काले बाल ब्राह्मणों की साजिश, मूल निवासियों को दो हर जगह नीले बाल: दिलीप सी मंडल

चूँकि एक परमानेंट दुश्मन पहले से स्थापित है तो उसको तुरंत खींच लिया जाता है। सी मंडल ने कहा कि ब्लू टिक नीला जनेऊ बना दिया गया है। चूँकि सी मंडल सी मंडल हैं, तो उनकी मजबूरी है कि उन्हें हर चीज नीली ही चाहिए, वरना उसमें ब्राह्मणवाद ठूँस देना है। और ब्राह्मणवाद क्या है, यह पूछिए दो लाइन ठीक से नहीं बोल पाएँगे।

नारीवाद का चिंतन जैसे राह भटक कर पीरियड्स के पैड्स और ‘नो ब्रा डे’ तक सीमित होने से ले कर स्वच्छंद संभोग और सिर्फ संभोग तक ही सिमट गया, वैसे ही दलित चिंतन की फुलवारी लगाने वाले आज कल हर बात में जनेऊ और ब्राह्मणवाद ढूँढ लेते हैं। पूरी दुनिया कथित दलितों के साथ साजिश में लगी हुई है और सारा विश्व भारत के ब्राह्मणों द्वारा संचालित है, ऐसा दलित चिंतन के अग्रणी दिलीप सी मंडल का मानना है।

दिलीप सी मंडल के नाम का ‘सी’ कई लोगों द्वारा कई अर्थों में लिया जा चुका है और सर्वाधिक प्रचलित मत वही है जो आप समझ रहे हैं। आर्यन आक्रमण थ्योरी जबसे ध्वस्त हुई है तब से इनका चिंतन थोड़ा कमजोर पड़ गया है। साथ ही, दलितों की स्वघोषित मसीहा मायावती को जब से दलितों के नए स्वघोषित मसीहा चंद्रशेखर ने चुनावों के समय नकारा है, तब से दलित चिंतन चर्चा से गायब हो गया था।

रोहित वेमुला की सच्चाई भी सामने आ गई और वेमुला स्वयं राजनीति में नहीं पड़ना चाहता था, लेकिन दलित चिंतकों को एक हीरो चाहिए था, तो उसकी मूर्ति बना दी गई। उसके बाद से दलितों के सारे मुद्दे भाजपा ने न सिर्फ हथिया लिए बल्कि कई योजनाओं के जरिए, उन्हें शौचालय से ले कर सिलिंडर, पानी, बिजली, बल्ब, बैंक खाता, आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि सारी सुविधाएँ सुनिश्चित कीं।

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इसका नतीजा यह हुआ कि दलित नेताओं और चिंतकों के पास दलितों के नाम पर राजनीति को ले कर कुछ खास बचा नहीं। या तो इन्होंने अफवाह फैला कर दलितों से आगजनी करवाई और (अलग-अलग खबरों के अनुसार) नौ से चौदह लोगों की जान ली, या फिर जबरदस्ती की दलित सम्मान रैलियाँ निकालीं, जिसका हासिल कुछ नहीं रहा। भाजपा समर्थित राजग पहले से ज्यादा सीट ले कर सत्ता में आई।

सोशल इंजीनियरिंग: गरीब को गरीब, दलित को दलित रखने की साजिश

जब दलितों ने, मुसलमान महिलाओं ने अपनी समस्याओं का समाधान मोदी सरकार की नीतियों और योजनाओं में पाया तो फिर वोटिंग रूम में कौन सा बटन दबाया, यह जानना मुश्किल नहीं है क्योंकि मुस्लिम बहुल इलाकों में भी भाजपा ने आधी सीटें जीती हैं। कुल मिला कर बात यह है कि दलितों के नाम पर राजनीति करने वालों को दलित नकार चुके हैं क्योंकि मायावती दलित नहीं रही, लालू गरीब नहीं रहा, मुलायम समाजवादी नहीं रहे, लेकिन इनका वोट बैंक उसी घटिया अवस्था में रहा जैसा वो तीस साल पहले थे, और उससे तीस साल पहले था।

दिलीप सी मंडल हों, जिग्नेश मवाणी हों, चंद्रशेखर हों, या मायावती, दलित जातियों ने यह समझना शुरू कर दिया है कि उनके जीवन में बदलाव ले कर कौन आएगा। यह समझना निरी मूर्खता है कि किसी के घर में एक अच्छे जीवन की शुरुआत के लिए जरूरी सारी सुविधाएँ, बिना किसी भेदभाव के, भाजपा सरकार दे, और वो वोट मायावती को चला जाएगा!

इसलिए, भीम को मीम के साथ आना पड़ा। इसलिए, गेस्टहाउस कांड वाले लोग बुआ-भतीजा हो गए। बात दलितों की कभी हुई ही नहीं, बात हमेशा गणित की थी। बात हमेशा सीट पाने की थी। बात हमेशा सत्ता में पहुँचने की थी। लालू-मुलायम-माया-सोनिया आदि ने दलितों-गरीबों को दलित और गरीब रखने पर विशेष काम किया।

ऐसा इसलिए किया क्योंकि गरीब शिक्षित हो कर, रोजगार के अवसर पा कर, एक सम्मानित जीवन हेतु आवास से ले कर, सिलिंडर, बल्ब, बिजली, बीमा आदि पा कर गरीबी से बाहर आ सकता है। अगर वो बाहर आ गया तो फिर वोट बैंक तो बर्बाद हो जाएगा, इसलिए दलित को दलित, गरीब को गरीब बनाए रखने की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ शुरू हुई। मकसद कुछ और था, लेकिन अंग्रेजी के शब्द गढ़ कर उसे ऐसा बताया गया मानो ये लोग सत्ता में आ कर कुछ गजब का कर देंगे।

दलित चिंतन को चाहिए ब्रा और पैड्स… और ब्लू टिक

जब मूल मुद्दे गायब हो जाएँ क्योंकि आपके नेता और चिंतक (किसी ने बनाया नहीं, उन्होंने स्वयं को ऐसा मान लिया) कभी भी आपके हितों के लिए खड़े नहीं हुए बल्कि आपकी रीढ़ के कशेरुकों को अपने पैर के अंगूठे रख कर ऊपर उठने के लिए इस्तेमाल किया और कहा कि तुम्हारे सर पर लात रख कर तुम्हारा भविष्य देख रहे हैं, तब प्रतीकों को ही मूल मुद्दा जैसे दिखाया जाता है। तब हर बात को साजिश के तौर पर दिखाया जाता है।

इस समय जब वंचितों और पिछड़ों के भविष्य पर लगातार काम हो रहा है, कहीं न कहीं उन्हें दी जा रही सब्सिडी आदि के कारण राष्ट्र की अर्थव्यवस्था भी धक्का सह रही है, तब उनकी हालत भी सुधर रही है। ये बात हर लाभार्थी को दिख रहा है, इसलिए अब नए दुश्मन और नए लांछन की आवश्यकता आन पड़ी है। अब इन्हें ‘दलित अस्मिता’ का झुनझुना थमाया जा रहा है। क्योंकि जमीनी बातों पर ये नेता और चिंतक कभी टिक ही नहीं पाएँगे, इसलिए शाब्दिक बातें छेड़ी जा रही हैं।

जब आप पूछिए कि 5000 सालों से कथित दलितों के साथ जो कथित अत्याचार हुए हैं, उनका वर्णन किस इतिहासकार ने किया है? क्या ऐसी बातें हजार साल पहले के भी यात्रा वृत्तांतों, ऐतिहासिक दस्तावेजों में दर्ज है? किसी धार्मिक ग्रंथ में इसका जिक्र है? क्या किसी कथित निचली जाति के रचनाकार ने कहीं लिखा है कि हजारों सालों से निचली जातियों के साथ दुर्व्यवहार हो रहा है? आप खोजते रहेंगे, आपको प्रमाण नहीं मिलेंगे। मैक्समूलर और विलियम जोन्स जैसे चिरकुट उपन्यासकारों (जिन्हें लोग इतिहासकार समझते हैं) ने ऐसी भ्रांतियाँ पैदा की, ताकि समाज कभी एकजुट न हो।

इसमें दोराय नहीं है कि निचली जातियों के साथ भेदभाव होता रहा है, और हो रहा है। लेकिन यह घटना पौराणिक नहीं है, यह घटना वैदिक काल से नहीं है, यह घटना 5000 साल पुरानी नहीं है। यह घटना अंग्रेजों और मुगलों को समय की है, जब से बाहर से अपने साथ लाई असमानता का सिद्धांत मुसलमान शासकों और अंग्रेजों ने भारतीय समाज पर थोप दिया।

बाहर से आए मुसलमान शासक अशरफ और ऐलाफ-अरजल जातियों के साथ समाज को हाँकते रहे, अंग्रेजों ने पूरे भारतीय समाज को ही अश्वेत होने के नाम पर हीन बनाए रखा। उसके बाद सूक्ष्म तरीके से भारतीय समाज के बीच विभाजन की दरारें पैदा की गईं, दो गुटों को भड़का कर वैमनस्य पैदा किया गया ताकि समाज एकजुट न हो सके। चाहे वो ईसाई कनवर्जन का काम हो या इस्लामी मतपरिवर्तन का, उन्हें बँटा हुआ हिन्दू समाज चाहिए था संख्या बढ़ाने के लिए।

संख्या बढ़ा कर इन्होंने क्या उखाड़ लिया वो पूरे विश्व में दिख रहा है। चोरी और डकैती से चलने वाली यूरोपीय अर्थव्यवस्थाओं का क्या हाल है, दिख रहा है। इस्लाम आईसिस के झंडे पर छप कर हर जगह आतंक की छाप छोड़ ही रहा है। आखिर समृद्ध भारत में गरीबी ले कर कौन आए? फिर ऐसे गरीबों को बहलाना किनके लिए सकारात्मक परिणाम ले कर आने वाला था? इसलिए जरूरत पड़ी जाति और दलित जैसे शब्दों की, जो इनके आने से पहले भारतीय समाज की शब्दावली में था ही नहीं।

वही बँटा हुआ समाज विकृत होता गया और सवर्ण-दलित का कोढ़ बन कर, भेदभाव की घटिया पराकाष्ठाओं को लगातार पार करता गया। यह कहना अनुचित है कि दलितों के साथ अत्याचार और भेदभाव नहीं हुए, या नहीं होते। खूब होते हैं, आज भी होते हैं, हमारे आपके सामने होते हैं। लेकिन उसका समाधान ट्विटर पर ‘ब्लू टिक’ न मिलने को ब्राह्मणों की साजिश बताना नहीं है।

ब्राह्मणवाद का नीला जनेऊ

दिलीप सी मंडल के लिए दलितों के जीवन की सबसे बड़ी समस्या ट्विटर पर ब्लू टिक का नहीं मिलना है। लेकिन, कोई भी व्यक्ति थोड़ी रिसर्च करे, दो बार सर्च करे तो पाएगा कि ट्विटर पर हर जाति, समाज, समुदाय, धर्म, मजहब, विचारधारा के लोगों को ब्लू टिक, यानी सत्यापित प्रोफाइल होने का प्रमाण, हासिल है।

चूँकि एक परमानेंट दुश्मन पहले से स्थापित है तो उसके प्रतीक जनेऊ को, जो अनभिज्ञता में ब्राह्मणों के ही साथ जोड़ा जाता है, उसको तुरंत खींच लिया जाता है। सी मंडल ने कहा कि ब्लू टिक नीला जनेऊ बना दिया गया है। चूँकि सी मंडल सी मंडल हैं, तो उनकी मजबूरी है कि उन्हें हर चीज नीली ही चाहिए, वरना उसमें ब्राह्मणवाद ठूँस देना है। इनसे पूछा जाए कि ब्राह्मणवाद है क्या, तो दो लाइन से आगे नहीं बढ़ पाएँगे।

ऐसी शब्दावली गढ़ कर जातिवाद फैलाने के कुत्सित प्रयास कुछ सौ सालों से चल रहे हैं, और चूँकि ये सत्ता पाने की सीढ़ी भी है, तो पिछले कुछ दशकों की राजनीति में ये ज्यादा प्रबल हो चुका है। ब्राह्मणों की दुर्गति क्या है वो बिहार के गाँवों में यजमानी करने वाले ब्राह्मणों को जा कर कोई देखे। उनके साथ समस्या यह है कि वो मजदूरी कर नहीं सकते क्योंकि यही समाज उन्हें मजदूरी करने से भी रोकता है, यह कह कर उन्हें पाप चढ़ेगा। और यही समाज, ब्राह्मणों को फिल्मों और टीवी पर धूर्त और मक्कार बता कर उसे उचित यजमानी भी नहीं देता।

इसका फल यह होता है कि ब्राह्मण न तो आरक्षण का पात्र बन पाता है, न ही उसके घर पर छत आ पाती है। वो अपनी कथित जाति के बंधन में बँधा हुआ है। स्थिति यह है कि आज बिहार के ब्राह्मणों और निचली जातियों की आर्थिक स्थिति में कोई खास अंतर नहीं है। जिन्होंने पढ़ाई की और नौकरियाँ पाईं, वो जरूर बेहतर स्थिति में हैं, लेकिन ये तर्क सारी जातियों पर लागू होता है।

इसलिए, दिलीप सी मंडल को ट्विटर पर अब ब्राह्मणवाद दिखता है। लोग इस पर ‘दिलीप सर का कथन सत्य है’ लिख रहे हैं, क्योंकि और कुछ लिख भी नहीं सकते। किसी भी शब्द में ‘वाद’ जोड़ देने से वो अचानक कूल हो जाता है। लोग उसे बिना जाने चर्चा में ले आते हैं। एक काल्पनिक बात को आधार मान कर नए तथ्य गढ़ लिए जाते हैं।

इसी तरह के उजड्ड लोगों ने नारीवाद के विमर्श में नारी की आर्थिक स्वतंत्रता से उसकी संपूर्ण स्वतंत्रता की राह को दूर छोड़ कर पश्चिमी विमर्श के पीरियड्स, ब्रा और सेक्स पर केन्द्रित कर दिया। नारी को समान अवसर देने की बात गायब हो गई और शराब पीना, व्यभिचार करना, गाली देना, ड्रग्स लेना नारीवाद का मुख्य पहलू बन गया। पश्चिम के समाज में भारतीय समाज की तरह की आर्थिक विसंगति नहीं है, वहाँ भ्रूण हत्या नहीं है, बच्चियों को जन्म लेते ही नहीं मारा जाता, इसलिए वहाँ समानता की बाकी सीढ़ियाँ पाटने के बाद स्त्रियों के मुद्दे अलग हैं।

वो वहाँ बार में जाना चाहती है, कई सेक्स पार्टनर रखना चाहती हैं, हर उस प्रतीक को त्यागना चाहती हैं जो उनके हिसाब से बंधन है, चाहे वो छाती पर लगा हुआ ब्रा ही क्यों न हो। उन्हें नौकरी की समस्या नहीं है, स्वास्थ्य की समस्या नहीं है, आर्थिक स्वतंत्रता की समस्या नहीं है, समान अवसरों की समस्या बहुत कम है। इसलिए उनका विमर्श अलग है। भारत के छद्म नारीवादी सीधे अंतिम सीढ़ी पर खड़े हो कर जीत जाना चाहते हैं।

वही हाल दलित विमर्श का हो गया है। समस्या है उनके आर्थिक और सामाजिक पिछड़ेपन की, जो कि उसी स्तर के समाधान खोजती है, न कि ट्विटर के ब्लू टिक की दरकार है उन्हें। जनेऊ को सूअर के गले में पहनाने और ब्राह्मणों को गाली देने से वंचितों का उत्थान नहीं हो सकता, इससे वो अपने ही खिलाफ और दुर्भावना फैला रहे हैं। ब्लू टिक सैकड़ों दलितों को मिला हुआ है, दलित नेताओं को मिला हुआ है। उसे पाने का एक तय नियम है, आप उसके लिए अप्लाय कीजिए, उनकी शर्तों को पूरा कीजिए, आपको मिल जाएगा।

इस सबमें जो अच्छी बात जो है, वो यह है कि असली दलित, यानी जिसका दलन किया गया है, शोषण हुआ है, जो वंचित है, पिछड़ा है, गरीब है, वो ट्विटर पर नहीं है। वरना जिस तरह का जहर दिलीप सी मंडल जैसे लोग फैला रहे हैं, वो विभाजनकारी और भड़काऊ है। ऐसे ही भावनाओं को भड़काने वाली, महत्वहीन बातें, नेताओं को चमका देती है, और दलित सड़क पर नीला दुपट्टा ओढ़े दूसरे दलित के सब्जी के ठेले को उलट देता है, मशाल ले कर छोटे व्यापारियों के बाजार में आग लगा देता है और नेता कहते हैं ‘आंदोलन सफल हुआ’।

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