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नई मस्जिद का नाम डॉ कलाम, परमवीर अब्दुल हमीद या अशफाकउल्ला खान के नाम पर हो: VHP की माँग

सुप्रीम कोर्ट ने दशकों से लंबित अयोध्या विवाद पर 9 नवंबर को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए विराम लगा दिया। अपने ऐतिहासिक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए तीन महीने में ट्रस्ट के गठन का आदेश दिया है। विश्व हिंदू परिषद (VHP) के कार्यकताओं ने सोमवार (नवंबर 11, 2019) को अपनी इच्छा जताते हुए कहा कि वो चाहते हैं कि भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी उस ट्रस्ट के सदस्य हों।

साथ ही विहिप ने यह भी कहा कि वह केंद्र से अनुरोध करेगा कि 5 एकड़ जमीन पर बनने वाली मस्जिद का नाम बाबर के नाम पर रखने की अनुमति न दे। विहिप के प्रवक्ता शरद शर्मा ने कहा, “बाबर एक विदेशी आक्रांता (हमलावर) था। हम सरकार को इसकी अनुमति नहीं देने के लिए संपर्क करेंगे। भारत में बहुत सारे अच्छे मुस्लिम हैं। देश की शांति और विकास में उनका काफी योगदान रहा है। इनमें वीर अब्दुल हमीद, अशफाकउल्ला खान और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का नाम आता है।। नई मस्जिद का नाम उनमें से किसी के नाम पर रखा जाना चाहिए।”

बता दें कि शरद शर्मा राम जन्मभूमि न्यास कार्यशला की देखभाल करते हैं, जहाँ राम मंदिर के लिए तराशे गए पत्थर रखे गए हैं। वहीं मुस्लिम याचिकाकर्ताओं में से एक का कहना है कि मस्जिद का नामकरण महत्वपूर्ण नहीं है। प्राथमिक मुद्दा मस्जिद के लिए भूमि को स्वीकार करने या न करने पर आम सहमति का था।

मुस्लिम पक्ष की ओर से मुख्य याचिकाकर्ता इकबाल अंसारी ने कहा, “मस्जिद कोई बाबर की मोहताज नहीं, बाबर एक बादशाह था।” उन्होंने आगे कहा कि अभी जमीन का अधिग्रहण किया जाना बाकी है और इस पर सुन्नी वक्फ बोर्ड की एक बैठक होगी। उन्होंने कहा कि वो देश को आश्वस्त कर सकते हैं कि वो हिन्दुओं के साथ बिना किसी उपद्रव के, गरिमा के साथ रहेंगे। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वो शांति व्यवस्था को बिगड़ने नहीं देंगे।

मस्जिद को मिलने वाली जमीन को लेकर अंसारी का एक और बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने कहा है, “अगर सरकार हमें जमीन देना चाहती है तो हमें हमारी सुविधा के हिसाब से देना चाहिए। आवंटित जमीन 67 एकड़ जमीन में से ही होनी चाहिए। तभी हम यह जमीन लेंगे। नहीं तो हम जमीन लेने की पेशकश को ठुकरा देंगे। लोग कह रहे हैं कि 14 कोस से बाहर जाकर मस्जिद बनाओ, यह उचित नहीं है।”

राम मंदिर पर कॉन्ग्रेस में फूट: सुरजेवाला के बयान को ख़ुर्शीद ने नकारा, कहा- मस्जिद को हाइलाइट करते

राम मंदिर मुद्दे को लेकर कॉन्ग्रेस के भीतर ही खींचतान देखने को मिल रही है। पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि कॉन्ग्रेस अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत करते हुए राम मंदिर निर्माण का समर्थन करती है। लेकिन पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान ख़ुर्शीद ने कहा है कि अगर सुरजेवाला की जगह वे पार्टी का रुख रखते तो कुछ अलग कहते। उन्होंने कहा कि राम मंदिर पर अगर उन्हें कॉन्ग्रेस का पक्ष रखने भेजा जाता तो उनकी राय वो नहीं होती, जो सुरजेवाला ने कही।

ख़ुर्शीद ने कहा कि उनकी पार्टी का शुरू से यह मानना रहा है कि अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला आएगा उसे स्वीकार किया जाएगा। लेकिन, फ़ैसले के डिटेल में जाने पर अलग-अलग चीजों को उठा कर पेश किया जा सकता है। ख़ुर्शीद ने कहा कि राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में लिखा गया है कि 3 बार मस्जिद के साथ ग़ैर-क़ानूनी कार्य किया गया। उन्होंने कहा कि क्या हमें ये चीजें हाइलाइट नहीं करनी चाहिए?

सलमान ख़ुर्शीद ने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ से बात करते हुए रणदीप सुरजेवाला के बयान को नकार दिया और कहा कि इससे ग़लत सन्देश गया है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि फ़ैसले में मस्जिद को ध्वस्त करने या फिर मंदिर और मस्जिद दोनों बनाने की बातें कही गई है। बकौल ख़ुर्शीद, वो मीडिया के सामने इन बातों को उठाते। उनका इशारा था कि जिस तरह उनकी पार्टी ने केवल मंदिर की बात की, उससे ग़लत सन्देश गया। उन्होंने कहा कि पार्टी को सीधा कहना चाहिए था कि वो सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सम्मान करती है।

ख़ुर्शीद ने कहा कि कॉन्ग्रेस नेता कठपुतली नहीं हैं, अगर बोलते समय किसी चीज को लेकर स्पष्ट राय है तो उसे रखना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि कॉन्ग्रेस के सभी नेताओं ने तय किया था कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सम्मान किया जाएगा और यही कहना चाहिए था। ख़ुर्शीद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के ‘पूरे फ़ैसले’ का सम्मान किए जाने की बात कही जानी चाहिए थी, सिवाय उसमें से चुन कर किसी एक चीज का समर्थन करने की बात कहने के। एचटी को दिए गए इंटरव्यू में ख़ुर्शीद ने एक तरह से सुरजेवाला और अपनी पार्टी से एकमत न होने की ओर इशारा किया।

राम मंदिर पर सलमान ख़ुर्शीद का इंटरव्यू (साभार: HT)

ज्ञात हो कि रणदीप सुरजेवाला ने कहा था कि वो राम मंदिर बनाने के पक्ष में हैं। उन्होंने कहा था कि अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला न तो किसी की जीत है और न ही किसी की हार। लेकिन कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा राम मंदिर के निर्माण का समर्थन किए जाने पर ही ख़ुर्शीद नाराजगी दिखा रहे हैं। ख़ुर्शीद ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में एक लेख लिख कर बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में रामलला की मूर्ति रखे जाने की निंदा की है। साथ ही ख़ुर्शीद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा है कि वहाँ मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने की बात एएसआई की रिपोर्ट साबित नहीं कर पाई। उन्होंने लिखा कि ये फ़ैसला ‘हिन्दू राष्ट्र’ को ख़ारिज करता है।

अयोध्या अधिनियम 1993 की वो धारा, जिसके तहत बनेगा राम मंदिर के लिए ट्रस्ट

शनिवार को सुप्रीम कोर्ट में 5 जजों की संवैधानिक पीठ ने सदियों पुराने अयोध्या मामले पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इस फैसले में सर्वोच्च न्यायलय ने विवादित जमीन को रामलला के मंदिर निर्माण के लिए सौंपा और केंद्र सरकार को 3 महीने में इसके लिए ट्रस्ट के गठन का आदेश दिया। जिसके बाद कल खबर आई कि केंद्र सरकार के अधिकारियों ने इस विषय पर जानकारी देते हुए बताया है कि ट्रस्ट के गठन की प्रक्रिया शुरु हो गई है और फिलहाल टीम कोर्ट के फैसले का विस्तृत अध्य्यन कर रही है।

यहाँ स्पष्ट कर दें कि यह दिशा-निर्देश अयोध्या अधिनियम 1993 में निश्चित क्षेत्र के अधिग्रहण के खंड 6 और 7 के तहत केंद्र सरकार में निहित शक्तियों के मद्देनजर आया है। अब ये अधिनियम क्या है और इसके लिए तय किए गए खंडों की मंदिर निर्माण में क्या भूमिका है, आइए जानें…

7 जनवरी 1993 को औचित्य में आए इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम कतिपय क्षेत्र अर्जन अधिनियम 1993 है। जिसमें उल्लेखित है कि इसके प्रारंभ होने के साथ ही क्षेत्र के संबंध में अधिकार, हक-हित, इस अधिनियम के आधार पर केंद्रीय सरकार को अंतरिक और उसमें निहित हो जाएगें। इसी अधिनियम की धारा 3 ने केंद्र सरकार को विवादित भूमि और उसके आसपास के क्षेत्र के संबंध में अधिकार, टाइटल और हित स्थानांतरित किया है।

इस अधिनियम की धारा 6 में कहा गया है कि केंद्र सरकार किसी भी प्राधिकरण या अन्य निकाय, या किसी ट्रस्ट के ट्रस्टियों को अधिग्रहित क्षेत्र को अधिनियम के प्रारंभ होने के बाद स्थापित कर सकती है, यदि निकाय इस तरह के अनुपालन के लिए तैयार है और जिसमें सरकार के नियम और शर्तें लागू हो सकती हैं।

इसके अलावा इसमें यह भी निर्धारित किया गया है कि क्षेत्र के संबंध में केंद्र सरकार के अधिकारों को उस प्राधिकरण या निकाय या उस ट्रस्ट के ट्रस्टी के अधिकार के रूप में माना जाएगा, जैसा कि मामला हो।

अब इसी प्रावधान का इस्तेमाल करके सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक ट्रस्ट को जमीन सौंपने के लिए कहा है, जो सरकार द्वारा बनाई गई योजना के अनुसार क्षेत्र का प्रबंधन और विकास करेगा।

अयोध्या मामले पर फैसला इसलिए था अनूठा-

  • 16 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित रखने के बाद सभी जजों ने किया था आपस में विचार साझा और एक ही जज से लिखवाया गया पूरा फैसला।
  • फैसला लिखने वाले जज के नाम का नहीं किया गया पूरे जजमेंट में खुलासा।
  • अयोध्या फैसले के नाम से विशेष तौर पर हुआ सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर पूरा जजमेंट अपलोड।
  • 10:30 पर आना था फैसला लेकर 10:20 पर ही खुला था कोर्ट का गेट।
  • 3 नवंबर को तैयार हो चुका था जजमेंट का ड्राफ्ट, लेकिन 7 नवंबर को दिया गया इसे अंतिम रूप।
  • 8 नवंबर को ही तय हुआ कि 9 नवंबर को सुनाया जाएगा अयोध्या फैसला।
  • फैसले के बाद 5 जजों ने ख़िचवाई थी ग्रुप फोटो, जिसे बाद में मीडिया से भी किया गया साझा।

दरअसल, इसी अधिनियम की धारा 7 के आधार पर ही भूमि के प्रबंध अधिकारों को केंद्र सरकार या किसी अन्य प्राधिकरण ट्रस्ट को सौंपा गया है। जिसमें ये बात साफ है कि किसी संविदा या लिखत अथवा किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी के आदेश में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी इस अधिनियम के प्रारंभ से ही धारा 3 के अधीन केंद्र सरकार में निहित संपत्ति का प्रबंध, केंद्रीय सरकार द्वारा अथवा उस सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति या किसी निकाय या किसी न्यास के न्यासियों द्वारा किया जाएगा।

वहीं धारा 7 की उपधारा 2 बताती है कि प्रबंध निकाय यथास्थिति को बनाए रखेगा, जिसे आमतौर पर “राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद” के रूप में जाना जाता है, जो देवता के पक्ष में भूमि के टाइटल की घोषणा के साथ है। अब केंद्र सरकार की योजना के अनुसार, भूमि पर मंदिर बनाने के लिए प्रबंध निकाय को अधिकृत किया जाएगा।

यहाँ बता दें कि इस मामले में अयोध्या अधिनियम की वैधता को ‘डॉक्टर एम इस्माइल फारुकी और अन्य’ बनाम ‘भारत संघ व अन्य’ 1994 SCC (6) 360 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बरकरार रखा गया था। अगर उस समय ऐसा नहीं होता तो अधिनियम की धारा 4(3) को रद्द कर दिया जाता और जो सुनवाई अयोध्या पर हुई, वो कभी संभव ही नहीं होती। बता दें अधिनियम की ये धारा अधिग्रहित भूमि के अधिकार, उपाधि और हित के संबंध में किसी भी मुकदमे, अपील या अन्य कार्यवाही को रद्द करने की माँग करता था, जो अधिनियम के प्रारंभ के समय किसी भी अदालत या ट्रिब्यूनल प्राधिकरण के समक्ष लंबित था।

लोग कह रहे 14 कोस से बाहर बनाओ मस्जिद, लेकिन हम वहीं बनाएँगे: बाबरी का पक्षकार

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या की विवादित जमीन रामलला को सौंपते हुए सरकार को मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए अलग से 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया था। इसको लेकर कई तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। AIMIM प्रमुख और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने फैसले पर नाखुशी जाहिर करते हुए इसे खैरात बताया था। वहीं सुन्नी वक्फ बोर्ड ने कहा है कि मस्जिद के लिए जमीन के बारे में वह 17 नवंबर की बैठक में फैसला करेगा। इस बीच यह भी खबर आई की मस्जिद के लिए जमीन अयोध्या से सटे सहनवा गॉंव में दी जा सकती है। यही बाबरी मस्जिद बनाने वाले बाबर का सेनापति मीर बाकी दफ़न है।

अब अयोध्या मामले के याचिकाकर्ताओं में से एक इकबाल अंसारी इकबाल का बयान सामने आया है। इकबाल अंसारी ने कुछ स्थानीय मुस्लिम नेताओं के साथ मिलकर माँग की है कि सुप्रीम कोर्ट ने जो 5 एकड़ जमीन मस्जिद के लिए देने को कहा है वह अयोध्या में अधिग्रहित 67 एकड़ जमीन में से ही सरकार दे।

अंसारी ने कहा, “अगर सरकार जमीन देना चाहती है तो हमें हमारी सुविधा के हिसाब से मिलनी चाहिए। आवंटित जमीन 67 एकड़ जमीन में से ही होनी चाहिए। तभी हम यह जमीन लेंगे। नहीं तो हम जमीन लेने की पेशकश को ठुकरा देंगे। लोग कह रहे हैं कि 14 कोस से बाहर जाकर मस्जिद बनाओ, यह उचित नहीं है।”

स्थानीय मौलवी मौलाना जलाल अशरफ ने कहा कि मुस्लिम मस्जिद बनाने के लिये खुद जमीन खरीद सकते हैं और उसके लिए सरकार पर निर्भर नहीं हैं। उन्होंने कहा, “अदालत या सरकार हमारी संवेदनाओं को कुछ हद तक शांत करना चाहती है तो 5 एकड़ जमीन अधिग्रहित इलाके में ही मिलनी चाहिए, क्योंकि 18 वीं शताब्दी के सूबे के संत क़ाज़ी कुद्दत सहित कई दरगाह और कब्रिस्तान इसी क्षेत्र में हैं।”

मुस्लिम पक्ष की तरफ से एक अन्य याचिकाकर्ता हाजी महबूब ने कहा, “हम इस झुनझुने को स्वीकार नहीं करेंगे। उन्हें निश्चित रूप से यह स्पष्ट करना चाहिए कि वो हमें कहाँ जमीन देना चाहते हैं।” अयोध्या नगर निगम में पार्षद हाजी असद अहमद ने कहा, “अगर अदालत या सरकार मस्जिद के लिए जमीन देना चाहती है तो उन्हें इसे अधिग्रहित 67 एकड़ जमीन में से ही देना चाहिए, अन्यथा हमें दान नहीं चाहिए।”

जमीयत उलेमा हिंद के अयोध्या प्रमुख मौलाना बी. खान ने कहा कि मुस्लिम पक्ष बाबरी मस्जिद के लिए लड़ रहा था न कि किसी दूसरी जमीन के लिए। उन्होंने कहा, “हमें मस्जिद के लिए कहीं और जमीन नहीं चाहिए। इसके बजाए हम यह जमीन भी राम मंदिर के लिए दे दें।”

सामाजिक कार्यकर्ता यूसुफ खान ने कहा कि यह मामला उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद बंद हो गया है और मस्जिद के लिए अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने कहा, “अयोध्या में हमारी धार्मिक जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त मस्जिदें हैं। शीर्ष अदालत ने राम मंदिर के पक्ष में अपना फैसला दिया है। यह मामला अब बंद हो चुका है।”

रामलला के 92 वर्षीय वकील के बेटे ने रामसेतु पर मनमोहन सरकार की पैरवी से कर दिया था इनकार

राम मंदिर मामले में रामलला विराजमान के 92 वर्षीय वकील के. पराशरण काफ़ी चर्चा में हैं। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण होते देखना उनकी अंतिम इच्छा थी, जिसके लिए उन्होंने इस उम्र में भी अदालत में घंटों खड़े होकर बहस की। जजों ने उन्हें बैठ कर जिरह करने की छूट दी, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया था। के. पराशरण की तरह ही उनके बेटे मोहन पराशरण भी एक सिद्धहस्त वकील हैं। वो भी अपने पिता की तरह भारत के सॉलिसिटर जनरल रह चुके हैं। उन्हें भी अपने पिता की ही तरह कई बड़े केस को सफलतापूर्वक हैंडल करने का अनुभव है।

मोहन पराशरण यूपीए काल में भारत के सॉलिसिटर जनरल थे। उन्होंने रामसेतु मामले में सरकार की पैरवी करने से इनकार कर दिया था। डॉक्टर मनमोहन सिंह की सरकार ने सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट पर क़दम बढ़ाने का निर्णय लिया था। इससे हिन्दुओं की आस्था पर चोट पहुँची, जो रामसेतु को किसी भी तरह का नुकसान होते नहीं देखना चाहते थे। भारी विरोध-प्रदर्शन हुआ। ‘राम ने कौन सी इंजीनियरिंग कॉलेज से डिग्री ली थी?’ पूछने वाले तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री एम करुणानिधि इस प्रोजेक्ट के पक्के समर्थक थे। केंद्र सरकार ने तो अदालत में एफिडेविट तक दे दिया था कि राम का कोई अस्तित्व ही नहीं है।

ऐसे में, मोहन पराशरण को सरकार की तरफ़ से ये केस लड़ना था, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। मोहन ने कहा कि जिस पवित्र रामसेतु पर कभी भगवान के चरण पड़े थे, उसके ख़िलाफ़ मैं कैसे केस लड़ सकता हूँ? सितम्बर 2013 में मोहन पराशरण ने कहा था कि चूँकि वो उसी इलाक़े से आते हैं, वो इस केस से ख़ुद को अलग कर रहे हैं। मोहन ने कहा था कि संविधान उन्हें अलग राय रखने की अनुमति देता है। ये भी जानने लायक बात है कि उस वक़्त उनके पिता के. पराशरण ही सेतुसमुद्रम के ख़िलाफ़ याचिकाकर्ताओं का केस लड़ रहे थे। मोहन ने कहा था कि उन्होंने जितनी जल्दी हो सके, सरकार को अपने रुख से अवगत कराने की कोशिश की।

मोहन पराशरण की माँग थी कि ऐसे किसी केस में लोगों की राय ज़रूर जाननी चाहिए। उन्होंने सरकार से कहा था कि इस केस में भी अयोध्या मामले की तरह ही स्थानीय लोगों की भावनाओं का ख्याल रखा जाना चाहिए। मोहन पराशरण ने उस दौरान नासा का जिक्र करते हुए सरकार के ख़िलाफ़ स्टैंड लिया था और कहा था कि अमेरिकी स्पेस एजेंसी भी मान चुकी है कि रामसेतु का अस्तित्व है। उन्होंने तत्कालीन यूपीए सरकार को कड़ा सन्देश देते हुए उसे बता दिया था कि रामसेतु पर उसका स्टैंड सही नहीं है। यूपीए सरकार ने पर्यावरण सम्बन्धी चिंताओं को भी ख़ारिज कर दिया था और कहा था कि इस प्रोजेक्ट से आर्थिक विकास में तेज़ी आएगी।

उस समय भी भाजपा इस प्रोजेक्ट के ख़िलाफ़ थी। सरकारी पद पर रहते हुए भी मोहन पराशरण ने सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट पर यूपीए सरकार की तरफ़ से पैरवी करने से ख़ुद को अलग कर लिया था और करोड़ों हिन्दुओं की भावनाओं का सम्मान किया था। आज उनके पिता ने इस उम्र में भी राम मंदिर के लिए सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ा और सफल हुए। दोनों पिता-पुत्र धर्म और लोगों की भावनाओं को लेकर ख़ासे सजग रहते हैं, भले ही इसके लिए उन्हें कोई नुकसान ही क्यों न उठाना पड़े। तभी तो मोहन ने पूछा था- “मैं श्रीराम में विश्वास रखता हूँ। फिर भला कैसे उनके द्वारा बनाए गए सेतु को तोड़ने के लिए अदालत में सरकार की पैरवी करूँ? नहीं। ये मुझसे नहीं हो सकता।“

कश्मीरियों को नमाज नहीं पढ़ने दिया जा रहा: NDTV की निधि राजदान और Pak चैनलों ने फैलाया झूठ

एनडीटीवी की पत्रकार निधि राजदान ने जम्मू-कश्मीर पर एक बार फिर से पाकिस्तान के एजेंडे को आगे बढ़ाया है। उन्होंने भारत सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए हजरतबल दरगाह को लेकर पाकिस्तानी नैरेटिव को आगे बढ़ाया। उन्होंने ट्विटर पर लिखा कि शायद यह पहली बार है जब श्रीनगर स्थित हजरतबल दरगाह में मुस्लिमों को नमाज पढ़ने के लिए पाबन्दी का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने ईद-ए-मिलाद को लेकर ऐसा कहा। निधि ने लिखा कि अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए 3 महीना हो गया, भयंकर ठंडी भी आ गई है, लेकिन जमीनी स्थिति ऐसी है कि लोगों को नमाज़ पढ़ने से भी रोका जा रहा है।

निधि राजदान ने सरकार पर एसएमएस सर्विस रोकने का भी आरोप लगाया। निधि ने ‘द कश्मीर वाला’ के संपादक फहद शाह के आरोपों को ट्वीट करते हुए ऐसा कहा। शाह ने ‘द ट्रिब्यून’ की एक ख़बर शेयर की थी, जिसमें एक अनाम वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि हजरतबल दरगाह पर केवल आसपास के लोगों को ही नमाज़ पढ़ने की इजाजत दी जाएगी और बड़ी संख्या में लोगों को कहीं भी एकत्रित नहीं होने दिया जाएगा। निधि ने इस ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा कि कश्मीरियों को बाकी भारतीय नागरिकों जैसे अधिकार नहीं मिल रहे।

निधि ने सरकार पर संचार-व्यवस्था ठप्प करने का आरोप लगाया। उन्होंने हिरासत में रखे गए या गिरफ़्तार किए गए कश्मीरी नेताओं को छोड़ने की पैरवी करते हुए लिखा कि इससे घाटी में लोकतंत्र बहाल होगा। इसके बाद कई लोगों ने निधि को आइना दिखाया और सच्चाई से वाकिफ कराया। पत्रकार आरती टीकू सिंह ने लिखा कि मीडिया का एक धड़ा दुष्प्रचार कर रहा है कि हजरतबल दरगाह पर मुस्लिमों को नमाज नहीं पढ़ने दिया जा रहा। उन्होंने एक वीडियो ट्वीट किया, जिसमें सैकड़ों लोग दरगाह के पास नमाज पढ़ते दिख रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान द्वारा ऐसा झूठ फैलाया जा रहा है।

श्रीनगर के डीएम शाहिद चौधरी ने ख़ुद कई ऐसे फोटो शेयर किए, जिसमें लोग दरगाह के पास इकट्ठे होकर ईद-उल-मिलाद मनाते दिख रहे हैं। इन लोगों ने वहाँ नमाज पढ़ी और वहाँ के इमाम भी इसमें सम्मिलित हुए। इन फोटोग्राफ्स के साथ ही निधि राजदान के झूठ का पर्दाफाश हो गया। अपना झूठ पकड़े जाने के बाद निधि ने ख़ुद का बचाव करने की असफल कोशिश की। उन्होंने लिखा कि वो बस ख़बरों को ट्वीट कर रही थीं। कुछ ऐसा ही झूठ पाकिस्तान के कई मीडिया चैनलों पर भी चलाया जा रहा है।

इससे पहले निधि राजदान लंदन में एक ऐसे कार्यक्रम में शामिल हुई थीं, जिसमें जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत को भला-बुरा कहा गया। जेकेएलएफ ने इस कार्यक्रम के आयोजन के लिए इसके आयोजकों व अतिथियों की प्रशंसा की थी। इस कार्यक्रम में निधि राजदान ने आरोप लगाया कि भारत ने अनुच्छेद 370 को लेकर कश्मीरी जनता की राय नहीं ली और पूरे राज्य में संचार- व्यवस्था ठप्प कर दी गई है। निधि राजदान ने कहा कि भारत दावा करता है कि यह सब जम्मू-कश्मीर के भले के लिए है। एनडीटीवी इससे पहले भी जम्मू-कश्मीर को लेकर प्रोपगेंडा फैलाता रहा है।

2600 खाते, ₹300 करोड़: स्विस बैंकों में भारतीयों के खातों का ‘वारिस’ नहीं, सरकार को मिल सकता है जमा धन

साल 2014 में भारत में आम चुनावों से पहले स्विस बैंक में जमा काले धन के मामले ने काफी तूल पकड़ा था। कुछ समय बाद स्विट्जरलैंड सरकार ने वैश्विक दबाव के चलते साल 2015 में निष्क्रिय खातों की जानकारी को सार्वजनिक करना शुरू कर दिया था। इस दौरान स्विस बैंक ने नीति बनाई थी कि खातों के दावेदारों को उसमें मौजूद धन हासिल करने के लिए आवश्यक प्रमाण उपलब्ध कराने होंगे। हालिया ख़बरों के मुताबिक स्विट्जरलैंड के बैंकों में भारतीयों के करीब 12 निष्क्रिय खातों के लिए कोई दावेदार सामने नहीं आया है। आशंका जताई जा रही है कि इन खातों में पड़े पैसे स्विट्जरलैंड सरकार को स्थानांतरित किए जा सकते हैं।

इनमें से कुछ खाते भारतीय निवासियों और ब्रिटिश राज के दौर के नागरिकों से जुड़े हैं। स्विस बैंक के पास मौजूद आँकड़ों के अनुसार पिछले 6 साल में इनके खातों पर किसी ‘वारिस’ ने सफलतापूर्वक दावा नहीं किया है। बताया जा रहा है कि इनमें से कुछ खातों के लिए दावा करने की अवधि अगले माह ही समाप्त हो जाएगी। वहीं कुछ अन्य खातों पर 2020 के अंत तक दावा किया जा सकता है।

इस पूरे मामले में खास बात है कि निष्क्रिय खातों में से पाकिस्तानी निवासियों से संबंधित कुछ खातों पर भी दावा किया गया है। इसके अलावा खुद स्विट्जरलैंड ने अपने देश सहित कई और देशों के निवासियों के खातों पर भी दावा किया है।

बता दें, साल 2015 में पहली बार स्विट्जरलैंड बैंक द्वारा इस तरह के खातों को सार्वजनिक किया गया था। जिसके बाद मालूम चला था कि स्विस बैंक में इस तरह के करीब 2,600 खाते हैं, जिनमें 4.5 करोड़ स्विस फ्रैंक या करीब 300 करोड़ रुपये की राशि पड़ी है। खबरों के अनुसार 1955 से इस राशि पर दावा नहीं किया गया है।

इस सूची को सर्वप्रथम सार्वजनिक किए जाते समय करीब 80 सुरक्षा जमा बॉक्स थे। लेकिन स्विस बैंकिंग कानून के तहत इस सूची में हर साल नए खाते जुड़ रहे हैं। ताजा जानकारी के अनुसार इन खातों की संख्या करीब 3,500 हो गई है।

गौरतलब है कि 2014 के बाद से शुरू हुई भारतीय राजनीति में स्विस बैंक में जमा बेहिसाब धन बड़ी बहस का हिस्सा रहा है। कहा जाता है कि पहले की सरकारों ने स्विट्जरलैंड के बैंक खातों में अपना अथाह धन रखा है।

ऐसे में लगातार सवालों के घेरे में आने के बाद और वैश्विक दवाब के कारण कुछ समय पहले ही स्विट्जरलैंड ने अपनी बैंकिंग प्रणाली को नियामकीय जाँच के लिए खोला है। साथ ही भारत सहित विभिन्न देशों के साथ वित्तीय मामलों पर सूचनाओं के स्वत: आदान-प्रदान के लिए समझौता भी किया है। जिसके मद्देनजर ही भारत सरकार को हाल में विदेशी बैंकों में जमा काले धन को लेकर बड़ी कामयाबी हाथ लगी थी। स्विट्जरलैंड सरकार ने भारत को स्विस बैंक में भारतीय खातों की पहली सूची दी थी। भारत उन चुनिंदा देशों में से एक है जिसे स्विस बैंक से जुड़ी जानकारी मिली है।

स्विट्जरलैंड के टैक्स विभाग द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक भारत सरकार को दूसरी सूची सितंबर 2020 में मिलेगी। फिलहाल इस समय स्विट्जरलैंड में दुनिया के 75 देशों के करीब 31 लाख खाते हैं जो कि निशाने पर हैं। इनमें भारत के भी कई खाते शामिल हैं। 

कॉन्गेस नेता ने कहा- शिवसेना का हो सकता है CM, पवार बोले- मुझे नहीं पता

महाराष्ट्र में तेज़ी से बदलते सियासी घटनाक्रम के बीच अब सरकार गठन की ज़िम्मेदारी राज्य की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) पर आ गई है। NCP को आज शाम साढ़े आठ बजे तक का वक्त दिया गया है। फ़िलहाल, NCP और कॉन्ग्रेस ने शिवसेना के साथ सरकार बनाने को लेकर आधिकारिक रूप से कोई बयान नहीं दिया है।

इस बीच, महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के नेता कगडा चंड्या पडवी (केसी पडवी) का बयान आया है कि बातचीत की प्रक्रिया चल रही है। इसका अंत सुखद होगा। उन्होंने कहा, “व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि तीनों पार्टियाँ (शिवसेना-कॉन्ग्रेस-NCP) सरकार का गठन करेंगी और शिवसेना का नेता मुख्यमंत्री होगा।”

वहीं, NCP अध्यक्ष शरद पवार से जब पूछा गया कि क्या कॉन्ग्रेस और NCP के बीच कोई बैठक होनी है तो उन्होंने कहा, “कौन कहता है कि कोई बैठक है? मुझे नहीं पता।”

इससे पहले, NCP नेता अजीत पवार राज्यपाल से मुलाक़ात कर चुके हैं। मुलाक़ात के बाद उन्होंने कहा था कि NCP, कॉन्ग्रेस और शिवसेना अगर मिल जाएँ तो राज्य में सरकार बनाई जा सकती है।

इससे पहले मीडिया के सामने बहुमत का दावा करने के वाली शिवसेना ने सोमवार शाम को राज्यपाल से 3 दिनों का अतिरिक्त वक़्त माँगा था। आदित्य ठाकरे के नेतृत्व में राजभवन पहुँचे शिवसेना नेताओं को राज्यपाल ने अतिरिक्त वक़्त देने से इनकार कर दिया। शिवसेना बहुमत के लिए ज़रूरी विधायकों के समर्थन का पत्र नहीं दे पाई।

इसके अलावा, NCP नेता जयंत पाटिल ने कहा था कि NCP नेताओं ने राज्यपाल से है कहा कि वो अपने साथी दलों से बात करउन्हें जवाब देंगे। सोमवार को उद्धव ठाकरे और शरद पवार की मुलाक़ात भी हुई थी। उद्धव की कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से भी फोन पर बात हुई। लेकिन, शिवसेना को समर्थन पत्र हासिल करने में कामयाबी नहीं मिल पाई।

उधर, भाजपा की भी कोर टीम की बैठक हुई। बैठक ख़त्म होने के बाद भाजपा नेता सुधीर मुनगंटीवार ने कहा कि उनकी पार्टी अभी ‘वेट एंड वाच’ की रणनीति पर काम कर रही है। इस बैठक में महाराष्ट्र के ताज़ा राजनीतिक परिदृश्य पर चर्चा हुई।

ग़ौरतलब है कि 288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में भाजपा को 105, शिवसेना को 56, कॉन्ग्रेस को 44 और एनसीपी को 54 सीटें मिली है। भाजपा-शिवसेना और कॉन्ग्रेस-एनसीपी ने मिलकर चुनाव लड़ा था। लेकिन, नतीजों के बाद शिवसेना ढाई साल के लिए सीएम का पद मॉंग रही थी जिसे भाजपा ने ठुकरा दिया। रविवार को भाजपा ने गवर्नर से कहा कि वह सरकार नहीं बनाएगी। इसके बाद राज्यपाल ने शिवसेना को न्योता दिया था।

रामलला ​ही रहे विराजमान… क्योंकि गुरु नानक देव भी कभी गए थे अयोध्या

क़ानूनी रूप से राम मंदिर का निर्माण प्रशस्त होने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के उन पहलुओं पर ध्यान देना ज़रूरी है, जो आपको इतिहास में पीछे ले जाकर यह बताएगा कि सारी चीजें सार्वजनिक रूप से ज्ञात थीं लेकिन फिर भी मामले को अटकाने, लटकाने और भटकाने की कोशिशें जारी थीं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम निर्णय में कहा कि मंदिर वहीं बनेगा और मस्जिद कहीं और बनेगा। मस्जिद के लिए अयोध्या में ही किसी और जगह पर 5 एकड़ ज़मीन मुहैया कराने का आदेश दिया गया। सीजेआई गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 सदस्यीय पीठ ने यह माना कि मुस्लिम पक्ष राम जन्मभूमि पर अपना एक्सक्लूसिव स्वामित्व नहीं साबित कर पाया।

यह भी एक संयोग ही था कि जिस दिन राम मंदिर पर फ़ैसला आया, उसी दिन करतारपुर साहिब कॉरिडोर का उद्घाटन भी हुआ। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पूर्व पीएम मनमोहन सिंह और पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह सम्मिलित हुए। करतारपुर कई वर्षों तक सिखों के प्रथम गुरु नानक देव जी का निवास स्थान रहा है। उन्होंने वहाँ 18 वर्ष गुजारे थे। ऐसे में, सिखों के लिए यह ख़ुशी का क्षण रहा क्योंकि जिस पवित्र स्थल को वो सीमा के इस पार से देख कर ही संतोष कर लेते थे, अब वहाँ जाकर दर्शन करने का भी सौभाग्य प्राप्त होगा।

इन सबके बीच राम मंदिर मामले में भी गुरु नानक देव जी का जिक्र आया। अयोध्या फ़ैसले की जो कॉपी है, उसमें पृष्ठ संख्या 991-995 में सिखों के प्रथम गुरु का जिक्र किया गया है। एक तरह से ये प्रमुख आधार रहा, जिसका संज्ञान लेते हुए अदालत ने यह माना कि बाबर के आक्रमण से वर्षों पहले भी अयोध्या एक तीर्थस्थल था और वहाँ पूजा-पाठ होते थे। दरअसल, सुनवाई के दौरान राजिंदर सिंह नामक वकील कोर्ट में पेश हुए थे, जो सिख इतिहासकार हैं और सिख साहित्यों के बड़े विद्वान भी हैं। उन्होंने सिख साहित्यों के आधार पर यह साबित किया कि गुरु नानक देव 1510 में भगवान श्रीराम का दर्शन करने गए थे।

गुरु नानक देव जी ने सं 1510-1511 में अयोध्या में भगवान श्रीराम का दर्शन किया था। गुरु नानक देव सं 1507 (विक्रम संवत 1564) में भद्रपद पूर्णिमा के दिन तीर्थाटन के लिए निकले थे। उससे पहले उन्हें भगवान का साक्षात्कार हो चुका था। उसके बाद वो दिल्ली से हरिद्वार और सुल्तानपुर होते हुए अयोध्या पहुँचे। उनका ये तीर्थाटन 3-4 सालों तक चला। वो 1510-11 (विक्रम संवत 1567-68) में अयोध्या पहुँचे। सुप्रीम कोर्ट ने इस ओर ध्यान दिलाया है कि जब उनका ये दौरा हुआ, तब तक बाबर ने भारत पर आक्रमण नहीं किया था। राजिंदर सिंह ने सिखों के पवित्र साहित्य ‘जन्म साखी’ को सबूत के रूप में पेश कर बताया कि गुरु नानक देव ने भगवान राम का दर्शन किया था।

सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट का वो हिस्सा, जिसमें गुरु नानक देव जी के अयोध्या दर्शन का जिक्र है

इलाहबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले में भी जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने ‘जन्म साखी’ का जिक्र करते हुए इस घटना की तरफ़ ध्यान दिलाया था। राजिंदर सिंह ने ‘आदि साखी’, ‘पुरातन जन्म साखी’, ‘पोढ़ी जन्म साखी’ और ‘गुरु नानक वंश प्रकाश’ जैसे पवित्र पुस्तकों का जिक्र करते हुए अपनी बात का सबूत पेश किया। यह भी पता चला कि बाद के दिनों में गुरु तेग बहादुर और गुरु गोविन्द सिंह भी भगवान श्रीराम का दर्शन करने अयोध्या पहुँचे थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि गुर नानक देव द्वारा वहाँ जाकर दर्शन करना हिन्दुओं की आस्था और विश्वास पर मुहर लगाता है। कोर्ट ने माना है कि बाबर के आक्रमण से पहले के कई धार्मिक दस्तावेज मौजूद हैं, जो जन्मभूमि की बात का समर्थन करते हैं।

यहाँ एक और घटना का याद दिलाना ज़रूरी है, जो निहंग सिखों को लेकर है। नवम्बर 30, 1858 को अवध के थानेदार ने एक एफआईआर दर्ज की थी, जिसमें उसने कहा था कि 25 सिख राम जन्मभूमि में घुस आए और उन्होंने गुरु गोविन्द सिंह का हवन किया। इन सिखों ने वहाँ की दीवारों पर ‘राम-राम’ लिखा और कई धार्मिक प्रक्रियाएँ पूरी करते हुए पूजा-पाठ भी किया। यह बताता है कि यह आंदोलन सिर्फ़ हिन्दुओं का नहीं था बल्कि पूरा भारत इससे जुड़ा हुआ था। निहंग सिखों की कहानी गुरु गोविंद सिंह और उनके पुत्रों के बलिदान तक जाती है। निहंग सिख संख्याबल में कम होने बावजूद दुश्मन को नाकों चने चबवाने वाले इतिहास के कारण विख्यात हैं।

यह सब बताता है कि अयोध्या विवाद को जबरदस्ती लम्बा खींचा जा रहा था जबकि सारी चीजें पब्लिक डोमेन में पहले से ही थीं। गुरु नानक देव द्वारा वहाँ दर्शन करना और फिर निहंग सिखों द्वारा जन्मभूमि में राम की आराधना करने से यह पता चला है कि राम जन्मभूमि से भारत के लोगों की भावनाएँ जुड़ी थीं, सिर्फ़ हिन्दुओं की नहीं।

हर घर से 1 शिला, 1 मुट्ठी मिट्टी और 11 रुपए: जहाँ सीता ने ली थी भू-समाधि वहाँ बनेगा भव्य मंदिर

अयोध्या में राम मंदिर का रास्ता साफ होने के साथ ही पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में सीता माता का मंदिर बनाए जाने की बात सामने आई है। सीता की भू-समाधि वाले स्थान के रूप में प्रख्यात उत्तराखंड के पौड़ी जिले के फलस्वाड़ी गाँव में एक भव्य मंदिर बनाया जाएगा। प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने पौड़ी में आयोजित शरदोत्सव में बतौर मुख्य अतिथि अपने संबोधन में कहा कि प्रस्तावित सीता माता सर्किट, पौड़ी के विकास में मील का पत्थर साबित होगा।

इस पर काम भी शुरू कर दिया गया है। मुख्यमंत्री का कहना है कि इस सर्किट के विकास से दुनिया का हर वह व्यक्ति जिसकी भगवान राम और माता सीता में आस्था है, फलस्वाड़ी गाँव में ज़रूर आना चाहेगा, जहाँ माता सीता ने भू-समाधि ली थी। उन्होंने आह्वान किया है कि फलस्वाड़ी में माता सीता का भव्य मंदिर बने, इसके लिए क्षेत्र के हर गाँव-हर घर से एक शिला (पत्थर), एक मुट्ठी मिट्टी और 11 रुपए दान लिया जाएगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि इसके लिए जल्द ही यात्रा की जाएगी। वे स्वयं देवप्रयाग से यह यात्रा करेंगे। संत-महात्माओं ने भी इसमें शामिल होने की इच्छा व्यक्त की है। इस यात्रा में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ भी साथ होंगे। मुख्यमंत्री ने त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कहा कि जिले के कोट ब्लॉक के फलस्वाड़ी गाँव स्थित सीता माता मंदिर को सीता सर्किट के रुप में विकसित करने की कार्ययोजना तैयार की गई है। सर्किट में फलस्वाड़ी के सीता माता मंदिर, कोटसाड़ा के महर्षि वाल्मीकि मंदिर, देवल गांव स्थित श्री लक्ष्मण मंदिर समूह, विदाकोटी व देवप्रयाग स्थित श्री रघुनाथ मंदिर को जोड़ने की योजना है।

बता दें कि जैसे श्रीराम को पुरुषों में उत्तम कहा गया है, उसी तरह माता सीता को भी महिलाओं में सबसे उत्तम माना जाता है। माता सीता मिथिला के राजा जनक की पुत्री थीं इसलिए उन्हें ‘जानकी’ भी कहा जाता है। वनवास भगवान राम को मिला था, लेकिन बचपन से महलों में पली-बढ़ी माता सीता ने अपना पतिव्रत धर्म निभाने के लिए महलों के सारे सुख, धन और वैभव को छोड़ कर पति के साथ वन के लिए चल दीं। 14 वर्ष का वनवास काटा। रावण द्वारा हरण के बाद उन्हें अग्नि परीक्षा भी देनी पड़ी।

पौराणिक और आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम के माता सीता को त्यागने के बाद लक्ष्मण उन्हें विदाकोटी में छोड़ वापस अयोध्या लौट गए थे। कोटसाड़ा गाँव स्थित महर्षि वाल्मीकि ने सीता माता को अपने आश्रम में रखा था। जब भगवान राम ने माता सीता की पवित्रता पर संशय व्यक्त किया तो माता सीता ने हाथ जोड़कर नीचे मुख करके बोलीं, “हे धरती माँ, यदि मैं पवित्र हूँ तो धरती फट जाए और मैं उसमें समा जाऊँ।” सीता के यह कहते ही नागों पर रखा एक सिंहासन पृथ्वी फाड़कर बाहर निकला। सिंहासन पर पृथ्वी देवी बैठी थीं। उन्होंने सीता को गोद में बैठा लिया। माता सीता के बैठते ही वह सिंहासन धरती में धँसने लगा और सीता माता धरती में समा गईं।