, कुछ ने एक घेरा बनाया और गोल-गोल भी घूमे। उनका डांस कुछ-कुछ सूफियों की तरह ही नजर आया। अब बर्मिंघम के मुस्लिमों ने एक कमिटी बनाई है, ये कमिटी भारत आकर अजमेर मॉडल पर रिसर्च करेगी। दूसरी भी एक कमिटी बनी है, ये इतिहासकार रोमिला थापर के पास जाएगी। उनसे पूछेगी कि कौन सा मुस्लिम व्यक्तित्व इस दरगाह के लिए सबसे फिट रहेगा। (फिट होने में जगह का कोई मसला नहीं है, बात परसेप्शन की है।)

जुबैर ने कहा कि कि उनकी पहली पसंद औरंगजेब है। जब बात जगह को लेकर पर आई तो उन्होंने कहा कि इसका कोई मुद्दा नहीं क्योंकि यहाँ वक्फ बोर्ड है। उन्होंने कहा कि कहीं नहीं तो किसी सड़क या रेलवे स्टेशन पर ही वक्फ बोर्ड दावा ठोंक देगा और दरगाह के लिए जगह बना देगा। अगर ये भी नहीं हो सका तो कुछ जमीन उस पैसे से खरीद ली जाएगी, जो हल्द्वानी में दंगाइयों के घरों पर बाँटे गए थे, संभल वाले फंड का इस्तेमाल आगे किए जाने की योजना है। जुबैर और असद इसके बाद लेबर पार्टी के एक फंक्शन में शामिल होने चले गए।

(यह लेख एक व्यंग्य है, इसे वैसे ही पढ़ें और शेयर करें)

नागनाथ और साँपनाथ की राजनीति के बीच प्रशांत किशोर BPSC आंदोलन से कितना उठा पाएँगे लाभ?: जिस बिहार की राजनीति में ‘जाति’ ही प्रमुख मुद्दा, वहाँ चुनावी रणनीतिकार से नेता बने PK की राहें नहीं आसान

बिहार की राजधानी पटना में बीपीएससी अभ्यर्थियों का प्रदर्शन कुछ समय से चल रहा है। छात्रों का प्रदर्शन हो और उसमें राजनीतिक दल शामिल हो जाएँ, तो इसे बड़ी ताकत माना जाता है। चूँकि बिहार के छात्र एक बार देश की राजनीति को बदल चुके हैं। छात्रों की ताकत के दम पर दिल्ली में इंदिरा गाँधी की सरकार हिल गई थी। ऐसे में इस बार बीपीएससी छात्रों के आंदोलन में शामिल हो चुके प्रशांत किशोर क्या इस मौके को भुना पाएँगे और अपने लिए सत्ता का रास्ता खोल पाएँगे, ये सवाल सभी के मन में उठ रहा है।

चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर, जो ‘जन सुराज’ अभियान के जरिए बिहार की राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं, हाल ही में बीपीएससी अभ्यर्थियों के आंदोलन में कूद पड़े हैं। ऐसे में क्या बीपीएसी मोमेंट प्रशांत किशोर के लिए ‘केजरीवाल मोमेंट’ बन पाएगा? क्या प्रशांत किशोर दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की तरह बिहार की राजनीति को प्रभावित कर पाने में सफल हो पाएँगे और क्या वो बीपीएससी छात्रों के आंदोलन के दम पर सत्ता पा सकेंगे? ऐसे सवाल खड़े हो रहे हैं। यही वजह है कि बीपीएससी आंदोलन में प्रशांत किशोर के कूदने को उनके राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। हालाँकि अभी तक तो उनके इस कदम को सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती नहीं ही दिख रही है।

चूँकि कुछ माह पहले तक प्रशांत किशोर विशुद्ध रूप से न्यूजरूम के नेता माने जाते रहे हैं। वो न्यूजरूम और चुनावी रणनीति तैयार करने के लिए बनाए गए वॉर रूम से राजनीतिक पार्टियों के लिए काम करते हैं और अब बिहार में जमीन पर उतरकर खुद नेता बनने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे में सवाल ये भी उठता है कि क्या पीआर का काम करने वाले नेता पर बिहार की जनता भरोसा कर भी पाएगी?

पटना के वरिष्ठ पत्रकार मनोज पाठक कहते हैं, “बीपीएससी आंदोलन के जरिए प्रशांत किशोर ने छात्रों का साथ लेने की कोशिश की है। लेकिन यह स्पष्ट है कि बिहार की राजनीति जातिवाद और जमीनी मुद्दों पर केंद्रित है, जो प्रशांत किशोर की रणनीति से मेल नहीं खाती।” मनोज पाठक का मानना है कि प्रशांत किशोर की अब तक की रणनीति पीआर आधारित रही है। वो कहते हैं, “वैनिटी वैन प्रकरण और जमानत लेने से इनकार जैसे कदम जनता को प्रभावित करने के लिए उठाए गए, लेकिन इनसे उन्हें अपेक्षित लाभ मिलता नहीं दिखता।”

बिहार में जातिगत राजनीति का दबदबा

बिहार में जाति आधारित राजनीति का दबदबा रहा है। वरिष्ठ पत्रकार मनोज पाठक के अनुसार, बिहार के नेता हमेशा जातिवादी समीकरणों पर आधारित रहे हैं। नीतीश कुमार कुर्मी-कोईरी और लालू यादव मुस्लिम-यादव समीकरणों पर टिके रहे हैं। लेकिन प्रशांत किशोर की जातिवादी राजनीति से दूरी उनके लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।

वरिष्ठ पत्रकार गिरिंद्रनाथ झा कहते हैं, “चूँकि बिहार में कोर मुद्दा जाति और जमीन का है, उसमें नीतीश कुमार को आप नजरअंदाज नहीं कर सकते, वो हावी रहेंगे।” गिरिंद्रनाथ झा कहते हैं कि नीतीश कुमार के जिंदा रहते उन्हें नजरअंदाज करना भी संभव नहीं है। वो भूमि सर्वे का ही उदाहरण देते हैं कि सरकार ने उसे 1 साल के लिए बढ़ा दिया है, जो चुनाव तक चलता रहेगा। उनका कहना है कि नीतीश कुमार ने शिक्षकों की नौकरियाँ बहुत बाँटी हैं, इसका फायदा उन्हें मिलता दिख रहा है। वो कहते हैं कि बीपीएससी आंदोलन का फायदा प्रशांत किशोर को नहीं दिखता।

मूलरूप से बिहार, लेकिन वर्तमान समय में देश की राजधानी दिल्ली में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार ने कहा, “प्रशांत किशोर जातिवाद आधारित राजनीति से खुद को दूर रखने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन आरजेडी और अन्य पार्टियाँ उन्हें ‘पांडे जी’ और ‘पंडित जी’ कहकर वर्ग विशेष से जोड़ने की कोशिश कर रही हैं। यह उनकी छवि पर असर डालता है।” उन्होंने इसे समझाते हुए कहा कि प्रशांत किशोर को ‘पांडे जी’ और ‘पंडित जी’ कहकर आरजेडी ने अपने यादव+मुस्लिम वोटरों के साथ पिछड़े या कमजोर वर्ग के वोटरों को संतुष्ट करने की कोशिश है, ताकि वो प्रशांत किशोर को एक उच्च वर्ग विशेष (ब्राह्मणों) से जोड़ सकें, जो अपेक्षाकृत अगड़े हैं, लेकिन राजनीतिक तौर पर उनकी कोई ताकत नहीं है।

गिरिंद्रनाथ झा का यह भी कहना है कि बिहार की राजनीति में सोशल मीडिया का प्रभाव सीमित है। उनका कहना है कि “दिल्ली में सोशल मीडिया के दम पर सरकारें बदल सकती हैं, लेकिन बिहार में राजनीति जमीनी मुद्दों पर केंद्रित रहती है। बीपीएससी आंदोलन का असर तब तक सीमित रहेगा, जब तक इसे जातिगत समीकरणों का समर्थन न मिले।”

छात्रों का गुस्सा और प्रशांत किशोर की रणनीति

प्रशांत किशोर ने बीपीएससी अभ्यर्थियों के आंदोलन को भुनाने का प्रयास किया है, लेकिन आलोचना भी झेल रहे हैं। प्रियांक कुमार, जो पटना में कोचिंग सेंटर चलाते हैं, का कहना है कि बीपीएससी आंदोलन में वास्तविक छात्रों की भागीदारी कम दिख रही है। उनका कहना है, “पटना पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए लोगों में से 30 तो छात्र नहीं थे। यह आंदोलन छात्रों की वास्तविक माँगों से भटकता दिख रहा है और प्रशांत किशोर की राजनीतिक महत्वाकांक्षा का हिस्सा बन गया है।”

हालाँकि वो ये भी कहते हैं कि बीपीएससी आंदोलन से प्रशांत किशोर को 2025 के चुनावों में भले ही बड़ा लाभ न मिले, लेकिन 2030 तक वह अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत कर सकते हैं। कुमार प्रियांक कहते हैं, “नीतीश कुमार अब बूढ़े हो गए हैं, उनकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। तीन-चार लोग उन्हें घेरे रहते हैं। बीजेपी में भी नेताओं की कोई अपनी हैसियत नहीं है, तो आरजेडी बिन पेंदी के लोटे की तरह हो गई है। उन्होंने कहा कि तेजस्वी यादव को उम्मीद थी कि खरमास के बाद नीतीश कुमार पलटी मारेंगे और उन्हें डिप्टी सीएम बना देंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।” कुमार प्रियांक कहते हैं कि इन आंदोलनों से बिहार पर बहुत फर्क पड़ने वाला नहीं है। यहाँ के लोग जाति से ऊपर कुछ सोच ही नहीं पाते।

कुमार प्रियांक का कहना है कि पीके डूबते के लिए तिनके की सहारे की तरह हैं। 2025 में नहीं कह सकते, लेकिन 2030 में वो अच्छा कर सकते हैं, क्योंकि आम जनता आरजेडी और जेडीयू-बीजेपी से आजिज आ चुकी है। वो एक को नागनाथ और एक को साँपनाथ कहते हैं। वो कहते हैं कि तेजस्वी के डिप्टी सीएम बनते ही यादवों ने जो ताँडव मचाया, उससे लोगों में फिर से डर लौटने लगा है। ऐसे में तेजस्वी से लोग दूर भाग रहे हैं। वो कहते हैं कि बिहार में सभी जातियों के अपने ब्लॉक हैं और उन ब्लॉक्स के नेता हैं। वो कहते हैं कि यादवों का भी अब लालू परिवार से मोहभंग हो रहा है।

क्या प्रशांत किशोर होंगे सफल?

मनोज पाठक का कहना है कि प्रशांत किशोर की चुनौती केवल जनता का समर्थन हासिल करना नहीं है, बल्कि अपने आंदोलन को जमीनी मुद्दों से जोड़ना भी है। उन्होंने कहा, “प्रशांत किशोर का राजनीतिक भविष्य बिहार की जातिगत राजनीति, जनता की बदलती प्राथमिकताओं और उनकी खुद की रणनीति पर निर्भर करेगा।”

मनोज पाठक और गिरिंद्रनाथ झा जैसे वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि इस आंदोलन का राजनीतिक फायदा प्रशांत किशोर को नहीं मिलेगा। पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए 39 लोगों में से 30 छात्र नहीं थे। यह तथ्य प्रशांत किशोर के खिलाफ गया और यह संदेश गया कि आंदोलन राजनीति का मोहरा बन गया है।

चूँकि बिहार की जमीनी राजनीति में अभी तक प्रशांत किशोर कुछ खास नहीं कर पाए हैं, जैसे कि उप-चुनाव में उनके सभी कैंडिडेट बुरी तरह से हार गए। ऐसे में बीपीएससी प्रदर्शन के दम पर वो कुछ बड़ा कर पाएँ, इस पर संदेह है। वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक बातचीत में कहते हैं कि प्रशांत किशोर अभी महज बुलबुले जैसे ही दिख रहे हैं, उसमें भी वो वैनिटी वैन जैसे छोटे से मामले में पूरी तरह एक्सपोज हो गए। उनका कहना है कि लोगों में ये संदेश जा रहा है कि प्रशांत किशोर के पीछे कोई और ही राजनीतिक ताकत खड़ी है। एक वरिष्ठ पत्रकार पटना में जन सुराज के आफिस की लोकेशन की बात कहते हैं कि वो किसी नेता विशेष के साथ हैं। ये बात भी जनता तक जा रही है।

बहरहाल, बीपीएससी आंदोलन के जरिए प्रशांत किशोर ने अपनी राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश की है। लेकिन बिहार की राजनीति का जातिगत और जमीनी स्वरूप उनकी योजनाओं के आड़े आ सकता है। प्रशांत किशोर को अपनी रणनीति में न केवल व्यापकता लानी होगी, बल्कि जनता के भरोसे को भी जीतना होगा। फिलहाल, बीपीएससी आंदोलन उनके लिए एक मौका है, लेकिन यह देखना होगा कि वह इसे अपने राजनीतिक भविष्य की नींव बना पाते हैं या नहीं।

महाकुंभ से पहले ठगी करने वाले सक्रिय, होटल डील के नाम पर कर रहे फर्जीवाड़ा: यूपी पुलिस ने शॉर्ट फिल्म बना कर किया जागरूक, जानें क्या है बुकिंग का सही तरीका

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में 13 जनवरी, 2025 से महाकुंभ शुरू हो रहा है। इस महाकुंभ में देश-विदेश से श्रद्धालु आने वाले हैं। इस महाकुंभ से पहले ही कई जालसाज भी ठगी की जुगत में हैं। वह फर्जी वेबसाइट और एड के माध्यम से महाकुंभ में आने वाले श्रद्धालुओं को होटल या अन्य सुविधाओं के लिए ठगने की जुगत लगा रहे हैं। ठगी का ऐसा ही एक मामला हाल ही में सामने आ भी चुका है। अब उत्तर प्रदेश पुलिस ने इन ठगों से निपटने और जनता को जागरुक करने के लिए प्रयास चालू कर दिए हैं।

यूपी पुलिस ने क्या समझाया?

यूपी पुलिस ने महाकुंभ के दौरान लोगों से होटल के नाम पर ठगी ना हो, यह पक्का करने के लिए डिजिटल तरीके अपनाए हैं। यूपी पुलिस ने महाकुंभ से कुछ ही दिन पहले एक छोटी फिल्म बनाई है। इसमें बताया गया है कि कैसे महाकुंभ के लिए होटल बुक करना है और कैसे जालसाजों से बचना है। इस शॉर्ट फिल्म में एक्टर संजय मिश्रा भी हैं। इस शॉर्ट फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे होटल बुक करने के नाम पर एक परिवार ठगी का शिकार होता है।

इसमें दिखाया गया है कि कैसे ठग उनसे ऑनलाइन बुकिंग के नाम पर पैसा लेकर गायब हो जाते हैं और जब परिवार असल में यहाँ पहुँचता है, तब ना कोई फ़ोन मिलता है और ना ही कोई मौजूद होता है। फिल्म में लालच देकर ठगी करने वालों से सावधान किया गया है। यूपी पुलिस की इस फिल्म में एक्टर संजय मिश्रा ने बताया है कि बिना किसी के झाँसे में आए महाकुंभ की वेबसाइट पर जाकर सारी बुकिंग की जा सकती है।

कैसे करें महाकुंभ के लिए बुकिंग?

उत्तर प्रदेश सरकार महाकुंभ 2025 को डिजिटल महाकुंभ के तौर पर आयोजित कर रही है। महाकुंभ की सारी जानकारी और सुविधाएँ एक ही जगह पर हों, इसके लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने kumbh.gov.in वेबसाइट बनाई है। इस वेबसाइट पर महाकुंभ की जानकारी के साथ ही होटल या कॉटेज बुकिंग के लिए भी विकल्प मौजूद हैं। यह वेबसाइट हिंदी में भी उपलब्ध है। इसमें ‘यात्रा एवं ठहराव’ नाम से एक अलग विकल्प दिया गया है।

इस विकल्प पर क्लिक करते ही ‘कहाँ ठहरें’ नाम से आए विकल्प पर सारी जानकारी मौजूद है कि कहाँ-कहाँ रुकने की व्यवस्थाएँ हैं। इसी में बुक करें नाम से विकल्प दिया गया है। यह UPSTDC की वेबसाइट पर ले जाता है। यहाँ से महाकुंभ के लिए बताए गए टेंट या फिर प्रयागराज के होटल बुक कर सकते हैं। इसी वेबसाइट पर महाकुंभ के दौरान नाव बुक करने का भी विकल्प मौजूद है। उत्तर प्रदेश सरकार ने महाकुंभ के लिए विशेष टेंट सिटी बसाई है।

महाकाल मंदिर के पास हिंदू लड़की के साथ होटल में रुका सैफ अहमद, नाम बताया प्रकाश गुप्ता : हकीकत खुलने पर मचा बवाल, फर्जी ID के साथ पुलिस ने दबोचा

मध्य प्रदेश के उज्जैन से लव जिहाद का मामला सामने आया है। यहाँ हिन्दू की फर्जी ID पर होटल में ठहरे मुस्लिम युवक को हिन्दू संगठनों ने पुलिस के हवाले कर दिया। पकड़े गए युवक का नाम मोहम्मद सैफ अहमद है। होटल में उसके साथ एक हिन्दू लड़की भी मिली है, जो मूल रूप से भिलाई की रहने वाली है। पुलिस ने सैफ अहमद के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है। घटना शनिवार (4 जनवरी 2025) की है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना उज्जैन के महाकाल मंदिर के पास एकलव्य होटल की है। शनिवार को हिन्दू संगठनों को इस होटल में एक मुस्लिम के हिन्दू नाम से ठहरे होने की सूचना मिली। सूचना पर हिन्दू संगठन के सदस्य होटल पहुँचे। यहाँ रजिस्टर चेक करने पर प्रकाश कुमार गुप्ता एक हिन्दू लड़की के साथ रुका मिला। शक होने पर उसे बाहर बुलाकर पूछताछ की गई तो उसका असली नाम सैफ अहमद निकला।

सैफ छत्तीसगढ़ के भिलाई का रहने वाला है। उसके साथ मिली लड़की भी भिलाई की रहने वाली निकली। सैफ को पकड़कर हिन्दू कार्यकर्ताओं ने हंगामा शुरू कर दिया। मामले की जानकारी मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँची और सैफ अहमद को हिरासत में ले लिया। लड़की को भी बरामद करके उसके परिजनों को सूचित कर दिया गया । लड़की ने बताया कि सैफ ने उसे अपना परिचय हिन्दू के तौर पर दिया था।

पुलिस इस पूरे मामले में होटल स्टाफ की भी भूमिका जाँच रही है। इधर सैफ अहमद ने बताया कि उसे प्रकाश गुप्ता का परिचय पत्र किसी रिक्शेवाले ने दिया था। पुलिस इस दावे की भी तस्दीक कर रही है। सैफ अहमद के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज कर लिया गया है। हिंदू कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सैफ ने हिंदू लड़की को महाकाल का दर्शन कराने के बहाने बहलाकर उज्जैन लाया था।

AAP के पूर्व जिलाध्यक्ष महमूद खान ने सोनू बन हिंदू युवती के साथ बनाए संबंध, वीडियो वायरल करने की धमकी देकर डाला धर्मांतरण का दबाव: ब्लैकमेलिंग और मारपीट का भी आरोप

आम आदमी पार्टी (आप) के पूर्व जिलाध्यक्ष महमूद खान को लव जिहाद के गंभीर मामले में गिरफ्तार किया गया है। जयसिंहपुर कोतवाली क्षेत्र की एक हिंदू युवती ने महमूद खान पर दुष्कर्म, धर्म परिवर्तन का दबाव बनाने और ब्लैकमेलिंग का आरोप लगाया है। पीड़िता का कहना है कि महमूद खान ने खुद को सोनू बताकर उससे दोस्ती की और विश्वास में लेकर उसका यौन शोषण किया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीड़िता ने बताया कि करीब 15 महीने पहले महमूद खान ने अपना नाम सोनू बताकर उससे दोस्ती की। बीते 20 अगस्त को वह कलेक्ट्रेट में आरोपित से मिलने आई, जहाँ से उसे शहर के एक कमरे में ले जाया गया। वहाँ महमूद ने न सिर्फ दुष्कर्म किया बल्कि उसका वीडियो भी बना लिया। इसके बाद वीडियो को वायरल करने की धमकी देकर पीड़िता पर शादी के लिए धर्म परिवर्तन का दबाव डाला गया।

जबरदस्ती धर्मांतरण की कोशिश

युवती ने पुलिस को बताया कि महमूद ने उसे मांस खाने पर मजबूर किया और अन्य लोगों को बुलाकर उसका धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश की। आरोपित के कमरे में कैद रहते हुए पीड़िता ने अत्याचार झेला। 25 नवंबर 2024 को मौका पाकर वह कमरे से भाग निकली।

महमूद खान गिरफ्तार

रविवार (5 जनवरी 2025) को आरोपित ने युवती को दोबारा बुलाने की कोशिश की। मना करने पर मारपीट की और नशा युक्त चाय पिलाने का प्रयास किया। पीड़िता की शिकायत पर कोतवाली नगर पुलिस ने महमूद खान को हिरासत में ले लिया है। प्रभारी निरीक्षक नारदमुनि सिंह ने बताया कि आरोपी के खिलाफ दुष्कर्म, ब्लैकमेलिंग और धर्म परिवर्तन के तहत मामला दर्ज किया गया है।

आम आदमी पार्टी की शाख पर असर

महमूद खान की गिरफ्तारी से आम आदमी पार्टी की छवि को झटका लगा है। यह मामला पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह के गृह जनपद सुल्तानपुर का है, जो इसे और भी संवेदनशील बनाता है।

PM मोदी ने किया जम्मू रेलवे डिवीजन का शुभारंभ, तेलंगाना के नए रेलवे टर्मिनल का भी उद्घाटन: कहा- इससे जम्मू-कश्मीर के साथ हिमाचल और लद्दाख को फायदा

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश को कई नए रेलवे प्रोजेक्ट की सौगात दी है। उन्होंने जम्मू कश्मीर में नए रेलवे डिवीजन और तेलंगाना में नए रेलवे टर्मिनल का उद्घाटन किया है तथा ओडिशा में एक नए रेलवे टर्मिनल का शिलान्यास किया है। पीएम मोदी ने इस मौके पर रेलवे क्षेत्र में हुए विकास पर बात की है।

पीएम मोदी ने सोमवार (6 जनवरी, 2025) को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सैकड़ों करोड़ के रेलवे प्रोजेक्ट का शिलान्यास और उद्घाटन किया। उन्होंने उत्तरी रेलवे के अंतर्गत बनाए गए नए जम्मू डिवीजन की शुरुआत की। यह उद्घाटन जम्मू से कश्मीर रेल पहुँचने से पहले हुआ है।

श्रीनगर रेल के माध्यम से जम्मू से जुड़ चुका है। कुछ ही दिनों में इस पर ट्रेनें चलने लगेंगी। जम्मू डिवीजन इसी क्षेत्र में रेलवे के सुगम संचालन के लिए बनाया गया है। इसके अंतर्गत कुल 742 किलोमीटर का रेल रूट होगा। जम्मू डिवीजन में पठानकोट-जम्मू-उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला, भोगपुर सिरवाल-पठानकोट, बटाला-पठानकोट तथा पठानकोट से जोगिंदर नगर वाले रूट होंगे।

इनमें से उधमपुर से बारामूला वाला रेल रूट सबसे अहम होगा क्योंकि यह घाटी को मैदानी इलाके से जोड़ेगा। इसे जोड़ने के लिए ही चेनाब नदी पर विश्व का सबसे ऊंचा रेल ब्रिज बनाया गया है। इस पर रेलवे वर्तमान में अलग-अलग ट्रेनें चला कर ट्रायल कर रहा है।

पीएम मोदी ने जम्मू डिवीजन के उद्घाटन पर कहा, ”आज जैसे-जैसे रेलवे नेटवर्क का विस्तार हो रहा है, उसी हिसाब से नए हेडक्वार्टर और डिवीजन भी बनाए जा रहे हैं। जम्मू डिवीज़न का लाभ जम्मू-कश्मीर के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश और पंजाब के कई शहरों को भी होगा। इससे लेह-लद्दाख के लोगों को भी सुविधा होगी।”

उन्होंने कहा, “हमारा जम्मू-कश्मीर आज रेल इंफ्रास्ट्रक्चर में नए रिकॉर्ड बना रहा है। उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला रेल लाइन इसकी चर्चा आज पूरे देश में है। ये परियोजना जम्मू-कश्मीर को भारत के अन्य हिस्सों के साथ और बेहतरी से जोड़ देगी। इसी परियोजना के तहत दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे आर्च ब्रिज, चिनाब ब्रिज का काम पूरा हुआ है।”

उन्होंने जम्मू रेलवे डिवीजन के अलावा तेलंगाना के चर्लपल्ली न्यू टर्मिनल स्टेशन का भी उद्घाटन किया। इसे ₹413 करोड़ की लागत से बनाया गया है। यह मेडचाल और मलकाजगिरी जिले में है। इससे हैदराबाद समेत बाकी जिलों के रेलवे टर्मिनल पर भीड़ कम होगी।

पीएम मोदी ने इस पर कहा, ” इस स्टेशन के आउटर रिंग रोड से जुड़ने से क्षेत्र में विकास को गति मिलेगी। स्टेशन पर आधुनिक प्लेटफॉर्म, लिफ्ट, एस्केलेटर जैसी सुविधाएं हैं। एक और खास बात है कि ये स्टेशन सोलर ऊर्जा से संचालित हो रहा है। ये नया रेलवे टर्मिनल, शहर के मौजूदा टर्मिनल्स जैसे सिकंदराबाद, हैदराबाद और काचिगुड़ा पर प्रेशर को बहुत कम करेगा।”

ओडिशा में भी रायगड़ा रेल मंडल के मुख्यालय का शिलान्यास भी किया। उन्होंने ओडिशा में चल रहे रेलवे प्रोजेक्ट को लेकर भी बात की। उन्होंने कहा, “आज ओडिशा में रेलवे के नए ट्रैक से जुड़े लगभग अनेकों प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है। इन पर 70 हजार करोड़ रुपये से अधिक का निवेश हो रहा है। राज्य में 7 गति शक्ति कार्गो टर्मिनल शुरू किए गए हैं, जो व्यापार और उद्योगों को बढ़ावा दे रहे हैं। आज भी ओडिशा में जिस रायगड़ा रेल मंडल का शिलान्यास किया गया है, इससे प्रदेश का रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर और मजबूत होगा।”

 

लिवर के 4 टुकड़े, इतना मारा कि 5 पसलियों के टूटने के बाद दिल भी फट गया… पोस्टमॉर्टम वाले डॉक्टर ने पूरे करियर में ऐसा नृशंस मामला कभी नहीं देखा: पढ़िए पत्रकार मुकेश चंद्राकर की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट

छत्तीसगढ़ के बीजापुर में पत्रकार मुकेश चंद्राकर की लाश 3 जनवरी 2025 को एक सेप्टिक टैंक में मिली थी। इस हत्याकांड में मुख्य आरोपित कॉन्ग्रेस नेता एवं ठेकेदार सुरेश चंद्राकर, उसके भाई और 4 अन्य सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। सुरेश के ठिकानों पर बुलडोजर भी चली है। मुकेश चंद्राकर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट सामने आई है। उनके तमाम अंगों में घाव मिले हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मुकेश को कत्ल से पहले बुरी तरह से तड़पाया गया था। मुकेश को इतना मारा गया था कि उनका लिवर 4 टुकड़ों में बँट गया था। सीने की 5 पसलियाँ और कॉलर बोन भी टूटे पाए गए। कॉलर बोन पसलियों को हाथों की हड्डियों से जोड़ती है। हाथ की हड्डी दो टुकड़ों में बँट गई थी। पिटाई से पसलियों के टूटने के बाद दिल भी फट गया था। गर्दन की हट्टी टूट गई थी। मृतक के सिर पर भी 15 घाव पाए गए हैं।

सिर पर किए गए वार से मृतक की खोपड़ी बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गई थी। उनके सीने और सिर को खासतौर पर निशाना बनाया गया था। मुकेश का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर का कहना है कि 12 साल के मेडिकल करियर में उन्होंने ऐसा नृशंस मामला पहले कभी नहीं देखा। डॉक्टर का मानना है कि मौत से पहले किसी भारी चीज से मुकेश के शरीर के कई हिस्सों पर वार किए गए थे।

दरअसल, छत्तीसगढ़ के तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जब 31 मई 2019 को बीजापुर जिले के भोपालपटनम गए थे, तब पार्टी के SC मोर्चा के सचिव एवं आरोपित सुरेश ने उनका जोरदार स्वागत किया था। उसके द्वारा जारी किए गए पोस्टर में दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर राहुल गाँधी, प्रियंका गाँधी और सोनिया गाँधी तक दिखे थे। सुरेश ने अपनी फेसबुक प्रोफ़ाइल पर भी इसे शेयर किया था।

गौरतलब है कि 1 जनवरी 2015 को 33 वर्षीय पत्रकार मुकेश चंद्राकर लापता हो गए थे। परिजनों ने सुरेश चंद्राकर पर अगवा करने का आरोप लगाया था। पुलिस ने उनका शव 3 जनवरी को सुरेश की एक बिल्डिंग के सेप्टिक टैंक से बरामद किया था। हत्या की वजह मुकेश द्वारा सुरेश चंद्राकर की बनवाई सड़क में कमियाँ उजागर करना बताया जा रहा है। पुलिस इस मामले की गहराई से छानबीन कर रही है।

HMPV भारत के लिए नया नहीं, खतरनाक भी कम: बेंगलुरु में 2 केस निकलने पर घबराएँ नहीं, बड़े सर्जन ने बताया- बच्चों में जल्दी होता है

चीन में चिंता का विषय बन चुके ह्यूमन मेटान्यूमोवायरस (HMPV) वायरस के इन्फेक्शन का भारत में पहला मामला सोमवार (6 जनवरी, 2024) को सामने आया। इस वायरस से बेंगलुरु का एक 8 महीने का बच्चा ग्रसित हुआ है। वह भारत में इसका ‘जीरो पेशेंट’ है। जीरो पेशेंट किसी रोग के सबसे पहले पहचाने गए रोगी को कहते हैं।

बेंगलुरु में ही एक और बच्चे के इस वायरस से ग्रसित होने की बात सामने आई है। वह तीन महीने का है। लेकिन अभी इस वायरस से चिंतित होने की जरूरत नहीं है, ऐसा एक बड़े सर्जन ने बताया है। उन्होंने कहा है कि यह वायरस भारत के लिए नया नहीं है।

भारत में यह पहला मामला हाल ही में चीन में HMPV के मामलों में उछाल के बाद सामने आया है। चिंताएँ इस लिए भी बढ़ी हैं क्योंकि चीन से ही कोविड-19 की शुरुआत हुई थी। बेंगलुरु में पाए गए इस वायरस से ग्रसित पाए गए बच्चों में से 8 माह के बच्चे का इलाज चल रहा है।

वहीं जो 3 महीने का बच्चा इससे ग्रसित पाया गया था, वह ठीक हो चुका है और उसको अस्पताल से छुट्टी दे दी गई है। इन मामलों की पुष्टि भारत में मेडिकल रिसर्च के लिए जिमेदार संस्था भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने की है।

इस वायरस से बढ़ती चिंताओं के बाद काफी जाने-माने सर्जन अमित ठधानी ने लोगों से ना घबराने की अपील की है। उन्होंने बताया है कि भारत में इस वायरस का पहले से क्या इतिहास रहा और पहले हुए शोधों में इस पर क्या जानकारियाँ हासिल हुई हैं।

उन्होंने एक्स (पहले ट्विटर) पर लिखा, “चीन से आया नया वायरस HMPV दशकों से भारत में मौजूद है और यह एक जाना-माना वायरस है जो खास तौर पर बच्चों में सांस से जुड़ी बीमारी का कारण बनता है। करीब दो दशक पहले AIIMS में किए गए इस शोध से पता चला कि बचपन में सांस कि बीमारियों में इसकी मौजूदगी करीब 3% से 33% है।”

सर्जन ठधानी से एक व्यक्ति ने पूछा कि भले ही यह वायरस पहले मिला चुका हो लेकिन इसका स्ट्रेन (प्रकृति) नई हो सकती है क्या। इस पर डॉ. अमित ठधानी ने साफ़ किया कि भले ही स्ट्रेन नया हो या पहले से अलग हो, यह क्रॉस-इम्युनिटी के चलते ज्यादा असर नहीं कर पाएगा।

सर्जन ठाधानी ने बताया कि सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम (SARS) वायरस, जिससे कोविड चालू हुआ था, वह केवल जानवरों और पक्षियों में पाया जाता है। जबकि HMPV आम तौर पर इंसानों में पाया जाता है। चीन ने इन मामलों के चिंताजनक होने से इनकार किया है। चीन HMPV मामलों में बढ़त को हर साल मौसम बदलने पर होने वाली बीमारी के तौर पर आँका है।

1954 का कुंभ, 1000+ लोगों की मौत और PM नेहरू: किसे बचाने के लिए इसे कहा गया ‘कुछ भिखारियों की मौत’ – एकमात्र मौजूद पत्रकार ने जो-जो देखा-लिखा, जानिए सब

तीर्थराज प्रयागराज में हर 12 साल बाद कुँभ मेले का आयोजन होता है। प्रयागराज महाकुंभ 2025 को लेकर बहुत कुछ लिखा-पढ़ा जा रहा है, लेकिन हम बताने चल रहे हैं आजादी के बाद आयोजित पहले कुंभ मेले के बारे में, जहाँ प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उस समय राष्ट्रपति रहे डॉ राजेंद्र प्रसाद भी पहुँचे थे। लेकिन उनका पहुँचना इतना दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि 1000 से ज्यादा लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी और 2000 से ज्यादा लोग घायल हो गए।

करीब 1000 लोगों के मारे जाने की वजह थी, भगदड़ का मचना.. जिसके बारे में अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग दावे किए जाते हैं। हालाँकि हम प्रकाशित कर रहे हैं वो सबसे विश्वसनीय आँखों देखी, जिसके हमेशा से छिपाने की कोशिश की गई।

कुंभ 1954 में भगदड़ का नेहरू कनेक्शन

भारत को आजादी 1947 में मिली थी। सन 1954 में पहली बार आजाद भारत के प्रयाग (तत्कालीन इलाहाबाद) में कुंभ का आयोजन होने वाला था। हालाँकि 1948 में अर्धकुंभ का आयोजन हो चुका था। चूँकि कुंभ 1954 का आयोजन खुद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के शहर इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हो रहा था, तो इसमें नेहरू की निजी रुचि भी थी। लेकिन दूसरे शाही स्नान (मौनी अमावस्या) में खुद नेहरू के शामिल होने के फैसले ने प्रयाग में लाशों के ढेर लगा दिए।

इन घटनाओं को कॉन्ग्रेस की सरकारों ने दबाने के भरसक प्रयास किए, यहाँ तक कि इस 1000 लोगों के मारे जाने की घटना को कुछ ‘भिखारियों’ की मौत कह कर भी सरकार ने प्रचारित किया और असलियत को दबाने की कोशिश की, लेकिन आनंद बिहार पत्रिका के एक पत्रकार की वजह से घटना खुल गई। सबूत के तौर पर तस्वीर भी छप गई। इसके बावजूद इस घटना को कॉन्ग्रेसियों ने पूरी ताकत से छिपाने की कोशिश की। हालाँकि इस घटना के खुल जाने और हादसे के चलते निराशा में घिर चुके उस समय के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत बेहद नाराज हुए थे और पत्रकार के लिए ‘हरा#$%दा’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था।

कैसे गई थी कुंभ 1954 में हजार से ज्यादा लोगों की जान?

ये दिन था 3 फरवरी 1954… मौका था कुंभ के दूसरे शाही स्नान यानी मौनी अमावस्या का। जवाहरलाल नेहरू खुद ही प्रयाग पहुँचे थे और उनके साथ थे राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद। समय था सुबह के करीब 10.20 बजे का, जब नेहरू जी और राजेंद्र बाबू की कार त्रिवेणी रोड से आई और बैरियर को पार करके किला घाट की ओर बढ़ी। इस दौरान नेहरू को देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी, तो मेले में आ रहा हुजूम और मेले से निकल रहा हुजूम आमने-सामने आ गया। भगदड़ मच गई। लोग खाईं से नीचे गिरने लगे, तो पास का ही बड़ा कुआँ लाशों से भर गया।

आनंद बाजार पत्रिका के लिए मेला कवर कर रहे फोटो जर्नलिस्ट एनएन मुखर्जी ने साल 1989 में ‘छायाकृति’ नाम की पत्रिका में छपे अपने संस्मरण में इन बातों को विस्तार से बताया है। दरअसल, इस मेले में हुए हादसे की भयावहता की पोल उन्हीं की तस्वीर से खुली थी। वो हादसे के समय वो संगम चौकी के पास एक टॉवर पर खड़े थे।

उन्होंने अपने संस्मरण में बताया था कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को उसी दिन संगम स्नान के लिए आना था। इसलिए सभी पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी उनके आगमन की तैयारियों में व्यस्त थे। लेकिन सुबह 10.20 बजे जब दोनों कार से किला घाट की तरफ बढ़े, तो भीड़ बेकाबू हो गई। हर तरफ लाशें थी। वो खुद कई लाशों के ऊपर से चढ़ कर आगे गए थे और तस्वीरें खींची थी।

उन्होंने हैरानी जताते हुए लिखा था कि इस बड़ी घटना के बावजूद हादसे वाली जगह से दूर रहे शीर्ष अधिकारी सरकारी आवास पर शाम 4 बजे तक चाय-नाश्ते में व्यस्त रहे, और उन्हें इस हादसे के बारे में जानकारी तक नहीं मिली। वहीं, जब एनएन मुखर्जी करीब 1 बजे अपने दफ्तर पहुँचे, जहाँ संपादक समेत तमाम पत्रकार साथी उनके जिंदा बचने पर हैरानी जताते हुए उनके आने पर खुशी जताई।

ये मामला अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियों में न जाए, इसलिए उस समय की सरकार ने इसे ‘कुछ भिखारियों की मौत’ कहकर खारिज करने की कोशिश की। लेकिन एनएन मुखर्जी ने वो तस्वीरें अधिकारियों के सामने रख दी, जिसमें कई महिलाएँ महँगे कपड़े और गहने पहने हुई थी, जिससे साफ जाहिर होता था कि मृतक कोई भिखारी नहीं थे, बल्कि वो संपन्न परिवारों से थे और सरकारी अव्यवस्था के शिकार हुए थे।

इस घटना में मारे गए लोगों के शव किसी को दिए नहीं गए, बल्कि ढेर के ढेर लगाकर सामूहिक रूप से जला दिए गए। एनएन मुखर्जी ने बताया था कि वो किसी तरह से उन शवों के ढेर के पास पहुँचे थे। उन्होंने पुलिसकर्मी के पैर पकड़ते हुए उससे से कहा था कि वो अपनी “मृत दादी को आखिरी बार देखना चाहते हैं”, जिसके बाद उन्हें शवों के पास जाने दिया गया। इस बीच, एनएन मुखर्जी ने चुपके से छोटे कैमरे से सामूहिक रूप से जलाए जा रहे शवों की तस्वीर खींच ली थी।

आनंद बाजार पत्रिका ने हादसे की खबर तस्वीर के साथ छापी। चूँकि बाकी जगहों पर बहुत कम खबर छपी, ऐसे में कॉन्ग्रेसी सिस्टम हैरान था कि हादसे की तस्वीर छप कैसे गई। उन तस्वीरों को देखते ही मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने चिल्लाकर कहा था, ‘कहाँ है ये ह$%#@मजा%$ फोटोग्राफर।’ एनएन मुखर्जी ने कहा कि इस बड़े हादसे से सबक लेकर सरकार ने आगे के सभी कुंभ मेले के लिए महीनों-सालों पहले से व्यवस्था करनी शुरू की थी। हालाँकि इस घटना के दौरान जवाहरलाल नेहरू की मौजूदगी को छिपाने के प्रयास अब तक चले आ रहे हैं।

पीएम मोदी ने मंच से की सही बात, तो गलत ठहराने में जुटा मीडिया गैंग

इस पूरी घटना को हमेशा से छिपाने की कोशिश होती रही है। तथ्यों को भी तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है। साल 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कौशांबी की एक जनसभा में इस वाकये का जिक्र किया था। उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि प्रयागराज कुंभ 1954 की लोहमर्षक घटना को छिपाने, दबाने के प्रयास किए गए। इसके बाद तो मानों पालतू मीडिया गैंग को कोई चारा मिल गया हो। तुरंत ही ऐसे गवाह पेश कर दिए गए, जिनका उस स्थान से कोई खास लेना-देना नहीं था और जवाहर लाल नेहरू के नारनामे को छिपाने के लिए ‘सुनी-सुनाई’ बातों को छापा गया। इस मामले को लेकर 12 साल पहले भास्कर ने भी एक रिपोर्ट छापी थी, लेकिन उसमें भी नेहरू की संलिप्तता को छिपा लिया गया था। बता दें कि हादसे के बाद इंडिया एक्सप्रेस ने इस घटना में सरकारी अधिकारियों के हवाले से सिर्फ 300 लोगों के मारे जाने की बात प्रकाशित की थी। हालाँकि टाइम पत्रिका ने हादसे में 500 लोगों के मारे जाने की बात कही थी, लेकिन नेहरू की मौजदूगी को हर तरफ से छिपाने की कोशिश ही की गई।

कुंभ 1954 के हादसे की तस्वीर, जो एनएन मुखर्जी ने खींची थी (फोटो साभार: TheStatesman)

ऐसा ही एक किस्सा बीबीसी हिंदी ने भी छापा, जिसमें उसने ये बताने की कोशिश की थी कि उस समय का मीडिया बहुत आजाद था। लेकिन एनएन मुखर्जी को वो भूल गया और ये साबित करने की कोशिश में पूरा जोर लगा दिया कि उस हादसे की वजह जवाहरलाल नेहरू नहीं थे। यही नहीं, बीबीसी ने तो ये भी झूठ स्थापित करने की कोशिश की, कि जवाहरलाल नेहरू घटना के समय प्रयागराज में थे ही नहीं। अलबत्ता उसने राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को जरूर खींचने की कोशिश की, कि उनके सामने ही भगदड़ हुई।

(एनएन मुखर्जी के संस्मरण के बारे में 4 फरवरी 2019 को द-स्टेट्समैन ने अंग्रेजी में छापा था। वो मूल रिपोर्ट स्क्रॉल की हिंदी वेबसाइट सत्याग्रह पर छपी थी। चूँकि सत्याग्रह वेबसाइट बंद हो गई है, ऐसे में ये रिपोर्ट सिर्फ द स्टेट्समैन पर ही उपलब्ध है।)

60 वर्ष पुराना मंदिर 30 सालों से बंद, फिरोजाबाद में खंडित मिली प्रतिमाएँ: प्रशासन ने पट खुलवाया, हिन्दू संगठनों ने पढ़ी हनुमान चालीसा

उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में रविवार (5 दिसंबर 2024) को 30 साल पुराना एक बंद पड़ा मंदिर मिला है। मंदिर की जानकारी होते ही जहाँ हिन्दू संगठनों ने इसकी सफाई शुरू की, तो वहीं प्रशासन ने महादेव के इस मंदिर में पहुँचकर ताला खुलवाया। यह मंदिर मुस्लिम बहुल इलाके में है। लोगों ने बताया कि इलाके में पहले एक हिन्दू परिवार रहता था मगर अब वो पलायन कर चुका है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यह मामला फिरोजाबाद जिले के थानाक्षेत्र रसूलपुर का है। यहाँ के शहीद चौक के पास बेहद संकरी गली नंबर 8 मुस्लिम आबादी मुस्लिम बहुल क्षेत्र मानी जाती है। इसी गली के कोने में एक मंदिर पिछले 30 वर्षों से बंद पड़ा था। बताया जा रहा है कि 3 दशक पहले इस जगह एक हिन्दू परिवार रहा करता था। उसी परिवार द्वारा इस मंदिर को बनवाया गया था जहाँ काफी समय तक नियमित पूजापाठ हुआ।

कुछ समय पहले हिन्दू परिवार इलाके से पलायन कर गया। हिन्दू परिवार के जाते ही मंदिर पर ताला लग गया। धीरे-धीरे वह जगह खंडहर नुमा हो गई। रविवार को यहाँ हिन्दू संगठन से जुड़े लोग पहुँचे और साफ़-सफाई करने लगे। उन्होंने पाया कि मंदिर के अंदर मौजूद मूर्तियाँ भी खंडित हो गई हैं। मंदिर के गुंबद पर अभी तक जंजीर लटक रही थी। माना जा रहा है कि इसी जगह पर घंटा लटका रहा होगा। दीवालों पर धार्मिक लाइनें लिखी हुई हैं। यहाँ हनुमान चालीसा का पाठ भी हुआ।

मामले की जानकारी प्रशासन को मिली तो पुलिस फ़ौरन मौके पर पहुँची। पुलिस की मौजूदगी में मंदिर का ताला खोला गया। इस दौरान कोई विरोध नहीं हुआ। सिटी मजिस्ट्रेट राजेंद्र सिंह के मुताबिक मंदिर लगभग 60 वर्ष पुराना है। इसका निर्माण 1963 में हुआ था। स्थानीय हिन्दुओं ने मंदिर खोले जाने को अपने धार्मिक अधिकार वापस मिलने जैसा बताया है। हिन्दू संगठन से जुड़े सदस्यों ने जल्द ही इस जगह विधि-विधान से प्रतिमा स्थापित करने का ऐलान किया है।