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कट्टरपंथियों ने सिर्फ हाथ काटा, चर्च ने तो जिंदगी तबाह कर दी, पत्नी ने कर ली आत्महत्या: एक प्रोफेसर की आपबीती

टीजे जोसेफ केरल के इदुकी जिले के एक कॉलेज में मलयालम पढ़ाते थे। 4 जुलाई 2010 को ईशनिंदा के आरोप में मुस्लिम कट्टरपंथियों ने उनका दाहिना हाथ काट दिया। कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन के 7 युवकों ने ​उन पर तब हमला किया जब वे अपने परिवार के साथ चर्च से प्रार्थना कर लौट रहे थे। कट्टरपंथियों का आरोप था कि जोसेफ ने परीक्षा के लिए जो प्रश्न तैयार किए थे उसमें ईशनिंदा वाले सवाल पूछे गए थे।

इस हमले के बाद जोसेफ का जीवन सामान्य नहीं रह गया था। हाल ही में जोसेफ की ऑटोबायोग्राफी रिलीज हुई है। इसके बाद एक फिर से धार्मिक असहिष्णुता कि मुद्दा गर्म हो गया। इसका कारण उन्हें निशाना बनाने वाले इस्लामिक कट्टरपंथी नहीं हैं। बल्कि, जोसेफ के खुद के ईसाई समुदाय ने उनकी जिंदगी तबाह कर दी। बकौल जोसेफ, उन्होंने अपना हाथ अपनी समुदाय की वजह से खोया है।

जोसेफ ने अपनी पुस्तक के विमोचन के बाद एक साक्षात्कार में हफपोस्ट इंडिया से बात करते हुए कहा, “इस्लामिक कट्टरपंथियों ने तो मुझ पर एक बार हमला किया। मगर जिस ईसाई संप्रदाय से मेरा संबंध है, उसने मुझे बहिष्कृत करके मेरा जीवन बर्बाद कर दिया। बिना किसी उचित कारण के मुझे नौकरी से निकाल दिया। मेरी नौकरी छूटने के कारण हुए सामाजिक अलगाव और आर्थिक संकट से तंग आकर मेरी पत्नी ने आत्महत्या कर ली।”

खुद को ‘ईसाई कट्टरता का जीवित शहीद’ बताते हुए 63 वर्षीय जोसेफ ने चर्च पर आरोप लगाया कि उसने मुस्लिम समूहों के साथ सीधे टकराव से बचने के लिए उन्हें बलि का बकरा बनाया। बता दें कि जोसेफ द्वारा सेट किए गए पेपर पर विवाद बढ़ने के बाद वो गिरफ्तारी के डर से अंडरग्राउंड हो गए थे। पुलिस ने उनके खिलाफ सांप्रदायिक घृणा फैलाने का मामला दर्ज कर लिया था। बचने के लिए जोसेफ एक शहर से दूसरे शहर भाग रहे थे। आखिरकार उन्हें पलक्कड़ जिले में एक मुस्लिम के लॉज में आसरा मिला। 1 अप्रैल 2010 को उन्हें यहाँ से गिरफ्तार कर लिया गया। कुछ समय बाद ही जोसेफ जमानत पर रिहा हो गए थे, लेकिन उनके पास नौकरी नहीं थी। उसी साल मार्च में उन्हें जॉब से सस्पेंड कर दिया गया। जोसेफ बताते हैं कि वो तीन बार हमले से बच गए, लेकिन चौथी बार हमलावरों ने उनका हाथ काट दिया।

जोसेफ कहते हैं, “शुरुआत में जब प्रश्न को लेकर विवाद हुआ तो साइरो मालाबार चर्च और इसके तहत आने वाले कॉलेज मैनेजमेंट ने मेरा पूर्ण समर्थन दिया था। हालाँकि मार्च 2010 में ही केरल में चर्च के अधिकारियों की एक दूसरी हाई-लेवल मीटिंग हुई थी। इसके बाद हर किसी ने अपना स्टैंड बदल लिया। इस बैठक में PFI और अन्य कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों का विरोध नहीं करने का निर्णय लिया गया। इसके बाद मैं बिल्कुल अकेला रह गया।” उन्होंने आगे कहा, “चर्च ने इस्लामी कट्टरवाद और मेरे साथ हुए हमले का समर्थन किया, जिसकी वजह से PFI ने मुझ पर हमला किया और मुझे अपने हाथ गँवाने पड़े।”

हमले में अपना दाहिना हाथ खोने के बाद उन्होंने बाएँ हाथ से पुस्तक लिखी। जोसेफ ने बताया कि चर्च ने शुरुआत में समर्थन करने के बाद उन्हें बहिष्कृत कर दिया। इसका साफ मतलब था कि चर्च ने आधिकारिक तौर पर यह घोषित कर दिया कि वो अब इसके सदस्य नहीं रहे। उनके साथ-साथ उनकी पत्नी, दो बच्चे और बुजुर्ग माँ को भी बहिष्कृत कर हाशिए पर खड़ा कर दिया।

जोसेफ कहते हैं, “चर्च के अधिकारियों ने मुझे इस्लामोफोबिया के साथ एक आतंकवादी के रूप में दिखाने का प्रयास किया। उन्होंने मुझे बहिष्कृत किया और पादरियों और धर्मात्माओं को मेरे पास आने और किसी भी प्रकार की मदद करने से रोका। यहीं से तकलीफें शुरू हुईं, जो अभी भी मेरे जीवन को प्रभावित कर रहा है।” वो कहते हैं, “चर्च के फैसले की वजह से मेरे बच्चों ने अपनी माँ को खो दिया। अब वो कभी वापस नहीं आएगी।”

उन्होंने आगे कहा, “मुस्लिम संगठन ने मेरे ऊपर हमला किया, लेकिन मेरे अपने लोगों ने मुझे जॉब से निकाल दिया, मेरे परिवार को बहिष्कृत कर दिया। चर्च और कॉलेज ने जो मेरे साथ किया वो कट्टरपंथियो के किए से भी भयानक सजा है।”

एकेडमिक और लेखक शाजी जैकब का कहना है कि जोसेफ के हाथ काट दिए जाने और फिर उनकी पत्नी द्वारा आत्महत्या कर लिए जाने के बाद से ही केरल में मजहबी कट्टरवाद अत्यंत चिंता का विषय बनकर उभरा। उन्होंने कहा, “अब उनकी (टीजे जोसेफ की) आत्मकथा साबित करती है कि कोई भी धार्मिक समूह असहिष्णुता और रुढिवादिता से मुक्त नहीं है। कैथोलिक चर्च ने अदालतों द्वारा उन्हें ईशनिंदा के आरोप से मुक्त करने के बाद भी उनके साथ बुरा व्यवहार किया है।”

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पुलिस ने मेरी दोनों टाँगें तोड़ डाली, ₹2Cr मुआवजा दो: HC पहुँचा जामिया का छात्र शय्यान मुजीब

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के एक छात्र ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उसकी याचिका पर हाई कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार तथा दिल्ली पुलिस को को नोटिस जारी किया है। छात्र शय्यान मुजीब का दावा है कि उसकी चोट के लिए सरकार जिम्मेदार है और उसे 2 करोड़ रुपए बतौर मुआवजा दिया जाना चाहिए। उसने दावा किया है कि जामिया में भड़की हिंसा के दौरान हुई पुलिस कार्रवाई में वो घायल हो गया था और उसे चोटें आई थीं। बता दें कि 15 दिसंबर 2019 को जामिया नगर में सीएए विरोधी उपद्रवियों ने कई वाहनों को फूँक डाला था।

दंगा और आगजनी की इस घटना के बाद पुलिस ने जामिया कैम्पस में घुस कर उपद्रवियों को खदेड़ा था। मुजीब ने दावा किया है कि वो लाइब्रेरी में बैठ कर पढ़ाई कर रहा था, तभी पुलिस ने उसकी पिटाई की। बता दें कि रविवार (फरवरी 16, 2020) को जामिया के छात्रों ने एक वीडियो जारी कर पुलिस पर लाइब्रेरी में घुस कर छात्रों को पीटने का आरोप लगाया था। हालाँकि, बाद में रिलीज हुए वीडियो से पता चला कि नकाबपोश पत्थरबाज लाइब्रेरी में भाग कर आ गए थे और पढ़ने का ड्रामा कर रहे थे। पुलिस ने चिह्नित कर उन पर एक्शन लिया था।

शय्यान मुजीब ने कोर्ट को बताया है कि उसकी दोनों टाँगें टूट चुकी हैं, जिन्हें ठीक करवाने में उसे 2.5 लाख रुपए की चपत लग गई। कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और दिल्ली सरकार को नोटिस जारी किया है। गत 15 दिसंबर को हुए दंगे को शांत करने के लिए पुलिस को आँसू गैस का सहारा लेना पड़ा था और लाठीचार्ज भी की गई थी। इसके बाद मीडिया व लिबरलों के एक वर्ग ने दिल्ली पुलिस पर ‘छात्रों के साथ ज्यादती’ करने का आरोप मढ़ा था।

दिल्ली पुलिस स्पष्ट कह चुकी है कि उसके किसी भी जवान ने किसी निर्दोष छात्र पर हाथ नहीं उठाया है। रविवार को वीडियो जारी होने के बाद पुलिस ने कहा कि इसकी जाँच की जाएगी और फिर कार्रवाई की जाएगी। बता दें कि जामिया प्रशासन व वहाँ के छात्रों ने पुलिस की जाँच में सहयोग भी नहीं किया था। जब पुलिस सीसीटीवी फुटेज लेने पहुँची थी, तब छात्रों ने जाँच कार्य में बाधा डालते हुए हंगामा खड़ा कर दिया था।

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वैलेण्टाइन से पहले और बाद के नेता: ‘प्यार’ में खाया धोखा, गली-गली भटक रहा मतदाता

दिल्ली का चुनाव संपन्न हुआ। लोकतंत्र के इस महान यज्ञ के तमाम पुरोहित ‘स्वाहा’ के उच्चारण के साथ शांति काल में उतर गए। जनसेवक नेतागण अपने-अपने बाथरूमों में आगामी पाँच वर्षों के लिए पुनर्स्थापित हुए। ‘अभी पहुँचता हूँ’ का दुखदाई समय बीता और ‘साहब बाथरूम में हैं’ का मनोहारी युग पुन: लौट आया है।

अख़बारों में रंगीन पूर्ण पृष्ठ राजनैतिक विज्ञापन फिर लौटे और विजयी नेताजी के पूरे पेज के शपथग्रहण के निमंत्रण को देख कर जनमानस हर्षित हो आया। बुतों को फेंकने-उठाने के बाद फ़ैज़ साहब ने कॉन्ग्रेस के शून्य से शून्य के सफ़र को देख कर फ़रमाया कि फिर से इक बार हरेक चीज़ वही थी, जो है। विराट हिंदू और क़ौम के सिपाही लाठियाँ घर में रख कर फ़िक्स्ड कुश्तियों के अखाड़ों की ओर लौट गए हैं। पत्रकार वर्ग की कुर्सियों के नीचे लगे कंटक हट गए हैं, और आगामी कुछ महीने शांतिपूर्वक बैठे-बैठे वे गोबर की खाद से गमलों में गोभी उगा कर पूर्व वित्तमंत्री के समान करोड़पति बनने की विधि जनता को बता सकेंगे।

अंबेडकर, गाँधी, बिस्मिल और अश्फ़ाक के चित्र वापस संदूकों में लौटेंगे और संविधान के रक्षक विधायकों के होर्डिंग धन्यवाद ज्ञापन के साथ ट्रैफ़िक सिग्नलों पर लटकेंगे। पप्पू और मुन्ना, शकील और वकील भी नेताओं के नाम पर बधाई के चित्र टाँगेंगे ताकि ख़ास-ओ-आम को सनद रहे कि ‘चचा विधायक हैं हमारे’ और हम ही सत्ता और जनता के मध्य प्रॉपर चैनल हैं। ज़मीन-जायदाद, नौकरी, सिफ़ारिश आदि की जो समस्याएँ तांत्रिक बाबू बंगाली नहीं सुलझा सकते हैं, उनके लिए विधायक चचा के यह नवांकुरित भतीजे आशा का संदेश लाते हैं। इन्हीं का स्वर उस बाथरूम के भीतर पहुँचता है जहाँ के जब-जब वोट की हानि होती है, चुनाव समय में पार्टी की रक्षा करने हेतु नेता प्रकट होते हैं।

ऐसे समय पर, जब वसंत निकल रहा है, वैलेण्टाइन बाबा का सालाना उर्स आया है। घाघ मतदाता जहाँ अपना मुफ़्त पानी, बिजली प्राप्त करके मगन है, नए मतदाता इस तेज़ी से बदलते परिदृश्य से चकित हैं। घाघ मतदाता पर्यावरण या संविधान रक्षा के ठीक चुनाव के पूर्व उठे बवाल को समझता है और उहापोह के माहौल में पार्टियों के मैनिफ़ेस्टो में धीरे से मुफ़्त कलर टीवी से लेकर मुफ़्त मैनिक्योर तक घुसा देता है। नया मतदाता भावुक होता है और यह सोचता है कि भारत इस चुनाव के बाद हिंदू या मुस्लिम राष्ट्र बन जाएगा। नया मतदाता भावुक प्रेमी की भाँति उस प्रत्याशी की स्मृति में आँसू बहाता है जो अभी पिछले सप्ताह संविधान, समाज और संस्कृति की रक्षा करने का वायदा कर के लुप्त हो गया है। भावुक मतदाता कहता है कि हे संत वेलेण्टाइन, अभी तो मेरा प्रिय श्वेत धवल वस्त्रों में व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की बात करता था, हा रे वेलेण्टाइन, कहाँ गया वह मेरा छलिया। कहाँ छुप गया है वह निर्मोही, क्या वह अब मेरा न रहा?

प्रेम में धोखा खाई किशोरी प्रेमिका सरीखे नए मतदाता को घाघ मतदाता पुरानी विवाहिता की भाँति उसे समझाता है- सब एक से होते हैं, और एक समय के बाद वो पहले जैसे भी नहीं रहते। अत: इस प्रेम दिवस पर, हे नव-मतदाता, तुम अपना टेंट-टपरा समेटो और उस कार्य में लगो जिसके लिए विधाता ने तुम्हें बनाया है। नौकरी ढूँढो, लटकती हुई नंगी बिजली के तारों से बचकर, बसों में लटक कर, जीविका की तलाश में निकलो और सामाजिक सरोकारों से एक वोकसुलभ तटस्थता बनाए रखो। यही वोकत्व जो जानता कम है और महसूस अधिक करता है, तुम्हें आदर्श मतदाता बनाता है। तुम्हें इसकी रक्षा करनी है ताकि अगले चुनाव में भी तुम संविधान, धर्म और पर्यावरण की रक्षा जैसे महान विषयों की आड़ में अपना मूल्य प्रत्याशियों की दृष्टि में बनाए रख सकते हो।

जिस प्रकार टेडी बियर, गुलाबों की चकाचौंध के पीछे प्रियतमा के द्वारा पकाया हुआ आलू का पराठा, और जानूँ के द्वारा कराया गया मुफ़्त फ़ोन रिचार्ज ही वो शक्ति है जो प्रेमसंबंधो में माधुर्य बनाए रखता है, बड़े-बड़े नारों के पीछे मुफ़्त संसाधनों का वचन और अपने वालों को जात-धर्म के झंडे के नीचे बाँधकर भीड़ जमा करने का माद्दा ही नेता और मतदाता के मध्य प्रेम को बनाए रखता है। फ़ूलों एवं प्रेम-पत्रों का प्रेम में वही स्थान है जो भारतीय राजनीति में आदर्शों एवं विचारधारा का है। जो नेता यह समझ गया वही पार लगता है अन्यथा चुनाव के वक्त मतदाता भी चतुर सुंदरी की भाँति नेता को -‘मैंने तो तुम्हें इस दृष्टि से कभी देखा ही नहीं’ या ‘आई लाईक यू एज़ ए फ़्रेंड’ – जैसा कुछ कहकर निकल लेता है, और नेताजी उसी प्रकार आजीवन पोस्टर चिपकाने वाले प्रत्याशी बने रह जाते हैं, जैसे आदर्शवादी प्रेमी अंकलजी के स्कूटर बनवाता रह जाता है और बाद में प्रेमिका के विवाह में बारात पर इत्र छिड़कता देखा जाता है। इस वैलेण्टाइन संदेश को हृदय में रखते हुए आइए हम सब एक आदर्श मतदाता बनने का प्रण लें, ताकि चुनाव दर चुनाव हम अपने नेतृत्व के लिए आदर्श नेता प्राप्त कर सकें।

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फारूक अब्दुल्ला और गुलाम नबी आजाद की छत्रछाया में जम्मू में लैंड जिहाद: 3 से 100 हो गए मस्जिद

जम्मू शहर और उसके कई जिलों में डेमोग्राफिक चेंज हाल फिलहाल में बड़ी चिंता के तौर पर उभरा है। इस संबंध में ‘एकजुट जम्मू’ नामक एक संगठन ने जो खुलासे किए हैं वे बेहद चौंकाने वाले हैं। संगठन के अध्यक्ष वकील अंकुर शर्मा ने बीते दिनों एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इन तथ्यों को सामने रखा।

इस संबंध में संगठन ने जो रिपोर्ट तैयार की है उससे पता चलता है कि जम्मू में सुनियोजित तरीके से लैंड जिहाद को अंजाम दिया गया। जम्मू-कश्मीर के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों फारूक अब्दुल्ला और गुलाम नबी आजाद की छत्रछाया में इसे अंजाम दिया गया। दोनों नेताओं ने हिंदू बहुसंख्यक इलाकों में मुस्लिम आबादी को स्टेट स्पांसर्ड तरीके से लाकर बसाया। देखते ही देखते अपने ही इलाकों में हिंदू अल्पसंख्यक हो गए। जम्मू-कश्मीर की सभी तथाकथित ‘सेकुलर’ मुस्लिम पार्टियों चाहे वह पीडीपी हो या नेशनल कॉन्फ्रेंस उसने लैंड जिहाद को आगे बढ़ाने का काम किया। कॉन्ग्रेस का एक धड़ा भी इसमें शामिल है।

‘एकजुट जम्मू’ की जॉंच टीम ने इस संबंध में पर्याप्त आँकड़े जुटाए हैं। इसके आधार पर संगठन के अध्यक्ष ने बताया कि फारूक अब्दुल्ला और गुलाम नबी आजाद ने भटिंडी के जंगलों की जमीन पर पहले खुद कब्जा किया। वहाँ पर अपने घर बनाए। बाद में मजहबी लोगों को वहॉं आकर बसने के लिए प्रोत्साहित किया। इस दौरान राज्य में इन्हीं नेताओं की पार्टियॉं सत्ता में रही।

रिपोर्ट के अनुसार जम्मू में 1990 के बाद 1,00,000 घरों का निर्माण हुआ। 50 लाख कनाल सरकारी जमीन पर अतिक्रमण हुआ। एक कनाल 505.857 वर्गमीटर के बराबर होता है। 1994 में जम्मू शहर में केवल 3 मस्जिद। लेकिन देखते ही देखते वहाँ 100 से ज्यादा मस्जिद बना दिए गए।

रिपोर्ट के मुताबिक, एक समय तक हिंदू बहुसंख्यक आबादी वाले जम्मू में मुस्लिमों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसमें भटिंडी, नरवाल, सुंजवाम, कालुचक, पीर बाबा मोहल्ला, पूँछी मोहल्ला, छन्नी रामा, छन्नी हिम्मत, रायका, सिधरा, रंगूरा, खानपुर, नगरोटा, गुज्जर मोहल्ला, कासिम नगर शामिल हैं। केवल छन्नी हिम्मत और कासिम नगर में ही हिंदू- मुस्लिमों का अनुपात 50-50 का है। अन्य इलाको में अब 80 प्रतिशत से ज्यादा आबादी मुस्लिम है।

स्थिति इतनी भयावह होती जा रही है कि वक्फ ने हिंदू बहुल जिलों जैसे सांबा, कठुआ और हिंदू बहुल नगर जैसे पूँछ, रंभन में जमीनों पर अपना दावा कर दिया है। संगठन की रिपोर्ट कहती है कि नगरोटा के पास तवी नदी के पास मुस्लिम इलाकों का निर्माण नगरोटा के सैन्य छावनी की घेराबंदी की साजिश का हिस्सा है।

इसके अलावा जम्मू में रेलवे पटरियों के आसपास के क्षेत्र भी जनसांख्यिकीय अतिक्रमण के निशाने पर रहा है। जम्मू-श्रीनगर हाईवे और जम्मू-पूँछ हाईवे पर ढाबा, रेस्तरां, सब्जी की दुकान, हैंडक्राफ्ट शॉप, होटल के व्यवसायों से भी डेमोग्राफिक तौर पर बड़ा बदलाव आया है।


प्रेस से बात करते एकजुट जम्मू के अध्यक्ष अंकुर शर्मा व अन्य

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370 तो गियो लेकिन J&K में तिरंगा सुरक्षित हाथों में, आँखें फाड़ कर देखो महबूबा कंधे की ज़रूरत किसे है

महाकाल एक्सप्रेस में महादेव को देख ओवैसी की सुलगी, लोगों ने कहा- एकतरफा सेकुलरिज्म नहीं चलेगा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (फरवरी 16, 2020) को काशी महाकाल एक्सप्रेस की शुरुआत करके भगवान शिव के भक्तगणों को नायाब तोहफा दिया। इस ट्रेन की शुरुआत के साथ ही भगवान शिव के तीन ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर, महाकालेश्वर और काशी विश्वनाथ एक साथ जुड़ गए। अब भक्तगण इस ट्रेन के जरिए आसानी से तीनों जगह दर्शन करने पहुँच पाएँगे।

जानकारी के अनुसार, इस ट्रेन की शुरुआत 20 फरवरी से होनी है। लेकिन इस ट्रेन की खासियतों के बारे में अभी से पता लगना शुरू हो चुका है। इस ट्रेन की सबसे अहम बात है कि इसमें एक सीट भगवान महाकाल के लिए आरक्षित है, जिस पर शिव मंदिर बनाया गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक एक्सप्रेस ट्रेन के बी5 कोच की सीट नंबर 64 पर इस मंदिर को स्थापित किया गया है।

हालाँकि ये खबर शिवभक्तों के लिए खुशखबरी की तरह है। लेकिन AIMIM के अध्यक्ष सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने इस पर सवाल खड़े किए हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टैग करते हुए संविधान की प्रस्तावना की फोटो ट्वीट की है। इसके बाद सोशल मीडिया पर कई तरह की प्रतिक्रिया आ रही हैं। कोई प्रधानमंत्री को इस कदम के लिए धन्यवाद दे रहा है। कोई ओवैसी की तरह उन पर सवाल उठा रहा है। कुछ यूजर ऐसे भी हैं जो रेलवे स्टेशन पर बने मस्जिदों की तस्वीर अपलोड कर ओवैसी बता रहे रहे हैं कि अब एकतरफा सेकुलरिज्म काम नहीं करेगा।

गौरतलब है कि इस ट्रेन में शिव का मंदिर होने के अलावा और भी कई खूबियाँ हैं जैसे काशी महाकाल एक्सप्रेस देश की पहली ऐसी ट्रेन है जिसका हर कोच सीसीटीवी कैमरे से लैस है। इसके हर केबिन में 6-6 चार्जिंग प्वॉइंट हैं। यात्रियों को 10 लाख रुपए का बीमा दिया जाएगा।

नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, आईआरसीटीसी के चीफ रीजनल मैनेजर अश्विनी श्रीवास्तव ने बताया है कि काशी महाकाल एक्सप्रेस के हर कोच में छह-छह सीसीटीवी कैमरों के जरिए सुरक्षा की निगरानी की जाएगी। इसके लिए हर कोच में एक कंट्रोल बनाया गया है। आईआरसीटीसी के पास एक महीने से अधिक समय तक वीडियो फुटेज मौजूद रहेंगे।

इसके अलावा इस ट्रेन में यात्रा करने वाले लोगों को 10 लाख रुपए का बीमा मिलेगा, इसका कोई भी प्रीमियम यात्रियों से नहीं लिया जाएगा। चीफ रीजनल मैनेजर के अनुसार टिकट बुकिंग की सुविधा के लिए स्टॉपेज वाले स्टेशनों पर आरक्षण काउंटर भी खोले जाएँगे, जबकि ट्रेन की साइड लोअर बर्थों के दो हिस्सों को एक साइड सपोर्ट से जोड़ा जाएगा। इससे यात्रियों को सफर के दौरान पीठ दर्द की शिकायत नहीं होगी।

प्राप्त जानकारी के अनुसार यह ट्रेन यात्रियों को उज्जैन, ओंकारेश्वर, महेश्वर, इंदौर व भोपाल तक घूमने का मौका देगी। इसके लिए आईआरसीटीसी ने कई पैकेज भी बनाए हैं। इनमें उज्जैन व इंदौर से आने वालों को वाराणसी, काशी, अयोध्या व प्रयागराज घूमने का मौका मिलेगा। जबकि लखनऊ, प्रयागराज व वाराणसी से उज्जैन जाने वालों के लिए दूसरे पैकेज बनाए गए हैं।

खबर के मुताबिक उज्जैन-ओंकारेश्वर जाने वालों को 2 रात तीन दिन के ₹9420 के पैकेज में महाकालेश्वर ज्योर्तिलिंग मंदिर, कालभैरव मंदिर, राममंदिर घाट, हरसिद्धि मंदिर और ओंकारेश्वर ज्योर्तिलिंग के दर्शन करवाए जाएँगे। वहीं, ₹12,450 के 3 रात व 4 दिनों के पैकेज में उज्जैन-ओंकारेश्वर-महेश्वर-इंदौर का भ्रमण करवाया जाएगा। इसमें इंदौर, महेश्वर में होल्कर किला, नर्मदा घाट व शिव मंदिर को भी जोड़ा जाएगा। इसके अलावा ₹14,950 में भोपाल, सांची, भीमवेट, उज्जैन का भ्रमण करवाया जाएगा। यह पैकेज तीन रातों व चार दिनों का होगा।

उज्जैन या इंदौर से आने वाले यात्रियों को ₹6,010 के 1 रात व 2 दिन के पैकेज में वाराणसी के घाट, काशी विश्वनाथ मंदिर, संकटमोचन मंदिर और दशाश्वमेघ घाट पर गंगा आरती के दर्शन करवाए जाएँगे। मगर, ₹10,050 प्रति यात्री के हिसाब से 2 रात, 3 दिनों के पैकेज में वाराणसी के घाट, काशी विश्वनाथ मंदिर, संकट मोचन मंदिर और दशाश्वमेघ घाट पर गंगा आरती, सारनाथ, प्रयाग में संगम व हनुमान जी के दर्शन करवाए जाएँगे। इनके अलावा उज्जैन व इंदौर से आने वालों को ₹14,770 में 3 रात, 4 दिन के पैकेज में वाराणसी के घाट, काशी विश्वनाथ मंदिर, संकट मोचन मंदिर और दशाश्वमेघ घाट पर गंगा आरती, सारनाथ, अयोध्या में श्रीराम मंदिर, हनुमानगढ़ी, शृंगवेरपुर के साथ ही प्रयाग में संगम व हनुमान जी के दर्शन करवाए जाएँगे।

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सेना में पुरुषों की तरह महिलाओं के लिए भी स्‍थायी कमीशन: SC ने 3 महीने में गठन का आदेश दिया

सेना में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने भी सोमवार (फरवरी 17, 2020) को मुहर लगा दी। साथ ही कोर्ट ने इसके लिए समय भी निश्‍चित कर दिया है। कोर्ट ने केंद्र को निर्देश दिया है कि तीन माह के भीतर महिलाओं के लिए सेना में स्‍थायी कमीशन का गठन किया जाए। कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले के बाद महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देना चाहिए था। महिलाओं के साथ भेदभाव नहीं कर सकते।

बता दें कि केन्द्र सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट के मार्च 2010 के उस फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती दी थी, जिसमें सेना को सभी महिला अफसरों को स्थायी कमीशन देने का आदेश दिया गया था। हाई कोर्ट ने कहा था कि शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत सेना में आने वाली महिलाओं को सेवा में 14 साल पूरे करने पर पुरुषों की तरह स्थायी कमीशन दिया जाए। रक्षा मंत्रालय ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।

इस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि सामाजिक और मानसिक कारण बताकर महिला अधिकारियों के इस अवसर से वंचित करना न सिर्फ भेदभावपूर्ण है, बल्कि यह अस्वीकार्य भी है। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, “महिलाओं को लेकर मानसिकता बदलनी चाहिए और सेना में सच्‍ची समानता लानी होगी। पुरुषों के साथ महिलाएँ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं।”

केंद्र का तर्क था कि सेना में ‘कमांड पोस्ट’ की जिम्‍मेवारी महिलाओं को नहीं दी जा सकती, क्‍योंकि उनकी शारीरिक क्षमता इसके लायक नहीं और उनपर घरेलू जिम्‍मेदारियाँ भी होती हैं। इन कारणों के साथ केंद्र ने कहा था कि इस पद की चुनौतियों का सामना महिलाएँ नहीं कर सकेंगी। इस पर कोर्ट ने कहा कि कमांड पोस्‍ट पर महिलाओं को आने से रोकना समानता के विरुद्ध है।

कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए कैप्टन तान्या शेरगिल, कैप्टन मधुमिता और अन्य महिला सैन्य अधिकारियों का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि महिला अधिकारी भी स्थायी कमीशन की अधिकारी हैं। महिला सेना अधिकारियों ने देश का गौरव बढ़ाया है। भारतीय सेना की लेफ्टिनेंट कर्नल सीमा सिंह ने खुशी जताते हुए कहा, “यह एक प्रगतिशील और ऐतिहासिक फैसला है। महिलाओं को समान अवसर दिए जाने चाहिए।”

हाथों में पत्थर लिए जामिया PhD छात्र ने कटाए बाल, दाढ़ी, डिलीट किए अकाउंट: सोशल मीडिया पर वायरल

जामिया यूनिवर्सिटी चर्चा में है। पढ़ाई नहीं पत्थरबाजी को लेकर। मारपीट और आगजनी को लेकर। CCTV फुटेज पुलिस-प्रशासन को देने के बजाय खुद के पास रखने को लेकर। एक घंटा के विडियो होने का दावा करके मात्र 5 मिनट के एडिटेड विडियो को वायरल करने को लेकर। और सबसे ज्यादा चर्चा में इसलिए है क्योंकि यहाँ के PhD वाले स्टूडेंट भी रिसर्च से ज्यादा पत्थर पर ध्यान लगाते हैं।

बीते साल 15 दिसंबर को दिल्ली के जामिया में हिंसा हुई। हिंसा नागरिकता संशोधन कानून (CAA) की विरोध की आड़ में की गई। सारा दोष दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार पर मढ़ा गया। लेकिन 16 फरवरी को इसी जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी हिंसा कांड से जुड़े कुछ विडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुए। पहले कुछ सेकंड वाले, बाद में कुछ मिनट वाले विडियो भी आए। सभी विडियो में पत्थरबाज जामिया स्टूडेंट्स की कलई खुलती नजर आई।

इन विडियो में एक चेहरा पहचान लिया गया (सूत्रों के अनुसार, जो इस चेहरे को व्यक्तिगत तौर पर जानते हैं, उनके अनुसार)। जिस शख्स का चेहरा वायरल हुआ है, उसका नाम मो. अशरफ भट बताया जा रहा है। यह जामिया में PhD का स्टूटेंड है और प्रोफेसर कडलूर सावित्री के गाइडेंस में “Biometrics in India Aadhar: Governmentality , Surveillance and privacy” पेपर पर रिसर्च कर रहा है।

जामिया के छात्रों के अनुसार मो. अशरफ का कल से पहले तक फेसबुक व अन्य सोशल मीडिया पर प्रोफाइल था। लेकिन हिंसा वाले दिन का विडियो वायरल होने और तस्वीरें बाहर आते ही न सिर्फ इसने सारे प्रोफाइल डिलीट/डीएक्टिवेट कर दिए, बल्कि सूत्र बताते हैं कि उसने अपने बाल और दाढ़ी भी कटवा ली है। सूत्र की बात को स्पष्ट करने के लिए हमने प्रोफेसर कडलूर सावित्री को मेल भी किया है, जिसका जवाब रिपोर्ट लिखे जाने तक नहीं आया है।

मो. अशरफ कितना शातिर है, इसका अंदाजा ऐसे लगाया जा सकता है। हमने जामिया के सूत्र की बात को स्पष्ट करने के लिए कई तरह से इसके नाम को गूगल पर सर्च किया। नाम के साथ जामिया, PhD, सब्जेक्ट से लेकर और भी कई की-वर्ड का यूज किया, लेकिन नतीजा हर बार नील बटे सन्नाटा। फिर हमने नाम के साथ इमेज सर्च और इमेज से इमेज सर्च भी किया – नतीजा फिर वही! यह शख्स ने अपने हर सोशल मीडिया प्रोफाइल को डिलीट कर अंडरग्राउंड हो चुका है।

सोशल मीडिया में कुछ जगहों पर यह भी चल रहा है कि जिस लड़के के हाथ में एयरगन वाली गोली कुछ दिन पहले एक शख्स ने मारी थी, मो. अशरफ वही है। ऐसा इसलिए क्योंकि दोनों की दाढ़ी है, लंबे बाल हैं। लेकिन यह केवल अफवाह है। दोनों अलग-अलग शख्स हैं।

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‘कॉन्ग्रेस छोड़ना है तो छोड़ दो, फिर उल्टा-पुलटा बोलो’ – केजरीवाल की तारीफ पर भिड़े दो सीनियर कॉन्ग्रेसी नेता

दिल्ली में आम आदमी पार्टी (AAP) ने एक बार फिर से सरकार बना ली है। अरविंद केजरीवाल ने रविवार (फरवरी 16, 2020) को तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। हालाँकि दिल्ली चुनाव में AAP की इस ऐतिहासिक जीत से कॉन्ग्रेस में काफी हलचल मची हुई है। पार्टी के कुछ नेता जहाँ केजरीवाल को बधाई दे रहे हैं, तो वहीं कुछ नेता आपस में ही उलझते दिख रहे हैं। 

इसी कड़ी में महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के नेता मिलिंद देवड़ा ने देर रात ट्वीट कर अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की तारीफ की, जिसके बाद अजय माकन ने उन्हें जवाब देते हुए कहा कि अगर आपको पार्टी छोड़नी है, तो बेशक छोड़ सकते हैं।

कॉन्ग्रेस नेता मिलिंद देवड़ा ने रविवार देर रात को एक ट्वीट किया। जिसमें उन्होंने दिल्ली सरकार के द्वारा रेवेन्यू के मोर्चे पर काम की तारीफ की। उन्होंने ट्विटर पर एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “एक ऐसी जानकारी साझा कर रहा हूँ जो कि बहुत कम लोग जानते हैं और यह स्वागत करने योग्य भी है। केजरीवाल सरकार ने पिछले पाँच साल में रेवेन्यू को डबल कर दिया है और अब ये 60 हजार करोड़ रुपए तक पहुँच गई है। दिल्ली अब भारत का सबसे आर्थिक रूप से सक्षम राज्य बन गया है।”

अजय माकन ने मिलिंद देवड़ा को जवाब देते हुए दिल्‍ली में कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी की सरकार के दौर के तुलनात्‍मक आँकड़े पेश किए। उन्‍होंने ट्विटर पर लिखा, “भाई, यदि आप कॉन्ग्रेस छोड़ना चाहते हैं तो कृपया छोड़ दें। उसके बाद इस तरह के कच्‍चे-पक्‍के, आधे-अधूरे तथ्‍यों का आराम से फैलाइए। चलिए मैं तथ्य पेश करता हूँ, जिसके बारे में काफी कम लोगों को पता है। 1997-98 (रेवेन्यू) 4,073 करोड़, 2013-14 (रेवेन्यू) 37,459 करोड़। कॉन्ग्रेस के शासन के दौरान 14.87% राजस्‍व में बढ़ोतरी हुई। 2015-2016 (रेवेन्यू) 41,129, वहीं 2019-20 (रेवेन्यू) 60,000। AAP सरकार के दौरान 9.90% रेवेन्यू बढ़ा।”

अजय माकन के ट्वीट पर पलटवार करते हुए मिलिंद देवड़ा ने उनके राजनीतिक मंशे पर ही सवाल खड़े कर दिए। मिलिंद ने कहा, “अगर आपने AAP के संग गंठबंधन की वकालत के बजाय शीला दीक्षित (जिनके कामों पर आपने हमेशा निशाना साधा) के कामों को जनता के बीच ले जाते तो आज हम सत्ता में होते।”

वहीं पहली बार चुनाव लड़ने वाली युवा कॉन्ग्रेस नेता राधिका खेड़ा ने भी मिलिंद देवड़ा के ट्वीट पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि वो पहली बार पार्टी की उम्मीदवार बनकर मैदान में उतरीं और उन्हें अपने वरिष्ठ नेताओं के इस रवैये काफी दुख हुआ कि वो अपनी पार्टी को बेहतर करने के लिए प्रोतत्साहित करने की बजाए AAP की शाबाशी देने में व्यस्त हैं! दिल्ली में यह सरप्लस 1994 से चलता आ रहा है। 2011 में शीला दीक्षित के समय में यह चरम पर पहुँचा।

गौरतलब है कि इससे पहले पी चिदंबरम और अधीर रंजन चौधरी जैसे वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता भी AAP की जीत पर खुशी जता चुके हैं। चौधरी कहा था कि बीजेपी और उसके सांप्रदायिक मुद्दों के खिलाफ AAP की जीत महत्वपूर्ण है। नतीजे आने से पहले अधीर रंजन चौधरी ने कहा था कि अगर इस चुनाव में केजरीवाल जीतते हैं तो ये विकास के मुद्दों की जीत होगी। वहीं चिदंबरम की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेताओं को आड़े हाथों लेते हुए कई सवाल उठाए थे।

बता दें कि दिल्ली विधानसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है। साल 2015 की तरह इस बार भी कॉन्ग्रेस दिल्ली में एक भी सीट हालिस नहीं कर सकी है। वहीं इस बार कॉन्ग्रेस का वोट प्रतिशत भी घटा है।

…उस मुगल ‘बादशाह’ की कब्र खोजेगा ASI, जिसने किया था गीता और 52 उपनिषदों का अनुवाद

इतिहास के पन्नों में कई राज दफन हैं। इनमें कुछ मौखिक तो कुछ लिखित हैं, जिन्हें बाद में शब्दों की शक्ल दी गई। अब इन्हीं शब्दों की परतों को खोलने का कार्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) करने जा रहा है, जिसमें उन्हें हुमायूँ मकबरे के भीतर दाराशिकोह की कब्र को खोजने का उत्तरदायित्व दिया गया है।

लिखित इतिहास के अनुसार दाराशिकोह की कब्र हुमायूँ मकबरे के भीतर है। ASI के सामने सबसे बड़ी परेशानी यहाँ दाराशिकोह की कब्र को खोजने की है क्योंकि अधिकतर कब्रों पर नाम नहीं लिखे हुए हैं। हुमायूँ मकबरे के पूरे परिसर में करीब 140 कब्रें हैं, जिनमें कुछ कब्रों पर नाम है तो ज्यादातर कब्र बेनाम हैं।

संस्कृति व पर्यटन मंत्रालय के आदेश पर ASI द्वारा 7 सदस्यीय टीम गठित की गई है, जो 3 महीने के भीतर दाराशिकोह की कब्र को ढूँढकर अपनी रिपोर्ट पेश करेगी। इस टीम का नेतृत्व टीजे अलोन करेंगे, जो ASI में स्मारक निदेशक हैं। इस टीम में वरिष्ठ पुरातत्वविद् आरएस बिष्ट, सईद जमाल हसन, केएन दीक्षित, बीआर मणि, केके मुहम्मद, सतीश चंद्र और बीएम पांडे शामिल हैं। इसके लिए तीन महीने का समय दिया गया है।

वहीं इस बारे में पूछे जाने पर संस्कृति व पर्यटन मंत्री प्रह्लाद पटेल ने कहा, “निष्कर्षों तक पहुँचने के लिए तीन महीने के समय को बढ़ाया भी जा सकता है। क्योंकि इसे ढूँढने में उस समय की वास्तुकला से लेकर लिखित इतिहास व अन्य जानकारियों को ध्यान में रखना होगा। पैनल उस समय के लिखित इतिहास, साक्ष्य या फिर कोई अन्य जानकारी, जिसे सबूत के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है, का उपयोग करके निष्कर्ष पर पहुँचेगा।”

बता दें कि दाराशिकोह, शाहजहाँ व मुमताज के बड़े बेटे एवं औरंगजेब के बड़े भाई थे। कई भाषाओं के विद्वान दाराशिकोह को मारकर 1659 में औरंगजेब गद्दी पर बैठा था। दारा शिकोह को एक “उदार मुस्लिम” के रूप में जाना जाता है, जिन्होंने हिंदू और इस्लामी परंपराओं के बीच समानताएँ खोजने की कोशिश की। उन्होंने भागवत गीता के साथ-साथ 52 उपनिषदों का अनुवाद फारसी में किया था।

पैनल में शामिल पुरातत्वविदों में से एक, केके मुहम्मद ने दारा शिकोह को उस समय के सबसे महान मुक्त विचारकों में से एक बताया। उन्होंने कहा कि दारा शिकोह ने उपनिषदों के महत्व को समझा और उसका अनुवाद किया। उपनिषद उस समय केवल कुछ उच्च जाति के हिंदुओं के लिए जाना जाता था। दारा शिकोह के उस फारसी अनुवाद ने आज के बहुत से मुक्त विचारकों को प्रेरित किया, जिसमें संयुक्त राज्य अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा भी शामिल हैं।

वहीं कुछ इतिहासकारों का कहना है कि अगर औरंगजेब की जगह दारा शिकोह मुगल सिंहासन पर बैठता तो इससे सांप्रदायिक हिंसा में खोए हजारों लोगों की जान बच सकती थी। अविक चंदा अपनी किताब- ‘दारा शिकोह, द मैन हू वुड बी किंग’ में लिखते हैं, “दारा शुकोह औरंगज़ेब का धुर विरोधी था। वह काफी सामंजस्यवादी, गर्मजोशी और उदार था, लेकिन इसके साथ ही वह लड़ाई के क्षेत्र में एक उदासीन प्रशासक होने के साथ ही अप्रभावी भी था।”

बता दें कि हाल ही में दिल्ली के एक सम्मेलन में वक्ताओं ने दारा शिकोह को ‘असली हिंदुस्तानी’ कहा था। इसमें RSS के पदाधिकारी भी शामिल थे। पिछले साल अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में दारा शिकोह के नाम पर एक रिसर्च चेयर स्थापित की गई।

दिल्ली विश्वविद्यालय में मध्ययुगीन इतिहास के प्रोफेसर सुनील कुमार ने दारा शिकोह के कब्र की खोज पर सवाल उठाते हुए कहा, “जब भी आप आधुनिक राजनीतिक उद्देश्यों के लिए अतीत का उपयोग करते हैं, तो आप हमेशा इसे ट्विस्ट कर देंगे क्योंकि अतीत आधुनिकता में उपयुक्त नहीं बैठ सकता। आप इसे अपने वर्तमान इरादों के लिए इसमें जोड़-तोड़ करते हैं। अगर औरंगजेब की जगह वह शहंशाह होता, तो क्या अलग भारत होता? ये धारणाएँ मुगल इतिहास की मिसप्लेस्ड अंडरस्टैंडिंग की वजह से आ रही हैं। उन्हें एक अच्छा मुस्लिम बनाया गया है लेकिन उनकी कब्र की खोज क्यों हो रही है?”

शाहजहाँनामा के अनुसार, औरंगजेब ने दारा शिकोह को पराजित करने के बाद, उन्हें जंजीरों में बाँधकर दिल्ली लाया गया था। उनका सिर काट दिया गया और आगरा किले में भेज दिया गया, जबकि उनके धड़ को हुमायूँ के मकबरे के परिसर में दफना दिया गया।

केके मुहम्मद ने कहा, “कोई नहीं जानता कि वास्तव में दारा शिकोह को कहाँ दफनाया गया था। हम सभी जानते हैं कि यह हुमायूँ के मकबरे के परिसर में एक छोटी सी कब्र है। अधिकांश लोग वहाँ एक विशेष छोटी सी कब्र की ओर इशारा करते हैं। इटालियन यात्री निकोलो मनुची ने ट्रेवल्स ऑफ मनुसी में उस दिन का एक ग्राफिक विवरण दिया है, जो कि इसके प्रत्यक्षदर्शी हैं। यही इस थेसिस का आधार है।”

पैनल के सदस्य बीआर मणि ने कहा, “परिसर में मौजूद कब्रों में से एक पारंपरिक रूप से दारा शिकोह का कहा जाता है। यह हुमायूँ के मकबरे परिसर के पश्चिमी तरफ स्थित है। हम इस बारे में पीढ़ियों से क्षेत्र में रहने वाले लोगों के साथ-साथ वरिष्ठ ASI अधिकारियों से सुनते आ रहे हैं, लेकिन फिर भी कोई सबूत नहीं है।”

AMU के प्रोफेसर शिरीन मूसवी ने कहा, “1857 तक परिवार के सभी सदस्यों को उसी परिसर में दफनाया गया था। इतिहासकार जदुनाथ सरकार, सभी अधिकारियों के साथ-साथ यूरोपियन और फारसी भी इसी तरफ इशारा करते हैं कि दारा शिकोह को हुमायूँ के मकबरे में दफन किया गया था।”

ASI की सबसे बड़ी समस्या यह है कि परिसर की अधिकांश कब्रों का कोई नाम नहीं है। ASI के एक पूर्व निदेशक और पैनल के सदस्य हसन ने कहा, “शाहजहाँनामा में मुहम्मद सालेह कम्बोह ने दारा शिकोह के अंतिम दिनों के बारे में कम से कम दो पेजों में लिखा है कि कैसे उनकी बेरहमी से हत्या की गई थी और फिर परिसर में कहीं दफना दिया गया था।”

केके मुहम्मद ने कहा कि निश्चितता के साथ तो नहीं कहा जा सकता है, मगर संभावना जरूर है। वहीं प्रोफेसर मूसवी को डर है कि कहीं यह खोज कभी खत्म न होने वाला न हो जाए, क्योंकि किसी ने भी कब्र की जगह का उल्लेख नहीं किया है। वहाँ पर कोई भी कब्र चिह्नित या अंकित नहीं है। दारा शिकोह की कब्र को पहचानने का कोई तरीका नहीं है।

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’20 सीटों पर बढ़त के बाद BJP नेता कहने लगे – ऐसा कैसे हो गया? वो चाहते थे कि पार्टी दिल्ली चुनाव हारे’

राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने रविवार (फरवरी 16, 2020) को देश की अर्थव्यव्स्था और दिल्ली चुनाव का मुद्दा उठाकर भाजपा पर निशाना साधा। प्रदेश की राजधानी जयपुर में आरक्षण मामले पर केंद्र सरकार के रुख के खिलाफ आयोजित प्रदर्शन में बोलते हुए सीएम गहलोत ने मोदी सरकार की वित्त संबंधी समझ पर सवाल उठाए और उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा लाई गई नीतियों को अपनाने की सलाह दी। इसके अलावा अशोक गहलोत ने इस आयोजन में राष्ट्रवाद और आरक्षण के ख़िलाफ सरकार को घेरा। साथ ही दिल्ली चुनावों के मद्देनजर भाजपा नेताओं पर आरोप लगाया कि वे लोग खुद नहीं चाहते थे कि उनकी पार्टी जीते।

अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार पर हमला बोलते हुए कहा, “आज देश में आर्थिक संकट है। उनके (मोदी सरकार के) वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति ने कहा है कि सरकार आर्थिक स्थिति को नहीं समझती। इसलिए अब उन्हें मनमोहन सिंह की नीतियों का अनुसरण करना चाहिए, जिसे वे (डॉ मनमोहन सिंह) नरसिम्हा राव के समय में अर्थव्यव्स्था बचाने के लिए लाए थे।” प्रदेश मुख्यमंत्री के अनुसार भाजपा की विश्वसनीयता नहीं है और वे अपनी विश्वसनीयता सिर्फ़ नरेंद्र मोदी और अमित शाह के केंद्र में होने के कारण खो रहे हैं।

कॉन्ग्रेस नेता गहलोत ने इस आयोजन में राष्ट्रवाद का मुद्दा उठाते हुए भाजपा के राष्ट्रवाद को छद्म-राष्ट्रवाद करार दिया और कहा कि हम असली राष्ट्रवादी हैं। उन्होंने कहा आरक्षण को लेकर खतरनाक खेल चल रहा है। भाजपा के सांसदों और संघ नेताओं की ओर से जिस प्रकार के बयान आ रहे हैं, इनका कोई भरोसा नहीं है कि कब ये आरक्षण को खत्म करने की घोषणा कर दें। उन्होंने आरक्षण के दायरे में आने वाले एससी, एसटी, ओबीसी से एकजुट होने का आह्वान किया और कहा कि आरक्षण की रक्षा के लिए यह जरूरी है। इससे भविष्य में आरक्षण को खत्म करने की किसी में हिम्मत नहीं होगी।

दिल्ली चुनावों में अपना खाता तक न खोल पाने वाली पार्टी के वरिष्ठ नेता ने इस आयोजन में दिल्ली चुनाव के परिणाम में भाजपा को मिली हार पर भी बयान दिया। उन्होंने कहा कि भाजपा के नेता ही दिल्ली के चुनाव में पार्टी की दुर्गति चाहते थे। उन्हीं के नेता चाहते थे कि भाजपा को अच्छे नतीजे न मिलें। मुख्यमंत्री गहलोत के मुताबिक भाजपा के नेता मन ही मन कह रहे थे कि इन्हें कोई सबक मिलना चाहिए।

दिल्ली में भाजपा की हार पर तंज कसते हुए गहलोत ने इस दौरान कहा कि सुबह जब भाजपा के 20 सीटों पर बढ़त के रुझान आए, तो भाजपा के नेता ही यह चर्चा करने लगे कि ऐसा कैसे हो गया। भाजपा को तो 10 सीटों के अंदर होना चाहिए था।