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कॉन्ग्रेस ने सर्जिकल स्ट्राइक पर फिर उठाए सवाल, MP के CM कमलनाथ ने पूछा- कब और कहाँ की स्ट्राइक?

सीमा पार सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर स्ट्राइक पर सवाल उठाने वाली कॉन्ग्रेस ने अरसे बाद फिर से इस पर मुॅंह खोला है। अबकी बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इसके सबूत मॉंगे हैं। 2016 के सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठाते हुए उन्होंने पूछा है कि यह कब और कहॉं हुई? बकौल कमलनाथ, सर्जिकल स्ट्राइक वह होता है, जो पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गॉंधी ने 1971 में किया था।

उन्होंने ये बातें अपने निर्वाचन क्षेत्र छिंदवाड़ा में एक सभा को संबोधित करते हुए कही। सीएम कमलनाथ ने कहा कि देश की जनता जानना चाहती है कि सर्जिकल स्ट्राइक कब हुआ? कहॉं हुआ? इसका क्या परिणाम हुआ? सिर्फ मुॅंह से कह देने भर से काम नहीं चलेगा।

उन्होंने कहा, “जब इंदिरा गाँधी की सरकार थी तब 90 हजार पाकिस्तानी जवानों ने सरेंडर किया था। याद है ये सब बातें?” इसके बाद केंद्र की मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, “पाकिस्तानी जवानों के सरेंडर करने की बात ये नहीं करेंगे। कहते हैं, मैंने सर्जिकल स्ट्राइक की, कौन सी सर्जिकल स्ट्राइक की? देश को कुछ तो बताइए सर्जिकल स्ट्राइक के बारे में।”

कमलनाथ ने कहा कि केंद्र सरकार रोजगार और किसानों की स्थिति में सुधार की बात नहीं करती। उन्होंने कहा, “मैं आप से पूछना चाहता हूँ कि क्या आपने मोदी जी को पिछले छह से आठ महीने में युवाओं के बारे में बात करते हुए देखा है? क्या आपने पीएम मोदी को किसानों के बारे बात करते हुए सुना है।”

ज्ञात हो कि जिस सर्जिकल स्ट्राइक के प्रमाण की बात कमलनाथ कर रहे हैं वह उरी हमले के बाद भारतीय सेना ने की थी। राजीव गाँधी के बेहद करीबी रहे कॉन्ग्रेस नेता सैम पित्रोदा ने भी इस पर सवाल उठाए थे। कॉन्ग्रेस नेताओं के अलावा अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी जैसे नेताओं ने भी इस पर संदेह जताते हुए मोदी सरकार से सबूत माँगे थे। बीते साल लोकसभा चुनावों के दौरान बालाकोट एयरस्ट्राइक को लेकर भी विपक्ष ने सवाल उठाए थे। हालॉंकि इससे राजनीतिक फायदा नहीं मिलने के बाद विपक्षियों नेताओं ने इस मसले को ठंडे बस्ते में डाल दिया था। लेकिन, वादाखिलाफी और पार्टी के भीतर विरोध से जूझ रहे कमलनाथ ने इसे एक बार फिर हवा देने की कोशिश की है।

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9वीं सदी के चोल राजाओं से IAS अधिकारी ने ली प्रेरणा, 2020 में बदल दी पानी को तरस रहे एक जिले की सूरत

हर साल देश के कई राज्य सूखे की चपेट में आते हैं। जलस्तर लगातार नीचे गिरता चला जा रहा है। इसके पीछे के कारण नए नहीं हैं। जल संचयन के परंपरागत तरीकों से दूरी इसका एक प्रमुख कारण है। लेकिन, अब एक बार फिर सरकारें उन्हीं परंपराओं की ओर लौटने को मजबूर हैं, जिन्हें विकास के नाम पर पीछे धकेल दिया गया था।

केंद्र शासित प्रदेश पुदुचेरी के कराईकल ज़िले को पिछले साल बारिश की कमी और कावेरी नदी से पानी की आपूर्ति न मिलने के कारण सूखाग्रस्त घोषित कर दिया गया था। सूखे के कारण यहाँ के लोग बेहद निराश थे। जिले में सूखे से परेशान किसान अपनी जमीन का केवल पाँचवां हिस्सा ही खेती के लिए प्रयोग करते थे। एक बाल्टी पानी के लिए मीलों पैदल चलना पड़ता था। अत्यधिक दोहन के कारण भू जलस्तर 200 से 300 फीट नीचे चला गया था।

हालात कुछ ऐसे थे कि लोग गाँव छोड़कर दूर शहरों में जाने लगे। जो लोग गाँव में रह गए वह बद से बदतर ज़िंदगी जीने को मजबूर थे। ऐसे समय में विक्रांत राजा जिलाधिकारी बन कराईकल आते हैं। सूखे की मार झेल रहे लोगों की समस्याओं को दूर करना राजा की असली परीक्षा थी। राजा ने बिना देरी किए लोगों की प्यास बुझाने की एक योजना बनाई।

29 वर्षीय विक्रांत राजा ने द बेटर इंडिया से बातचीत में कहा, “तमिलनाडु का मूल निवासी होने के नाते, मैंने
कराईकल जैसी जगहों के बारे में पर्याप्त किस्से सुने थे। मुझे अपनी कृषि गतिविधियों के लिए ‘द राइस बाउल’ कहकर बुलाया जाता था। मॉनसून और कावेरी नदी पर निर्भरता के कारण सूखे ने कराईकल की कमर तोड़ दी थी। इसके बाद प्रदूषित जल निकायों और अतिक्रमणों की समस्या पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता थी।”

योजना के मुताबिक राजा ने ‘नाम नीर ‘(हमारा जल) नाम से एक परियोजना की शुरुआत की। योजना को नाम के अनुरूप स्थानीय लोगों, शैक्षणिक संस्थानों, मंदिर अधिकारियों, कॉरपोरेट्स और सरकारी अधिकारियों के सामूहिक प्रयासों से लागू किया गया। विक्रांत राजा उपदेश की बजाय जमीनी कार्य पर यकीन करते हैं। तालाब पुनरुद्धार के लिए सरकारी अधिकारियों को सामाजिक जिम्मेदारी सौंपी गई। राजा और उनकी टीम ने इसकी शुरूआत कराईकल के प्रसिद्ध मंदिर, थिरुनलारु से जुड़े तालाब से की। शुरुआत भी कुछ ऐसे कि तीन हफ्तों से भी कम समय में उनके पास एक तालाब था। जैसा वह चाहते थे।

राजा बताते है कि पहली सफलता के बाद हम लोक निर्माण और आम जनता जैसे अन्य विभागों के अधिकारियों का ध्यान अपनी कार्यों की ओर आकर्षित करने में कामयाब रहे। यह सब तब और तेज हुआ कि जब सरकारी अधिकारियों द्वारा करीब 35 तालाबों को पूरी तरह से व्यवस्थित कर दिया गया। इसके बाद तो राजा ने एक महीने के लिए ज़िले में जागरूकता अभियान चलाया। राजा ने इस अभियान से जुड़ने के लिए लोगों को स्वयंसेवक बनाने का अनुरोध किया।

वहीं सरकारी तंत्र से भी अभियान को कुछ इस तरह से मदद की गई कि मनरेगा योजना के तहत प्रत्येक गाँव को एक तालाब को पुनर्जीवित करने के लिए कहा गया। यह इतना सफल रहा कि इस अभियान से 85 तालाब का
पुनरुद्धार हुआ। अधिकांश तालाब मंदिरों के किनारे होते हैं तो उनके अधिकारियों से उसकी सफाई कराने को कहा गया। इससे करीब 30 तालाबों का पुनरुद्धार हुआ। इसके लिए मंदिर समितियों ने अपने स्तर पर मंदिर के धन का प्रयोग किया।

इसके अलावा, कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) के जरिए 20 तालाबों को प्रमुख नहर से जोड़ा गया। इससे कावेरी नदी से कृषि क्षेत्रों तक पानी का प्रवाह सुलभ हुआ। सबसे अच्छी बात यह कि ज्यादातर मामलों में लोगों और संगठनों ने पैसा न देकर मुफ्त सेवाओं या सामग्री की पेशकश की। इस अभियान को लोगों तक पहुँचाने के लिए प्रशासन की ओर से एक अपील की गई। इसमें कहा गया कि लोग अपने पसंदीदा अभिनेताओं या परिवार या दोस्तों के जन्मदिन के अवसर पर तालाब की सफाई करें। इस अभियान से छात्र बड़ी संख्या में जुड़े और यह बेहद सफल रहा। कुल मिलाकर इस अभियान के तहत 450 प्रदूषित क्षेत्रों और पूरी तरह से सूख चुके 178 जल स्रोतों को तीन माह के अंदर पुनर्जीवित कर दिया गया।

इतनी ही नहींं इसके बाद जल केंद्रों से जुड़े क्षेत्रों का सौन्दर्यीकरण करने के लिए सभी लोगों ने करीब 25,000 पौधे लगाए। इस अभियान का असर कुछ इस तरह हुआ कि पोवम नामक एक छोटे से गाँव में किसानों ने 15 साल बाद कृषि कार्य फिर से शुरू कर दिया।

विक्रांत राजा को यह सब करने की प्रेरणा 9वीं शताब्दी के चोल राजवंश से मिली। बकौल राजा, उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि स्कूल के समय इतिहास के जिस हिस्से ने उन्हें बेहद प्रभावित किया था उसे जिलाधिकारी के तौर पर अमल में लाने का मौका मिलेगा।

आपको बता दें कि एक समय था जब चोल वंश के तहत 400 से अधिक जलाशयों के साथ कराईकल जिला फलता-फूलता था। बाढ़ प्रबंधन के कारण कावेरी के पानी को कृषि क्षेत्रों में बहने से रोक दिया गया था। इसके चलते चोल शासकों के अधीन इंजीनियरों ने वर्षा जल को संरक्षित करने वाले चैनलों और बंडों का एक नेटवर्क बनाया, जिसके माध्यम से प्रचुर मात्रा में उपयोग के लिए पानी सुनिश्चित किया गया।

डिप्टी कलेक्टर (आपदा प्रबंधन) एस. भास्करण बताते हैं कि जब लोग तालाब पर निर्भर थे, तो उन्होंने इसकी देखभाल की। जब कुएँ पर आए, तो वे तालाबों को भूल गए। जब हैंडपंप आया तो कुएँ उपेक्षित हो गए। जब पाइप से पानी की आपूर्ति शुरू हुई तो हैंड पंपों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया। जिले में लगातार भूजल स्तर का गिरना जल स्त्रोतों की उपेक्षा का ही परिणाम है।

इस सफल अभियान पर डिप्टी कलेक्टर (राजस्व) एस प्रवेश कहते हैं कि पर्यावरण की रक्षा करने के लिए सार्वजनिक भागीदारी सबसे बड़ी कुंजी है। हमें ग्रामीणों को यह समझाने की आवश्यकता है कि ये संसाधन उनके अपने हैं। ‘नाम नीर’ ने लोगों को यह संदेश देने में पूरी सफलता प्राप्त की। केंद्रीय भूजल बोर्ड (सीजीडब्ल्यूबी) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए विक्रांत राजा ने बताया कि 2018-2019 के बीच कराईकल के भूजल स्तर में 10 फीट की वृद्धि हुई है।

करीब तीन साल तक इस जिले को देने के बाद बीत दिनों राजा को मुख्यमंत्री वी नारायणसामी के सचिव के रूप में तैनाती मिली है। उनकी शुरू की गई परियोजना का दूसरा चरण इस साल मॉनसून के बाद शुरू होगा।

जहाँ बनने जा रही है हनुमान जी की सबसे ऊँची प्रतिमा, वहाँ की Exclusive ग्राउंड रिपोर्ट

कर्नाटक में स्थित हम्पी अपने ऐतिहासिक साक्ष्यों के लिए प्रसिद्ध है। इस जगह की सबसे ख़ास बात यह है कि एक ओर जहाँ इस जगह के साथ भारतीय मध्यकालीन इतिहास की गवाही देती स्थापत्य कला के खंडहर मौजूद हैं, वहीं यह हिन्दुओं के पवित्र ग्रंथ रामायण की घटनाओं के साथ भी अद्भुत सम्बन्ध जोड़ती हुई नजर आती है।

कहा जाता है कि हम्पी ही वो जगह है, जहाँ त्रेतायुग में माँ सीता की खोज के दौरान भगवान श्री राम की मुलाकात किष्किंधा पर्वत पर पहली बार अपने परम भक्त हनुमान जी से हुई थी। कहा जाता है कि यहीं स्थित अंजनाद्री पर्वत पर हनुमान जी की माता अंजनी निवास करतीं थीं।

कर्नाटक के हम्पी में ‘हनुमान जन्मभूमि ट्रस्ट’ ने ही इसी जगह पर हनुमान जी की विश्व की सबसे विशालकाय प्रतिमा का निर्माण करने का फैसला किया है। यह प्रतिमा हनुमान जी के जन्मस्थान किष्किंधा में बनाई जाएगी और इसकी ऊँचाई 215 फीट होगी। यह हनुमान की दुनिया की सबसे ऊँची प्रतिमा होगी। ज्ञात हो कि यह न्यास अयोध्या में श्री रामजन्मभूमि पर राम मंदिर निर्माण के लिए गठित ‘श्री राम जन्मभूमि ट्रस्ट’ के नक्शे-कदम पर चल रहा है।

उच्चतम न्यायलय के निर्णय के बाद फरवरी 5, 2020 को ही राम जन्मभूमि ट्रस्ट के गठन के साथ ही ठीक उसी दिन कर्नाटक हनुमान जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट का भी गठन किया गया था। इस ट्रस्ट का उद्देश्य हम्पी में किष्किंधा का समग्र विकास करना है। इस ट्रस्ट के अध्यक्ष गोविंदानंद सरस्वती स्वामी हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हनुमान जन्मभूमि ट्रस्ट के सूत्रों ने कहा कि हम्पी, जो पहले से ही एक पर्यटन केंद्र है अब उसे एक तीर्थस्थल में बदला जाएगा। ट्रस्ट ने कहा- “राम मंदिर के निर्माण के बाद यह अयोध्या की भव्यता के बराबर होगा। अयोध्या में राम की 225 फीट ऊँची प्रतिमा बनाई जा रही है और हमने हनुमान की भी सबसे ऊँची प्रतिमा लगाने का फैसला किया है क्योंकि राम और हनुमान अविभाज्य थे। हालाँकि हनुमान जी की यह प्रतिमा श्री राम की प्रतिमा से 10 फीट छोटी होगी और इसे ताँबे से बनाया जाएगा।

प्राचीन ऐतिहासिक विजयनगर साम्राज्य के लिए मशहूर है हम्पी

हम्पी, दक्षिणी भारत के एक पुराने शहर विजयनगर में स्थित एक छोटा सा गाँव है। वर्ष 1336 से 1565 तक, यह मध्यकालीन हिन्दू राज्य विजयनगर साम्राज्य की राजधानी था। उस समय, विजयनगर साम्राज्य दक्षिणी भारत के ज़्यादातर हिस्सों पर राज करता था और इस्लाम के लिए चुनौती बनकर उभरा था। वर्ष 1565 में, डेक्कन महासंघ ने इस शहर पर जीत हासिल की और कई महीनों तक इसकी संपत्ति को लूटा।

यहाँ के खंडहरों को देखने से यह सहज ही प्रतीत होता है कि किसी समय में हम्पी में एक समृद्धशाली सभ्यता निवास करती थी। इस शहर की खुदाई करने पर पुरातत्त्ववेत्ताओं को कई भव्य महल और मंदिर, पानी की शानदार व्यवस्था और कई दूसरे बुनियादी ढाँचे मिले। वर्ष 1986 में इस प्राचीन शहर को यूनेस्को विश्व विरासत स्थल घोषित कर दिया गया।

7वीं सदी में हम्पी में बना विरुपाक्ष मंदिर आज भी शान से खड़ा है

हम्पी में स्थित है रामायण में वर्णित किष्किंधा पर्वत

हम्पी को रामायणकाल में पम्पापुरी और किष्किन्धा के नाम से जाना जाता था। यहाँ कई बड़ी और विशालकाय ग्रेनाइट की चट्टानें देखी जा सकती हैं। यहीं पर किष्किंधा पर्वत पर तुंगभद्रा नदी के किनारे कई मंदिर भी हैं। जिनमें मतंग ऋषि आश्रम, शबरी गुफा और अंजना पर्वत सबसे महत्वपूर्ण हैं।

हम्पी में तुंगभद्रा नदी किनारे अंजनाद्री पर्वत पर स्थित हनुमान जी की माँ अंजना का मंदिर


किष्किंधा पर्वत पर अंजना मंदिर के आस पास बड़ी चट्टानों पर बंदरों के काफी झुण्ड देखे जा सकते हैं


किष्किंधा में वह स्थान जहाँ पर रामायण के अनुसार श्री राम-हनुमान की पहली भेंट हुई थी

हम्पी के आसपास मौजूद ग्रेनाइट पहाड़ियों की गिनती दुनिया के सबसे पुराने पत्थरों में की जाती है। करोड़ों सालों में ग्रेनाइट के बड़े-बड़े पत्थरों ने घिस-घिस कर छोटी पहाड़ियों का रूप ले लिया है।

इनमें से कई पहाड़ियाँ, एक के ऊपर एक पड़े पत्थरों से बनी हैं। इस मंदिर के अवशेष हेमकूट पहाड़ी की चोटी पर पाए जाते हैं। अंजना मंदिर तक पहुँचने के लिए करीब 500 सीढ़ियाँ चढ़नी होती हैं।

ऊँचाई पर स्थित किष्किंधा पर्वत से ऐतिहासिक विजयनगर साम्राज्य को आसानी से देखा जा सकता है

हास्य: रवीश पर बने मीम्स का फैक्टचेक | Fact check of memes on Ravish Kumar

रवीश कुमार ने एक याचना मिश्रित अपील की है। उन्होंने लिखा कि वो शकीला बेगम हैं, रवीश नहीं। जामिया के प्रोटेस्ट में हिजाब पहनकर बैठी हुई एक महिला की तस्वीर वायरल हुई। कुछ लोगों ने मजे लेने के लिए लिखा कि क्या ये रवीश कुमार हैं? हालाँकि सभी को पता है कि वो रवीश कुमार नहीं हैं, मगर उन्होंने इसे दिल पर लेते हुए पोस्ट लिख दिया।

पूरा वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करके देखें

सोनिया की ‘बड़ी बहन’ के बेटे ने गाँधी परिवार को दी चुनौती, थरूर ने किया समर्थन

दिल्ली चुनावों में करारी शिकस्त के बाद कॉन्ग्रेस नेताओं में सिर फुटौव्वल जारी है। लेकिन, पहली बार किसी ने खुलकर शीर्ष नेतृत्व यानी गॉंधी परिवार को चुनौती दी है। ये नेता हैं पूर्व सांसद संदीप दीक्षित। वे दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बेटे हैं। शीला दीक्षित को कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गॉंधी अक्सर अपनी बड़ी बहन बताती थीं। यहॉं तक कि पिछले साल शीला के निधन के बाद सोनिया ने कहा था कि वे उनके लिए नेता से ज्यादा एक दोस्त थीं।

संदीप के बगावती सुर का कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी समर्थन किया है। थरूर के अनुसार, संदीप दीक्षित ने वही कहा है जो देश भर में मौजूद पार्टी के नेता निजी बातचीत में कहते हैं। उन्होंने, संदीप दीक्षित के साक्षात्कार को शेयर करते हुए ट्वीट लिखा, “संदीप दीक्षित ने जो कहा है वह देश भर में पार्टी के दर्जनों नेता निजी तौर पर कह रहे हैं। इनमें से कई नेता पार्टी में जिम्मेदार पदों पर बैठे हैं।” उन्होंने लिखा, “मैं सीडब्ल्यूसी से फिर आग्रह करता हूँ कि कार्यकर्ताओं में ऊर्जा का संचार करने और मतदाताओं को प्रेरित करने के लिए नेतृत्व का चुनाव कराए।”

संदीप दीक्षित ने अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस को दिए साक्षात्कार में पार्टी अध्यक्ष न चुने जाने को लेकर अपना बयान दिया था। उन्होंने कहा कि इतने महीनों के बाद भी कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता नया अध्यक्ष नहीं नियुक्त कर सके हैं। इसका कारण यह है कि वह सब यह सोच कर डरते हैं कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे।

पूर्व सांसद दीक्षित ने कहा कि कॉन्ग्रेस के पास नेताओं की कमी नहीं है। अब भी कॉन्ग्रेस में कम से कम 6-8 नेता हैं, जो अध्यक्ष बन कर पार्टी का नेतृत्व कर सकते हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि कभी-कभार आप निष्क्रियता चाहते हैं, क्योंकि आप नहीं चाहते हैं कि कुछ हो।

गौरतलब है कि साल 2017 में सोनिया गाँधी ने पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी बेटे राहुल गॉंधी के लिए खाली कर दी थी। लेकिन, 2019 के लोकसभा चुनावों में करारी पराजय के बाद राहुल ने इस्तीफा दे दिया था। शुरुआत में उनकी काफी मान-मनौव्वल की गई थी। लेकिन, इस्तीफा वापस लेने को जब वे तैयार नहीं हुए तो काफी फजीहत के बाद पार्टी ने सोनिया को अंतरिम अध्यक्ष चुन लिया था। अब ऐसी चर्चा चल रही है कि दोबारा राहुल कि इस पद पर ताजपोशी की जा सकती है।

इस मसले पर साक्षात्कार में संदीप दीक्षित ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को भी निशाने पर लिया। उन्होंने कहा, “मुझे वास्तव में अपने वरिष्ठ नेताओं से बहुत निराशा हुई है। उन्हें निश्चित तौर पर सामने आना चाहिए। उनमें से ज्यादातर राज्यसभा में हैं, पूर्व में मुख्यमंत्री रह चुके हैं और वर्तमान में मुख्यमंत्री हैं, वे बहुत वरिष्ठ हैं। मुझे लगता है कि उन्हें सामने आकर पार्टी के लिए कड़े फैसले लेने का वक्त आ गया है।”

संदीप दीक्षित ने अमरिंदर सिंह, अशोक गहलोत, कमलनाथ का नाम लेते हुए कहा कि ये सभी साथ क्यों नहीं आते, बाकी लोगों को भी साथ क्यों नहीं लाते? उनके मुताबिक, “एके एंटनी, पी चिदंबरम, सलमान खुर्शीद, अहमद पटेल… इन सभी ने कॉन्ग्रेस के लिए महान काम किया है। ये अब अपने राजनीतिक करियर के ढलान पर हैं। लेकिन उनके (अमरिंदर सिंह, गहलोत, कमलनाथ) के पास शायद और 4-5 साल हैं। मुझे लगता है कि अब समय आ गया है कि वे बौद्धिक योगदान दें… वे केंद्र में, राज्यों में या अन्य जगहों पर लीडरशिप की चयन प्रक्रिया में जा सकते हैं।”

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‘हम तुम्हारी खाल नोचने में कसर नहीं छोड़ेंगे’ – BJP के नेताओं को कॉन्ग्रेस MLA ने दी सरेआम धमकी

मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस विधायक विजय चौरे ने सार्वजनिक रूप से भाजपा के लोगों को उनकी खाल नोच डालने की धमकी दी। छिंदवाड़ा के सौसर में कॉन्ग्रेस विधायक ने एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ये धमकी दी। अपनी पार्टी का गुणगान करने के बाद उन्होंने भाजपा का नाम लेकर कहा, “जिस दिन कॉन्ग्रेस के किसी कार्यकर्ता पर उँगली उठाने का प्रयास किया, उसके बाल को हाथ लगाने का प्रयास किया, मैं इस मंच से सार्वजनिक रूप से कहता हूँ, हम उसकी खाल नोचने में कसर नहीं छोड़ेंगे।”

न्यूज़ एजेंसी ANI द्वारा ट्वीट किए गए विडियो में विजय चौरे को कहते सुना जा सकता है कि एक साल हुआ कॉन्ग्रेस की सरकार बने और कमलनाथ को मुख्यमंत्री बने। उस एक साल में कॉन्ग्रेस की कई उपलब्धियाँ हैं। विधायक, सांसद, प्रदेश के मुख्यमंत्री और सरकार के खिलाफ बोलने का उनके पास (भाजपा) कोई मुद्दा नहीं है। एक साल की उपलब्धियाँ आप सब और कार्यकर्ताओं के सामने हैं।

कॉन्ग्रेस विधायक को इस वीडियो में भाजपा पर आरोप लगाते हुए भी सुना जा सकता है। वे कहते हैं, “किसी न किसी प्रकार से सौहार्द्रपूर्ण और शांतिपूर्ण अवसर और माहौल को खराब करने का काम भारतीय जनता पार्टी के लोगों ने 5-7 दिनों में किया। काफी हद तक उन्होंने बदनाम करने की कोशिश की। कॉन्ग्रेस के विधायक, सांसद और मुख्यमंत्री-सरकार को घेरने का काम किया।”

वे बीजेपी को ललकारते हुए कहते हैं, “भाजपा के लोगों हम हर चीज के लिए तैयार हैं। हम कॉन्ग्रेस के लोग हैं। बेईमानी, चोरी, लूट-घसोट, जुआ-शराब और अवैध कारोबार में हम लिप्त नहीं हैं। ये सारे काम आप करोगे और बदनाम कॉन्ग्रेस को करोगे। कॉन्ग्रेस का कोई भी माई का लाल ये बर्दाश्त नहीं करेगा, ये ध्यान में रखना।”

गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस विधायक ने जहाँ से भाजपा के लोगों को ये धमकी दी, वहाँ पर भीड़ का जमावड़ा था और ध्यान देने वाली बात है कि जिस पार्टी के विधायक ने बयान दिया है, आज उसी पार्टी से तंग आकर उनके ही राज्य में एक महिला प्रोफेसर ने अपने बाल मुंडवा लिए हैं।

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भरी अदालत में मोदी के मंत्री की तारीफ, CJI ने कहा- आकर हमें भी अपनी योजना के बारे में समझाएँ

नितिन गडकरी जब महाराष्ट्र में मंत्री हुआ करते थे तो उनका नाम ही हाईवे मिनिस्टर पड़ गया था। फिलहाल वे केंद्र में भूतल परिवहन एवं राष्ट्रीय राजमार्ग जैसे विभागों के मंत्री हैं। वे मोदी सरकार के उन मंत्रियों में शामिल हैं जिनके कामकाज की सबसे ज्यादा तारीफ होती है। अब गडकरी का लोहा देश की शीर्ष अदालत ने भी मान लिया है। खुद मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे ने पूछा है कि क्या केंद्रीय परिवहन मंत्री सुप्रीम कोर्ट में आकर उन्हें अपनी योजनाओं से अवगत करा सकते हैं?

वाकया बुधवार का है। सुप्रीम कोर्ट में प्रदूषण से निपटने के लिए देश में इलेक्ट्रिक वाहनों को लाने के लिए एक एनजीओ की याचिका पर सीजेआई की अगुआई वाली खंडपीठ सुनवाई कर रही थी। खंडपीठ ने कहा कि पटाखे और पराली से प्रदूषण कुछ दिनों के लिए होता है। हवा की गुणवत्ता को बदतर करने में गाड़ियों का सबसे ज्यादा योगदान होता है। इसे रोकने के लिए पीठ ने केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से सलाह मॉंगी। पीठ ने उनकी तारीफ करते हुए मिलने की इच्छा जताई। कहा- सार्वजनिक परिवहन और सरकारी गाड़ियों को इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (ई-व्हीकल्स) से बदलने का गडकरी का आइडिया शानदार है।

खंडपीठ ने पूछा, “क्या परिवहन मंत्री आकर इलेक्ट्रिक वाहनों की तकनीक की योजना की जानकारी दे सकते हैं?” सीजेआई ने यह भी स्पष्ट किया कि इसे समन नहीं निमंत्रण समझा जाना चाहिए, क्योंकि इससे इलेक्ट्रिक वाहनों के बारे में योजना की तस्वीर ज्यादा स्पष्ट होगी।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) एएनएस नडकर्णी ने मंत्री को अदालत में बुलाए जाने को लेकर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि इसका राजनीतिक दुरुपयोग हो सकता है। इसके बाद पीठ ने साफ किया कि गडकरी को अदालत में आमंत्रित करने के लिए कोई लिखित आदेश जारी नहीं किया जाएगा। उन्हें समन नहीं किया जा रहा। वे केवल सलाह देने आएँगे। पीठ ने कहा, “हम सरकार को कोई आदेश नहीं दे रहे, बल्कि हम ये जानना और समझना चाहते है कि इलेक्ट्रिक गाड़ियों के लिए सरकार के पास क्या योजना है?” सीजेआई बोबडे ने कहा कि केंद्रीय मंत्री चाहें तो अपने किसी अधिकारी को भी भेज सकते हैं जो उनकी योजना से अदालत को पूरी तरह अवगत करा सके।

असल में इस मामले में एनजीओ की ओर पैरवी प्रशांत भूषण कर रहे हैं। पीठ ने हल्के अंदाज में कहा, “हम जानते हैं कि प्रशांत भूषण राजनीतिक व्यक्ति हैं, लेकिन वे मंत्री से बहस नहीं करेंगे।” वैसे राफेल मामले में लोकसभा चुनाव के वक्त शीर्ष अदालत का तत्कालीन कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गॉंधी ने भी गलत तरीके से हवाला दिया था। इसके लिए बाद में उन्हें माफी भी मॉंगनी पड़ी थी।

इससे पहले सुनवाई के दौरान भूषण ने कहा कि राष्ट्रीय ई-मोबिलिटी मिशन योजना, 2020 पेश की गई थी। इसके अनुसार सरकार को इलेक्ट्रिक वाहन खरीदने थे। इस योजना को लागू कराने और इसके तहत इलेक्ट्रिक वाहनों की खरीद के लिए सब्सिडी देने की मॉंग उन्होंने रखी।

पीठ ने कहा कि प्रदूषण को लेकर समझौता नही किया जा सकता है। यह मामला न केवल दिल्ली एनसीआर के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई चार सप्ताह के लिए स्थगित करते हुए सरकार को इस पर विचार करने का निर्देश दिया। साथ ही केंद्र को एनईएमएमपी- 2020 पर फैसले के लिए अथॉरिटी बनाने का निर्देश भी दिया।

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सोशल मीडिया और सेलेक्टिव मीडिया किस तरह से अपने हिस्से के सच को जनता के सामने रख कर अपना उल्लू सीधा करता है इसका आज एक और उदाहरण सामने आया है। अमेरिका के मशहूर समाचार पत्र वॉशिंगटन पोस्ट की पूर्व मशहूर प्रकाशक कैथरीन ग्राहम ने पत्रकारिता और ख़बरों को लेकर कहा था- “News is what someone wants suppressed. Everything else is advertising. The power is to set the agenda. What we print and what we don’t print matter a lot.”

इसका हिंदी में अर्थ है- “खबर वह होती है, जिसे कोई दबाना चाहता है। बाकी सब विज्ञापन है। मुद्दे तय करना दम की बात है। मायने यह रखता है कि हम क्या छापते हैं और क्या नहीं छापते।”

हाल ही में जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी ने नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में छात्रों द्वारा की गई पत्थरबाजी के आधे वीडियो दिखाने वाले पत्रकारों ने खुद ही खुद को जनता के सामने बेनकाब किया है। और कम से कम इस बात का प्रमाण दे दिया है कि वो दर्शकों को क्या दिखाना चाहते हैं और क्या छुपाना चाहते हैं।

क्या है मामला –

देश का मीडिया गिरोह अपनी धुन पर सवार है और उसने आज यही प्रयोग आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के एक बयान के साथ दोबारा किया है। हाल ही में उनके एक और बयान को, जिसमें उन्होंने कहा था, “तलाक के अधिक मामले शिक्षित और सम्पन्न परिवारों से सामने आ रहे हैं, क्योंकि शिक्षा और संपन्नता अहंकार पैदा करती है, जिससे परिवार टूट रहे हैं।” मीडिया ने उसे मरोड़कर यह प्रपंच फैलाया कि भागवत ने यह कहा कि पढ़ने-लिखने से तलाक ज़्यादा होता है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत आज बृहस्पतिवार (फरवरी 20, 2020) को झारखंड के राँची में एक कार्यक्रम के दौरान जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे। मीडिया गिरोह ने मोहन भागवत के इसी कार्यक्रम के दौरान दिए गए भाषण के सिर्फ एक हिस्से को प्रमुखता से प्रकाशित किया है और बताया है कि मोहन भागवत ने ‘राष्ट्रवाद’ को लेकर बड़ा बयान दिया है।

मीडिया गिरोह प्रमुख NDTV ने मोहन भागवत का सीधा-सा अर्थ निकालते हुए अपनी भाषा में हेडलाइन देते हुए लिखा- “RSS चीफ मोहन भागवत बोले- नेशनलिज्म न कहो, क्योंकि नेशनलिज्म का मतलब होता है हिटलर।”

क्या है मोहन भागवत के बयान का सच

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने राँची में कार्यक्रम में हिस्सा लिया, इस दौरान उन्होंने अपने संबोधन में अपनी ब्रिटेन यात्रा का जिक्र करते हुए एक किस्से के माध्यम से राष्ट्रीयता (नेशनलिज़्म/Nationalism) शब्द की व्याख्या करते हुए लोगों से कहा कि शब्दों का चयन अच्छी प्रकार से करना चाहिए क्योंकि इनके अर्थ भिन्न हो सकते हैं।

मोहन भागवत ने अपने भाषण में बताया कि ब्रिटेन में आरएसएस कार्यकर्ताओं से उस दौरान जब उनकी बातचीत हुई, उसी में यह बात निकलकर सामने आई कि बातचीत में शब्दों के अर्थ भिन्न हो जाते हैं। मोहन भागवत ने कहा- “…इसलिए आप नेशनलिज़्म/Nationalism (राष्ट्रवाद) इस शब्द का उपयोग करने से बचें। आप नेशन (राष्ट्र) कहेंगे चलेगा, नेशनल (राष्ट्रीय) कहेंगे चलेगा, नेशनलिटी (राष्ट्रीयता) कहेंगे तो भी चलेगा, मगर नेशनलिज्म (राष्ट्रवाद) न कहो क्योंकि नेशनलिज्म का मतलब होता है हिटलर, नाजीवाद, फासीवाद। ऐसे ही शब्दों का बदलाव हुआ है।”

ब्रिटेन में एक आरएसएस कार्यकर्ता के साथ अपनी बातचीत को याद करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि वहाँ 40 से 50 लोगों से संघ के बारे में उनकी बातचीत हुई थी। उन्होंने कहा- “संघ के कार्यकर्ता ने मुझे कहा कि अंग्रेजी आपकी भाषा नहीं है और इसलिए शब्दों का इस्तेमाल बचकर कीजिएगा। यहाँ पर नेशनलिज्म शब्द की जगह नेशनल कहेंगे तो चलेगा, नेशन कहेंगे तो चलेगा, नेशनलिटी कहेंगे तो चलेगा पर नेशनलिज्म मत कहिएगा। नेशनलिज्म का मतलब हिटलर और नाजीवाद होता है।” 

गौरतलब है कि यह कहने से पहले ही मोहन भागवत यह स्पष्ट कर चुके थे कि शब्दों का अर्थ आज के समय में बदल दिए गए हैं। साथ ही, हमें यह भी देखना होगा कि एक ही शब्द अलग-अलग देश, काल और परिस्थिति में अलग-अलग अर्थ पाते है। ध्यान देने की बात यह है कि भारत में ही विगत कुछ वर्षों में राष्ट्रवाद और फासीवाद शब्दों को वामपंथी मीडिया गैंग से लेकर देश के कथित विचारक वर्ग ने खूब इस्तेमाल किया है। इन शब्दों को इतना इस्तेमाल किया गया है कि ये अब अपने मूल और शाब्दिक अर्थ से अलग माने जाने लगे हैं।

देश के कुछ कथित निष्पक्ष पत्रकार नागरिकता संशोधन कानून (CAA) पर भी अपने प्राइम टाइम में लोगों को फासीवादियों की तरह ही ‘गैस चैंबर’ में बंद कर दिए जाने जैसे रटे-रटाए वाक्यों को रोजाना 9-10 PM के बीच जनता के कानों में ठूँसते देखे गए थे। जाहिर सी बात है कि भ्रामक हेडलाइंस का उदेश्य एक विचारधारा के विरुद्ध लोगों को भर्मित कर अपना उल्लू सीधा करना ही होता है।

इसी के प्रकाश में मोहन भागवत ने राँची में बयान दिया कि उन शब्दों से बचिए, जिनका अर्थ कुछ और ही कर दिया गया है। निश्चित तौर पर मोहन भागवत द्वारा यह बात एक तरह से वहाँ मौजूद जनसभा को दिशा-निर्देशित करने के उद्देश्य से कही गई थी।

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का पूरा भाषण नीचे दिए गए वीडियो में सुन सकते हैं। भाषण के शुरू में ही मोहन भागवत स्पष्ट कहते सुने जा सकते हैं कि शब्दों का अर्थ बदलता जा रहा है। इसके बाद ही उन्होंने बताया है कि राष्ट्रवाद शब्द के इस्तेमाल करने पर आपके कथन का सीधा अर्थ फासीवाद और नाजीवाद से जोड़ दिया जाता है। इसलिए इसके प्रयोग से बचना चाहिए। हम अक्सर खबरों में देखते आए हैं कि राष्ट्रवाद या नेशनलिज़्म जैसे शब्दों का प्रयोग करते ही विरोधी अपने एजेंडे को अक्सर आगे कर देते हैं।

यह वीडियो देखने से पता चलता है कि मेनस्ट्रीम मीडिया द्वारा चलाई जा रही हेडलाइन भ्रामक और बेहद चालाकी से संघ के खिलाफ इस्तेमाल करने के उद्देश्य से चलाई जा रही है।

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कन्हैया कुमार को क्यों बचा रही केजरीवाल सरकार?: दिल्ली पुलिस ने कहा- देशद्रोह का मामला चलाने की दें इजाजत

जेएनयू में 2016 में देश विरोधी नारे लगाने के मामले में तत्कालीन छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उनके साथियों के खिलाफ देशद्रोह का मामला चलाने की अनुमति दिल्ली सरकार नहीं दे रही है। इस संबंध में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने केजरीवाल सरकार के गृह मंत्रालय को पत्र लिखा है। पत्र दिल्ली की एक अदालत द्वारा इस संबंध में राज्य सरकार को रिमाइंडर भेजने का निर्देश दिए जाने के बाद लिखी गई है।

पत्र में कन्हैया कुमार, उमर खालिद समेत अन्य के खिलाफ मुक़दमा चलाने की जल्द से जल्द अनुमति देने की अपील दिल्ली सरकार से की गई है। रिपोर्ट्स के अनुसार दिल्ली पुलिस ने केजरीवाल की सरकार से इस संबंध में उसकी लंबित पड़ी फाइल पर जल्द सहमति देने की गुजारिश की है ताकि वे देशद्रोह के आरोप में कन्हैया कुमार और अन्य पर अभियोग चला सके।

दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल के डिप्टी कमिश्नर ऑफ़ पुलिस प्रमोद सिंह कुशवाहा ने दिल्ली सरकार को लिखी चिट्ठी में कहा है, “आपसे प्रार्थना की जाती है कि CrPC के सेक्शन 196 के अंतर्गत केस दर्ज करने के लिए जरूरी अनुमति प्रदान करने की प्रक्रिया तेज करें जैसा कि आईपीसी चैप्टर VI, सेक्शन 124 A आईपीसी के अंतर्गत जरूरी विधान है।”

बुधवार को हुई सुनवाई के दौरान मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट (सीएमएम) पुरुषोत्तम पाठक ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया था कि वह दिल्ली सरकार को कन्हैया पर अभियोजन के लिए जरूरी मॅंजूरी के बारे में याद दिलाए। इससे पहले पुलिस ने कोर्ट को बताया था कि मुकदमा चलाने की मॅंजूरी अभी तक नहीं दी गई है। मॅंजूरी का अनुरोध करने वाला पत्र जीएनसीटीडी (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सरकार) के पास लंबित है। अदालत ने इस संबंध में दिल्ली सरकार से 3 अप्रैल तक स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को भी कहा था।

उल्लेखनीय है 9 फरवरी 2016 को जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी परिसर में देश विरोधी नारे लगाने के कई वीडियो सामने आए थे। इसके बाद दिल्ली पुलिस ने तत्कालीन जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उमर खालिद समेत कई अन्य आरोपितों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर जाँच की थी। इसी आधार पर पिछले साल अदालत में चार्जशीट दायर की थी जिसमें कन्हैया कुमार समेत अन्य आरोपितों पर देशद्रोह की धारा लगाई गई थी। इन पर आरोप है इन्होंने जेएनयू परिसर में हुए कार्यक्रम में इन्होंने एक जुलूस की अगुवाई की थी और देशद्रोही नारे लगाए थे।

दिल्ली पुलिस ने 14 जनवरी 2019 को करीब 1200 पन्ने का चार्जशीट अदालत में दाखिल किया था। इसमें कन्हैया कुमार और डेमोक्रेटिक स्टूडेंट यूनियन के सदस्य उमर खालिद को मुख्य आरोपित बनाया था। वहीं, सात अन्य आरोपितों में आकिब हुसैन, मुजीब हुसैन, मुनीब हुसैन, उतर गुल, रईस रसूल, बसरत अली व खालिद बशीर भट का नाम शामिल है। इसके अलावा रामा नागा, आशुतोष, शहला राशिद, डी राजा की बेटी अपराजिता राजा, रुबैना सैफी, समर खान समेत 36 छात्रों को भी आरोपित बताया गया है।

लेकिन केजरीवाल सरकार की अनुमति नहीं मिलने के कारण इस मामले में अभियोग शुरू नहीं हो सका है। दिल्ली सरकार का रुख इस मामले में बेहद चौंकाने वाला है। वह न केवल देस विरोधी नारे लगाए जाने को ख़ारिज करती रही है, बल्कि दिल्ली पुलिस के साक्ष्यों को मनगढ़ंत और दोषपूर्ण भी करार देती है। बुधवार को इस संबंध में दिल्ली दिल्ली सचिवालय में हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान केजरीवाल से सवाल भी पूछा गया था। जवाब में उन्होंने कहा कि इस संबंध में फैसला लेना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। लेकिन, वे इस पर संबंधित विभाग को जल्द फैसला लेने को कहेंगे।

गौरतलब है कि देशद्रोह के मामले में अभियोग चलाने के लिए सीआरपीसी की धारा 196 के तहत दिल्ली सरकार की मॅंजूरी जरूरी है। बिना इसके कोर्ट दिल्ली पुलिस की चार्जशीट पर संज्ञान नहीं ले सकती।

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हिंदुओं के ख़िलाफ़ और महिलाओं के लिए अक्सर सोशल मीडिया पर अपशब्दों का इस्तेमाल करके उन्हें अपमानित करने वाले फर्जी माइथोलॉजी एक्सपर्ट देवदत्त पटनायक एक बार फिर से ट्विटर पर लताड़े जा रहे हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि ट्विटर पर हमेशा गलत जानकारी फैलाने का प्रयास करते पाए जाते हैं देवदत्त नामक यह शख्स। और जब अन्य यूजर्स ने उनके झूठ का पर्दाफाश करके उनकी आलोचना करते हैं, तो वो गाली-गलौच पर उतर आते हैं। माँ-बहन के लिए आपत्तिजनक शब्द इस्तेमाल करने लगते हैं।

दरअसल, देवदत्त पटनायक ने कल फिर CAA के ख़िलाफ़ तंज भरे अंदाज में ट्विटर पर लिखा था कि भारत में कागज़ मुस्लिम शासकों की देन है। अब हिंदुत्व उस कागज़ का इस्तेमाल गरीबों को डराने के लिए कर रहा है और मुस्लिम महिलाएँ सामने आकर उसे जमा कराने से मना कर रही हैं। हिंदुत्व हास्यास्पद बात करता है।

इस 4 पंक्ति के ट्वीट में देवदत्त पटनायक ने आखिरी शब्द तक सिर्फ़ झूठ परोसा और हिंदुत्व को मोदी सरकार की जगह लिखकर अपना नैरेटिव गढ़ा। तो सोशल मीडिया यूजर्स ने भी उन्हें फौरन आड़े हाथों ले लिया। सबसे पहले तो पटनायक के इस वाक्य को खारिज किया गया कि भारत में कागज मुस्लिम शासकों की देन हैं।

ट्रू इंडोलॉडी नामक हैंडल ने जानकारी दी कि 6 ई. में संस्कृत हस्तलिपी कागज़ पर लिखी गई थी, जिसकी खोज जम्मू-कश्मीर के गिलगिट में साल 1931 में हुई थी। उनमें से कई हस्तलिपियाँ अब भी श्रीनगर म्यूजियम में हैं। जिसका मतलब है कि ये हस्तलिपियाँ कागज पर उस समय लिखी जा चुकी थीं, जब इस्लाम का जन्म भी नहीं हुआ था।

इसके बाद एक यूजर ने ऐसी निराधार बातें करने के लिए उनकी तुलना राहुल गाँधी से की और कहा कि राहुल गाँधी भी देवदत्त पटनायक से ज्यादा समझदार हैं। साथ ही पटनायक के झूठ की कागज़ से संबंधित एक जानकारी भी शेयर की। धीरे-धीरे अधिकतर ट्वीट पर प्रतिक्रिया देने वाले पटनायक को उनकी बेवकूफी के लिए ट्रोल करने लगे। ऐसे में अपने गलीज़ व्यक्तित्व के लिए कुख्यात देवदत्त पटनायक से आइना देखा न गया और उन्होंने एक बार फिर अपना ओछा व्यक्त्त्वि का प्रदर्शन सरेआम कर दिया।

पटनायक ने ट्विटर यूजर्स का गुस्सा देख रिप्लाई तो सुनील नाम के यूजर को दिया, लेकिन गाली ट्रू इंडोलॉडी को दी। क्योंकि ट्रू इंडोलॉजी के अकॉउंट से अक्सर तथ्यों के जरिए देवदत्त के झूठों का पर्दाफाश होता रहता है।

पटनायक ने लिखा, “तुम लोगों को बेवकूफ बनाना कितना आसान है। जिन्हें ये भी नहीं पता कि INVENTION और POPULARISING में क्या फर्क होता है। क्या तुम्हारी माँ ने अपने पीरियड के दौरान ट्रू इंडोलॉजी की कुत्तियों को खाना खिलाया था?”

इसके बाद पटनायक ने एक और ट्वीट को रीट्वीट करते हुए लिखा, “देखो, हिंदुत्व ट्रोल को INVENTION और POPULARISING के बीच का फर्क़ तक नहीं पता। शायद इन लोगों को पीरियड्स से गुजर रहे ट्रू इंडोलॉजी ने खाना बना कर खिलाया होगा!”

अब ये टिप्पणियाँ, किसी भी स्तर पर एक महिला के लिए कितनी शर्मनाक बात है, यहाँ ये बताने की जरूरत नहीं है। सोशल मीडिया पर इस टिप्पणी को देखने के बाद पटनायक के ख़िलाफ़ एक्शन लेने की माँग उठाई जा रही हैं। ट्रू इंडोलॉजी को टैग करके कहा जा रहा है कि वो इस बेवकूफ के ख़िलाफ़ कार्रवाई करें। लोगों का कहना है कि उन्हें खुद पर शर्म आ रही है कि उन्होंने कभी पटनायक की किताब को खरीदकर पढ़ा। उन्हें तरह-तरह से कोसा जा रहा है, उनकी कुंद बुद्धि के लिए उन्हें धिक्कारा जा रहा है।

वहीं, ट्रू इंडोलॉजी ने भी ऐसे सेक्सिस्ट कमेंट के आने के बाद उद्योगपति आनंद महिंद्रा को टैग करके पटनायक को नौकरी देने पर सवाल उठाए। उनसे पूछा है कि क्या पटनायक उनकी माँ और पत्नी के बारे में भी ऐसी बातें करता है, क्या उनमें कोई शर्म नहीं है। उनका इंप्लॉय आम नागरिकों को गाली देता है, महिलाओं का अपमान करता है और वो चुप हैं?

बता दें कि ट्रू इंडोलॉजी के साथ बेहूदगी करने के अलावा पटनायक का एक और ट्वीट सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। जिसमें पटनायक एक यूजर का रिप्लाई देने के लिए बेशर्मी से योनि पर भद्दा कमेंट करते हैं।

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