जीसस क्राइस्ट या ईसा मसीह कोई अनजान नाम नहीं है। दुनिया में सबसे ज़्यादा पालन किए जाने वाले धर्म ईसाइयत में उन्हें ‘सन ऑफ गॉड’, अर्थात परमात्मा के पुत्र के नाम से जाना जाता है। हालाँकि, इस बारे में अक्सर सवाल उठते रहते हैं कि ईसा मसीह को ज्ञान कहाँ से प्राप्त हुआ? कुछ पुराने दस्तावेजों से ये भी पता चलता है कि ईसा मसीह ने बौद्ध भिक्षुओं व लामाओं से आत्मा और परमात्मा के गुर सीखे, फिर वापस इजरायल लौटकर उसे अन्य लोगों को बताया।
इस बारे में रूसी लेखक निकोलस निकोविच ने अपनी पुस्तक ‘Lavie inconnue de Jesus Christ (Life of Saint Issa)’ में काफ़ी कुछ लिखा है। यह क़िताब 1894 में लिखी गई थी। इसमें उन्होंने एक अनुभवी लामा से बात की थी, जिसने उन्हें बताया कि बौद्ध लामा ‘ईसा’ का नाम सम्मान से लेते हैं, क्योंकि उन्होंने भारत आकर हिन्दुओं व बौद्धों से काफ़ी कुछ सीखा था। इन्हीं चीजों को उन्होंने इजरायल जाकर अपने अन्य अनुयायियों को सिखाया।
असल में, अनुभवी लामा ने निकोलस को बताया कि ईसा के बारे में काफ़ी कम बौद्धों को जानकारी है। केवल वही लामा उन्हें जानते हैं, जिन्होंने पुराने दस्तावेज पढ़े हैं। लामा ने बताया कि अनंत बुद्ध हुए हैं, जिनके बारे में 84,000 दस्तावेज हैं। उन सभी में उन बुद्धों के जीवन का जिक्र है। इनमें से एक बुद्ध ईसा को भी माना गया है। लामा ने बताया कि बुद्ध ब्रह्म के अवतार थे। उन्होंने बताया कि इसी तरह के कई अवतार हुए हैं, जिनमें से एक गौतम बुद्ध थे। इसी तरह, ईसा का भी एक पवित्र बालक के रूप में जन्म हुआ। लामा ने निकोलस को बताया कि उस बच्चे को ज्ञान प्राप्ति के लिए भारत लाया गया।
15. The cave that Jesus lived in. Issa Muquam – The Abode of Issa
He took the silk route – travelled to Europe to Turkey and then on to India – Rajputana (Rajasthan) Jagannath Puri Rājagṛiha, studied in Nalanda Ladakh (India) Kathmandu (Nepal) pic.twitter.com/taWwRIIFSN
बकौल लामा, जब बौद्ध धर्म चीन में फ़ैल रहा था, तभी बुद्ध के सन्देश इजरायल तक भी पहुँचे और लोग इससे अवगत हुए। निकोलस ने अनुभवी लामा के हवाले से लिखा है कि ईसा जब तक वयस्क नहीं हो गए, तब तक भारत आकर वो बुद्ध के बारे में पढ़ते रहे और भिक्षुओं के साथ रहे। यहीं उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई। ईसा की ज़िंदगी से जुड़े दुर्लभ बौद्ध दस्तावेजों को भारत से नेपाल लाया गया और फिर वहाँ से तिब्बत भेजा गया। ये दस्तावेज प्राचीन पाली भाषा में लिखे हुए हैं। लामा ने उस समय बताया था कि वो ल्हासा में हैं। इसे तिब्बती भाषा में भी अनुवादित किया गया था।
निकोलस लिखते हैं कि ब्राह्मण ईसा से नाराज़ थे क्योंकि उन्होंने भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों को नकार दिया था। ब्राह्मणों ने उनकी जान लेने की कोशिश की, जिसके बाद उन्हें कुछ लोगों की मदद से नेपाल के पहाड़ों में छिपना पड़ा था। हालाँकि, इन बातों में कितनी सच्चाई है, इसकी पुष्टि नहीं हो सकती है और आधुनिक इतिहासकारों ने ईसा के भारत आने की बात नकार दी है। इसी तरह ‘यूनिवर्सिटी ऑफ साउथर्न कैलिफॉर्निया’ से एमए कर चुके रिचर्ड मार्टीनी कहते हैं:
“जब मैं हिमालय पर स्थित हेमिस में बैठा हुआ था, तभी एक लामा ने आकर मुझसे कहा कि क्या तुम्हें पता है, ईसा यहाँ से पढ़े थे। मैं एक पल के लिए चौंक गया। उस बौद्ध भिक्षु ने मुझे बताया कि जिन्हें तुम जीसस कहते हो, उन्हें हमलोग यहाँ ईसा के नाम से जानते हैं।”
Ahmadi Muslims hold the unique belief that #Jesus (peace be upon him) survived the #crucifixion and travelled towards India to continue his ministry among the Lost Tribes of Israel. Learn More: https://t.co/MXW0az278p
निकोलस अपनी पुस्तक में ये भी लिखते हैं कि ईसा सिल्क रूट से भारत आए थे। सिल्क रूट पर एक इजरायली ट्राइब के होने के भी सबूत मिले हैं, ऐसा कई रिसर्चर्स ने दावा किया है। अहमदिया मुस्लिमों के एक बड़े वर्ग का भी मानना है कि जीसस को जब क्रॉस पर लटकाया गया था, उसके बाद वो पुनर्जीवित हो भारत पहुँचे थे। इससे उनके पीछे पड़े दुश्मनों की नज़रों से भी वो ओझल हो गए और उन्हें अपने ज्ञान का प्रचार-प्रसार करने के लिए नए लोग मिले। हालाँकि, इन सबके कोई स्पष्ट सबूत नहीं हैं।
नागरिकता संशोधन क़ानून लागू होने के साथ ही तीन पड़ोसी इस्लामिक देशों के पीड़ित अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता मिलने की राह साफ़ हो गई। ऐसी स्थिति में यूपीएससी की तैयारी करने वाला एक आदर्श छात्र क्या करेगा? आदर्श छोड़िए, एक सामान्य छात्र क्या करेगा, जो किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहा हो? वो इस क़ानून की प्रति डाउनलोड करेगा, उसे बार-बार पढ़ेगा और समझेगा कि इस क़ानून का मतलब क्या है, ये लाया क्यों गया है और इसके लागू होने के बाद क्या होगा? कुछ छात्र नोट्स बनाएँगे कि इस क़ानून के मुख्य बिंदु क्या हैं? कुछेक दूसरों को समझाएँगे और आपस में इस पर चर्चा करेंगे।
अब मैं आपको दूसरी स्थिति बताता हूँ। यूपीएससी की तैयारी करने वाला और सरकारी अधिकारी बनने के स्वप्न देखने वाला एक छात्र इस क़ानून के लागू होते ही अपना देशी कट्टा निकाल कर दंगा करता है, आगजनी करता है और पुलिस पर गोली चलाता है। इसके बाद वह अपने साथियों के साथ मोहित नामक पुलिसकर्मी पर हमला कर देता है। चूँकि वह गोली चलाता है और उसके साथी मोहित की जान लेने को उतारू हो जाते हैं, पुलिसकर्मी मोहित आत्मरक्षा में गोली चलाता है, जो उस यूपीएससी के छात्र को लगती है। उसके दोस्त उसे उठा कर वहाँ से भागते हैं। बाद में उसे मृत घोषित कर दिया जाता है।
पहले पैराग्राफ में जिन यूपीएससी छात्रों की बात की गई है, उन्हें मीडिया पूछता तक नहीं। वहीं दूसरे केस में यूपीएससी का जो छात्र है, वो मीडिया के लिए ‘हीरो’ बन जाता है, एक ‘शहीद’ बन जाता है, जो भविष्य में आईएएस अधिकारी बन कर शायद देश की तस्वीर ही बदल देता। उसकी बहन का बयान मीडिया में चलाया जाता है, जिसमें वो पुलिसवालों को ‘जालिम’ और ‘आतंकवादी’ बताती हैं। उसके पिता के बयान को प्रमुखता दी जाती है, जो अपने बेटे की ‘मेहनत’ की दाद देते हैं। मीडिया इस बात को प्रचारित करता है कि कैसे वो दिन-रात पढ़ता ही रहता था।
देशी कट्टा लहराते हुए पुलिसवालों से मुठभेड़ करने वाला यूपीएससी का ‘मेहनती छात्र’ सिर्फ़ मीडिया ही नहीं बल्कि राजनीति में भी छा जाता है। कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी उसके परिजनों से मिलने जाती हैं और पुलिस व सरकार को कोसती हैं। यह सब क्यों? ये सब इसीलिए, क्योंकि उसका नाम सुलेमान था। और जिस पुलिस ने गोली चलाई, वो ‘योगी आदित्यनाथ की पुलिस’ थी। सरकारें आती-जाती रहती हैं लेकिन पुलिस अपनी ड्यूटी निभाती रहती है लेकिन घायल मोहित की इतनी ही ग़लती है कि यूपी की जनता ने योगी को सीएम की कुर्सी पर बिठाया है।
ये घटना बिजनौर की है। सुलेमान ने पुलिस पर गोली चलाई, जो कॉन्स्टेबल मोहित के पेट में लगी। गुंडों ने सब-इंस्पेक्टर आशीष का पिस्टल भी छीन लिया था। कोई रास्ता न देखते हुए आत्मरक्षा में मोहित को फायर करना पड़ा और सुलेमान मारा गया। आशीष और मोहित की जान जाती तो शायद ही मीडिया या विपक्षी नेता उनके परिजनों को पूछने भी आते, लेकिन चूँकि मरने वाला सुलेमान था, इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि वो कैसे मरा, किन परिस्थितियों में मोहित ने गोली चलाई और मरने से पहले सुलेमान ने क्या किया था? वो देशी कट्टा लहराते हुए घूम रहा था, अपने दंगाई साथियों के साथ आगजनी में लगा था, पुलिसकर्मियों की जान लेने को उतारू था और उसने पुलिस पर गोली चलाई- यह सब माफ़ है। क्यों? क्योंकि उसका नाम सुलेमान है।
इस घटना को देखते हुए रामलीला मैदान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कही गई बात प्रासंगिक लगने लगती है, जिसमें उन्होंने दिल्ली पुलिस के साथ हिंसा करने वालों को समझाया था। रविवार (दिसंबर 22, 2019) को पीएम मोदी ने दंगाइयों को सन्देश देते हुए कहा था:
“जिन पुलिसवालों पर आप पत्थर बरसा रहे हैं, उन्हें जख्मी करके आपको क्या मिलेगा? मत भूलिए, आजादी के बाद 33 हजार से ज्यादा पुलिसवालों ने शांति के लिए, आपकी सुरक्षा के लिए अपना बलिदान दिया है। जब कोई संकट आता है, कोई मुश्किल आती है, तो पुलिस ये नहीं पूछती कि आपका धर्म क्या है।”
पीएम ने पूछा था कि पुलिस पर पत्थर बरसाने से क्या मिलेगा? दिल्ली में ऐसे ही एक ‘नवयुवक’ को वक़्फ़ बोर्ड ने नौकरी दी है। उत्तर प्रदेश में हिंसा करते हुए मारे गए ऐसे ही लोगों के घरों पर नेताओं व मीडियाकर्मियों का ताँता लगा हुआ है। घायल मोहित के घर कितने नेता गए? मोहित के परिजनों से कितने मीडिया वालों ने बातचीत की? ऐसे-ऐसे कई मोहित हैं, जिन्होंने इस सीएए विरोध प्रदर्शन के दौरान दंगाइयों का सामना किया। पुलिस से पिस्टल छीन लेने का मतलब है कि पुलिस उपद्रवियों को आम नागरिक समझते हुए उनके साथ नरमी बरत रही थी। इस नरमी का ग़लत फ़ायदा उठा कर पुलिस पर ही गोली चलाई गई।
अब जरा मीडिया के प्रोपेगेंडा पर एक नज़र डाल लें। शुरुआत करने के लिए ‘द क्विंट’ से ज़्यादा अच्छा क्या रहेगा? इस प्रोपेगेंडा पोर्टल ने बताया कि कैसे ‘बेचारे’ सुलेमान ने ‘कंट्री मेड पिस्टल’ से एक छोटा सा फायर किया, और इससे पुलिसकर्मी मोहित को छोटी सी गोली लग गई। पुलिस के उस बयान को ज्यादा हाइलाइट किया गया, जिसमें आत्मरक्षा में गोली चलाए जाने की बात कही गई। देखिए:
पुलिस से सुलेमान को मार डाला: ‘The Quint’ का नैरेटिव
इसके बाद शेखर गुप्ता के ‘द प्रिंट’ ने एक क़दम और आगे बढ़ते हुए ‘यूपीएससी छात्र’ सुलेमान के माता-पिता और बहन के बयानों को हाइलाइट करते हुए दिखाया कि कैसे पुलिस ने ही उसे मार डाला। ‘द प्रिंट’ की एकतरफा पत्रकारिता का एक नमूना देखिए:
शेखर गुप्ता की वेबसाइट ने सलमान के परिवार वालों के बयान को दी ज्यादा तवज्जो
‘स्क्रॉल’ ने सुलेमान की उम्र दिखाई, जैसे कि वह कोई दुधमुँहा बच्चा हो, जिसने ‘दूधपीलाई’ की जगह ग़लती से बन्दूक पकड़ ली और उससे गोली चल गई। उसने लिखा कि ऐसा ‘पाया गया है’ कि सिविल सर्विस की तैयारी करने वाले सुलेमान की मौत एक पुलिस कॉन्स्टेबल की गोली से हुई। इसे आप यहाँ देखें:
‘स्क्रॉल’ का जोर इस बात पर था कि वो मरा तो पुलिस की गोली से ही ना…
मेनस्ट्रीम मीडिया ने भी इसी नैरेटिव को आगे बढ़ाया। इंडिया टुडे:
‘इंडिया टुडे’ ने भी सुलेमान के मारे जाने को पुलिस की ग़लती की तरह दिखाया
ऐसे मामलों में भला ‘इंडियन एक्सप्रेस’ कैसे पीछे रहता? उसने सुलेमान की माँ की रोती हुई फोटो लगा कर पुलिस की ‘पहली स्वीकारोक्ति’ को हेडलाइन में जगह दी। इसे ऐसे पेश किया गया जैसे पुलिस ने कोई बहुत बड़ी ग़लती कर दी हो। ये देखिए:
आखिर ‘स्क्रॉल’ ने भी तो अपना कंटेंट यहीं से लिया था
मीडिया के लिए यह सब नया नहीं है क्योंकि आतंकवादियों के मारे जाने के बाद उसके ‘अदर साइड’ को दिखाने और उसके ‘बेचारे’ माँ-बाप का इंटरव्यू लेने के लिए पत्रकारों की भीड़ उमड़ती है। अब यही ट्रेंड हर जगह चल पड़ा है, जिससे समाज के एक वर्ग को काफ़ी ‘प्रोत्साहन’ भी मिला है। वो हमेशा ‘पीड़ित’ ही रहेंगे, भले ही वो ख़ून कर दें या रेप कर लें। वो हमेशा सहानुभूति के पात्र रहेंगे, विपक्षी नेताओं के लिए, मीडिया के लिए और बुद्धिजीवियों के एक बड़े वर्ग के लिए भी। ऐसा ही सुलेमान के मामले में भी हुआ। मोहित खतरे से बाहर हैं या नहीं, किस हॉस्पिटल में हैं और उन्हें हुए नुकसान का स्तर क्या था, इससे किसी को मतलब नहीं।
एक देश है बुल्गारिया। यह अपने गुलाबों के लिए प्रसिद्ध है। दुनिया भर के रोज़ ऑइल का 85% उत्पादन यहीं से होता है। प्राकृतिक सुंदरता तो खैर है ही इस देश की। वैसे बुल्गारिया एक इंसान को लेकर भी फेमस है – बाबा वाँगा। जी हाँ, वही भविष्यवक्ता, जिन्होंने 9/11 हमले से लेकर सुनामी तक की सटीक भविष्यवाणी की है।
बाबा वाँगा की एक और भविष्यवाणी आई है। यह बहुत ही खौफनाक और भयावह है। बाबा वाँगा की भविष्यवाणी के अनुसार 2020 में यूरोप पर मुस्लिम आतंकियों की एक पूरी सेना रासायनिक हमला कर सकती है। और यह हमला छोटा-मोटा अटैक जैसा नहीं होगा। यह हमला ऐसा होगा, जिससे पूरे यूरोप का अस्तित्व मिट सकता है।
11 अगस्त 1996 को बाबा वाँगा की मौत हो गई थी। हालाँकि अपनी मौत से पहले ही उन्होंने हजारों साल आगे (सन 5079) तक का भविष्य देख लिया था।
यूरोप पर समुदाय विशेष के कट्टरपंथी आतंकियों के केमिकल अटैक के अलावा 2020 जिन बड़ी और वैश्विक घटनाओं को लेकर उन्होंने भविष्यवाणी की है, उनमें ये दो भी प्रमुख हैं – (i) रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पर हमला होगा (ii) अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप संदिग्ध बीमारी का शिकार होंगे, जिससे वो बधिर तक हो सकते हैं, उनकी मौत तक हो सकती है।
पुतिन को लेकर बाबा वाँगा ने जो भविष्यवाणी की है, उसके अनुसार रूसी राष्ट्रपति के आस-पास के लोग, उनके राजनीतिक सर्कल के लोग ही उन पर हमला करवना सकते हैं। हालाँकि वो इस हमले में मारे जाएँगे या बचेंगे, यह भविष्यवाणी में नहीं बताया गया है।
आपको बता दें कि बाबा वाँगा 12 साल की उम्र में एक तूफान में कहीं खो गईं थीं। कई दिनों बाद जब वो अपने परिवार को मिलीं तो आँखों में मिट्टी भर जाने के कारण उनके आँखों की रोशन चली गई थी। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वो चमत्कारी था। उन्हें भविष्य में होने वाली चीजों का आभास होने लगा था। बराक ओबामा के राष्ट्रपति बनने से लेकर सुनामी और 5079 में दुनिया के अंत तक की भविष्यवाणी वो कर चुकी हैं।
पिछले कई दिनों से देशभर में एनआरसी और सीएए के विरोध पर बवाल मचा हुआ है। लोग नागरिकता संशोधन कानून के साथ ही संभावित NRC को लेकर मीडिया और वामपंथियों और विपक्षी राजनीतिक पार्टियों द्वारा फैलाए भ्रम के कारण सडकों पर थे। बता दें कि आज मंगलवार को केंद्रीय कैबिनेट द्वारा राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को अपडेट करने को भी मंजूरी दी गई है। अप्रैल से दिसंबर तक NPR की प्रक्रिया चलेगी। इसमें नागरिकों का एक रजिस्टर बनाया जाएगा। इसके बाद ही इस बात की भी चर्चा शुरू हो गई थी कि एनपीआर और एनआरसी में क्या कोई संबंध है? एनपीआर को लेकर भी लोगों में भ्रम न फैलाया जाए। उसे मद्देनजर रखते हुए ANI को दिए इंटरव्यू में केंद्रीय गृह मंत्री और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने, एनपीआर, एनआरसी, सीएए और डिटेंशन सेंटर जैसे मुद्दों पर खुलकर जवाब दिया।
#WATCH Home Minister Amit Shah to ANI: There is no need to debate this( pan-India NRC) as there is no discussion on it right now, PM Modi was right, there is no discussion on it yet either in the Cabinet or Parliament pic.twitter.com/hgHJ3IBFCO
ANI से बातचीत करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने कहा मैं एक बार स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि NRC और एनपीआर में कोई भी संबंध नहीं है। एनआरसी के मुद्दे पर गृहमंत्री ने कहा, अभी इस पर बहस की कोई जरूरत नहीं है। अभी इस पर मंत्रिमंडल में कोई बात नहीं हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मुद्दे पर पहले ही सब साफ कर चुके हैं। इस पर अभी न ही कैबिनेट में और न ही पार्लियामेंट में कोई चर्चा हुई है।
Home Minister Amit Shah to ANI: There is no connection between detention center and NRC or CAA. The center has been there for years and is for illegal migrants. Misinformation is being spread on this. pic.twitter.com/OAHlt8V96e
एनपीआर के समय पर सवाल पर उन्होंने कहा, “इसे सीएए या एनआरसी से जोड़ना गलत है। हमने जुलाई 2019 में ही एनपीआर के लिए नोटिफिकेशन जारी कर दिया था। तो ये कहना कि हम इसे इस समय क्यों लाए, इस पर सवाल उठाना गलत है।
नागरिकता संशोधन कानून पर देशभर में हुए विरोध को लेकर अमित शाह ने कहा कि नागरिकता कानून को लेकर सबसे ज्यादा उत्तर पूर्वी राज्यों में विरोध की उम्मीद थी, लेकिन वहाँ तुलनात्मक रूप से शांति रही। बाकी जगहों पर राजनीतिक विरोध हुआ है।
#WATCH Home Minister Amit Shah speaks to ANI on National Population Register, NRC/CAA and other issues. https://t.co/g4Wl8ldoVg
NPR को लेकर विस्तृत जानकारी देते हुए गृहमंत्री ने कहा कि देश की जनगणना का संवैधानिक प्रोविजन 10 साल में करने का है। 2011 में पिछली जनगणना हुई थी, इसलिए अगली 2021 में होनी है। जनगणना की प्रक्रिया अप्रैल 2020 में शुरु होगी। तब मकानों की मैपिंग शुरु होगी। पूरी जनगणना और एनपीआर 2021 में होगा।
गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि एनपीआर को लेकर कहीं पर भी देश के किसी भी नागरिक को मन में ये शंका लाने का कोई कारण नहीं है और खासकर अल्पसंख्यक भाई-बहनों को कि इसका उपयोग एनआरसी बनाने के लिए होगा, इसका इससे कोई लेना-देना नहीं है। NPR को लेकर कोरी अफवाहें फैलाई जा रही हैं। अप्रैल 2019 से पूरे देश में कराई जाने वाली जनगणना को लेकर अमित शाह ने कहा कि एनपीआर हमारा या हमारे घोषणापत्र का एजेंडा नहीं है। यह कॉन्ग्रेस सरकार लेकर आई थी। अच्छी योजना है, इसलिए इसे हम भी इसे आगे बढ़ा रहे हैं।
Home Minister Amit Shah to ANI: It is possible that some names are missed in the NPR, still their citizenship will not be revoked because this is not the process of NRC. The NRC is a different process. I want to make it clear that nobody will lose citizenship because of NPR. pic.twitter.com/JnSdPwIKxx
गृहमंत्री अमित शाह ने यह भी कहा कि मैं जनता को बताना चाहता हूँ कि एनपीआर का इस्तेमाल एनआरसी के लिए नहीं हो सकता है। एनपीआर के डेटा का इस्तेमाल सरकारी योजनाओं को लोगों तक पहुँचाने के लिए होता है।
डिटेंशन सेंटर के सवाल पर गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि मेरी जानकारी के हिसाब से असम में एक डिटेंशन सेंटर है, कोई और डिंटेशन सेंटर मेरी नजर में नहीं है। और वो भी प्रक्रिया का हिस्सा है। जब भी कोई अवैध नागरिक देश में कहीं पकड़ा जाता है तो उसे कहीं तो रखेंगे। जेल में नहीं रख सकते। उसे एक जगह रखते है और फिर उसे डिपोर्ट करने की प्रक्रिया शुरू होती है। ये नया नहीं है ये सब प्रक्रिया का ही हिस्सा है।
#WATCH HM Amit Shah to ANI on Kerala and West Bengal say no to NPR: I humbly appeal to both Chief Ministers again, that don’t take such a step and please review you decisions, don’t keep the poor out of development programs just for your politics. pic.twitter.com/DaomdBQTdR
नागरिक संशोधन कानून (CAA) पर असदुद्दीन ओवैसी की आलोचना पर गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि अगर हम कहें कि सूर्य पूर्व से उगता है तो ओवैसी जी कहते हैं कि यह पश्चिम से नहीं उगता, वह हमेशा हमारे रुख का विरोध करते हैं। फिर भी मैं उन्हें फिर से विश्वास दिलाता हूँ कि CAA का NRC से कोई लेना-देना नहीं है।
गौरतलब है कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA)-2019 के खिलाफ देश के कई हिस्सों में जमकर विरोध प्रदर्शन और हिंसक घटनाए हुईं हैं। दिल्ली से लेकर मुंबई और लखनऊ से लेकर बेंगलुरु तक प्रदर्शनकारी इस कानून के खिलाफ सड़कों पर उतर आए थे। भारी संख्या में अफवाह फ़ैलाने और आगजनी तथा हिंसा के आरोप में गिरफ्तारियाँ हुई हैं। वहीं, अभी भी कई राज्यों एवं शहरों में प्रदर्शनकारी नागरिक संशोधन कानून (CAA) और एनआरसी का विरोध कर रहे हैं। संभव है गृहमंत्री के इस स्पष्टीकरण से अब इस तरह की अफवाहों पर लगाम लगे।
पिछले दिनों में दो खबरें आई हैं जो पढ़ कर आपको लगेगा कि ये भीम-मीम, वामपंथी-दंगाई, नक्सली-आतंकी इकोसिस्टम किस तरह से काम करता है, और फिर अपने लोगों को कैसे हिंसा करने को उकसाता रहता है। एक लड़का था जिसकी आँख जामिया वाली आगजनी, पत्थरबाजी और हिंसा में चली गई। उसकी आँख किसने फोड़ी ये किसी को पता नहीं, लेकिन इतना सबको पता है कि उस दंगे में शास्त्रीय संगीत में तबले और बाँसुरी की जुगलबंदी तो बिलकुल नहीं चल रही थी। उस लड़के को दिल्ली वक्फ बोर्ड ने नौकरी देने का फैसला लिया, साथ ही कथित तौर पर दंगा भड़काने वाला आम आदमी पार्टी विधायक अमानतुल्ला खान ने पाँच लाख रुपए भी दिए।
दूसरी घटना है अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की जहाँ, ताजा खबरों के अनुसार, पुलिस ने CCTV फुटेज में पाया कि छात्रों ने किस तरह से सोच-समझ कर तोड़-फोड़ और हिंसा की है। वहीं के एक तथाकथित छात्र तारिक मोहम्मद को दंगा के दौरान, उसके अनुसार, आँसू गैस के गोले लगने से उसका हाथ नाकाम हो गया। उसे वहीं के कैमिस्ट्री विभाग में ‘मानवीय आधार’ पर असिस्टेंट प्रोफेसर की नौकरी देने का प्रावधान किया है।
ऐसे ही, बिजनौर में दंगों के दौरान सुलेमान नाम का 20-वर्षीय UPSC अभ्यर्थी, पुलिस कॉन्सटेबल मोहित पर अपने देसी कट्टे से गोली चलाता है, जो कि कॉन्सटेबल मोहित के पेट में लगती है। उनके साथ सब-इंस्पेक्टर आशीष से दंगाई पिस्तौल छीन कर भाग जाते हैं। (अब लोग यह भी पूछेंगे कि पुलिस कैसी है कि लोग पिस्तौल छीन कर भाग जाते हैं!) गोली के हमले से घबराए मोहित अपनी सर्विस रिवॉल्वर से सुलेमान पर गोली चलाते हैं। सुलेमान बाद में मर जाता है। मीडिया में आधी कहानी चलती है कि पुलिस ने स्वीकारा कि सुलेमान को उनकी गोली लगी थी। फिर उसे देश का अगला IAS बताया जाने लगता है। कोई ये नहीं पूछता कि सुलेमान 20 साल में ही, कट्टा लेकर क्या IPS बनने की ट्रेनिंग कर रहा था?
क्विंट ने हेडलाइन में पुलिस को दोषी और सुलेमान को निर्दोष और UPSC अभ्यर्थी बताने की चेष्टा में कमी नहीं की
बाकी जगहों की खबरों में आप लगातार पाएँगे कि दंगाइयों को पूरा वामपंथी गिरोह लगातार ‘मासूम’ बताने में लगा हुआ है और इनके मजहबी उन्माद को लगातार नैरेटिव से गायब करने की कोशिश कर रहा है। जबकि, यह बात रोशनी और अंधेरे की तरह साफ है कि चाहे वो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी हो या जामिया मिलिया इस्लामिया, दोनों जगहों के छात्रों ने बड़ी भीड़ के सामने हिन्दू घृणा से सने नारों को ध्वनि से सहमति दी है। यहाँ PFI और ISIS के लोग निजी स्तर पर फ़ोन करके, कैराना से हथियार भिजवा कर, भीड़ में हिस्ट्री-शीटरों को घुसा कर तैयारी कर रहे हैं और आप को लगता है कि ये दंगे ऑर्गेनिक हैं?
इन जगहों के छात्रों को ‘हिन्दुओं से आजादी’ चाहिए। इन जगहों के छात्र ‘हिन्दुत्व की कब्र खुदेगी’ की बात करते हैं। यहाँ की दीवारों पर हिन्दुओं को कैलाश पर्वत पर भेजने की बातें लिखी हुई हैं। यहाँ के छात्र भीड़ को उकसा रहे हैं कि ‘अब समय आ गया है कि गलियों में उतरा जाए और एक दूसरे से पूछा जाए कि तेरा मेरा रिश्ता क्या…’। इन दंगाइयों के समर्थक ‘फक हिन्दुत्व’ का पोस्टर ले कर आते हैं और उसमें ‘ॐ’ के पवित्र प्रतीक चिह्न को नाजियों के प्रतीक की तरह दिखाते हैं।
ये सब क्या हो रहा है, क्या हिन्दुओं की समझ में नहीं आ रहा? इन पोस्टरों और नारों के जवाब में तख्ती ले कर फर्जी एक्सेंट में जीभ मरोड़ कर ‘या एक्च्वली… देअर इज़ अ लॉट ऑफ़… वी आर ऑल प्रोटेस्टिंग…’ गुनगुनाने वाले क्या बोलेंगे? इन्हें तो जब सीधा पूछा जाता है कि किस बात का विरोध कर रहे हो, तो मुस्कुराने लगते हैं, और फिर भाग जाते हैं।
नवयुवकों और नवयुवतियों से कुछ सवाल
उन नवयुवकों से मेरा सवाल यह है कि तुम लोग जो संवेदनशील हो रहे हो कि पुलिस हिंसा कर रही है, तो तुम्हारी संवेदना उस बात पर क्यों नहीं है कि दंगा करने से सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान होता है? तुमने आग लगाने वाले को क्लीन चिट कैसे दे दी? बल्कि तुम्हारी समझ में ऐसी विकृति आ गई है जहाँ तुम दंगाइयों को रोकने में असफल पुलिस पर भी सवाल उठाओगे, वो लाठीचार्ज करे तब भी सवाल उठाओगे।
लेकिन बात वही है कि पुलिस तुम्हारे 5 साल के कूढ़मगज अनुभवों के आधार पर फैसला नहीं करती। पुलिस के पास मेरी या तुम्हारी कम्फर्टेबल पोजिशन की लग्जरी नहीं है जहाँ हम कुर्सियों पर बैठ कर पुलिस को ज्ञान दे रहे हैं, पुलिस उस दस हजार की भीड़ के बीच खड़ी होती है जहाँ कोई कट्टा ले कर आया है, कोई घर से माचिस ले कर चला है, किसी की जेब में पेट्रोल की बोतलें हैं, कोई मजहबी लौंडा अपने इस महान कार्य के लिए किसी हिन्दू को अपना बाप बना कर पत्थरबाजी करने में शरीक हो रहा है।
और तुम कहते हो कि पुलिस हिंसा कर रही है। पुलिस की हिंसा कब होती है, वो ठीक से समझो। पुलिस अगर एक शांत इलाके में, जहाँ लोग अपने घरों में हैं, बच्चे स्कूलों में हैं, व्यापारी दुकानों में हैं, नवयुवक ऑफिसों में हैं, सड़क पर सामान्य ट्रैफिक है, वहाँ अचानक से ट्रकों से उतरती है, घरों में घुसती है, और मारने-पीटने लगती है, तब कहेंगे कि पुलिस हिंसा कर रही है।
अगर पुलिस, घर से पेट्रोल बम ले कर चले दंगाइयों को पहले रोकने की कोशिश करती है, लाउडस्पीकर से अपील करती है, पत्थरबाजी झेलती है, फिर उनके शांत होने का इंतजार करती है, फिर देखती है कि दंगाई बसें जला रहे हैं, कट्टों से गोलियाँ चला रहे हैं, पेट्रोल बम फेंक रहे हैं, तब पुलिस आत्मरक्षा में हर वो उपाय करेगी जो कानूनी है। कोर्ट ने पहले भी दंगाइयों का पक्ष सुनने से इनकार किया है, और कल भी दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस को ऐसे फसादियों की बेल याचिका खारिज करते हुए दो सप्ताह की कस्टडी दी है।
पुलिस शुरुआत नहीं कर रही, पुलिस तो अति हो जाने पर अंत करने के लिए आ रही है क्योंकि उसे आना पड़ रहा है। इसका मतलब यह भी नहीं कि पुलिस हर बार और हर जगह सही ही होती है। लेकिन, ऐसे प्रायोजित दंगों से निपटने के लिए पुलिस के पास और कोई रास्ता नहीं होता जब भीड़ में लोग हथियार ले कर घूम रहे हों और भीड़ उन्हें अपने बीच छुपाए चलती हो। कितनी जगह की भीड़ ने आग लगाने वाले को रोका? कितनी जगह की भीड़ ने कट्टा वाले से कट्टा छीना? कितनी जगह की भीड़ ने रेलवे स्टेशन तोड़ने वाले को मना किया? अरे भीड़ तो छोड़ो, तुमने कितनी बार इन लोगों को चिह्नित करके पूछा कि ये जो हो रहा है, वो क्यों हो रहा है? जवाब है, नहीं पूछा क्योंकि तुम जान बूझ कर भोले बन रहे हो।
प्रधानमंत्री ने कपड़ों की बात की, तुमने उसमें मजहब ढूँढ लिया। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारतीय मुस्लिमों को डिटेंशन सेंटर में डालने की बातें झूठी हैं, तुमने कहा कि असम में डिटेंशन सेंटर हैं। आज कर्नाटक में भी खुला है। तुमने ‘डिटेंशन सेंटर’ नामक शब्दों को पकड़ा, संदर्भ भूल गए कि वो बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए हैं। संदर्भ तुम इसलिए भूल गए क्योंकि या तो तुम्हारी बुद्धि घास चरने चली गई है, या फिर तुम यह मान बैठे हो कि व्हाट्सएप्प में मजहब विशेष के लोगों को भारत से निकाले जाने की बातें बिलकुल सही हैं।
ये जो लोग हैं, वो सवाल पूछ रहे हैं कि इस आम जनता को, जो दंगे कर रही है, उसे सरकार क्यों समझा नहीं रही। आप यह देखिए दंगे चरणों में हो रहे हैं, पहले हुआ असम में, फिर बंगाल में, फिर दिल्ली में, फिर उत्तर प्रदेश में, फिर कर्नाटक में। इस बीच न सिर्फ गृहमंत्री ने पूरी तरह से आश्वस्त किया है, बल्कि प्रधानमंत्री ने भी कहा है कि भारत के मुस्लिमों को अफवाहों में पड़ने की जरूरत नहीं है। लेकिन, जब विरोध के मूल में कोई कानून न हो, बल्कि हिन्दुओं के प्रति घृणा भरी हो, तो वो पत्थरबाज भीड़ गृहमंत्री के आश्वासन को कैसे समझेगी!
ये नागरिकता कानून का विरोध नहीं, दिमाग में जमा मजहबी मवाद है
जब आप इनकी, यानी मजहबी भीड़ की, मजहबी छात्रों की भीड़ की, और उनके वैयक्तिक मनोभावों को, उनके नारों को पढ़ेंगे और सुनेंगे तो पाएँगे कि ‘CAA-NRC तो बहाना है, इरादा गजवा-ए-हिन्द लाना है’। जी हाँ, इस मजहबी उन्माद से सनी भीड़ की हीरोइनें, आयशा और लदीदा, पुलवामा में बलिदान हुए जवानों के नामों की लिस्ट शेयर करके बताती है कि उनकी मौत से उसे कितनी खुशी है। वो लिखती हैं कि सेकुलर नारे को वो नकार चुकी है, और सिर्फ इस्लामी कट्टरपंथी नारे में ही उसका विश्वास है। उसके लिए यह जिहाद का हिस्सा है, जहाँ काफिरों की कोई जगह नहीं।
और हिन्दू क्या कर रहा है! हिन्दू पोलिटकली करेक्ट होना चाह रहा है। वो अभी भी इस इंतजार में है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की दीवारों पर ख़िलाफ़त की माँग, ‘हिन्दुओं से आज़ादी’ के नारे की बात, ‘हिंदुत्व की कब्र’ खोदने की बात का कोई फैक्ट चेक आए और कहा जाए कि डरो मत, वो तो सीरिया के आईसिस इलाके की रिफ़ायनरी की दीवारों पर लिखा हुआ है। भारत का हिन्दू यह सोच रहा है कि इतनी हिंसा, मस्जिदों से नमाज के बाद निकलती भीड़ के द्वारा की गई आगजनी के विडियो शेयर होने से बेचारे कट्टरपंथियों का नाम खराब हो रहा है, वो सुबह रुक्साना भाभी से नजरें कैसे मिला पाएगा!
ये दुर्भाग्य है कि हिन्दुओं को लगता है कि सीलमपुर में पुलिस पर पेट्रोल बम फेंकते दंगाई का हाथ उसी बम से फट जाने पर, उस विडियो को दिखाने से, हिन्दू कोई अपराध कर रहा है! आप सोचिए कि हम किस तरह से कंडिशन हो चुके हैं कि जो दंगाई है, जो बम फेंक रहा है, उसका हाथ फट गया, तो हमारी सहानुभूति उस दंगाई के साथ हो जाती है कि वो बेचारा है। कुछ कुतर्की यह भी कह देंगे कि वो तो साइंस एक्सपेरिमेंट कर रहा था और मुझे कैसे पता चला कि वो पेट्रोल बम पुलिस पर ही फेंका जाता! ये तो वही बात हो गई कि खराब ड्राइवर के साथ बैठे हुए आप उसे तब तक कुछ मत कहिए जब तक वो किसी पोल में गाड़ी न ठोक दे!
हिन्दुओं को, और हर धर्म, मजहब, रिलीजन और पंथ के नागरिकों को आँखें खोलनी होंगी और दंगाई को पहचानना होगा। उन्हें यह आँख खोल कर देखना होगा कि ‘हिन्दुओं से आजादी‘ की माँग कौन कर रहा है? हिन्दुओं के धैर्य की परीक्षा ली जा रही है वरना किसकी हिम्मत है कि वो ‘फक हिन्दुत्व’ की जगह किसी भी दूसरे मजहब का ‘इ’ भी लिख दे। अगले दिन उसका गला रेता हुआ मिलेगा। जाओ, अगर कूव्वत है तो जैसे ‘ॐ’ के प्रतीक के साथ हरामखोरी की, वैसे चाँद-तारे के साथ कर के दिखाओ।
वो नहीं हो पाएगा तुमसे, वो तुम सोच भी नहीं सकते क्योंकि कमलेश तिवारी की याद तुरंत आ जाएगी। हिन्दुओं को गरियाना, अपमानित करना, उनके देवताओं की मूर्तियाँ तोड़ना, उनके ग्रंथों पर चप्पल रख कर फोटो शेयर करना, सूअर को जनेऊ पहनाना बहुत आम बात है। वो आम इसलिए है कि न तो इस पर कोई कानून है, न ही हिन्दुओं को एक पैसा चिंता है कि उसके प्रतीक चिह्नों के साथ कौन क्या कर रहा है।
अभी इसलिए, इन दंगों के सहारे छोटे-छोटे इलाकों में, छोटे-छोटे समूहों में, छोटे-छोटे समय के लिए इस्लामी कट्टरपंथी टेस्टिंग कर रहे हैं। वो यह देखना चाहते थे कि मंदिर पर मस्जिद रख देंगे तो हिन्दू क्या कर लेगा। वो यह देखना चाहते हैं कि कारसेवकों को अगर ट्रेन में जला दिया जाए तो उनका कितना नुकसान हो सकता है। वो यह देखना चाहते हैं कि इसी देश के टैक्स का पैसा खाते हुए, ‘पाकिस्तान से नाता क्या, ला इलाहा इल्लल्लाह’ कहने पर क्या हो सकता है। वो यह देखना चाहते हैं कि बड़े-बड़े शहरों में किसी भी बात की आड़ में दंगा करने पर क्या हो सकता है।
वो अब देखना चाहते हैं कि दो बार बहुमत में आई हिन्दुओं के हितों की बात करने वाली सरकार के रहते हुए दंगे करने पर क्या हो सकता है। वो ये देख रहे हैं कि अगर इसमें छात्रों का प्रयोग किया जाए तब तो कहेंगे कि पढ़े लिखे लोग विरोध कर रहे हैं, कोई तो बात होगी। वो ये देख रहे हैं कि अब सीधे हिन्दुओं से आज़ादी की बात करने पर भी कोई उन्हें नोटिस नहीं कर रहा है। वो अब देख रहे हैं कि हिन्दुत्व की कब्र खोदने की बात पर हिन्दू चिल आउट कर रहा है। वो ये देख रहे हैं कि उम्माह और ख़लीफ़ा के शासन में ख़िलाफ़त की बात पर हिन्दू चर्चा भी नहीं कर रहा। इसलिए वो अब ‘फक हिन्दुत्व’ का पोस्टर भीड़ में किसी के हाथ में पकड़ा देता है।
तलाक, कश्मीर, राम मंदिर का उबाल है ये, ‘नागरिकता’ तो बहाना है
दशकों से ललबबुआ बनी भारत की दूसरी बहुसंख्यक आबादी अल्पसंख्यक बन कर विशेष सुविधाओं का उपभोग कर रही है। जिन राज्यों के जिन जिलों में कथित अल्पसंख्यकों की संख्या ज्यादा है, वहाँ की जनसांख्यिकी पर इनका प्रभाव देख लीजिए। कश्मीर से कश्मीरी पंडितों को भगाना भी एक सफल इस्लामी प्रयोग था, जिसकी छोटी-छीटी झलक आप कैराना और मेरठ में आए दिन देखते रहते हैं। हिन्दुओं को हर त्योहार पत्थरबाजी, मूर्तियों और मंदिरों को तोड़ने की खबरों में बाढ़ क्यों आ गई है आज कल?
हौज़ काज़ी में दुर्गा मंदिर को मजहबी भीड़ तोड़ देती है और हिन्दू कीर्तन करते रह जाते हैं। आखिर ऐसी स्थिति में हम पहुँचे कैसे? आखिर इकोसिस्टम इस स्तर पर कैसे पहुँच गया कि दंगाइयों को पुलिस अगर नियंत्रण में लाना चाहती है तो पुलिस को ही हर जगह दरिंदे के रूप में देखा जा रहा है? आपने क्या किया है इन झूठों को काटने के लिए? क्या आपने इन दंगापरस्त एंकरों से, कॉलेज के तख्तीधारी छात्र-छात्राओं से कभी पूछा कि इस दंगे पर तुम चुप क्यों थे?
आपने नहीं पूछा क्योंकि आपको लगा कि दोस्ती टूट जाएगी, या आपने यह सोचा कि इससे क्या हो जाएगा, लिखने दो… इससे आप उसी गिरोह के पैदल सिपाही तैयार होने दे रहे हैं, जिन्हें तथ्यों की ईंटों से इतना पीटना चाहिए कि उसका चेहरा पहचानने लायक न रहे। क्या आपने लगातार उनसे सवाल पूछे कि नागरिकता कानून में ऐसा क्या है जिससे उसे दिक्कत है? जब वो कहे कि मजहब विशेष के ख़िलाफ़ अत्याचार हो रहा है, तो आपने उन्हें पूछा कि मोदी की कौन सी योजना ऐसी है, जहाँ उनका शौचालय तोड़ दिया गया और उसकी ईंट से हिन्दू का शौचालय बनवा दिया गया?
आप चिल्ड आउट हैं कि हमें क्या, ये तो शांत हो जाएगा। लेकिन आपको यह नहीं दिखता कि आज के दंगों की जड़ में कश्मीर है, ट्रिपल तलाक का कानून है, राममंदिर का फैसला है… आप यह नहीं समझ रहे कि ये दंगे अचानक नहीं हुए, ये दंगे कुछ वैसे ही हुए जैसे गाँव से गुजरते काँवरियों के ऊपर रात के एक बजे छतों से पथराव होता है। इसका मतलब है कि छतों पर पत्थर रखे गए थे कि कोई इधर से गया है, तो लौटेगा भी।
वैसे ही पेट्रोल बम बनाए जाते हैं। आपको लगता है कि लखनऊ के परिवर्तन चौक पर बस जलाने वाले लोग पार्क में बैठ कर चकमक पत्थर टकरा कर आग का आविष्कार कर रहे थे? या वो अपने घरों से चले होंगे तो तेल और माचिस ले कर निकले होंगे? आपको लगता है कि पीतल और लोहा गला कर भीड़ जामिया की सड़क पर सैमुअल कोल्ट बन जाती है और कट्टे का आविष्कार करती है, फिर गोली चलाती है? या फिर उसे पता था कि यहाँ दंगे होंगे और गोली चला कर किसी की जान लेंगे, और फिर उस लाश का इस्तेमाल करेंगे सरकार पर निशाना साधने के लिए?
आपके पास विकल्प दो ही हैं: डर कर रहिए या सवाल पूछना शुरू कीजिए। सवाल नहीं पूछेंगे इनसे कि ‘हिन्दुओं से आजादी’ और सेकुलर होने की बात, दोनों ही एक साथ कैसे संभव है, तो ये और बड़ी भीड़ बन कर आएँगे। अगर आप इनसे नहीं पूछेंगे कि ‘हिन्दुत्व की कब्र’ खोदने की हिम्मत तो छोड़ें, ये विचार कैसे आया इनके दिमाग में, तो ये कल आपके घरों की दीवारों पर ऐसे नारे लिखेंगे। सवाल नहीं पूछेंगे कि तुम्हें ‘हिन्दुत्व’ को फक करने का विचार क्यों आता है, तो ये कल आपकी बहू-बेटियों को छेड़ने से भी नहीं हिचकिचाएँगे।
इनके गिरोह में रवीश कुमार और अनुराग कश्यप जैसे जैसे नाम हैं जो हर बात पर हिटलर और आपातकाल की बातें करते हैं। फोटोशॉप में ये मोदी का सर हिटलर के धड़ पर जोड़ देते हैं और मोदी हिटलर बन जाता है। ये कह देते हैं कि आपातकाल आ गया है, और आवाज उठाने की आज़ादी नहीं है, और मूर्खों की एक जमात पोस्टर ले कर खड़ी हो जाती है कि तुम हमारी आवाज़ को दबा नहीं सकते। जबकि सत्य यह है कि इसी अनुराग कश्यप की पाँच फिल्मों पर रोक किस सरकार में लगी थी, वो यह भूल गया है। सत्य यह है कि फासीवादी सरकारों के राज में ऐसे पोस्टर सड़कों पर नहीं दिखते, आवाज उठाने वाले जेलों में होते हैं।
इस सरकार से ज्यादा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कब थी मुझे याद नहीं। अगर कोई ‘हिन्दुओं से आजादी’, ‘हिन्दुत्व की कब्र खुदेगी’, ‘फक हिन्दुत्व’ बोल कर और लिख कर खुले आम टहल रहा है, तो उससे ज्यादा बोलने की स्वतंत्रता और क्या होगी? ऐसे लोगों को सरकार द्वारा जेल में डालना तो छोड़िए, आम आदमी उसकी निंदा भी नहीं कर पा रहा क्योंकि ये तस्वीरें, ये आवाज़ें उस तक मीडिया पहुँचने ही नहीं देती।
इसलिए हिन्दुओं को सोचना चाहिए कि उसका अस्तित्व किन शर्तों पर रहेगा इस भारतभूमि पर। हिन्दुओं को यह देखना होगा कि जब सामने वाला खुल्लमखुल्ला तुम्हारी कब्र खोदने पर तुला हुआ है, तो तुम्हें कम से कम वैचारिक तैयारी तो करनी ही होगी। अगर हिन्दुओं ने इन बातों पर आज प्रश्न नहीं किए तो ये भीड़ तुम्हारे घरों में घुसेगी। फिर ये भीड़ क्या करेगी, उसके लिए इतिहास को पढ़ो।
रेलवे के समूह ‘ए’ की मौजूदा आठ सेवाओं का एक केन्द्रीव सेवा ‘भारतीय रेलवे प्रबंधन सेवा (आईआरएमएस)’ में सेवाओं के एकीकरण से ‘नौकरशाही’ खत्म हो जाएगी। इससे रेलवे के सुव्यवस्थित कामकाज को बढ़ावा मिलेगा, निर्णय लेने में तेजी आएगी, संगठन के लिए एक सुसंगत विजन सृजित होगा और तर्कसंगत निर्णय लेने को प्रोत्साहन मिलेगा। इसके लागू होने के बाद से रेलवे बोर्ड का गठन अब से विभागीय तर्ज पर नहीं होगा और इसका स्थान एक छोटे आकार वाली संरचना लेगी। इसका गठन कार्यात्मक तर्ज पर होगा रेलवे बोर्ड की अध्यक्षता चेयरमैन रेलवे बोर्ड (सीआरबी) करेंगे, जो इसके मुख्य कार्यकारी अधिकारी होंगे। इसमें 4 सदस्यों के अलावा कुछ स्वतंत्र सदस्य होंगे।
रेलवे में सुधार के लिए गठित विभिन्न समितियों ने सेवाओं के एकीकरण की सिफारिश की है। 7-8 दिसंबर, 2019 को आयोजित दो दिवसीय ‘परिवर्तन संगोष्ठी’ में रेल अधिकारियों की आम सहमति और व्यापक समर्थन से यह सुधार किया गया है। निष्पक्षता एवं पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कैबिनेट द्वारा गठित की जाने वाली वैकल्पिक व्यवस्था की मंजूरी से डीओपीटी के साथ परामर्श कर सेवाओं के एकीकरण की रूपरेखा तय की जाएगी।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने भारतीय रेलवे के रूपांतरकारी संगठनात्मक पुनर्गठन को मंजूरी दे दी है। यह ऐतिहासिक सुधार भारतीय रेलवे को भारत की ‘विकास यात्रा’ का विकास इंजन बनाने संबंधी सरकार के विजन को साकार करने में काफी मददगार साबित होगा।
रेल अधिकारियों की आम सहमति और व्यापक समर्थन से यह सुधार किया गया है
सुधारों में निम्नलिखित शामिल हैं:
रेलवे के समूह ‘ए’ की मौजूदा आठ सेवाओं का एक केन्द्रीय सेवा ‘भारतीय रेलवे प्रबंधन सेवा (आईआरएमएस)’ में एकीकरण किया जाएगा।
रेलवे बोर्ड का पुनर्गठन कार्यात्मक तर्ज पर होगा, जिसकी अध्यक्षता सीआरबी करेंगे। इसमें 4 सदस्यों के अलावा कुछ स्वतंत्र सदस्य होंगे।
मौजूदा सेवा ‘भारतीय रेलवे चिकित्सा सेवा (आईआरएमएस)’ का नाम बदलकर भारतीय रेलवे स्वास्थ्य सेवा (आईआरएचएस) रखा जाएगा।
रेलवे ने अगले 12 वर्षों के दौरान 50 लाख करोड़ रुपए के प्रस्तावित निवेश से आधुनिकीकरण के साथ-साथ यात्रियों को उच्च मानकों वाली सुरक्षा, गति एवं सेवाएँ मुहैया कराने के लिए एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम बनाया है। इसके लिए तेज गति एवं व्यापक स्तर से युक्त एक एकीकृत एवं चुस्त-दुरुस्त संगठन की आवश्यकता है, ताकि वह इस जिम्मेदारी को पूरी एकाग्रता के साथ पूरा कर सके। इसके साथ ही वह विभिन्न चुनौतियों से निपटने में सक्षम हो सके। दरअसल, आज के ये सुधार वर्तमान सरकार के अधीन पहले लागू किए जा चुके उन विभिन्न सुधारों की श्रृंखला के अंतर्गत आते हैं जिसमें रेल बजट का विलय केन्द्रीय बजट में करना, महाप्रबंधकों (जीएम) एवं क्षेत्रीय अधिकारियों (फील्ड ऑफिसर) को सशक्त बनाने के लिए उन्हें अधिकार सौंपना, प्रतिस्पर्धी ऑपरेटरों को रेलगाडि़यां चलाने की अनुमति देना इत्यादि शामिल हैं।
अगले स्तर की चुनौतियों से निपटने और विभिन्न मौजूदा कठिनाइयों को दूर करने के लिए यह कदम उठाने की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। विश्व भर की रेल प्रणालियों, जिनका निगमीकरण हो चुका है, के विपरीत भारतीय रेलवे का प्रबंधन सीधे तौर पर सरकार द्वारा किया जाता है। इसे विभिन्न विभागों जैसे कि यातायात, सिविल, यांत्रिक, विद्युत्, सिग्नल एवं दूरसंचार, स्टोर, कार्मिक, लेखा इत्यादि में संगठित किया जाता है। इस प्रक्रिया से 150 वर्षों से चले आ रहे ‘Departmentalism’ का ख़ात्मा होगा।
मौजूदा कठिनाइयों को दूर करने के लिए यह कदम उठाने की आवश्यकता महसूस की जा रही थी
इन विभागों को ऊपर से लेकर नीचे की ओर पृथक किया जाता है और इनकी अध्यक्षता रेलवे बोर्ड में सचिव स्तर के अधिकारी (सदस्य) द्वारा की जाती है। विभाग का यह गठन ऊपर से लेकर नीचे की ओर जाते हुए रेलवे के जमीनी स्तर तक सुनिश्चित किया जाता है। सेवाओं के एकीकरण से यह ‘नौकरशाही’ खत्म हो जाएगी। इससे रेलवे के सुव्यवस्थित कामकाज को बढ़ावा मिलेगा, निर्णय लेने में तेजी आएगी, संगठन के लिए एक सुसंगत विजन सृजित होगा और तर्कसंगत निर्णय लेने को प्रोत्साहन मिलेगा।
रेलवे में सुधार के लिए गठित विभिन्न समितियों ने सेवाओं के एकीकरण की सिफारिश की है, जिनमें प्रकाश टंडन समिति (1994), राकेश मोहन समिति (2001), सैम पित्रोदा समिति (2012) और बिबेक देबरॉय समिति (2015) शामिल हैं।
7-8 दिसम्बर, 2019 को दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय ‘परिवर्तन संगोष्ठी’ में रेल अधिकारियों की आम सहमति और व्यापक समर्थन से यह सुधार किया गया है। इस भावना की कद्र करने और रेल अधिकारियों के सुझावों को अहमियत दिए जाने को लेकर उनमें व्यापक भरोसा उत्पन्न करने के लिए रेलवे बोर्ड ने 8 दिसम्बर, 2019 को ही सम्मेलन के दौरान बोर्ड की असाधारण बैठक आयोजित की थी और उपर्युक्त सुधारों सहित अनेक सुधारों की अनुशंसा की थी।
अब आगामी भर्ती चक्र या प्रक्रिया से एक एकीकृत समूह ‘ए’ सेवा को सृजित करने का प्रस्ताव किया जाता है, जो ‘भारतीय रेलवे प्रबंधन सेवा (आईआरएमएस)’ कहलाएगी। अगले भर्ती वर्ष में भर्तियों में सुविधा के लिए डीओपीटी और यूपीएससी से परामर्श कर नई सेवा के सृजन का काम पूरा किया जाएगा। इससे रेलवे अपनी जरूरत के अनुसार अभियंताओं/गैर-अभियंताओं की भर्ती करने और इसके साथ ही करियर में उन्नति के लिए इन दोनों ही श्रेणियों को अवसरों में समानता की पेशकश करने में सक्षम हो जाएगी।
रेल मंत्रालय निष्पक्षता एवं पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए कैबिनेट द्वारा गठित की जाने वाली वैकल्पिक व्यवस्था की मंजूरी से डीओपीटी के साथ परामर्श कर सेवाओं के एकीकरण की रूपरेखा तय करेगा। यह प्रक्रिया एक साल के भीतर पूरी हो जाएगी।
रेलवे के सुव्यवस्थित कामकाज को बढ़ावा मिलेगा और निर्णय लेने में तेजी आएगी
भर्ती किए जाने वाले नए अधिकारी आवश्यकतानुसार अभियांत्रिकी एवं गैर-अभियांत्रिकी क्षेत्रों से आएँगे और उनके कौशल एवं विशेषज्ञता के अनुसार उनकी तैनाती की जाएगी। इससे फायदा ये होगा कि वे किसी एक क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल कर सकेंगे। ताकि वो एक समग्र परिप्रेक्ष्य विकसित कर सकें और इसके साथ ही वरिष्ठ स्तरों पर सामान्य प्रबंधन जिम्मेदारियों का निर्वहन करने के लिए तैयार हो सकें। सामान्य प्रबंधन पदों के लिए चयन योग्यता आधारित प्रणाली के जरिए किया जाएगा।
रेलवे बोर्ड का गठन अब से विभागीय तर्ज पर नहीं होगा और इसका स्थान एक छोटे आकार वाली संरचना लेगी जिसका गठन कार्यात्मक तर्ज पर होगा। इसमें एक चेयरमैन होगा जो ‘मुख्य कार्यकारी अधिकारी’ के रूप में कार्य करेगा। इसके साथ ही 4 सदस्य होंगे, जिन्हें अवसंरचना, परिचालन एवं व्यावसायिक विकास, रोलिंग स्टॉक एवं वित्तीय से जुड़े कार्यों की अलग-अलग जवाबदेही दी जाएगी। चेयरमैन दरअसल कैडर नियंत्रणकारी अधिकारी होगा जो मानव संसाधनों (एचआर) के लिए जवाबदेह होगा और जिसे एक डीजी (एचआर) आवश्यक सहायता प्रदान करेगा। शीर्ष स्तर के तीन पदों को रेलवे बोर्ड से खत्म (सरेंडर) कर दिया जाएगा।
बदलावों के तहत रेलवे बोर्ड के शेष पद सभी अधिकारियों के लिए खुले रहेंगे, चाहे वे किसी भी सेवा के अंतर्गत आते हों। बोर्ड में कुछ स्वतंत्र सदस्य (इनकी संख्या समय-समय पर सक्षम प्राधिकरण द्वारा तय की जाएगी) भी होंगे, जो गहन ज्ञान वाले अत्यंत विशिष्ट प्रोफेशनल होंगे। ये ऐसे लोग होंगे, जिन्हें उद्योग जगत, वित्त, अर्थशास्त्र एवं प्रबंधन क्षेत्रों में शीर्ष स्तरों पर काम करने सहित 30 वर्षों का व्यापक अनुभव होगा। स्वतंत्र सदस्य विशिष्ट रणनीतिक दिशा तय करने में रेलवे बोर्ड की मदद करेंगे।
आज के ये सुधार वर्तमान सरकार के अधीन पहले लागू किए जा चुके उन विभिन्न सुधारों की श्रृंखला के अंतर्गत आते हैं
बोर्ड से मंजूरी मिलने के बाद पुनर्गठित बोर्ड काम करना शुरू कर देगा। इसके तहत यह सुनिश्चित किया जाएगा कि अधिकारियों को पुनर्गठित बोर्ड में शामिल किया जाए अथवा उनकी सेवानिवृत्ति तक समान वेतन एवं रैंक में समायोजित किया जाए।
दिल्ली में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के भाषण का एक अंश सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। मंगलवार (दिसंबर 24, 2019) को संगम विहार इलाके में 65,000 झुग्गी परिवारों को दिल्ली सरकार की ओर से जहाँ झुग्गी, वहीं मकान योजना के तहत सर्टिफिकेट दिया गया।
इस मौके पर एक जनसभा को संबोधित करते हुए केजरीवाल ने कहा, “आपके स्कूल का इंतजाम कर दिया, आपके पानी का इंतजाम कर दिया। आपके दवा-दारू का इंतजाम कर दिया। फिर उन्होंने थोड़ा रुक कर कहा- दारू का नहीं, दवा का इंतजाम किया।” इसी बात पर वहाँ मौजूद लोगों की हँसी छूट गई। इस भाषण का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
इस वीडियो को देखकर लग रहा है कि सीएम केजरीवाल ने जान-बूझकर दारू शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है। भाषण देने के फ्लो में उनके मुँह से निकल गया। हालाँकि उन्होंने तुरंत ही वहाँ पर रूककर उसे सुधार लिया और कहा कि उन्होंने दारू का नहीं, सिर्फ दवा का इंतजाम किया है।
बता दें कि फरवरी 2020 में संभावित दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी (AAP) कमर कस कर मैदान में उतर चुकी है। बीजेपी अनधिकृत कॉलोनियों में मालिकाना हक दिए जाने के मसले को मुद्दा बना रही है, तो वहीं, आम आदमी पार्टी 5 साल के लेखा-जोखा के सहारे चुनावी मैदान में उतरी है।
पिछले 2 महीनों से आम आदमी पार्टी, दिल्ली के सभी 70 विधानसभा सीटों के लगभग हर इलाके में प्रचार का एक राउंड पूरा कर चुकी है, जिसमें जन संवाद के जरिए लोगों से केजरीवाल सरकार के बारे में बातचीत की गई। अब प्रशांत किशोर की कंपनी केजरीवाल के लिए काम करेगी। प्रशांत किशोर की कंपनी ने आगामी विधानसभा चुनाव के लिए नारा दिया है- अच्छे बीते 5 साल, लगे रहो केजरीवाल।
मारुति के पूर्व एमडी जगदीश खट्टर (77) के खिलाफ सीबीआई ने धोखाधड़ी का केस दर्ज कर उन्हें हिरासत में लिया है। सीबीआई अधिकारियों ने ये जानकारी मंगलवार (दिसंबर 24, 2019) को दी। खट्टर फिलहाल कारनेशन ऑटो इंडिया कंपनी के डायरेक्टर हैं। जिनपर पंजाब नेशनल बैंक से 110 करोड़ रुपए का घोटाला करने का आरोप है। इस संबंध में सीबीआई ने खट्टर के ठिकानों और कंपनी के दफ्तरों में सोमवार को छापेमारी भी की। बता दें सीबीआई ने मारुति के पूर्व एमडी पर ये कार्रवाई बैंक की शिकायत पर की।
CBI has filed FIR against Director of Carnation Auto India, Jagdish Khattar(former Maruti MD) and the said company(Carnation Auto India) and other unknown private person under criminal breach of trust,cheating and criminal misconduct. pic.twitter.com/6bBhdQxUt4
साल 2007 में मारुति से एमडी के पद पर रिटायर हो चुके खट्टर ने एक साल बाद कारनेशन कंपनी की शुरुआत की थी। जो कार एक्सेसरीज और पुरानी कारें बेचती थी। कारनेशन ने 2009 में पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) से 170 करोड़ रुपए का लोन लिया था। लेकिन साल 2015 में ये लोन एनपीए घोषित हो गया। इससे पीएनबी को 110 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। इस मामले में पीएनबी ने आपराधिक षडयंत्र और धोखाधड़ी का केस दर्ज करवाया।
इस मामले में खट्टर पर आरोप लगा कि खट्टर की कंपनी ने बैंक के पास जिन एस्टेट्स को गिरवी रखा था, उन्हें भी धोखे से बेचा जा चुका है। जिसका पता बैंक को फॉरेंसिक ऑडिट में चला कि इन लोगों ने 6692.48 लाख की फिक्सड संपत्तिको मात्र 455.89 लाख रुपए में बेच दिया और प्राप्त हुई रकम भी बैंक में जमा नहीं करवाई। जिसके बाद बैंक ने इसे धोखाधड़ी करार दिया और कानूनी कार्रवाई के लिए शिकायत की।
गौरतलब है कि पीएनबी ने अपनी शिकायत में कारनेशन के अलावा तीन गारंटर कंपनियों- खट्टर ऑटो इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, कारनेशनल रिएलिटी प्राइवेट लिमिटेड और कारनेशन इंश्योरेंस ब्रोकिंग कंपनी प्राइवेट लिमिटेड को भी आरोपित बनाया है। लेकिन मामले की शुरुआती जाँच में गारंटर कंपनियों की प्रत्यक्ष भूमिका सामने नहीं आई। अब सीबीआई अपनी आगे की जाँच के बाद इन कंपनियों की भूमिका को तय करेगी।
झारखण्ड में राज्य सरकार ने मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं को धरातल पर लागू करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसा हम नहीं कह रहे बल्कि आँकड़े कुछ ऐसी ही कहानी बयाँ कर रहे हैं। अगर कुल वोटों की बात करें तो राज्य में भाजपा को ताज़ा विधानसभा चुनाव में 50 लाख 22 हज़ार 374 (5,022,374) वोट मिले। अगर सरकारी योजनाओं की बात करें तो मोदी सरकार की बड़ी योजनाओं का लाभ इससे कहीं ज़्यादा लोगों को मिला। भाजपा को राज्य में 25 सीटें आई हैं और हेमंत सोरेन की झामुमो 30 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है।
सरकारी योजनाओं के आँकड़ों पर एक नज़र डालने से हमें पता चलेगा कि पिछले कुछ सालों में राज्य सरकार द्वारा शुरू की गई जन कल्याणकारी योजनाओं के मामले में झारखण्ड का कैसा प्रदर्शन रहा?
आयुष्मान भारत: 55 लाख लोगों को दिए गए कार्ड्स
अगर ‘आयुष्मान भारत योजना’ की ही बात करें तो भाजपा को जितने वोट मिले, उससे 5 लाख से भी ज़्यादा लोगों को इस योजना का लाभ दिया गया। आँकड़ों के अनुसार, 55 लाख 2 हज़ार 570 (55,02,570) लोगों को इ-कार्ड्स दिए गए। राज्य के 654 अस्पतालों को इस योजना के तहत सूचीबद्ध किया गया है। इन आँकड़ों से पता चलता है कि भाजपा ने जिन लोगों को हेल्थकेयर स्कीम से जोड़ा, उससे 5 लाख कम लोगों ने उसे वोट दिया। ये योजना झारखण्ड से ही लॉन्च की गई थी। राज्य में 57 लाख लोगों को इससे जोड़ने का लक्ष्य रखा गया था।
उज्ज्वला: 30 लाख गैस कनेक्शन
झारखण्ड में उज्ज्वला योजना का प्रदर्शन काफ़ी शानदार रहा। राज्य सरकार ने दावा किया था कि ये देश का पहला राज्य है, जहाँ गैस कनेक्शन के साथ मुफ्त में ओवन और पूरा भरा हुआ सिलिंडर दिया गया। अब तक राज्य में 31 लाख से भी ज़्यादा गैस कनेक्शन बाँटे गए हैं। अगस्त 2019 में रघुबर सरकार ने एक बार फिर से 12 लाख नए एलपीजी गैस कनेक्शन बाँटने का अभियान शुरू किया था। देशभर में इस योजना के तहत एक सिलिंडर दिया जाता था लेकिन झारखण्ड सरकार ने लाभार्थियों को 2 सिलिंडर दिया। पीएम मोदी ने हर जनसभा में उज्ज्वला का जिक्र किया था लेकिन शायद इनमें से सब वोटों में तब्दील नहीं हो सका।
कृषि आशीर्वाद योजना: 20 लाख किसानों को मिला लाभ
ऐसा नहीं है कि राज्य सरकार ने सिर्फ़ केंद्र की योजनाओं को लागू करने में ही चपलता दिखाई। रघुबर दास की सरकार ने अपनी योजनाओं को भी बखूबी लागू किया। जहाँ एक तरफ केंद्र की पीएम किसान सम्मान योजना के तहत किसानों को 6 हज़ार रूपए सालाना दिए गए, ‘मुख्यमंत्री कृषि आशीर्वाद’ योजना के तहत भी 5 से 25 हज़ार रूपए किसानों को प्रतिवर्ष मिले। केंद्र की योजना का लाभ 8 लाख किसानों को मिला और राज्य सरकार की योजना 20 लाख 56 हज़ार किसानों तक पहुँची। इसके तहत 11 लाख किसानों को पहली क़िस्त में ही जोड़ लिया गया था।
तेजस्विनी योजना: 10 लाख किशोरियों को प्रशिक्षण
भाजपा ने महिला कल्याण मंत्रालय लुइस मरांडी को सौंपा था। 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को हरा कर लुइस विधायक बनी थीं। उन्होंने ‘तेजस्विनी योजना’ के तहत 14-24 वर्ष की युवतियों को कौशल प्रशिक्षण देने का कार्यक्रम चलाया, ताकि उन्हें रोज़गार मिलने में समस्या न हो।
इस योजना से 10 लाख युवतियों व किशोरियों को जोड़ा गया। मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के तहत 72 हज़ार से कम वार्षिक आय वालों को 30 हज़ार रुपए दिए गए। वहीं मुख्यमंत्री सुकन्या योजना के तहत बालिका व उसके परिजनों के खाते में रुपए डाले गए। इन सबके बावजूद रघुबर दास अपनी सरकार नहीं बचा पाए।
एक तरफ विपक्ष मोदी सरकार पर तानाशाही और आवाज़ दबाने का आरोप लगाता है। दूसरी तरफ जिन राज्यों में विपक्षी दल सत्ता पर काबिज हैं, वहाँ सत्ताधीशों के ख़िलाफ़ फेसबुक पोस्ट हिंसा का कारण बन जाती है। अव्वल तो ये कि इस घटना की निंदा करने की बजाय उसे जायज ठहराया जाता है। विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ता राहुल तिवारी को शिवसैनिकों ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की आलोचना करने वाले पोस्ट के लिए पीटा।
शिवसैनिकों की गुंडई को पार्टी विधायक और उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ने जायज ठहराया है। इतना ही नहीं आदित्य ने पीड़ित के लिए अपशब्दों का प्रयोग भी किया है। दरअसल, मामला ये है कि शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ने जामिया में हुए उपद्रव की तुलना जालियाँवाला बाग़ नरसंहार से की थी, जिससे नाराज़ राहुल तिवारी ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा था कि उद्धव आखिर अपने औकात पर आ ही गए। इसके बाद अचानक से उनके घर के बाहर बड़ी संख्या में शिवसैनिक जमा हो गए और तिवारी की पिटाई की गई। उनका सिर मुंडवा दिया गया। पोस्ट डिलीट करने के बावजूद 25 शिवसैनिकों ने उन्हें मारा-पीटा।
अब आदित्य ठाकरे अपनी पार्टी के गुंडों के बचाव में उत्तर आए हैं। आदित्य ने पीड़ित राहुल तिवारी को ओछा और नीच ट्रोल करार दिया है। आदित्य ने अपने बयान में कहा कि राहुल ने मुख्यमंत्री उद्धव के लिए असभ्य भाषा का प्रयोग किया, जबकि वो सीएए से उपजे असंतोष के बीच राज्य में शांति-व्यवस्था कायम करने में लगे हुए हैं। उन्होंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं की गुंडई को गुस्से में दी गई त्वरित प्रतिक्रिया बताया। आदित्य ने साथ ही बिना नाम लिए कहा कि राहुल जैसे धमकीबाज और गालीबाज लोगों को जवाब देना हमारा काम नहीं होना चाहिए। आदित्य ने कहा:
“मैं शिवसैनिकों की गुस्से में दी गई प्रतिक्रिया को समझ सकता हूँ। जब किसी नेता, संगठन या समुदाय के ख़िलाफ़ इस तरह इस तरह असभ्य भाषा का इस्तेमाल किया जाता है तो गुस्सा स्वाभाविक है। इनलोगों के इस व्यवहार का जवाब देश की जनता ने हालिया चुनावों में लोकतान्त्रिक तरीके से दे दिया है। ये सोशल मीडिया के ‘लिंच मॉब’ हैं, जो देश में कलह और विभाजन का माहौल पैदा करना चाहते हैं। वो परेशान हैं क्योंकि देश ने उनकी तर्कहीन बातों को नकार दिया है। मैं कहता हूँ कि हमारे मुख्यमंत्री का ही अनुसरण कीजिए। वो शांत हैं, उदार हैं, लेकिन जनहित के निर्णयों को लागू करने को लेकर आक्रामक हैं। वो जनसेवा कर रहे हैं।”
आदित्य ठाकरे ने जो बयान जारी किया, उसमें पीड़ित राहुल तिवारी को बार-बार ‘ट्रोल’ कह कर सम्बोधित किया गया है। महाराष्ट्र की पुलिस पर भी इस मामले में पक्षपात का आरोप लगा है। तिवारी ने बताया कि पुलिस ने गुंडे शिवसैनिकों पर एफआईआर दर्ज करने के बदले उन्हें ही समन जारी कर दिया। पुलिस ने उन पर समझौता करने का दबाव बनाया। साथ ही उनके साथ हुई मारपीट का वीडियो भी सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया गया। तिवारी ने आरोप लगाया कि अलोकतांत्रिक माहौल बना कर विरोध में आवाज़ उठाने वालों का दमन किया जा रहा है।