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जामिया का हर वीडियो, हर एंगल: लाइब्रेरी में कब, क्या और कैसे हुआ, साथ में लिबरल गिरोह की नंगई भी

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) की विरोध की आड़ में बीते साल 15 दिसंबर को दिल्ली के जामिया में हिंसा हुई। उपद्रवियों पर काबू पाने की कोशिश में दिल्ली पुलिस ने जामिया मिलिया इस्लामिया के कैंपस में प्रवेश किया। उस समय लिबरल गिरोह ने पुलिस के कैंपस में दाखिल होने को लेकर खूब रोना रोया। 16 फरवरी की सुबह एक वीडियो सामने आया और इसके बाद फिर से गिरोह का प्रलाप शुरू हो गया। एडिटेड वीडियो के जरिए दिल्ली पुलिस को बदनाम करने और दंगाइयों को पाक-साफ बताने की कोशिश की गई। हालॉंकि समय बीतने के साथ पूरी तस्वीर पलट गई और लिबरलों के प्रपंच का किला रेत की महल के माफिक ढह गया। आइए समझते हैं पूरे दिन किस तरह यह मामला आगे बढ़ा;

वीडियो 1

आज सुबह तड़के जामिया कोआर्डिनेशन कमेटी ने यह वीडियो जारी किया। वीडियो में दिखाई पड़ रहा था कि दिल्ली पुलिस लाइब्रेरी में घुस कर छात्रों को पीट रही है। इस वीडियो की आड़ लेकर रवीश कुमार जैसे पत्रकारों और राणा अयूब जैसे इस्लामिस्ट्स ने मोदी सरकार और दिल्ली पुलिस पर हमला बोल दिया और जामिया हिंसा के लिए उसे जिम्मेदार ठहरा, पुलिस पर हमले करने वाली मुस्लिम भीड़ को बचाने की कोशिशें शुरू कर दीं। यह एडिटेड वीडियो था। इसमें दिख रहा था कि छात्र किताबें बंद कर के बैठे हुए थे और जैसे ही पुलिस आई, उन्होंने किताबें खोल कर पढ़ने का नाटक शुरू कर दिया। बाद में इस वीडियो से जामिया प्रशासन ने भी किनारा कर लिया।

वीडियो 2

जामिया लाइब्रेरी में हुई हिंसा का पूरा सच ( साभार : न्यूज़ नेशन )

मीडिया गैंग के प्रोपेगेंडा के बाद जामिया लाइब्रेरी में पुलिस और उपद्रवियों के बीच संघर्ष का एक और वीडियो भी सामने आ गया। इसमें नकाबपोश उपद्रवी पहले लाइब्रेरी में घुसते दिखे। फिर पुलिस उन्हें खदेड़ते हुए लाइब्रेरी पहुॅंची। ऐसा नहीं है कि पुलिस ने यूँ ही किसी पर कार्रवाई कर दी। पुलिस ने उपद्रवियों को चिह्नित कर एक्शन लिया। इस वीडियो में देखा जा सकता है कि लाइब्रेरी के दरवाजे पर एक व्यक्ति खड़ा है, जो भाग कर आ रहे नकाबपोशों को अंदर घुसा रहा है।

वीडियो 3

हाथ में पत्थर लेकर और चेहरे पर नकाब बाँध कर लाइब्रेरी में कौन सी पढ़ाई की जाती है, ये जामिया के उपद्रवी ही बता पाएँगे। वीडियो में कुछ उपद्रवियों को पत्थर लेकर लाइब्रेरी में घुसते हुए देखा जा सकता है। दिल्ली पुलिस का कहना है कि ये वो दंगाई हैं, जो 15 दिसंबर को पुलिस से बचने के लिए यहाँ छिपे थे। पुलिस उनलोगों की तलाश कर रही थी, जिन्होंने यूनिवर्सिटी के बाहर आगजनी की थी। दिल्ली पुलिस ने कहा कि सोशल मीडिया पर सर्कुलेट हो रहे सभी वीडियोज की जाँच की जाएगी, जिसके बाद ही इस दिशा में कार्रवाई की जा सकती है।

ऑप इंडिया के सवाल

आपको याद होगा कि जामिया मिलिया इस्लामिया के प्रशासन और छात्रों, दोनों ने ही पुलिस को जाँच में सहयोग नहीं किया। जब पुलिस जाँच के लिए सीसीटीवी फुटेज लेने पहुँची, तब छात्रों ने हंगामा किया और पुलिस को वो फुटेज नहीं लेने दिया। आख़िर जामिया के छात्र क्या छिपाना चाहते थे? हमारे कुछ और भी सवाल हैं, जो इस वीडियो को देखने के बाद उभरते हैं:

  1. जामिया का ये वीडियो हिंसा के 60 दिनों बाद क्यों रिलीज किया गया? इतने दिन तक इन्तजार क्यों? उपद्रवी छात्रों और गिरोह विशेष के बीच क्या सेटिंग चल रही थी?
  2. वीडियो को काट-छाँट कर क्यों जारी किया गया? पूरा वीडियो आने से उपद्रवी छात्रों की पोल खुल जाती, क्या इसीलिए वीडियो को अपने हिसाब से काट कर पेश किया गया?
  3. ऊपर हम पूछ चुके हैं कि जामिया का प्रशासन और छात्र पुलिस की जाँच में सहयोग क्यों नहीं कर रहे हैं? सीसीटीवी फुटेज में ऐसा क्या था कि इसे पुलिस को नहीं दिया गया था?
  4. ये वीडियो किसने जारी किया? पुलिस ने तो नहीं किया है। फिर जामिया के छात्रों ने किया? या फिर गिरोह विशेष ने?
  5. पूरी क्रोनोलॉजी कुछ यूँ लग रही है। बसें जलाओ, पत्थरबाजी करो, अराजकता फैलाओ और फिर लाइब्रेरी में छिप कर पढ़ने का नाटक करो। पुलिस चिह्नित कर कार्रवाई करे तो सहानुभूति कार्ड खेलो। कहीं यही क्रोनोलॉजी तो नहीं है।

हालाँकि, फ़िलहाल सोशल मीडिया पर गिरोह विशेष द्वारा दिल्ली पुलिस को बदनाम करने का खेल जारी है। रवीश कुमार से लेकर बरखा दत्त तक इसी काम में लगे हुए हैं। किसी ने पूरा वाला वीडियो शेयर करने की जहमत नहीं उठाई है। आधे-अधूरे वीडियो के आधार पर अफवाहों का बाजार गर्म किया जा रहा है।

रवीश कुमार नहीं समझ पा रहे जामिया की लाइब्रेरी में क्यों भागे ‘छात्र’: बताने की कृपा करें

जामिया का कटा विडियो: रवीश ने जानबूझ कर क्यों दिखाया एडिटेड विडियो? समझिए क्रोनोलॉजी

‘प्रदर्शन का विडियो FB पर क्यों डाली’ – जामिया की पूर्व छात्रा सीमा रिजवी पर हमला, बेटी को किडनैप करने की धमकी

रवीश कुमार नहीं समझ पा रहे जामिया की लाइब्रेरी में क्यों भागे ‘छात्र’: बताने की कृपा करें

जामिया के उपद्रवियों का मीडिया के लिबरल गिरोह विशेष से ऐसा गठजोड़ हुआ कि दिल्ली पुलिस को बदनाम करने के लिए काटा-छाँटा हुआ वीडियो जारी किया गया। मकसद था जामिया के दंगाइयों को पाक-साफ़ साबित किया जा सके और दिसंबर में हुई हिंसा का पूरा दोष दिल्ली पुलिस पर मढ़ा जा सके। क्यों? क्योंकि दिल्ली पुलिस केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन आती है, जिसके मुखिया अमित शाह हैं। पुलिसकर्मियों का ‘गुनाह’ इतना भर है कि उन्होंने उपद्रवियों के ख़िलाफ़ एक्शन लिया।

आप क्रोनोलॉजी समझिए। नकाब पहने छात्र बिना किताबें लिए बैठे हुए थे। एक अन्य वीडियो के जरिए उनकी पोल खुल गई, जिसमें देखा जा सकता है कि छात्र किताबें बंद कर के बैठे हुए थे और जैसे ही पुलिस आई, उन्होंने किताबें खोल कर पढ़ने का नाटक शुरू कर दिया। दूसरे वीडियो में देखा जा सकता है कि दरवाजे पर खड़ा एक छात्र नकाबपोशों को लाइब्रेरी के भीतर घुसा रहा है। हाथ में पत्थर और चेहरे पर नकाब- जामिया के लाइब्रेरी का ड्रेस कोड कुछ अजीब नहीं लग रहा?

अब दंगाई अगर कहीं छिपेंगे, तो क्या पुलिस वहाँ जाकर उन्हें चिह्नित नहीं करेगी? एक बार वो चिह्नित हो गए तो उन पर पुलिस कार्रवाई भी करेगी ही। इसीलिए, जामिया के उपद्रवियों ने काट-छाँट कर वीडियो रिलीज किया, ताकि उन्हें सहानुभूति मिल सके। तभी तो अमित मालवीय ने पूछा है कि जामिया के छात्रों की शिक्षा के लिए भारत सरकार प्रतिवर्ष 600 करोड़ रुपए ख़र्च करती है, बदले में ये छात्र क्या देते हैं? यानी, जामिया के एक छात्र पर सरकार एक साल में सवा 3 लाख रुपए ख़र्च करती है।

जब विडियो 29 सेकेंड से 49 सेकेंड का होते हुए अब 2 मिनट से ज़्यादा लम्बा आ गया है, जिसमें दंगाई और फ़सादी लौंडे लाइब्रेरी में पहुँचाए जा रहे हैं, कोई डायरेक्शन दे रहा है कि किधर जाना है, छुपना है, हाथों में पत्थर और गले में रुमाल का मास्क दिख रहा है, तब रवीश जी ने इंडिया टुडे के ‘एक और विडियो’ का लिंक डाला है। इस दोहरे रवैये पर सवाल तो पूछे जाएँगे। लेकिन इस आदमी से पूछना चाहिए कि क्या उसके पास अभी भी सही विडियो नहीं गया?

क्या यही छात्र लाइब्रेरी में छुपते हुए, इसी पुलिस पर आरोप लगाने के लिए भीतर जा कर आग ही लगा देती तो जिम्मेदारी किसकी होती? जब 15-16 दिसंबर को कुछ विडियो सामने आए थे, जिसमें कहीं भी पुलिस नहीं थी, और छात्र स्वयं ही टेबल आदि तोड़ते दिख रहे थे, तो ये सवाल उठा था कि इसमें पुलिस कहाँ है। साथ ही इस बात का अंदाज़ा पहले ही लग गया था कि अगर पुलिस घुसी भी होगी तो दंगाइयों का पीछा करते हुए घुसी होगी जो बाहर आग लगा कर, पत्थरबाजी करने के बाद लाइब्रेरी की तरफ भागे होंगे। अब यही सत्य साबित होती हुई दिख रही है।

आज विडियो में वही दिख रहा है। रवीश समेत कुछ लोगों का कहना है कि पुलिस डंडे क्यों मार रही है? भाई, हाथ में पत्थर ले कर घूमने वाले और बसों में आग लगाने वाले छात्र नहीं, फसादी होते हैं। उनसे अपराधियों की तरह ही निपटना चाहिए। उन्हें नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज पुलिस को तब करना होता है जब मान-मनौव्वल की संभावना दंगाइयों की तरफ से खत्म हो जाती है। विडियो जैसे-जैसे बाहर आएँगे, सच भी सामने आता चला जाएगा।

अभी समय के साथ ऐसे और भी कुत्सित प्रयास किए जाएँगे। आज जामिया के दंगाइयों को बचाने के लिए प्रपंच खेला जा रहा है, बीते कल को जेएनयू के उपद्रवियों को बचाने के लिए भी ऐसा ही खेल किया गया था और आने वाले दिनों में शाहीन बाग़ के उपद्रवियों को गाँधीवादी बताने के लिए चल रहा प्रपंच भी और गहरा होगा। हर एक सरकार विरोधी हिंसा की वारदात में शामिल व्यक्ति को भारत का ‘स्वतंत्रता सेनानी’ साबित करने का प्रयास होता है, भले ही उसने पुलिस पर गोली चलाई हो या फिर आम लोगों पर पत्थर।

हाथ में पत्थर लेकर जामिया की लाइब्रेरी में कौन सी पढ़ाई करने जा रहे ‘छात्र’: नए Video से पलटी पूरी तस्वीर

जामिया के लाइब्रेरी में पहले घुसे नकाबपोश, पीछे से आई पुलिस: नए वीडियो से बेनकाब हुआ प्रपंच

7 फरेबी पत्रकार: जामिया के एडिटेड विडियो से कर रहे बलजोरी, सोशल मीडिया पर लत्तम-जूत्तम

जामिया का कटा विडियो: रवीश ने जानबूझ कर क्यों दिखाया एडिटेड विडियो? समझिए क्रोनोलॉजी

भारत के बाहर पहली बार योग यूनिवर्सिटी, अप्रैल से शुरू होंगी कक्षाएँ

भारत से बाहर पहली बार ‘योग’ को बढ़ावा देने के लिए एक विश्विद्यालय शुरू हो रहा है। अमेरिका के लॉस एंजिलिस में शुरू हो रही इस यूनिवर्सिटी में अप्रैल 2020 से कक्षाएँ शुरू होंगीं। मानव सभ्यता को भारतवर्ष की अप्रतिम सौगात ‘योग’, के वैश्विक प्रचार-प्रसार की दिशा में यह यूनिवर्सिटी एक पायदान ऊपर चढ़ना है। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों के कारण विश्व स्तर पर 21 जून को योग दिवस के रूप में संयुक्त राष्ट्र की मान्यता मिल चुकी है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार विवेकानंद योग यूनिवर्सिटी की स्थापना के लिए लॉस एंजिलिस में शुरूआती कैंपस बना दिया गया है। इस विश्वविद्यालय का प्रारम्भिक बजट 5 मिलियन डॉलर का है, जो प्राचीन भारतीय पद्धति पर शोधों को भी बढ़ावा देगी। भारतीय योग गुरु एचआर नरेंद्र को यूनिवर्सिटी का चेयरमैन और केस वेस्टर्न यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर श्री श्रीनाथ को यूनिवर्सिटी का प्रेसीडेंट बनाया गया है।

कैलिफोर्निया के ब्यूरो फॉर प्राइवेट पोस्ट सेकेंडरी एजुकेशन से योग यूनिवर्सिटी को नवंबर 2019 में आधिकारिक मान्यता प्राप्त हो गई थी। योग यूनिवर्सिटी में अप्रैल महीने में योगा में मास्टर कोर्स करने के लिए एडमिशन शुरू हो जाएगा।

NASA में वैज्ञानिक रह चुके योग यूनिवर्सिटी के चेयरमैन नागेंद्र ने मीडिया को दिए इंटरव्यू में कहा कि शिक्षा इंसान को पूर्ण बनाती है और शिक्षा के जरिए वह राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे सकता है। योग विश्विद्यालय का ध्येय छात्रों में शिक्षा देना है जिससे राष्ट्र के निर्माण में वह अपना योगदान दे सकें।

भारत में पहली योगा यूनिवर्सिटी वर्ष 2002 में शुरू की गई थी। नागेंद्र ने बताया कि इससे प्रेरित होकर ही उन्होंने विश्व में योग के प्रचार-प्रसार के लिए भारत से बाहर भी यूनिवर्सिटी शुरू करने की प्रेरणा पाई। यह योग यूनिवर्सिटी अनुसंधान क्रियाओं में संयुक्त शोधों की सुविधा भी प्रदान करेगी, जिसके जरिए उसे विश्व भर की यूनिवर्सिटीज का भी सहयोग प्राप्त हो सकेगा।

मोदी का कुत्ता, शाह का रखैल, योगी की नाजायद औलाद: अखिलेश ने नंबर किया वायरल, सपाई बक रहे गालियाँ

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने एक व्यक्ति को भाजपा नेता बताते हुए उससे ख़ुद की जान को ख़तरा होने का दावा किया था। अब उस व्यक्ति ने ख़ुद के निर्दोष होने का दावा करते हुए सपा के मुखिया पर आरोप लगाया है कि उनके समर्थक उन्हें लगातार धमकियाँ दे रहे हैं। ज्ञात हो कि शनिवार (फरवरी 15, 2020) को एक व्यक्ति ने अखिलेश यादव के कार्यक्रम में ‘जय श्री राम’ कह दिया था, जिसके बाद सपा कार्यकर्ताओं ने उस व्यक्ति की पिटाई की थी। इसके बाद अखिलेश ने दावा किया कि एक भाजपा नेता से उनकी जान को ख़तरा है। उन्होंने एक मैसेज मीडिया को दिखाया था, जिसके बाद उस व्यक्ति का नंबर वायरल हो गया था।

जिस व्यक्ति ने अखिलेश की सभा में ‘जय श्री राम’ कहा था, उसका नाम गोविन्द शुक्ला था। उन्होंने जिस व्यक्ति पर धमकी देने के आरोप लगा कर नंबर वायरल किया, उसका नाम प्रशांत सिंह है। ‘स्वराज्य’ की पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा ने पूछा कि क्या अखिलेश यादव को ‘टोंटी चोर’ कहना गाली की श्रेणी में आता है, वो भी तब जब मोदी-शाह को नाजी से लेकर हत्यारा कहे जाने तक को लोकतान्त्रिक विरोध बताया जाता रहा हो। अखिलेश ने जिस व्यक्ति का नंबर ट्वीट किया, उसे जान से मारने की लगातार धमकियाँ मिल रही हैं।

प्रशांत ने एक वीडियो के माध्यम से बताया कि अखिलेश यादव ने उनका मोबाइल नंबर और व्हाट्सप्प स्क्रीनशॉट वायरल कर दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्व सीएम ने बिना जाँच-पड़ताल किए और सच्चाई समझे बिना ये सब किया, जिससे सपा समर्थक उनके ख़ून के प्यासे हो गए हैं। प्रशांत ने कहा कि उनके परिवार पर भी ख़तरा है। उन्होंने कहा कि अगर उनकी किसी बात से अखिलेश को ठेस पहुँची है, तो उन्हें इसका खेद है। उन्होंने बताया कि वो काफ़ी परेशान हैं और घर से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं।

प्रशांत ने दावा किया कि उन्होंने कोई ग़लत मैसेज नहीं किया था, बल्कि मोदी और योगी के लिए ‘ज़िंदाबाद’ लिखा था। प्रशांत ने यह भी कहा कि पीएम मोदी और सीएम योगी अच्छा कार्य कर रहे हैं, इसीलिए उनका ‘ज़िंदाबाद’ होना चाहिए। उन्होंने अखिलेश को सलाह दी कि अगर भविष्य में वो अच्छा कार्य करेंगे तो उनका भी ‘ज़िंदाबाद’ किया जाएगा। बकौल प्रशांत सिंह, उन्होंने 16 जनवरी को अखिलेश यादव को मैसेज किया था और अखिलेश ने कन्नौज प्रकरण में राजनीतिक लाभ लेने के लिए उनको निशाने पर ले लिया।

प्रशांत ने कहा कि अगर उन्हें या फिर उनके परिवार को कोई भी क्षति पहुँचती है तो इसके जिम्मेदार अखिलेश यादव होंगे। उन्होंने कहा कि ‘टोंटी चोर’ एक साधारण शब्द है, इसके लिए उन पर निशाना साधा जा रहा जबकि अखिलेश के समर्थक उनके पेज पर सीएम योगी व अन्य विरोधियों के ख़िलाफ़ कई भद्दे-भद्दे कमेंट्स करते हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री को सपा समर्थकों द्वारा ‘चिलम वाले बाबा’ भी कहा जाता है।

वहीं समाजवादी पार्टी के विभिन्न सोशल मीडिया ग्रुप्स में प्रशांत सिंह को ‘गुंडा’ बताते हुए उनका नंबर वायरल किया जा रहा है। उन्हें ‘अपराधी’ बताया जा रहा है और ‘मार-मार कर गर्दा उड़ाने’ की धमकी दी जा रही है। उन्हें ‘कायर’ बताते हुए ‘भूसा भर के पर्दा गिरा देने’ की धमकी भी दी जा रही है। उन्हें व्हाट्सप्प के माध्यम से भी धमकाया जा रहा है। एक बिलाल ख़ान नामक सपा कार्यकर्ता ने प्रशांत को ‘मोदी का कुत्ता, शाह का रखैल और योगी की नाजायज औलाद’ जैसे आपत्तिजनक तमगों से नवाजा।

उद्धव की कुर्सी पर संकट: शरद पवार ने NCP मंत्रियों को बुलाया, अजित ने कहा- पता नहीं कब तक चलेगी सरकार

महाराष्ट्र में राजनीति कब किस करवट बैठ जाए कहना मुश्किल है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में प्रदेश में चल रही शिवसेना, कॉन्ग्रेस और एनसीपी की गठबंधन सरकार के मतभेद आए दिन सामने आते रहते हैं। भीमा-कोरेगॉंव के मसले ने इसे और गहरा दिया है।

भीमा-कोरेगाँव मामले की जाँच पुणे पुलिस से एनआइए को सौंपे जाने को लेकर एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने उद्धव सरकार की आलोचना की थी। उन्होंने कहा था कि महाराष्ट्र पुलिस में कुछ लोगों का व्यवहार आपत्तिजनक था। पवार ने कहा था कि वो चाहते हैं कि इन अधिकारियों की भूमिका की भी जाँच होनी चाहिए।

अब पवार ने सोमवार (फरवरी 17, 2020) को महाराष्ट्र में अपने सभी मंत्रियों की बैठक बुलाई है। इस बैठक में एनसीपी के सभी 16 मंत्री शामिल होंगे। बताया जा रहा है कि यह बैठक पवार ने आनन-फानन में बुलाई है और इसके कारणों पर पार्टी ने कुछ नहीं बताया है।

वहीं, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने भीमा-कोरेगाँव की जांँच केंद्रीय एजेंसी एनआईए को सौंपने को लेकर कहा कि वो इसके लिए मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को धन्यवाद देते हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि शरद पवार इस फैसले का विरोध कर रहे थे, उन्हें इस बात का डर लग रहा था कि कहीं सच सामने ना आ जाए।

भाजपा नेता और महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने शिवसेना को फिर से चुनाव लड़ने की चुनौती भी दी है। एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने शिवसेना, NCP और कॉन्ग्रेस गठबंधन को हराने की बात कही। फडणवीस ने कहा, “अगर शिवसेना को इतना ही भरोसा है, तो मैं उन्हें फिर से चुनाव लड़ने की चुनौती देता हूँ। शिवसेना, कॉन्ग्रेस और NCP गठबंधन को बीजेपी अकेले चुनाव में हराएगी।”

दूसरी ओर, महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री अजित पवार ने भी आज बयान दिया है कि कोई भी ज्योतिष यह नहीं बता सकता है कि महाराष्ट्र में गठबंधन की सरकार कितने दिन चलने वाली है। अजित पवार ने यह भी कहा कि चीजें तभी तक आराम से चल सकती हैं जब तक यह सोनिया गाँधी, शरद पवार और उद्धव ठाकरे के अनुसार चलेंगी।

इससे पहले कॉन्ग्रेस ने शनिवार को उद्धव सरकार की ओर से भीमा-कोरेगाँव मामले की जाँच राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) को सौंपे जाने पर सहमति को लेकर असहमति जताई थी। कॉन्ग्रेस के महाराष्ट्र प्रभारी मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा था कि यह उचित नहीं था। इस तरह की बातों को लेकर पार्टनर से विचार करना चाहिए। उन्होंने उद्धव ठाकरे के लिए कहा था कि वो पावर में हैं, लेकिन इसका इस्तेमाल विवेकपूर्ण तरीके से करना चाहिए था।

ज्ञात हो कि महाराष्ट्र में बीते विधानसभा चुनाव में बीजेपी और शिवसेना साथ चुनाव लड़ी थी। चुनाव नतीजों में गठबंधन को बहुमत भी मिले थे, लेकिन बाद में शिवसेना और भाजपा की राह अलग हो गई थी। इसके बाद शिवसेना ने कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई और उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने।

…वो मामला, जिससे ढाई महीने पुरानी ठाकरे सरकार संकट में: NCP और कॉन्ग्रेस के सीनियर नेता हुए नाराज

कभी नहीं कहा कि हम एक नहीं हो सकते: BJP से हाथ मिलाने पर महाराष्ट्र के CM उद्धव ठाकरे

CM पद से इस्तीफा दे देंगे उद्धव ठाकरे: महाराष्ट्र गठबंधन में बढ़ती कलह के बीच कॉन्ग्रेस नेता का बयान

हाथ में पत्थर लेकर जामिया की लाइब्रेरी में कौन सी पढ़ाई करने जा रहे ‘छात्र’: नए Video से पलटी पूरी तस्वीर

जामिया मिल्लिया इस्लामिया में 15 दिसंबर को हुई हिंसा के संबंध में एक के बाद एक कई खुलासे हो रहे हैं। इनसे उपद्रवी छात्रों और मीडिया के गिरोह विशेष के बीच गठजोड़ की पोल खुल रही है। सबसे पहले तो एक सीसीटीवी फुटेज वायरल किया गया, जिसके आधार पर आरोप लगाया गया कि दिल्ली पुलिस ने जामिया लाइब्रेरी में घुस कर छात्रों की पिटाई की। दिल्ली पुलिस को बदनाम करने के तमाम प्रयास किए गए। लेकिन, एक अन्य वीडियो के जरिए उनकी पोल खुल गई, जिसमें देखा जा सकता है कि छात्र किताबें बंद कर के बैठे हुए थे और जैसे ही पुलिस आई, उन्होंने किताबें खोल कर पढ़ने का नाटक शुरू कर दिया।

जामिया के छात्रों की पोल खोलती हुई एक दूसरी वीडियो भी सामने आई है। इसमें देखा जा सकता है कि दरवाजे पर खड़ा एक छात्र नकाबपोशों को लाइब्रेरी के भीतर घुसा रहा है? अब दंगाई अगर कहीं छिपेंगे, तो क्या पुलिस वहाँ जाकर उन्हें चिह्नित नहीं करेगी? एक बार वो चिह्नित हो गए तो उन पर पुलिस कार्रवाई भी करेगी ही। इसीलिए, जामिया के उपद्रवियों ने काट-छाँट कर वीडियो रिलीज किया, ताकि उन्हें सहानुभूति मिल सके। अब नए वीडियो में पत्थरबाजों को लाइब्रेरी में घुसते देखा जा सकता है।

हाथ में पत्थर लेकर और चेहरे पर नकाब बाँध कर लाइब्रेरी में कौन सी पढ़ाई की जाती है, ये जामिया के उपद्रवी ही बता पाएँगे। वीडियो में कुछ उपद्रवियों को पत्थर लेकर लाइब्रेरी में घुसते हुए देखा जा सकता है। दिल्ली पुलिस का कहना है कि ये वो दंगाई हैं, जो 15 दिसंबर को पुलिस से बचने के लिए यहाँ छिपे थे। पुलिस उनलोगों की तलाश कर रही थी, जिन्होंने यूनिवर्सिटी के बाहर आगजनी की थी। दिल्ली पुलिस ने कहा कि सोशल मीडिया पर सर्कुलेट हो रहे सभी वीडियोज की जाँच की जाएगी, जिसके बाद ही इस दिशा में कार्रवाई की जा सकती है।

अब गिरोह विशेष को जिस बात का जवाब देना है कि हाथ में पत्थर लेकर लाइब्रेरी में शरण ले रहे उपद्रवियों पर पुलिस ने अगर कार्रवाई की भी तो इसमें गलत क्या है? आगजनी और दंगा करने वाले अगर लाइब्रेरी में छिप जाएँ तो उनका पाप धुल जाता है क्या और वो क़ानून से ऊपर हो जाते हैं क्या?

जामिया के लाइब्रेरी में पहले घुसे नकाबपोश, पीछे से आई पुलिस: नए वीडियो से बेनकाब हुआ प्रपंच

7 फरेबी पत्रकार: जामिया के एडिटेड विडियो से कर रहे बलजोरी, सोशल मीडिया पर लत्तम-जूत्तम

जामिया का कटा विडियो: रवीश ने जानबूझ कर क्यों दिखाया एडिटेड विडियो? समझिए क्रोनोलॉजी

हमने नहीं जारी किया कोई Video : एडिटेड वीडियो पर जामिया प्रशासन

जामिया यूनिवर्सिटी के प्रशासन ने उस एडिटेड वीडियो से खुद को अलग कर लिया है जिसमें पुलिस लाइब्रेरी में घुसकर छात्रों को पीटती नजर आई थी। टाइम्स नाउ की खबर के अनुसार आज तड़के जामिया कोआर्डिनेशन कमेटी की तरफ से ट्वीट किए गए वीडियो से यूनिवर्सिटी प्रशासन ने किनारा कर लिया है। जामिया यूनिवर्सिटी ने एक स्टेटमेंट जारी कर कहा है कि उसने यह वीडियो जारी नहीं किया है।

जामिया मिलिया के पीआरओ अहमद अजीम ने कहा है कि फुटेज में दिख रहे छात्र एमफिल और पीएचडी के लग रहे हैं। हमें भी पता चला है कि यह वीडियो जामिया कोआर्डिनेशन कमिटी की ओर से जारी किया गया है। पुलिस इसकी जॉंच कर रही है। वीडियो के साथ छेड़छाड़ को लेकर प्रशासन ने कोई टिप्पणी नहीं की है।

गौरतलब है कि एडिटेड वीडियो को गिरोह विशेष ने वायरल किया। तथाकथित लिबरल पत्रकारों ने इस वीडियो के सहारे न सिर्फ़ दिल्ली पुलिस को क्रूर और अत्याचारी साबित करने का झूठा प्रयास किया, बल्कि जामिया नगर के दंगाइयों को भी पाक-साफ़ बताने की कोशिश की। बता दें कि बीते जनवरी में जामिया में भड़की हिंसा में सैकड़ों वाहनों को फूँक डाला गया था, जिनमें सरकारी बसें भी शामिल थीं। इसके बाद पुलिस को यूनिवर्सिटी के अंदर घुस कर सीएए विरोध के नाम पर दंगा कर रहे उपद्रवियों को खदेड़ना पड़ा था।

हालॉंकि जब पूरा वीडियो सामने आया तो पूरी तरह से अलग तस्वीर उभरकर सामने आई। इससे पता चला कि उपद्रवी नकाबपोश पहले लाइब्रेरी में घुसे, उसके बाद पुलिस उन्हें खदेड़ते हुए आई। पुलिस ने यूँ ही किसी पर कार्रवाई नहीं की। उपद्रवियों को चिह्नित कर एक्शन लिया। इस वीडियो में लाइब्रेरी के दरवाजे पर एक व्यक्ति खड़ा नजर आया जो भाग कर आ रहे नकाबपोशों को अंदर घुसा रहा था।

7 फरेबी पत्रकार: जामिया के एडिटेड विडियो से कर रहे बलजोरी, सोशल मीडिया पर लत्तम-जूत्तम

जामिया का कटा विडियो: रवीश ने जानबूझ कर क्यों दिखाया एडिटेड विडियो? समझिए क्रोनोलॉजी

‘प्रदर्शन का विडियो FB पर क्यों डाली’ – जामिया की पूर्व छात्रा सीमा रिजवी पर हमला, बेटी को किडनैप करने की धमकी

जीत की हार: बाबा भारती से सुल्तान की लगाम ले फिर भाग निकला डाकू खड्ग सिंह

सुबह जब बाबा भारती अपने अस्तबल में गए, तो उनका घोड़ा ‘सुल्तान’ हिनहिना रहा था। उन्हें यक़ीन न आया। किंतु यह सच था। डाक़ू खड्ग सिंह की आत्मा ने उसे धिक्कारा और वह रात को ही घोड़ा चुपचाप वापस बाबा के अस्तबल में बाँध आया। लेकिन दिल्ली के अस्तबल से सुल्तान ऐसे गायब हुआ कि दोबारा फिर अभी तक वापस लौटकर नहीं आया।

हार की जीत नामक इस कहानी के लेख सुदर्शन ने बाबा भारती के घोड़े सुल्तान और बाबा भारती के रिश्ते को कुछ इस तरह से बताया था- “माँ को अपने बेटे और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था।”

दिल्ली की राजनीति ने बाबा भारती और डाकू खड्ग सिंह की कहानी को एक बार फिर प्रासंगिक कर दिया है। यह बताना शायद आवश्यक नहीं है कि दिल्ली की राजनीति में डाकू खड्ग सिंह और बाबा भारती कौन है। दिल्ली की जनता तो कम से कम बाबा का घोड़ा सुल्तान ही है।

2015 के विधानसभा चुनाव और 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के बीच कोई ख़ास बदलाव देखने को नहीं मिला है। आंदोलन और धरनों से बने हुए अरविंद केजरीवाल के राजनीतिक करियर में उनकी यह तीसरी जीत शायद काफी महत्वपूर्ण साबित होगी।

लेकिन क्या डाकू खड्ग सिंह दिल्ली की जनता के साथ न्याय कर पा रहा है? इस प्रश्न पर कोई बात करने को राजी नहीं है। सुल्तान आज भी उसी दशा में बाबा भारती के इन्तजार में है। लेकिन फिर सवाल यह भी है कि सुल्तान इस बार बाबा भारती के पास गया क्यों नहीं? 70 में से 62 सीटें आम आदमी पार्टी के खाते में जाने का तो कम से कम यही संदेश है कि सुल्तान अपने अस्तबल में न होकर एक ऐसे आदमी के साथ चने खा रहा है, जिसने उसे वायदों के सिवाय और कुछ नहीं दिया।

वर्ष 2013 में केजरीवाल के उदय से पहले हर किसी ने यह ठान लिया था कि वह अपना नायक खुद चुनेंगे। यह हुआ भी। लोगों ने सड़क से उठाकर एक आदमी को ख़ुशी-ख़ुशी शासन सौंप दिया। लेकिन… लेकिन खड्ग सिंह की नजर सिर्फ और सिर्फ सुल्तान पर थी। एक दिन डाकू खड्ग सिंह ने बाबा भारती के रास्ते में अपाहिज होने का नाटक किया और बाबा को करुण पुकार लगाई।

अपाहिज ने बाबा से हाथ जोड़कर कहा, “बाबा, मैं दुखियारा हूँ। मुझ पर दया करो” और बदले में बाबा ने अपाहिज को सुल्तान पर बिठा दिया और लगाम अपाहिज के हाथों थमा दी। इसके बाद जो हुआ, उसने बाबा भारती का हृदय चीर दिया। खड्ग सिंह ने घोड़े को बाबा से छुड़ाकर वहाँ से भागने लगा और बाबा से कहा- मैं आपका दास हूँ बाबा! बस घोड़ा वापस न दूँगा।

बाबा ने धीरज से उसे कहा कि अब घोड़े का नाम न ले क्योंकि वह उसका हो चुका। बाबा ने लेकिन खड्ग सिंह से विनती की कि वो इस विषय में कुछ न कहेंगे। उन्होंने कहा- “मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। लोगों को यदि इस घटना का पता चला तो वे दीन-दुखियों पर विश्वास न करेंगे।”

दिल्ली की जनता के साथ जो 2015 के चुनाव में हुआ, वही 2020 के चुनाव में एकबार फिर हो गया है। फ्री की बिजली, मुफ्त मेट्रो, शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर किए गए काल्पनिक दावे, ये सब डाकू खड्ग सिंह के हाथ में सुल्तान की लगाम पकड़ाने के लिए काफी थे।

डाकू खड्ग सिंह ने अपने हर रंग-रूट सुल्तान के सामने उसे रिझाने को दिखाए। कभी हिन्दुओं के प्रतीक चिहृन स्वस्तिक और हिन्दू देवता हनुमान का अनादर करता तो कभी हनुमान चालीसा गाकर सुनाता। कभी अजान गाते सुना गया, तो कभी जीसस क्राइस्ट की आरती गाता।

इस तरह से खड्ग सिंह ने राजनीति में ध्रुवीकरण को एक नई ऊँचाई दे डाली हैं। सुल्तान अब खड्ग सिंह के अस्तबल में सिर्फ इस उम्मीद में बँधा है कि उसे कोई और अस्तबल फिलहाल नजर नहीं आ रहा। सुल्तान का बाबा भारती खुद कहीं रास्ता भटक गया है। तब तक दिल्ली को यह सब देखते रहना होगा। लेकिन इससे अन्य राज्य सबक जरूर ले सकते हैं।

लेकिन, अब कल के दिन अगर कोई निस्वार्थ सेवा भाव के नाम पर बदलाव के लिए नई वाली राजनीति जैसे जुमले गाकर आना भी चाहेगा, तो वह कभी सफल नहीं हो पाएगा। जनता उसे भी दूसरा खड्ग सिंह सोचती रहेगी। दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित के घोटालों की 370 पन्नों वाली फ़ाइल, जो आज तक सामने नहीं आ सकी, जेएनयू से जुड़े मामलों पर कार्रवाई का मामला, सपनों का जन लोकपाल, CCTV, शिक्षा… ये सब मुद्दे आज भी उसी जंतर-मंतर पर खड़े हैं, जहाँ से डाकू खड्ग सिंह सुल्तान को लेने चला था। हमारे देश में राजनीतिज्ञों को बड़ी-बड़ी उपलब्धियाँ हासिल हैं। लेकिन खड्ग सिंह की इस उपलब्धि के आगे सब बौने ही नजर आते हैं।

बाबा भारती आज भी यही कह रहे हैं – “मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। वरना…”

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पथराव के बाद जान बचाकर भागे कन्हैया कुमार: शिवसैनिकों सहित 3 गिरफ्तार, 30 पर FIR

जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष रहे सीपीआई नेता कन्हैया कुमार पर हमले के सिलसिले में शिवसेना के दो पदाधिकारी सहित तीन लोग गिरफ्तार किए गए हैं। 30 लोगों पर एफआईआर हुई है। बिहार के आरा में हुए पथराव के बाद कन्हैया कुमार को जान बचाकर भागना पड़ा था। इस दौरान उनके काफिले में शामिल वाहनों ने कई लोगों को कुचल दिया था।

गौरतलब है कि बीते करीब दो हफ्तों में कन्हैया कुमार पर बिहार में आठ बार हमले हो चुके हैं। ‘जन-गण-मन यात्रा’ पर निकले कन्हैया जहॉं भी जा रहे हैं वहीं उन्हें विरोध का सामना करना पड़ रहा है। यह यात्रा 30 जनवरी को शुरू हुई थी। शुक्रवार (फरवरी 14, 2020) को उनके काफिले पर हमला तब हुआ था जब वह आरा के रमना मैदान जा रहे थे। इसी दौरान स्थानीय लोगों ने काफिले पर हमला कर दिया। हमले में कई वाहन क्षतिग्रस्त भी हो गए थे।

इस सिलसिले बिहार पुलिस ने शिवसेना के पदाधिकारियों सहित 3 लोगों को गिरफ्तार किया है। 30 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। शिवसेना के पदाधिकारियों ने पुलिस पर एकतरफा कार्रवाई का आरोप लगाया है। पुलिस ने शिवसेना के महासचिव विक्रमादित्य और संजय गुप्ता को गिरफ्तार किया है। अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी में पुलिस रात-दिन छापेमारी में लगी हुई है। वहीं कन्हैया के काफिले से कुचलकर घायल हुए शिवसेना कार्यकर्ता सनी तिवारी का इलाज चल रहा है।

कन्हैया के काफिले पर हमले में कई लोग घायल और वाहन क्षतिग्रस्त हो गए थे। आरोप है कि कन्हैया के कार्यक्रम स्थल पहुँचने से पहले मंच को आग के हवाले करने की भी कोशिश की गई थी।

कन्हैया इस यात्रा के तहत अब तक करीब 10 शहरों में जा चुके हैं। यह यात्रा एक महीने तक चलने वाली है। कन्हैया कुमार को लगातार भारी विरोध का सामना करना पड़ा रहा है। विरोध भी कुछ इस तरह कि लोग कन्हैया पर अंडे, मोबिल और पत्थर तक फेंक रहे हैं। उन पर मोतिहारी, सुपौल, कटिहार, सीवान, मधेपुरा, गोपालगंज, जमुई, गया और सारण सहित कई स्थानों पर हमला हो चुका है। विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि वह देशद्रोही हैं, उनसे देश के लिए बेहतरी की उम्मीद नहीं की जा सकती।

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हर दूसरे दिन पिट रहे हैं कन्हैया कुमार, जूता-चप्पल, अंडा, मोबिल, पत्थर… सब बरसा रहे बिहारी

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जामिया के लाइब्रेरी में पहले घुसे नकाबपोश, पीछे से आई पुलिस: नए वीडियो से बेनकाब हुआ प्रपंच

सोशल मीडिया में जामिया मिल्लिया इस्लामिया का एक वीडियो जारी किया गया। जिसे गिरोह विशेष ने वायरल किया। तथाकथित लिबरल पत्रकारों ने इस वीडियो के सहारे न सिर्फ़ दिल्ली पुलिस को क्रूर और अत्याचारी साबित करने का झूठा प्रयास किया, बल्कि जामिया नगर के दंगाइयों को भी पाक-साफ़ बताने की कोशिश की। बता दें कि बीते जनवरी में जामिया में भड़की हिंसा में सैकड़ों वाहनों को फूँक डाला गया था, जिनमें सरकारी बसें भी शामिल थीं। इसके बाद पुलिस को यूनिवर्सिटी के अंदर घुस कर सीएए विरोध के नाम पर दंगा कर रहे उपद्रवियों को खदेड़ना पड़ा था।

अब जामिया लाइब्रेरी में पुलिस और उपद्रवियों के बीच संघर्ष का नया वीडियो सामने आया है। ‘न्यूज़ नेशन’ के अनुसार, उपद्रवी नकाबपोश पहले लाइब्रेरी में घुसे, उसके बाद पुलिस उन्हें खदेड़ते हुए आई। ऐसा नहीं है कि पुलिस ने यूँ ही किसी पर कार्रवाई कर दी। पुलिस ने उपद्रवियों को चिह्नित कर एक्शन लिया। नए वीडियो में देखा जा सकता है कि लाइब्रेरी के दरवाजे पर एक व्यक्ति खड़ा है, जो भाग कर आ रहे नकाबपोशों को अंदर घुसा रहा है। स्पष्ट है कि ये सारे उपद्रवी लाइब्रेरी में बैठ कर पढ़ाई करने का नाटक करने लगे।

देखें जामिया लाइब्रेरी में हुई घटना का सच (वीडियो साभार: न्यूज़ नेशन)

सहानुभूति पाने के लिए जामिया के छात्रों ने मीडिया के एक वर्ग के साथ मिल कर दिल्ली पुलिस को बदनाम करने के लिए वीडियो जारी किया था। ऑपइंडिया ने भी एक वीडियो के जरिए बताया था कि कैसे नकाब पहने छात्र बिना किताबें लिए बैठे हुए थे। जैसे ही पुलिस आती है, वो किताबें पढ़ने का नाटक करने लगते हैं। तमाम ड्रामा के बावजूद पुलिस उन्हें पहचान लेती है और एक्शन लेती है। साफ़ है कि दंगाइयों को बचाने के लिए दिल्ली पुलिस को बदनाम किया जा रहा, क्योंकि वो केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है।

इस संबंध में हमने कई सवाल भी पूछे थे। जामिया का ये वीडियो हिंसा के 60 दिनों बाद क्यों रिलीज किया गया? इतने दिन तक इन्तजार क्यों? उपद्रवी छात्रों और गिरोह विशेष के बीच क्या सेटिंग चल रही थी? वीडियो को काट-छाँट कर क्यों जारी किया गया? पूरा वीडियो आने से उपद्रवी छात्रों की पोल खुल जाती, क्या इसलिए वीडियो को अपने हिसाब से काट कर पेश किया गया? जामिया का प्रशासन और छात्र पुलिस की जाँच में सहयोग क्यों नहीं कर रहे हैं? सीसीटीवी फुटेज में ऐसा क्या था कि इसे पुलिस को नहीं दिया गया?

ये वीडियो किसने जारी किया? पुलिस ने तो नहीं किया है। फिर जामिया के छात्रों ने किया? या फिर गिरोह विशेष ने? अब नए वीडियो से सारा ‘खेल’ सामने आ रहा है। उपद्रवियों को बचाने के लिए ‘छात्रों पर पुलिसिया क्रूरता’ का ड्रामा रचा जा रहा है ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की छवि बदनाम की जा सके। उधर जामिया मिल्लिया इस्लामिया प्रशासन ने वीडियो जारी करने की बात नकार दी है। यूनिवर्सिटी ने कहा कि उसने कोई सीसीटीवी फुटेज जारी नहीं किया है।

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