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मिनी स्कर्ट पहनो, शराब पिओ और अप्राकृतिक संबंध बनाओ! बीवी के इनकार पर इमरान ने दिया तीन तलाक

देश में एक ओर जहाँ तीन तलाक पर कानून बनने के बाद भी कट्टरपंथी उस पर बहस रोकने को तैयार नहीं हैं, वहीं, दूसरी ओर इससे जुड़े मामले भी कम होने का नाम नहीं ले रहे। वैसे तो विभिन्न कारणों से मुस्लिम महिलाओं के तीन तलाक पीड़िताओं में तब्दील होने के बहुत से उदाहरण हैं मगर बिहार के पटना का मामला थोड़ा अलग है। यहाँ पर नूरी फातमा नाम की महिला को उसके शौहर ने सिर्फ़ इसलिए तलाक दे दिया क्योंकि उसने मॉर्डन बनने और शराब पीने से मना कर दिया था। तलाक के बाद महिला अब इंसाफ माँगने के लिए जारी अपनी जंग के तहत बिहार राज्‍य महिला आयोग पहुँची।

गौरतलब है कि ये मामला पिछले साल अक्टूबर का है। जब फातमा ने अपने और इमरान के रिश्ते के बारे में बताते हुए शिकायत की थी। उसने बताया था कि उसका निकाह इमरान मुस्तफा से 2015 में हुआ था। इसके बाद दोनों दिल्ली शिफ्ट हो गए थे। लेकिन यहाँ आने के कुछ दिन बाद मुस्तफा, नूरी को मॉडर्न लड़कियों की तरह रहने के लिए कहने लगा, वो चाहता था कि नूरी छोटे कपड़े पहने, नाइट पार्टी में जाएँ, और शराब पिए। लेकिन जब उसने ऐसा करने से मना किया तो वो उसे हर रोज मारने लगा। इस दौरान उसका गर्भपात भी हुआ। मगर इमरान को कोई फर्क नहीं पड़ा। उसने पिछले साल एक सितंबर को नूरी के साथ अप्राकृतिक संबंध बनाने की कोशिश भी की थी, जिसका महिला ने विरोध किया था।

महिला ने अपनी शिकायत में इमरान पर आरोप लगाया, “कई सालों तक मुझ पर अत्याचार करने के बाद, कुछ दिन पहले उसने मुझे उसका घर छोड़ने को कहा। लेकिन जब मैंने मना किया, तो उसने मुझे तीन तलाक दे दिया।”

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, तीन तलाक के बाद से नूरी इंसाफ के लिए थाना से महिला आयोग तक दर-दर की ठोकरें खा रही हैं। उसने अपने शौहर इमरान के खिलाफ दिल्ली के शाहीन बाग में एफआइआर (FIR) दर्ज करवा दी है। साथ ही उसने बिहार राज्‍य महिला आयोग में भी शिकायत की थी। मगर, इमरान सुनवाई की तिथि पर बिहार महिला आयोग नहीं पहुँचा। अब महिला आयोग ने सुनवाई की अगली तिथि मार्च में रखी है। आयोग की अध्यक्ष दिलमणी मिश्र इस मामले को गंभीर बताते हुए कहती हैं कि इसमें नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

9 साल पहले कॉन्ग्रेस सरकार में हुई बच्चे की मौत, मीडिया गिरोह ने उदाहरण देकर फैलाया प्रोपेगेंडा

नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन पर बैठे लोगों की मंशा जगजाहिर होने के बाद मीडिया गिरोह अब इनके बचाव में खुल कर उतर गया है। सोशल मीडिया पर मोदी सरकार के प्रति प्रोपगेंडा साधने के लिए झूठी अफवाहें खुलेआम फैलाई जा रही हैं और बड़े-बड़े मीडिया संस्थान अपने अजेंडे के लिए इसका उपयोग भी कर रहे हैं। क्योंकि, यहाँ उनका मकसद कुछ भी करके मोदी सरकार को और उनके समर्थकों को सवालों के घेरे में घेरना है। इसी तरह की कोशिश वामपंथी मीडिया की स्तंभकार डॉ नजमा ने की है।

दरअसल, अभी दो दिन पहले शाहीन बाग प्रदर्शन के कारण एक नवजात की मौत की खबर आई। जिसे देखकर काफी लोग आहत हुए। मगर बच्ची की माँ ने इस पर सामान्य प्रतिक्रिया दी। जिसे सुनने के बाद काफी लोगों ने उसकी आलोचना की और एक सामान्य व्यक्ति की तरह ऑपइंडिया अंग्रेजी की संपादक नुपुर शर्मा ने भी उस पर ट्वीट किया। उन्होंने पूछा कि आखिर वो कैसी माँ है, जो अपने बच्चे की जान जाने के बाद भी सामान्य है। उन्होंने कहा कि वो इस घटना को सुनने के बाद अवाक हो चुकी हैं।

अब इस ट्वीट पर डॉ नजमा नामक ‘बुद्धिजीवी’ ने रिप्लाई किया। उन्होंने ऑपइंडिया संपादक के प्रति कुँठा निकालने के लिए लिखा,” नुपुर तुम तो तब भी चुप थी जब 2 महीने का नजरूल इस्लाम पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधा न पाने के कारण असम के डिटेंशन सेंटर में मर गया था। तुम्हें बच्चे के मरने की फिक्र नहीं है, तुम्हें सिर्फ़ उस कारण से मतलब है, जिसके कारण बच्चे की मौत हुई।”

अब हालाँकि, इससे पहले ऑपइंडिया संपादक डॉ नज़मा के आरोपों पर कोई रिप्लाई करतीं, एक यूजर ने आकर डॉ नजमा के प्रोपेगेंडे को वहीं ध्वस्त कर दिया। स्पैमिंदर भारती नामक यूजर ने डॉ नजमा के ट्वीट का जवाब देते हुए लिखा, “जिस वाकये के बारे में आप बात कर रही हो, वो साल 2011 का है। 9 साल पहले का। जब केंद्र और असम दोनों में कॉन्ग्रेस सरकार थी। मगर उस समय तुमने बोलना जरूरी नहीं समझा और इतने वक्त तक चुप रहीं। अब तुम अपना पॉलिटिकल प्रोपेगेंडा साधने के लिए बच्चे की मौत से जुड़े मामले को 9 साल बाद इस्तेमाल कर रही हो, इससे तुम्हारे बारे बहुत कुछ पता चलता है।”

यहाँ बता दें कि डॉ नजमा के ट्विटर अकॉउंट के अनुसार वो द स्क्रॉल, हिंदू, टीएनएम जैसे बड़े वामपंथी मीडिया संस्थानों की स्तंभकार हैं। जहाँ बतौर ‘बुद्धिजीवी’ अक्सर उनके विचार प्रकाशित होते हैं। मगर, ये शर्म की बात है कि ऑपइंडिया संपादक को घेरने के लिए और प्रदर्शन के बचाव में वो शाहीन बाग के बच्चे की मौत को जस्टिफाई करने पर उतरती हैं और एक 9 साल पुराना केस का उल्लेख करके ये साबित करने की कोशिश करती हैं कि शाहीन बाग में बच्चे की मौत एक कारण से हुई।

दरअसल, इस मामले के संबंध में डॉ नजमा ने एक ट्वीट किया था। जिससे उनकी ‘सेकुलर’ छवि का भी पता चला और ये भी मालूम चला कि वामपंथी मीडिया के लिए लिखते-लिखते वे कितनी कुतर्की बन चुकी हैं। जो इस पूरी घटना में महिला को उसकी जाति पर और बच्चे की मौत को एक परंपरा के रूप में आँकती हैं।

वो एक यूजर के ट्वीट का जवाब देते हुए बच्चे की मौत पर लिखती हैं, “उसका सरनेम चौधरी है। जो कि अधिकतर जाट होते हैं। हैरानी नहीं है कि अगर वो अपने बच्चों की मौत पर इतने आराम से बोल रही है। क्योंकि कन्या भ्रूण हत्या इनकी परंपरा है।” हालाँकि यह जानना भी जरूरी है कि अपना बेवकूफी भरा ये ट्वीट डॉ नजमा डिलीट कर चुकी हैं। लेकिन यूजर ने उनके इस ट्वीट का स्क्रीनशॉट लेकर उनके नाम के आगे लगे ‘डॉ’ उपाधि पर सवाल उठाए हैं।

‘कश्मीरी पंडितों के पलायन के लिए मुस्लिम जिम्मेदार नहीं, फ़िल्म पर लगे रोक… वरना पूरे देश में सांप्रदायिक सौहार्द बिगड़ेगा’

कश्मीरी पंडितों के विस्थापन पर बनी फ़िल्म शिकारा रिलीज होने से पहले ही विवादों में घिरती जा रही है। फ़िल्म की रिलीज पर रोक लगाने के लिए जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई है। इसमें कहा गया है कि शिकारा फ़िल्म में कश्मीरी पंडितों के लिए पलायन के लिए एक समुदाय को जिम्मेदार ठहराया गया है, जबकि हक़ीकत में ऐसा नहीं है। इसलिए इस फिल्म को रिलीज होने से रोक दिया जाए। यह फ़िल्म 7 फरवरी को रिलीज हो रही है।

हाईकोर्ट में याचिका दायर करने वालों में राजनीतिक विश्लेषक मिसगर इफ्तिखार, कश्मीरी पत्रकार माजिद हैदरी और एक स्थानीय वकील इरफान हफीज लोन प्रमुख रूप से शामिल हैं। याचिका में कहा गया है कि फिल्म का ट्रेलर देखने से पता चलता है कि इसमें कश्मीरी पंडितों के घाटी से पलायन के लिए कश्मीरी कट्टरपंथियों को जिम्मेदार बताया गया है। जबकि सच्चाई यह नहीं है। इस फिल्म के जरिए दो समुदायों में नफरत फैलाने की कोशिश हो रही है। ऐसे समय में यह फ़िल्म पूरे देश के माहौल को ख़राब कर सकती है।

मिसगर इफ्तिखार का कहना है कि हमने कई बार इस फिल्म के ट्रेलर देखे और और पाया कि उसमें दिखाए गए कंटेंट आपत्तिजनक हैं। फिल्म रिलीज करने का समय भी सही नहीं है। इफ्तिखार ने कहा कि हम नहीं चाहते कि किसी कौम के बीच दरार पैदा हो। अभी तक बहुत कुछ देख चुके हैं और आगे नहीं देखना चाहते। उन्होंने कहा, “कश्मीरी पंडित हमारे भाई हैं, हम चाहते हैं कि वो वापस अपने घरों में आएँ। हम उनके साथ हैं।”

इससे पहले 30 जनवरी को 30 मिनट की विशेष स्क्रीनिंग के दौरान शिकारा फ़िल्म के निर्माता विधु विनोद चोपड़ा ने कहा था कि कश्मीरी पंडितों के पलायन पर बनी इस फ़िल्म का मकसद किसी भी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है। बल्कि यह फ़िल्म दिखाती है कि कश्मीरी पंडितों ने किस तरह त्रासदी का डट कर सामना किया है। उन्होंने यह भी कहा थी कि जनवरी 1990 में कश्मीरी पंडितों के साथ हुई रूह कँपा देने वाली बर्बरता से हम सब वाकिफ हैं।

चोपड़ा ने पत्रकारों से कहा था, “हमारे घर छीन लिए गए थे। यह ऐसी चीज है, जिसको लेकर हमारा रुख अडिग है। इस कहानी को बयाँ करने के लिए हिम्मत चाहिए और वह भी ऐसे अंदाज में बयाँ करने के लिए कि लोग इसे देखने आएँ। दरअसल कश्मीरी पंडितों के पलायन पर बनी फ़िल्म शिकारा 7 फरवरी को रिलीज हो रही है।

वहीं कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचारों के 30 वर्ष पूरे होने पर कश्मीरी पंडितों ने “हम वापस आएँगे” हैश टेग चलाया था, जोकि पूरे दिन ट्विटर पर ट्रेंड करता रहा।

बता दें कि इससे पहले कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद वहाँ के हालातों को संभालने के लिए सरकार को कश्मीर में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच लंबे समय तक इंटरनेट पर पाबंदी लगानी पड़ी थी। वहीं इसके बाद सरकार द्वारा लागू किए गए सीएए को लेकर देश के कई हिस्सों में आज भी विरोध-प्रदर्शन की आड़ में उपद्रव हो रहा है।

शिकारा: कश्मीरी पंडितों की कहानी के वो हिस्से जो अब तक छुपाए गए हैं!

कश्मीरी पंडितों पर हुए अत्याचारों के तीस साल: ट्रेंड कर रहा ‘हम वापस आएँगे’

AAP नेता ने किया ट्वीट डिलीट… मतलब पक्का हो गया – कपिल गुर्जर की हकीकत पर फँस चुकी है पार्टी

सोशल मीडिया पर शाहीन बाग में गोली चलाने वाले कपिल गुर्जर के राजनैतिक बैकग्राउंड का खुलासा होने के बाद आम आदमी पार्टी की बहुत फजीहत हो रही है। पार्टी के जो नेता कल तक ऐसी अप्रिय घटनाओं के लिए भाजपा को दोषी ठहरा रहे थे, मोदी-शाह पर ऊँगली उठा रहे थे वो अब खुद अपने ट्वीट डिलीट करते घूम रहे हैं।

जी हाँ। सोमवार (फरवरी 4, 2020) को क्राइम ब्रांच के खुलासे के बाद आम आदमी पार्टी के नेता कुलदीप कुमार ने बिना किसी सफाई के अपना वो ट्वीट डिलीट कर दिया, जिसमें उनकी पार्टी के दिग्गज नेता कपिल गुर्जर के साथ दिखाई दे रहे थे और जो प्रमाण था कि वाकई कपिल ने साल 2019 में आम आदमी पार्टी ज्वाइन की थी।

डिलीट किए पोस्ट को कुलदीप कुमार ने पिछले साल 14 मई को ट्वीट किया था। उन्होंने अपने ट्वीट में बताया था कि पार्टी के मुख्यालय में कॉन्ग्रेस और बसपा छोड़ कई नेताओं ने राज्यसभा सांसद संजय आजाद और आतिशी मार्लेना के हाथों टोपी व पटका पहन आम आदमी पार्टी ज्वाइन की। इसके अलावा अपने ट्वीट में उन्होंने कपिल गुर्जर के पिता गजे सिंह का नाम भी मुख्य रूप से लिखा था। उन्होंने अपने डिलीट किए ट्वीट में लिखा था कि मुख्य रूप से उनकी पार्टी में पटपड़गंज जिले के बसपा अध्यक्ष गजे सिंह एवं पूर्व ईडीएमसी सचिव मदन मोहन और प्रदीप हांडले शामिल हुए।

अब हालाँकि, दिल्ली विधानसभा चुनावों के मद्देनजर पार्टियों के बीच बिना निराधार आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला आम हो चुका है। लेकिन कपिल गुर्जर की सच्चाई का खुलासा होने के बाद कुलदीप कुमार द्वारा डिलीट किया गया उनका ये ट्वीट उनकी पार्टी की मंशा पर सवाल उठाता है और बताता है कि क्राइम ब्रांच द्वारा दिए गए सभी सबूत सही हैं। कपिल गुर्जर ने और उनके पिता ने आम आदमी पार्टी की सदस्यता ली थी। वो भी चोरी छिपे नहीं। बल्कि आतिशी मार्लेना और संजय सिंह जैसे नेताओं की मौजूदगी में।

मैं हूँ आम आदमी: AAP का नेता निकला शाहीन बाग में गोली चलाने वाला कपिल गुर्जर

कपिल गुर्जर को सम्मानित करने वाले संजय सिंह ने शाहीन बाग फायरिंग के लिए शाह को ठहराया था जिम्मेदार

कपिल गुर्जर को सम्मानित करने वाले संजय सिंह ने शाहीन बाग फायरिंग के लिए शाह को ठहराया था जिम्मेदार

आम आदमी पार्टी ने जिन आरोपों को दूसरों पर खुलेआम लगाया था अब उन आरोपों में केजरीवाल की पार्टी खुद फँसती हुई नज़र आ रही है, क्योंकि अब यह पता चला है कि 1 फरवरी को शाहीन बाग में जिस कपिल गुर्जर ने यह घोषणा करते हुए हवा में तीन फायर किए थे कि, यह हिंदुस्तान है यहाँ केवल हिंदुओं की ही चलेगी। दरअसल वह कपिल आप आदमी पार्टी का नेता था, 2019 के शुरुआत में ही वह अपने पिता के आम आदमी पार्टी से जुड़ गया था।

दिल्ली पुलिस द्वारा किया गया यह खुलासा आम आदमी पार्टी को शर्मिंदा करने के लिए पर्याप्त है। इससे पहले शाहीन बाग में हुई फायरिंग की घटना के तुरंत बाग आप नेता संजय सिंह ने आरोप लगाते हुए कहा था कि, यह सब बीजेपी की चाल है। संजय सिंह ने शाहीन बाग की घटना के बाद बीजेपी पर हमला बोलते हुए कहा था कि बीजेपी विधानसभा चुनावों को स्थगित कराने के लिए दिल्ली में शांति भंग करना चाहती है।

इसके बाद मंगलवार को दिल्ली क्राइम ब्रांच को जाँच के दौरान कपिल गुर्जर के मोबाइल फोन से कुछ तस्वीरें मिलीं। जिनको दिल्ली पुलिस ने साझा किया है। इन तस्वीरों में कपिल गुर्जर को आप नेता आतिशी और संजय सिंह के साथ देखा जा सकता है। वहीं तस्वीरों में आप नेता आतिशी, संजय सिंह और दिल्ली के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया कपिल गुर्जर और उनके पिता का स्वागत करते हुए दिखाई दे रहे हैं। कपिल ने पुलिस पूछताछ में स्वीकार किया है कि उसने और उसके पिता ने राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए पिछले वर्ष 2019 के शुरुआत में ही आम आदमी पार्टी में शामिल हो गए थे।

वहीं इससे पहले संजय सिंह ने इस घटना पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए हुए चुनाव आयोग को पहले ही चेतावनी दे दी थी कि भाजपा द्वारा चुनाव स्थगित करने के लिए एक साजिश रची जा रही है। राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा था, ‘मैंने पहले ही आगाह कर दिया था कि भाजपा दिल्ली में चुनाव टालने के लिए शांति भंग करने की साजिश रच रही है। उन्हें पता है कि वे हार जाएँगे। 2015 के दिल्ली चुनावों से पहले भी उन्होंने ऐसा ही करने की कोशिश की थी।

तब संजय सिंह ने सरकार पर सवाल खड़ा करते हुए कहा था, “यह कैसे संभव है कि देश की राजधानी में एक अकेला व्यक्ति आसानी से गोली चला रहा है और खुलेआम हथियार लहरा रहा है?” दिल्ली की कानून व्यवस्था के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ज़िम्मेदार हैं, लेकिन वे हम पर आरोप लगाकर हमें बेहजह परेशान करने की कोशिश कर रहे हैं।

दरअसल 1 फरवरी को कपिल गुर्जर नाम के एक व्यक्ति ने शाहीन बाग में सीएए के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शन के करीब पहुँचकर तीन हवाई फायर किए थे। इसके बाद वहाँ तैनात पुलिस कर्मियों ने आरोपित को तत्काल हिरासत में ले लिया था। पुलिस हिरासत में लिए जाने के बाद आरोपित ने कहा था कि हमारे देश में केवल हिंदुओं की चलेगी और किसी की नहीं। इस घटना पर शीघ्र ही प्रतिक्रिया देते हुए आप नेता संजय सिंह ने केन्द्र की बीजेपी सरकार को इसके लिए दोषी ठहराया था।

अब इस खुलासे के बाद साफ़ हो गया है कि कपिल गुर्जर कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है बल्कि आम आदमी पार्टी का ही एक नेता है और शाहीन बाग विरोध प्रदर्शन की साजिश के पीछे आम आदमी पार्टी की ही एक महत्वपूर्ण भूमिका भी नजर आ रही है।

‘Times Now’ के दिल्ली में AAP की जीत की भविष्यवाणी के बावजूद, इन वजहों से वो अभी भी चुनाव हार सकते हैं

सभी राजनीतिक दलों के समर्थकों के बीच, सोशल मीडिया पर भाजपा के समर्थक ही ओपिनियन पोल को गंभीरता से लेते हैं, शायद उनसे भी ज्यादा गंभीरता से, जो लोग ऐसे सर्वे करवाते हैं। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि ऐसे समर्थकों में से अधिकांश ‘माहौल’ से अधिक ‘डेटा’ पर भरोसा करते हैं- यही वजह है कि जब भी विपक्ष द्वारा हेटक्राइम, जय श्री राम, आदि नैरेटिव्स तैयार किए जाते हैं, तो वे डेटा माँगते नजर आते हैं। जनमत सर्वेक्षण डेटा यानी आँकड़ों से संबंधित होते हैं, और इसी कारण भाजपा समर्थकों को इसे नकारना थोड़ा मुश्किल हो जाता है, क्योंकि यह उनके सामान्य भावनाओं के खिलाफ जाता है।

हालाँकि, ‘टाइम्स नाउ‘ द्वारा करवाए गए हालिया सर्वेक्षण ने भाजपा समर्थकों का मनोबल गिराने का काम किया है। टाइम्स नाउ ने दावा किया है कि यह सर्वे जनवरी 27, 2020 और फरवरी 01, 2019 के बीच किया गया था, यानी कि ऐसी अवधि के दौरान जब कि भाजपा को बढ़त बनाते हुए देखा गया। यह पोल सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी को मतदान का 52% हिस्सा देने की बात कहता है, जिसका अर्थ है कि आम आदमी पार्टी की दिल्ली विधानसभा की कुल 70 सीटों में से 60 से अधिक सीटों पर विजय होगी।

आश्चर्य की बात है कि यही ओपिनियन पोल कहता है कि 52% मतदाता शाहीन बाग़ में चल रहे CAA-विरोधियों के भी विरोध में हैं। गौरतलब है कि यही शाहीन बाग़ भाजपा ने विधानसभा चुनाव में प्रमुख मुद्दा बना रखा है। यही ओपिनियन पोल यह भी कहता है कि अगर दिल्ली में इसी समय लोकसभा चुनाव भी करवाए जाएँ तो भाजपा दिल्ली में सभी सीटों पर विजयी रहेगी। यह कितना भी विवादस्पद क्यों न लगे, लेकिन यह वास्तविकता है कि लोग विधानसभा और आम चुनावों में अलग-अलग मुद्दों पर मतदान करते हैं।

तो क्या इसका आशय यह है कि बीजेपी के दिल्ली विधानसभा चुनाव जीतने की संभावना नहीं है? मुझे नहीं लगता है कि इस निष्कर्ष को ही आखिरी मान लिया जाना चाहिए। इसके पीछे पाँच मुख्य कारण ये हैं –

पहला कारण स्वाभाविक है: ओपिनियन पोल ब्रह्म वाक्य नहीं होता

वर्ष 2015 के चुनाव में कोई भी ओपिनियन पोल आम आदमी पार्टी की इतनी बड़ी जीत की भविष्यवाणी नहीं कर पाया था। बावजूद इसके, आम आदमी पार्टी के खाते में 70 में से 67 सीटें आईं। उस समय आधे से ज्यादा पोल भाजपा को बहुमत से विजयी मानकर चल रहे थे। ओपिनयन पोल के माध्यम से मतदातों का सटीक आँकलन कठिन होता है। फिर, भाजपा अपने बूथ प्रबंधन के मामले में कहीं ज्यादा परिपक्व है। जबकि आम आदमी पार्टी के पास ‘वॉलंटियर्स’ तक की भी कमी है।

‘मोदी फ़ॉर PM, केजरी फॉर CM’ शायद पिछली बार जितना प्रभावी न हो

केजरीवाल और उनकी पार्टी ने ‘मोदी फ़ॉर PM, केजरी फॉर CM’ का नारा पिछले चुनावों में वोट माँगने के लिए इस्तेमाल किया था, लेकिन फजीहत होने के बाद यह बैनर हटा दिए गए थे। टाइम्स नाउ द्वारा चलाए गए ओपिनियन पोल की बात मानें तो यही निष्कर्ष निकलता है कि मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा अभी भी मोदी को ही केंद्र में देखना चाहता है। और अगर इसी ओपिनियन पोल की मानें तो आज यह नारा इसलिए भी प्रभावी नहीं रह गया है क्योंकि 2015 में जीतने के बाद, केजरीवाल ने कभी भी मोदी पर हमला करने का कोई भी अवसर नहीं खोया है।

वह पूरी तरह से अलग केजरीवाल थे, जिसे लोगों ने 2015 से पहले देखा था, जिसने 2014 के लोकसभा चुनावों में सीधे मोदी के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, फिर भी मोदी को ‘कायर और मनोरोगी’ कहने जैसे ध्रुवीकरणों का इस्तेमाल नहीं किया था। इस तरह के सम्बोधन नोटबंदी के बाद और भी बदतर होते गए। भारत-पाक तनाव के दौरान भी पाकिस्तान में केजरीवाल के समर्थन में हैशटैग चलाए गए। लगता नहीं है कि लोग यह सब भूलेंगे।

केजरीवाल मोदी नहीं है

मीडिया और ओपिनियन पोल करने वालों के इस बात को मानने के पीछे कि AAP वर्ष 2015 के चुनाव परिणामों को दोहराने वाली है, यह कारण है कि मोदी इस चुनाव में वर्ष 2014 से भी बेहतर प्रदर्शन को दोहरा सकते हैं।
ओपिनियन पोल करने वालों में से कई लोग वास्तव में मानते हैं कि केजरीवाल मोदी की तरह हैं और इस तरह उन्हें विश्वास है कि केजरीवाल 2020 में वही दोहराएँगे जो कि मोदी ने 2019 में दोहरा चुके हैं।

यह कोई रहस्य नहीं है कि मीडिया का एक बड़ा वर्ग केजरीवाल से प्यार करता है। पिछले चुनावों के दौरान, NDTV के रवीश कुमार ने एक ब्लॉग लिखा था, जिसमें लगभग यही तर्क दिया गया था कि केजरीवाल को लोकतंत्र में आशा को जीवित रखने के लिए जीतना चाहिए। केजरीवाल ने जीत हासिल की और लोकतंत्र फिर स्थापित हो गया, जो कि मोदी के चुनाव जीतने पर मर जाता है।

इसके अलावा, केजरीवाल वामपंथी इकोसिस्टम के भी चहेते हैं। हालाँकि, केजरीवाल गोवा और पंजाब को जीतने में विफल रहे, और इस इकोसिस्टम का मोह भंग हो गया और कुछ ने तो अपने संरक्षक कॉन्ग्रेस में वापस जाने का फैसला भी किया। इसके बाद वो सब राफेल घोटाले के कोरस में शामिल हो गए, जबकि अन्य लोग तब भी मोदी का विकल्प JNU के छात्रों, जिग्नेश मेवानी, हार्दिक पटेल और यहाँ तक कि ममता बनर्जी जैसों में ढूँढने लगे।

2019 के लोकसभा चुनाव के फैसले के बाद, इकोसिस्टम ने 2014 के परिणामों के बाद जो कुछ भी किया था उसे ही दोहरा रहा है। केजरीवाल पर विश्वास होना उसी रिपीट मोड में होने का हिस्सा है। और उनके पास यह मानने के कारण हैं कि दिल्ली में केजरीवाल की वही छवि है जो राष्ट्रीय स्तर पर मोदी की छवि है। दोनों ने ही निम्न वर्गों तक वह पहुँचाया है, जो कि उनके लिए मायने रखता है। अगर मोदी ने उन्हें गैस सिलेंडर, बिजली, मकान आदि दिए, तो केजरीवाल ने कम से कम पानी और बिजली “मुफ्त” दी।

जिस समय पत्रकार मनगढ़ंत राफेल घोटालों की आढ़ में सपने देख रहा था, उस समय मोदी जमीनी स्तर पर लोगों का समर्थन जीत रहे थे। केजरीवाल भी इसी तरह अपनी ‘मुफ्त’ बिजली और पानी के कारण जमीनी स्तर पर समर्थन ले सकते थे। लेकिन वास्तविकता यही है कि केजरीवाल मोदी नहीं है।

राफेल घोटाला काल्पनिक था, लेकिन केजरीवाल अपने किए हुए बड़े-बड़े वादों को निभाने में वास्तव में असफल रहे हैं। भाजपा उन असफलताओं को प्रकाश में लाने का प्रयास कर रही है और अमित शाह खुद मैदान में आ चुके हैं। मोदी अपने ऊपर लगने वाले आरोपों में उलझकर विरोधियों के नेरेटिव्स में नहीं उलझते हैं, जबकि केजरीवाल को अमित शाह ने फंसा लिया है और वो अपनी असफलताओं के बारे में बात करने पर मजबूर है।

दिल्ली भारत नहीं है

केजरीवाल के मोदी नहीं होने के अलावा, अन्य अंतर यह है कि दिल्ली भारत नहीं है। यह एक ऐसा क्षेत्र है जो भारत में अन्य स्थानों की तुलना में ‘माहौल’ से अधिक आसानी से प्रभावित होता है, शायद इस क्षेत्र पर मुख्यधारा के मीडिया के कारण यह प्रभाव है।

AAP का उदय, जिसे कि यह पार्टी देश में कहीं और नहीं दोहरा पाई, उस सिद्धांत के लिए एक तरह से वसीयतनामा है। यही कारण है कि मोदी ने 2019 के चुनाव में जो दोहराया है, उस प्रदर्शन की सीधी तुलना 2020 में केजरीवाल के प्रदर्शन के साथ नहीं हो सकती है।

ऐसी खबरें हैं कि भाजपा के स्वयंसेवकों को चुनावों से पहले दिल्ली में झुग्गियों में समय बिताने के लिए कहा गया है। उन्हें वहाँ केवल ‘शाहीन बाग’ पर बात नहीं करनी चाहिए, बल्कि उन्हें यह भी समझाना चाहिए कि कैसे ‘मुफ्त’ वास्तव में मुफ्त नहीं है और इस तरह के अन्य मुद्दों पर भी बात करनी चाहिए।

आखिरी ओवर में नरेंद्र मोदी की रैलियाँ

नरेंद्र मोदी की रैलियाँ होने वाली हैं, जो कि अपने आप में सबसे बड़ा कारण है।

नोट: राहुल रौशन द्वारा मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे इस लेख का अनुवाद आशीष नौटियाल ने किया है।

‘सिंहगढ़ युद्द’ के 350 साल: जब ‘तानाजी’ के साथ एक छिपकली भी हुई थी वीरगति को प्राप्त

1600 ई. में कोंढाणा किले पर भगवा ध्वज फहराने के लिए मराठाओं द्वारा लिखी गई ‘सिंहगढ़ युद्ध’ की विजयगाथा को आज पूरे 350 साल हो गए। ये युद्ध 4 फरवरी 1670 को रात के समय पुणे के पास स्थित किले पर लड़ा गया था। इसकी अगुवाई मराठाओं की ओर से छत्रपति शिवाजी के सेनानायक तानाजी मालुसरे ने की थी। जबकि मुगलों की ओर से उदयभान राठौड़ ने अपनी फौज का नेतृत्व किया था। इस युद्ध को जीतने के लिए तानाजी मालुसरे ने अपने जिस साहस और शूरता का परिचय दिया था, वो इतिहास के पन्नों में आज भी दर्ज है। अभी बीते दिनों आज की पीढ़ी को इस महापराक्रमी योद्धा से मुखातिब कराने के लिए ‘तानाजी’ नाम की फिल्म भी बनी। जो पूर्ण रूप से सिंहगढ़ के युद्ध पर आधारित थी। इस फिल्म को देखने के बाद लोगों ने तानाजी का किरदार निभाने वाले अभिनेता अजय देवगन को खूब सराहा और बिना किसी तोड़-मरोड के इतिहास को बड़े पर्दे पर पेश करने के लिए फिल्म निर्देशक को धन्यवाद भी दिया।

इस किले पर जहाँ आज टूरिस्टों की भीड़ जमा रहती है। लोग जहाँ बरसात और कोहरे का लुत्फ उठाने पहुँचते हैं। उसे आज से 350 साल पहले छत्रपति शिवाजी की खातिर मुगलों से जीतने के लिए तानाजी ने अपनी जान गवाई थी। उनकी मौत के बाद महाराज शिवाजी ने खुद कहा था कि भले ही उन्होंने इस किले को जीत लिया, मगर उन्होंने अपना शेर खो दिया। तानाजी की याद में ही महाराज ने इस किले का नाम कोंढाना से सिंहगढ़ किया था और इसके लिए लड़े गए युद्ध का नाम सिंहगढ़ युद्ध पड़ा था।

बताया जाता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज ने जून 1665 में मुगलों से किए गए एक करार के तहत कोंढाणा समेत 22 किले उन्हें लौटा दिए थे। लेकिन इस संधि से वे काफी आहत थे। उनके मन में इसे लेकर एक टीस थी। नतीजतन एक दिन उन्होंने मुगलों के कब्जे से यह किला वापस लेने का निर्णय लिया। अब वैसे तो उनकी सेना में कई शूर सरदार थे, जो कोंढ़ाणा किले को जीतने के लिए जान की बाजी लगाने को तैयार थे। लेकिन इस मुहिम के लिए शिवाजी ने अपने विश्वसनीय तानाजी मालुसरे का चयन किया और अपना संदेश तानाजी तक पहुँचाया।

इस युद्ध को लड़ने के लिए छत्रपति के विश्वसनीय तानाजी मालुसरे ने अपने बेटे की शादी बीच में अधूरी छोड़ दी थी। महाराज के संदेशवाहक से संदेश मिलने के बाद उन्होंने ऊँची आवाज में कहा था, “पहले कोंढाणा दुर्ग का विवाह होगा, बाद में पुत्र का विवाह। यदि मैं जीवित रहा तो युद्ध से लौटकर विवाह का प्रबंध करूँगा। यदि मैं युद्ध में काम आया तो शिवाजी महाराज हमारे पुत्र का विवाह करेंगे।”

दुर्ग के लिए तानाजी ने अपने युद्ध कौशल और पराक्रम के बलबूते एक भीषण युद्ध लड़ा और लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए। महाराज को जब उनकी मृत्यु की खबर मिली और मालूम हुआ कि पुत्र का विवाह छोड़कर तानाजी केवल छत्रपति का आदेश सुनकर रणभूमि में उतरे, तो उन्हें प्रसन्नता के साथ दुख हुआ। इतिहासकारों के अनुसार, उन्होंने ये खबर सुनकर कहा था, “गढ़ आला पण सिंह गेला” अर्थात ‘गढ़ तो हाथ में आया, परंतु मेरा सिंह (तानाजी) चला गया।’ उसी दिन से कोंढाणा दुर्ग का नाम ‘सिंहगढ़’ हो गया।

इस युद्ध के 350 साल पूरे होने पर हमें ध्यान रखने की आवश्यकता है कि तानाजी द्वारा लड़ा गया ये युद्ध आम युद्ध नहीं था। क्योंकि ये किला लगभग 4,304 फुट की ऊँचाई पर स्थित है। जिस तक पहुँचने के लिए तानाजी ने यशवंती नामक गोह प्रजाति की छिपकली का प्रयोग किया था।

बताया जाता है देर रात किले पर चढ़ाई करने के लिए तानाजी ने अपने बक्से से यशवंती को निकालकर, उसे कुमकुम और अक्षत से तिलक किया था और किले की दीवार की तरफ उछाल दिया किन्तु यशवंती किले की दीवार पर पकड़ न बना पाई। फिर दूसरा प्रयास किया गया लेकिन यशवंती दुबारा नीचे आ गई। जिसके बाद तानाजी के भाई सूर्याजी व शेलार मामा ने इसे अपशकुन समझा। मगर, तब तानाजी ने कहा कि अगर यशवंती इस बार भी लौट आई, तो उसका वध कर देंगे और यह कहकर दुबारा उसे दुर्ग की तरफ उछाल दिया, इस बार यशवंती ने जबरदस्त पकड़ बनाई और उससे बंधी रस्सी से एक टुकड़ी दुर्ग पर चढ़ गई। अंत मे जब यशवंती को मुक्त करना चाहा तो पता चला कि यशवंती भी भारी वजन के कारण वीरगति को प्राप्त हो चुकी थी, किन्तु उसने अपनी पकड़ नही छोड़ी थी।

इस दौरान तानाजी ने लगभग 2,300 फुट चढ़ाई की थी और मात्र 342 सैनिकों के साथ अंधेरी रात में किले पर धावा बोला था। बाद में उनके भाई सूर्याजी ने भी उनका साथ दिया था। किले को जीतने के लिए तानाजी और उनकी सेना ने उदयभान सिंह के लगभग 5,000 मुगल सैनिकों के साथ भयंकर युद्ध लड़ा था। मगर लंबे समय तक युद्ध चलने के पश्चात तानाजी को उदय भान ने मार दिया था और कुछ समय बाद मराठा सैनिक ने उदयभान को मारकर सिंहगढ़ के युद्ध की विजयगाथा को अमर किया था।

कमलनाथ सरकार मकान-दुकान बनाने के लिए बिल्डर्स को बेचेगी मंदिरों की जमीन, बीजेपी ने किया विरोध

मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार इन दिनों हिन्दू भावनाओं को ताक पर रख कर उसके विरुद्ध कार्यों में लगी हुई है। इस बार सरकार ने बिल्डरों को खुश करने के लिए हिंदू मंदिरों की जमीन को दाँव पर लगा दिया है। सरकार ने फैसला किया है कि वह प्रदेश के मंदिरों की जमीन को बिल्डरों को बेचेगी, जिस पर बिल्डर दुकान या मकान किसी का भी निमार्ण कर सकते हैं।

मध्य प्रदेश की कमलनाथ सरकार ने इस प्रस्ताव को बनाकर तैयार कर रखा है। वहीं बताया जा रहा है कि पाँच फरवरी को होने वाली कैबिनेट की बैठक में इस प्रस्ताव पर मुहर लगना बाकी है। इस सरकार द्वारा तैयार किए गए प्रस्ताव में यह भी है कि बेची गई मंदिर की जमीन पर बिल्डर्स मकान-दुकान कुछ भी बना सकते हैं। साथ ही जमीन बेचने पर जो पैसा मिलेगा वो मंदिर, जिला प्रशासन और सरकारी खजाने में जाएगा। दरअसल कमलनाथ सरकार ने प्रदेश के मंदिरों की जमीन बिल्डरों को देने का प्रस्ताव तैयार किया है। वहीं बताया कि इस प्रताव से मंदिरों की प्राइम लोकेशन वाली बेशकीमती जमीन को अतिक्रमण और कब्जे से बचाया जा सकेगा।

आध्यात्म विभाग के मंत्री पीसी शर्मा ने कहा कि सरकार के अधीन आने वाले मंदिरों की खाली जमीन व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए निजी व्यक्तियों को बेचने का प्रस्ताव लाया जा रहा है। इसकी शुरुआत भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर के साथ दूसरे बड़े शहरों के मंदिरों से होगी। जिस व्यक्ति को जमीन दी जाएगी, वो उस पर निर्माण कार्य कर बेच सकेगा। इससे मिलने वाला पैसा तीन हिस्सों में बाँटा जाएगा। 20 फीसदी मंदिर, 30 फीसदी जिला स्तर और 50 फीसदी राज्य स्तर के देवस्थान कोष में जमा होगा। सरकार केवल जमीन देगी। उस पर मकान-दुकान या बिल्डिंग बिल्डर अपने खर्च पर बनवाएगा। बिल्डर अपनी मर्जी के मुताबिक उस जमीन पर फ्लैट, डुप्लेक्स, दुकान, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स सहित दूसरा कर्मिशियल निर्माण कर सकता है।

इस प्रस्ताव का बीजेपी जमकर विरोध कर रही है। बीजेपी ने कमलनाथ सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि प्रदेश की सरकार तुष्टीकरण की राजनीति कर रही है और सरकार का यह प्रस्ताव हिंदुओं की भावनाओं को आहत करने वाला है। साथ ही सरकार पर आरोप लगाया कि वह लगातार हिंदू विरोधी फैसले ले रही है।

कोलकाता: ISIS आतंकी अबू मूसा ने जज पर किया हमला, अब वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से होगी सुनवाई

कोलकाता की जेल में बंद आईएसआईएस के सदस्य आतंकी अबू मूसा ने मंगलवार को कोर्ट में सुनवाई के दोरान जज पर हमला कर दिया। इस दौरान आतंकी ने जज पर जूता फेंका। इसके बाद आतंकी को तत्काल हिरासत में लेकर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच जेल की स्पेशल सेल में बंद कर दिया गया।

कोलकाता की प्रेसीडेंसी जेल में बंद आतंकी संगठन आईएसआईएस के मोहम्मद मसीउद्दीन उर्फ अबू मूसा को मामले की सुवाई के लिए मंगलवार को सेशन्स कोर्ट में पेश किया, जहाँ अचानक से आतंकी मूसा ने जज पर जूता फेंक दिया। गनीमत रही कि यह जूता जज को न लगकर कोर्ट परिसर में खड़े वकील को जाकर लगा। इस घटना के बाद कोर्ट ने फैसला लिया है कि आगे से इस मामले की सुनवाई विडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए होगी।

दरअसल आतंकी अबू मूसा इससे पहले भी इस तरह की कई घटनाओं को अंजाम दे चुका है। पिछले माह में उसने जेल वार्डन अमल करमाकर पर पीवीसी पाईप से हमला किया था। इस हमले में गंभीर रूप से घायल वार्डन को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा था। पहले भी मूसा ने अलीपुर सेंट्रल जेल के एक वार्डन पर हमला किया। लोहे की कांटी से उसके गले पर हमला किया था।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल के बर्धमान में वर्ष 2014 को एक मकान में बिस्फोट हुआ था। इसके बाद वर्ष 2017 में हुए ब्लास्ट के आरोप में बंगाल पुलिस ने आतंकी अबू मूसा को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के दौरान उसके पास से हथियार भी बरामद किए गए थे। सीआईडी की पूछताछ में उसने माना था कि वह आतंकी संगठन आईएसआईएस के संपर्क में रहा और उसने भारत में आईएसआईएस के लिए भर्ती की थी। वहीं शुरुआती जाँच के बाद इस मामले की जाँच एनआईए को सौंप दी गई थी।

11 फरवरी को जैसे-जैसे चुनाव नतीजे सामने आएँगे, वैसे-वैसे शाहीन बाग साफ़ होता जाएगा: अनुराग ठाकुर

दिल्ली राजनीति का केंद्र बन चुके शाहीन बाग धरने को लेकर बैन हटाने के बाद बीजेपी नेता और वित्त राज्य मंत्री अनुराठ ठाकुर ने एक बड़ा बयान दिया है। अनुराग ठाकुर ने कहा है कि जैसे-जैसे दिल्ली चुनावों के नतीजे आएँगे ऐसे ही शाहीन बाग का धरना उठना शुरू हो जाएगा।

मंगलवार को वित्त राज्य मंत्री अनुराग ठाकुर ने दिल्ली में आयोजित एक जनसभा में लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि दिल्ली में चल रहे शाहीन बाग धरने को विपक्षी दलों का पूरा साथ मिल रहा है। ठाकुर ने केजरीवाल सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, “दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया स्वयं शाहीन बाग धरने को अपना समर्थने दे चुके हैं। मैं आपको बता देना चाहता हूँ, 11 फरवरी को जैसे-जैसे चुनाव के नतीजे सामने आते जाएँगे, वैसे-वैसे ही शाहीन बाग साफ़ होता जाएगा।”

इसके अलावा दिल्ली चुनाव और शाहीन बाग़ पर बीजेपी नेता अनुराग ठाकुर का कहना है कि जनता जैसे-जैसे कमल का बटन दबाएगी वैसे ही 11 तारीख को नतीजे आते-आते शाहीन बाग भी साफ हो जाएगा।

गौरतलब है कि इससे पहले भी बीजेपी नेता दिल्ली में चुनाव प्रचार के दौरान दिए एक विवादित बयान को लेकर चर्चा में आए थे। तब अनुराग ने मंच से कहा था, देश के गद्दारों को, इसके जवाब में सामने बैठी जनता ने बोला था, गोली मारो… को। इसके बाद चुनाव आयोग ने इसे गंभीरता से लेते हुए अनुराग को स्टार प्रचारकों की सूची से बाहर कर दिया। वहीं केजरीवाल को आतंकवादी कहने वाले प्रवेश वर्मा को भी चुनाव आयोग स्टार प्रचारकों की सूची से बाहर कर चुका है।