Home Blog Page 5215

मंगलुरु हिंसा में मारे गए लोगों के परिजनों को मुआवजा नहीं देगी येदियुरप्पा सरकार, फैसला लिया वापस

कनार्टक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने मंगलुरु में पुलिस की गोलीबारी के दो पीड़ितों को 10-10 लाख रुपए का मुआवजा देने के अपने आदेश को पलट दिया है। मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने बुधवार (दिसंबर 25, 2019) को मीडिया से बात करते हुए कहा कि 19 दिसम्बर को मंगलुरु में हुई हिंसा में मारे गए दो लोगों के परिजनों को मुआवजा नहीं देने का फैसला किया गया है।

येदियुरप्पा ने दक्षिण कन्नड़ जिले के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ मैराथन बैठक के बाद संवाददाताओं से कहा, “हमने पुलिस गोलीबारी में मारे गए लोगों के परिवार के सदस्यों को मुआवजा नहीं देने का फैसला नहीं किया है, क्योंकि अपराधियों को मुआवजा देना अपने आप में एक अक्षम्य अपराध है। इससे पहले सरकार ने उन्हें मुआवजा देने का फैसला किया था, लेकिन अब हमने इसे वापस ले लिया है।”

मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने पुलिस को 19 दिसंबर को दंगा करने वाले गुंडों की पहचान करने, उनके खिलाफ मामले दर्ज करने और कड़ी कार्रवाई शुरू करने का निर्देश दिया है। सीएम ने कहा, “अब यह स्पष्ट है कि यह (मंगलुरु दंगा) एक साजिश थी। लोगों ने थाने के शस्त्रागार में घुसने की कोशिश की। हम किसी को भी नहीं बख्शेंगे।”

उन्होंने इस हिंसा को सोची-समझी साजिश करार देते हुए कहा कि साजिशकर्ताओं ने पुलिस पर पथराव किया था। वो लोग एक ऑटोरिक्शा-ट्रॉली में पत्थर भरकर लाए थे, जिसे उन्होंने पुलिस के ऊपर फेंका। उन्होंने कहा कि सरकार आगजनी और हिंसा में शामिल लोगों के बैकग्राउंड का पता लगाएगी और अपराध में शामिल सभी लोगों को गिरफ्तार करेगी।

कर्नाटक सरकार के खिलाफ ‘बेबुनियाद’ आरोप लगाने के लिए विपक्ष की निंदा करते हुए येदियुरप्पा ने कहा, “जब दिमाग सही से काम नहीं करता है तो विपक्षी इसी तरह की बात करते हैं। उन बेचारों के पास उठाने के लिए अन्य कोई मुद्दा नहीं है, इसलिए वे इस तरह के गैरजिम्मेदाराना बयान देते हैं। साक्ष्य में आगजनी और लूट में उनकी (दंगाइयों) भागीदारी साफ तौर दिख रही है।”

गौरतलब है कि पिछले सप्ताह मंगलुरु में प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हो गई थी, जिसमें दो लोग मारे गए थे। मृतकों की पहचान 49 वर्षीय जलील कुद्रोली और 23 वर्षीय नौशीन के रूप में की गई है।

इथोपिया में एक-एक कर जलाई जा रही है मस्जिदें, इस्लाम को ईसाईयों का दुश्मन बताने वाले वीडियो वायरल

अफ़्रीकी देश इथोपिया में एक-एक कर मस्जिदों को जलाया जा रहा है। मुस्लिमों के व्यापार पर हमले किए जा रहे हैं। इसके ख़िलाफ़ हजारों मुस्लिम सड़क पर उत्तर कर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। अम्हारा क्षेत्र में 4 मस्जिदों को जला डाला गया है। राजधानी अदीस अबाबा से 350 किलोमीटर उत्तर में स्थित मोट्टा शहर में कई मुस्लिमों के व्यापारिक प्रतिष्ठानों को भी नुकसान पहुँचाए जाने की ख़बर है। प्रदर्शनकारी मुस्लिमों की माँग है कि दोषियों को सज़ा दी जाए।

प्रधानमंत्री अबी अहमद ने कहा है कि कुछ कट्टरपंथी देश की साझा और सहिष्णु सांस्कृतिक विरासत को नुकसान पहुँचाना चाहते हैं। मुस्लिम एक्टिविस्ट्स ने आरोप लगाया है कि कुछ राजनेता मजहबी उन्माद फैला रहे हैं।

अधिकारियों ने बताया है कि इस मामले में 15 आरोपितों की गिरफ़्तारी हुई है। प्रशासन का मानना है कि कुछ दिनों पहले एक ऑर्थोडॉक्स चर्च में आग लगने की ख़बर फैलने के बाद ये घटनाएँ हुई हैं। मुस्लिम एक्टिविस्ट्स का आरोप है कि पुलिस ने जल्दी एक्शन नहीं लिया और एक पर एक हमलों को रोकने में नाकाम रही। ओरोमिया क्षेत्र में कुछ दिनों पहले हिंसा भड़क गई थी, जिसमें 80 लोग मारे गए थे। उस दौरान भी चर्च और मस्जिदों को जलाए जाने की ख़बरें आई थीं।

2007 की जनगणना के अनुसार, 11 करोड़ की जनसंख्या वाले इथोपिया के एक तिहाई लोग इस्लाम मजहब का अनुसरण करते हैं। देश की 40% जनसंख्या ऑर्थोडॉक्स ईसाई है, जो मेजोरिटी में है। मुस्लिम दूसरे सबसे बड़े समुदाय हैं। अम्हारा देश का दूसरा सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला क्षेत्र है, जहाँ ऑर्थोडॉक्स ईसाईयों की जनसंख्या 80% से भी ज़्यादा है। इस क्षेत्र में मुस्लिम काफ़ी कम संख्या में हैं और उनका आरोप है कि कट्टरपंथी ऑर्थोडॉक्स ईसाई उन्हें परेशान कर रहे हैं।

हालाँकि, ऑर्थोडॉक्स चर्च ने मस्जिदों पर हो रहे हमलों की निंदा की है। ‘इथोपियन इस्लामिक अफेयर्स सुप्रीम काउंसिल’ ने भी इन हमलों की निंदा की है। मोट्टा शहर में जिन 4 मस्जिदों को आग लगाई गई, उनमें से 2 तो पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके हैं। 2 अन्य मस्जिदों को भी ख़ासा नुकसान हुआ है। एक होटल को भी जला डाला गया क्योंकि उसका मालिक मुस्लिम था। दरअसल, इस घटना से पहले सोशल मीडिया में एक वीडियो काफ़ी सर्कुलेट हुआ था। उन वीडियोज में ईसाईयों के साथ ग़लत व्यवहार करने के लिए मुस्लिमों व इस्लाम की निंदा की गई थी।

फ़रवरी 2019 में भी तीन मस्जिदों को जला दिया गया था। उससे 2 दिन पहले उसी इलाक़े में 2 मस्जिदों को आग के हवाले कर दिया गया था। वहाँ के युवकों से विभिन्न संगठन लगातार अपील कर रहे हैं कि इन मस्जिदों के पुनर्निर्माण में सहयोग किया जाना चाहिए। हालाँकि, कई वीडियो व ऐसे मैसेज सर्कुलेट हो रहे हैं, जिनमें मुस्लिमों को ‘ईसाइयत का दुश्मन’ बताया जा रहा है।

उम्माह और उइगर मुस्लिमों की बात कर रहे थे अफरीदी, चीन से आया एक ट्वीट तो निकल गई सारी हेकड़ी

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर अक्सर चुप्पी साध लेने वाले पाकिस्तान क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान शाहिद अफरीदी ने 3 दिन पहले सोशल मीडिया के जरिए चीन में उईगर और उम्माह की स्थिति पर चिंता जाहिर की। साथ ही उन्होंने अपने प्रधानमंत्री इमरान खान से भी इसके ख़िलाफ़ बोलने की गुहार लगाई और कहा उईगर मुस्लिम उनके भाई-बहन ही है। लेकिन, इसी बीच चीन से एक राजदूत ने उन्हें उनके ट्वीट का जवाब दिया और शाहिद को बिना कोई जवाब-सवाल किए अपना ट्वीट तुरंत डिलीट करना पड़ा।

दरअसल, चीन में उईगर मुस्लिमों पर हो रहे अत्याचार के ख़िलाफ़ शाहिद ने रविवार को ट्वीट किया था। जिसमें उन्होंने लिखा था, “उईगर मुस्लिमों पर हो रहे अत्याचार की खबरों से दिल दुखी है। मैं प्रधानमंत्री इमरान खान से अपील करता हूँ कि वो इस बारे में जरूर बोलें। जब हम दुनियाभर के मुस्लिमों के बीच एकता की बात करते हैं तो इसमें हमारे चीन में रहने वाले उईगर भाई और बहनें भी शामिल हैं। मैं चीनी दूतावास से भी अपील करता हूँ कि वो इस मसले पर मानवता का परिचय दें और वहाँ के मुस्लिमों के साथ उचित व्यवहार करें।”

शाहिद अफरीदी का ट्वीट

अब इस ट्वीट के बाद, चीन के एक राजदूत लिजियां झाओ ने उनको ट्वीट पर ही जवाब दिया और लिखा,”मुझे लगता है कि चीन के ख़िलाफ़ पश्चिमी प्रोपगेंडा के कारण तुम बरगला गए है। हम यहाँ की स्थिति को देखने के लिए तुम्हारा स्वागत करते हैं। तुम्हें यहाँ एक अलग ही शिनजियांग मिलेगा। पश्चिमी चीन का बुरा दिखा रहा है और मुस्लिमों की भावनाओं को भी ठेस पहुँचा रहा हैं।”

हालाँकि, सोशल मीडिया पर लिजियां के इस जवाब देने से पहले शाहिद अफरीदी का ये ट्वीट सोशल मीडिया पर मौजूद था। लेकिन जैसी ही चीनी राजदूत ने उनके ट्वीट पर रिप्लाई दिया, उन्होंने फौरन अपना ट्वीट डिलीट कर दिया। जिस कारण लोगों ने दोनों ट्वीट शेयर करते हुए तंज भी कसा कि आखिर इमरान खान अपने बॉस के सामने मुँह क्यों खोलेगा?

चीनी राजदूत का शाहिद के ट्वीट पर रिप्लाई

गौरतलब है कि ऐसे समय में जब विश्व के लगभग सभी देशों ने पाकिस्तान का साथ छोड़ दिया है। उस समय चीन पाकिस्तान का सबसे बड़ा साझेदार है और इसी कारण वहाँ के बड़े-बड़े राजनेता भी उईगर मुस्लिमों की स्थिति पर कुछ भी बोलने से बचते हैं। ऐसे में शाहिद अफरीदी का चीन के खिलाफ़ बोलना और प्रधानमंत्री इमरान खान को इस मुद्दे पर बोलने के लिए उकसाना उन्हें महंगा पड़ सकता है। क्योंकि इस समय सीपेक और रक्षा समेत कई करोड़ डॉलर के प्रोजेक्ट पाकिस्तान में चीन के कर्ज से ही चल रहे हैं। 

विभाजन और पाकिस्तान में अल्पसंख्यक: कॉन्ग्रेस के लिए नेहरू और इतिहास से सीखने का वक्त

मोहम्मद अली जिन्ना ने 1929 में 14 मॉंगों का एक ज्ञापन तैयार किया था। इसका मकसद एक अलग इस्लामिक देश का गठन करना था। इसका प्रारूप हद से ज्यादा कट्टर और इस्लाम को छोड़कर अन्य धर्मों की भावनाओं को आहत करने वाला था। इसके कुछ प्रमुख बिंदु इस प्रकार थे;

  • मुस्लिमों को गौ हत्या की छूट होगी
  • जहॉं मुस्लिम बहुसंख्यक होंगे परिसीमन नहीं होगा
  • वंदेमातरम समाप्त करना होगा
  • तिरंगे में बदलाव किया जाना चाहिए
  • मुस्लिम लीग के झंडे को तिरंगे के बराबर दर्जा मिले

ऑल इंडिया मुस्लिम लीग अपनी इन सांप्रदायिक मॉंगों पर अड़ गई और भारत का विभाजन धर्म के आधार पर कर दिया गया। हालाँकि, ब्रिटिश संसद ने भारत की जमीनों का बॅंटवारा तो कर दिया लेकिन आधिकारिक तौर पर नहीं बताया गया कि किस धर्म के व्यक्ति को कहॉं रहना है? इंडिया इंडिपेंडेंस एक्ट, 1947 की पहली धारा के अनुसार 15 अगस्त 1947 को दो डोमिनियन का गठन किया गया। एक राष्ट्र भारत था, तो दूसरा नया देश पाकिस्तान बनाया गया।

‘मिशन विद माउंटबेटन’ पुस्तक के लेखक एलन कैंपबेल-जोहानसन विभाजन पर लिखते है, “21 सितम्बर, 1947 की सुबह गवर्नर-जनरल के डकोटा हवाई जहाज से माउंटबेटन, इस्में, वेरनों, एलन कैंपबेल-जोहानसन (लेखक), नेहरू, पटेल, नियोगी, राजकुमारी अमृत कौर, जनरल लॉकहार्ट, एचएम पटेल, और वी शंकर ने पूर्वी एवं पश्चिमी पंजाब के दौरा किया।” उन्होंने रावी नदी के आसपास के इलाकों का हवाई सर्वेक्षण करते हुए बताया कि यह लिखित इतिहास का सबसे बड़ा विस्थापन है।

एक अन्य पुस्तक ‘द लास्ट डेज ऑफ़ द ब्रिटिश राज’ में लियोनार्ड मोसेली लिखते है, “अगस्त 1947 से अगले नौ महीनों में 1 करोड़ 40 लाख लोगों की विस्थापन हुआ। इस दौरान करीब 6,00,000 लोगों की हत्या कर दी गई। बच्चों को पैरों से उठाकर उनके सिर दिवार से फोड़ दिए गए, बच्चियों का बलात्कार किया गया, बलात्कार कर लड़कियों के स्तन काट दिए गए और गर्भवती महिलाओं के आतंरिक अंगों को बाहर निकाल दिया गया।” इन घटनाओं को देखते हुए सरदार पटेल ने प्रधानमंत्री नेहरू को 2 सितम्बर 1947 को पत्र लिखा, “सुबह से शाम तक मेरा पूरा समय पश्चिम पाकिस्तान से आने वाले हिन्दू और सिखों के दुख और अत्याचारों की कहानियों में बीत जाता है।”

हालाँकि, 20 जुलाई 1947 को यह नियम बना दिया गया था कि दोनों देशों द्वारा अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की जाएगी। भारत के गवर्नर-जनरल माउंटबेटन ने इसकी सार्वजानिक घोषणा भी कर दी थी। बावजूद इसके, पाकिस्तान ने इसे नजरंदाज किया और वहां हिन्दुओं और सिखों का नरसंहार जारी रहा। पंजाब के गवर्नर जनरल फ्रांसिस मुडी ने जिन्ना को 5 सितंबर 1947 को पत्र लिखा, “मुझे नहीं पता कि सिख सीमा कैसे पार करेंगे। महत्वपूर्ण यह है कि हमें जल्द से जल्द उनसे छुटकारा पाना होगा।”

पाकिस्तान के सिंध प्रान्त से भी हिन्दुओं पर हमले की ख़बरें लगातार मिल रही थी। प्रधानमंत्री नेहरू ने 8 जनवरी 1948 को बीजी खेर को एक टेलीग्राम भेजा, “स्थितियों को देखते हुए (सिंध में गैर-मुस्लिमों की हत्या और लूट-पाट हो रही थी), सिंध से हिन्दू और सिख लोगों को निकालना होगा।” अगले दिन प्रधानमंत्री ने खेर को एक पत्र भी लिखा, “सिंध में हालात ख़राब है और मुझे डर है कि हमें भारी संख्या में निष्क्रमण देखना होगा। हम उन्हें सिंध में नहीं छोड़ सकते।” पाकिस्तान में हिन्दुओं के नरसंहार को लेकर प्रधानमंत्री परेशान थे और उन्होंने सरदार पटेल को भी वहॉं की स्थितियॉं बताने के लिए 12 जनवरी 1948 को एक पत्र लिखा। सरदार ने पहले ही उनकी सुरक्षा और पुनर्वास के प्रयास शुरू कर दिए थे। उनका स्पष्ट मत था कि पाकिस्तान में हिन्दुओं और सिखों का रुकना संभव नहीं है।

पाकिस्तान से आने वाले हिन्दुओं और सिखों का भारत में पुनर्वास एक जटिल कार्य था। प्रधानमंत्री नेहरू ने 15 नवंबर 1950 को संसद में यह स्वीकार किया था कि किसी अन्य देश को ऐसी स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा, जैसी विस्थापन की समस्या भारत के सामने थी। देश के पहले लोकसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस का चुनावी घोषणा-पत्र खुद जवाहरलाल नेहरू ने तैयार किया था। इसे कॉन्ग्रेस कार्यसमिति ने बैंगलोर में 13 जुलाई, 1951 को पारित किया। इसमें नेहरू लिखते है, “पिछले चार सालों की सबसे बड़ी समस्या पाकिस्तान से आने वाले विस्थापितों का पुनर्वास है। जिसपर तात्कालिक और लगातार ध्यान देने की जरूरत है।” इस घोषणा-पत्र में कॉन्ग्रेस ने बताया कि साल 1951-52 में विस्थापितों के पुनर्वास और राहत के लिए 140 करोड़ रुपए खर्च किए जाएँगे। इसमें उनके लिए दुकानें और औद्योगिक क्षेत्र के अलावा 86,000 नए घर बनवाना भी शामिल था।

पाकिस्तानी गैर-मुस्लिमों को देशभर में बसाना भारत सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल था। फिर भी, वहाँ बहुत बड़ी संख्या में गैर-मुस्लिम रह गए थे, जिनका बाद में भी विस्थापन जारी रहा। पहली लोकसभा में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के सदस्य सीपी गिडवानी ने 6 दिसंबर, 1952 को बताया, “हमारा सिन्धी का एक अखबार है जो बम्बई से निकलता है। उसने लिखा है कि परसों एक जहाज कराची से आया, उसमें 23 हिन्दू आए। उसमें से एक ने बयान दिया है कि एक हिन्दू किसी गाँव में जा रहा था, उसका क़त्ल करके उसकी लाश को एक बोरी के अन्दर डाल दिया गया। इसलिए विवश होकर हमें यहाँ आना पड़ा।”

भारत सरकार ने लोकसभा में 1959 में एक ब्यौरा दिया। इसके अनुसार राजस्थान, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, मणिपुर, मध्य प्रदेश, बिहार, असम और अंडमान निकोबार में पाकिस्तानी गैर-मुस्लिमों को बसाया गया था। तीसरी पंचवर्षीय योजना में इस पुनर्वास कार्यक्रम का पूरा विवरण दिया गया था। इसमें बताया गया है कि पाकिस्तान से 89 लाख धार्मिक प्रताड़ित गैर-मुस्लिम भारत आए, जिसमें से 47 लाख पश्चिम पाकिस्तान और शेष पूर्वी पाकिस्तान से थे। साल 1947-48 और 1960-61 के बीच कुल 239 करोड़ रुपए इन विस्थापितों के पुनर्वास के लिए तय किए गए थे। इसमें से 133 करोड़ पश्चिम पाकिस्तान और 106 करोड़ पूर्वी पाकिस्तान के लिए आवंटित किए गए थे। पहली पंचवर्षीय योजना से पहले 70.87 करोड़, पहली पंचवर्षीय योजना में 97.55 करोड़ और दूसरी पंचवर्षीय योजना में 70.32 करोड़ रुपए की राशि खर्च की गई। यही नहीं, इस दौरान सरकार ने 33,000 परिवारों को अस्थायी तंबुओं से निकालकर जमीनें वितरित की थी। लगभग 1,10,000 लोगों को व्यावसायिक और तकनीकी शिक्षा भी दी गई थी।

आज कॉन्ग्रेस नागरिकता (संशोधन) कानून का विरोध कर रही है। इसका कोई आधार नहीं है। वास्तव में उनके नेताओं को अपने इतिहास को जानने और समझने की जरूरत है। उस दौर में प्रधानमंत्री नेहरू के केंद्रीय मंत्रिमंडल में राहत और पुनर्वास के लिए एक अलग से मंत्रालय भी बनाया गया था। इसका कभी किसी ने विरोध नहीं किया और विश्व के सबसे बड़े विस्थापन को नियमित किया गया था। वर्तमान भारत सरकार ने इसी प्रक्रिया का सरलीकरण किया है।

नागरिकता (संशोधन) कानून की आवश्यकता क्यों?

मरीचझापी में जिन 7000 शरणार्थियों का संहार हुआ वे भी दलित थे, जय भीम-जय मीम का नया छलावा है ‘रावण’

‘अगर पाकिस्तान के मुस्लिम भारत आकर रहेंगे, तो विभाजन का क्या मतलब, पूरे को हिन्दुस्तान घोषित कर दो’

UP पुलिस ने तेज की कार्रवाई: लाखों की वसूली के लिए रामपुर के 28 और बिजनौर में 43 घरों में भेजे गए नोटिस

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध में उत्तर प्रदेश में हिंसा करने वाले उपद्रवियों की अब शामत आनी शुरू हो गई है। उत्तर प्रदेश सरकार ने हिंसा करने वाले प्रदर्शनकारियों की पहचान कर उनसे सरकारी संपत्ति को हुए नुकसान की कीमत की वसूली शुरू कर दी है। इसी कड़ी में यूपी पुलिस ने 28 उपद्रवियों की पहचान करते हुए उनके घरों में नुकसान की वसूली के लिए नोटिस भेजे हैं। हिंसक प्रदर्शन के दौरान लगभग 15 लाख की सार्वजनिक संपत्ति की क्षति हुई है।

बता दें कि कुछ दिनों पहले ही सीएम योगी आदित्यनाथ ने हिंसक प्रदर्शन के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने वालों को कड़ा संदेश देते हुए कहा था कि सार्वजानिक संपत्ति को नुक़सान पहुँचाने वालों की संपत्ति बेच कर इसकी भरपाई की जाएगी। उपद्रवियों की संपत्ति को नीलाम करके जो पैसे आएँगे, उससे सार्वजनिक संपत्ति को पहुँचाई गई क्षति की भरपाई होगी।

सीएम के घोषणा करने के कुछ ही दिनों बाद ही रामपुर पुलिस ने पहली नोटिस जारी की है। इस नोटिस में रामपुर जिले के 28 स्थानीय लोगों को हिंसक कार्यवाही और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के लिए जिम्मेदार ठहराया। ये उपद्रवी संपत्ति की क्षति के लिए 14.86 लाख रुपए का भुगतान करेंगे।

यूपी पुलिस द्वारा जारी किया गया नोटिस

इंडिया टीवी की एक रिपोर्ट के अनुसार, पुलिस ने स्पष्टीकरण माँगा था कि क्यों 14.86 लाख रुपए के नुकसान के लिए वसूली नहीं की जानी चाहिए। रामपुर पुलिस द्वारा जारी किए गए इस नोटिस में सरकारी संपत्तियों को 14,86,500 रुपए के नुकसान का हवाला दिया गया है। इसमें अन्य लोगों के अलावा भोट थाने की पुलिस जीप (750,000 रुपए), एक सब-इंस्पेक्टर की मोटरसाइकिल (65,000 रुपए), सिटी कोतवाली पुलिस स्टेशन की मोटरसाइकिल (90,000 रुपए) के साथ ही वायरलेस सेट, हूटर / लॉउडस्पीकर, 10 डंडा, तीन हेलमेट और तीन बॉडी प्रोटेक्टर शामिल हैं।

रामपुर के जिलाधिकारी आंजनेय कुमार सिंह ने कहा कि पुलिस ने विरोध प्रदर्शन में उनकी भूमिका पाए जाने के बाद 28 लोगों को नोटिस जारी किए। आंजनेय कुमार सिंह ने कहा, “हमने 28 व्यक्तियों को नोटिस जारी किए जिनकी भूमिका पुलिस ने जाँच के दौरान पाई। पुलिस ने उनके खिलाफ सबूत जमा किए। उन्हें (28 लोगों को) एक सप्ताह के भीतर जवाब देने के लिए कहा गया है। अगर वो ऐसा नहीं करेंगे तो उनके खिलाफ वसूली की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। 28 में से कुछ को गिरफ्तार कर लिया गया है, जबकि अन्य का पता लगाने के लिए छापेमारी जारी है। अभियुक्त या उसका परिवार अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए साक्ष्य प्रस्तुत कर सकते हैं कि कैसे उनके खिलाफ गलत तरीके से मामला दर्ज किया गया है।”

इसके अलावा बिजनौर में भी सार्वजनिक संपत्ति को क्षति पहुँचाने के आरोप में 43 उपद्रवी दंगाइयों को पुलिस ने नोटिस जारी किया है।

दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित खबर

इसके अलावा अलीगढ़ के शाहजमाल में पथराव करने वालों के एक लाख से अधिक पोस्टर चस्पा किए जा चुके हैं। इनमें 16 से अधिक दंगाइयों के नाम-पते भी पुलिस को मिल गए हैं, जिनकी गिरफ्तारी के लिए दबिश दी जा रही है। बता दें कि शाहजमाल में शुक्रवार को जुमे की नमाज के बाद भीड़ ने पथराव किया था। कुछ नकाबपोश उपद्रव के इरादे से सड़क पर उतरे थे। जिसके बाद पुलिस ने सख्त कार्रवाई करनी शुरू कर दी है।

मुखर्जी नगर: पुलिस द्वारा कोचिंग-PG बंद करने वाली वायरल वीडियो और पत्र फर्जी, FIR दर्ज

CAA और NRC के विरोध से छात्रों को रोकने के लिए दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाके में तमाम कोचिंग सेंटरों को बंद किए जाने की खबरों को उत्तर पश्चिमी डीसीपी विजयंत आर्या ने अफवाह करार दिया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर वायरल हो रही इस भ्रामक जानकारी के बारे में बुधवार (दिसंबर 25, 2019) को कहा कि मुखर्जी नगर के कोचिंग सेंटरों के बंद होने की खबर अफवाह मात्र है। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया पर इससे संबंधित फर्जी खबरें शेयर करने वालों के खिलाफ केस दर्ज किए गए हैं। इसके साथ ही उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों से इस फर्जी खबर के वीडियो को डिलीट करने के लिए भी कहा है।

दिल्ली पुलिस ने फर्जी वीडियो और लेटर के खिलाफ केस भी दर्ज कर लिया है और मुखर्जी नगर के लोगों से अपील की है कि वह सोशल मीडिया पर ऐसे फर्जी पोस्ट पर ध्यान ना दें। दरअसल सोशल मीडिया पर दिल्ली पुलिस का एक फर्जी वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें छात्रों को हॉस्टल खाली करने को कहा जा रहा है। 

इस वीडियो में कहा जा रहा है कि मुखर्जी नगर इलाके के छात्रों से कहा जा रहा है कि मुखर्जी नगर में सभी कोचिंग सेंटर 24 दिसंबर से 2 जनवरी तक बंद किए गए हैं। लॉ एंड आर्डर को देखेते हुए धारा 144 लगाई गई है इसलिए सभी छात्र अपना-अपना पीजी खाली करके चले जाएँ। साथ ही इसमें ऐसा न करने वालों को गिरफ्तार करने की भी बात कही गई है। हालाँकि दिल्ली पुलिस ने इसे नकार दिया और कहा कि वीडियो के साथ छेड़छाड़ की गई है। उन्होंने किसी को गिरफ्तार करने की बात से इनकार कर दिया है।

इस वीडियो को गोविंदा मिश्रा नाम के ट्विटर हैंडल से शेयर किया गया है। वीडियो शेयर करते हुए गोविंदा मिश्रा ने लिखा, “अब पूरा मुखर्जी नगर खाली करवाया जा रहा है। फरमान जारी हो गया है कि सभी कोचिंग और PG बंद कर दिए जाएँ। सरकारी नौकरी की तैयारी करने वाले लाखों छात्रों से दिल्ली का मुखर्जी नगर खाली करने को बोल दिया गया है। PG, लाइब्रेरी सब बंद कर दिए हैं। क्या देश में आपातकाल लागू हो गया है?”

सरकारी योजनाओं में नहीं होगा फर्जीवाड़ा, घुसपैठ रुकेगा: NDTV के इस वीडियो से समझें NPR के फायदे

नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (NPR) को लेकर केंद्र सरकार ने अहम घोषणा की है। इसके लिए 3941.35 करोड़ रुपए का बजट आवंटित किए जाने के साथ ही सरकार ने बताया है कि 1 अप्रैल 2020 से इसकी प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। जहाँ एक तरफ मीडिया का गिरोह विशेष विपक्षी नेताओं के साथ मिल कर भ्रम फैलाने में लगा हुआ है, वहीं केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट कर दिया है कि एनपीआर का एनआरसी से कोई लेनादेना नहीं है। एनडीटीवी के रवीश कुमार कई बार एनआरसी को लेकर लोगों के बीच डर का माहौल पैदा करने का प्रयास कर चुके हैं।

जैसा की हम पहले ही आपको बता चुके हैं एनपीआर की प्रक्रिया पहली बार यूपीए-2 की सरकार के दौरान पूरी की गई थी। तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल इस रजिस्टर में नाम दर्ज कराने वाली पहली सदस्य थीं। कॉन्ग्रेस ने ही इसे एनआरसी से जोड़ा था। आश्चर्य यह कि तब एनडीटीवी जैसे न्यूज़ चैनलों को एनपीआर काफ़ी महत्वपूर्ण लगा था। इस बारे में एनडीटीवी का एक वीडियो भी वायरल हो रहा है, जिसमें एनडीटीवी की निधि कुलपति एनपीआर के फायदों के बारे में समझा रही हैं। आप भी इस वीडियो को देखें:

इस वीडियो में एनडीटीवी ने बताया था कि सरकार इस बार (2010-11 में) जनगणना के साथ एक और अहम कार्य कर रही है। एनडीटीवी ने बताया कि देश के हरेक व्यक्ति के डिटेल्स इसमें होंगे और इसके जरिए ही लोगों को विशेष पहचान पत्र मिलेगा। एनडीटीवी ने तब इसका महिमामंडन करते हुए इसे दुनिया के सबसे बड़े जनसंख्या रजिस्टर की संज्ञा दी थी। अपनी रिपोर्ट में एनडीटीवी ने बताया था:

“एनपीआर में क़रीब 120 करोड़ लोगों के नाम होंगे। इसे तैयार करने में 3540 करोड़ रुपए ख़र्च आएगा। ये अपनी तरह की सबसे बड़ी कवायद है। लोगों के फोटो खींचे जाएँगे और दसों उँगलियों के बायोमेट्रिक निशान लिए जाएँगे। इस बार जनगणना अधिकारी आपके घर 2 फॉर्म लेकर आएँगे- एक हाउस लिस्टिंग का और दूसरा एनपीआर का फॉर्म होगा। 15 साल से ऊपर की उम्र का हर व्यक्ति इस रजिस्टर में होगा। एनपीआर के कई फ़ायदे होंगे। इसके जरिए ही ‘यूनिक आइडेंटिटी कार्ड’ मिलेगा। ये पहचान पत्र सरकारी योजनाओं में ख़ास कर के काम आएगा।”

एनडीटीवी ने एनपीआर का गुणगान करते हुए बताया था कि इसके जरिए सरकारी योजनाओं में फर्ज़ीवाड़े को रोकना आसान हो जाएगा। साथ ही एनडीटीवी ने समझाया था कि किस तरह एनपीआर तैयार होने के बाद अवैध घुसपैठ रोकने में भी कामयाबी मिलेगी। चैनल ने आगे बताया कि यह भारत में रह रहे लोगों का डेटाबेस होगा। इससे अवैध रूप से रह रहे लोगों की पहचान होगी। एनडीटीवी ने जनता से अपील करते हुए कहा था- ध्यान रखे, इस रजिस्टर में आपका नाम ज़रूर होना चाहिए, क्योंकि ये आपके बहुत काम आएगा।

भाजपा ने नहीं, कॉन्ग्रेस की सरकार ने NPR को NRC से जोड़ा था: 9 साल बाद मोदी सरकार ने अलग किया

NPR का पहला डाटा किसका: जिसके लिए कॉन्ग्रेसी मंत्री ने कहा था- इंदिरा गाँधी की रसोई सँभालती थी

1 अप्रैल से NPR: घर-घर जाकर जुटाया जाएगा डाटा, मोदी सरकार ने ₹8500 करोड़ की दी मंजूरी

दंगे में मरने वाले 14 हैं मजहब विशेष से: फर्जी पत्रकार राणा अयूब ने योगी को कहा इस्लाम-विरोधी

पूरे देश में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के ख़िलाफ़ विपक्षी दलों ने जनता को भड़काने का प्रयास किया। मुस्लिमों के बीच अफवाह फैला कर उन्हें हिंसा के लिए उकसाया गया। इसमें विपक्षी नेताओं के साथ-साथ कई कथित बुद्धिजीवी और पत्रकार भी शामिल रहे। प्रदर्शनकारियों ने जगह-जगह अराजकता फैलाते हुए सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया। पुलिस के साथ झड़प की और आमजनों को परेशान किया। इसका सबसे ज्यादा असर उत्तर प्रदेश में देखने को मिला। कई जगह दंगाइयों की हिंसा को रोकने के लिए पुलिस को जवाबी कार्रवाई करनी पड़ी, जिसमें कई उपद्रवी मारे भी गए।

चूँकि, दंगाइयों में अधिकतर मुस्लिम थे, मारे जाने वाले लोगों में भी कई मुस्लिम ही रहे। इसे लेकर तथाकथित पत्रकार राणा अयूब ने सोशल मीडिया पर लोगों को भड़काना शुरू कर दिया है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में लेख लिख कर और बयान देकर भारत की नकात्मक छवि बनाने में जुटीं राणा अयूब ने मरने वालों के नाम गिना कर दावा किया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार सांप्रदायिक है। मरने वालों में आसिफ, अनस, बिलाल, आरिफ, शहरोज़, वकील, नबी आफताब, फैज़, सुलेमान, सैफ, मोढ़िन, रशीद और जशीर शामिल थे।

राणा अयूब ने दावा किया कि इन सभी लोगों को यूपी पुलिस ने मार डाला। हालाँकि, उन्होंने उन दोनों हिन्दुओं का नाम नहीं बताया, जो मारे गए थे। राणा अयूब ने इसे मुस्लिम-विरोधी नरसंहार करार दिया। उन्होंने उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार की ओर इशारा करते हुए लिखा कि उसके हाथों में ख़ून के धब्बे हैं। अयूब ने अपनी टाइमलाइन पर उनलोगों की ‘मानवीय संवेदना वाली कहानियाँ’ भी शेयर की, जिसमें बताया गया था कि कैसे मरने वाले एकदम निर्दोष और निर्धन थे। सारा इल्जाम पुलिस पर ही लगा दिया गया।

इससे पहले सुलेमान के मारे जाने को लेकर ये हाइलाइट किया गया था कि उसे यूपी पुलिस ने मार डाला और वो यूपीएससी की तैयारी करने वाला छात्र था। ये घटना बिजनौर की है। सुलेमान ने पुलिस पर गोली चलाई, जो कॉन्स्टेबल मोहित के पेट में लगी। गुंडों ने सब-इंस्पेक्टर आशीष का पिस्टल भी छीन लिया था। कोई रास्ता न देखते हुए आत्मरक्षा में मोहित को फायर करना पड़ा और सुलेमान मारा गया। इसी तरह की घटनाओं में पुलिस का पक्ष छिपाते हुए यूपी सरकार पर ही निशाना साधा गया और दंगाइयों का महिमामंडन किया गया।

देशी कट्टे से पुलिस पर गोली चला कर होती है UPSC की तैयारी! अपने ‘शहीद दंगाई हीरो’ के बचाव में मीडिया

पेट्रोल बम फेंको, नौकरी पाओ योजना: ‘ये लोग’ दंगाइयों को पालते रहेंगे, हिंदू सोता रहेगा

मैं पंकज तिवारी… अल्लाह कसम मैं पत्थर नहीं चला रहा था: गोरखपुर के एक पत्थरबाज का ‘कबूलनामा’

‘किस ऑफ लव’ शुरू करने वाली दंपत्ति को पुलिस ने किया गिरफ्तार, सेक्स ट्रैफिकिंग का है मामला

ऑनलाइन सेक्स ट्रैफिकिंग मामले में 23 दिसंबर को केरल पुलिस की क्राइम ब्रांच ने ‘किस ऑफ लव’ अभियान शुरु करने वाली दंपत्ति के ख़िलाफ़ तिरुवनंतपुरम की पॉक्सो विशेष अदालत में हलफनामा दर्ज किया है।

क्राइम ब्रांच के आईजी एस श्रीजिथ, जिन्होंने ‘ऑपरेशन बिग डैडी’ को भी लीड किया था और जिसके तहत रैकेट का भांडाफोड़ हुआ। उनके द्वारा कोर्ट में दायर हलफनामे में मॉडल रेस्मी आर नय्यर और राहुल पशुपालन नामक इस दंपत्ति पर आरोप लगाया गया है कि दोनों पति-पत्नी एक ऐसी गैंग की मदद करते थे, जो बच्चों की सप्लाई ‘पेडोफाइल्स’ को करती थी।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, सेक्स रैकेट मामले में दायर हुई चार्जशीट में रेस्मी पर आरोप है कि वे नाबालिग लड़कियों को अमीर क्लाइंटों के साथ ‘Paid sex’ के लिए तैयार करती थी। जबकि उसका पति राहुल पशुपालन इस रैकेट के बारे में जानता था और साथ ही इस काम में उसका साथ भी देता था।

गौरतलब है कि इस मामले में पहली दफा एफआईआर साल 2015 में दर्ज हुई थी। जिसके बाद क्राइम ब्रांच ने इस दंपत्ति को नेदमबेसरी (Nedumbasserry) से पहली बार गिरफ्तार किया था। उस दौरान इनके अलावा चार अन्य लोगों को भी रैकेट में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

इस हलफनामे में इस दंपत्ति द्वारा शुरु किए गए अभियान ‘किस ऑफ लव’ का भी जिक्र किया गया है और कहा गया है कि ये दंपत्ति बंगलुरु से केरल में नाबालिग लड़कियों की तस्करी करती थी। ताकि उन्हें वेश्यावृति में भेजा जा सके। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस मामले में इन दोनों के अलावा 11 अन्य लोगों को भी इस चार्जशीट में आरोपित बनाया गया है।

भाजपा ने नहीं, कॉन्ग्रेस की सरकार ने NPR को NRC से जोड़ा था: 9 साल बाद मोदी सरकार ने अलग किया

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि राष्‍ट्रीय जनसंख्‍या रजिस्‍टर (NPR) का एनआरसी से कोई लेनादेना नहीं है। लेकिन, विपक्ष फिर भी बाज नहीं आ रहा। उनका कहना है कि भाजपा का ये क़दम एनआरसी की दिशा में प्रारंभिक क़दम है। असल में न तो एनपीआर भाजपा ने शुरू किया है और न ही पार्टी ने इसे एनआरसी का हिस्सा बताया है। ये दोनों ही काम उसी पार्टी ने किए हैं, जो आज इसका सबसे ज़्यादा विरोध कर रही है। कॉन्ग्रेस ने केंद्र में अपनी सरकार रहते न सिर्फ़ पहली बार एनपीआर को तैयार किया था, बल्कि पार्टी ने इसे एनआरसी से भी जोड़ा था।

हम बता चुके हैं कि एनपीआर का पहला डाटा देश की इकलौती महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का था। 25 जुलाई 2007 से 25 जुलाई 2012 तक वह राष्ट्रपति रही थीं। जुलाई 2012 में जारी की गई प्रेस रिलीज में स्पष्ट बताया गया है कि एनपीआर तैयार करने के लिए जनसांख्यिकीय आँकड़े अप्रैल से सितंबर 2010 के दौरान पूरे देश में घर-घर जाकर गणना कर एकत्रित किए गए थे। इसमें कहा गया था कि एकत्र किए गए एनपीआर आँकड़ों को बॉयोमीट्रिक्‍स के साथ UIDAI के पास यूआईडी संख्‍याओं (आधार) के डि-डुप्‍लिकेशन और अपक्रमण के लिए भेजा जाएगा।

अब आपको बताते हैं कि कैसे कॉन्ग्रेस पार्टी की सरकार ने ही इसे एनआरसी की प्रक्रिया का हिस्सा बताया था। ‘सेंसस इंडिया’ ने अपनी वेबसाइट पर 2011 में बताया था कि ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ इंडियन सिटीजन्स (NRIC)’ की दिशा में एनपीआर पहला क़दम है। इसमें एनपीआर की प्रक्रिया में शामिल होना भारत में रह रहे लोगों के लिए अनिवार्य बताया गया है। यूपीए-2 सरकार ने बताया था कि एमपीआर में प्रत्येक व्यक्ति के 15 सूचीबद्ध डिटेल्स के अलावा फोटो, फिंगरप्रिंट और आईरिस सहित तीन बायोमेट्रिक डिटेल्स भी होंगे।

‘सेन्सस इंडिया’ की वेबसाइट ने 2011 में ही बताया था कि ये NRC का हिस्सा है

वहीं अप्रैल 2020 से शुरू होने वाली एनपीआर की प्रक्रिया को लेकर गृह मंत्री अमित ने चीजें स्पष्ट करते हुए बताया:

NPR जनसंख्या का रजिस्टर है। देश में जो भी रहते हैं, उनके नाम रजिस्टर किए जाते हैं, जिसके आधार पर अलग-अलग योजनाओं का आकार बनता है। NRC में नागरिकता का प्रमाण माँगा जाता है। इन दोनों प्रक्रिया का कोई लेन-देन नहीं है। NRC का कांसेप्ट राजीव गाँधी लेकर आए थे, आज सोनिया गाँधी उसका विरोध कर रही हैं।

आज वही कॉन्ग्रेस एनपीआर का सबसे ज़्यादा विरोध कर रही है, जिसने कभी इस पूरी प्रक्रिया को पहली बार कराया था। सीताराम येचुरी और प्रकाश करार सरीखे वामपंथी नेता एनपीआर को एनआरसी का दूसरा रूप बता रहे हैं। ओवैसी ने भी इसे एनआरसी की तरफ़ पहला क़दम बताया है। कॉन्ग्रेस नेता अजय माकन 2018-19 के गृह मंत्रालय की रिपोर्ट देख कर दावा करते हैं कि एनपीआर की प्रक्रिया एनआरसी का अगला क़दम है, लेकिन अपनी ही सरकार के दौरान ‘सेंसस इंडिया’ की वेबसाइट पर कही गई बात को भूल जाते हैं।

अमित शाह ने बताया किन लोगों के लिए है डिटेंशन सेंटर, कहा- NPR का NRC से कोई संबंध नहीं

NPR का पहला डाटा किसका: जिसके लिए कॉन्ग्रेसी मंत्री ने कहा था- इंदिरा गाँधी की रसोई सँभालती थी

1 अप्रैल से NPR: घर-घर जाकर जुटाया जाएगा डाटा, मोदी सरकार ने ₹8500 करोड़ की दी मंजूरी