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अयोध्या में राम मंदिर के पक्ष में फैसला ‘सेक्युलर राजनीति’ के लिए परीक्षा की घड़ी: योगेंद्र यादव

अपने तोड़ मरोड़ से भरे हुए लेख में योगेंद्र यादव, जिन्हें पहले पोलिटिकल साइंस में अपने काम के लिए जाना जाता था, ने अपनी बौद्धिकता की चरम सीमा से आगे जाते हुए कहा है कि राम मंदिर कुछ अन्य महत्वपूर्ण प्रस्तावों के साथ भारत में सेक्युलर पॉलिटिक्स की परीक्षा होगा। मैं दंग रह गई जब मैंने यह हैडलाइन पढ़ी, और इस लेख को पढ़ने का निश्चय केवल इसके लिए किया कि कहीं यह क्लिकबेट न हो। और वह नहीं था! एक समय ‘पोलिटिकल साइंटिस्ट’ कहे जाने वाले व्यक्ति ने सच में ऐसा कहा था।

लेकिन इस पर दोबारा सोचने पर, एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर जिसे अकादमिक दुनिया को अंदर से जानने का मौका मिला है, मुझे आश्चर्य नहीं होता कि योगेंद्र यादव को ऐसा विश्वास है कि हिन्दुओं और राम मंदिर के पक्ष में कोई भी फैसला सेक्युलर नहीं होगा। उनकी बौद्धिक धोखेबाजी यहीं नहीं रूकती। उनकी राय है कि एनआरसी और यूसीसी (यूनिफॉर्म सिविल कोड), केंद्रीय मतांतरण विरोधी कानून और नागरिकता संशोधन विधेयक जैसे कानूनों को को भी ‘ग्रेडेड रिस्पांस’ (सधी प्रतिक्रिया) मिलनी चाहिए न कि एकमत समर्थन।

उनकी स्थिति से पता चलता है कि नेहरूवादी सेक्युलरिज़्म में दो परेशानियाँ हैं। एक, कोई भी निर्णय जो बहुसंख्यक समुदाय की भावनाओं का पक्ष दूर-दूर तक ले (जरूरी नहीं कि अल्पसंख्यकों का अपमान कर के) वह सेक्युलर नहीं हो सकता। दूसरा, भारत की विज़न एक बहस तक सीमित है जहाँ अल्पसंख्यकों की भावनाएँ कैनवास का इकलौता रंग हैं; हर तर्क या तो उनके खिलाफ है या उनके पक्ष में। मैं ऐसी दृष्टि के खिलाफ हूँ, क्योंकि मैं भी अल्पसंख्यकों की तरह मिट्टी की बेटी हूँ, और मैं भी अपनी राय और अधिकार रखने के लायक हूँ।

राम मंदिर: हिन्दू अभिव्यक्ति, मुस्लिमों का अपमान नहीं है

राम मंदिर के पक्ष में कोई भी फैसला केवल एक कारण के चलते माइनॉरिटी विरोधी रूप में बेशक नहीं देखा जाना चाहिए, और योगेंद्र यादव ऐसा कर के गलती कर रहे हैं। अयोध्या मुस्लिमों के मक्का की तरह है। यह एएसआई की रिपोर्ट में स्थापित हो चुका है कि वहाँ पर पहले एक भव्य हिन्दू मंदिर था और उसे तोड़कर ही मस्जिद बनाई गई। किसी भी श्रद्धालु समुदाय की तरह हिन्दू मंदिर का पुनर्निर्माण चाहते हैं अब, जब देश राजशाही और अधिनायकवादी शासन से आज़ाद है। हिन्दुओं के पक्ष में निर्णय मुस्लिमों के खिलाफ नहीं होगा, क्योंकि मुस्लिमों में से एक प्रेरित तबका ही इस मुद्दे का इस्तेमाल भावनाएँ भड़काने में कर रहा है। क्षेत्र में छोटी मुस्लिम जनसंख्या के साथ स्थानीय मुस्लिम समुदाय से कभी मस्जिद के लिए होहल्ला नहीं रहा। राम मंदिर के लिए आवाज़, दूसरी ओर, बहुंसख्यक समुदाय के पूरे सामाजिक-सांस्कृतिक मेल में से आती रही है, भारत के भीतर भी और बाहर भी।

दुर्भाग्यपूर्ण रूप से सैकड़ों सालों तक बहुंसख्यकों की कंडीशनिंग के चलते उन्हें लगता है कि अपनी सांस्कृतिक प्रथाओं की कोई अभिव्यक्ति अल्पसंख्यकों का अपमान है। लेकिन यह तुलना गलत है। भारत बहुंसख्यक और अल्पसंख्यक दोनों समुदायों का है। यह किसी एक का अधिक और दूसरे का कम नहीं है। अतः इसका कोई कारण नहीं है कि बहुंसख्यकों को अपने होने भर से शर्मिंदा होना पड़े।

योगेंद्र यादव के लिए अल्पसंख्यकों के खिलाफ और उनके पक्ष में

भारत एक विभिन्नता वाला देश है जिसे सदियों से एक सूत्र में “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” पिरोता है। ऐसे देश में कोई सेक्युलरिज़्म के विचार को एक ही रंग में कैसे पेंट कर सकता है और बहुसंख्यकों के गुणों को क्रूर और सेक्युलरता के खिलाफ बता सकता है?

तीनों ही प्रस्ताव यूसीसी (यूनिफॉर्म सिविल कोड), केंद्रीय मतांतरण विरोधी कानून और नागरिकता संशोधन विधेयक अल्पसंख्यकों के खिलाफ बताए जा रहे हैं उनके द्वारा जिनके छिपे हित सामाजिक अस्थिरता, डेमोग्राफिक असंतुलन, सीमा पार घुसपैठ से जुड़े हुए हैं। इसके उलट ये तीनों ही प्रस्ताव देश के सेक्युलर परिचय को संरक्षित करते हैं।

  • यूसीसी सभी समुदायों पर प्रभाव डालता है, उन्हें फायदा पहुँचाता है और उनके बीच वैमनस्य को दबाता है। यह किसी भी एक समुदाय के पक्ष या विपक्ष में नहीं है।
  • मतांतरण विरोधी कानून किसी भी समुदाय से जबरिया मतांतरण पर रोक लगाएगा, जो एवंजेलिस्म और पैसे के लालच से होता है। यूसीसी की तरह यह भी सब पर लागू होगा। इसे अल्पसंख्यकों के खिलाफ बताने वाला ऐसे निर्णय की ओर इशारा कर रहा है जो अल्पसंख्यकों को असहज कर के छोड़ेगा।
  • नागरिकता संशोधन विधेयक हिन्दुओं, सिखों, बौद्धों, जैनों, पारसियों या ईसाइयों को अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आने पर शरण और भारत की नागरिकता देगा। इससे भी भारत के अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर कोई आँच नहीं आएगी।

भारत में सेक्युलरिज़्म ने समय-समय पर परीक्षा दी है और लम्बे समय तक हमले झेले हैं। यह किसी एक फैसले का मोहताज नहीं है। लेकिन यह साफ है कि योगेंद्र यादव जैसे कई सारे ‘बौद्धिक धोखेबाज’ और ‘संदिग्ध विश्लेषकों’ का खुलासा हो चुका है। जो केवल एक हिन्दू-समर्थक फैसले की आहट भर से आहत हैं।

समय आ गया है कि पोलिटिकल साइंटिस्ट का ढोंग करने वाले प्रोपेगंडाबाजों को मान लेना चाहिए कि बहुंसख्यकों की प्रकृति ही सेक्युलर मानी जाती है। अनगिनत पंथों में फैले हुए हिन्दू धर्म ने हमेशा आस्था, विचारधारा, पंथ और मान्यताओं के लिए छतरी का काम किया है। जबकि नव-सेक्युलरिज़्म एक भंगुर सिद्धांत है, प्रोपेगंडा और दोहरेपन की अवधारणाओं की दया पर खड़ा हुआ, वह आस्थाओं के बीच की बहुंसख्यकों की संस्कृति है, जो उन्हें स्वीकार करने और गले लगाने का धैर्य देती है।

(मूलतः अंग्रेजी में प्रकाशित इस लेख का हिन्दू अनुवाद मृणाल प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव ने किया है।)

13 साल की उम्र में ISIS ने अगवा करके बनाया सेक्स स्लेव: फिर बार-बार हुआ बलात्कार

मात्र 13 साल की उम्र थी इमान अब्दुल्लाह की जब ISIS के आतंकियों ने उन्हें अगवा किया और फिर सेक्स स्लेव बनाकर बार-बार बेचते रहे। इस बीच कई वहशियों ने उनपर अपनी दरिंदगी दिखाई और अनगिनत बार उनका बलात्कार हुआ। ये क्रम इमान के साथ तब तक चला जब तक राहतकर्ताओं ने उन्हें आतंकियों की जकड़ से छुड़वाकर उनके परिवार से नहीं मिलवाया।

इराक के अल्पसंख्यक समुदाय यजीदी से आने वाली इमान ने मुंबई दौरे के दौरान अपने जीवन के उन दर्दनाक पलों की हकीकत को बयान करते हुए मंगलवार को पत्रकारों से बात की। यहाँ उन्हें और उनके कुछ साथियों को हार्मनी फाउंडेशन के वार्षिक मदर टेरेसा पुरस्कार से सम्मानित करने के लिए आमंत्रिण किया गया था।

इस दौरान उन्होंने ISIS की ऐसी दरिंदगी का खुलासा किया, जिसे सोचकर भी आम इंसान की रूह काँप जाए। इमान ने बताया कि ISIS के आतंकियों ने न केवल उनके समुदाय (यजीदी) की लड़कियों को अगुआ करके सेक्स स्लेव बनाया, बल्कि उनका धर्म परिवर्तन भी करवाया। उन पर क्रूरता हुई और उन्हें शारीरिक मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया।

मुंबई में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान हुसैन अल कैदी (बाईं), काव्यर उमर अहमद, डॉ अब्राहिम, मथई और इमान अब्दुल्लाह। (तस्वीर साभार: द हिंदू)

अब्दुल्ला इस दौरान वार्ता में हुसैन अल कैदी के साथ मौजूद थी। जो उन्हें रेस्क्यू करने वाले संस्था के निदेशक हैं। मीडिया से बातचीत में अल कैदी ने बताया, “कुर्द क्षेत्र से यूएस की सेना हटाए जाने के बाद उन्हें बहुत छला हुआ महसूस होता है। तुर्की द्वारा कुर्दीश सेनाओं पर हमले बढ़ गए हैं। कुर्दीश सेनाओं ने भी हिरासत में लिए ISIS के आतंकियों को छोड़ दिया है। हमें डर लगता है कि ये ISIS आतंकी दोबारा याजिदियों पर हमला करेंगे।”

इमान के साथ आए अल कैदी ने अपनी बात कहते हुए इस बात पर जोर दिया कि वे कुर्द के एक गर्वित नागरिक हैं। जहाँ मुस्लिम, ईसाई और यजीदी पूरी तरह शांति बनाकर रहते हैं।

गौरतलब है कि साल 2014 में ISIS ने इराकी शहर सिंजर पर कब्जा करके यजीदियों के घर पर हमला बोला था। जिसके बाद अमेरिकी सेना ने ISIS से लड़ने के लिए कुर्द सेना के साथ गठबंधन किया और आतंकवादियों को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। कई आतंकियों को इस दौरान जेल में भी डाला गया। स्थिति सुधरने लगी कि अक्टूबर 2019 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प ने उत्तरी सीरिया से अमेरिकी सेना वापस लेने की घोषणा कर दी और कुर्द बलों को लड़ाई लड़ने के लिए अकेला छोड़ दिया।

चिन्मयानन्द मामला: SIT ने लॉ स्टूडेंट और 4 अन्य के खिलाफ कोर्ट मे दाखिल की चार्जशीट

शाहजहाँपुर के चिन्मयानन्द प्रकरण में यौन-शोषण मामले की जाँच कर रही एसआईटी ने आज न्यायालय में अपनी चार्जशीट दाखिल कर दी। इस चार्जशीट में यूपी पुलिस की एसआईटी ने चिन्मयानन्द पर रेप का आरोप लगाने वाली छात्रा और चार अन्य लोगों के खिलाफ चिन्मयानंद से सवा करोड़ रुपए की रंगदारी माँगने का आरोप तय किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक एसआईटी द्वारा दायर चार्जशीट के आरोपितों में कोआपरेटिव बैंक के चैयरमैन डीपीएस राठौर और स्थानीय नेता अजीत सिंह शामिल हैं। पुलिस के अनुसार दोनों ने चिन्मयानन्द को सबूत के नाम पर ब्लैकमेल कर मोटी रकम माँगी थी। इस मामले में यूपी पुलिस की एसआईटी ने आरोपितों पर आईपीसी की धारा 385(रंगदारी) , 506 (धमकी देने) और 201 (सबूत नष्ट करने) के तहत केस दर्ज कर लिया है।

बता दें कि चिन्मयानन्द ने छात्रा और उसके साथियों पर ब्लैकमेल करने का आरोप लगाया था। 25 सितम्बर को छात्रा की गिरफ़्तारी के बाद एसआईटी द्वारा पूछताछ के दौरान उसने चिन्मयानन्द से 5 करोड़ रुपए माँगने की बात क़ुबूल की थी।

चिन्मयानंद पर आरोप लगाने वाली छात्रा के लापता होने के बाद यह मामला सुर्ख़ियों में आया था। अपने वीडियो में पीड़ित छात्रा ने चिन्मयानंद पर आरोप लगाते हुए कहा था कि संत समाज के एक बहुत बड़े नेता ने मेरे परिवार को जान से मारने की धमकी दी है। प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री योगी से मदद की गुहार लगाते हुए पीड़ित छात्रा का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था जिसके बाद पुलिस ने छात्रा को उसके दोस्तों के साथ राजस्थान के मेहंदीपुर बालाजी के पास एक होटल से बरामद किया था।

मामले के तूल पकड़ते ही चिन्मयानंद के वकील ने छात्रा के खिलाफ ब्लैकमेल करने और रंगदारी डिमांड करने का मामला दर्ज कराया था। अपनी दलील में पीड़िता ने चिन्मयानंद पर दुष्कर्म करने और उसका वीडियो बनाने का आरोप लगाया था।

भगवान भी इनफ़ोसिस के आँकड़े नहीं बदल सकता: चेयरमैन नंदन नीलकेणी

भारत की अबसे बड़ी आईटी कंपनियों में शुमार इनफ़ोसिस ने आज (बुधवार, 6 नवंबर, 2019 को) “शरारती आरोपों” की कड़ी निंदा की है। कम्पनी के सह-संस्थापकों और पूर्व कर्मचारियों के खिलाफ अनाम स्रोतों से यह आरोप लगाए गए थे। स्टॉक एक्सचेंजों बीएसई (बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज, सेंसेक्स) और निफ्टी (नेशनल स्टॉक एक्सचेंज, एनएसई) को दिए गए बयानों में कम्पनी ने कहा है, “इनफ़ोसिस हालिया विसलब्लोअर की शिकायतों में सह संस्थापकों और पूर्व सहकर्मियों के खिलाफ लगे शरारती आरोपों की कड़ी निंदा करता है।”

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार इनफ़ोसिस के चेयरमैन नंदन नीलकेणी ने कहा, “यह अटकलें दुःखद हैं, और इनका निशाना सबसे सफल और सम्मानित लोगों में से कुछ की छवि को खराब करना था। हमारे सभी सह संस्थापकों के ज़िंदगी भर के कंट्रीब्यूशन के लिए मेरे मन में गहरा सम्मान है। मैंने यह संस्थान बनाया है और इस कम्पनी को निस्वार्थ रूप से सेवा की है और आज भी इनफ़ोसिस की दीर्घकालिक सफलता के लिए प्रतिबद्ध हूँ।”

कम्पनी के कथन में यह भी जिक्र है कि उसने एक बाहरी लॉ फर्म को भी हायर किया है। उसका काम विसलब्लोअर की शिकायतों की एक स्वतंत्र जाँच करने का होगा। वह लॉ फर्म “जाँच के नतीजों को एक उचित समय पर सभी स्टेकहोल्डर्स के साथ साझा करेगी।”

बाद में नीलकेणी ने एनालिस्ट्स को अलग से भी सम्बोधित किया। एक कांफ्रेंस कॉल में एनालिस्ट्स को सम्बोधित करते हुए नीलकेणी ने कहा, “इनफ़ोसिस के पास सशक्त प्रक्रियाएँ हैं, और यहाँ तक कि खुद भगवान भी इस कम्पनी के नंबरों में बदलाव नहीं कर सकते। हमारी फाइनेंस टीम इन आरोपों से अपमानित महसूस कर रही है। लेकिन मैं जाँच प्रक्रिया को पक्षपाती (बायस) नहीं करना चाहता।”

इनफ़ोसिस ने परसों (सोमवार, 4 नवंबर, 2019 को) कहा था कि उसे अब तक गुप्त शिकायतों के पक्ष में कोई सबूत नहीं मिले हैं। विसलब्लोअर की शिकायतों में कहा गया था कि कंपनी का चोटी का मैनेजमेंट कथित अनैतिक तरीकों का इस्तेमाल करता था। “विसलब्लोअर की शिकायतों के विषय में आज की तारीख तक ऐसा कोई प्राथमिक सबूत (प्राइमा फेसी एविडेंस) कम्पनी को प्राप्त नहीं हुआ है जिससे किसी भी आरोप की पुष्टि हो सके।” इनफ़ोसिस ने निफ्टी को बताया। सेंसेक्स में इनफ़ोसिस के शेयर बुधवार को दो प्रतिशत ऊपर चढ़े।

‘पानी की तरह है भाजपा-शिवसेना का रिश्ता, कोई कितनी भी कोशिश करे अलग नहीं कर सकता’

महाराष्ट्र के वित्त मंत्री सुधीर मुनगंटीवार ने कहा है कि भाजपा और शिवसेना का रिश्ता पानी की तरह है। उन्होंने पानी का उदाहरण देते हुए पूछा कि कितनी भी कोशिश कर ले, कोई इसे अलग कर सकता है क्या? महाराष्ट्र भाजपा के अध्यक्ष रह चुके मुनगंटीवार ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की अध्यक्षता में हुई बैठक के बाद बताया कि किसानों के मुद्दे पर बुलाई गई ये बैठक सफल रही। साथ ही उन्होंने कहा कि इन्तजार कीजिए क्योंकि कभी भी शुभ समाचार मिल सकता है। इससे कयास लगाए जा रहे हैं कि भाजपा और शिवसेना मिल कर सरकार बनाने की ओर बढ़ रही है।

कैबिनेट की बैठक में शिवसेना के 6 मंत्री भी शामिल हुए। मंत्री रामदास कदम ने कहा कि चूँकि मुद्दा किसानों को लेकर था, इसीलिए वो लोग शामिल हुए। शिवसेना नेता ने कहा कि कल को कोई ये नहीं कह सकता कि कृषि से जुड़े मसलों पर बुलाई गई बैठक में शिवसेना ने भाग नहीं लिया। 1 दिन पहले भी मुनगंटीवार ने कहा था कि सरकार भाजपा की ही होगी और इसमें कोई ‘अगर-मगर’ की संभावना नहीं है। उन्होंने कहा था कि उनकी पार्टी शिवसेना का इन्तजार करेगी।

इससे पहले शरद पवार के बयान से शिवसेना को झटका लगा था। पवार ने साफ़ कर दिया था कि भाजपा और शिवसेना को ही जनादेश मिला है और उन्हें ही सरकार बनाना है। साथ ही एनसीपी सुप्रीमो ने विपक्ष में बैठने की घोषणा कर दी। पवार ने जब ये बयान दिया, उससे कुछ देर पहले ही शिवसेना नेता संजय राउत ने उनसे मुलाक़ात की थी। राउत ने कहा था कि बैठक के दौरान राज्य के राजनीतिक परिदृश्य को लेकर चर्चा हुई और वरिष्ठ नेता पवार इसे लेकर चिंतित हैं।

भाजपा के मंत्री चंद्रकांत पाटिल ने भी कहा कि भाजपा और शिवसेना को ही सरकार बनाने का जनादेश मिला है और दोनों पार्टियाँ मिल कर सरकार बनाएँगी। उन्होंने कहा कि भाजपा के दरवाजे शिवसेना के लिए हमेशा के लिए खुले हैं। इसी बीच मंगलवार (नवंबर 5, 2019) की रात मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सरसंघचालक मोहन भागवत से भी मुलाक़ात की। उधर कॉन्ग्रेस नेता अहमद पटेल ने भी केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से मुलाक़ात की। हालाँकि, उन्होंने कहा कि ये राजनीतिक मुलाक़ात नहीं थी।

10 किलो वजन कम हो गया है, जमानत दे दीजिए: सिख नरसंहार के गुनहगार सज्जन कुमार ने SC में लगाई गुहार

कॉन्ग्रेस के पूर्व सांसद सज्जन कुमार को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं मिली है। 1984 सिख नरसंहार मामले में आजीवन कारावास की सजा काट रहे सज्जन कुमार ने स्वास्थ्य का हवाला देकर जमानत मॉंगी थी। जस्टिस एसए बोबडे, एसए नजीर और कृष्ण मुरारी की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए एम्स से कॉन्ग्रेसी नेता के स्वास्थ्य को उचार सप्ताह में रिपोर्ट मॉंगी है।

सज्जन कुमार के वकील विकास सिंह ने कोर्ट में सज्जन कुमार के ‘ख़राब स्वास्थ्य’ का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि कॉन्ग्रेस नेता सज्जन कुमार का वजन 10 किलो कम हो गया है। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वजन कम हो जाना कोई बीमारी नहीं है। अब सुप्रीम कोर्ट एम्स से रिपोर्ट मिलने के बाद इस मामले में आगे की सुनवाई करेगा। पिछले साल 18 दिसंबर को दिल्ली हाई कोर्ट ने निचली अदालत के 2013 के फैसले काे पलटते हुए सज्जन कुमार को 1984 के सिख विरोधी दंगों के एक मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

जब सज्जन कुमार के वकील ने उनके ‘ख़राब स्वास्थ्य’ की बात की तो जस्टिस बोबडे ने पूछा कि आखिर उन्हें बीमारी कौन सी है? इसके जवाब में वकील विकास सिंह ने बताया कि सज्जन कुमार का वजन 10 किलो कम हो गया है। इसके बाद जस्टिस बोबडे ने कहा कि अगर सज्जन कुमार चाहते हैं कि उनका मेडिकल एग्जामिनेशन हो तो कोर्ट उसके लिए आदेश दे देगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो सज्जन कुमार के स्वास्थ्य का ध्यान रख रहा है। जस्टिस बोबडे ने कहा- ‘आप जहाँ भी रहें, स्वस्थ रहने चाहिए।

1984 में हुए सिख नरसंहार मामले में जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार सहित कई नेता अदालत की कार्रवाई का सामना कर रहे हैं। इस मामले में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ पर भी गंभीर आरोप लगते रहे हैं। गाँधी परिवार के वफादार रहे सज्जन कुमार 2004 में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह को हरा कर तीसरी बार सांसद बने थे।

वकीलों के खिलाफ FIR की अनुमति नहीं: हाई कोर्ट ने ठुकराई दिल्ली पुलिस की याचिका

वकीलों और पुलिस के बीच दिल्ली में पिछले चार दिनों से चल रहे संघर्ष में एक बड़ा फैसला देते हुए कोर्ट ने वकीलों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की अनुमति देने से इंकार कर दिया है। यह फैसला अदालत ने साकेत कोर्ट वाली घटना में दिया है, जिसके एक चर्चित वीडियो में कुछ वकील एक पुलिस वाले के साथ हाथापाई करते देखे जा सकते हैं। दिल्ली हाई कोर्ट ने 3 नवंबर के अपने आदेश के बारे में कोई स्पष्टीकरण देने से भी इंकार करते हुए उसे स्वतः स्पष्ट (सेल्फ एक्सप्लनेटोरी) बताया है

इसके अलावा बार काउन्सिल ऑफ़ इंडिया ने बड़ा बयान दिया है। काउन्सिल ने दिल्ली पुलिस के हड़ताली कर्मचारियों को ‘बेकाबू भीड़’ बताते हुए उन पर ‘भद्दे’ नारे लगाने का आरोप लगाया और साथ ही पूरे मामले के राजनीति से प्रेरित होने का शक जताया। उन्होंने इसे आज़ाद भारत का सबसे काला दिन बताया है। काउन्सिल ने ‘दोषी’ पुलिस वालों के खिलाफ एक हफ्ते में गिरफ़्तारी और कार्रवाई न होने पर धरने पर बैठने की धमकी दी है।

इसके अलावा खबर यह भी आ रही है कि एक सुप्रीम कोर्ट वकील ने दिल्ली के कमिश्नर अमूल्य पटनायक को क़ानूनी नोटिस भेजा है क्योंकि उन्होंने आईटीओ स्थित पुलिस हेडक्वार्टर के सामने प्रदर्शन कर रहे पुलिस वालों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली पुलिस जहाँ एक तरफ विरोध प्रदर्शन कर रही थी वहीं सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी ने इस मामले को लेकर बीजेपी पर हमला बोल दिया था। आम आदमी पार्टी ने कहा कि दिल्ली पुलिस ‘राजनीतिक इकाई’ में तब्दील हो गई है। यह बीजेपी की सशस्त्र शाखा की तरह काम कर रही है, जबकि इसका काम कानून-व्यवस्था बनाए रखने का है। वकीलों के समर्थन में आई आप ने दिल्ली पुलिस पर कई सवाल खड़े किए हैं।

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इसके अलावा आप के मुखिया अरविन्द केजरीवाल ने भी वकीलों का पक्ष लेते हुए पुलिस द्वारा की गई फायरिंग को बेवजह करार दिया था। उन्होंने यह बयान फायरिंग में घायल दो वकीलों को देखने अस्पताल पहुँचने पर दिया था।

पिछले हफ्ते के शनिवार (2 नवंबर, 2019 को) पार्किंग विवाद को लेकर दिल्ली के तीस हज़ारी कोर्ट के बाहर वकीलों और पुलिस के बीच हिंसा हुई थी। एक पुलिस कार और 20 अन्य वाहनों को आग लगा दी गई थी। 2 पुलिस वालों को दिल्ली हाई कोर्ट ने सस्पेंड कर दिया था और न्यायिक जाँच के आदेश दे दिए थे

इस मामले के खिलाफ कल दिल्ली के हज़ारों पुलिस वाले वर्दी उतार कर सादे कपड़ों में विरोध प्रदर्शन और हड़ताल भी किया था। इसके अलावा कई वर्तमान और भूतपूर्व अफसरों ने भी इसके खिलाफ ट्विटर पर आवाज़ उठाई थी।

अयोध्या में 400 साल से बाबरी मस्जिद, कयामत तक मस्जिद ही रहेगी: मौलाना अरशद मदनी

जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा है कि अयोध्या में 400 साल से बाबरी मस्जिद थी और कयामत तक वो मस्जिद ही रहेगी। उनका यह बयान ऐसे वक्त में आया है जब अगले सप्ताह अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने की उम्मीद जताई जा रही है। मदनी ने उम्मीद जताई है कि कोर्ट का फैसला मुस्लिमों के हक में आएगा। साथ ही कहा है कि अदालत जो भी फैसला देगी उसे वे स्वीकार करेंगे।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार मदनी ने बुधवार (नवंबर 6, 2019) को दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में पत्रकारों से बात करते हुए शरीयत का हवाला देकर कहा बाबरी मस्जिद, कानून और न्याय की नजर में एक मस्जिद थी। करीब 400 साल तक मस्जिद थी। लिहाजा शरीयत के हिसाब से वो आज भी मस्जिद है। उन्होंने कहा कि सत्ता और ताकत के दम पर उसे कोई भी रूप दे दिया जाए कयामत तक वह मस्जिद ही रहेगी।

मदनी ने दावा किया कि मस्जिद का निर्माण करने के लिए किसी हिंदू मंदिर को तोड़ा नहीं गया था। उन्होंने कहा कि मुस्लिमों का दावा ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है। हम अपने इस दावे के साथ खड़े हैं। सुप्रीम कोर्ट जो भी फैसला सुनाएगा हम उसे मानेंगे लेकिन मस्जिद पर अपना दावा नहीं छोड़ सकते। उन्होंने कहा कि हम मुस्लिमों के साथ भारत के हर नागरिक से अपील करते हैं कि सुप्रीम कोर्ट आने वाले फैसले का सम्मान करें।

मदनी ने कहा, “कानून हमारा है। सुप्रीम कोर्ट हमारी है। जो भी फैसला होगा हम उसका एहतराम करेंगे। मुल्क के सभी लोगों से चाहे वे हिंदू हो या मुस्लिम, सबको फैसले को अमन के साथ स्वीकार करने की गुजारिश करता हूॅं। इस मामले में हमारी आवाज जहॉं तक पहुॅंचेगी हम वहॉं तक पहुँचाएँगे।”

इस दौरान उन्होंने कश्मीर और एनआरसी के मसले पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि जमीयत एनआरसी के खिलाफ नहीं है। यह पूरे देश में होना चाहिए, लेकिन इसका आधार धार्मिक नहीं हो। वहीं, आर्टिकल 370 को लेकर कहा कि यह मामला कोर्ट में है उम्मीद है कि कश्मीरियों को न्याय मिलेगा। लेकिन, वहॉं लाखों लोग रहते हैं और बीते 90 दिन से वहॉं काम ठप है। हमने पहले भी कहा था और आज भी कह रहे उनसे बातचीत करिए।

माओवंशी आतंकी हैं, ह्यूमन राइट्स के पात्र नहीं: केरल मुख्य सचिव के बयान से खफा वामपंथ-कॉन्ग्रेस

केरल के मुख्य सचिव टॉम जोसे ने माओवादी आतंकवादियों को आतंकवादी क्या कहा, केरल कॉन्ग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (सीपीआई) उनके ऊपर भड़क उठे हैं। विधानसभा के फ्लोर से लेकर मीडिया और सड़कों तक उनका विरोध किया जा रहा है, क्योंकि उन्होंने यह कहने की जुर्रत कर दी कि खुद ऑटोमैटिक हथियार लेकर घूमने वाले और निहत्थे, निरीह लोगों को ढाल बनाकर मौत के मुँह में धकेलने वाले माओवादी आतंकियों के ह्यूमन राइट्स की चिंता करना पुलिस और सुरक्षा बलों का काम नहीं है।

कल (मंगलवार, 6 नवंबर, 2019 को) टाइम्स ऑफ़ इंडिया के सम्पादकीय पेज पर प्रकाशित एक लेख में जोसे ने कहा था कि संयुक्त राष्ट्र की आतंकवाद की परिभाषा (वे तत्व जो हिंसा का इस्तेमाल राजनीतिक मंशा से करते हैं, और इस प्रक्रिया में नागरिकों को नुकसान पहुँचाते हैं या नुकसान की राह पर धकेलते हैं। अतः एक लोकतान्त्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार के खिलाफ हथियारबंद लड़ाई करने वाले नागरिकों को नुकसान पहुँचाने के चलते आतंकवादी होते हैं) के हिसाब से माओवादी आतंकी ही हुए। उन्होंने यह पक्ष रखा कि सरकारों का काम निहत्थे और शांतिप्रिय नागरिकों की हिफाज़त करना होता है।

जोसे ने लिखा कि इसका कोई औचित्य नहीं कि शांतिप्रिय आम नागरिकों और माओवंशी आतंकियों के ह्यूमन राइट्स एक जैसे हों। यह न केवल देश के सिद्धांतों के ख़िलाफ़ होगा, बल्कि कानून का पालन करने वाले आम नागरिकों का मखौल उड़ाना उनका अपमान होगा।

इसी सत्य पर कम्युनिस्ट और केरल कॉन्ग्रेस खफा हैं। जहाँ कम्युनिस्ट पार्टी सीपीआई क़ानूनी तोड़ मरोड़ से खूँखार माओवादियों और आम नागरिकों के अधिकार बराबर बताने में लगी है, वहीं कॉन्ग्रेस नाराज है कि ऐसा लग रहा है केरल का शासन मुख्य सचिव चला रहे हैं।

लेकिन जोसे को सोशल मीडिया पर आम और खास सभी तबकों से समर्थन मिल रहा है। आम लोग उनकी सराहना कर रहे हैं और उनके विरोधियों का उपहास कर रहे हैं।

सबरीमाला मुद्दे पर केरल सरकार से लगातार टकरा चुके हिंदूवादी एक्टिविस्ट राहुल ईश्वर ने भी जोसे के लेख का समर्थन किया है।

ऐसे में सवाल यह है कि कम्युनिस्टों का तो समझ में आता है, मगर सिद्धार्थ शंकर रे के समय में खुद इन वामपंथी आतंकियों के हाथों अपने कारकर्ताओं को खो चुकी कॉन्ग्रेस किस कारण से इन आतंकियों के पक्ष में अपना बचा खुचा जनाधार गँवाने पर तुली है।

अयोध्या में 30 लाख लोगों ने की परिक्रमा, आतंकी हमले के मद्देनजर सुरक्षा कड़ी

अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले राम की नगरी श्रद्धालुओं से पट गई है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक करीब 30 लाख लोगों ने 14 कोसी परिक्रमा पूरी की। अब प्रशासन गुरुवार (7 नवंबर) को होने वाली पंचकोसी परिक्रमा की तैयारी में जुटा है। अनुमान है कि 20 लाख श्रद्धालु इसमें हिस्सा लेंगे।

राम मंदिर के पक्ष में फैसला आने की उम्मीद और आतंकवादी हमले की आशंका के बीच परिक्रमा बुधवार सुबह पूरी हुई। परिक्रमा में हर आयु वर्ग के श्रद्धालु शामिल थे। पूरा परिक्रमा पथ राम के जयघोष से गूॅंज उठा। परिक्रमा पूरी करने के बाद श्रद्धालुओं ने श्रीरामजन्मभूमि में विराजमान रामलला, हनुमानगढ़ी, कनक भवन और नागेश्वरनाथ समेत अन्य प्रमुख मंदिरों में पूजा की।

कार्तिक पूर्णिमा मेला और परिक्रमा को लेकर प्रशासन की ओर से सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम पहले से थे। आतंकी हमले के इनपुट के बाद सुरक्षा-व्यवस्था और कड़ी कर दी गई है। खुफिया सूत्रों के हवाले से कुछ खबरों में बताया गया है कि 7 पाकिस्तानी आतंकी नेपाल के रास्ते यूपी में दाखिल हुए हैं। आशंका जताई जा रही है कि ये गोरखपुर और फैजाबाद में छिपे हो सकते हैं तथा भगवा लिबास में अयोध्या में हमले को अंजाम दे सकते हैं।

अयोध्या के एसएसपी आशीष तिवारी ने बताया कि शांति बनाए रखने के लिए प्रशासन की ओर से 1600 गाँवों में 16,000 वालंटियर्स को लगाया गया है। सभी मोबाइल एप के जरिए आपस में जुड़े हुए हैं। उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया पर किसी तरह की अफवाह फैलने से रोकने के लिए भी तैयारी की गई है। प्रशासन सोशल मीडिया की कड़ी निगरानी कर रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मद्देनजर प्रशासन ने पहले से ही अयोध्या में विजयोत्सव निकालने पर रोक, लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर रोक सहित कई पाबंदियां लगा रखी है। 4 नवम्बर से लेकर 18 नवम्बर तक पुलिस ने विशेष निषेधाज्ञा लागू कर रखी है। ज़िले में धारा 144 को बढ़ाकर 28 दिसंबर तक लागू कर दिया गया है। गौरतलब है कि बीते महीने 40 दिन की सुनवाई के बाद मुख्य न्यायाधीश के अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने अयोध्या मामले पर फैसला सुरक्षित रख लिया था। 17 नवंबर से पहले फैसला आने की उम्मीद है।

एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक मुंबई शहर में पुलिस कमिश्नर संजय बर्वे ने दूसरे समुदाय से शान्ति की अपील करते हुए मुलाक़ात की। बता दें कि जन्मभूमि पर कारसेवा करने के जवाब में साल 1993 में मुंबई नगरी सीरियल ब्लास्ट से दहल उठी थी जिसमें सैकड़ों लोगों ने अपनी जान गँवा दी थी।