महाराष्ट्र में शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे की आलोचना करने वालों पर शिवसेना कार्यकर्ताओं का तांडव जारी है। अब बीड जिले के एक व्यक्ति को निशाना बनाया गया है, जिसे फेसबुक पर मुख्यमंत्री की आलोचना की थी। शिवसेना की एक कार्यकर्ता ने पूरे बोतल भर इंक एक व्यक्ति के ऊपर सिर्फ़ इसीलिए उड़ेल दिया, क्योंकि उसने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की आलोचना करते हुए पोस्ट लिखा था। महिला ने जब उस व्यक्ति पर इंक डाला, तब वो फोन से बात कर रहा था।
शिवसेना कार्यकर्ताओं ने बुजुर्ग को चारों ओर से घेर रखा था और उसे खरी-खोटी सुना रहे थे। इनमें कुछ शिवसेना की महिला कार्यकर्ताएँ भी शामिल थीं। इस दौरान वहाँ उपस्थित कई लोग तमाशबीन बन कर देखते रहे। अंत में महिला ने स्याही भरी बोतल निकाली और बजुर्ग के सिर और गले पर उड़ेल दिया। इस घटना का पूरा वीडियो नीचे संलग्न किया गया है, जिसे आप देख सकते हैं:
शिवसेना नहीं सुधरेगी 2.0
मुंबई के बाद बीड में क़ानून हाथ में लिया
मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखने वाले व्यक्ति पर स्याही फेंकी
जिस बुजुर्ग पर स्याही डाली गई है, वो असल में एक सरकारी कर्मचारी है। महाराष्ट्र में सरकार, सत्ताधारी शिवसेना या मुख्यमंत्री ठाकरे की किसी प्रकार से भी आलोचना को शिवसेना कार्यकर्ता बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। हाल ही में एक व्यक्ति ने जब मुख्यमंत्री की आलोचना की तो उसके साथ मारपीट की गई और उसका सिर मुँड़वा दिया गया था। बाद में युवा सेना के अध्यक्ष आदित्य ठाकरे ने इस मामले में अपने कार्यकर्ताओं का बचाव किया था और पीड़ित को ही ‘नीच’ करार दिया था।
एक आँख बाहर ताकती हुई, दूसरी आखों के ऊपर से सफ़ेद रंग की पट्टी, सिर में बैंडेज, पाँव में बैंडेज। जामिया गैंग के छात्र कुछ यूँ ही घूम रहे हैं। घायल अवस्था में। एक से बढ़कर एक फोटोज आ रहे हैं मार्किट में। किसी युवती के हिजाब के ऊपर से ही बैंडेज लगा दिया गया है तो किसी के जैकेट के ऊपर से ही पट्टियाँ बाँध दी गई हैं। कहीं इस आस्था में विरोध प्रदर्शन हो रहा है तो कहीं नाटक खेलने की बातें सामने आ रही हैं। जैसा कि सीएए विरोधी सेलेब्रिटी फरहान अख़्तर ने कहा है- “I don’t want to go into the details”, हम भी ये काम ‘फाल्ट न्यूज़’ वालों पर छोड़ते हैं।
आख़िर इन वामपंथियों का फैक्ट-चेक कर के अपना समय ही क्यों बर्बाद करना? यहाँ सवाल ये है कि आखिर किस क्रिएटिव नकली डॉक्टर ने ये मरहम-पट्टी की है, जिसने जैकेट और हिजाब के ऊपर से ही बैंडेज लगा दिया? चोट शरीर को आई है या कपड़े को? क्या ये वही डॉक्टर है, जिसके गैंग ने पाकिस्तान में कबूतर के गुदाद्वार से हेपेटायटिस का कीड़ा खिंच लेने वाला तरीका ईजाद किया है? अगर ऐसा है तो ये सोचने लायक बात है कि इन वामपंथियों को दवा किस मार्ग से खिलाया जाता होगा और पानी शरीर के किस भाग से होकर चढ़ाया जाता होगा?
ये फोटो क्रन्तिकारी हैं। वामपंथियों के पास इससे भी एक क़दम और आगे निकलने का मौक़ा है। वो गले में फाँसी की रस्सी लगा कर भी घूम सकते हैं ताकि लोगों को लगे कि उन्हें ‘अलोकतांत्रिक’ और ‘तानाशाह’ भारत सरकार ने सज़ा-ए-मौत दे दी है और वो मारे जा चुके हैं। लोग तो भला ठहरे बेवकूफ। वो समझेंगे कि ये जो भी वामपंथी विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, उन्हें फाँसी दी जा चुकी है। ठीक उसी तरह, जैसे जैकेट और हिसाब के ऊपर से मरहम-पट्टी की गई है।
ये ट्रेंड सही नहीं है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि ये सब पीएम मोदी के फिटनेस अभियान का विरोध कर रहे हैं? प्रधानमंत्री हमेशा योग करने, फिट रहने, व्यायाम करने और सुबह दौड़ लगाने की बातें करते हैं, ताकि लोग ख़ुद को फिट रख सकें। कहीं वामपंथियों ने ये तो नहीं ठान लिया है कि उन्हें फिट रहने के लिए कोई मजबूर नहीं कर सकता और वो ऐसे ही हाथ-पाँव टूटने का बहाना करते हुए घूमेंगे? या फिर कुछेक ने मोदी की इस नीति का विरोध करने के लिए ये भी प्रण किया हो कि तब तक दंगे और उपद्रव करेंगे, जब तक पुलिस उनका कचूमर निकाल कर उन्हें अनफिट नहीं कर देती।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगर कल को कह दें कि शौच के बाद हमेशा हाथ-पाँव ठीक से धोना चाहिए तो ये वामपंथी कहीं… छोड़िए, जब ऐसा होगा तो आपको ख़ुद पता चल जाएगा। एक आँख, एक हाथ और एक पाँव वाले इन प्रदर्शनकारियों को सबसे पहले उस नकली डॉक्टर का नाम उजागर करना चाहिए। ऐसा इसीलिए, क्योंकि इससे लोगों को भी पता चलेगा कि शरीर घायल होने से कपड़ों की मरहम-पट्टी कर के भी मरीजों को ठीक किया जा सकता है और ऐसा तरीका ईजाद करने वाला क्रन्तिकारी वैज्ञानिक है कौन?
आश्चर्य की बात तो ये कि कुछ प्रदर्शनकारियों के बैंडेज पर ख़ून लगा हुआ भी दिख रहा है। वो लाल रंग का कौन सा पदार्थ है, इसकी जाँच होनी चाहिए। अगर वो केमिकल वाला रंग है तो ये और भी टेंशन वाली बात है क्योंकि कई मुस्लिम मानते हैं कि इस्लाम में रंग खेलना हराम है। हिजाब, उसके ऊपर लगी पट्टी और फिर पट्टी पर लगा लाल रंग का केमिकल। हाथ में एक बैनर हो और मुँह चिल्लाने की मुद्रा में हो तो फोटो परफेक्ट आता है। ठीक उसी एंगल से, जिससे लदीदा और आयशा की करतूतों को सुनियोजित तरीके से ब्रांडिंग के लिए शूट किया गया था।
जैकेट के ऊपर से मरहम-पट्टी: मदरसा छाप डॉक्टरों की करतूत?
जिन पत्थरबाज दंगाइयों को सच में पुलिस ने पीटा है, वो पोस्टर-बैनर लेकर बाहर निकल कर विरोध प्रदर्शन करने की हालत में हैं ही नहीं। आख़िर इतनी पिटाई के बाद कोई उपद्रवी फिर से बाहर निकलने की जहमत क्यों उठाएगा? योगी के मंत्री पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि ऐसी कार्रवाई की जाएगी कि दंगाइयों की सात पुश्तें याद रखेंगी। तो सोचने वाली बात है, कोई दंगाई मार खा कर भी बाहर क्यों निकलेगा? अर्थात, जिन्होंने पुलिस के डंडे का स्वाद नहीं चखा है, वही बाहर निकले हुए हैं। मतलब वो लोग ‘नकली घायल’ हैं।
अगर सच में बैंडेज पहनने का शौक है तो उपद्रवियों के लिए दो विकल्प हैं। पहला विकल्प ये है कि वो यूपी में जाकर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का प्रयास कर सकते हैं। पुलिस उनकी ऐसी मरम्मत करेगी कि वो ख़ुद असली मरहम-पट्टी के साथ लौटेंगे। लेकिन हाँ, वो फिर सड़क पर उतर कर ‘ड्रामा खेलने’ की हिम्मत शायद ही जुटा सकें। दूसरा विकल्प भी है। इस विकल्प में उन्हें ‘सेक्युलर बैंडेज’ मिलेगा और मुफ़्त में उनके बाल भी मुँड़ दिए जाएँगे। इसके लिए महाराष्ट्र में जाकर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की आलोचना करनी होगी। इसके बाद पुलिस की कोई ज़रूरत ही नहीं रह जाएगी। शिवसैनिक काम पूरा कर देंगे।
हालाँकि, शिवसेना ने जिन लोगों की पिटाई की है, वो बेचारे तो बाहर निकल कर विरोध प्रदर्शन भी नहीं कर सकते। अगली बार न जाने उनके साथ क्या हो! लेकिन हाँ, ये नकली बैंडेज और मरहम-पट्टी वाले सहानुभूति और समर्थन नहीं, हँसी के पात्र बन रहे हैं। आप भी हँस लीजिए, इन्हें देख कर।
संसद द्वारा 11 दिसंबर को नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) पारित होने के बाद, वर्ष 2000 से कोटा में रह रहे पाकिस्तान के आठ हिन्दू शरणार्थियों को सोमवार (30 दिसंबर) को भारतीय नागरिकता प्रदान की गई। इन सभी शरणार्थियों को कोटा के ज़िला कलेक्टर द्वारा नागरिकता का प्रमाण पत्र दिया गया था।
Om Prakash Kasera, Kota District Collector: Eight people had come from Pakistan, and have been living here since 2000. The Home Department of the state govt has issued orders to provide citizenship to them. (30.12) #Rajasthanpic.twitter.com/tg9T3EtsxR
ख़बर के अनुसार, वे धार्मिक उत्पीड़न का सामना करने के बाद पाकिस्तान के सिंध प्रांत से भागकर हिन्दुस्तान आ गए थे। नए नागरिकों ने “इस बात पर ख़ुशी ज़ाहिर की कि अब वे भारतीय संविधान के अनुसार एक भारतीय नागरिक के रूप में अपना जीवन जी सकेंगे।”
भारतीय नागरिकता प्राप्त करने वालों में से एक ने कहा,
“हम यहाँ आए क्योंकि हमारे परिवार पहले से ही यहाँ हैं। हमें नागरिकता देने के लिए हम भारत के बहुत आभारी हैं। मैं बहुत ख़ुश हूँ और अपनी ख़ुशी व्यक्त करने लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं हैं।”
इसके अलावा, एक अन्य शख़्स ने कहा, “हम 20-25 साल से यहाँ रह रहे हैं। हमने यहाँ कभी किसी समस्या का सामना नहीं किया। और वहाँ रहने वाले सभी सिंधी भारत आना चाहते हैं। हम यहाँ बहुत ख़ुश हैं। हमने अब तक किसी भी तरह की समस्या का सामना नहीं किया है।”
जबकि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा था कि राज्य में नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) और नेशनल रजिस्टर फ़ॉर सिटीजन (NRC) लागू नहीं किया जाएगा, लेकिन स्थानीय प्रशासन ने इसे नागरिकता देने की एक नियमित प्रक्रिया बताया।
ग़ौरतलब है कि नागरिकता संशोधन क़ानून 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से आए ग़ैर-मुस्लिम शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देने का काम करता है। यह उन लोगों पर लागू होता है, जिन्हें धर्म के आधार पर उत्पीड़न के कारण भारत में शरण लेने के लिए मजबूर किया गया था। इसका उद्देश्य ऐसे लोगों को अवैध प्रवास की कार्यवाही से बचाना है। नागरिकता के लिए कट-ऑफ की तारीख 31 दिसंबर, 2014 है, जिसका अर्थ है कि आवेदक उस तारीख को या उससे पहले भारत में प्रवेश कर चुका हो।
पश्चिम बंगाल में एक मौलवी ने धमकी दी है कि अगर नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) रद्द नहीं किया गया तो वो कोलकाता हवाई अड्डे को ब्लॉक कर देगा। यह दावा करते हुए कि देश की मजहबी आबादी के लिए नागरिकता क़ानून अनुचित है, पश्चिम बंगाल के जँगीपारा, हुगली में फुरफुरा शरीफ़ के मौलवी अब्बास सिद्दीक़ी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से आग्रह किया कि वे सुप्रीम कोर्ट को या तो विवादास्पद नागरिकता क़ानून को चुनौती दें या फिर राज्य विधानसभा में इस क़ानून के ख़िलाफ़ कोई सख़्त क़ानून लाएँ।
टाइम्स नाउ से बात करते हुए मौलवी ने बताया कि उसने ममता बनर्जी से इस क़ानून को रद्द करने के लिए तत्काल क़दम उठाने के लिए कहा है अन्यथा “उन्हें (ममता बनर्जी) पश्चिम बंगाल में मुस्लिमों का समर्थन खोना पड़ जाएगा।” उसने कहा कि पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्ती के नेतृत्व में होने वाले विरोध-प्रदर्शन अन्य लोगों के लिए संतोषजनक हो सकते हैं, लेकिन वे समुदाय विशेष की आबादी को संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।
आपको बता दें कि 22 दिसंबर को पश्चिम बंगाल के मंत्री और जमीयत उलेमा-ए-हिन्द (जेयूएच) के प्रदेश अध्यक्ष सिद्दीकुल्लाह चौधरी ने कुछ दिन पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को धमकी देते हुए कहा था कि अगर CAA को तुरंत वापस नहीं लिया गया तो वह अमित शाह को कोलकाता एयरपोर्ट से बाहर नहीं निकलने देंगे। उन्होंने कहा था कि जब भी शाह कोलकाता के दौरे पर आएँगे, हम उन्हें रोकने के लिए एक लाख लोग एयरपोर्ट के बाहर इकट्ठा कर देंगे।
रैली में वक्ताओं ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को CAA और NRC के ख़िलाफ़ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए सड़कों पर उतरने के लिए धन्यवाद दिया था। चौधरी की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए, भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई के प्रमुख दिलीप घोष ने पीटीआई को बताया था कि चौधरी ने पूर्व में भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के समर्थन में ऐसी भड़काऊ टिप्पणियाँ कर चुके हैं।
देश में नागरिकता संशोधन क़ानून को लागू करने के केंद्र सरकार के फ़ैसले के ख़िलाफ़ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की नाराज़गी से प्रेरित होकर, पश्चिम बंगाल में मजहब विशेष के कई लोगों ने नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन के बहाने अत्यधिक हिंसा, आगजनी, पथराव की घटनाओं को अंजाम दिया।
ममता बनर्जी, जो शायद अपने वोट बैंक को खोने से डरती हैं, हाल ही में नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर कहा था कि वह अपने राज्य पश्चिम बंगाल में CAA और NRC को लागू नहीं होने देंगी। तृणमूल कॉन्ग्रेस पार्टी (TMC) द्वारा नागरिकता क़ानून को ख़त्म करने के लिए एक अभियान चलाया गया था, जबकि इस क़ानून का उद्देश्य तीन पड़ोसी इस्लामिक देशों अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के प्रताड़ित गैर-मुस्लिमों को भारतीय नागरिकता प्रदान करना है।
TMC द्वारा पोस्टर लगाए गए थे जिसमें दावा किया गया था कि CAA और NRC को पश्चिम बंगाल में लागू नहीं किया जाएगा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी CAA और NRC के ख़िलाफ़ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए कम से कम चार मौकों पर सड़क पर उतरीं।
भाजपा द्वारा कोटा में शिशुओं की मौत के कारण का निरीक्षण करने के लिए एक फैक्ट फाइंडिंग कमिटि गठित करने के एक दिन बाद, चार सदस्यीय पैनल ने मंगलवार (31 दिसंबर) को राजस्थान में कोटा ज़िले के एक अस्पताल का दौरा किया और रोगियों के साथ बातचीत की।
इस दौरान कमेटी के सदस्यों में से एक, लॉकेट चटर्जी ने कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाली राजस्थान सरकार को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर झारखंड विधानसभा चुनावों में झामुमो-कॉन्ग्रेस-राजद गठबंधन की जीत का जश्न मनाने का आरोप लगाया, जब उनके राज्य में शिशु मर रहे थे।
चटर्जी ने राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी के खिलाफ़ रुख़ करते हुए कहा, “राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी कहाँ हैं? सरकारी की निर्दयता के कारण माताओं ने अपने शिशुओं को खो दिया।”
ख़बर के अनुसार, राहुल गाँधी पर तीखा प्रहार करते हुए, पश्चिम बंगाल के भाजपा सांसद ने ट्वीट किया,
“राहुल गाँधी निश्चित तौर पर इटली में नए साल की तैयारियों में व्यस्त होंगे। अगर उन्हें अन्य राज्यों का दौरा करने का समय मिलता है, तो वो राजस्थान क्यों न जाते और वहाँ की गंभीर स्थिति पर ध्यान नहीं देते?”
ग़ौरतलब है कि कोटा में एक महीने के भीतर 77 बच्चों की मौत हो गई, जिनमें से एक सप्ताह के भीतर 12 शिशुओं की मौत हुई। पिछले एक साल में 940 से अधिक बच्चों की मौत हुई है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने मुख्यमंत्री गहलोत से “संवेदनशील” मुद्दे से निपटने का आग्रह किया है।
फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग के अन्य सदस्य कांता कर्दम (उत्तर प्रदेश), जसकौर मीणा (राजस्थान) और भारती पवार (महाराष्ट्र) हैं, जिन्होंने गहलोत सरकार पर आरोप लगाया है। इस पैनल की स्थापना सोमवार (30 दिसंबर) को भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जे पी नड्डा ने की थी, जिसे तीन दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट पेश करनी है।
सोशल मीडिया पर अक्सर लोग अपने अनुभव शेयर करते रहते हैं। इसी क्रम में तन्वी नामक एक यूजर ने अपना अनुभव शेयर किया, जो चर्चा का विषय बना। तन्वी ने बताया कि जब वो स्कूल में थीं और उनकी उम्र महज 14 वर्ष थी, तब वो एक मुस्लिम लड़के के साथ रिलेशनशिप में थीं। उसका नाम आलम था और उसका सबसे अच्छा दोस्त भी एक हिन्दू लड़का ही था। आलम के बारे में तन्वी ने आगे बताया कि वो दिखने में अच्छा था और वो कभी-कभी उनके घर भी आया करता था। दरअसल, तन्वी ये देखना चाहती थीं कि उनके माता-पिता के आलम को लेकर क्या विचार हैं?
तन्वी भी कभी-कभी आलम के यहाँ जाया करती थीं। आलम उनके साथ काफ़ी अच्छा व्यवहार किया करता था और उसके अब्बू-अम्मी भी तन्वी के साथ काफ़ी मीठा व्यवहार करते थे। आलम ने तो अपने घर में सबको ये भी बता रखा था कि तन्वी उसकी गर्लफ्रेंड है। तन्वी मानो आसमान में उड़ रही थी। जिसके साथ वो रिलेशनशिप में थी, वो और उसका परिवार उसके साथ न सिर्फ़ सलीके से पेश आ रहा था बल्कि इतना अपनापन भी दिखा रहा था। उस उम्र में तन्वी के लिए ये बहुत बड़ी बात थी।
गड़बड़ियाँ तब शुरू हुईं, जब एक दिन तन्वी आलम के घर गईं। अचानक से आलम की 2 बहनें और 3 भाई बिना कुछ बताए घर से बाहर निकल गए। तन्वी और आलम को वहाँ अकेले छोड़ दिया गया। तन्वी बताती हैं कि उनके मन में काफ़ी सारी बातें चलने लगीं और उन्होंने अपनी ‘छठी इन्द्रिय’ का इस्तेमाल कर के सोचना शुरू कर दिया कि पाँचों उन दोनों को अकेले छोड़ कर घर से क्यों निकल गए? इसी बीच आलम भी तन्वी के काफ़ी नजदीक आना चाह रहा था लेकिन सोच में पड़ी तन्वी को लगा कि दाल में कुछ काला है और वो वहाँ से निकलने के उपाय ढूँढने लगीं।
I stayed away from Alam knowing something was wrong here. He tried to get close to me but I just couldn’t loosen up.i moved out in next 15 mins saying my mom is calling me. He called me next day saying sorry and I said for what. He was like I thought u didn’t like it
लगभग 15 मिनट के बाद तन्वी ने अपनी माँ का फोन आने का बहाना बनाया और वो वहाँ से निकल गईं। अगले दिन आलम ने फोन कर के तन्वी से माफ़ी माँगी। तन्वी ने उससे पूछा भी कि वो किस बात के लिए सॉरी बोल रहा है? इसके जवाब में आलम ने कहा कि उस दिन जो भी हुआ, उसे लगता है कि तन्वी को ये सब अच्छा नहीं लगा, इसीलिए वो माफ़ी माँग रहा है। ये सब होने के 3-4 दिन बाद आलम की अम्मी ने तन्वी को कॉल किया और फोन में मीठी-मीठी बातें की। आलम की अम्मी ने तन्वी से पूछा कि वो उनके घर क्यों नहीं आ रही हैं?
आलम की अम्मी ने तन्वी को बताया कि वो उसे काफ़ी मिस कर रही हैं और जब उन्होंने चिकेन बिरयानी बनाई थी, तब भी उन्हें तन्वी की काफ़ी याद आई थी। तन्वी का माथा ठनका और वो ये सोचने लगी कि आलम की अम्मी, जिनके घर में बच्चों की कमी नहीं है, उनके ख़ुद के 5 बेटे-बेटियाँ हैं, वो भला उसे क्यों इतना याद करेंगी? आलम की अम्मी ने तन्वी को घर आने को भी कहा था। काफ़ी सोच-विचार के बाद तन्वी ने फ़ैसला किया कि वो उनसे मिलने जाएँगी क्योंकि वो आलम की अम्मी को एक अच्छी महिला मानती थीं।
जब वो आलम के यहाँ पहुंचीं, तो उसकी अम्मी कुरान पढ़ रही थीं। उन्होंने तन्वी को बैठने का इशारा किया और कुरान पढ़ने लगीं। कुछ देर बाद आलम की अम्मी ने तन्वी से कहा कि वो कुरान का पहला पन्ना पढ़ कर सुनाने जा रही हैं। तन्वी ने उन्हें बताया कि उसकी माँ हनुमान चालीसा पढ़ती हैं लेकिन उन्हें इस चीजों में उतना इंटरेस्ट नहीं है। ये सुनते ही आलम की अम्मी ने तन्वी से कहा कि ये सब ‘काफिरों की चीजें’ हैं और उसे इन सब से दूर ही रहना चाहिए। यही वो पल था जब तन्वी को पूरी तरह आलम के परिवार की सच्चाई पता चली। माँ का फोन आने के बहाने तन्वी वहाँ से किसी तरह भाग खड़ी हुईं।
She read the first page of Quran and I said hey listen my mom reads hanuman chalisa but I don’t dwell into it. She looked at me and said this are infidel stuffs please avoid them
तन्वी ने दौड़ते हुए घर आकर अपने पिता को ये बातें बताई। उसे डर था कि उसके पिता उसे मारेंगे-पीटेंगे लेकिन उन्होंने उसे गले से लगा लिया और रोने लगे। ये सब सुन कर तन्वी की माँ भी चिंतित हो गईं। दोनों ने उसके स्कूल में कॉल कर के तन्वी की सुरक्षा का ध्यान रखने को कहा। तन्वी के एक भाई को हमेशा उसके साथ रहने को कहा गया। उसके भाई ने आलम के घर जाकर उसके परिवार वालों को समझाया भी लेकिन उन्होंने अनसुना कर दिया। तन्वी को आज भी जब ये घटना याद आती हैं तो वो सोचती हैं कि समय पर आँखें न खुलतीं तो आलम का परिवार उसे पूरी तरह बर्बाद कर चुका होता।
तन्वी कहती हैं कि वो अभी भी भगवान शिव को धन्यवाद देती हैं क्योंकि अगर वो आलम या उसके परिवार के जाल से नहीं निकलतीं तो आज उनके भी 3 बच्चे होते और वो फिर से एक और को जन्म देने की तैयारी कर रही होतीं। आलम का परिवार फ़िलहाल एक मुस्लिम बहुल इलाक़े में रहता है। आलम और उसके सभी भाइयों की शादी हो चुकी है। वो सभी अपनी बीवियों, बच्चों और अब्बू-अम्मी के साथ एक 2 कमरे वाले फ्लैट में रहते हैं। तन्वी के इस अनुभव को सोशल मीडिया पर ख़ूब शेयर किया गया।
शायद याद हो कि 2018 की 1 जनवरी को महाराष्ट्र के भीमा कोरेगाँव में क्या हुआ था। एक ऐतिहासिक युद्ध के 200 साल पूरे हुए थे, और हर बीते साल की तरह, इस साल भी एक खास जाति के लोग, अपने योद्धाओं की याद में एक छोटे आयोजन में भाग लेने के लिए जुटे। इनके दो सौ सालों के इतिहास में इस आयोजन में कभी भी किसी हिंसा का जिक्र नहीं है। लेकिन, जब वामपंथी नक्सली, माओवंशी कामरेड और घोर जातिवादी घृणा बाँटने वाले नव निर्वाचित विधायक जिग्नेश मवाणी का हाथ इसमें लगता है तो वहाँ पत्थरबाज़ी के कारण एक राहुल पतंगले की मौत हो जाती है।
उसके बाद जो हिंसा भड़कती है उसमें तीस पुलिस जवान समेत कई लोग घायल होते हैं और करीब 300 लोगों को हिरासत में लिया जाता है। उसके बाद प्रकाश अंबेडकर नामक एक व्यक्ति, जिसकी एकमात्र उपलब्धि भीम राव अंबेडकर का पोता होना है, वो इसमें कूद जाता है, और प्रदर्शनों का आह्वान करता है। पुलिस जाँच शुरू करती है और तब नए एंगल सामने आते हैं जो बताते हैं कि आखिर एक अहिंसक सम्मेलन, एक सुनियोजित हिंसक दुर्घटना का रूप कैसे ले लेती है।
अर्बन नक्सलियों के कुछ नेता पुलिस द्वारा पकड़े जाते हैं जिनका इस हिंसा को भड़काने से ले कर प्रधानमंत्री के हत्या की योजना बनाने तक में हाथ बताया जाता है। रोना विल्सन, वरावारा राव, अरुण फरेरा, सुधा भारद्वाज और गौतम नवलखा एक साथ पुलिस की छापेमारी के बाद धरे जाते हैं। उन पर केस चलता है, सुप्रीम कोर्ट उन्हें हाउस अरेस्ट में रखने की सलाह देती है।
अब ये समझिए कि दो साल पहले वहाँ ऐसा क्या हुआ था कि हर साल का शांत आयोजन हिंसक हो गया। हुआ यह कि जब शहरी नक्सलियों और दलितों के स्वघोषित नेताओं को पता चला कि दलित लोगों से संबंधित कुछ होने वाला है, तो उनके लिए यह वैसा ही मौका था जैसा कि खबरी गिद्ध राजदीप सरदेसाई संसद हमलों को मानते हैं: वैसा समय जब परिस्थितियाँ अनुकूल हों और आपकी बांछे खिला दें (जहाँ-जहाँ भी होती हैं)।
चूँकि, समुदाय विशेष को सत्तर साल पागल बनाने के बाद, नया मुस्लिम दलित है जिस पर एकमात्र नेत्री सुश्री मायावती जी का ही राज था, क्योंकि लालू टाइप के डकैत नेता सत्ता से बाहर हो चुके थे, तो दलित राजनीति को भड़काने के लिए जिग्नेश मवाणी टाइप के टुटपुँजिए लौंडों को एक दरार दिखी जहाँ वो पैर फँसा सकता था। विधायक बन कर तो वो हीरो बना, लेकिन नया-नया जोश उसे राष्ट्रीय परिदृश्य में स्थापित कर सकता था।
माओवंशी आंदोलन लाशें चाहता है
मवाणी को उन्हीं लोगों का साथ मिला जो सालों से इस देश के टुकड़े-टुकड़े करने से ले कर इनकी राह में आने वाले सारे लोगों को हटाने की योजना बना रहे थे। नरेन्द्र मोदी की हत्या इनकी योजना में शामिल थी। साथ ही, वामपंथी लम्पटों का जो टैम्पलेट है, आंदोलनों को सफल मानने का, उसके लिए हिंसा और कुछ लाशों की जरूरत पड़ती है।
तो इस दिन को अंग्रेजों और पेशवाओं की लड़ाई की जगह दलितों और ब्राह्मणों की लड़ाई के नाम पर प्रचारित किया गया, जो कि सर्वथा गलत है (जिस पर आगे चर्चा होगी)। और ब्राह्मणों के घुस जाने के बाद, आज के नैरेटिव में वहाँ ‘हिन्दुत्व’ घुसाया गया। हिन्दुत्व के आने से वैचारिक रूप से इन्हें उन आतंकियों का भी समर्थन मिल गया जो हिन्दुओं को हर दूसरे वाक्य में कोसते रहते हैं।
आंदोलन की रूपरेखा तो तैयार हो गई, स्टेज सज गया, वक्ता आ गए, लेकिन इससे आंदोलन सफल नहीं कहा जाता। वामपंथियों या भीम-मीम के आंदोलनों के नाम पर मासूम गरीबों को सड़क पर आगजनी करने को उकसाने वाले हमेशा कुछ लाशों की तलाश में रहते हैं। वो न सिर्फ हिंसा भड़काना चाहते हैं, बल्कि अपने ही लोगों से पेट्रोल बम फिंकवाते हैं, और भीड़ को कहते हैं कि देखो ब्राह्मणों ने बम फेंका तुम पर, तुम्हें 5000 सालों से सता रहे हैं, देखते क्या हो, यलगार हो!
भीड़ में आया गरीब, जो कि पिछले साल तक महार जाति के योद्धाओं के स्मारक पर पुष्प अर्पित करता था, आज यह पूछ भी नहीं पाया कि पत्थर फेंकने वाले, या आग का गोला फेंकने वाले ब्राह्मण ही हैं, यह कैसे पता चला? क्या उनकी तरफ की भीड़ में उन्हीं दलितों का प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों में ब्राह्मण नहीं हैं? भारद्वाज कौन होते हैं? फिर भीड़ में पत्थर का जवाब पत्थर से देने को तैयार दलित गरीब पैदल सिपाही यह क्यों नहीं सोचता कि सामने भी तो कथित ब्राह्मणों के समर्थन में दलित भी खड़े हो सकते हैं?
लेकिन दंगाई सोच के शहरी नक्सिलयों और आतंकियों के पुरातन हिमायतियों ने उन्हें बताया कि यही तो उनके वंशज हैं जिन्हें तुम्हारे पूर्वजों ने धूल चटाई थी, वो अपना बदला लेने आ रहे हैं, टूट पड़ो। दलित टूट पड़ता है, कोई राहुल मारा जाता है, 16 साल का योगेश प्रह्लाद जाधव की हत्या होती है भीड़ में, 19 साल की दलित गवाह पूजा किसी कुएँ में मृत पाई जाती है। सैकड़ों घायल होते हैं उस एक हिंसक प्रदर्शन और उसके बाद के दंगों में।
उकसाने वालों में मिलिंद एकबोते और संभा जी भिड़े का नाम बताया जाता रहा जो कि माओ की नाजायज वामपंथी औलादों की हिंसक योजना का विरोध कर रहे थे। कहा गया कि इन्होंने ही हिंसा भड़काई जबकि जाँचों में पता चला कि वामपंथी गुंडे ठीक-ठाक समय से इस हिंसा की योजना बना रहे थे। वैसे भी, जहाँ माओवंशी कामपंथी आतंकी किसी योजना का हिस्सा हों, और उनकी योजना में दो-चार लाशें न गिरें, ऐसा संभव ही नहीं। पुणे पुलिस ने लगातार छापेमारी करके ऐसे उत्पाती योजनाकारों को पकड़ा जिन पर मामला चल रहा है।
दलितों के आंदोलन के नाम पर ऐसे ही, एक अफवाह के नाम पर, अप्रैल 2018 में नौ लोगों की जानें गईं जब दलित लोगों से यह कह दिया गया सरकार आरक्षण खत्म करने की योजना बना रही है। इन दंगों से जो नुकसान हुआ, वो किसका हुआ? न तो मवाणी का, न भीम आर्मी वाले रावण का, न उन नेताओं का जिन्होंने पैसे दे कर गरीब लोगों के हाथों में पेट्रोल से भींगी मशालें दीं, और कहा कि आग लगा दो। कानूनी केस किन पर चल रहे हैं? लेकिन पैदल सिपाहियों की कमी नहीं दिखती।
इनके हर आंदोलन में आम नागरिक की लाश की जरूरत होती है, और अगर वो स्वतः पूरी न हो रही हो, तो हाल के फर्जी प्रदर्शनों की तरह, आपस में ही देसी कट्टे से गोली मार कर पूरी कर दी जाती है। ये पैटर्न है। लोगों का मरना हर वामपंथी, या भीम-मीम आंदोलन की एक जरूरत है, जहाँ वो जरूरत ये लोग आपस में भी पूरी कर लेते हैं। इनके नेता स्टेज से भाषण दे कर भावनाएँ भड़काते हैं, इन्हें फर्जी बात सिखाई जाती है कि पाँच हजार सालों से तुम्हें सताया जा रहा है। कोई मुझे एक दस्तावेज ला कर दिखा दे जहाँ ऐसा लिखा हो कि ‘जाति’ जैसी कोई चीज थी भारत में मुगलों और अंग्रेजों के आने से पहले, या यह कि उनके साथ दुर्व्यवहार होता था।
इससे इनकार नहीं कि बाहरी आक्रमणकारियों और मुग़ल आतंकियों के यहाँ बस जाने के बाद जातिगत भेदभाव हमारे समाज में आया और हम उसकी आग से आज भी झुलस रहे हैं। जिस मनु स्मृति का जिक्र ये चम्पक हमेशा करते हुए, लोगों को मनुवादी कहते हैं, उन्हें पता भी है कि उसके 100,000 श्लोकों वाली इस स्मृति के संक्षिप्त रूपों में अब न सिर्फ 4,000 श्लोक ही बचे हैं, बल्कि उस पुस्तक की प्रतियाँ बहुत खोजने पर ही किसी घर में मिले। किसी ‘वाद’ को पकड़ने के लिए कम से कम उस आदमी को जानना तो पड़ेगा, उसकी बातें तो जाननी होंगी? दुर्भाग्य यह है कि दूसरों को मनुवादी कहने वालों से दो श्लोक पूछ दीजिए दाँत निपोड़ देगा, और जिसको कहते हैं, उससे भी पूछिए तो वो भी यही कहेगा कि इन भीम-मीम की नौटंकियों से पहले उन्होंने मनु स्मृति का नाम भी नहीं सुना था।
लेकिन उसी मनुवाद के नाम पर इन्हें भड़का कर दंगा कराया जाता रहा है, आगे भी कराया जाता रहेगा। मरेंगे भी वही लोग, मारेंगे भी आपस में ही, नेता तो विधायक बन जाएगा, उसके बाद चुप बैठा रहेगा।
भीमा-कोरेगाँव में हुआ क्या था?
1818 की पहली जनवरी को ईस्ट इंडिया कम्पनी और पेशवा बाजीराव द्वितीय के बीच एक युद्ध हुआ। इस युद्ध में अंग्रेजों की तरफ से पेशवा की सेना से लड़ने वाली टुकड़ी में कथित तौर पर दलित योद्धा थे, जिसे महार रेजिमेंट कहा जाता है। ये पूर्णतः सहमत होने वाली बात है, और इसका जिक्र भी है कि इस टुकड़ी में वाकई कथित निचली जातियों के सैनिक थे। इसी कारण इस युद्ध को ‘दलितों ने जब उच्च जाति के शोषक, उत्पीड़क ब्राह्मण पेशवा को हराया’ के रूप में आज कल प्रचारित किया जाता है।
लेकिन सच्चाई इससे बहुत दूर है। ये कोरी गप्पबाजी और बकवास है, चाहे तार्किक रूप से देखें, या तथ्यों को सामने रखा जाए। इनका मानना है कि पेशवा ब्राह्मण थे, तो उसकी अंग्रेजों के हाथों हुई हार को इसलिए दलितों की जीत कहा जाए क्योंकि लड़ने वाले दलित सिपाही थे। अब इसमें समस्या जो है, वो यह है कि दलित सैनिक यहाँ किसी स्वतंत्र टुकड़ी के सिपाही नहीं थे, बल्कि वो ईस्ट इंडिया कम्पनी की एक टुकड़ी के सिपाही थे, जिसमें उनके अलावा और भी धर्म-मजहब-जाति के सैनिक थे।
ऐसा किसी दस्तावेज में नहीं लिखा है कि ईस्ट इंडिया कम्पनी के बॉम्बे नेटिव इन्फैंट्री, जो पेशवा से लड़ी, उसमें पूरा तो छोड़िए अधिकतर भी दलित थे। कुछ रहे होंगे, संभव है लेकिन आज भी रेजिमेंट के नाम होने का मतलब यह नहीं होता कि सिख रेजिमेंट में सिख ही होते हैं। 1932 में अंबेडकर ने स्वयं यह माँग रखी थी कि महार समुदाय के ज्यादा सैनिकों को सेना में जाने का मौका मिलना चाहिए।
आप जब युद्ध में जाते हैं तो आप पाकिस्तान को हराना चाहते हैं, आप किसी भी धर्म के भारतीय सैनिक हों, निशाने पर पाकिस्तान का झंडा होता है न कि मजहब। उसी तरह, यह मानना मूर्खता है कि ब्रिटिश की तरफ से लड़ने वाले दलित ये सोच कर लड़ रहे होंगे कि आज तो पेशवा के ब्राह्मणवाद को ऐसी धूल चटाएँगे कि 2019 में इसकी वैचारिक सहमति वाले मनुवादियों की सरकार ही न आ पाए। ऐसा नहीं होता।
एक पल को चलिए मान लेते हैं कि वो खुन्नस में थे कि पेशवा ब्राह्मण है, तो उसे हराना एक निजी संतुष्टि देगी और उसके सैनिकों को मारना दलित अस्मिता के नए कीर्तिमान रचेगा। लेकिन जितना सच यह है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के झंडे के लिए दलित लड़ रहे थे, उतना ही बड़ा सच यह है कि पेशवा की सेना में अरबी (मुस्लिम) थे। इसकी चर्चा कई जगहों पर, अंग्रेजों द्वारा लिखे गए इतिहास में ही है। तो कायदे से तो ये लड़ाई या तो अंग्रेजों ने मराठा पेशवा के साथ लड़ कर जीती, या फिर दलित सैनिकों ने मुस्लिम सैनिकों का गला रेत कर ये जीत हासिल की।
पीटर ऑबेर की पुस्तक ‘Rise and Progress of the British Power in India’ से
इसे आधे तर्क के साथ देखना बस यही बताता है कि आप कह देंगे कि मैकग्राथ खराब क्रिकेटर है क्योंकि उसकी बैटिंग एवरेज तो ऋषभ पंत से भी खराब है। फिर आपको पंत की बॉलिंग एवरेज और औसत भी तो देखना होगा। वो आप नहीं करेंगे क्योंकि इधर दलित सैनिक है, उधर ब्राह्मण पेशवा का झंडा! या तो झंडा बनाम झंडा तौलिए, या फिर सैनिक बनाम सैनिक। अगर यह कम है तो रामचंद्र क्षीरसागर की पुस्तक ‘दलित मूवमेंट इन इंडिया एंड इट्स लीडर्स, 1857-1956’ में यह भी लिखा है कि महार जाति के सैनिक मराठा के लिए भी लड़ा करते थे।
रामचंद्र क्षीरसागर की पुस्तक ‘दलित मूवमेंट इन इंडिया एंड इट्स लीडर्स, 1857-1956’ से
इसलिए, वामपंथियों के नैरेटिव से बचिए क्योंकि वो कब किसको कट्टे से मार कर आपकी जाति का हीरो बना कर खुद सत्ता में पहुँच जाएँ, या वैटिकन से फंडिंग पा जाएँ, आपको पता भी नहीं लगेगा। जहरीली वामपंथन लहसुनधति रॉय के गैरकानूनी बंग्ले के बारे में आपको पता है कि वो उन्हीं जंगलों की जमीन का अतिक्रमण कर के बनी है जिसकी बातें वो पूरी दुनिया में करती रहती है। ये है सच इन माओ की नाजायज औलादों का जिन्हें अपनी राजनैतिक बेहतरी के लिए आम दलितों की टूटी रीढ़ या सर मे लगी गोली का सहारा चाहिए, और वो काम भी कट्टा ले कर ये लोग स्वयं करते हैं।
ख़ुद को असम के किसानों के नेता बताने वाले अखिल गोगोई को एनआईए की विशेष अदालत ने गुवाहाटी में 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। इससे पहले दिसंबर 17 को उसे 10 दिनों के लिए पुलिस कस्टडी में भेजा गया था। सीएए के विरोध की आड़ में हिंसा करने वाले गोगोई को यूएपीए (ग़ैर-क़ानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम) के तहत गिरफ़्तार किया गया है। उसके ख़िलाफ़ आईपीसी व यूएपीए की जिन धाराओं में मुक़दमा दर्ज किया गया है, उसपर एक नज़र आप भी डाल लीजिए:
धारा 120 बी (आपराधिक षड्यंत्र रचना)
धारा 124 ए (देशद्रोह का अपराध)
धारा 153 ए (धर्म, नस्ल, भाषा इत्यादि के आधार पर लोगों में नफ़रत फैलाना)
धारा 153 बी (राष्ट्रीय अखंडता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला कार्य करना)
यूएपीए धारा 18 (आतंकी या उसके सदृश घटना की साज़िश रचना), और
यूएपीए धारा 39 (आतंकी गतिविधियों के लिए बैठक करना, समर्थन जुटाना)
इन धाराओं को देखने के बाद आप समझ गए होंगे कि मामला कितना गंभीर है और अखिल गोगोई पर देशद्रोह व आतंकी साज़िश के आरोप लगे हैं। उसे दिसंबर 12 को असम पुलिस ने गिरफ़्तार कर के एनआईए को सौंप दिया था। उसके संगठन का नाम है- किसान मुक्ति संग्राम समिति (KMSS), जो ख़ुद को किसानों के लिए लड़ने वाला संगठन बताता है। एनआईए ने उसके घर पर छापा मारा, जहाँ से कई आपत्तिजनक डाक्यूमेंट्स व पुस्तकें बरामद हुईं। उसके पर्सनल लैपटॉप को भी जाँच एजेंसी ने अपने कब्जे में ले लिया है। उसे लेकर अभी और खुलासे हो सकते हैं।
अब आते हैं उसे मिल रहे अर्बन नक्सलियों के समर्थन पर। अगर पूर्व के इतिहास को देखें तो पता चलता है कि ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ की नेता और ख़ुद को सामाजिक कार्यकर्ता बताने वाली मेधा पाटेकर के साथ गोगोई के क़रीबी सम्बन्ध हैं। मेधा पाटेकर भी आजकल सीएए विरोधी उपद्रव में लगी हुई हैं। उन्होंने जामिया के छात्रों के साथ भी विरोध प्रदर्शन किया। कुछ दिनों पहले उन्हें पाकिस्तानी हिन्दू शरणार्थियों ने खदेड़ दिया था। मेधा पाटेकर की बात करने से पहले ये जानना ज़रूरी है कि आख़िर ये केएमएसएस है क्या और ये अखिल गोगोई है कौन?
Anna Hazare’s new team: Kiran Bedi, Medha Patkar, Santosh Hegde, Akhil Gogoi,
42 वर्षीय अखिल गोगोई ने 2005 में केएमएसएस की स्थापना की थी। वह पहले आरटीआई एक्टिविस्ट के रूप में काम करता रहा है। उसे पब्लिक कॉज रिसर्च फाउंडेशन (PCRP) ने नेशनल आरटीआई अवॉर्ड ने नवाजा था। पीसीआरपी किसका संगठन था? इसकी स्थापना 2006 में अरविन्द केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और अभिनन्दन शेखरी ने मिल कर की थी। केजरीवाल आज दिल्ली के मुख्यमंत्री हैं और सिसोदिया उनके डिप्टी। वहीं अभिनन्दन शेखरी न्यूज़लॉन्ड्री नामक प्रोपेगंडा पोर्टल के संपादक हैं। पीसीआरएफ भी एक संदिग्ध संस्था थी, जिसपर इनकम टैक्स के कई मामले चल रहे थे। प्रशांत भूषण भी इसके ट्रस्टी थे।
जनवरी 2011 में अखिल गोगोई ने आरोप लगाया था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने लंदन में संपत्ति ख़रीदी है। उसने कुछ फोटो भी शेयर किए थे। लेकिन, वो सारे फोटो कैम्ब्रिज के एमआईटी के निकले, जहाँ गोगोई के बेटे पढ़ाई के लिए गए हुए थे। आज भाजपा का विरोध कर रहा अखिल कभी कॉन्ग्रेस को वोट न देने की अपील करता था। असम और अरुणाचल प्रदेश में बाँध प्रोजेक्ट्स को बंद कराने के लिए अखिल गोगोई ने लोगों को जम कर भड़काया था। उसके कारण नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पॉवर कारपोरेशन (NHPC) के कई डैम प्रोजेक्ट्स में रुकावट आई थी।
असली खेल जुलाई 2010 में तब शुरू हुआ, जब मेधा पाटेकर गुवाहाटी पहुँचीं और उन्होंने अखिल गोगोई के साथ मिल कर पूरे शहर को एक तरह से दिन भर बंधक बनाए रखा। बाँध प्रोजेक्ट्स के विरोध के नाम पर पाटेकर और गोगोई ने हज़ारों लोगों के साथ डीसी के दफ्तर तक मार्च किया और हज़ारों लोगों के साथ विरोध प्रदर्शन किया था। ये विरोध प्रदर्शन भी केएमएसएस के बैनर तले ही किया गया था। उपद्रवियों ने डीसी दफ्तर की और चप्पल भी फेंके थे। उस रैली में मेधा पाटेकर ने चेतावनी दी थी कि उनकी माँगें नहीं माने जाने पर पूरे राज्य में बड़े पैमाने पर विद्रोह होगा।
फ़रवरी 2012 में भी मेधा पाटेकर ने असम पहुँच कर अखिल गोगोई का समर्थन किया था। समय-समय पर अखिल और केएमएसएस के आन्दोलनों को राष्ट्रीय पहचान देने के लिए मेधा पाटेकर की उपस्थिति का सहारा लिया जाता रहा है। यहाँ आप उन तस्वीरों को देख सकते हैं, जिसमें मेधा पाटेकर और अखिल गोगोई साथ में रैलियों को सम्बोधित करते दिख रहे हैं। इस संगठन व अखिल के बारे में वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता और 15 सालों तक असम के मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई ने कहा था:
“किसान मुक्ति संग्राम समिति के आंदोलन के पीछे माओवादियों का हाथ है। राज्य के भूमिहीनों को बरगला कर माओवादी अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। ओडिशा में माओवादियों के केएमएसएस के कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग दी है। ऐसे दो कार्यकर्ताओं को हमनें गिरफ़्तार किया है। मेरे पास इस बात के सबूत हैं कि अखिल गोगोई का माओवादियों से डायरेक्ट लिंक है। केएमएसएस ऐसे 2संगठनों के साथ मिल कर भी काम कर रहा है, जो असम को भारत से अलग करने की माँग करते हैं और प्रतिबंधित हैं। हिंसा पर उतारू केएमएसएस से कोई बातचीत नहीं होगी।”
गोगोई ने ये बयान जून 2011 में दिया था। तब केएमएसएस ने राज्य भर में हिंसा की थी। इसके बाद अखिल गोगोई को गिरफ़्तार कर के जुडिशल कस्टडी में भेज दिया गया था। अखिल गोगोई अनशन पर भी बैठा था और तब अन्ना हज़ारे के संरक्षण में चलने वाले ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ ने उसके आंदोलन को पूर्ण समर्थन दिया था। जहाँ तक मेधा पाटेकर की बात है, वो जनवरी 2013 में भी गुवाहाटी पहुँची थीं, जहाँ उन्होंने न सिर्फ़ विरोध प्रदर्शन किया था बल्कि अखिल के समर्थन में रैली भी की थी। उन्होंने लोगों को भड़काते हुए कहा था कि अरुणाचल प्रदेश में बनने वाले 168 बाँधों से ग़रीबों को कुछ नहीं मिलेगा, ये सब अमीरों के लिए है। उन्होंने तत्कालीन सीएम तरुण गोगोई पर हज़ारों करोड़ के भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे।
अब सवाल ये उठता है कि क्या केएमएसएस एक माओवादी संगठन है? एक बार विरोध प्रदर्शन के दौरान एक गर्भवती महिला के एम्बुलेंस को घेर लिया गया और ड्राइवर की पिटाई की गई। ये करतूत केएमएसएस के कार्यकर्ताओं की ही थी। गर्भवती महिला पर भद्दे कमेंट्स किए गए और एम्बुलेंस के शीशे को तोड़ डाला गया। ऐसा तब हुआ था, जब फ़रवरी 2012 में संगठन ने गोगामुख-ठेकेरागुरी मार्ग को अपने कब्जे में ले रखा था। पुलिस को रोकने के लिए जगह-जगह पेड़ काट कर गिरा दिए गए, टायर में आग लगा दिया गया और ट्रकों को रोड पर खड़ा कर दिया गया था।
यहाँ तक कि पुलिस पर जम कर पत्थरबाजी भी की गई थी। तरुण गगोई यूँ ही नहीं बार-बार कहते रहे हैं कि अखिल गोगोई एक माओवादी है। जनवरी 2011 में एक केएमएसएस कार्यकर्ता ने कोर्ट में स्वीकार किया था कि उसे ट्रेनिंग के लिए ओडिशा के माओवादियों के पास भेजा गया था। ‘इंडिया टुडे’ से बातचीत के दौरान भी उसने इस बात को कबूल किया था। इसके अलावा मई 2011 की एक रैली में माओवादी शरत साइका की उपस्थिति भी चर्चा का विषय बनी थी। उस रैली को अन्ना हज़ारे और स्वामी अग्निवेश ने भी सम्बोधित किया था। साइका ओडिशा में हथियारों का प्रशिक्षण ले चुका था।
अखिल गोगोई के ख़िलाफ़ ऑन ड्यूटी पुलिस अधिकारी पर हमला करने को लेकर एफआईआर भी दर्ज किया गया था लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान उसपर कोई कार्रवाई नहीं की गई। उसके संगठन का एक व्यक्ति इसी आरोप में गिरफ़्तार हुआ था लेकिन अगले ही दिन उसे विवादस्पद परिस्थितियों में रिहा कर दिया गया। एक पुलिस अधिकारी ने स्वीकार किया था कि सरकार अखिल को छूना भी नहीं चाहती है क्योंकि वो राज्य में ‘वन मैन अपोजिशन’ के रूप में काम कर रहा था और सरकार को डर था कि उस पर कार्रवाई करने से ‘बदले की भावना’ का आरोप लगेगा।
दिसंबर 2016 को मेधा पाटेकर ने अखिल के समर्थन में इस पोस्ट को शेयर किया था
ऐसा भी प्रतीत होता है कि पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई केएमएसएस और अखिल पर कार्रवाई करना चाहते थे लेकिन मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और अर्बन-नक्सल के नेक्सस के कारण ऐसी जहमत नहीं उठाई। फरवरी 2014 में दिए एक बयान में उन्होंने ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स का डर जताया था। उन्होंने कहा था कि कार्रवाई के लिए सबूत जुटाना होता है। यह सवाल भी उठता है कि के कॉन्ग्रेस आलाकमान अर्बन-नक्सलियों पर कार्रवाई नहीं चाहती थी? गोगोई लगातार माँग करते रहे कि असम के जिलों को माओवादी प्रभाव वला घोषित किया जाए लेकिन उनकी अपनी ही सरकार ने ऐसा क्यों नहीं किया?
तरुण गोगोई ने 2014 में केंद्र से माँग की थी कि असम के 9 जिलों को नक्सल प्रभावित घोषित किया जाए। वो कहते रहे, किसी ने ध्यान नहीं दिया। उन्होंने बताया था कि इसके 5 वर्ष पूर्व जब उन्होंने असम में माओवादी धमक की बात की थी, तब किसी ने उन पर विश्वास नहीं किया था। मुख्यमंत्री बार-बार आरोप लगाते रहे कि केएमएसएस और माओवादी मिल कर भारतीय लोकतंत्र की जड़ों को खोदना चाहते हैं लेकिन कार्रवाई नहीं की गई। क्यों? अब देखना है कि एनआईए की ताज़ा कार्रवाई के बाद क्या निकला कर आता है।
वर्ष 2019 कई कारणों से सुर्ख़ियों में रहा और कई लोग अच्छे व बुरे कारणों से सुर्ख़ियों में रहे। जहाँ अच्छे कारणों से चर्चा बटोरने वाले लोगों की चर्चा हो ही रही है, हमें उन लोगों को भी याद करने की आवश्यकता है, जो बुरे कारणों से मीडिया में बने रहे। नकारात्मकता फैलाने वाले लोगों और उनकी करतूतों को याद किए बिना हम सबक नहीं ले सकते। ऑपइंडिया ने उन 10 लोगों की सूची जारी की है, जो वर्ष 2019 में ग़लतबयानी और अन्य ग़लत वजहों से सुर्ख़ियों में रहे। हो सकता है कि इनमें से कई की करतूतों को आप भूल गए हों, लेकिन हम उन्हें फिर से याद दिला रहे हैं।
10. नवजोत सिंह सिद्धू: बोलते-बोलते बोलती हो गई बंद
नवजोत सिंह सिद्धू। अर्थात, कॉन्ग्रेस के सिद्धू। वो पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के भी फेवरिट हैं, जिन्होंने करतारपुर कोरिडोर के उद्घाटन के दौरान उन्हें ‘हमारा सिद्धू’ कह कर सम्बोधित किया था। सिद्धू पाकिस्तान को इतना चाहने लगे कि उन्होंने कह दिया कि परमिशन न मिलने पर वो वाघा बॉर्डर से ही पाक निकल जाएँगे। उनकी पत्नी को कॉन्ग्रेस ने किनारे कर दिया, जिसके बाद उन्होंने कॉन्ग्रेस से इस्तीफा दे दिया। पंजाब के सीएम अमरिंदर सिंह से उनकी लगातार लड़ाई होती रही। कैप्टेन से कलह के कारण सिद्धू ने मंत्री पद से भी इस्तीफा दे दिया। ‘द कपिल शर्मा शो’ से भी उन्हें हटना पड़ा।
वैष्णो देवी में एकांतवास में लीन होने चले गए थे नवजोत सिद्धू
ख़बर आई कि सिद्धू के स्पाइनल कॉर्ड में समस्या आ गई है, जिसके बाद डॉक्टर ने उन्हें कम बोलने की सलाह दी हैं। उसके बाद ख़बर आई कि वो वैष्णो देवी मंदिर में एकांतवास काट रहे हैं। राहुल गाँधी को तोप और ख़ुद को एके-47 बताने वाले सिद्धू ने अमेठी से राहुल के हारने पर राजनीति छोड़ने की बात कही थी। अमेठी से राहुल की बुरी हार हुई। कॉन्ग्रेस में साइडलाइन किए गए सिद्धू हमारी सूची में इस साल नकारात्मकता फैलाने वाले लोगों में शामिल हैं।
9. स्वरा भास्कर, शेहला रशीद: Twitter के वामपंथियों की पूज्य देवियाँ
स्वरा भास्कर की 2018 में एक ही फ़िल्म आई ‘वीरे दी वेडिंग’ और उसमें भी उन्हें बड़ा रोल नहीं मिला। स्वरा की कई साड़ियाँ बेकार हो गईं, कई ब्लाउज बेकार हो गए, जो उन्होंने आम चुनाव के दौरान मोदीविरोधियों के कैम्पेनिंग के लिए खरीदी थीं। वो जहाँ-जहाँ गईं, उनके समर्थन वाले उम्मीदवारों की हार हुई। जामिया हिंसा के दौरान उन्होंने दिल्ली पुलिस की आलोचना की। सीएए क़ानून बनने के बाद उन्होंने भारत को ‘हिन्दू पाकिस्तान’ बताया। एक 4 साल के बच्चे को ‘चु*#या’ कहने वाली स्वरा मोदी की जीत के लिए हिन्दुओं को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि भारत का भविष्य हिंसा और नफरत है।
स्वरा और शेहला जैसी वामपंथनियों के लिए ये साल मायूसी भरा रहा लेकिन उन्होंने नकारात्मकता फैलानी नहीं छोड़ी
वहीं शेहला रशीद जम्मू कश्मीर में शाह फैसल के साथ जुड़ कर राजनीति की शुरुआत करना चाहती थीं लेकिन फैसल भारत से भागते हुए पकड़े गए और जम्मू कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश बन गया। शेहला की उम्मीदें धूमिल हो गईं। लोकतंत्र की दुहाई देकर राजनीति छोड़ने वाली शेहला ने पीएम मोदी को चुनौती दी थी कि अनुच्छेद 370 हटा कर दिखाएँ और राम मंदिर बना कर दिखाएँ। उनकी दोनों चुनौतियाँ कबूल हो गईं। केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्री के साथ धक्का-मुक्की करने वाले जाधवपुर यूनिवर्सिटी के छात्रों का भी शेहला ने समर्थन किया। सेना पर झूठे आरोप लगाने के लिए उन पर देशद्रोह का भी मुक़दमा दर्ज हुआ।
8. गीतकार से ट्रोल बने जावेद अख्तर: बीवी और बेटे भी उसी राह पर
अख्तर परिवार बॉलीवुड में एकसूत्री कार्यक्रम पर निकल आया है- झूठी ख़बरें फैलाना और लोगों से लड़ाई-झगडे करना। जावेद अख्तर ने जामिया हिंसा मामले में ट्विटर पर क़ानूनी ज्ञान बघारा तो एक पुलिस अधिकारी ने उन्हें खरी-खरी सुनाई। उन्होंने साध्वी प्रज्ञा की तुलना रावण से कर दी। बुर्के की तुलना घूँघट कर के उन्होंने इस्लामिक कुरीति का बचाव किया। उनकी दूसरी बीवी शबाना आजमी भी पीछे नहीं रहीं। उन्होंने भगवान गणेश की मूर्ति बनाने वालों की ‘ग़रीबी’ का जिक्र किया। गिरिराज सिंह को हराने के लिए उन्होंने बेगूसराय में कन्हैया कुमार के लिए चुनाव प्रचार किया।
अख़्तर परिवार ने फेक न्यूज़ फैलाने से लेकर सोशल मीडिया में लोगों से लड़ने तक, सब कुछ किया
जावेद के बेटे फरहान अख़्तर ने सीएए को लेकर भारत का ग़लत नक्शा शेयर किया और दावा किया कि महिलाओं व आदिवासियों को देश से बाहर निकाल दिया जाएगा। करणी सेना को आतंकी बताने वाले फरहान ने बीएचयू के छात्रों को कलंक बता दिया। साध्वी प्रज्ञा को हराने के लिए फरहान ने चुनाव के बाद अपील करते हुए लिखा कि उन्हें वोट न दें। उनका ख़ूब मजाक बना। कुल मिला कर ये तिकड़ी किसी भी सकारात्मक चीज के लिए इस साल ख़बर में नहीं रही।
7. ममता बनर्जी: मोदी विरोध में ‘दीदी’ की दादागिरी
पश्चिम बंगाल में सीबीआई और पुलिस के बीच झड़प हुई। अपने क़रीबी पुलिस कमिश्नर को बचाने के लिए ममता ने सरकारी एजेंसी के कामकाज में व्यवधान डाला और धरना भी दिया। सीबीआई अधिकारियों को ही गिरफ़्तार कर लिया गया। लोकसभा चुनाव से पहले कोलकाता में एक बड़ी रैली कर ममता ने विपक्षी एकता का शक्ति-प्रदर्शन किया लेकिन बंगाल में भाजपा ने दस्तक दी और उनकी सीटें घट गईं। राज्यपाल जगदीप धनखड़ के साथ उनका अभी भी झगड़ा चल रहा है। सीएए लागू होने के बाद मुस्लिमों की भीड़ ने क़ानून-व्यवस्था चौपट कर हिन्दुओं के घरों को जला डाला पर ‘दीदी’ ने एक्शन नहीं लिया।
ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में असली ‘तानाशाही’ का नमूना दिखाया
पश्चिम बंगाल में भूख हड़ताल पर बैठे शिक्षकों पर रात में ही लाठियाँ बरसाई गईं। केंद्र सरकार ने तीन तलाक़ को खत्म करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया लेकिन ममता बनर्जी की सरकार ने इसे इस्लाम पर हमला बताया। उनके भतीजे अभिषेक भी फ़र्ज़ी डिग्री विवाद के कारण सुर्ख़ियों में रहे। राज्य में डॉक्टरों की हड़ताल हुई और ममता पर तानाशाही का आरोप लगा। उनकी फोटोशॉप तस्वीर शेयर करने पर एक महिला को जेल तक हो गई। ममता ने पीएम मोदी को थप्पड़ मारने की बात कही। सुरक्षा बलों तक को भी उन्होंने धमकी दी। कुल मिला कर वह एक बार भी अच्छे कारणों से चर्चा में नहीं रहीं।
6. एचडी कुमारस्वामी: रोते-रोते गँवा दी सरकार, एक्सपेरिमेंट फेल
भाजपा को सत्ता में आने से रोकने के लिए एचडी कुमारस्वामी कॉन्ग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बने थे। इस साल उनकी सरकार चली गई। लेकिन, कुमारस्वामी ने सत्ता में रहते कोई ऐसा मौक़ा नहीं छोड़ा, जब उन्हें रोने का मौक़ा मिला हो। उनकी सरकार के दौरान हुई फोन टैपिंग का मामला अभी भी ख़बरों में है। अगस्त में उन्होंने बयान दिया कि वो ‘ग़लती से’ मुख्यमंत्री बन गए थे और वो राजीनीति से संन्यास लेना चाहते हैं। मुख्यमंत्री रहते जब लोग उनके पास समस्याएँ लेकर आएँ तो उन्होंने लोगों को फटकारते हुए मोदी के पास जाने की सलाह दी। सरकारी बस से यात्रा करने और चटाई पर सोने के बावजूद उनके ‘विलेज स्टे’ में करोड़ों ख़र्च हुए।
एचडी कुमारस्वामी अपने आँखों में आँसू लेकर ही घूमते रहे
उनके राज में स्थिति ये रही कि देवगौड़ा परिवार के बारे में लिखने पर पत्रकारों पर पुलिसिया कार्रवाई की गई। उन्होंने अपने एक बयान में वंशवादी राजनीति को देश के विकास के लिए सही ठहराया। सेना का अपमान करते हुए उन्होंने कहा कि जिनके पास खाने के लिए नहीं होता है, वो भी सेना में चले जाते हैं। पीएम मोदी और अपने चेहरे की तुलना को लेकर भी उन्होंने अजीबोगरीब बयान दिए। जब वो मुख्यमंत्री थे, तब कहते थे कि वो कॉन्ग्रेस के दबाव में क्लर्क बन गए हैं। रोते-रोते उनका ये साल भी बीत गया।
5. बेहाल बिहार में विकल्पहीनता के दो चेहरे: एक छत पर, दूसरा Twitter पर
पटना में जलजमाव का आलम ऐसा रहा कि उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी तक को रेस्क्यू करने के लिए एसडीआरएफ की टीम को जाना पड़ा। नीतीश कुमार छत पर छाता लेकर मंद-मंद मुस्कुराते हुए बारिश का आलम देखते रहे। जब पजामा ऊँचा कर निरीक्षण के लिए निकले, तब पूछ डाला कि क्या अमेरिका और मुंबई में बाढ़ नहीं आता? कभी आँगनबाड़ी सेविकाएँ, कभी शिक्षक, कभी छात्र तो कभी विपक्षी कार्यकर्ता- पटना की सड़कों पर पुलिस के डंडों का शिकार कौन नहीं बना? उधर सुशील मोदी ट्विटर पर अख़बारों की कतरन शेयर कर के अपने ऑपरेशन का हालचाल देते रहे। राबड़ी को बिहार का नेहरू बनाते रहे।
बिहार में विचित्र स्थिति है: ‘सुमो’ के साथ बैठे नीतीश शायद ऐसा ही कुछ कह रहे हैं
राजगीर में बलात्कार की घटना हुई। राज्य के कई अन्य हिस्सों में भी अपराध की घटनाएँ घटीं। नीतीश कुमार ‘ठीक’ से ‘ठीके’ हो गए लेकिन अफ़सोस, राज्य में सवाल पूछने वाले नहीं बचे हैं। बाढ़, चमकी, बेरोजगारी, मर्डर, बलात्कार… नीतीश के बिहार में अब यही सब चल रहा है। मुजफ्फरपुर में जापानी इंसेफ्लाइटिस से सैंकड़ों बच्चे मर गए। नीतीश आरएसएस कार्यकर्ताओं की कुंडली निकलवाते रहे। चमकी बुखार से निपटने में नाकामयाब नीतीश सरकार विधानसभा में आम बाँटने में पीछे नहीं रही। इस साल ‘नीकु-सुमो’ की जोड़ी बिहार की विकल्पहीनता का चेहरा बन कर उभरी।
4. नहीं काम आया ‘रा-फ़ेल’ मुद्दा: न अध्यक्ष रहे, न बने पीएम
इस वर्ष लोकसभा चुनावों के दौरान ‘राफेल में चोरी हुई है’ और ‘चौकीदार चोर है’ जैसे नारों के साथ सियासी समर में उतरे राहुल गाँधी की नैया ऐसी डूबी कि कॉन्ग्रेस का उद्धार होना तो दूर, वो ख़ुद अमेठी से हार गए। हार से निराश राहुल ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और उनकी माँ अंतरिम अध्यक्ष बनीं। हाल ही में जिस तरह से दिल्ली में हुई रैली में उनके पोस्टर-बैनर दिखे और प्रियंका ने उन्हें अपना नेता बताया, सम्भावना है कि वो फिर से अध्यक्ष पद पर वापसी करें। ‘सुप्रीम कोर्ट ने भी कह दिया है कि चौकीदार चोर है’- इस बयान के लिए देश की उच्चतम अदालत ने उन्हें फटकार लगाई, जिसके बाद उन्हें माफ़ी माँगनी पड़ी।
राहुल गाँधी: न सत्ता मिली, न कॉन्ग्रेस अध्यक्ष रहे, कोर्ट का चक्कर लगाते बीता साल
‘सारे मोदी चोर हैं’- इस बयान के लिए भी उन्हें कोर्ट का चक्कर लगाना पड़ा। नेशनल हेरलड मामले में वो जमानत पर बाहर हैं। उधर उनके जीजा रॉबर्ट वाड्रा भी बीकानेर से लेकर लंदन तक की सम्पत्तियों को लेकर जाँच का सामना कर रहे हैं। संसद में आँख मारना हो या पीएम मोदी को हास्यास्पद ढंग से गले लगाना, राहुल गाँधी मजाकिया कारणों से चर्चा में रहे। साल का अंत होते-होते असली मुद्दों पर मोदी सरकार को घेरने के बजाय सावरकर पर बयान देकर एक बार फिर उन्होंने कॉन्ग्रेस की नैया डाँवाडोल कर दी। झारखण्ड व महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान भी वो उतने सक्रिय नहीं रहे और न ही टिकट वितरण में दिलचस्पी दिखाई। शायद ‘जस्ट Chill-Chill’ उनका नया मोटो है।
3. कट्टरपंथियों की हिजाबी जोड़ी: जामिया के उपद्रवियों की ‘नायिकाएँ’
आयशा रेना और लदीदा फरज़ाना को मीडिया के एक बड़े वर्ग ने सूडान आंदोलन के दौरान लोकप्रिय हुई आला सलाह की तरह पेश करना चाहा। जामिया के छात्रों के उपद्रव को ढकने और भारत सरकार को बदनाम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रोपेगंडा चलाया गया। दोनों युवतियों को पुलिस से भिड़ते हुए दिखाया गया। सब कुछ सुनियोजित तरीके से किया गया और वीडियो शूट कर वायरल किया गया। आयशा आतंकी याकूब मेमन की समर्थक हैं और भारत को फासिस्ट देश मानती हैं। वहीं लदीदा ‘अल्लाहु अकबर’ नारे का बचाव करते हुए बाकी नारों को सेक्युलर बताती हैं और कहती हैं उन्होंने उन नारों को छोड़ दिया है।
हैदराबाद में ओवैसी से मिलतीं आयशा और लदीदा
लदीदा ने एक लम्बे-चौड़े फेसबुक पोस्ट में आज़ादी से पहले हिन्दुओं का नरसंहार करने वाले इस्लामी कट्टरपंथी नेताओं को अपना आदर्श बताया, अपना पिता बताया। केरल से शाहीन अब्दुल्लाह को उठा कर लाया गया, जो पुलिस से बचते हुए इन युवतियों के पास पहुँचा और इन दोनों से उसे बचाते हुए वीडियो शूट कराया। बरखा दत्त को इन दोनों के साथ देखा गया, तभी कई लोगों को भनक लग गई कि इन्हें उभारा जाना एक पूर्व-नियोजित साज़िश है। दोनों युवतियों को एक दीवार पर खड़ा किया गया, जैसे सूडान की आला सलाह कर पर खड़ी हुई थी। रवीश के शो से लेकर ओवैसी से मिलने तक, दोनों चर्चा में रहीं।
2. नकारात्मकता का बेताज बादशाह: ‘डर के माहौल’ का शहंशाह
नाम ही काफ़ी है। एनडीटीवी के धरोहर। भारत में ‘डर का माहौल’ दिखा कर लोगों को भड़काने वाले रवीश कुमार। इस पर चर्चा करना ही बेकार है कि इन्होने इस साल क्या-क्या किया, बल्कि सवाल तो ये है कि इन्होंने इस साल क्या-क्या नहीं किया? हाल ही में जब झारखण्ड विधानसभा चुनाव परिणाम के दौरान कुछ देर के लिए भाजपा की स्थिति सुधरती दिखर ही थी तो इन्होने युवाओं को ही कोसना शुरू कर दिया। ऑरिजनल आर्टिकल पढ़े बिना इन्होने ‘विशेषज्ञों के हवाले से’ ख़ूब फर्जीवाड़ा फैलाया। मोदी से कठिन सवाल पूछने की चाह रखने वाले ‘पत्रकारिता के एकमात्र झंडाबरदार’ रवीश सपा-बसपा के मंच पर देखे गए। मैग्सेसे अवॉर्ड लिया लेकिन विदेश में जाकर अंग्रेजी में कहा कि भारत में अब लोकतंत्र नहीं रहा।
नकारात्मक पत्रकारिता का एक ही सरताज: एनडीटीवी के रवीश कुमार
रवीश ने यहाँ तक कह दिया कि भारत का दिल छोटा है। कारवाँ, क्विंट और वायर के हवाले से उन्होंने जनता को बरगलाने में कसर नहीं छोड़ी। रवीश ने न्यूज़लॉन्ड्री के एक लेख को शेयर कर सीधा ऑपइंडिया पर निशाना साधा। उन्हें रेप में जात तो दिख गया लेकिन मजहबी अपराधों पर उनकी खतरनाक चुप्पी कायम रही। अपने गृह जिले चम्पारण पहुँच कर उन्होंने अपने विरोधियों को ‘लबरा’ बता दिया। अयोध्या दीपोत्सव को कवर करने पर एक रिपोर्टर को ही भला-बुरा कह दिया। कमलेश तिवारी की हत्या पर वो चुप रहे, उस दिन वो मेक्सिको-अमेरिका का झगड़ा दिखाते रहे। कुल मिला कर इस साल ‘रवीश अनंत, रवीश की नकारात्मकता अनंता’ वाली स्थिति रही।
1. जातिवादी ज़हर बोने वाला मंडल, विषैले नाग से भी ख़तरनाक
राजनीति में जातिवाद। सोशल मीडिया में जातिवाद। शिक्षण संस्थानों में जातिवाद। दिलीप ‘सी’ मंडल एक ऐसा नाम है, जो देश में विभाजन पैदा करने की क़सम खा कर अपने घर से बाहर निकलता है। उसने ब्लू टिक के लिए ट्विटर को घेरा और कहा कि दलितों के एकाउंट्स को वेरिफाई नहीं किया जा रहा। उसने ‘जय भीम ट्विटर’ अभियान चलाया। माखनलाल यूनिवर्सिटी में उसने छात्रों को उनकी जाति पूछ कर प्रताड़ित किया। विरोध के स्वर उठे तो 23 छात्रों को निष्काषित कर दिया गया। उसके करतूतों के विरोध की ऐसी सज़ा मिली कि छात्रों को कड़ाके की ठण्ड वाली रात में कपड़े उतरवा कर 20 किलोमीटर घुमाया गया। वो छात्रों में जातिवादी ज़हर बो कर विभाजन पैदा कर रहा है।
टीवी चैनलों से लेकर सोशल मीडिया पर, जातिवादी जहर का कारोबारी है दिलीप सी मंडल
फेसबुक पर लगातार जातिवादी पोस्ट लिख कर लोगों को भड़काने वाले दिलीप मंडल को हर चीज में ब्राह्मणों को दोष देने में विशेष प्रकार का मजा आता है। उसका पूरा साल यही करते हुए बीता। लोगों का मानना है कि ऐसे जातिवादी जहर फैलाने वाले का शिक्षण संस्थानों में घुसना, राजनीतिक संरक्षण मिलना और सोशल मीडिया में समर्थन मिलना देश के भविष्य के लिए सही नहीं है। वह शिक्षण संस्थानों में अपने जैसे ऐसे कितने दिलीप मंडल पैदा करने में लगा हुआ है, इसे भी देखना चाहिए। कुल मिला कर इस साल ये व्यक्ति सबसे ज़्यादा ज़हर फैलाने के मामले में अव्वल रहा।
सीएए, एनआरसी और एनपीआर पर बहस सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक जारी है। इन विरोधों को चलाने के तरीकों के बारे में अब यह सच सामने आया है कि भारी मात्रा में धनराशि खर्च कर सरकार के इस पहल के खिलाफ जनमत सर्वेक्षण और जनता की राय कायम करने की जा रही है। एक Reddit उपयोगकर्ता, जिसका यूजर नाम onosmosis है, ने केंद्र में भाजपा सरकार के खिलाफ अभियान चलाने के लिए इंटरनेट पर दर्जनों वेब सर्वर चलाने का दावा किया है।
Reddit यूजर ने r / india subreddit पर निम्न सूचनाएँ पोस्ट किया, जो उसके ‘प्रोजेक्ट’ के बारे में सूचित करता है:
मैं, पिछले तीन महीनों से, सोशल मीडिया, विशेष रूप से 2 लाख से अधिक फर्जी एकाउंट्स (bot accounts) से किए जा रहे ट्वीट्स का विश्लेषण कर रहा हूँ जिन्हें खासतौर से वर्तमान शासन के आईटी सेल के खिलाफ एक अभियान चलाने के लिए एडब्ल्यूएस पर 40 से अधिक सर्वर चला रहा हूँ। यह एक कठिन कार्य है, और जैसा कि आप संलग्न स्क्रीनशॉट में देख सकते हैं, यह महँगा भी है। लेकिन अभियान की रिपोर्ट और परिणाम आप देख सकते हैं। यह लगातार IT सेल के ट्विटर पोल को लगातार हरा रहा है और इस कानून का विरोध कर रहे लोगों को अधिक ऊर्जा /आवाज दे रहा है। मैं इस पर अपने व्यापक रिपोर्ट को कल आप सभी के लिए अपने ब्लॉग पर प्रकाशित करूँगा। मुझे जो खुशी होती है, वह यह है कि इतनी शक्ति और धन वाली सरकार एक ऐसा काम करने में सक्षम नहीं है। विरोध करते रहिए मैं अपनी प्रौद्योगिकी कौशल के साथ अपना योगदान दे रहा हूँ।
Reddit यूजर का दावा है कि सरकार के खिलाफ अभियान चलाने के लिए अमेज़ॅन वेब सेवाओं पर 40 से अधिक सर्वर चलाकर, वह लगातार ‘आईटी सेल के ट्विटर पोल” को हराने में सक्षम है। इसका मतलब है कि आईटी सेल को हराने के लिए पोल्स में वोट देने के लिए तकनीकी संसाधनों का उपयोग किया जा रहा है। उपयोगकर्ता ट्विटर पर 2 लाख से अधिक बॉट खातों को चलाने या हेरफेर करने का दावा करता है, जो कि यदि सही है, तो किसी भी ट्विटर पोल पर धाँधली करने के लिए पर्याप्त है।
इसके आगे की पोस्ट में, उपयोगकर्ता का कहना है कि जैसा कि हम बहुत ही आदर्श परिदृश्य में नहीं रह रहे हैं, उन्होंने बीजेपी के आईटी सेल द्वारा संचालित बॉट के ट्विटर खातों की निगरानी और हेरफेर करने का फैसला किया। वह कहता है कि इसमें बहुत पैसा और ऊर्जा लगी, लेकिन यह इसके लायक था। उसने अपने हेरफेर के परिणामों को जल्द ही अपने ब्लॉग पर जारी करने का वादा किया है।
उसने अपने द्वारा किराए पर लिए गए 40 सर्वरों के लिए अमेज़न वेब सर्विसेज के साथ लेनदेन की एक प्रति भी संलग्न की। यह दर्शाता है कि 20 नवंबर को, 2,00,361.42 की राशि का भुगतान किया गया था, और। 2,11,869.90 की एक और राशि का भुगतान किया जाना है। इसका मतलब है कि लोगों को सीएए और एनआरसी का समर्थन नहीं करने के लिए ट्विटर पोल में हेरफेर करने के लिए केवल दो महीनों में चार लाख रुपए से अधिक खर्च किए गए हैं।
पोस्ट ने कई रेडिट यूजर से रेस्पॉन्स प्राप्त कीं, जिन्होंने प्रौद्योगिकी का उपयोग करके ‘बीजेपी आईटी सेल को हराने’ में उनकी मदद की। उनमें से कई डेटा विज्ञान, प्रोग्रामिंग, क्लाउड कंप्यूटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, और सूचना प्रौद्योगिकी के अन्य क्षेत्रों में उच्च योग्य होने का दावा करते हैं, जो इस ‘प्रोजेक्ट’ में सहयोग करने में मदद करते हैं। उनमें से कई ने चर्चा को स्लैक या टेलीग्राम में स्थानांतरित करने का सुझाव दिया ताकि यह दूसरों द्वारा नहीं देखा जा सके। कुछ यूजर ने AWS बिल को कम करने में मदद की पेशकश की, और कई ने बिलों का भुगतान करने के लिए एक फण्ड रेज़र अभियान चलाने का सुझाव दिया।
रेडिट पोस्ट और बड़ी संख्या में उस पर की गई टिप्पणियों को देखते हुए, यह कहा जा सकता है कि इंटरनेट पर बीजेपी को हराने के लिए जोरदार अभियान चलाए जा रहे हैं। जब कई ऑनलाइन पोल में लोगों को सीएए या एनआरसी के खिलाफ वोट करने के बारे में पता चलता है, तो इसका कारण हो सकता है कि 2 लाख से अधिक फर्जी एकाउंट्स से उनके खिलाफ मतदान किया गया, न कि वास्तविक व्यक्तियों द्वारा वोट डाला गया। और यह सिर्फ एक यूजर है, ऐसे कई ऑनलाइन संसाधन हो सकते हैं जो पर्दे के पीछे से सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के लिए समर्पित हैं।