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जामिया का पुलिस को CCTV फुटेज देने से इनकार, उपद्रवी छात्रों का गुनाह छिपाने की कोशिश?

अब सीसीटीवी फुटेज को लेकर जामिया मिलिया इस्लामिया प्रशासन और दिल्ली पुलिस के बीच ठन गई है। जहाँ एक तरफ़ यूनिवर्सिटी ने आरोप लगाया था कि दिल्ली पुलिस ने कैम्पस में बिना अनुमति घुस कर तोड़फोड़ मचाई, वहीं पुलिस ने कहा था कि नियंत्रण से बाहर होने पर पुलिस को एक्शन लेना पड़ा। सीएए विरोध प्रदर्शन के नाम पर हिंसा, आगजनी और दंगे करने वाले जामिया के छात्रों ने पुलिस पर पत्थरबाजी भी की थी। जाँच में सीसीटीवी फुटेज का अहम रोल होगा, लेकिन अभी तक दिल्ली पुलिस को सीसीटीवी फुटेज नहीं मिला है। ये घटना दिसंबर 15 को हुई थी।

एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि सीसीटीवी फुटेज लेने के लिए जामिया नगर के एसएचओ को यूनिवर्सिटी प्रशासन के पास भेजा गया था। जब पुलिस वहाँ पर पहुँचीं, तब भारी संख्या में जामिया के छात्र जमा हो गए और उन्होंने पुलिस का विरोध किया। छात्रों ने सीसीटीवी फुटेज देने से इनकार कर दिया। हालाँकि, अभी तक ये नहीं पता चल सका है कि छात्र सीसीटीवी फुटेज पुलिस के पास क्यों नहीं पहुँचने देना चाहते हैं? सवाल ये है कि क्या वो कुछ छिपा रहे हैं? मजबूरन एसएचओ को खाली हाथ वापस लौटना पड़ा।

हालाँकि, जामिया मिलिया इस्लामिया प्रशासन ने पुलिस के साथ बैठक के दौरान लिखित में वादा किया था कि सीसीटीवी रिकॉर्डिंग्स को पुलिस को सौंपा जाएगा, ताकि घटना की सही तरीके से जाँच हो सके। अब यूनिवर्सिटी प्रशासन अपने वादे से पलटता दिख रहा है। अगर उन रिकॉर्डिंग्स के साथ कुछ भी होता है तो पुलिस इसे ‘सबूतों के साथ छेड़छाड़’ मान कर आगे की कार्रवाई करेगी, ऐसा वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है। जामिया के चीफ प्रॉक्टर वसीम अहमद ने यूनिवर्सिटी का पक्ष रखते हुए कहा:

“15 दिसंबर को दिल्ली पुलिस ने जामिया के कई छात्रों को हिरासत में लिया था। उसी समय पुलिस ने हमसे उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर करा लिए थे, जिसमें कहा गया था कि हमें जाँच के लिए सीसीटीवी फुटेज पुलिस को सौंपनी पड़ेगी। उन्होंने फुटेज की माँग की है और हम इस पर अभी सोच-विचार कर रहे हैं। एक पुलिस अधिकारी इसके लिए आया था लेकिन जैसे ही छात्र आए, वो यहाँ से चला गया।”

जामिया मिलिया इस्लामिया ने मानव संसाधन मंत्रालय से माँग की है कि इस पूरे मामले की न्यायिक जाँच कराई जाए। इसीलिए, वो सीसीटीवी फुटेज पुलिस को नहीं सौंपना चाह रहे। जामिया प्रशासन ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से भी इस मामले की शिकायत की है।

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इस्लामी संगठन PFI पर लगेगा बैन: DGP की सिफारिश पर डिप्टी सीएम केशव मौर्य का स्पष्ट बयान

उत्तर प्रदेश सरकार ने उग्र इस्लामिक संगठन PFI पर पाबंदी लगाने का फ़ैसला किया है। पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) पर नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़काने का आरोप लगा था। इस संबंध में यूपी पुलिस जाँच कर रही थी। जाँच के बाद ही उत्तर प्रदेश के डीजीपी ओपी सिंह ने गृह विभाग को चिट्ठी लिखकर PFI पर बैन लगाने की सिफारिश की थी।

पुलिस की सिफारिश के बाद डिप्टी सीएम केशव मौर्य ने आज (31 दिसंबर 2019) PFI पर प्रतिबंध लगाने की सरकार की मंशा की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यूपी में हिंसा फैलाने में PFI का हाथ था। केशव मौर्य ने कहा,

यूपी में हिंसा फैलाने में PFI का हाथ था। सिमी के लोग ही PFI में थे, जिन्होंने यूपी में हिंसा फैलाई। सरकार की तरफ़ से इस संगठन पर प्रतिबंध लगाया जाएगा और सरकार की ओर से प्रस्ताव लाकर इसे प्रतिबंधित किया जाएगा।

डिप्टी सीएम ने तल्ख़ अंदाज़ में कहा कि सिमी जैसे आतंकी संगठन चाहे किसी भी रूप में सामने आएँगे, उन्हें कुचल दिया जाएगा और जल्द ही PFI जैसे आतंकी इस्लामी संगठनों को भी प्रतिबंधित किया जाएगा।

इससे पहले उत्तर प्रदेश के डीजीपी ओपी सिंह ने गृह विभाग को चिट्ठी लिखकर PFI पर बैन लगाने की सिफारिश की थी। उनके मुताबिक जाँच में पता चला है कि हिंसक विरोध-प्रदर्शन में PFI का हाथ था। उन्होंने बताया कि उपद्रवियों के पास से आपत्तिजनक सामग्री बरामद किया गया था।

हिंसा के दौरान PFI के कई सदस्य पकड़े गए थे। यह सदस्य हिंसा में शामिल होने के साथ हिंसा फैलाने वालों की मदद भी कर रहे थे। लखनऊ में प्रदर्शन के दौरान भड़की हिंसा मामले में पुलिस ने PFI के तीन सदस्यों को गिरफ़्तार भी किया था। गिरफ़्तार किए गए आरोपितों की पहचान PFI अध्यक्ष वसीम अहमद, कोषाध्यक्ष नदीम, मंडल अध्यक्ष अशफाक के रूप में हुई थी।

PFI एक उग्र इस्लामी कट्टरपंथी संगठन है, जो कि दक्षिण भारत के राज्यों में काफ़ी सक्रिय होने के साथ-साथ चुनाव भी लड़ता रहा है। यह कट्टर संगठन उत्तर प्रदेश में बड़ी तेज़ी से फैल रहा है। पुलिस का कहना है कि PFI के गुंडों ने यूपी में हुई हिंसा के दौरान सोशल मीडिया के ज़रिए लोगों को उकसाने और दंगा भड़काने का काम किया था। पुलिस ने बताया कि उन्हें ऐसे दस्तावेज़ भी बरामद हुए थे जिनमें माहौल बिगाड़ने की बातें कही गई थीं।
पुलिस ने बताया था कि नागरिकता संशोधन के नाम पर देश भर में भड़की हिंसा में कई जगहों पर इस PFI संगठन के उपद्रवी शामिल थे। इससे से जुड़े लोगों ने उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों में बैठक की थी।

ग़ौरतलब है कि दिल्ली पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियों ने साथ मिलकर दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया में हुए दंगों के कारणों की जाँच की थी। इस पूरे मामले में दिल्ली पुलिस ने इस्लामिक संगठन PFI की तरफ़ इशारा किया था। पुलिस के अनुसार, जामिया मिलिया इस्लामिया में हिंसा से दो दिन पहले 13 दिसंबर को कट्टरपंथी इस्लामी संगठन PFI के लगभग 150 सदस्यों ने विभिन्न राज्यों से दिल्ली में प्रवेश किया था। पुलिस और ख़ुफ़िया एजेंसियों के मुताबिक़, जामिया इलाक़े में हिंसा भड़कने से पहले वो कहीं छिप गए थे।

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11 साल का बच्चा, 1000 से अधिक बार यौन शोषण… अपने ‘कनेक्शन’ वाले पादरी को मदर टेरेसा ने ऐसे बचाया

शिकागो में मदर टेरेसा के आध्यात्मिक सलाहकार जेसुइट पादरी डोनल्ड जे मग्वायर (Donald J. McGuire) ने एक अमेरिकी लड़के का यौन शोषण किया था। यह बात जानकर हैरानी होगी कि पादरी ने ऐसा एक बार नहीं बल्कि हजारों बार किया, कई राज्यों और कई देशों में घूम-घूम कर किया। मतलब जहाँ भी वो पादरी जाता था, उस बच्चे को अपने साथ ले जाता था और वहाँ उसका यौन शोषण करता था। इस मामले में सोमवार (30 दिसंबर) को सैन फ्रांसिस्को में कैलिफोर्निया राज्य अदालत में पादरी के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया गया।

उस बच्चे का नाम है रॉबर्ट जे गोल्डबर्ग (Robert J. Goldberg) और अब वो 61 साल का हो चुका है। इस मुक़दमे के बारे में एसोसिएटेड प्रेस को दिए साक्षात्कार में 61 वर्षीय गोल्डबर्ग ने अपने साथ हुए यौन शोषण की पूरी कहानी बताई। उन्होंने बताया कि वह 11 साल की उम्र से यौन शोषण का शिकार हो रहे थे, जब वो पादरी डोनल्ड जे मग्वायर (अब मर चुका है) के लिए काम करते थे।

मग्वायर की मौत 2017 में जेल में हुई थी। उसे गोल्डबर्ग के अलावा अन्य लड़कों के यौन शोषण के लिए 25 साल की सज़ा सुनाई गई थी। जेल में सजा काटने के दौरान ही वो मर गया।

ख़बर के अनुसार, गोल्डबर्ग का कहना है कि उन्होंने 40 साल से अधिक समय तक जेसुइट पादरी मग्वायर की दासता में जीवन गुजारा। सोमवार को दायर किए गए मुक़दमे में फिलहाल प्रतिवादियों के नाम नहीं है, लेकिन गोल्डबर्ग के वकीलों का कहना है कि अमेरिकी जेसुइट और वेटिकन के इस संबंध में आदेश को प्रतिवादियों में शामिल किया जाएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि तब गोल्डबर्ग और अन्य बच्चों के साथ हो रहे यौन शोषण के बारे में कैथोलिक के शीर्ष अधिकारियों को पता था। वो जानते थे कि मग्वायर पर बार-बार लड़कों के यौन शोषण का आरोप लग रहा है, लेकिन उनके अपराधों को छिपाने के लिए वेटिकन की ओर से ही पर्दा डाला गया।

कैथोलिक दुर्व्यवहार कांड के लगभग दो दशकों बाद तक, हज़ारों पीड़ित लोगों ने अपनी दर्दनाक आपबीती सुनाई। इस साल की शुरुआत में सैकड़ों लोगों ने मुक़दमों में ख़ुद के साथ हुए शोषण के बारे में तब ख़ुलासा किया, जब न्यूयॉर्क में एक साल के लिए इस संबंध में मुकदमों को दर्ज करने की अनुमति (one year window) दी गई। गोल्डबर्ग की तरह अन्य सैकड़ों पीड़ित भी ख़ुद के साथ हुए यौन शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा सकते हैं, जब 1 जनवरी से न्यू जर्सी और कैलिफोर्निया में भी one year window खुलेगी।

हालाँकि कई पीड़ित अभी भी चुप्पी साधे हुए हैं। गोल्डबर्ग के बारे में बता दें कि जब वो 11 साल के थे, तब वे 1970 में मग्वायर से मिले थे। मग्वायर ने उनकी माँ को रहने के लिए एक घर दिया। फिर उसने गोल्डबर्ग की माँ को इस बात के लिए राज़ी किया कि उनका बेटा उनकी (खुद मग्वायर की) देखरेख में सही रहेगा।

इस दौरान, तय हुआ कि गोल्डबर्ग, मग्वायर के रहने वाले क्वार्टर में शाम बिताएँगे या मग्वायर के साथ घर लौटेंगे, उनके साथ उनके बिस्तर पर सोएँगे। इस बीच, गोल्डबर्ग की माँ ने इस बात की पुष्टि की कि मग्वायर ने गोल्डबर्ग को अपने सहायक के रूप में काम करने के लिए प्रति सप्ताह $300 से $500 तक भुगतान करता था।

गोल्डबर्ग ने बताया, “वह बहुत सख़्त था, मैंने कोई बात नहीं कही थी। उसने जो कुछ भी मेरी माँ को बताया, वह चाहता था कि मैं वैसा करूँ और मुझे वैसा करना पड़ा।”

गोल्डबर्ग ने बताया कि अगर वो अपने दोस्तों के साथ भागने या मग्वायर के साथ सेक्स करने से इनकार कर देता था, तो वो उसे घंटों एक कमरे में बंद करके सज़ा देता था। दर्दनाक यह कि सज़ा के तौर पर वो उसका यौन शोषण करता था।

गोल्डबर्ग और उनका परिवार मग्वायर के साथ 1976 तक रहे। इसके बाद मग्वायर को सैन फ्रांसिस्को के विश्वविद्यालय में शिक्षण की नौकरी मिली तो वो कैलिफोर्निया चला गया। यह वही समय था, जब मग्वायर ने मदर टेरेसा के साथ रिश्ता बनाया। वह मदर टेरेसा का आध्यात्मिक सलाहकार बन गया था।

गोल्डबर्ग ने बताया कि शिकागो में पादरी मग्वायर के आपराधिक मुक़दमे में पीड़ितों की गवाही के बाद उनकी भावनाएँ बदलने लगीं। पूरे मुकदमे के दौरान मग्वायर को इस बात का बिल्कुल पछतावा नहीं था कि उसने गोल्डबर्ग और अन्य पीड़ितों के साथ यौन शोषण किया था।

ऐसा नहीं है कि पादरी मग्वायर के बारे में चर्चा (यौन शोषण वाली) आज या मुकदमा शुरू होने के समय हुई हो। यह 1960 के दशक की शुरुआत में शुरू हो चुकी थी। तब वह यूरोप में रहा करता था और जर्मनी तथा ऑस्ट्रिया में चर्च के अधिकारियों ने युवा लड़कों के साथ उसके यौन संबंधों के बारे में चौंकाने वाली रिपोर्ट भेजी थी।

मग्वायर के खिलाफ शिक़ायतें जारी रहीं लेकिन वह तीन दशक से भी ज्यादा समय तक पादरी बना रहा। 1994 में, मदर टेरेसा ने मग्वायर के ऊपर अपने “आत्मविश्वास और विश्वास” को व्यक्त करने के लिए जेसुइट के आदेश का समर्थन किया था। तब मदर टेरेसा ने कहा था कि उनका मानना ​​है कि मग्वायर के ख़िलाफ़ लगाए गए सारे आरोप असत्य थे।

2012 में, शिकागो जेसुइट के अधिकारी ब्रैडली एम शेफ़र, जिन्हें मदर टेरेसा का पत्र प्राप्त हुआ था, उन्होंने एक बयान जारी कर मग्वायर पर लगाम लगाने में विफल रहने के लिए माफ़ी माँगी थी। पिछले साल मिडवेस्ट जेसुइट्स ने एक सूची जारी की थी। इसमें उन 55 अभियुक्तों का नाम था, जिन्हें जेसुइट्स नाम दिया गया था, उसमें मग्वायर का भी नाम था, और इसके लिए माफ़ी माँगी थी। इसमें कहा गया था, “हम स्पष्ट रूप से जानते हैं कि पहले के दशकों में, कुछ मिडवेस्ट जेसुइट्स को मंत्रालय से जल्दी से नहीं हटाया गया था, इस बात का हमें दुख है।”

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हिजाब पहन कर PM मोदी का विरोध कर रही हैं मिया खलीफा? Pak सीनेटर मलिक के ट्वीट का उड़ा मजाक

पाकिस्तान के सीनेटर रहमान मलिक ने पोर्न स्टार मिया खलीफा के भले के लिए प्रार्थना की है। पाकिस्तानी सीनेटर को लगता है कि अंतरराष्ट्रीय पोर्न स्टार मिया खलीफा भारत की क्षेत्रीय अभिनेत्री हैं और वो नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में उत्तरी हुई हैं, इसीलिए रहमान मलिक ने उनके प्रति सहानुभूति जताई। हालाँकि, असलियत कुछ और है। दरअसल, यह सब शुरू हुआ एक व्यक्ति द्वारा कुछ फोटोज ट्वीट करने से। उसने दावा किया कि भारत में कई क्षेत्रीय सिने इंडस्ट्रीज की प्रभावशाली अभिनेत्रियाँ प्रदर्शनकारी मुस्लिमों के साथ खड़ी हैं और सीएए का विरोध कर रही हैं।

उसने अपने ट्वीट में पाकिस्तान के पूर्व इंटीरियर मिनिस्टर रहमान मलिक को भी टैग किया। साथ ही उसने लिखा कि विरोध दर्ज कराने के लिए ही इन अभिनेत्रियों ने हिजाब पहन रखा है। इसके बाद उक्त ट्विटर यूजर ने आशा जताई कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तुरंत ही इस्तीफा देना पड़ेगा। ये ट्वीट अक्षय नामक यूजर ने किया था। उसने जानबूझ कर सीनेटर रहमान मलिक को टैग कर के ट्रैप किया था। रहमान मलिक जाल में फँस गए और उन्होंने इस झूठी कहानी को सच मान लिया। उन कथित ‘क्षेत्रीय अभिनेत्रियों’ में मिया खलीफा की फोटो भी थी, जिसे मलिक पहचान ही नहीं पाए।

सीनेटर रहमान मलिक ने मिया खलीफा के लिए लिखा- “गॉड ब्लेस हर।” पाकिस्तानी पत्रकार नायला इनायत ने रहमान मलिक की इस कारस्तानी को ट्विटर पर शेयर किया, जिसके बाद लोगों ने जम कर ठहाके लगाए। रहमान मलिक ने आगे ये भी लिखा कि वो भारत सरकार को ‘देख लेंगे’ क्योंकि सीएए यूएन के नियमों के भी ख़िलाफ़ है। नायला ने पूछा कि क्या पाकिस्तानी सीनेटर ये सोचते हैं कि अब वो पोर्न स्टार्स की मदद से भारत के साथ युद्ध करेंगे? कुछ ट्विटर यूजर ने लिखा कि पाकिस्तान में कई जगह इंटरनेट बंदी के कारण नेतागण भी देश-दुनिया से अनजान बने बैठे हुए हैं।

वैसे ये पहली बार नहीं है, जब किसी पाकिस्तानी नेता ने ऐसी हरकत की हो। ट्विटर पर अब्दुल बासित ने एक ऐसा ट्वीट रीट्वीट किया था, जिसमें अडल्ट फिल्म कलाकार जॉनी सीन्स को कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद वहाँ की पीड़ित जनता बताकर दिखाया जा रहा है। इस तस्वीर में दिखाया गया था कि यूसुफ़ अनंतनाग का रहने वाला है, जिसकी आँखों की रौशनी पेलेट गन्स की वजह से चली गई।

फिल्म, गाँजा और समलैंगिक सेक्स: तनवीर कुरैशी की तीसरी डिमांड पूरी नहीं करने पर शुभांकर की हत्या

पश्चिम बंगाल के 24 परगना फलदा निवासी शुभांकर हलधर द्वारा समलैंगिक रिश्ते बनाने से इंकार करने पर झारखण्ड के जमशेदपुर में एक मुस्लिम युवक मोहम्मद तनवीर ने उसकी हत्या कर दी। पुलिस ने अपनी जाँच के बाद तनवीर को गिरफ्तार किया। साथ ही उसके पास से हत्या में इस्तेमाल चाकू, उसका मोबाइल, शुभांकर का मोबाइल, स्कूटी, खून से सने कपडों को बरामद किया।

सोमवार को पूरी वारदात का खुलासा करते हुए एसएसपी अनूप बिरथरे ने बताया कि शुभांकर कोलकाता की प्रदूषण जाँच करने वाली कंपनी में सुपरवाइजर था। वह साकची स्थित मानसूर्या होटल में अपने सहयोगी के साथ 19 दिसंबर से ठहरा हुआ था। लेकिन, 22 दिसंबर की रात शुभांकर हलधर मानगो स्थित आइलेक्स में फिल्म देखने के लिए होटल से निकला और शीतला मंदिर के पास शुभांकर टेंपो का इंतजार करते हुए उसकी मुलाकात मोहम्मद तनवीर से हुई।

तनवीर ने शुभांकर को अकेला देख उसे अपने जाल में फँसाया। उसने पहले शुभांकर से दोस्ती की और फिर उसे टॉकिज तक पहुँचाने का भरोसा दिलाया। टॉकिज पहुँचने पर तनवीर ने भी उसके साथ फिल्म देखने की इच्छा जताई। जिसके बाद शुभांकर ने तनवीर की टिकट खरीदकर उसे भी फिल्म दिखाई।

टॉकिज से निकलने के बाद गाँजा पीने के लिए दोनों स्वर्णरेखा नदी किनारे गए। यहाँ नशा करने के बाद तनवीर ने शुभांकर के साथ अप्राकृतिक संबंध बनाने का दबाव बनाया। मगर, जब उसने ऐसा करने से मना किया, तो तनवीर ने उसपर चाकू से हमला कर हत्या कर दी। शुभांकर की हत्या को अंजाम देने के बाद तनवीर उसकी जेब में पड़े रुपए, उसके 2 स्मॉर्टफोन लेकर वहाँ से भाग गया।

घटना का खुलासा होने के बाद सिटी डीएसपी अनुदीप सिंह के नेतृत्व में वारदात से जुड़ी हर परत खोलने के लिए 10 अधिकारियों की एक टीम बनाई गई। इस टीम ने तहकीकात के दौरान शुभांकर के मोबाइल की लोकेशन जुटाने से अपनी जाँच शुरु की, जो कि पुलिस को जमशेदपुर के आजादनगर और कपाली में मिली।

इसके बाद साकची थाना प्रभारी कुणाल कुमार ने घटना के बाद सीसीटीवी फुटेज देखे। पुलिस को कई फुटेज मिले जिससे पता चला कि शुभांकर के साथ एक अन्य युवक था, जो उसे स्कूटी से स्वर्णरेखा नदी किनारे लाया था। कई फुटेज देखते-देखते पुलिस ने आखिरी फुटेज आइलेक्स का देखा तो पता चला कि दूसरे युवक ने भी शुभांकर के साथ फिल्म देखी थी। इसके बाद मुखबिरों को लगाया गया तो पता चला कि ये युवक कपाली निवासी तनवीर है।

जानकारी जुटाने के बाद, साकची पुलिस ने शुभंकर के लूटे गए मोबाइल के लोकेशन की मदद से जमशेदपुर के कपाली के रोड नंबर पांच निवासी तनवीर कुरैशी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।

पुलिस के मुताबिक तनवीर नशा का आदि है। इससे पहले वो पूर्व में बाइक चोरी के आरोप में जेल जा चुका है। मालूम हो कि 23 दिसंबर को साकची सुवर्णरेखा नदी किनारे शुभांकर हलधर का शव पुलिस ने बरामद किया था।

‘ऐसे राजनीतिक माहौल में मेरे जैसे MLA के लिए कोई जगह नहीं’ – कैबिनेट विस्तार के बाद ही ठाकरे-पवार को झटका

महाराष्‍ट्र में सोमवार को हुए मंत्रिमंडल विस्‍तार के बाद गठबंधन से बनी सरकार में बगावती सुर बुलंद होने लगे। राज्य के बीड़ जिले से एनसीपी विधायक प्रकाश सोलंके ने ऐलान किया कि वे आज न केवल अपनी विधायकी से इस्तीफा देंगे, बल्कि राजनीति से भी संन्यास ले लेंगे।

विधायक ने सोमवार को कहा, “मैं पार्टी के किसी नेता से नाखुश नहीं हूँ। मैंने एनसीपी नेताओं को अपने फैसले से अवगत करा दिया है। मैं मुंबई में मंगलवार दोपहर को विधानसभा अध्यक्ष से मिलूँगा और अपना इस्तीफा पत्र सौंप दूँगा।”

हालाँकि, प्रकाश सोलंके ने अपने बयान में साफ किया है कि वे मंत्री न बनाए जाने के चलते ये फैसला नहीं ले रहे हैं और न ही किसी पार्टी नेता से नाराज हैं। लेकिन, आजतक की रिपोर्ट के मुताबिक उनके बातचीच में उन्होंने कहा कि ऐसी राजनीतिक परिस्थिति बनी है, जिसके बाद अब उन जैसे लोगों के लिए सियासत में कोई जगह नहीं बची है।

सोलंकी ने कहा, “तीस साल से राजनीति कर रहा हूँ और अब इस तरह के राजनीतिक माहौल में हमारे लिए कोई जगह नहीं बची है।”

गौरतलब है कि सोमवार को उद्धव सरकार के कैबिनेट विस्‍तार में प्रकाश सोलंके को मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली, जबकि इससे पहले वे कॉन्ग्रेस-एनसीपी सरकार में राज्यमंत्री रहे चुके हैं। इसके अलावा वे चार बार से मजलगांव सीट से विधायक चुने जा चुके हैं।

ऐसे में मंत्रिमंडल विस्तार के बाद अचानक उनके फैसले से साफ है कि वो सरकार में मंत्री पद न पाने से नाराज हैं और इसी कारण वे मौजूदा राजनीति के लिए खुद को अयोग्य बताकर राजनीति से अलविदा ले रहे हैं।

गौरतलब है कि एनसीपी विधायक के अलावा मंत्रिमंडल विस्तार के बाद संजय राउत को लेकर भी बातें शुरू हो गई हैं। कार्यक्रम में उपस्थित न होने के कारण दबे सुर में ये भी बातें उठने लगी हैं कि उनके भाई और विक्रोली से विधायक सुनील राउत को मंत्रिमंडल में जगह न मिलने से वह नाराज हैं।

‘जो श्री राम का नहीं, वो किसी काम का नहीं’ – बाला साहेब के सैनिक ने उद्धव की सेना से दिया इस्तीफ़ा

शिवसेना के 400 कार्यकर्ता BJP में शामिल, कहा – ‘भ्रष्ट और हिन्दू-विरोधी दलों संग मिलकर बनाई सरकार’

आगरा में हिंदू परिवार घर बेचने पर मजबूर: मर्डर केस वापस लेने का दबाव, बहू-बेटियों की इज्जत से खिलवाड़

मेरठ की तरह आगरा स्थित ताजगंज के तेलीपाड़ा में रविवार को करीब एक दर्जन घरों पर ‘मकान बिकाऊ’ का पोस्टर चिपका देख सनसनी फैल गई। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया कि इसके पीछे का कारण इलाके में 3 महीने पहले 2 समुदायों के बीच हुआ एक बवाल है। इस मामले में ‘समुदाय विशेष’ के लोगों ने राठौर समाज के 20 वर्षीय युवक पप्पू की हत्या कर दी थी।

बताया जा रहा है कि इस घटना के बाद मामले में पुलिस की ओर से कोई ठोस कार्रवाई न होने और समुदाय विशेष के लोगों द्वारा आए दिन परेशान करने के कारण राठौर समाज के लोगों में दहशत है। आरोपित पक्ष लगातार उन पर समझौता करने का दबाव बना रहा है, लेकिन पीड़ित पक्ष इसके लिए तैयार नहीं है।

जानकारी के अनुसार, पप्पू की हत्या के मामले में 43 नामजद लोगों पर शिकायत दर्ज हुई थी। लेकिन पुलिस ने अपनी कार्रवाई में केवल पप्पू खां और हाशिम को जेल भेजा, जबकि अन्य सभी आरोपित अभी तक फरार हैं। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि पुलिस द्वारा इस मामले में दबिश तो दी गई लेकिन इसके बाद कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।

आए दिन आरोपित पक्ष की ओर से दबाव के बीच पीड़ित परिवारों ने अपने घर पर “मकान बिकाऊ” है, का पोस्टर लगा दिया। हालाँकि, मकानों पर लगे पोस्टरों की जानकारी मिलते ही पुलिस मौके पर पहुँची और दोनों पक्षों से बातचीत कर पोस्टर हटवा दिए। लेकिन इस दौरान यह पोस्टर सोशल मीडिया पर वायरल हो चुके थे और मामला तूल भी पकड़ चुका था।

पीड़ित पक्ष ने मीडिया को बताया कि उनके परिवारों में दहशत का माहौल बन गया है। उनके मुताबिक आरोपित युवक दर्जनों की संख्या में आकर उन पर मुकदमा वापसी के लिए दबाव बना रहे हैं।

उनका कहना है कि समुदाय विशेष के लोग उनसे समझौते के लिए आए दिन बात करते हैं। लेकिन, जब वह इससे इनकार करते हैं, तो उनके बच्चों के साथ मारपीट की जाती है। इस कारण से इलाके के दर्जनों परिवार मानसिक तनाव में हैं।

बता दें कि समुदाय विशेष की ये हरकतें यहीं नहीं रुकती। उनमें से कुछ युवक आए दिन पीड़ित पक्ष की महिलाओं के आने-जाने पर उन पर फब्तियाँ कसते हैं। जिस कारण वहाँ लड़कियों-महिलाओं का घरों से निकलना मुश्किल हो गया है। पीड़ित पक्ष के अनुसार वे इस संबंध में इलाका पुलिस से शिकायत कर चुके हैं। लेकिन पुलिकर्मी कभी-कभी ही इलाके में गश्त लगाने आते हैं। जबकि अधिकारियों द्वारा रात और दिन दो सुरक्षाकर्मियों की ड्यूटी लगाने के लिए कहा गया था। 

उल्लेखनीय है कि पीड़ित पक्ष के अनुसार तेलीपाड़ा में समुदाय विशेष बड़ी संख्या में है, जबकि राठौर समाज के करीब एक दर्जन परिवार ही हैं। इसलिए, इलाके की बहुसंख्यक आबादी से परेशान होकर राठौर समाज के लोग तेलीपाड़ा से पलायन करने को मजबूर हैं।

पूरा मामला:

इसी साल 28 सितंबर की रात रुपए लेने के बावजूद कोल्ड ड्रिंक की बोतल न देने के मामले को लेकर विवाद हो गया था। तब दोनों समुदाय के लोग आमने-सामने आ गए थे और उसी बीच पथराव हुआ था। पथराव में घायल तेलीपाड़ा निवासी पप्पू राठौर की 1 सप्ताह बाद इलाज के दौरान मौत हो गई थी। जिसके बाद युवक के चाचा निरंजन सिंह राठौर ने कुछ नामजद लोगों के ख़िलाफ़ मुकदमा कराया था। लेकिन पुलिस ने सिर्फ दो आरोपितो को गिरफ्तार कर जेल भेजा जबकि बाकी आरोपित अभी तक फरार हैं।

निरंजन सिंह का कहना है कि आरोपित पक्ष के लोग समझौते के लिए उन पर दबाव बना रहे हैं और राजीनामा नहीं करने पर बस्ती से मकान खाली कराने की धमकी दे रहे थे।

इसके अलावा उनका कहना है कि बीते 4 नवंबर को क्षेत्र निवासी राजेश राठौर के बेटे के साथ समुदाय विशेष के लोगों ने मारपीट भी की थी और पुलिस से शिकायत करने पर उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी गई थी।

बता दें कि क्षेत्र में राठौर समाज के लोगों के 12 घर ही हैं और लगातार मिलती धमकियों से वे भी दहशत में जी रहे हैं। खबरों के अनुसार पुलिस की कार्रवाई न होने पर ही मकान बिकाऊ के पोस्टर लगाए गए हैं। अगर स्थिति ऐसी ही रही तो वह मकान बेचकर चले जाएँगे।

10 गलियाँ हुईं सुनसान, 125 हिन्दू परिवारों के पलायन के बाद मेरठ बन रहा दूसरा कैराना

मुस्लिमों के ख़ौफ़ से 150 हिन्दू धर्मांतरण और पलायन को मजबूर: रिपोर्ट्स

मेरठ पलायन: ‘सिर्फ प्रहलाद नगर नहीं, डर के कारण 30 कॉलनियों के हिंदू अपने मकान बेचने को मजबूर’

टूटे हाथ वाले मौलवी की तस्वीर का दूसरा पहलू: मदरसे के अंदर से पुलिस पर हुई थी गोलीबारी, तब लिया एक्शन

सोशल मीडिया में एक तस्वीर बड़ी तेज़ी से वायरल हो रही है। इस तस्वीर में 72 वर्षीय शिया मौलवी असद रज़ा हुसैनी के एक हाथ पर प्लास्टर चढ़ा हुआ है और शरीर पर घाव के निशान हैं। दरअसल, इस तस्वीर का संबंध 20 दिसंबर को नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में हुए विरोध-प्रदर्शन से है। इस तस्वीर के लिए मुज़फ़्फ़रनगर पुलिस की कार्रवाई को ‘ज़्यादती’ कहते हुए इसकी कड़ी निंदा की जा रही है।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ख़बर के अनुसार, विरोध-प्रदर्शन के दौरान केवल असद रज़ा हुसैनी ही नहीं, बल्कि उनके मदरसा-सह-अनाथालय के छात्र भी पुलिस की कार्रवाई में घायल हुए थे। उनमें से 11 को जेल भेज दिया गया। सम्पर्क करने पर, स्थानीय पुलिस ने आरोपों का खंडन किया और कहा कि वे हिंसक उपद्रवियों का पीछा करते हुए परिसर में प्रवेश किए थे।

मुज़फ़्फ़रनगर के मिनाक्षी चौक के पास 20 दिसंबर को झड़प के दौरान एक मदरसे के प्रिंसिपल और एक अनाथालय के प्रभारी हुसैनी को मदरसा के 40 छात्रों के साथ पुलिस ने कथित तौर पर हिरासत में लिया था।

एक तरफ़, मौलवी के परिवार ने ख़ुद को मीडिया से दूर कर लिया है, वहीं दूसरी तरफ़ अनाथालय के कर्मचारियों ने पुलिस के ख़िलाफ़ झूठा नैरेटिव तैयार किया। मद्रास-अनाथालय में काम करने वाले एक कर्मचारी नईम ने कहा, “कम से कम 200 पुलिसकर्मियों की एक टुकड़ी ने जबरन परिसर में प्रवेश किया। उन्होंने अपने रास्ते में आने वाले सभी लोगों पर हमला किया और नाबालिग बच्चों को भी नहीं छोड़ा।”

इतना ही नहीं यह भी कहा गया कि पुलिस की टीम ने अनाथालय में मौजूद 9 वर्ष तक के नाबालिगों को लाठियों से पीटा। इनमें से कुछ के शरीर में फ्रैक्चर भी हो गया। नईम का कहना है कि हुसैनी ने हमेशा स्थानीय राजनीति से दूरी बनाए रखी, और अपना जीवन दूसरों के लिए समर्पित कर दिया। पुलिस उन्हें परिसर से बाहर घसीटा गया था, फिर एक जगह पर ले गई जहाँ उनकी पिटाई की।

लेकिन मीडिया गिरोह, एक खास वर्ग और CAA की आड़ में विरोध प्रदर्शन के नाम पर दंगा करने वालों की पोल खोल देती है पुलिस। मुज़फ़्फ़रनगर के एसपी सतपाल अंतिल ने बताया, “मीनाक्षी चौक और महावीर चौक के बीच कम से कम 50,000 लोगों की भीड़ थी, जो पुलिस पर हमला कर रही थी और हिंसा और बर्बरता में लिप्त थी। जब हमने भीड़ को रोकने की कोशिश की, तो दंगाइयों एक समूह परिसर के अंदर गया और परिसर के अंदर से हम पर गोलीबारी शुरू कर दी। इसके बाद हमने परिसर में प्रवेश किया और फिर 70 लोगों को गिरफ़्तार किया।”

एसपी ने दावा किया, “प्रबंधन द्वारा पहचाने गए मदरसे के सभी छात्रों को रिहा कर दिया गया है। बाद में, प्रबंधन ने मदरसे के छात्रों को जल्द रिहा करने के लिए पुलिस की प्रशंसा की थी।”

सोशल मीडिया पर घूमती इस तस्वीर पर यूपी पुलिस ने ट्विटर के माध्यम से मुज़फ़्फ़रनगर पुलिस के ख़िलाफ़ झूठी अफ़वाहों और दुर्भावनापूर्ण अभियान के बारे में लोगों को सच्चाई से अवगत कराया। पुलिस ने बताया कि 20.12.2019 को मुज़फ़्फ़रनगर की घटनाओं में पुलिस कार्रवाई के कारण कोई हताहत नहीं हुआ था। बल्कि इसके उलट, दंगाइयों ने आगजनी कर वाहनों में आग लगाई, एक हिंसक भीड़ ने पुलिस पर फायरिंग की। इसके लिए FIR दर्ज की गई। फिर पुलिस ने विश्वसनीय साक्ष्य के आधार पर उपद्रवियों को गिरफ़्तार किया।

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मर गए 14 और बच्चे: कोटा के जेके लोन अस्पताल में टूटे हुए हैं ख़िड़की-दरवाजे, घूमते हैं सूअर

राजस्थान के कोटा के जेकेलोन अस्पताल में बच्चों की मौत का मामला थमने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले 5 दिनों में यहाँ 14 और बच्चों की मौत हो गई है। जिसके बाद इस अस्पताल में एक महीने के भीतर मरने वाले बच्चों की संख्या 77 से 91 पहुँच गई है। खुद, जेके लोन के नए अधीक्षक सुरेश दुलारा ने सोमवार को इसकी जानकारी देते हुए बताया कि अस्पताल के NICU और PICU में 25 दिसंबर से 29 दिसंबर के बीच 6 नवजात समेत 14 बच्चों की मौत हुई है। उन्होंने बताया कि इससे पहले 24 दिसंबर तक 77 शिशुओं की यहाँ मौत हुई थी और इनमें से 10 शिशुओं की मौत 23 दिसंबर और 24 दिसंबर को 48 घंटे के भीतर हुई थी।

बाल रोग विभाग के प्रमुख ने इस संबंध में कहा कि वह 25 दिसंबर तक 77 शिशुओं की मौत के पीछे के कारणों का विश्लेषण कर रहे हैं। बाद में जिन 14 शिशुओं की मौत हुई, उनमें से 4 की मौत गंभीर निमोनिया, 1 की मौत मेनिंगोएनसेफेलाइटिस, 4 की मौत जन्मजात निमोनिया, 3 की मौत सेप्सिस और 1 की मौत सांस संबंधी बीमारी के कारण हुई।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण (NCPCR) ने भी लिया संज्ञान

गौरतलब है कि अस्पताल में नवजात बच्चों की लगातार हो रही मौत पर राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण (NCPCR) ने भी संज्ञान लिया है। NCPCR के अध्यक्ष ने अस्पताल में हालातों को मुआएना करने के बाद कोटा के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) को तलब कर राज्य के चिकित्सा शिक्षा विभाग को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, NCPCR के अधिकारियों ने बताया कि आयोग ने कोटा के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) बीएस तंवर को 3 जनवरी तक पेश होने को कहा है। वहींं, राज्य के चिकिस्ता शिक्षा विभाग के सचिव वैभव गालरिया को भी कारण बताओ नोटस जारी कर 3 दिन के अंदर इस मामले की रिपोर्ट आयोग को सौंपने के लिए कहा गया है।

यहाँ बता दें कि NCPCR की रिपोर्ट के मुताबिक, अस्पताल की जर्जर हलात और वहाँ पर साफ-सफाई को बरती जा रही लापरवाही बच्चों की होतीं मौत का एक अहम कारण है। अपनी रिपोर्ट में NCPCR ने बताया है कि अस्पताल की ख़िड़कियों में शीशे नहीं हैं, दरवाजे टूटे हुए हैं, जिस कारण अस्पताल में भर्ती बच्चों को मौसम की मार झेलनी पड़ती है। इसके अलावा अस्पताल के कैंपस में सूअर भी घूमते पाए गए।

बच्चों की होती लगातार मौत पर भाजपा सख्त

राजस्थान सरकार एक ओर जहाँ इन मौतों को पिछले सालों के मुकाबले सबसे कम बताकर दरकिनार करने की कोशिश कर रही है, वहीं विपक्षी पार्टी भाजपा ने इस पर अपना कड़ा रुख अख्तियार किया हुआ है। इसके मद्देनजर बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने जाँच के लिए 4 सांसदों का एक पैनल बनाकर उन्हें 3 दिन में अपनी रिपोर्ट सौंपने को कहा है। इस पैनल में लोकसभा सांसद जसकौर मीणा, लॉकेट चटर्जी, भारती पवार और राज्यसभा सांसद कांता कर्दम शामिल हैं। अब यह टीम मंगलवार को यानी आज अस्पताल का दौरा करेगी और बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा को इसकी रिपोर्ट सौंपेगी।

इसके अलावा, नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के शीर्ष नेता एवं राजस्थान में भाजपा अध्यक्ष सतीश पूनिया ने रविवार को अचानक अस्पताल का निरीक्षण कर पहले ही दावा किया है कि अस्पताल में मासूम बच्चों को साफ हवा के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता है। यही नहीं, बीजेपी नेता का कहना है कि अव्यवस्था के बीच गंभीर बीमारियों से जूझते इन बच्चों की देखभाल के लिए नर्स नहीं, बल्कि उनकी माँ खड़ी रहती हैं।

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कानून से खेलो, हिंदुत्व की कब्र खोदो… क्योंकि वे जब आएँगे सारे गुनाह दफन हो जाएँगे

बिजनौर के 22 साल के सुलेमान के पीठ पर किसने हाथ रखी होगी कि उसने कॉन्स्टेबल मोहित के पेट में गोली मार दी? मेरठ की उस गली में लौंडों को किसने इशारा किया कि वे सिटी SP अखिलेश नारायण सिंह के सामने भी देश विरोधी नारे लगाने से नहीं डरे? वह कौन है जिसके कहने पर आतंकियों की आपा लदीदा फरज़ाना और आयशा रेना को विरोध का चेहरा बनाने की साजिश रची गई ? जामिया और अलगीढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में ‘हिंदुत्व की कब्र खुदेगी’ से लेकर ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ के नारों का हुक्म किसका था? किसकी शह पर आपके चुने हुए प्रधानमंत्री को वह हिटलर कह निकल जाता है? देश के गृह मंत्री को तड़ीपार कह आपके साथ खड़े रहने की हिमाकत वह कैसे कर लेता है? आगजनी, पथराव, हिंसा का हथियार उसके हाथ कौन थमाता है? राम मंदिर में अड़ंगा डालने वाला कथित इतिहासकार संवैधानिक पद पर बैठे गवर्नर को बोलने से रोकने की ढिठाई कैसे कर लेता है?

इनके लिए न तो संविधान का कोई मतलब है और न वे इस देश के कानून को मानते हैं। उन्हें पता है कि उनके पीछे एक पूरा गिरोह है। लंपट कॉन्ग्रेसियों, नीच वामपंथियों, वहाबियों, ईसाई मिशनरियों, भीमटों का गिरोह। सीमा पार से समर्थन। ये जानते हैं कि अलग-अलग वेश, नारों और झंडों से यह गिरोह बहुसंख्यकों को छलेगा। सत्ता में लौटेगा। तब उनकी पीठ सहलाई जाएगी, हर उस मौके के लिए जब उन्होंने संविधान और कानून को ठेंगा दिखाया होगा।

झारखंड में रविवार (29 दिसंबर 2019) को हेमंत सोरेन के नेतृत्व में नई सरकार बनी। कैबिनेट का पहला फैसला था- पत्थलगड़ी में शामिल लोगों पर दर्ज FIR वापस होगा। वैसे तो पत्थलगड़ी आदिवासियों की एक प्राचीन परंपरा है। अमूमन इसके जरिए मौजा, सीमा, ग्रामसभा और अधिकार की जानकारी दी जाती है। वंशावली, पुरखों और शहीदों की याद में भी पत्थलगड़ी की जाती रही है। लेकिन, 2017 में आदिवासियों की इस परंपरा की आड़ में देश के संविधान और कानून को चुनौती देने का सिलसिला झारखंड से शुरू हुआ था जो पड़ोसी छत्तीसगढ़ तक भी पहुॅंचा। इस दौरान हिंसा, हत्या, रेप, अपहरण जैसी घटनाएँ अंजाम दी गई। एक चुनी हुई सरकार को, देश के कानून को सीधे-सीधे चुनौती दी गई। जॉंच से यह तथ्य भी सामने आए कि इसके पीछे पूरा गिरोह, खासकर ईसाई मिशनरियॉं थी। कायदे से तो इस मामले की सुनवाई अदालतों में होनी चाहिए थी। अदालतों को तय करना चाहिए था कि जिन पर एफआईआर दर्ज हैं, वे दोषी हैं या निर्दोष। लेकिन, एक सरकार ने हिंसा के सारे सूत्रों को झटके में बेदाग कर दिया।

ऐसे में ताज्जुब नहीं होता है कि नतीजों के तुरंत बाद भावी मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन रांची के पुरुलिया रोड स्थित कार्डिनल हाउस पहुॅंचते हैं। आर्च बिशप फेलिक्स टोप्पो से आशीर्वाद लेते हैं। आर्च बिशप फेलिक्स टोप्पो खुलकर कहते हैं- हम सब भाजपा से डरे हुए थे। नई सरकार क्रिसमस गिफ्ट है। यहॉं तक कि सत्ता से भाजपा की विदाई के लिए बीते पॉंच साल से चर्चों में एक विशेष प्रेयर तक हो रहा था। एक धर्मगुरु और गैर कानूनी धर्मांतरण का धंधा चलानी वाली मिशनरीज यह सब करने और कहने की हिम्मत केवल इसलिए जुटा पाते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि एक सरकार आएगी और उनके हर गुनाह दफ़न कर देगी।

फरवरी 2016 में जेएनयू में राष्ट्रविरोधी नारे लगते हैं। इस मामले में 14 जनवरी 2019 को दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल 1,200 पन्नों की चार्जशीट दायर करती है। जेएनयू छात्र संघ का पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उमर खालिद मुख्य आरोपित है। शेहला रशीद, वामपंथी नेता डी राजा की बेटी अपराजिता, आकिब हुसैन, मुजीब हुसैन, मुनीब हुसैन सहित 36 छात्र आरोपित हैं। लेकिन, दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार इस मामले में केस चलाने की इजाजत ही नहीं दे रही है। सुरक्षा की यही गारंटी कन्हैया कुमार से लेकर शेहला रशीद तक को देश भर में घूम-घूमकर प्रोपेगेंडा फैलाने की इजाजत देता है। कभी सेना के नाम पर झूठे आरोप लगाने तो कभी आपके चुने हुए प्रधानमंत्री को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी करने की आजादी देता है। इन्हें पता है कि पीठ पर हाथ सहलाने के लिए गिरोह पीछे खड़ा है। मौका मिलते ही उनके दाग भी धो देगा।

महाराष्ट्र में भी अर्बन नक्सलों को क्लीनचिट देने की कोशिशें शुरू हो गई हैं। महाविकास अघाड़ी की सरकार बनते ही एनसीपी विधायक जितेंद्र आव्हाड ने सुधीर धावले को जेल से रिहा करने की सिफारिश मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे से की। भीमा-कोरेगाँव मामले में दर्ज मामले वापस लेने की मॉंग की। जनवरी 2018 को भीमा-कोरेगाँव में हुई हिंसा का धावले मास्टरमाइंड माना जाता है। यदि आने वाले दिनों में अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर धावले से लेकर सुधा भारद्वाज तक देश के किसी कोने में फिर से चुनी हुई सरकार के खिलाफ हिंसा की साजिश रचते दिखें तो चौंकिएगा मत।

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के नाम पर हिंसा करने वालों को भी बचाने का खेल पहले दिन से ही चल रहा है। छात्रों का हवाला दे सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया गया। प्रियंका गॉंधी सार्वजनिक तौर पर उस पुलिस को अराजक बता रही हैं जो दंगाइयों के निशाने पर थे। उस पर धर्म विशेष के लोगों को प्रताड़ित करने का आरोप लगा रही हैं।

​प्रियंका गॉंधी ने ऐसे ही नहीं कह दिया कि यह भगवा आपका नहीं है। जब वे ऐसा कह रही होती हैं, तब उन्हें पता होता है कि छलना ही आपकी नियति है। ज्यादा दिन नहीं हुए जब उनके सामने ही हेमंत सोरेन ने कहा था- गेरुआ पहन बहू-बेटियों की इज्जत लूटने का काम करते हैं। उनकी आँखों ने उस भीड़ में बैठकर इस बात पर आपको भी ताली पीटते देखा था। जबरन धर्मांतरण रुकवाने वाली सरकार को सत्ता से बेदखल करते भी उन्होंने आपको देखा है। वे जानती हैं जब वे लौटेंगी तो भगवा आतंकवाद गढ़कर हिंसक भीड़ का मजहब छिपा लेंगी और आप लिबरल दिखने के लिए ताली पीटते रहेंगे।

वक़्त है चेत जाने का। अपनी आवाज खुद बनने का। मीडिया के भरोसे आप बैठे नहीं रह सकते। यह मीडिया उनका ही पाला-पोसा है। यह मीडिया ‘मेरा गला दबाया’ के उनके झूठे आरोपों पर बवाल काटता है। लेकिन, आपको नहीं बताता कि झूठ बोल रही नेता की सुरक्षा में लगी लेडी अफसर के साथ बदतमीजी हुई थी। वह नहीं बताता है कि वह अधिकारी इतनी कत्वर्यनिष्ठ है कि भाई की मौत होने के बाद भी अपनी ड्यूटी निभा रही थी। यह मीडिया प्राइम टाइम में चुन-चुन कर आपको फ्रेम दिखाता है ताकि मजहबी भीड़ पीड़ित दिख सके। वह सुलेमान के यूपीएसएसी की तैयारी करने की स्टोरी बुनता है ताकि उसके हाथ का कट्टा छिप जाए।

इसलिए नहीं चेते तो 2020 भी किसी 20-20 मैच की तरह हाथ से फिसल जाएगा। वक्त ड्रेसिंग रूम में बैठकर अफसोस करने का नहीं, खुद की आवाज बनने का है।

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