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अपनी सगाई तक कैंसल कर दी मुस्लिम पक्ष की एक महिला वकील ने, 9 साल तक सिर्फ राम मंदिर मामले में…

अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार (नवंबर 9, 2019) को अपना फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने इस फैसले में विवादित जमीन रामलला को देने का फैसला किया है, जबकि मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही दूसरी जगह 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया। 

सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर लगातार 40 दिन तक रोजाना सुनवाई करने के बाद 9 नवंबर को फैसला सुनाया। 40 दिनों की मैराथन सुनवाई के दौरान हिन्दू और मुस्लिम पक्ष के वरिष्ठ वकीलों ने बेहतरीन तरीके से अपनी दलीलें पेश कीं। इन वरिष्ठ वकीलों में के परासरण, राजीव धवन, सीएस वैद्यनाथन, रंजीत कुमार, जफरयाब जिलानी, पीएस नरसिम्हा, पीएन मिश्रा और एजाज मकबूल का नाम शामिल है।

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बता दें कि इन वकीलों के बहतरीन परफॉर्मेंस के पीछे इनके कुछ जूनियर वकीलों का भी हाथ है। इस केस में उनका साथ देने के लिए किसी जूनियर वकील ने अपनी सारी कानूनी व्यस्तताओं को दरकिनार कर दिया तो किसी ने अपनी सगाई तक को रद कर दिया। उन्होंने अपने प्रोफेशनल माँग को निजी माँग से ज्यादा तरजीह दी।

इनमें से एक हैं 50 वर्षीय वकील पी वी योगेश्वरन। जिन्होंने इस मामले पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अन्य अदालती व्यस्तता से किनारा कर लिया। किथेई जिले में एक छोटे से गाँव उप्पुकोट्टई से आने वाले पी वी योगेश्वरन ने हिन्दू पक्ष के लिए काम किया। उन्होंने 1994 में कानून की पढ़ाई पूरी की थी और वरिष्ठ वकील एस बालकृष्णन और फिर लाला राम गुप्ता के जूनियर के रूप में सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की।

योगेश्वरन पिछले नौ साल से अयोध्या मामले पर काम कर रहे थे। जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 30 सितंबर, 2010 के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी, वो तभी से इस केस से जुड़े रहे। योगेश्वरन रोजाना स्वेच्छा से पाँच घंटे वकील भक्ति वर्धन सिंह के साथ मामले पर अध्ययन करने के लिए समर्पित थे। इसके बाद वे वरिष्ठ अधिवक्ता परासरन, वैद्यनाथन और रंजीत कुमार के साथ एक से दो घंटे तक चलने वाले ब्रीफिंग सत्र में भी शामिल होते थे।

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योगेश्वरन ने इस बारे में बात करते हुए टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि उन्हें इस मामले पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अदालत के सभी अन्य कामों को छोड़ना पड़ा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले से जुड़ने के बाद उन्हें पता चला कि कैसे उनके जैसे एक साधारण वकील को सीखने के लिए पूरी ज़िंदगी लगानी होती है।

मुस्लिम पक्ष के वकील एजाज मकबूल की जूनियर वकील आकृति चौबे ने इस मामले को गहराई से जानने के लिए अपने निजी जीवन में बहुत बड़ा त्याग किया। चौबे को अपने ब्वॉयफ्रेंड के साथ सगाई करनी थी, लेकिन कोर्ट की सुनवाई 6 अगस्त से 16 अक्टूबर तक चलनी थी। और इस बीच उनके सगाई करने का मतलब था कि वो कोर्ट की सुनवाई में उपस्थित नहीं हो पातीं। फिर उन्होंने सोचा कि सगाई तो इंतजार कर सकती है, लेकिन कोर्ट नहीं।

बाद में उन्होंने अपने सगाई के कार्यक्रम को रद कर दिया। अब वो अपना ‘रोका’ समारोह न करके अगले साल फरवरी में सीधा शादी ही करने वाली हैं। आकृति का ब्वॉयफ्रेंड इंडियन एयरलाइंस में वकील हैं। आकृति का फैमिली बैकग्राउंड भी योगेश्वरन की तरह ही है। आकृति चौबे ने तभी अपने पिता को खो दिया था, जब वो पाँचवीं कक्षा में थीं।

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आकृति ने बताया कि उनकी माँ दिल्ली सरकार के साथ काम करती है और वो उनका काफी सपोर्ट करती हैं। चौबे ने कहा कि वो पिछले दो वर्षों से इस पर बिना किसी ब्रेक काम कर रहीं थी। आकृति ने बताया कि वो दलीलें शुरू होने के बाद रोजाना वकील राजीव धवन को ब्रीफ करती थीं।

मुस्लिम पक्ष की वकालत कर रहे धवन और जिलानी कई तथ्यों और रिकॉर्डों के लिए आकृति की मदद लिया करते थे। इसके साथ ही अन्य महिला वकील कुर्रातुलेन का भी सीनियर वकीलों का साथ देने में अहम योगदान रहा। योगेश्वर और आकृति जैसे और भी कई ऐसे जूनियर वकील हैं, जिन्होंने इस केस में काफी मेहनत की है।

अयोध्या पर SC के फ़ैसले को चुनौती नहीं दी जानी चाहिए: शाही इमाम अहमद बुखारी

दशकों पुराने अयोध्या मामले में शनिवार को सुप्रीम कोर्ट की पॉंच जजों की पीठ ने अपना फैसला सुनाया। इसके साथ ही इस बेहद संवेदनशील मामले की कानूनी लड़ाई का अंत हो गया है। फ़ैसले के बाद तमाम तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आई है। इसी कड़ी में दिल्ली के जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी ने कहा है कि अयोध्या मामले को अब आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। उनके मुताबिक सुप्रीम कोर्ट फ़ैसले के ख़िलाफ़ पुनर्विचार याचिका दायर करने की ज़रूरत नहीं है। उन्होंने उम्मीद जताई कि अब देश में साम्प्रदायिक तनाव के लिए जगह नहीं होगी और आगे ऐसे मुद्दों को हवा नहीं दी जाएगी।

शाही इमाम ने एक प्रेस कॉन्फ्रेन्स में कहा, “मैंने पहले भी कहा था कि देश क़ानून और संविधान के अमल पर चलता है। 134 साल से चल रहे विवाद का अंत हुआ। पाँच सदस्यीय पीठ ने निर्णय लिया। गंगा-जमुनी संस्कृति और सद्भाव को देखते हुए कि यह प्रयास करना होगा कि आगे देश को इस तरह के विवाद से फिर नहीं गुज़रना पड़े।”

उन्होंने कहा, “देश संविधान के तहत चले, कानून का अमल होता रहे, सांप्रदायिक तनाव नहीं हो और समाज नहीं बाँटे, इसके लिए सभी को अपनी भूमिका अदा करनी होगी। हिंदू-मुस्लिम की बात बंद होनी चाहिए और देश को आगे बढ़ाने के लिए सब मिलकर चलें।” शाही इमाम ने कहा कि प्रधानमंत्री के बयान से यह उम्मीद की जानी चाहिए कि देश सद्भाव की तरफ आगे बढ़ेगा।

फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील से जुड़े ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बयान के बारे में पूछे जाने पर बुखारी ने कहा, “मेरी अपनी राय है कि मामले को ज्यादा बढ़ाना उचित नहीं है। पुनर्विचार के लिए उच्चतम न्यायालय में जाना बेहतर नहीं है।” उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय पहले से कहता रहा है कि वह फ़ैसले का सम्मान करेगा और अब फ़ैसला आने के बाद लोग इससे सहमत हैं।

ग़ौरतलब है कि CJI रंजन गोगोई की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने अयोध्या की जिस जमीन को लेकर विवाद था वहॉं मंदिर निर्माण का आदेश दिया है। साथ ही मस्जिद निर्माण के लिए सरकार को सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश दिए हैं। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से 3 महीने के भीतर इसके लिए एक योजना तैयार करने को कहा है।

मेरे दोस्त इमरान ने करतारपुर कॉरिडोर में ‘अल्लाह का काम’ किया है: सिद्धू

कॉन्ग्रेस नेता, पूर्व सांसद व पंजाब सरकार में भूतपूर्व मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ने आज करतारपुर साहिब के उद्घाटन समारोह में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की शान में जम कर कसीदे पढ़े। उन्होंने करतारपुर कॉरिडोर के निर्माण के लिए इमरान खान का शुक्रिया किया और कहा कि इमरान ने ‘अल्लाह का काम’ किया है।

पूर्व क्रिकेटर और क्रिकेट कमेंटेटर सिद्धू ने अपने भाषण में यह दावा किया कि ‘उनके दोस्त’ इमरान ने यह काम (करतारपुर कॉरिडोर का निर्माण) बिना कोई नफा नुकसान देखे किया है। यहाँ यह जान लेना ज़रूरी है कि पाकिस्तान के पीएम इमराना भी पूर्व क्रिकेटर हैं, और सिद्धू के समकालीन खेल चुके हैं। दोनों क्रिकेट के दिनों से ही काफी करीबी दोस्त माने जाते हैं। सिद्धू इमरान खान के न्यौते पर उनके शपथ ग्रहण में भी गए थे जहाँ उनकी पाकिस्तानी सेना के अफसरों और खालिस्तानी आतंकियों से नज़दीकी का प्रदर्शन कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए शर्म का कारण बन गया था।

करतारपुर कॉरिडोर के समरोह में भी सिद्धू भारतीय विधायक, पूर्व सांसद और पूर्व मंत्री होने के बावजूद भारत नहीं बल्कि पाकिस्तान के कोटे से मौजूद थे। उन्हें न ही भारत सरकार और न ही उनके राज्य की सरकार ने अपने प्रतिनिधिमंडल में रखा। यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस के प्रतिनिधिमंडल और पाकिस्तान की सरकार और विदेश मंत्रालय के कोटे से भी न्यौता नहीं आया था। वे, मीडिया खबरों के अनुसार, इमरान खान की पार्टी के न्यौते पर समारोह में उपस्थित थे। 

फडणवीस को सरकार बनाने का मिला मौका, 11 तक साबित करना होगा बहुमत

महाराष्ट्र की राजनीति ने एक बार फिर से करवट ली है। शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन लगभग टूट जाने के और देवेंद्र फडणवीस व  शिव सेना  के एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी के बाद भाजपा को सरकार बनाने का निमंत्रण मिला है।

आ रही मीडिया खबरों के मुताबिक राज्य के गवर्नर भगत सिंह कोश्यारी ने फडणवीस को सबसे बड़ी पार्टी का नेता होने के चलते सरकार बनाने के लिए निमंत्रण भेजा है। उनके पास परसों ( सोमवार, 11 नवंबर, 2019 को) तक विधानसभा के पटल पर फ्लोर टेस्ट पास करने (सदन में बहुमत साबित करने) का मौका होगा। फडणवीस कल ही (शुक्रवार, 8 नवंबर, 2019 को) राज्य के कार्यवाहक मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे कर हटे हैं।

हाल ही में (21 अक्टूबर, 2019 को) हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा और शिव सेना को क्रमशः 105 और 56 सीटें मिलीं थीं। 288 सदस्यों की विधानसभा में उनके पास बहुमत से काफी ज़्यादा का आँकड़ा था, लेकिन शिव सेना ने नतीजों की घोषणा वाले दिन (24 अक्टूबर, 2019) से ही घोषणा कर दी कि वह भाजपा के साथ सरकार तभी बनाएगी अगर उसे आधे मंत्रालय और ढाई साल के लिए सीएम के पद की लिखित गारंटी मिलेगी। उसने इसे चुनाव के ठीक पूर्व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का शिव सेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे से वादा बताया।

साथ ही, शिव सेना के मुखपत्र सामना में जनादेश को भाजपा के अहंकार और दूसरी पार्टियों में तोड़फोड़ और भितरघात की कथित तौर पर अनैतिक राजनीति की हार बताया, बावजूद इसके कि सबसे ज़्यादा सीटें भाजपा को ही मिलीं थीं। दूसरी और भाजपा ने शिव सेना के लिए बातचीत के दरवाज़े खुले रखने की बात की लेकिन साफ कर दिया कि सीएम भाजपा का ही होगा क्योंकि उसकी सीटें अधिक हैं। इसके बाद केंद्रीय मंत्री और हालिया दौर में महाराष्ट्र में शरद पवार के बाद सबसे अनुभवी और शक्तिशाली क्षत्रप माने जाने वाले पूर्व भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कल दावा किया कि ऐसी कोई डील कभी हुई ही नहीं थी।

इसके बाद फडणवीस ने कार्यवाहक सीएम पद से इस्तीफ़ा सौंपा और प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर कहा कि यह दुःखद बात है कि उद्धव के पास एनसीपी और कॉन्ग्रेस से सौदेबाजी करने का समय है, लेकिन शिव सेना सुप्रीमो उनका फोन तक नहीं उठाते। इसके जवाब में उद्धव ने भी प्रेस से बात करते हुए भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व पर हमला बोला और कहा कि भरोसा दोनों ओर से ही खत्म हो चुका है- और वे ‘अमित शाह एन्ड कम्पनी’ पर कोई विश्वास नहीं कर सकते।

मैं सही साबित हुआ, मेरी मेहनत लाई रंग: राम रथी आडवाणी का अयोध्या फैसले पर कथन

आज अयोध्या का फैसला आने के बाद सबसे ज़्यादा जिन दो लोगों के बारे में बात हुई, वे हैं विश्व हिन्दू परिषद के स्वर्गीय मुखिया अशोक सिंघल, और उनके साथ राम रथ यात्रा निकालने वाले भाजपा के पितृ पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी। इस ऐतिहासिक क्षण के एक दिन पहले कल ही अपना 93वाँ जन्मदिन मनाने वाले आडवाणी, जिन्होंने अपना कैरियर फिल्म समीक्षा पत्रकार के रूप में शुरू किया था, ने अंग्रेजी में एक बयान जारी कर फैसले से संतोष जाहिर किया है। साथ ही कहा है कि अंततः उनका स्टैंड सही साबित हुआ है।

 
पेश है उनके कथन का हिंदी रूपांतरण: 

आज मैं अपने देशवासियों के साथ खुले दिल से अयोध्या मामले में 5 सदस्यों वाली सुप्रीम कोर्ट की संविधानिक पीठ द्वारा दिए गए इस ऐतिहासिक निर्णय का स्वागत करता हूँ।

मेरा स्टैंड सही साबित हुआ है और मुझे बेहद ख़ुशी है कि सुप्रीम कोर्ट ने एकमत से निर्णय देकर अयोध्या में राम जन्मभूमि पर श्री राम का भव्य मंदिर बनाने की राह प्रशस्त की है।

मेरे लिए यह बेहद संतुष्टि का क्षण है क्योंकि ईश्वर ने मुझे एक मौका दिया था इस जनांदोलन का छोटा सा हिस्सा बनने का। यह आंदोलन भारत की आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा आंदोलन था, जिसका लक्ष्य वही था जो आज सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद से पूरा होने जा रहा है।

मैंने हमेशा इस पर ज़ोर दिया था कि राम और रामायण भारत की सांस्कृतिक और सभ्यतात्मक विरासत में एक सम्मानित स्थान रखते हैं, और रामजन्मभूमि की देश और विदेश में हमारे करोड़ों देशवासियों के दिल में विशेष और पवित्र जगह है। अतः यह अभिभूत कर देने वाली बात है कि उनके विश्वास और भावनाओं को सम्मान मिला है।

मैं सर्वोच्च न्यायालय के अयोध्या में मस्जिद बनाने के लिए पाँच एकड़ ज़मीन दिए जाने का भी स्वागत करता हूँ। आज का निर्णय एक ऐसी लम्बी और दुरूह प्रक्रिया का पटाक्षेप है जो पिछले कई दशकों से कई मंचों पर चल रही थी- न्यायिक भी, और गैर-न्यायिक भी। अब जबकि इतना लम्बा चला अयोध्या का मंदिर-मस्जिद विवाद अपने अंत पर पहुँच गया है, तो समय आ गया है कि सभी विरोध और वैमनस्यता पीछे छोड़ें और साम्प्रदायिक सौहार्द और शांति को गले लगाएँ। इस हेतु के लिए , मैं हमारे विभिन्नताओं वाले समाज से एक साथ काम कर भारत की राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मज़बूत करने की  करता हूँ।

रामजन्भूमि आंदोलन के दौरान मैंने कई बार कहा है कि अयोध्या में राम मंदिर बनाने जा सच्चा मकसद एक भव्य राष्ट मंदिर बनाने का है- भारत को एक सशक्त, वैभवपूर्ण, शांतिप्रिय और सौहार्दपूर्ण राष्ट्र बनाने का जिसमें सभी के साथ न्याय को और कोई जिससे बाहर न हो। हम सभी को उस आर्य लक्ष्य के लिए आज से समर्पित हो जाना चाहिए। 

अब आंदोलन नहीं करेगा RSS, चरित्र निर्माण पर ध्यान केंद्रित करेगा: अयोध्या फैसले पर मोहन भागवत

अयोध्या मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए, RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि इस फ़ैसले को जीत या हार के दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए, और सभी को मंदिर निर्माण के लिए एक साथ आगे आना चाहिए। प्रेस कॉन्फेन्स को संबोधित करते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत किया। साथ ही लोगों से भाईचारा बनाए रखने की अपील भी की।

उन्होंने कहा कि मामला दशकों से चल रहा था और यह सही निष्कर्ष पर पहुँच गया है। RSS प्रमुख ने कहा कि इस फ़ैसले को जय-पराजय की दृष्टि से बिलकुल नहीं देखा जाना चाहिए। सत्य व न्याय के मंथन से प्राप्त निष्कर्ष को भारतवर्ष के सम्पूर्ण समाज की एकात्मकता व बंधुता के परिपोषण करने वाले निर्णय के रूप में देखना और उपयोग में लाना चाहिए। सम्पूर्ण देशवासियों से अनुरोध है कि विधि और संविधान की मर्यादा में रहकर संयमित व सात्विक रीति से अपने आनंद को व्यक्त करें।

भागवत ने कहा कि RSS को उम्मीद है कि सरकार जल्द ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार दोनों पक्षों के बीच विवाद को समाप्त करने के लिए क़दम उठाएगी। अतीत से सब कुछ भूलकर, हम सभी को एक साथ मिलकर राम जन्मभूमि स्थल पर भव्य मंदिर निर्माण के लिए अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

मुस्लिम पक्षों को दी गई 5 एकड़ भूमि के बारे में पूछे जाने पर, RSS प्रमुख ने कहा कि वे सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले का सम्मान करते हैं और हम सभी को झगड़े और विवादों को समाप्त कर देना चाहिए। बोर्ड को जमीन कहॉं दी जानी चाहिए यह पूछे जाने पर RSS प्रमुख ने कहा कि उन्हें इस मसले पर कुछ नहीं कहना है। सुप्रीम कोर्ट ने जो फ़ैसला दिया है, उसके अनुसार पालन किया जाएगा। ज़मीन हमें नहीं बल्कि सरकार को देनी है, इसलिए जो करना है वो सरकार ही तय करेगी।

यह पूछे जाने पर कि क्या RSS इसके बाद मथुरा और काशी के मुद्दों को उठाएगा, भागवत ने कहा कि RSS कोई आंदोलन नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि अब RSS केवल चरित्र निर्माण पर ध्यान केंद्रित करेगा और भविष्य के किसी आंदोलन में शामिल नहीं होगा।

ग़ौरतलब है कि CJI रंजन गोगोई की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने अयोध्या की जिस जमीन को लेकर विवाद था वहॉं मंदिर निर्माण का आदेश दिया है। साथ ही मस्जिद निर्माण के लिए सरकार को सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश दिए हैं। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से 3 महीने के भीतर इसके लिए एक योजना तैयार करने को कहा है।

अशोक सिंघल को भारत रत्न दो, तुरंत करो घोषणा: स्वामी की माँग

भारतीय जनता पार्टी के नेता और राज्य सभा के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने विश्व हिन्दू परिषद के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष स्वर्गीय अशोक सिंघल को भारत रत्न दिए जाने की माँग की है। साथ ही पूर्व केंद्रीय मंत्री ने इसके लिए तुरंत घोषणा की भी माँग की है। उनकी यह माँग राम जन्मभूमि आंदोलन की दशकों की माँग पर आज सुप्रीम कोर्ट की स्वीकृति की मुहर के आलोक में आई है।

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गौरतलब है कि हार्वर्ड से पीएचडी अर्थशास्त्री सुब्रमण्यम स्वामी खुद भी आज अंततः सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुलझाए गए राम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद विवाद के पक्षकारों में से एक हैं। उन्होंने एक याचिका दायर कर अपने आस्था के आधार पर जन्मभूमि स्थल पर बनाने के मूलभूत संवैधानिक अधिकार को हिन्दू-मुस्लिम दोनों पक्षों के सम्पत्ति अधिकार से बड़ा बताया था। हालाँकि उनकी खुद की याचिका तो अदालत ने अंततः एक दूसरी बेंच के पास भेज दी, लेकिन इसके बाद इस मामले की प्रगति में अभूतपूर्व तेज़ी आई थी। 

इस बारे में स्वामी हमेशा दावा करते रहे हैं कि उन्हें यह मामला सुलझवाने की ज़िम्मेदारी जन्मभूमि आंदोलन के आर्किटेक्ट माने जाने वाले सिंघल ने ही अपने अंतिम दिनों में सौंपी थी। बकौल स्वामी, सिंघल ने अपनी मृत्यु आसन्न देख उनसे वादा लिया था कि वे इस मामले का हल निकलवा कर राम मंदिर बनवाने का प्रयास करेंगे, जिसके बाद स्वामी ने उक्त याचिका डाली। 

सिंघल के योगदान को आज फैसला आने के बाद स्वामी ही नहीं, कई अन्य भाजपा और हिंदूवादी संगठनों के नेताओं ने याद किया। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और गोरक्ष पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ ने सिंघल की रामशिला पूजन की फोटो अपने गुरु के गुरु योगी दिग्विजयनाथ के साथ ट्वीट की। संघ के विचारक केएन गोविंदाचार्य ने भी भाजपा के पितृ-पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी के साथ सिंघल के योगदान को इस आंदोलन और इस क्षण के लिए सबसे अधिक श्रेय दिया। 

2015 में अपनी मृत्यु को प्राप्त होने वाले सिंघल 1942 में संघ प्रचारक से सार्वजनिक जीवन की शुरुआत करने के बाद विभिन्न संघ परिवार के पदों से होते हुए 1981 में वीएचपी के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव बने थे। आडवाणी के साथ उन्होंने जन्मभूमि आंदोलन का नेतृत्व किया था। 

इसके अलावा उनके लिए भारत रत्न की माँग करने वाले सुब्रमण्यम स्वामी का भी मामले से पुराना संबंध रहा है ,एक ट्विटर हिअंडल ने आज सुबह स्वामी और तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के बीच 1992 में हुए पत्राचार को ट्विटर पर साझा किया था, जिसका स्वामी अकसर उल्लेख करते हैं। उसे रीट्वीट करते हुए स्वामी ने दस्तावेज़ों की वैधता पर मुहर भी लगा दी। 

अयोध्या पर फैसले के बाद योगी आदित्यनाथ ने गुरु को किया याद, शेयर की रामशिला की तस्वीर

अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और गोरक्षपीठ के महंत योगी आदित्यनाथ ने अपने गुरुओं महंत दिग्विजयनाथ, महंत अवैद्यनाथ और महंत रामचंद्र परमहंस को श्रद्धांजलि अर्पित की। अपने तीनों महंत गुरुओं को याद करते हुए उन्होंने लिखा, “गोरक्षपीठाधीश्वर युगपुरुष ब्रह्मलीन महंत दिग्विजयनाथ जी महाराज, परम पूज्य गुरुदेव गोरक्षपीठाधीश्वर ब्रह्मलीन महंत अवैद्यनाथ जी महाराज एवं परमहंस रामचंद्रदास जी महाराज को भावपूर्ण श्रद्धांजलि।”

योगी आदित्यनाथ ने अयोध्या आंदोलन के दौरान हुए एक शिलापूजन समारोह की तस्वीर शेयर करते हुए गोरक्षपीठ के पूर्व महंतों को श्रद्धांजलि अर्पित की। दरअसल, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जिस गोरक्षपीठ के पीठाधीश्वर हैं, उसका राम मंदिर आंदोलन में अहम योगदान रहा है। उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ और महंत अवैद्यनाथ गुरु महंत दिग्विजय नाथ, राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान होने वाले अनेकों कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका निभाते थे। जानकारी के अनुसार, महंत दिग्विजयनाथ ने 1950-60 के दशक में राम जन्मभूमि से जुड़े तमाम कार्यक्रमों में सक्रिय तौर पर काम किया था।

इससे पहले उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत करते हुए कई ट्वीट किए। इनमें उन्होंने लिखा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का स्वागत है, देश की एकता व सद्भाव रखने में सभी सहयोग करें, उत्तर प्रदेश में शांति, सुरक्षा और सद्भाव का वातावरण बनाए रखने के लिए पूर्ण रूप से प्रतिबद्ध है।

बता दें कि RSS प्रमुख मोहन भागवत ने एक प्रेस कॉन्फेन्स को संबोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत किया। अयोध्या फ़ैसले पर उन्होंने पूरे देश में आपसी भाईचारा बनाए रखने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि मामला दशकों से चल रहा था और यह सही निष्कर्ष पर पहुँच गया है।

RSS प्रमुख ने कहा कि इस फ़ैसले को जय-पराजय की दृष्टि से बिलकुल नहीं देखा जाना चाहिए। सत्य व न्याय के मंथन से प्राप्त निष्कर्ष को भारतवर्ष के सम्पूर्ण समाज की एकात्मकता व बंधुता के  परिपोषण करने वाले निर्णय के रूप में देखना व उपयोग में लाना चाहिए। सम्पूर्ण देशवासियों से अनुरोध है कि विधि और संविधान की मर्यादा में रहकर संयमित व सात्विक रीति से अपने आनंद को व्यक्त करें।

गद्दार है ओवैसी, इसकी औकात ही नहीं है कि हिन्दुस्तान का बँटवारा कर सके: बाबा रामदेव

योग गुरु बाबा रामदेव ने अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। बाबा रामदेव ने कहा कि राम का वनवास खत्म। अब अयोध्या में राम मंदिर बनेगा। उन्होंने सभी से फैसले को सहर्ष स्वीकार करने के साथ ही अराजक तत्वों से सावधान रहने की जरूरत की बात भी कही। बाबा रामदेव ने कहा कि इस फैसले को किसी की हार या जीत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लमिन (एआईएमआईएम) के अध्यक्ष और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने अदालत के फैसले को लेकर अपनी नाखुशी जाहिर करते हुए कहा कि वो इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। उनका कहना है कि उन्हें खैरात में पाँच एकड़ जमीन नहीं चाहिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम (सर्वोच्च) जरूर है, लेकिन वह अचूक नहीं है। उन्होंने कहा कि मुल्क हिन्दू राष्ट्र की ओर बढ़ रहा है। संघ अब काशी और मथुरा के मुद्दे को भी उठाएगा।

रिपब्लिक टीवी पर डिबेट के दौरान बाबा रामदेव ने ओवैसी की जमकर क्लास लगाई और उन्हें उनके ‘औकात’ के बारे में भी बताया। रामदेव ने ओवैसी को गद्दार बताया। उन्होंने कहा कि वो ओवैसी को गद्दार इसलिए कह रहे हैं क्योंकि उनका (ओवैसी) भारत और भारतीयता में आस्था नहीं है। उन्होंने कहा कि ओवैसी का अपना एक अलग मजहबी एजेंडा है। उस मजहबी एजेंडे को चलाकर ये अपना राज कायम रखना चाहते हैं और लोगों को अलग-अलग तरीके से भड़काना चाहते हैं।

बाबा रामदेव ने आगे कहा कि ओवैसी चाहते ही नहीं है कि हिन्दुस्तान के अंदर हिन्दू और मुस्लिम मिलकर शांति से रहे। ये मजहबी तौर पर झगड़े कराकर देश को बाँटना चाहते हैं। कोई हिन्दू राष्ट्र और कोई इस्लाम राष्ट्र की बात नहीं होगी। यह भारत है, यह हिन्दुस्तान है। उन्होंने कहा, “अगर ओवैसी का वश चले तो ये हैदराबाद में निजामी के समय की तरह ही दूसरा फसाद खड़ा कर दे, लेकिन इसकी औकात ही नहीं है इतनी कि हिन्दुस्तान का बँटवारा कर सके।”

उल्लेखनीय है कि अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार (नवंबर 9, 2019) को अपने फैसले में विवादित जमीन रामलला को देने का फैसला किया। जबकि मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही दूसरी जगह 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन रामलला को इसलिए दी है, क्योंकि मुस्लिम पक्ष जमीन पर दावा साबित करने में नाकाम रहा। जिसके बाद कोर्ट ने राम मंदिर निर्माण की रूपरेखा तय करने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार को दी है। कोर्ट ने केंद्र से तीन महीने के अंदर ट्रस्ट बनाने के लिए कहा है।

‘कारसेवकों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया, पूरे देश में हो राम राज्य’

महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) ने अयोध्या के फैसले पर ख़ुशी का इज़हार किया है। पार्टी के मुखिया और शिव सेना संस्थापक बाला साहेब ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि वे आज खुश हैं। उन्हें ख़ुशी है कि मंदिर के संघर्ष के लिए बलिदान देने वाले कार सेवकों के बलिदान व्यर्थ नहीं गए हैं।

गौरतलब है कि राम जन्मभूमि मंदिर के आंदोलन में विश्व हिन्दू परिषद, लाल कृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी के अलावा शिव सेना (2008 में मनसे के निर्माण से पहले राज ठाकरे की भी पार्टी) का भी बड़ा हाथ था। 1992 में बाबरी ध्वंस मामले में बाला साहेब ठाकरे को भी आरोपित के तौर पर नामजद किया गया था।

राज ठाकरे ने आज (9 नवंबर, 2019 को) राम मंदिर के जल्दी से जल्दी मंदिर निर्माण की माँग की है। उन्होंने साथ ही कहा कि राम मंदिर के अलावा उनकी इच्छा राष्ट्र में राम राज्य की भी है।

बाबरी मस्जिद निर्माण के 491 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुना राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। सीजेआई रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने साफ़ कर दिया कि मुस्लिम पक्ष अयोध्या की विवादित ज़मीन पर अपना दावा साबित करने में विफल रहा। राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट स्थापित कर 3 महीने के भीतर मंदिर निर्माण के लिए योजना शुरू की जाए, ऐसा सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है।

ट्रस्ट बनाने और मंदिर निर्माण की योजना के लिए तीन महीने का वक्त सरकार को दिया गया है। साथ ही शीर्ष अदालत ने कहीं और मस्जिद बनाने के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ जमीन देने का भी निर्देश दिया है। यानी, सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए अलग से ज़मीन दी जाएगी। सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि बाहरी हिस्से पर हिन्दुओं द्वारा पहले से ही पूजा की जा रही थी, इसमें कोई विवाद नहीं है। 1857 से पहले यहाँ हिन्दुओं द्वारा पूजा करने के सबूत हैं। मुस्लिम पक्ष को राम मंदिर बनाने के लिए अयोध्या में ही 5 एकड़ ज़मीन दी जाएगी।